भगवान श्री कृष्ण के कवच की सिद्धि — जन्माष्टमी का सात दिवसीय अनुष्ठान और कवच का रक्षण
श्री कृष्ण के रक्षक कवच को सिद्ध करने की विधि।
6 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
कृष्ण भक्त की पहली सिद्धि: भगवान श्री कृष्ण का कवच
जन्माष्टमी पर सिद्ध, स्मरण मात्र से रक्षण
वक्ता कहते हैं कि जो लोग भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति करते हैं, भगवती राधा और भगवान कृष्ण के माधुर्य स्वरूप और कृपा की प्राप्ति चाहते हैं, या साधना मार्ग और तंत्र मार्ग में कृष्ण से संबंधित मंत्रों की साधना करना चाहते हैं, उन्हें सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण के कवच की सिद्धि करनी चाहिए। वे कहते हैं कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी के समय यह कवच सिद्ध कर लिया जाए तो बाद में जब भी इसका प्रयोग किया जाए — स्मरण मात्र भी कर लिया जाए — तो भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अवश्य रक्षण प्राप्त होता है। जो कृष्ण और राधा की सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें यह कवच अवश्य सिद्ध करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह विषय उन लोगों के लिए है जो भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति करते हैं, जो भगवती राधा और भगवान कृष्ण के माधुर्य स्वरूप और उनकी कृपा की प्राप्ति करना चाहते हैं, और उनके लिए जो चाहते हैं कि साधना मार्ग में, तंत्र मार्ग में वे भगवान श्री कृष्ण से संबंधित विषयों को लेकर उनके मंत्र इत्यादि की साधना करें। इन सबके लिए, वे कहते हैं, सर्वप्रथम, सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण के कवच की सिद्धि करनी चाहिए। वे कहते हैं कि वे इस कवच को सिद्ध करने की विधि और इसके माध्यम से शरीर में कैसे रक्षा होती है, यह श्रोताओं के समक्ष रख रहे हैं। वे कहते हैं कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी के समय यह कवच सिद्ध कर लिया जाए तो बाद में जब भी इसका प्रयोग किया जाए — स्मरण मात्र भी कर लिया जाए — तो भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अवश्य ही रक्षण प्राप्त होता है। जो लोग भगवान श्री कृष्ण और भगवती राधा की सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें यह कवच अवश्य ही सिद्ध करना चाहिए।
कृष्ण कवच की सिद्धि का सात दिवसीय जन्माष्टमी अनुष्ठान
भोजपत्र, 1100 पाठ, चांदी का खोल, हवन, बच्चे के हाथ से धारण
वक्ता लगभग सात दिन का अनुष्ठान बताते हैं जो भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की द्वितीया से आरंभ होकर जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी तक चलता है। केवल कवच मूल — पहले से आठवें श्लोक तक, पूर्व पीठिका और फलश्रुति छोड़कर — सफेद भोजपत्र पर गोपी चंदन से, या केसर और गोरोचन मिली अष्टगंध की स्याही से चांदी, सफेद चंदन या लाल चंदन की लेखनी से, या कम से कम तुलसी की कलम से छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा जाता है। इसे कृष्ण के चरणों में रखकर सात दिन प्रतिदिन 108 पाठ किए जाते हैं और जन्माष्टमी की रात अधिकाधिक पाठ करके 1100 पाठ पूरे किए जाते हैं। फिर भोजपत्र को कृष्ण के स्वरूप, उनके नाम या राधा के नाम वाले चांदी के खोल में डालते हैं; जन्माष्टमी के अगले दिन कृष्ण के 108 नामों या सहस्रनाम से हवन होता है (पुरुष सामान्य घी से, स्त्रियां मिक्स पौष्टिक हवन सामग्री से), कम से कम पांच छोटे बच्चों और छोटी बच्चियों को माखन मिश्री आदि खिलाया जाता है, और कवच गले में धारण किया जाता है — उत्तम यह है कि पांच-सात वर्ष तक का अबोध बालक अपने हाथ से गले या बांह पर पहनाए। वे कहते हैं कि ऐसे धारण करने पर कहा जाता है कि सुदर्शन चक्र और गोपियां सर्वत्र रक्षा करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का पाठ श्री कृष्ण जन्माष्टमी के समय भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। से आरंभ करके जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी तक किया जाता है — लगभग सात दिन का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं।। सर्वप्रथम सफेद भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर, या जो भोजपत्र मिल जाए उस पर, कवच मूल लिखा जाता है। कवच मूल, वे समझाते हैं, केवल वह भाग है जिसमें भगवान कृष्ण के प्रत्येक अलग-अलग स्वरूप से रक्षण कहा गया है — पूर्व पीठिका और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। छोड़कर; यानी पहले श्लोक से आठवें श्लोक तक, अंत के श्लोक छोड़ देंगे। इतना श्लोक गोपी चंदन मिल जाए तो उससे लिखें। अन्यथा अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। की स्याही में केसरअष्टगंध की स्याही तथा देवी के अर्पण में प्रयुक्त केसर। और गोरोचनगाय से प्राप्त पीत द्रव्य, जो यंत्र लेखन तथा तिलक में प्रयुक्त होता है। मिलाकर, चांदी की लेखनी हो तो उससे, या सफेद या लाल चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। की लेखनी से। और कुछ न मिले तो, वे कहते हैं, तुलसी की कलम से भोजपत्र पर कवच छोटा-छोटा सा लिख लें। लिखने के बाद इसे भगवान श्री कृष्ण के चरणों में रखें। कवच बहुत छोटा है, इसलिए सात दिन तक प्रतिदिन 108 पाठ करें; और संभव हो तो कृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि में अधिकाधिक पाठ करें ताकि 1100 पाठ पूर्ण हो जाएं। 1100 पाठ पूर्ण होने पर लिखा हुआ भोजपत्र चांदी के सुंदर खोल में डालें जिस पर भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप बना हो, उनके नाम लिखे हों या भगवती राधा का नाम लिखा हो। जन्माष्टमी के अगले दिन जब भगवान श्री कृष्ण का पूजन हो, तब हवन करने के बाद कवच धारण करें। हवन कृष्ण की शतनामावली, उनके 108 नामों से, या इच्छा हो तो सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। इत्यादि से करें। पुरुष सामान्य घी से आहुति देंगे; स्त्रियां हवन सामग्री से — मिक्स, पौष्टिक हवन सामग्री से। पूर्णाहुति इत्यादि करके कम से कम बाल गोपालों को, छोटे-छोटे बच्चों को कुछ भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। — माखन मिश्री और जो संभव हो — खिलाएं: कम से कम पांच बच्चों को, और छोटी-छोटी बच्चियों को। फिर कवच गले में धारण करें। घर में कोई छोटा बच्चा, पांच-सात वर्ष तक का अबोध बालक हो, तो उसके हाथ से यह कवच गले या बांह में धारण करना और उससे आशीर्वाद लेना, वे कहते हैं, बड़ा उत्तम होता है। वे जोड़ते हैं कि कहा जाता है कि इस कवच को धारण करके जहां भी जाएं, भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्रभगवान विष्णु/नारायण का सुदर्शन चक्र अस्त्र, शास्त्रों में एकादशी जैसे व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले भक्तों के रक्षक रूप में वर्णित। और उनकी गोपियों के द्वारा सर्वत्र रक्षा होती है।
संतान प्राप्ति के लिए कृष्ण कवच
कवच का सबसे विशिष्ट फल
वक्ता कहते हैं कि इस कृष्ण कवच का सबसे विशिष्ट महत्व संतान प्राप्ति में है। यदि किसी व्यक्ति को, किसी स्त्री या पुरुष को, संतान प्राप्ति में बाधा हो रही हो तो इस कवच को धारण करने से उसके जीवन में यह संभावना बढ़ जाती है कि शीघ्र ही उसे शिशु की — पुत्र रत्न या पुत्री रत्न की — प्राप्ति हो।
वक्ता कहते हैं कि भगवान कृष्ण के इस कवच का एक सबसे विशिष्ट महत्व यह है: यदि किसी व्यक्ति को, किसी स्त्री या पुरुष को, संतान प्राप्ति में बाधा हो रही हो तो इस कवच को धारण करने से उसके जीवन में यह संभावना बढ़ जाती है कि शीघ्र ही उसे शिशु की प्राप्ति हो — पुत्र रत्न या पुत्री रत्न की प्राप्ति हो सकती है।
अभिचार, ग्रह और प्रेत-पिशाच बाधा के विरुद्ध कृष्ण कवच
कृष्ण की विशिष्ट सेवा के साथ; कार्यस्थल पर रक्षा और पदोन्नति भी
वक्ता कहते हैं कि कवच धारण के साथ-साथ यदि भगवान श्री कृष्ण की विशिष्ट सेवा की जाए तो इस कवच के माध्यम से जीवन में उपस्थित होने वाली किसी भी प्रकार की अभिचारिक बाधा, ग्रह कृत बाधा और प्रेत-पिशाच कृत बाधा से सर्वत्र रक्षा होती है। कार्यस्थल पर रक्षा होती है और पदोन्नति होती है। वे कहते हैं कि इस कवच के माध्यम से जीवन में होने चाहिए ऐसे हर प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि साथ ही साथ यदि आप भगवान श्री कृष्ण की विशिष्ट सेवा करते हैं तो इस कवच के माध्यम से — यदि आपके जीवन में किसी भी प्रकार की अभिचार बाधा, कोई ग्रह कृत बाधा, प्रेत-पिशाच कृत बाधा उपस्थित हो रही हो — इसके द्वारा आपकी सर्वत्र रक्षा होती है। कार्यस्थल पर आपकी रक्षा होती है, पदोन्नति होती है। यानी, वे कहते हैं, इस कवच के माध्यम से आपको हर प्रकार के वे लाभ प्राप्त होते हैं जो आपके जीवन में होने चाहिए।
जन्म कुंडली में दुर्बल भाग्य के लिए कृष्ण कवच
पीड़ित भाग्य ग्रह, नीच राशि, गलत भाव, राहु-केतु
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार भाग्य दुर्बल होता है — सभी कार्य कर रहे हैं लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहा। जन्म कुंडली का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि भाग्य के ग्रह पीड़ित हैं, नीच राशि में या गलत भाव में हैं, जिससे उनका प्रभाव सही प्रकार से नहीं मिल रहा, या वे राहु-केतु से ग्रसित हैं — इसे वे दुर्भाग्य कहते हैं। वे कहते हैं कि इस कवच को धारण करने से ऐसी ग्रह जनित बाधाएं और कुंडली का जो प्रभाव नहीं मिल रहा था, वह शुभ प्रभाव मिलने लगता है।
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि हमारा भाग्य काफी दुर्बल होता है: हम सभी कार्य कर रहे हैं लेकिन जो अपेक्षित परिणाम है वह नहीं मिल रहा। जन्म कुंडली का विश्लेषण करने पर, वे कहते हैं, पता चलता है कि हमारे भाग्य के जो भी ग्रह हैं वे कहीं पीड़ित हैं, नीच राशि में हैं, गलत भाव में हैं, जिसके कारण उनका प्रभाव सही प्रकार से नहीं मिल रहा; या वे राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। और केतु के द्वारा ग्रसित हैं, जिसके कारण उनका वैसा प्रभाव नहीं मिल पा रहा — और इसे हम दुर्भाग्य कहते हैं। वे कहते हैं कि इस कवच को धारण करने से इस प्रकार की जो भी ग्रह जनित बाधाएं हैं, और कुंडली का जो प्रभाव नहीं मिल रहा होता है, वह शुभ प्रभाव प्राप्त होने लगता है।
तीर्थ यात्रा में कृष्ण कवच का जाप
वृंदावन, गया, सप्तपुरी और नदी तीर्थ; आजीवन आश्रय
वक्ता कहते हैं कि जब कभी श्रीमद् धाम वृंदावन, गोलोक, मथुरा इत्यादि की यात्रा पर निकलें, भगवान नारायण के किसी स्वरूप जैसे गया जी में, किसी भी पुरी — सप्तपुरी — में, या गंगा जी, यमुना जी, त्रिवेणी संगम इत्यादि पर जाएं, तो इस कवच को धारण किए हुए वहां अवश्य ही इसका अधिकाधिक जाप करें, चलते-फिरते भी। वे कहते हैं कि कवच का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। आजीवन इसके आश्रय में रहकर भगवान कृष्ण और भगवती राधा की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
वक्ता कहते हैं कि जब कभी भी आप श्रीमद् धाम वृंदावन, गोलोक इत्यादि की, मथुरा इत्यादि की यात्रा पर निकलें; या भगवान नारायण के किसी भी स्वरूप — गया धाम जी, गया जी — या ऐसे किसी मुख्य स्वरूप स्थान, जितनी भी पुरियां हैं, सप्तपुरी में जाएं; या गंगा जी, यमुना जी, त्रिवेणी संगमप्रयागराज में गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती का संगम — जप के दौरान अशुद्ध विचार आने पर इसका स्मरण, अथवा गंगा-नर्मदा का मानसिक आवाहन, चित्त को तत्काल शुद्ध करने हेतु विहित है। इत्यादि पर जाएं — तो इस कवच को धारण किए रहते हुए वहां अवश्य ही इसका अधिकाधिक जप करें। चलते-फिरते, वे कहते हैं, उन धामों में इसका जाप कर सकते हैं। इस कवच का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। वे कहते हैं कि आजीवन इस कवच के आश्रय में रहकर आप भगवान कृष्ण और भगवती राधा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।