निष्फल मंत्र को होलिका रात्रि में पुनः सिद्ध करने की विधि
निष्फल मंत्र को पुनः प्रभावी करने की विधि पर नोट्स।
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सिद्ध मंत्र प्रभाव देना क्यों बंद कर देता है, और होलिका रात्रि का उपाय किसे करना चाहिए
मंत्र नहीं बँधता, साधक से उसका संबंध बँधता है
वक्ता कहते हैं कि जागृत किया हुआ मंत्र — सबर मंत्र, महाशक्ति का मंत्र या काम्य प्रयोग का मंत्र — अपनी ही गलती से या किसी दुष्ट व्यक्ति के कीलन जैसे प्रयोग से काम करना बंद कर सकता है। वे कहते हैं कि मंत्र को स्वयं कभी बाँधा नहीं जा सकता; बल्कि साधक के आभामंडल और मंत्र की अपनी ऊर्जा के बीच अवरोध डाल दिया जाता है, जिससे मंत्र प्रभाव नहीं देता, प्रयोग नहीं हो पाता, या जप करने पर कष्ट तक होने लगता है। इसके लिए वे होलिका दहन की रात्रि का एक प्रयोग बताते हैं, और कहते हैं कि अपनी असावधानी से मंत्र में दोष आने का केवल शक हो तो भी यह प्रयोग करें, और तब भी जब बहुत समय से जपा गया मंत्र प्रयोग में प्रभाव न दे।
वक्ता कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आने वाले लोग YouTube या किसी और माध्यम से बहुत सारे मंत्रों को — विशेषकर सबर मंत्र को, या अन्य प्रकार के मंत्रों को — जागृत करने का प्रयास करते हैं। कभी अपनी ही गलती से, कभी किसी दुष्ट व्यक्ति के कारण, वे कहते हैं, ऐसा मंत्र काम करना बंद कर देता है और प्रभावहीन हो जाता है। वे इसका तंत्र समझाते हैं: कोई तंत्र प्रवृत्ति का व्यक्ति कीलन जैसी किसी तैयारी का प्रयोग करके आपके मंत्र की क्षमता को बाँध सकता है। वास्तव में, वे कहते हैं, मंत्र को बाँधा नहीं जा सकता। होता यह है कि आपके आभामंडल और मंत्र की अपनी ऊर्जा के बीच कोई बंधन, कोई अवरोध डाल दिया जाता है। इसी कारण मंत्र आपके लिए प्रभावहीन हो जाता है: आप उसका प्रयोग नहीं कर पाते, या जब भी जप करते हैं तो आप ही को कष्ट होने लगता है, और वह प्रभाव नहीं देता जबकि पहले बहुत प्रभाव देता था। वे कहते हैं कि यह कोई भी मंत्र हो सकता है — महाशक्तियों का मंत्र, काम्य प्रयोगसांसारिक या भौतिक कामना-पूर्ति हेतु मंत्र का प्रयोग — उदाहरणस्वरूप, एकाक्षरी गुरु मंत्र का उपयोग अन्य मंत्रों को जाग्रत करने हेतु किया जा सकता है, परंतु इसे सीधे इस प्रयोजन हेतु प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। का मंत्र, साबरी मंत्र इत्यादि। उपाय के रूप में वे होलिका की रात्रि का एक प्रयोग रखते हैं, जिससे दोषयुक्त हो गया मंत्र हर दोष और बंधन से मुक्त होकर साधक के लिए पुनः पूर्ण चैतन्य हो जाए। किसे करना चाहिए, इस पर वे कहते हैं कि यदि आपको ज़रा भी शक-संशय है कि आपकी अपनी असावधानी से मंत्र में कोई त्रुटि या दोष आ गया है, तो भी यह प्रयोग करें — अवश्य करें। अंत में वे जोड़ते हैं कि यदि आप बहुत समय से किसी मंत्र का जप कर रहे हैं और प्रयोग करने पर वह प्रभाव नहीं देता — चाहे काम्य प्रयोग हो या साबर से संबंधित कोई मंत्र — तो भी आपको यही प्रयोग करना चाहिए, जिससे मंत्र प्रभावशील बने और प्रयोग में फल दे।
सिद्ध मंत्र के असावधान प्रयोग से मंत्र दोष: रजस्वला स्त्री को दिया गया झाड़ा
गलती सिद्धि में नहीं, प्रयोग में होती है
वक्ता कहते हैं कि मंत्र सिद्ध हो जाने के बाद अधिकांश गलतियाँ उसके प्रयोग के खंड में होती हैं, और उन्हीं से वह प्रभावहीन हो जाता है। उनका उदाहरण: कोई पुरुष जिसके पास हनुमान जी का सिद्ध सबर मंत्र है, अपने ही परिवार की किसी कष्टग्रस्त स्त्री को झाड़ा देता है, और वह उस समय रजस्वला है — तब मंत्र प्रभावहीन और दोषयुक्त हो जाता है, और उस पुरुष को भी दोष लगता है। वे इसे अनेक कारणों में से एक बताते हैं, कहते हैं कि मंत्र का प्रयोग पूरी जानकारी लेकर ही करना चाहिए, और कहते हैं कि जब भी ऐसे कर्मों से — जाने या अनजाने — मंत्र की क्षमता घट जाए, तब होलिका रात्रि का पुनर्जीवन विधान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि मंत्र सिद्ध कर लेने के बाद हम उसका प्रयोग करते हैं, और प्रयोग के इसी खंड में हमसे बहुत सारी गलतियाँ हो जाती हैं जिनसे मंत्र प्रभावहीन हो जाता है। वे एक उदाहरण देते हैं। मान लीजिए आपने हनुमान जी का कोई सबर मंत्र सिद्ध किया। अब आप उससे किसी को झाड़ा देते हैं — सामान्य रूप से, अपने ही घर-परिवार में किसी को। आप पुरुष हैं, आपके ही परिवार की कोई स्त्री शारीरिक कष्ट में है, और उस समय वह रजस्वला है, और आपने हनुमान जी के मंत्र से उसे झाड़ा डाल दिया। ऐसे समय में, वे कहते हैं, आपका मंत्र कहीं न कहीं प्रभावहीन और दोषयुक्त हो जाएगा, और आपको भी दोष लगेगा। वे कहते हैं कि यह एक कारण है; ऐसे बहुत सारे कारण हो सकते हैं, इसलिए सभी जानकारी लेकर ही मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। जब भी अनजाने में या जानबूझकर इस प्रकार के आपके किसी कर्म से मंत्र में असमर्थता आ जाए — यानी उसकी कार्यक्षमता घट जाए — तभी, वे कहते हैं, आपको होलिका रात्रि का विधान करना चाहिए।
सिद्ध मंत्र को पुनः प्रभावी करने वाला होलिका रात्रि का दही बड़ा अर्पण विधान
नौ पत्तल, हर एक पर मंत्र, सब होलिका अग्नि में
होलिका दहन की शाम के लिए वक्ता का विधान: कम से कम नौ उड़द दाल के दही बड़े बनाएँ, नौ पत्तलों पर एक-एक रखें (साल का पत्ता सर्वोत्तम; केले का पत्ता, बाज़ार का दोना-पत्तल या मिट्टी के छोटे पात्र भी चलेंगे), हर एक पर दही और थोड़ा-सा गुड़ डालें, और यह नित्य के गुरु–गणेश स्मरण के बाद करें, उस दिन लहसुन-प्याज़ न खाएँ तो बहुत अच्छा। सबर मंत्र हो तो हर पत्तल उठाकर उस पर मंत्र कम से कम नौ बार बोलें (बहुत लंबा हो तो तीन या पाँच बार); एकाक्षरी या देवता/महाशक्ति का मंत्र हो तो पत्तल बाएँ हाथ में लेकर दाहिने हाथ से एक माला जपें, कुल नौ मालाएँ। सब कुछ साल या केले के बड़े पत्ते से ढककर होलिका दहन स्थल ले जाएँ, नारायण से कहें कि इस सिद्ध मंत्र को पवित्र अग्नि में हव्य रूप में समर्पित करते हैं और उसे पूर्ण प्रभावशील करने की प्रार्थना करें, सब अर्पित करके घर आ जाएँ। वे कहते हैं कि समय होलिका दहन के मुहूर्त से पीछे गिनकर मंत्र की लंबाई के अनुसार तय करें।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग होलिका की रात्रि में, शाम के समय करना है। सामग्री: कम से कम नौ उड़द दाल के बड़े बनाएँ — वही दही बड़ा जो होली पर बनता ही है, उड़द दाल को भिगोकर-फुलाकर — और दही लाकर रखें; नौ दही बड़े चाहिए। पत्तल के लिए साल वृक्ष का पत्ता अति उत्तम है; न मिले तो बाज़ार के छोटे पत्तल और दोने, नौ; वह भी न मिले तो मिट्टी के छोटे पात्र भी चलेंगे, पर पत्ता कहीं बेहतर है। केले का पत्ता भी चलेगा — एक ही पत्ते को नौ जगह काट लें, हर टुकड़े पर एक दही बड़ा अट जाए। समय पर वे कहते हैं: होलिका दहन का समय देख लें और उससे पर्याप्त पहले, अपने मंत्र के अनुसार, यह प्रयोग शुरू करें — सबर मंत्र लंबा होगा, तो उसी अनुसार समय चुनें। शुरू करने से पहले गुरु–गणेश स्मरण और नित्य का जो पूजन होता है, वह अवश्य कर लें। प्रयोग शाम को है, इसलिए वे कहते हैं कि उस दिन भर लहसुन-प्याज़ इत्यादि न खाएँ तो बहुत बढ़िया। विधि: एक बड़ी थाली रखें, उसमें नौ पत्ते (साल, केला या दोना-पत्तल) रखें, हर एक पर एक बड़ा रखें, सब पर अच्छे से दही डालें, फिर हर एक के ऊपर ज़रा-ज़रा सा गुड़गुड़, जो अकेले अथवा तिल और घी के साथ अर्पित किया जाता है। डालें। इसके बाद, यदि आपका मंत्र साबर मंत्र है, तो एक पूरा पत्ता दही बड़े सहित हाथ में उठाएँ और उस पर मंत्र कम से कम नौ बार बोलें — बहुत लंबा मंत्र हो तो तीन या पाँच बार भी चलेगा — और नीचे रख दें। हर पत्ते के साथ ऐसा ही करें: उठाएँ, मंत्र बोलें, रखते जाएँ। यदि इसके बजाय कोई एकाक्षरी मंत्र है, या देवता या महाशक्ति का मंत्र है जिसका आप प्रयोग करते थे और अब वह प्रभाव नहीं देता, तो हर दही बड़े पर एक माला, कुल नौ मालाएँ जपें: पत्ता बाएँ हाथ में लें, दाहिने हाथ से एक माला जप करें, उतार दें, अगला लें, ऐसे नौ तक। जप के बाद, वे कहते हैं, साल या केले का एक बड़ा पत्ता लें जिससे सब अच्छी तरह ढक जाए, उसके नीचे अर्पण सामग्री ले जाकर वहाँ पहुँचें जहाँ होलिका दहन होने वाला है, और वहाँ कहें: "हे नारायण, मैं आपके द्वारा इस पवित्र अग्नि में अपने द्वारा सिद्ध किए गए इस मंत्र को हव्य के रूप में आपको समर्पित करता हूँ। हे नारायण, कृपा करके इस मंत्र को पूर्ण रूप से प्रभावशील बना दें, जब कभी भी मैं इसका प्रयोग करूँ, यह पूर्ण चैतन्य होकर मेरे कार्य सिद्ध करे।" यह बोलकर वहाँ समर्पित कर दें और घर आ जाएँ। अगले दिन का देवता-अनुसार पूजन इस प्रयोग को पूरा करता है।
होलिका रात्रि के मंत्र अर्पण के बाद होली के दिन देवता-अनुसार पूजन
देवता का प्रिय पत्र, नौ बार अभिमंत्रित
वक्ता कहते हैं कि होलिका रात्रि के अर्पण के अगले दिन — होली के दिन ही, अवश्य — मंत्र के अपने देवता को उनका प्रिय पुष्प या पत्र उस पर नौ बार मंत्र पढ़कर चढ़ाना है। भैरव जी का मंत्र हो तो नौ बार अभिमंत्रित बिल्व पत्र भैरव जी को चढ़ाएँ और उनका पूजन करें; हनुमान जी का मंत्र हो तो नौ बार मंत्र पढ़कर तुलसी पत्र चढ़ाएँ और हनुमान मंदिर में पूजा दें; दुर्गा जी का मंत्र हो तो मंत्र पढ़कर बेलपत्र घर पर उन्हें समर्पित करें और मंदिर में उनका पूजन दें, जिसमें श्रृंगार अवश्य हो। इसके बाद, वे कहते हैं, जिस विधि से भी पहले प्रयोग करते थे, मंत्र फिर से प्रभाव देने लगता है।
वक्ता कहते हैं कि अगले दिन से, होली के दिन, एक काम और करना है — और यह अवश्य करना है: मंत्र जिस देवता से संबंधित है, उनका प्रिय पुष्प या पत्र लेकर मंत्र सहित चढ़ाना है। उनके उदाहरण: यदि भैरव जी का मंत्र है तो एक बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र लें, उसे हाथ में लिए मंत्र नौ बार पढ़ें और भैरव जी को चढ़ाएँ; भैरव जी का पूजन इत्यादि भी ज़रूर करें। यदि मंत्र हनुमान जी से संबंधित है तो उसी मंत्र को नौ बार पढ़कर हनुमान जी को तुलसी पत्र चढ़ाएँ और हनुमान मंदिर में पूजा दे दें। यदि दुर्गा जी का मंत्र है तो बेलपत्र लें, दुर्गा जी का मंत्र पढ़कर घर पर उन्हें समर्पित करें और मंदिर में उनका पूजन दे आएँ — और उस पूजन में, वे कहते हैं, श्रृंगार अवश्य दें। इतना कर लेने के बाद, वे कहते हैं, जिस विधि से भी आप पहले उस मंत्र का प्रयोग करते थे, वह मंत्र फिर से आपको प्रभाव देने वाला हो जाएगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।