जन्म, विवाह और मृत्यु में तंत्र सबसे आसान क्यों
अशुद्धि व मांगलिक अवसरों पर प्रहार क्यों टिकता है।
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सूतक-पातक और घर के मांगलिक कार्यों के समय तंत्र सबसे अधिक प्रभावी क्यों होता है?
देव शक्तियाँ हटती हैं, पितृ पहरे पर होते हैं, और पितृ अशुद्ध किए जा सकते हैं
वक्ता कहते हैं कि घर में शादी-ब्याह, बच्चे के जन्म या किसी की मृत्यु के समय किया गया तंत्र वह होता है जो बाद में किसी को दिखाने-सुनाने पर पता चलता है, जबकि होना यह चाहिए कि सूतक-पातक में तंत्र का प्रभाव विशेष न हो। उनकी व्याख्या: इन सभी समयों में घर के कुल पितृ आए होते हैं; मांगलिक कार्य में देव शक्तियाँ उपस्थित रहती हैं, पर सूतक-पातक में वे उस स्थान से हटकर अलग रहती हैं, तब पितृ ही देव-तुल्य होकर हर चीज का दायित्व सँभालते हैं, और पितरों को क्षुद्र विद्या से आसानी से अशुद्ध किया जा सकता है। ईर्ष्यालु लोग और तंत्र-प्रवृत्ति वाले करने वाले यह जानते हैं और इसी का लाभ उठाते हैं; और ईर्ष्यालु व्यक्ति, वे जोड़ते हैं, कभी आपका भला नहीं चाहता और परवाह नहीं करता कि किस माध्यम से, किस स्तर तक गिरकर प्रयोग करवा रहा है।
वक्ता प्रश्न से शुरू करते हैं: जब घर में सूतक-पातक पड़ा हो या कोई मांगलिक कार्य होने वाला हो, उसी समय तंत्र सबसे ज्यादा प्रभावी क्यों होता है? घर में शादी-ब्याह है और तंत्र का प्रभाव; कहीं दिखाएँ-सुनाएँ तो बाद में पता चलता है कि शादी के समय हुआ है। या उस समय बच्चे ने जन्म लिया था, या उस काल में किसी की मृत्यु हुई थी। वस्तुतः, वे कहते हैं, होना तो यह चाहिए कि जब सूतक-पातक पड़े तब किसी तंत्र का विशेष प्रभाव न हो, पर बहुत बार ऐसा नहीं होता; इसके विपरीत हो जाता है। सर्वप्रथम, वे कहते हैं, जब भी कोई आपसे ईर्ष्या करता है तो वह कभी आपका भला नहीं चाहता। और ईर्ष्यालु लोग जो भी तंत्र की क्रियाएँ किसी से करवाते हैं, वे कभी इस बात की परवाह नहीं करते कि किस माध्यम से और किस स्तर तक गिरकर यह प्रयोग करवा रहे हैं। फिर कारण। जब भी घर में मांगलिक कार्य होने वाला होता है या सूतक-पातक पड़ता है, उस समय घर के कुल पितृ कहीं न कहीं आए होते हैं; उनका आगमन हुआ रहता है। मांगलिक कार्य में तो देव शक्तियों की उपस्थिति रहती है, लेकिन जब सूतक-पातक पड़ता है तो देव शक्तियाँ उस स्थान से हटकर अलग स्वरूप में रहती हैं। उस समय पितृ ही देव-तुल्य होकर हर चीज का दायित्व सँभालते हैं। और पितरों को, वे कहते हैं, तंत्र विद्या से, क्षुद्र विद्या से, कहीं न कहीं आसानी से अशुद्ध किया जा सकता है। यह बात ईर्ष्यालु व्यक्ति और तंत्र-प्रवृत्ति के ऐसा करने वाले लोग जानते हैं। इसी कारण जब भी घर में इस प्रकार की चीजें होती हैं, तभी यह किया जाता है।
विवाह, जन्म और मृत्यु के समय कुल पितृ क्यों आते हैं?
वंश वृद्धि से सातवीं पीढ़ी के पितृ की गति
वक्ता कहते हैं कि मांगलिक कार्य में हम पितृ को बुलाते हैं और वे प्रसन्न होकर आते हैं, क्योंकि विवाह का अर्थ है वंश की वृद्धि। कारण वे यह बताते हैं: माना जाता है कि सातवीं पीढ़ी के जिस कुल पितृ की किसी कारण गति नहीं हुई, उसकी गति तब हो जाती है जब सातवाँ वंश जन्म लेता है, इसलिए पितृ प्रसन्न होते हैं कि विवाह होगा, वंश बढ़ेगा, हमारी मुक्ति होगी। बच्चे के जन्म पर भी कुल पितृ आशीर्वाद देने आते-जाते हैं, और मृत्यु के समय कुल पितरों का आवागमन इसलिए रहता है कि जिनकी देह छूटी है उन्हें लेकर जाना है। इसे वे इस विषय को समझने का सरल तरीका कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई मांगलिक कार्य होता है तो हम पितृ को बुलाते हैं, और पितृ खुश होते हैं, प्रसन्न होते हैं कि आज हमारे घर में हमारे वंशजों का विवाह है, वंश की वृद्धि होने वाली है। यह बात, वे कहते हैं, स्वतः होती है और सभी को जाननी चाहिए। कारण वे यह बताते हैं: सातवीं पीढ़ी के जो कुल पितृ होंगे, अगर किसी कारण उनकी गति नहीं हुई होगी, तो माना जाता है, कहा जाता है, कि उनकी गति तब हो जाती है जब सातवाँ वंश जन्म लेता है। इसलिए मांगलिक कार्य में पितृ प्रसन्न होते हैं कि विवाह होगा, वंश वृद्धि होगी, हमारी गति हो जाएगी, हम मुक्त हो जाएँगे। जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, वंश वृद्धि होती है, तो कुल के पितृ आते हैं; उनका आवागमन होता है; प्रसन्न होते हैं कि वंश की वृद्धि होगी, और आशीर्वाद देने भी आते हैं। और जब मृत्यु होती है तो उस समय कुल पितरों का आवागमन इसलिए रहता है कि जिनकी देह छूटी है उन्हें लेकर पितृ लोग इत्यादि जाते हैं। सामान्यतः, वे कहते हैं, सरल तरीके से इस विषय को ऐसे समझा जाता है।
भजन-कीर्तन के साथ निकली बुजुर्ग की शव-यात्रा पर ईर्ष्या, और उससे बुलाए गए क्षुद्र तंत्र
शोकग्रस्त घर पर छोड़ी गई नियम-रहित प्रेत-पिशाच शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि किसी जवान की अकाल मृत्यु तो अलग और गलत बात है, पर जब कोई बहुत बुजुर्ग लंबे शारीरिक कष्ट के बाद देह छोड़ता है तो घर के लोग कहीं न कहीं थोड़े प्रसन्न भी होते हैं कि कष्ट से मुक्ति मिली, और ऐसे बुजुर्गों की वैकुंठ की अंतिम यात्रा में शव-यात्रा के साथ प्रायः भजन-कीर्तन करते हुए खुशी-खुशी विदा किया जाता है। ऐसे समय भी, वे कहते हैं, लोग ईर्ष्या कर देते हैं कि अरे इनकी मृत्यु हुई है और ये भजन-कीर्तन करवा रहे हैं। इसी ईर्ष्या से ग्रसित होकर लोग क्षुद्र तंत्रों का प्रयोग करते हैं, जिनमें किसी प्रकार का कोई नियम-बंधन नहीं होता: किसी नियम को न मानने वाली प्रेत शक्ति, पिशाच शक्ति, और वैसे ही लतखोर तांत्रिक जो किसी के घर पर बिना देखे-सुने ये क्रियाएँ कर देते हैं।
वक्ता दो मृत्युओं में भेद करते हैं। अगर किसी जवान व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई हो तो वह गलत बात है; वह अलग विषय है। लेकिन किसी बड़े-बुजुर्ग की मृत्यु हुई हो जिनका शरीर काफी कष्ट के बाद छूटा हो, तो घर के लोग कहीं न कहीं थोड़े प्रसन्न भी होते हैं कि कष्ट से इन्हें मुक्ति मिली: बुजुर्ग हो गए थे, उम्र हो गई थी, शरीर में इतना कष्ट हो रहा था। इसलिए जो बड़े-बुजुर्ग बहुत बुजुर्ग होकर देह त्याग करते हैं, वे कहते हैं, उनकी वैकुंठ की अंतिम यात्रा जब निकलती है, शव-यात्रा जब निकाली जाती है, तो बहुत बार लोग भजन-कीर्तन करते हुए ही जाते हैं। भजन-कीर्तन करवाते हैं, शव-यात्रा के साथ खुशी-खुशी विदा करते हैं कि आप भगवान का नाम लेते हुए जाइए। ऐसे समय में भी, वे कहते हैं, लोग ईर्ष्या कर देते हैं कि अरे इनकी मृत्यु हुई है और ये भजन-कीर्तन करवा रहे हैं। इस सारी ईर्ष्या से ग्रसित होकर लोग क्षुद्र प्रकार के तंत्रों का प्रयोग करते हैं। और ये क्षुद्र तंत्र ऐसे होते हैं जिनमें किसी प्रकार का कोई नियम-बंधन नहीं होता: किसी नियम को न मानने वाली प्रेत शक्ति, पिशाच शक्ति, और वैसे ही लतखोर तांत्रिक जो किसी के घर पर बिना देखे-सुने ये सब क्रियाएँ कर देते हैं।
छठिहार से पहले नवजात को दुनिया को दिखाना नजर और तंत्र को न्योता है
पचास देखने वाले, सच में खुश कम, और उनमें शत्रु भी
वक्ता कहते हैं कि घर में बच्चे का जन्म केवल वंश वृद्धि के कारण जलन पैदा करता है, लड़की से अधिक लड़के पर, और आज लोग माँ के ठीक से देखने से पहले ही बच्चे को फेसबुक, स्टोरी और व्हाट्सएप स्टेटस पर डाल देते हैं। इसे वे सबसे बड़ी गलती कहते हैं: सबको यह नियम पता है कि बच्चा सतईसा में पड़े तो पिता को उसका मुख नहीं देखना चाहिए, पर यह नहीं पता कि chhathihar तक बच्चे को बचाकर रखना है, दुनिया को नहीं दिखाना है। पचास लोग बच्चे को देखते हैं तो नज़र लगती है; सच में खुश बहुत कम होते हैं, अधिकांश के मन में बधाई के पीछे ईर्ष्या आती है, और उन्हीं में आपके शत्रु भी होते हैं, जो फिर कुछ करवाकर छठिहार में बच्चे के कपड़ों में ही कुछ करवाकर दे जाते हैं। अगर जीवन में कभी घर की रक्षा के लिए कोई पूजन-पाठ नहीं किया, वे कहते हैं, तो घर में परेशानी हो जाती है।
छठिहार तक नवजात के लिए सावधानियाँ
किसी की गोद नहीं, आशीर्वाद दूर से, शुद्ध और संवेदनशील आभा-मंडल
वक्ता कहते हैं कि कोई भी आए, बच्चे को किसी को भी गोद में लेने, ले जाने, खिलाने के लिए मत दे दीजिए; परहेज कीजिए, क्योंकि वंश बहुत कृपा से बढ़ता है, इसलिए नियमों का पालन करना सीखिए। वे कहते हैं कि बुद्धिमान पत्नियाँ इस बात पर अपने पतियों को डाँटकर रखती हैं और पहले के समय में माएँ बच्चे को बचाकर रखती थीं, जबकि आज ढोल-बाजा बजाने वाले को खुशी से बच्चे का वीडियो दे रहे हैं और घर आए ट्रांसजेंडर लोगों की गोद में खुशी से दे रहे हैं; उनका नियम है \"आशीर्वाद दीजिए भाई, दूर से दीजिए\", और किसी की भी गोद में क्यों दे रहे हैं? नवजात का आभामंडल बहुत शुद्ध और बहुत संवेदनशील होता है, इसीलिए उसे सबसे ज्यादा परेशानी होती है, और वह बोल नहीं सकता कि क्या कष्ट है; बेचारा रोएगा। नुकसान तुरंत दिख सकता है, या जो उस समय लगा दिया गया, बच्चे या वंश के लिए जो प्रेत-पिशाच कर दिया गया, वह दो, चार या आठ साल बाद जरूर हावी होता है और बचपन से दिक्कत हो जाती है।
तो इस समय, वक्ता कहते हैं, इन सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए। कोई भी व्यक्ति आए, बच्चे को किसी को भी मत दे दीजिए: "गोद में लो, ले जाओ, खिलाओ, बच्चा है।" परहेज कीजिए। आपका वंश है; बहुत कृपा होती है तब वंश वृद्धि होती है। नियमों का पालन करना सीखिए। सास-ससुर की बात, वे कहते हैं, आजकल लड़कियों को वैसे भी बुरी लगती है, और लड़के बेचारे भी मान लेते हैं कि किसी को बुरा न लगे। जो लड़कियाँ बुद्धिमान होती हैं वे अपने पतियों को डाँटकर रखती हैं कि देखो, बच्चे के साथ ऐसा नहीं करना है; हम उसे बचाकर छुपाए रखेंगे। पर आजकल लड़कियाँ ही वैसी हो जाती हैं। पहले के समय में माएँ बच्चे को बचाकर रखती थीं; आज वह सब नहीं है। आज ढोल-बाजा बजा रहे हैं और बाजा बजाने वाले को प्रसन्नता से बच्चे का वीडियो साथ में दे रहे हैं। घर में जो ट्रांसजेंडर लोग आते हैं, उन्हें बच्चा ले जाकर खुशी से दिखाते हैं; एक तो होता है कि आदमी थोड़ा मना भी करता है। आशीर्वाद दीजिए भाई, दूर से दीजिए। किसी की भी गोद में क्यों दे रहे हैं? यही चीजें, वे कहते हैं, इस समय की परेशानी बनती हैं। या तो तुरंत, तत्काल प्रभाव से कोई दिक्कत हो गई तो हो गई। नहीं तो: बच्चे का आभामंडल बहुत शुद्ध और बहुत संवेदनशील होता है, इसी कारण उसे सबसे ज्यादा परेशानी होती है। वह किसी को बोल नहीं सकता कि मुझे क्या कष्ट हो रहा है; पेट दर्द होगा तो कैसे बोलेगा? बेचारा रोएगा, और आपको क्या पता कि उसे क्या कष्ट है। या तो बच्चे को तत्काल कष्ट हो गया, आपने थोड़ा-बहुत कुछ किया, घर के बड़े-बुजुर्ग परेशान हो रहे हैं पर आज के लोग उनकी मानेंगे नहीं। दूसरी बात: उस समय नहीं, पर जो उस समय लगा दिया गया, बच्चे के लिए, वंश के लिए जो प्रेत-पिशाच कर दिया गया, वह दो साल, चार साल, आठ साल बाद जरूर हावी हो जाता है, और फिर बचपन से ही दिक्कत हो जाती है।
विवाह में खुली हल्दी रस्म: हल्दी के साथ मली गई श्मशान की भस्म
हल्दी वही लगाएँ जिन्हें नियम कहता है
वक्ता कहते हैं कि शादी-ब्याह में भी आज लोग बड़े-बुजुर्गों के नियम नहीं मानते, हर चीज ताक पर रख देते हैं, और जो दिखावा करते हैं वह भी लिमिट में नहीं रहता, जिससे ईर्ष्यालु लोगों को मौका बहुत आसानी से मिल जाता है; पहले लड़का-लड़की को बंधन में रखा जाता था, किसी से नहीं मिलते थे। अब हल्दी लगाने पूरी दुनिया के लोग आते हैं, कोई नियम नहीं पलता, और अगर कोई हाथ में श्मशान की भस्म लेकर आए, हल्दी के साथ मलकर जो करना था करके चला जाए, तो आप क्या कर लेंगे? नियम, वे कहते हैं, यह है कि जितने लोग लगाते हैं, उन्हीं को लगाना चाहिए; पर लोग दिखाना चाहते हैं कि पूरा कुटुंब, पूरा शहर, यहाँ तक कि जिन्हें जानते नहीं वे भी आकर लगाएँगे, और किसके मन में क्या है, कौन जाने।
जन्म के बाद, वक्ता कहते हैं, आते हैं शादी-विवाह। शादी-विवाह में भी लोग आजकल नियम नहीं मानते; बड़े-बुजुर्गों के नियमों को कोई मानने वाला नहीं है; हर चीज को ताक पर रख देते हैं, और उसका दूरगामी परिणाम बाद में होता है। नियम-धर्म तो वैसे भी नहीं मानना है, चलिए ठीक है; लेकिन उसके बाद जो दिखावा करते हैं वह भी लिमिट में होना चाहिए, और वह भी नहीं होता। ईर्ष्यालु लोगों को जो करना है, करने का मौका बहुत आसानी से मिल जाता है। पहले के समय में, वे कहते हैं, लोग हर चीज को बंधन में रखते थे: नहीं करना है, सब कुछ छुपाकर रखना है; बच्ची किसी से नहीं मिलेगी, लड़का किसी से नहीं मिलेगा। आज के समय में नहीं। हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है। लगाने आते हैं, पूरी दुनिया के लोग लगा रहे हैं, कोई नियम पालन ही नहीं हो रहा। अब उस हल्दी के साथ कोई श्मशान की भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। हाथ में लेकर आया, मलकर, जो करना था करके चला गया, तो आप क्या कर लीजिएगा? नियम, वे कहते हैं, यह है कि जितने लोग लगाते हैं, उन्हीं को लगाना चाहिए। आज के समय में उतना नहीं है; आज दिखाना है कि पूरा कुटुंब, पूरा मेरा अपना शहर आकर लगाएगा भाई। जिसे नहीं जानते वह भी लगाएगा। और किसके मन में क्या है, कौन जाने।
रक्षा-सूत्र को अंधविश्वास कहकर ठुकराना, और उसके बाद की परेशानियाँ
अपनी सुरक्षा खुद छोड़ना, फिर देवी-देवताओं को दोष देना
वक्ता कहते हैं कि माता-पिता गले में पहनने को कुछ देते हैं, या कुल पुरोहित, पंडित जी मंत्र पढ़कर हाथ में बाँधने का बंधन देते हैं कि इसे बाँधकर रखो, तो आज के बच्चे कहते हैं \"खुल गया, गिर गया, भूल गया, क्या मम्मी तुम इतना परेशान हो रही हो\" और कमाने लगने पर \"यह बाँधने से कुछ नहीं होता\"। वे कहते हैं कि समय पर अनुशासन मिला होता तो कम से कम महत्व समझते। बाद में जब बच्चा नहीं हो रहा होता तो आईवीएफ, यह-वह करवाने दौड़ो और फिर रोते रहो। अपनी सुरक्षा आप खुद छोड़ते हैं, वे कहते हैं, और जिन चीजों को आप अंधविश्वास कहकर एक सिरे से नकारते हैं वही समय पर तेजाब की तरह लगती हैं कि कोई काम नहीं बनता; फिर आप रोते हैं, देवी-देवताओं को गलत बोलते हैं और ऐसी बातें बताने वालों को आडंबरी कहते हैं, जबकि भीतर चोट बहुत सही लगती है। ऐसी परेशानी वालों को उनकी सलाह है कि अगर किसी ने कहा है कि विवाह के समय करवाया गया है, तो अपने विवाह के समय का अच्छे से अवलोकन करें कि नीति-नियम कैसे निभाए गए; हो सकता है आप निभा रहे हों, पर बिगाड़ने वाले बहुत होते हैं, इन चीजों में बहुत सोच-समझकर चलना होता है और आने वाली पीढ़ी को सही से यह ज्ञान देना होता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर माता-पिता ने कुछ दिया कि इसे गले में पहनकर रखो, या हाथ में बाँधने के लिए बंधन दिया जाता है, लोग देते हैं, कुल पुरोहित देते हैं, पंडित जी मंत्र पढ़कर देते हैं कि इसे बाँधकर रखो, तो: "खुल गया, गिर गया; हाँ, गिर गया था, भूल गया था; क्या मम्मी तुम इतना परेशान हो रही हो?" ऐसे शब्द बच्चों के रहते हैं। वे बच्चे नहीं हैं, वे कहते हैं; सही समय पर अनुशासन मिला होता तो ऐसी गलती नहीं करते; महत्व समझते, कम से कम डरते। आपने पापा की परी बनाकर रखा तो लो, परी अब जीवन भर भुगतेगी और आपको भी भुगतवाएगी। लड़कों का भी वही हाल है: कमाने लगे तो माता-पिता की नहीं सुनेंगे। "क्या मम्मी, आप भी? यह बाँधने से कुछ नहीं होता।" और बाद में जब बच्चा नहीं पैदा हो रहा होता है तो फिर दौड़ो: आईवीएफ करवाओ, यह करवाओ, वह करवाओ, करवाते रहो, और उसके बाद रोते रहो। अपनी सुरक्षा आप खुद छोड़ते हैं, वे कहते हैं, और अंधविश्वास बोलकर जिन चीजों को आप एक सिरे से नकारते हैं, वही चीजें समय पर आपको लगती हैं, और फिर तेजाब की तरह काम करती हैं कि कोई काम नहीं बनता। फिर आप रोते हैं, देवी-देवताओं को गलत बोलते हैं, और जो इस प्रकार की बातें बताते हैं उन्हें अखंड आडंबरी बोलते हैं। लेकिन भीतर चोट आपको बहुत सही से लगती है। अपने आप को सँभालिए। वे जोड़ते हैं कि अगर ये वीडियो पाँच-दस साल बाद भी यूट्यूब पर रहे, तो जिनके साथ ऐसी परेशानी हो रही है वे इन सब चीजों को देखें और अपने शादी-ब्याह के समय को देखें: अच्छे से अवलोकन करें, अगर किसी ने बोला है कि विवाह के समय करवाया गया है, तो देखें कि नीति-नियम कैसे निभाए गए होंगे। हो सकता है आप निभा रहे हों, लेकिन बिगाड़ने वाले लोग बहुत होते हैं। बहुत सोच-समझकर इन सब चीजों में चलना होता है। अंत में वे आशा करते हैं कि सब इन विषयों से लाभ लेंगे और आने वाली पीढ़ी को सही तरीके से यह ज्ञान देंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।