ज़्यादा पूजा-पाठ के बाद भी तंत्र अभिचार क्यों लगता है — कुल शक्ति और पितरों का बंधन, पूजा की चुराई हुई ऊर्जा, और उपाय घर में क्यों नहीं होता
योजनाबद्ध अभिचार घर की कुल शक्ति और पितरों को कैसे बाँधता है ताकि पूजा की ऊर्जा शत्रु की मसान शक्ति को मिले — और उपाय न घर का अनुष्ठान है न एक बार का उतारा, बल्कि घर के बाहर की गई अपनी साधना क्यों है।
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नियमित पूजा-पाठ करने वाला अभिचार पर संदेह सबसे बाद में क्यों करता है
इष्ट-सेवा सुरक्षा की गारंटी लगती है, और तंत्र इसी सोच के लिए बना है
वक्ता कहते हैं कि यह विषय उन साधकों और सामान्य गृहस्थों के लिए है जिन पर शत्रुओं ने तंत्र क्रियाएँ कर रखी हैं, जिनसे दुर्घटनाएँ और परेशानियाँ आ रही हैं और छुटकारा नहीं मिल रहा। शुरू में किसी को पता नहीं चलता कि अभिचार हुआ है, और मुख्य कारण यह है कि जो व्यक्ति किसी भी रूप में आस्तिक है और नियमित पूजा-पाठ करता है वह इसे मानेगा ही नहीं: उसे लगता है कि मैं इष्ट की सेवा करता हूँ, भगवान में रमा हूँ, मेरे साथ गलत हो ही नहीं सकता। वे कहते हैं कि तंत्र इसी सोच के लिए बना है; केवल सच्चा समर्पण अलग बात है, और तब भी आपके साथ रहने वालों तक वह पहुँच सकता है। जब तक वह गंभीरता से लेता है समस्या बढ़ चुकी होती है, क्योंकि अभिचार को जितना समय दें उतना बढ़ता है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज का विषय उन साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी।ों और सामान्य गृहस्थों के लिए है जो किसी भी प्रकार के तंत्र अभिचार से पीड़ित हैं — जिनके शत्रुओं ने उन पर विभिन्न प्रकार की तंत्र क्रियाएँ कर रखी हैं, जिसके कारण उनके जीवन में दुर्घटनाएँ और अनहोनी घटनाएँ घट रही हैं, और जो चाहकर भी इनसे छुटकारा नहीं पा रहे। वे कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि शुरू में किसी भी व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उस पर तंत्र प्रयोग हुए हैं या नहीं। इसके कई कारण हैं, पर पहला यह कि अगर व्यक्ति किसी भी रूप में आस्तिक है और पूजा-पाठ करता है — सामान्य ही सही, पर नियमित रूप से — तो कहीं न कहीं वह इस बात को मानेगा ही नहीं। सामान्य व्यक्ति की भावना यही होती है: मैं अपने इष्ट की सेवा कर रहा हूँ, निरंतर भगवान में रमा हुआ हूँ, तो मेरे साथ कुछ गलत हो ही नहीं सकता। वे कहते हैं कि तंत्र इसी सोच के लिए बना हुआ है। यह मन में इसलिए काम करता है क्योंकि अभी आपकी इतनी क्षमता नहीं है, चाहे आप इष्ट के प्रति कितने भी समर्पित हों। अगर सचमुच समर्पित रहेंगे तो बात अलग है, तब कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा — पर, वे जोड़ते हैं, प्रभाव *आप पर* नहीं पड़ेगा; आपके साथ रहने वाले लोगों तक वह फिर भी पहुँच सकता है। वे कहते हैं कि जब तक व्यक्ति इस बात को समझता और गंभीरता से लेता है, तब तक समस्या बढ़ चुकी होती है, क्योंकि अभिचार ऐसी चीज़ है जिसे जितना समय दें वह उतना बढ़ता है।
क्या कवच किसी अपने द्वारा खिलाई गई अभिमंत्रित वस्तु से बचा सकता है?
घर के भीतर से किया गया अभिचार हर कवच को बेकार कर देता है — शील्ड के भीतर बम
वक्ता कहते हैं नहीं: आप कितना भी सुरक्षात्मक कवच पहने हों, अगर आपका कोई अपना ही व्यक्ति खाने में मिलाकर कोई अभिमंत्रित वस्तु खिला दे तो वह कवच किस काम का — जैसे बहुत अच्छी शील्ड में बैठकर उसी जगह खुद बम फोड़ लेना। अभिचार का प्रक्षेपण दूर बैठकर ही हो, यह आवश्यक नहीं; ईर्ष्यालु अपना व्यक्ति कुछ खिला जाए, घर में कुछ रख जाए या वहाँ मसानी क्रिया कर जाए और पता भी न चले, और आस्तिक व्यक्ति यही मानता रहता है कि कोई शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती, जब तक कि समस्या बढ़ न चुकी हो — क्योंकि अभिचार को जितना समय दिया जाए वह उतना बढ़ता है।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र करने की विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ होती हैं। मान लीजिए हम बहुत ही अधिक सुरक्षात्मक कवच पहने हुए हैं और इष्ट के प्रति बहुत समर्पित हैं। लेकिन अगर आपका कोई अपना ही व्यक्ति किसी चीज़ में मिलाकर कोई अभिमंत्रित वस्तु आपको खिला दे तो वह कवच किस काम का? वे कहते हैं, आप बहुत अच्छी शील्ड में हैं, पर जिस जगह आप बैठे हैं वहीं खुद से बम फोड़ लीजिएगा तो वह शील्ड किस काम की, प्रोटेक्शन किस काम का? यही बात समझनी होती है: यह आवश्यक नहीं कि कहीं दूर बैठकर ही किसी प्रकार के अभिचार का प्रक्षेपण किया गया हो। हो सकता है कि आपका कोई अपना ही व्यक्ति ईर्ष्यावश — आपके सुख और उन्नति से जलकर — आपको कुछ अभिमंत्रित वस्तु खिलाकर चला जाए, आपके घर में कुछ रखकर चला जाए, या आपके घर पर आकर कोई मसानी क्रिया कर दे और आपको पता भी न चले, और आपके साथ विभिन्न समस्याएँ खड़ी हो जाएँ। शुरू-शुरू में, अगर व्यक्ति आस्तिक है, तो यही सोचता रहता है कि मैं अपने इष्ट के प्रति समर्पित हूँ, इस प्रकार की कोई शक्ति किसी भी प्रकार से मेरा अहित नहीं कर सकती। वे कहते हैं कि जब तक वह इस बात को समझता और गंभीरता से लेता है, तब तक समस्या बढ़ चुकी होती है — क्योंकि अभिचार ऐसी चीज़ है जिसे आप जितना समय देंगे वह उतना बढ़ेगा।
योजनाबद्ध अभिचार पूजा करने वाले घर की कुल शक्ति और कुल पितरों को कैसे बाँधता है
घर का भेद लो, शक्ति बाँधो, द्वार के पितरों को हटाओ
वक्ता कहते हैं कि जो घर नियमित पूजा करता है, अपनी शक्तियों को भोग-भेंट देता है और अपने कुल देवी-देवता को जानता है, उस पर सामान्य अभिचार काम नहीं करता; काम करता है पूरी तरह योजनाबद्ध अभिचार, जिसे वे अपने जीवन के अनुभव से बताते हैं कि लोग कैसे धोखा करते हैं। शत्रु पहले घर का भेद लेता है: कौन-सी शक्ति पूजित है और उसे कैसे मनाया जाता है। फिर वह कुल शक्ति को वचन, भोग या मंत्रात्मक शक्ति से बाँधने का प्रयास करता है; सामान्य लोक-देव रुक जाते हैं, जबकि बहुत समय से पूजित बृहद शक्ति आसानी से नहीं बँधती और स्वप्न या सवारी के माध्यम से परिवार को सावधान करती है। चेतावनी न आए तो समझिए वह रोक दी गई है। उसके बाद कुल पितृ, जो सदैव द्वार पर रहते हैं जबकि कुल शक्तियाँ पूजन स्थान से द्वार पर पहरा देती हैं, भोग या अन्य उपाय से रोके जाते हैं। यह सब पूरी जानकारी वाली घुसपैठ है; तभी अभिचार का प्रयोग किया जाता है।
वक्ता कहते हैं, यह कैसे बढ़ता है, यह भी जानिए। मान लीजिए आप साधना मार्ग पर हैं, या साधारण रूप से नियमित पूजा-पाठ करते हैं; अपने घर की शक्तियों को भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य।, पूजा और भेंट देते हैं और जानते हैं कि घर में कौन-सी शक्ति पूजित है, आपके देवी-देवता और कुल की शक्तियाँ कौन हैं। इसके बाद भी अभिचार कैसे हो जाता है? क्योंकि करने वाला सामान्य तरीके से नहीं करेगा; नियमित सेवा-पूजा करने वाले पर सामान्य अभिचार प्रभावी नहीं होता। यह पूरी तरह योजनाबद्ध अभिचार होगा: सबसे पहले वह आपके घर का भेद लेगा, कौन-सी शक्ति पूजित है, उसकी पूजा-भोग-भेंट क्या है, उसे कैसे मनाया जाए। वक्ता ज़ोर देते हैं कि यह वे पढ़-लिखकर नहीं बता रहे; अपने जीवन के अनुभवों से, क्योंकि उन्होंने स्वयं झेला और देखा है कि लोग कैसे धोखा करते हैं। सबसे पहले वे आपकी कुल शक्ति को बाँधने की कोशिश करेंगे: वचन के द्वारा, भोग के द्वारा या मंत्रात्मक शक्ति के द्वारा। घर में सामान्य शक्ति या लोक-देव पूजित हों तो वे रुकने लगते हैं। बहुत समय से पूजित बृहद शक्ति इतनी आसानी से बंधित नहीं होगी, और स्वप्न इत्यादि के माध्यम से, या घर में जिस पर सवारी आती हो उसके माध्यम से, बता भी देगी: देखो ऐसी-ऐसी परेशानी हो रही है, सावधान रहो, और उपाय भी बता देगी। अगर ऐसा कुछ न हो और स्वप्न से कुछ पता ही न चले, तो इसलिए कि तब तक शत्रु ने सब पता कर लिया है, शक्ति क्या है और उसे कैसे रोकना है, और उसे रोक दिया गया है। कुल शक्ति के बाद सबसे पहला कार्य कुल के पितृों को हटाना होता है; हर कुल में पितृ होते ही हैं, उनकी सेवा होती हो या नहीं, और भोग देकर या किसी और प्रकार से उन्हें रोका जाता है। एक बात सदैव याद रखिए: इसमें घुसपैठ ही होती है। बिना पूरी जानकारी के कोई भी बहुत समय से पूजित कुल शक्तियों के साथ इतनी आसानी से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। अगर आप पूजा-पाठ करते ही नहीं तब तो उनके लिए बहुत आसान है; वे उस घर की बात कर रहे हैं जहाँ दो-तीन पुश्त से शक्ति पूजित है और फिर भी अभिचार हो जाता है। वे कहते हैं कि कुल पितृ सदैव आपके द्वार पर रहते हैं; कुल शक्तियाँ पूजन स्थान में होती हैं और उनका भी द्वार पर पहरा रहता है। इसलिए पहले उन्हें रोका जाता है, और उसके बाद ही अभिचार का प्रयोग किया जाता है।
कुल रक्षक बँधने पर शत्रु की मसान शक्ति को मिलने वाली पूजा की ऊर्जा
जितनी पूजा बढ़ाएँ, घुसपैठिया शक्ति उतनी बलवान
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद शत्रु किसी वस्तु के माध्यम से या अभिमंत्रित चीज़ छिड़ककर आपके घर में मसानिक शक्ति स्थापित कर देता है — एक बार में न हुई तो दो-तीन बार में। आप पूजा-पाठ करते रहते हैं और ऊर्जा बनती भी है, पर जप-पूजा की वह ऊर्जा अब आपके इष्ट, कुल शक्तियों या कुल पितरों तक पहुँच ही नहीं पाती, क्योंकि तंत्र प्रक्रिया से उन्हें छानकर अलग कर दिया गया है, बाँध दिया गया है। तो वह ऊर्जा उस शक्ति के पास जाती है जिसका प्रक्षेपण शत्रु ने किया है, और वह आपकी पूजा ग्रहण करने लगती है। परेशानी बढ़ने पर आप पूजा, भोग और क्रियाएँ बढ़ाते हैं, और वह शक्ति और अधिक बलवान होती जाती है।
वक्ता कहते हैं कि रक्षकों को रोकने के बाद अभिचार का प्रयोग किया जाता है — कोई मसानिक शक्ति चला दी जाती है। आप तो पूजा-पाठ कर रहे थे, पर उन्होंने आपके घर में मसान शक्ति स्थापित कर दी — किसी वस्तु के माध्यम से लाकर, या कोई अभिमंत्रित चीज़ छिड़ककर; एक बार में न हुई तो दो-तीन बार किया और वह हो गई। जिस भी तरह से, उन्होंने अपना अभिचार कर दिया। अब आप पूजा भी कर रहे हैं, पाठ भी कर रहे हैं। होता यह है कि ऊर्जा अभी भी बन रही है — आप पूजा कर रहे हैं तो ऊर्जा बनेगी — लेकिन पूजा-पाठ और जप की वह ऊर्जा अब आपके इष्ट तक, कुल की शक्तियों तक, कुल पितरों तक पहुँच ही नहीं पाती, क्योंकि तंत्र प्रक्रिया के द्वारा उन्हें छानकर पूरी तरह अलग कर दिया गया है, बाँध दिया गया है। अब वे ले नहीं पाएँगे। तो वह ऊर्जा कहाँ जा रही है? वे कहते हैं, उन शक्तियों के पास जिनका प्रक्षेपण आपके शत्रुशत्रु, इन प्रवचनों के व्यावहारिक अर्थ में — जो सामान्य अथवा तांत्रिक उपायों से गृहस्थ के विरुद्ध कार्य करता है। ने अभिचार के माध्यम से किया या करवाया है। अब वह शक्ति आपकी पूजा ग्रहण करना आरंभ कर देती है। परेशानी बढ़ेगी तो आप पूजा बढ़ाएँगे; पूजा बढ़ाएँगे, भोग बढ़ाएँगे, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ करने लगेंगे — और अगर आपको विश्वास हो जाएगा कि यह चल रहा है, तो वह शक्ति और अधिक बलवान होती जाएगी।
सावधानी: वक्ता की विशेष हनुमान साधना केवल बंधित कुल शक्ति वालों के लिए
जो बंधित नहीं, वे करेंगे तो बंध जाएँगे
ग्रुप में डाली गई पोस्ट के प्रश्न का उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि जिस विशेष हनुमान साधना की बात उन्होंने कही थी वह उन्हीं लोगों के लिए है जिनके साथ यह घटना हुई है — जिन्हें पता है कि उनकी कुल शक्ति बंधित है। यह केवल उन्हीं के लिए है; जिनकी शक्ति बंधी हुई नहीं है वे अगर करेंगे तो बंधित हो जाएँगे। उनका आशय उन लोगों से था जिनके कुल पितृ और शक्तियाँ बंधी हैं, जिन्हें पूरा पता है कि अभिचार हुआ है और अभिचार शक्ति उनकी पूजा-पाठ ग्रहण कर रही है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक बात आती है: उन्होंने ग्रुप में एक पोस्ट डाली थी, और उस प्रश्न का उत्तर अब दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि हनुमान जी की एक विशेष साधना वैसे व्यक्तियों को करनी है जिनके साथ यह घटना हुई है — या जिन्हें कम से कम यह पता होना चाहिए कि उनकी कुल शक्ति बंधित है। यह केवल उन्हीं लोगों के लिए है। जिनकी शक्ति बंधी हुई नहीं है, वे अगर करेंगे तो बंधित हो जाएँगे। वे कहते हैं कि वे जो बताने वाले थे, वह उन लोगों के लिए था जिनके घर के पितृ और कुल बंधे हैं, जिन्हें पूरा पता है कि अभिचार बिल्कुल हुआ है, अभिचार शक्ति इस प्रकार उनकी पूजा-पाठ ग्रहण कर रही है, और वे इससे परेशान हो रहे हैं।
अभिचार-पीड़ित का पहला नियम: घर में बड़ा अनुष्ठान नहीं, और वैदिक मार्ग पहुँच से बाहर क्यों
दुर्लभ शास्त्री और डेढ़-दो लाख का खर्च
ऐसी स्थिति में व्यक्ति क्या करे, इस पर वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला काम यह है कि घर में कभी कोई बड़ा अनुष्ठान न करें। अगर सामान्य वैदिक मार्ग अपनाएँ तो, वे कहते हैं, आजकल ऐसे धर्म-धुरंधर शास्त्री-पंडित सामान्य रूप से मिलते नहीं जो पूरे विधि-विधान से पूजा-पाठ और अनुष्ठान पूर्ण कर दें, और मिलें भी तो उनकी फीस से अलग वास्तविक खर्च ही डेढ़-दो लाख रुपए हो जाता है, जो पीड़ा से पहले ही टूट चुका व्यक्ति वहन नहीं कर पाता और वहीं धरा रह जाता है।
तो इस स्थिति में व्यक्ति को क्या करना चाहिए? वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला काम यह है कि घर में कभी कोई बड़ा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। न करें। और यह भी जान लें कि इसमें कैसा अनुष्ठान प्रभावी होगा। वे कहते हैं कि अगर आप सामान्य वैदिक अनुष्ठान करेंगे, तो अभी के समय में ऐसे धर्म-धुरंधर शास्त्री, पंडित, ब्राह्मण सामान्य रूप से मिलने वाले नहीं हैं जो पूरे विधि-विधान से आपका पूरा पूजा-पाठ और अनुष्ठान पूर्ण करें। अगर मिलते हैं तो उनकी माँग बहुत अधिक होगी — या यूँ कहें, वे स्पष्ट करते हैं, कि वे जो फीस लेंगे वह अलग है, पर वास्तविक खर्च ही इतना हो जाता है, पूजन-पाठ की सामग्री में डेढ़-दो लाख रुपए लग जाते हैं, और तब तक आपकी आर्थिक स्थिति ऐसी बची नहीं होती कि आप उतना कर पाएँ। तो, वे कहते हैं, आप वहीं धरे रह जाते हैं; आप वह करवा नहीं पाते।
जेन्युइन साधक का उतारा एक-दो पक्ष में क्यों पलट जाता है
शत्रु बलि दोगुनी करता है; अदृश्य तंत्र विश्वास तोड़ता है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के मार्ग में कोई व्यक्ति आपका साथ कब तक देगा: शत्रु जैसे ही देखेगा कि इस पूजन-भोग-भेंट से उसका काम रोका गया है, वह उसका दोगुना दे देगा — अगर उसने एक मुर्गे का कलेजा दिया है तो अब दो देने होंगे, तंत्र में यही होता है। जेन्युइन तांत्रिक आपको ईमानदारी से बताएगा कि कितना लगेगा, और चूँकि आप कुछ देख नहीं रहे, आपको शक होगा कि वह ठग रहा है और आप छोड़ देंगे। मान लीजिए सही व्यक्ति ने कम पैसे में उतारा कर दिया और सब लाइन पर आ गया, तो वह एक-दो पक्ष चलेगा; शत्रु को पता चलते ही वह पलट देगा, फिर वही स्थिति, साधक पर वही संशय, और विश्वास टूट जाएगा — क्योंकि भीतर जो तंत्र की प्रक्रिया चल रही है उसे आप समझ ही नहीं पाते, इसलिए कुछ पूरा नहीं होता और आप भटकते रह जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर तंत्र की पद्धति में जाइएगा तो कोई भी व्यक्ति कब तक आपका साथ देगा? वह एक बार देख लेगा कि यह चीज़ ऐसी-ऐसी है, शत्रु तो आपका प्रबल है — शत्रु एक बार नहीं, दस बार विचार करेगा। और आप क्या करेंगे जब अगला आदमी देखेगा कि इस पूजन-भोग-भेंट से इसे रोका गया है? वह उसका दोगुना देकर उतार देता है। अगर उसने एक मुर्गे का कलेजा दिया है तो अब दो देने होंगे। वे कहते हैं कि तंत्र में जाइए तो यही सब होने वाला है। अब आपके सामने अगला व्यक्ति — जो जेन्युइन तांत्रिक या साधक है, जो भी है — आपको ईमानदारी से बताएगा कि हाँ, यह-यह चीज़ लगेगी, इतना-इतना लगेगा। सुनने के बाद, चूँकि आप कुछ देख नहीं रहे, आपके मन में शक ही आएगा कि भाई यह ठग रहा है, खाने के लिए बोल रहा है, मेरा इतना पैसा लग रहा है — और आप वहाँ से छोड़ देंगे। मान लीजिए इसके बजाय कोई सही व्यक्ति थोड़े कम पैसे में मिल गया और उसने उतारा कर भी दिया। एक बार किया, आपका सब कुछ ठीक होने लगा, कुछ समय के लिए चीज़ लाइन पर आ गई, वह चीज़ हटा दी — बहुत अच्छी बात है। पर कितने समय तक? एक पक्ष, दो पक्ष। आपके शत्रु उसे पलटे बिना नहीं रहेंगे; जैसे ही उन्हें पता चलेगा वे पलट देंगे, और आपकी फिर वही स्थिति। अब जिस साधक के पास आप गए थे उसके बारे में मन में फिर वही संशय: इनके पास गए, कुछ हुआ नहीं, फिर वही जस की तस स्थिति। आपका विश्वास टूट जाएगा। चूँकि जो टेक्निक वहाँ काम कर रही है, जो तंत्र की प्रक्रिया भीतर चल रही है, उसे आप समझ ही नहीं पाते, इसलिए आप किसी पर विश्वास नहीं कर पाते, रिज़ल्ट नहीं मिलता, कोई चीज़ कभी पूरी नहीं होती और आप भटकते रह जाते हैं। वे कहते हैं कि आप भी जेन्युइन हों, सामने वाला साधक भी जेन्युइन हो, तब भी ऐसा होने का कारण यही है।
अभिचार के विरुद्ध उग्र शस्त्र-मंत्र प्रयोग घर में कभी क्यों नहीं करने चाहिए
जमी मसान शक्ति को कष्ट दो तो वह चार गुना पलटवार करती है
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में साधक महाशक्तियों के उग्र तंत्रोक्त कवच या तंत्रोक्त-मंत्रोक्त पाठ करवाता है — बाँधने, मारने, तोड़ने-फोड़ने वाले शस्त्र मंत्र, "बंध बंध, भक्ष भक्ष, रक्ष रक्ष" वाले — पूरे विधि-विधान के साथ, पर अगर आपके साथ यह समस्या है तो वह विधान घर में कभी नहीं होता। घर में करने पर, बिना पहले सिद्ध किए, ये मंत्र आपके एंटी-पार्टी बनकर बैठी मसान शक्ति को कष्ट देते हैं; उसे जैसे ही कष्ट होगा वह आपको और कष्ट देगी। जिस शक्ति को आपने डेढ़-दो साल इष्ट के लिए दी गई पूजा खिलाई है, उसे अब लाठी मारकर निकालने चलेंगे तो वह निकलेगी नहीं — आप ही को चार लाठी और देगी, शरीर में समस्या पैदा करेगी, पूजा करने जाइएगा तो एक्सीडेंट करवा देगी, और आप कहेंगे कि महादेव की पूजा भी फलित नहीं हो रही और महादेव पर से विश्वास उठ जाएगा — क्योंकि चल कुछ और रहा है और आप देख कुछ और रहे हैं।
वक्ता अब बताते हैं कि वे क्या करवाने वाले थे, और कोई भी साधक ऐसी परिस्थितियों में क्या करवाता है: किसी महाशक्ति की उग्र शक्तियों का उग्रात्मक तंत्रोक्त कवच, या तंत्रोक्त-मंत्रोक्त पाठ — शस्त्रोक्त पाठ, अर्थात् शस्त्र धारण करने वाले स्वरूपों के शस्त्र मंत्र, जो किसी को बाँधने, मारने, तोड़ने-फोड़ने के होते हैं — "बंध बंध, भक्ष भक्ष, रक्ष रक्ष" वाले मंत्र। इनके विधि-विधान होते हैं और पूरा विधान करवाना पड़ता है। लेकिन अगर आपके साथ यह समस्या है तो वह विधान घर में कभी नहीं होता। अगर घर में करेंगे तो आपकी परेशानी बढ़ेगी। कैसे? जब आप इस प्रकार के मंत्रों का प्रयोग करेंगे — जिन्हें आपने पहले से सिद्ध नहीं किया है, और जिन्हें किसी और से सुनकर करना आरंभ कर देते हैं — तो सामने जो मसान शक्ति, अभिचारात्मक शक्ति आपकी एंटी-पार्टी बनकर बैठी है, उसे कष्ट होना आरंभ हो जाएगा। उसे जैसे ही कष्ट होगा, वह आपको और कष्ट देना शुरू कर देगी। वे कहते हैं, आप उसे मारेंगे-पीटेंगे — पर मान लीजिए कि वह डेढ़-दो साल से आपके घर में बैठकर आपकी पूजा, पाठ, भोग, भेंट सब ले रही है; आप अपने इष्ट को दे रहे हैं और ले वह रही है। दो साल आपने उसे बैठाकर खिलाया। अब उसके बाद आप उसे लाठी मारकर सोच रहे हैं कि घर से निकाल दें। वह कभी निकलेगी? नहीं निकलेगी। वह आप ही को चार लाठी और देगी कि तुम करना छोड़ दो: विभिन्न प्रकार से कष्ट देगी, आपके शरीर में समस्या उत्पन्न कर देगी, और आप उसे हटा ही नहीं पाएँगे। आप पूजा-पाठ करने जाइएगा तो उसमें कोई एक्सीडेंट करवा देगी। फिर आप कहेंगे: हम तो फलाने देवी-देवता की पूजा शुरू किए थे, शिव जी की यह पूजा शुरू किए थे और मेरे साथ यह घटना घट गई — यानी महादेव की पूजा फलित नहीं हो रही। अब आपको महादेव पर भी विश्वास नहीं होगा। वहाँ जो टेक्निक चल रही है उसे आप समझ नहीं पा रहे: चलता कुछ और है, वह कुछ और रहा होता है, आप किसी और को देख लेते हैं। है कुछ और, देख रहे हैं कुछ और। वे कहते हैं कि इसीलिए इन चीज़ों को करवाने का एक विशेष तरीका होता है।
अभिचार से स्थायी सुरक्षा: आकलन के बाद निवारण, फिर घर के बाहर अपनी साधना
एक बार में इलाज नहीं, और पीड़ित के लिए घर में साधना कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि इन चीज़ों को करवाने का विशेष तरीका भी एक बार में प्रभावी नहीं हो सकता; पूरी तरह देखना पड़ता है कि यह प्रभावी होगा या नहीं और इसे हटाया भी जा सकता है या नहीं। और एक बात सदैव ध्यान रखें: आप कितने भी बड़े साधक के पास जाएँ, अगर किसी शत्रु ने आप पर अभिचार किया है तो जीवन में पूर्ण रूप से सुरक्षित आप तभी होंगे जब स्वयं साधना शुरू करेंगे। समापन में उनका निर्देश है कि इस प्रकार की समस्या वाले लोग कभी घर पर साधना न करें; साधनाएँ घर के बाहर करनी होती हैं। बाकी विवरण, वे कहते हैं, आगे के वीडियो में बताएँगे।
वक्ता कहते हैं कि इन चीज़ों को करवाने का एक विशेष तरीका होता है, और उस तरीके से भी ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता कि काम एक बार में प्रभावी हो जाए। पूरी तरह देखना पड़ता है कि यह चीज़ प्रभावी होगी या नहीं, इस चीज़ को हम हटा सकते हैं या नहीं। और एक बात सदैव ध्यान रखिए, वे कहते हैं: आप कितने भी बड़े साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। के पास चले जाइए — अगर आप पर कोई रास्ते-घाट की चीज़ लगी है, किसी शत्रु ने अभिचार किया है, तो जीवन में पूर्ण रूप से सुरक्षित आप तभी हो पाएँगे जब आप स्वयं साधना शुरू करेंगे। नहीं तो, वे कहते हैं, आप उसी स्थिति में रह जाते हैं जो वे अपने पास आने वाले बहुत से लोगों में देखते हैं। वक्ता कहते हैं कि वे आशा करते हैं कि लोग इन सब बातों से समझेंगे कि कैसे क्या करना होता है। नवरात्रि में उन्होंने जो मैसेज डाला था कि साधना कैसे करनी है — जो लोग उससे जुड़े और उनसे पूछा — उनके लिए यही बात है: जिन लोगों के साथ इस प्रकार की समस्याएँ हैं, उन्हें कभी भी घर पर साधना नहीं करनी है; उन्हें साधनाएँ घर के बाहर करनी होती हैं। बाकी सारा विवरण, वे कहते हैं, आगे आने वाले वीडियो में बताएँगे।
एक साधक से परामर्श लें, दस से नहीं: समस्या हर जगह भेजने से कुछ क्यों नहीं होता
तीन सलाहकार, तीन उपाय; भटकना ही प्रारब्ध
वक्ता कहते हैं कि वे हर व्यक्ति को अच्छा समय देते हैं, और अगर नहीं देते तो उसके पीछे कारण होता है — जैसे जब कॉपी-पेस्ट किया हुआ मैसेज ही बता देता है कि उस व्यक्ति ने वही समस्या दस-पंद्रह लोगों को फ़ॉरवर्ड की है। ऐसे लोगों से वे कहते हैं कि किसी एक व्यक्ति से परामर्श लें: हर जेन्युइन साधक कोई एक चीज़ देखेगा, उसी को पकड़ेगा और अपने अनुसार बताएगा, तो तीन लोग तीन अलग बातें बता देंगे और बंदा कुछ नहीं कर पाएगा। वे कहते हैं कि ऐसे लोगों की स्थिति द्वार-द्वार जाकर पचास तरह का खाना सूँघने वाले कुत्तों जैसी होती है, जिनका पेट सूँघने से ही भर जाता है और खाते कुछ नहीं — और इसमें उनकी गलती भी नहीं; उनका प्रारब्ध ही ऐसा है कि केवल भटकना लिखा है, और अगर करने बैठ भी गए तो घर में जो चीज़ बैठी है वह करने नहीं देगी।
वक्ता कहते हैं कि वे एक-एक व्यक्ति को बहुत अच्छा समय देते हैं और ऐसा कभी नहीं करते कि आज बोला और कल बात नहीं करेंगे; अगर नहीं करते तो उसके पीछे कोई कारण होता है। कभी लोग ऐसे प्रश्न पूछ देते हैं कि उन्हें लगता है कि यह व्यक्ति अभी दस जगह भटक रहा है। एक व्यक्ति ने, वे बताते हैं, वही मैसेज दस-पंद्रह लोगों को फ़ॉरवर्ड किया था — उनके पास वही फ़ॉरवर्ड किया हुआ, कॉपी-पेस्ट मैसेज आया, जिसमें पूरा दिख जाता है कि किसे कॉपी किया है, किसे भेजा है, कितने बजे, किस तारीख़ को। उन्होंने कहा: किसी एक व्यक्ति से परामर्श लीजिए — दस जगह क्यों भेज रहे हैं? वे कहते हैं कि उनका प्रश्न यह नहीं कि कौन फ़्रॉड है और कौन नहीं। हर व्यक्ति, जेन्युइन हो या कुछ भी, कोई एक चीज़ देखेगा, उसी को पकड़ेगा और तदनुसार बताएगा कि आपको यह-यह करना है। अगर जिज्ञासु ने तीन व्यक्तियों को भी भेजा और तीनों ने अपने-अपने अनुसार बोल दिया, तो बंदा क्या करेगा? वे कहते हैं कि ऐसे लोगों की स्थिति कुत्तों जैसी होती है: हर द्वार पर जाएँगे, वहाँ रखा खाना खाएँगे नहीं — सूँघकर आगे बढ़ जाएँगे। खाना कितना भी स्वादिष्ट हो, उन्हें लगेगा यह भी स्वादिष्ट है, वह भी, वह भी; पचास तरह का खाना सूँघ लेंगे, सूँघने से ही पेट भर जाएगा, कभी कुछ कर नहीं पाएँगे, और पेट गड़बड़ होता रहेगा। और इसमें उनकी गलती भी नहीं: इसे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कह लीजिए — प्रारब्ध ही ऐसा हो गया है कि ये जीवन में कभी कुछ नहीं कर सकते; इनके लिए केवल भटकना लिखा है। ये उनके वीडियो सुनकर भी भटकेंगे और किसी और की अच्छी-अच्छी बातें सुनकर भी भटकेंगे। और अगर करने बैठ गए तो जो चीज़ इनके घर में बैठी है वह करने नहीं देगी — तो करेंगे कहाँ से?
एक बार किए सप्तशती या सप्तश्लोकी अनुष्ठान की राहत क्यों चुक जाती है
पहले फल की माया, और बिना नई जमा के खर्च होती पूँजी
वक्ता कहते हैं कि माया बहुत प्रबल होती है: कोई भी अनुष्ठान एक बार कर लीजिए — दुर्गा सप्तशती या सप्तश्लोकी का अनुष्ठान, नवरात्रि के नौ दिन सुबह 108 शाम 108 — तो काम बने या न बने, शक्ति बहुत भयानक माया दिखाती है और कहीं न कहीं जगदंबा की कृपा भी हो जाती है। व्यक्ति की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है, पर उसे भीतर बनी ऊर्जा, मणिपूरक चक्र का स्पंदन महसूस होने लगता है, स्वप्न में दृष्टांत और चित्र दिखने लगते हैं, और साधना का शुभ प्रभाव मिलते ही वह स्वयं को तुरंत सिद्ध मान लेता है और दूसरों को परामर्श देने लगता है। कुछ दिन बाद फिर मैसेज आता है कि परेशानी लौट आई — क्योंकि जो साधना जारी नहीं रखी गई उसकी ऊर्जा पंद्रह दिन, बीस दिन, ज़्यादा से ज़्यादा तीन-छह महीने रहती है; जमा पूँजी खत्म हो रही है और नया कुछ डाला नहीं जा रहा, तो समस्या फिर बढ़ जाती है।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में एक और चीज़ देख लीजिए, उनके व्यक्तिगत अनुभव से। छह-सात महीने पहले लोग उन्हें मैसेज करके पूछते थे: भैया यह चीज़ है, मुझे यह प्राप्त नहीं हुआ, मेरे घर में यह परेशानी है, इससे कैसे छुटकारा पाएँ। उन्होंने एक-एक चीज़ बताई, काफी अच्छा समय दिया, कहा कि ऐसे-ऐसे करो — और उन्होंने किया। वे कहते हैं, माया बहुत प्रबल होती है। अगर आप कोई भी अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कर लेते हैं, तो काम बने या न बने, शक्ति, ऊर्जा बहुत भयानक माया दिखाती है। दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान, सप्तश्लोकी का अनुष्ठान एक बार ही कर लीजिए, माया तुरंत प्रबल हो जाती है। आपको लगता है: अरे, मैंने सप्तश्लोकी का इतना बड़ा अनुष्ठान कर लिया — नवरात्रि के नौ दिन रोज़ सुबह 108 शाम 108, सोचो कितनी बड़ी साधना कर ली — और कहीं न कहीं शक्ति की, महाशक्ति जगदंबा की कृपा हो भी जाती है। अब व्यक्ति क्या करता है? उसकी समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है, पर स्वयं के भीतर जो ऊर्जा बनी है — मणिपूरक चक्र का जो स्पंदन उसे महसूस होने लगा है, स्वप्न के माध्यम से जो दृष्टांत दिखने लगे हैं, स्वप्न में जो विभिन्न चित्र दिखने लगे हैं — जब साधना का यह शुभ प्रभाव मिलने लगता है तो व्यक्ति स्वयं को तुरंत सिद्ध बना लेता है। फिर वक्ता देखते हैं कि वही व्यक्ति किसी दूसरे को परामर्श दे रहा है। उन्होंने सोचा: वाह, इसकी अपनी समस्या तो सुलझ गई होगी। कुछ दिन बाद फिर उसका मैसेज आया: भैया, अभी तो ऐसी-ऐसी परेशानी हो गई। क्योंकि साधना की ऊर्जा कितने समय तक रहेगी? बहुत रहेगी तो पंद्रह दिन, बीस दिन, तीन महीने, छह महीने — अगर आप जारी ही नहीं रख रहे तो कहाँ से? नौ दिन तो आप बहुत अच्छे से रह लिए, पर उसके बाद नहीं, तो ऊर्जा का ह्रास हो रहा है, खत्म हो रही है। जो सेविंग आपने की थी वह खत्म हो रही है और नया आप उसमें डाल नहीं रहे; उसके बाद आपकी समस्या फिर बढ़ जाएगी। वे कहते हैं कि यही सारी चीज़ें होती हैं।
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