जन्म, विवाह और मृत्यु में तंत्र सबसे आसान क्यों
इस व्याख्या में बताया गया है कि अशुद्धि (सूतक-पातक) और जीवन के मांगलिक अवसरों पर ही तांत्रिक प्रहार सबसे सरलता से क्यों टिक जाता है, जबकि सिद्धांततः अशुद्धि में तंत्र करना कठिन होना चाहिए: तंत्र करवाने वाले ईर्ष्यालु लोग विधि या स्तर की परवाह क्यों नहीं करते; कुल पितर संतान जन्म और विवाह जैसे आनंद के अवसरों पर क्यों आते हैं — जहाँ वंश वृद्धि से उनकी अपनी मुक्ति आगे बढ़ती है — और मृत्यु पर जाने वाली आत्मा को मार्ग दिखाने क्यों आते हैं; अशुद्धि के दिनों में देवीय रक्षक शक्तियों के पीछे हटने पर इन पितरों को क्षुद्र विद्या से अपेक्षाकृत सरलता से क्यों दूषित किया जा सकता है; भजन-कीर्तन के साथ दी गई अंतिम विदाई में भी द्वेष प्रेत और पिशाच जैसी निम्न शक्तियों के रूप में कैसे सामने आ सकता है; संतान जन्म पर उठने वाली जलन को छठीहार जैसी परंपरागत रक्षा अवधि से पहले ही नवजात को सोशल मीडिया पर दिखा देना कैसे और बढ़ा देता है; नवजात की रक्षा की ठोस सावधानियाँ — शिशु को हर किसी की गोद में न देना, अत्यधिक प्रदर्शन से बचाना, और उसके अत्यंत संवेदनशील आभामंडल को समझना; आज की खुली हल्दी रस्म और अनुष्ठान सामग्री की लापरवाही किस प्रकार वह खतरा पैदा करती है जिसे परंपरागत एकांतवास रोक देता था; और कुल पुरोहित या बुजुर्ग द्वारा दिए गए रक्षा सूत्र को आधुनिक अविश्वास में ठुकरा देना व्यक्ति को इन संधिकालों में आध्यात्मिक रूप से निहत्था क्यों छोड़ देता है।
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सूतक में तंत्र सर्वाधिक प्रभावी क्यों
सूतक-पातक या घर के मांगलिक अवसरों पर तंत्र सबसे अधिक प्रभावी क्यों हो जाता है?
सिद्धांततः सूतक-पातक की अशुद्धि में तांत्रिक प्रभाव का टिकना कठिन होना चाहिए, पर होता अक्सर इसका उल्टा है — विवाह, संतान जन्म या घर में हुई मृत्यु के समय किया गया तांत्रिक प्रहार प्रायः बहुत बाद में, किसी से परामर्श लेने पर ही सामने आता है।
अभिचार (अभिचार) ठीक उन्हीं दिनों सबसे अधिक प्रभावी होता है जब घर में जन्म या मृत्यु की अशुद्धि (सूतक और पातक) चल रही हो, या विवाह जैसे मांगलिक अनुष्ठान हो रहे हों — बाद में जब कोई परामर्श के लिए आता है तो प्रायः यही निकलता है कि वह पीड़ा उसी विवाह, संतान जन्म या घर की मृत्यु के समय आरंभ की गई थी। सिद्धांततः अशुद्धि के दिनों में तांत्रिक प्रभाव सरलता से नहीं टिकना चाहिए, किंतु बार-बार इसका उल्टा ही देखने में आता है — इसलिए इस कमजोरी के पीछे की प्रक्रिया को समझना आवश्यक है।
ईर्ष्यालु को विधि की परवाह क्यों नहीं
तंत्र करवाने वाले ईर्ष्यालु लोग विधि या स्तर की परवाह क्यों नहीं करते?
ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी दूसरे का भला नहीं चाहता, और ईर्ष्या से प्रेरित होकर तांत्रिक अनुष्ठान करवाने वाले इस बात की चिंता नहीं करते कि कौन सी विधि अपनाई जा रही है या वह विधि कितने नीचे स्तर तक गिरती है।
इस कमजोरी का आरंभ बिंदु सीधा है: ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी दूसरे का भला नहीं चाहता। जो लोग जलन के वशीभूत होकर किसी परिवार पर तांत्रिक अनुष्ठान करवाते हैं, वे इससे पूर्णतः उदासीन रहते हैं कि कौन सी विधि प्रयोग हो रही है या जिस साधक से करवा रहे हैं वह कितने निम्न स्तर तक जाने को तैयार है।
कुल पितर हर्ष और शोक दोनों में क्यों आते हैं
कुल पितर शुभ अवसरों और मृत्यु — दोनों समय क्यों आते हैं?
मान्यता है कि विवाह या संतान जन्म जैसे मांगलिक अवसरों पर पितर इसलिए आते हैं क्योंकि वंश की वृद्धि से उनकी अपनी मुक्ति आगे बढ़ती है, और मृत्यु के समय वे पुनः आते हैं — तब जाने वाली आत्मा को मार्ग दिखाने के लिए।
घर में जब भी मांगलिक कार्य होते हैं या सूतक-पातक का समय आता है, कुल पितर (पितृ) वहाँ आते हैं। मांगलिक अवसरों पर उनका आवाहन किया जाता है और वे इस बात से प्रसन्न होते हैं कि उनका वंश बढ़ रहा है, क्योंकि परंपरा में माना जाता है कि सातवीं पीढ़ी तक के जिन पितरों को अब तक मुक्ति नहीं मिली, उन्हें सातवीं पीढ़ी के जन्म लेते ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है — इसलिए वंश वृद्धि पितरों को प्रिय है, वह उनकी अपनी मुक्ति का मार्ग खोलती है। इसी प्रकार संतान के जन्म पर पितर वंश की वृद्धि को आशीर्वाद देने आते हैं, और मृत्यु के समय वे फिर आते हैं — तब जाने वाली आत्मा को आगे का मार्ग दिखाने के लिए।
इन कालों में पितर असुरक्षित क्यों
सूतक और मांगलिक अवसरों पर पितर सहज ही दूषित क्यों हो जाते हैं, और इसका दुरुपयोग कैसे होता है?
इन नाजुक दिनों में अशुद्धि के कारण देवीय रक्षक शक्तियाँ पीछे हट जाती हैं या दूरी बनाए रखती हैं, और वहाँ उपस्थित पितरों पर ही घर की आध्यात्मिक जिम्मेदारी आ जाती है — जबकि पितरों को क्षुद्र विद्या से अपेक्षाकृत सरलता से दूषित किया जा सकता है, और ईर्ष्यालु लोग तथा नकारात्मक तंत्र करने वाले ठीक इसी का लाभ उठाते हैं।
सूतक के दिनों में या मांगलिक अवसरों पर पितर तो उपस्थित रहते हैं, किंतु अशुद्धि के कारण देवीय रक्षक शक्तियाँ पीछे हट जाती हैं या अपनी दूरी बनाए रखती हैं — ऐसे में घर की आध्यात्मिक जिम्मेदारी स्वयं पितरों पर आ जाती है। पितरों को क्षुद्र विद्या (क्षुद्र विद्या) के प्रयोग से अपेक्षाकृत सरलता से दूषित या प्रभावित किया जा सकता है, और ईर्ष्यालु लोग तथा नकारात्मक तंत्र करने वाले घर की प्रबल देवीय रक्षा पर सीधा प्रहार करने के बजाय ठीक इसी कमजोरी का लाभ उठाते हैं।
अंतिम विदाई में भी द्वेष
क्या भजन-कीर्तन के साथ दी गई अंतिम विदाई में भी द्वेष सामने आ सकता है, और वह किस रूप में आता है?
हाँ — लंबी पीड़ा के बाद हुई मृत्यु पर जब परिवार किसी बुजुर्ग की अंतिम यात्रा भजन-कीर्तन के साथ निकालता है, तब भी ईर्ष्यालु देखने वाले यह प्रश्न उठाते हैं कि शोक में उत्सव कैसा — और द्वेषवश वे उस घर पर अनियंत्रित निम्न तांत्रिक शक्तियाँ (प्रेत, पिशाच) छोड़ सकते हैं।
किसी युवा की असमय मृत्यु निःसंदेह दुखद है, किंतु जब कोई वृद्ध लंबी पीड़ा भोगने के बाद देह त्यागते हैं तो परिवार को उनके कष्ट से मुक्त होने का संतोष होता है, और अंतिम यात्रा प्रायः भजन-कीर्तन के साथ निकाली जाती है ताकि प्रभु स्मरण के साथ विदाई दी जा सके। ऐसे क्षणों में भी ईर्ष्यालु देखने वाले नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि मृत्यु के शोक में उत्सव या कीर्तन क्यों — और द्वेष से प्रेरित होकर ऐसे लोग उन अनैतिक साधकों के माध्यम से, जो बिना विचारे किसी भी घर पर नकारात्मक अनुष्ठान कर देते हैं, अनियंत्रित निम्न तांत्रिक शक्तियों (प्रेत, पिशाच) को उस परिवार पर छोड़ देते हैं।
संतान जन्म पर ईर्ष्या और बढ़ता प्रदर्शन
संतान जन्म पर जलन क्यों होती है, और आज का सोशल मीडिया प्रदर्शन इस खतरे को कैसे बढ़ा देता है?
संतान जन्म पर वंश की वृद्धि से — पुत्र हो या पुत्री — प्रायः तीव्र सामाजिक जलन उत्पन्न होती है, और नवजात के ठीक से सँभलने से पहले ही उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैला देने की आज की आदत इस खतरे को और बढ़ा देती है, क्योंकि यह सबसे नाजुक समय में नजर और नकारात्मक शक्तियों को न्योता देती है।
संतान के जन्म पर वंश की वृद्धि से प्रायः तीव्र जलन उत्पन्न होती है — चाहे पुत्र जन्मे या पुत्री। आज के समय में बच्चे के जन्म लेते ही, उसके ठीक से सँभलने से पहले ही, उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया, स्टोरी और स्टेटस पर सार्वजनिक रूप से फैला दी जाती हैं। परंपरा में इसके विपरीत कठोर रक्षात्मक नियम हैं — कुछ विशेष ग्रह कालों में, या छठीहार (छठिहार) यानी नामकरण और शुद्धि संस्कार होने तक, बच्चे को सार्वजनिक दृष्टि और बुरी निगाहों से बचाकर रखा जाता है, क्योंकि नवजात को खुले में दिखाना नकारात्मक शक्तियों और नजर (नज़र) को आमंत्रित करता है। सोशल मीडिया पर बधाई देने वाले बहुत होते हैं, पर भीतर से द्वेष और ईर्ष्या भी प्रायः रहती है, और विरोधी इसी प्रदर्शन का लाभ उठाते हैं — जैसे संस्कारों के अवसर पर नवजात को दूषित या अभिमंत्रित वस्त्र और वस्तुएँ भेंट कर देना।
छठियार से पूर्व नवजात की रक्षा
छठीहार से पहले नवजात की रक्षा के लिए कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिए?
नवजात को आने-जाने वाले हर व्यक्ति की गोद में लापरवाही से न दें, माताओं और बुजुर्गों द्वारा शिशु की कड़ी रखवाली की परंपरा बनाए रखें — उसे बधाई गाने आए लोगों को न सौंपें — और यह समझें कि शिशु का अत्यंत शुद्ध एवं संवेदनशील आभामंडल नकारात्मक हस्तक्षेप से विचलित हो सकता है, जिसका असर कभी-कभी वर्षों बाद ही सामने आता है।
यदि घर में आध्यात्मिक रक्षा न हो या परंपरागत सावधानियाँ न मानी जाएँ, तो नवजात वाला परिवार असुरक्षित हो जाता है। इस अवधि की सावधानियों में शामिल है: नवजात को आने वाले हर व्यक्ति की गोद में लापरवाही से न देना, क्योंकि वंश की वृद्धि एक वरदान है जिसके साथ अनुशासन और सीमाएँ आवश्यक हैं; माताओं और बुजुर्गों द्वारा नवजात की कड़ी रखवाली की परंपरा बनाए रखना, न कि बच्चे को बधाई गाने आए लोगों या लोक-शुभचिंतकों को बिना विचारे सौंप देना — आशीर्वाद उचित दूरी से ही ग्रहण किया जाए; और यह समझना कि शिशु का आभामंडल (आभामंडल) अत्यंत शुद्ध और अति संवेदनशील होता है, इसलिए नकारात्मक ऊर्जा का हस्तक्षेप अकारण बेचैनी, पेट दर्द या रोने का कारण बन सकता है — कुछ प्रभाव तुरंत दिखते हैं, किंतु शैशव में डाली गई नकारात्मक शक्तियाँ या टोटके वर्षों बाद भी प्रकट हो सकते हैं और बचपन से ही निरंतर बाधाएँ खड़ी करते रहते हैं।
खुली हल्दी रस्म से बनता जोखिम
आज की खुली हल्दी रस्म और अनुष्ठान सामग्री की लापरवाही विवाह में खतरा क्यों बन जाती है?
आज के विवाहों में वर-वधू की उस परंपरागत एकांतवास की मर्यादा प्रायः छोड़ दी जाती है, और हल्दी जैसी रस्में बिना किसी रोक-टोक के बड़ी भीड़ के लिए खोल दी जाती हैं — इससे किसी दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति को यह अवसर मिल जाता है कि वह अनुष्ठान सामग्री में श्मशान भस्म मिलाकर सीधे वर या वधू पर लगा दे, जिससे गंभीर आध्यात्मिक हानि होती है; अनुष्ठान की सामग्री केवल निर्धारित निकट परिजन ही लगाएँ।
विवाह के अवसर पर लोग प्रायः परंपरागत नियमों और बड़ों के मार्गदर्शन की उपेक्षा कर देते हैं और मर्यादा के स्थान पर अत्यधिक दिखावा ले आते हैं — यही दुर्भावना रखने वालों को भरपूर अवसर देता है। परंपरा में वर और वधू विवाह से पूर्व कठोर एकांतवास और रक्षा में रहते थे; आज हल्दी जैसी रस्में बिना किसी रोक-टोक के बड़ी भीड़ के लिए खोल दी जाती हैं। कोई दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति अनुष्ठान की सामग्री में श्मशान भस्म (भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है।) मिलाकर सीधे वर या वधू पर लगा दे तो इससे गंभीर आध्यात्मिक हानि हो सकती है — इसीलिए ऐसी रस्मों में सामग्री लगाने की अनुमति केवल निर्धारित निकट परिजनों को ही होनी चाहिए।
रक्षा सूत्र की उपेक्षा क्यों नहीं
कुल पुरोहित या बुजुर्ग द्वारा दिए गए रक्षा सूत्र को आधुनिक अविश्वास में कभी क्यों नहीं ठुकराना चाहिए?
कुल पुरोहित या घर के बुजुर्गों द्वारा दिए गए रक्षा कवच और रक्षा सूत्र को आज की पीढ़ी अविश्वास में लापरवाही से ठुकरा देती है, जिससे व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से निहत्था रह जाता है — बाद में उठने वाली लंबी कठिनाइयाँ, जैसे अकारण संतान संबंधी बाधा या पारिवारिक बिखराव, प्रायः इसी उपेक्षा से जुड़ी निकलती हैं।
कुल पुरोहित या घर के बुजुर्गों द्वारा दिए गए रक्षा कवच और रक्षा सूत्र (रक्षा सूत्र) को आज की पीढ़ी प्रायः लापरवाही से ठुकरा देती है। अविश्वास में इन परंपरागत आध्यात्मिक रक्षाओं की उपेक्षा करने से व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से निहत्था रह जाता है, और आगे चलकर जब लंबी कठिनाइयाँ खड़ी होती हैं — जैसे अकारण संतान संबंधी बाधा या पारिवारिक बिखराव — तब लोग संघर्ष करते हैं और या तो ईश्वर को दोष देते हैं या आध्यात्मिक परामर्श को ही नकार देते हैं, बजाय इसके कि उस कठिनाई का सूत्र इसी आरंभिक उपेक्षा तक ढूँढ़ें। जन्म, मृत्यु और विवाह — जीवन के इन संधिकालों में परंपरागत सावधानियों और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन ही घर को ऐसी दुर्भावनापूर्ण बाधा से बचाने के लिए आवश्यक बताया गया है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।