दत्त माला मंत्र — गुरु विहीन साधक के लिए पूर्णिमा से आरंभ होने वाला अनुष्ठान
गुरु विहीन साधक के लिए दत्तात्रेय साधना का मार्गदर्शन।
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भौतिक गुरु के बिना साधना मार्ग का चुनाव, और चुने हुए इष्ट पर संशय की कीमत
पहले अनिर्णय, फिर संशय जो पूर्ण फल रोक देता है
वक्ता कहते हैं कि जब भौतिक रूप से जीवन में कोई गुरु या मार्गदर्शक नहीं होता, तो साधक के लिए साधना मार्ग चुनना बहुत कठिन हो जाता है — साबर में पौराणिक मंत्र करें या तंत्रोक्त, भगवान के किस स्वरूप की पूजा करें, और सबसे पहले गुरु स्वरूप में किस देवता या महाशक्ति को चुनें; विकल्प बहुत होते हैं पर निर्णय लेने की क्षमता साथ नहीं देती। वे कहते हैं कि चुनाव कर भी लें तो संशय बना रहता है कि सही किया या गलत, और जब साधक भटकने लगे और जिस महाशक्ति को इष्ट देवता और गुरु माना है उन पर शक करने लगे, तो साधना का पूर्ण फल नहीं मिलता। वे कहते हैं कि इसके लिए वे जो साधना दे रहे हैं वह हर साधक के लिए है — नए हों या पुराने, पौराणिक, तंत्रोक्त या साबर के, स्त्री, पुरुष और साधिकाएँ सभी।
वक्ता कहते हैं कि जब भौतिक रूप से साधक के जीवन में कोई गुरु या कोई मार्गदर्शक नहीं होता, तो यह चुनना काफी कठिन हो जाता है कि कौन सा साधना मार्ग लें: किस प्रकार की साधना करें, साबर में पौराणिक मंत्र करें या तंत्रोक्त मंत्र, और भगवान के किस स्वरूप की पूजा करें। वे कहते हैं कि सबसे पहली विकट परिस्थिति यह आती है कि गुरु स्वरूप में किस देवता का चुनाव करें, किस महाशक्ति का गुरु स्वरूप में पूजन करें। विकल्प बहुत सारे होते हैं, पर विकल्पों को चुनने की जो क्षमता चाहिए, निर्णय लेने की जो क्षमता चाहिए, वह कहीं न कहीं साथ नहीं देती। वे कहते हैं कि साधक चुनाव कर भी ले, तब भी भीतर यह संशय बना रहता है कि जो किया वह सही है या गलत। जब भटकाव आने लगे, और साधक उसी महाशक्ति पर शक और संशय करने लगे जिसे उसने अपना इष्ट और गुरु माना है, तो कहीं न कहीं साधना का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा। इन सभी परिस्थितियों को देखकर, वे कहते हैं, यह साधना हर साधक के लिए है — नए हों या पुराने, किसी भी प्रकार की साधना करते हों, पौराणिक, तंत्रोक्त या साबर क्षेत्र के, स्त्री हों या पुरुष, साधिकाएँ और नए साधक सभी।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्यक स्वरूप दत्तात्रेय, गिरनार पर नित्य निवास
गिरनार कोटि सिद्धों का धाम, जैसे कैलाश सदाशिव का
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय को तीनों महाशक्तियों — ब्रह्मा, विष्णु और शिव — का सम्यक स्वरूप कहा गया है, इसीलिए गुरु न होने पर उन्हें ही गुरु रूप में चुनना है। जैसे कैलाश पर सदाशिव महारुद्र और विभिन्न शक्तियों का नित्य वास कहा गया है, वैसे ही, वे कहते हैं, अनेक कोटि सिद्धों का वास दत्तात्रेय के साथ गिरनार पर्वत पर कहा गया है, जहाँ वे नित्य निवास करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव — तीनों महाशक्तियों का जो सम्यक स्वरूप है, वह भगवान दत्तात्रेय को कहा गया है। इसी कारण वे हर गुरु-विहीन साधक को दत्तात्रेय देते हैं। जिस प्रकार कैलाश पर्वत पर सदैव नित्य भगवान सदाशिव महारुद्र का वास कहा गया है, और विभिन्न प्रकार की शक्तियों का निवास कहा गया है, वे कहते हैं, उसी प्रकार अनेकों-अनेक कोटि सिद्धों का वास भगवान दत्तात्रेय के साथ गिरनार पर्वत पर कहा गया है। गिरनार पर्वत पर, वे कहते हैं, भगवान दत्तात्रेय नित्य निवास करते हैं।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा की दत्तात्रेय जयंती और उनके त्रिमुख स्वरूप की अनुसूया कथा
तीनों देवों से चंद्रमा, दुर्वासा और दत्तात्रेय का प्रकट होना
वक्ता कहते हैं कि मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को dattatreya-jayanti, यानी उनका अवतरण दिवस माना जाता है। वे कथा सुनाते हैं: जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश माता अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने आए, तो उन्होंने पतिव्रत धर्म के प्रभाव से तीनों को बाल रूप कर दिया, और इन तीनों की कृपा से तीन स्वरूप प्रकट हुए — चंद्रमा, दुर्वासा और दत्तात्रेय। वे कहते हैं कि दत्तात्रेय को प्रमुख रूप से विष्णु का अंश माना गया है, पर सम्यक रूप तीनों का है — तीन मस्तक, ब्रह्मा, विष्णु, महेश के, और छह भुजाएँ।
वक्ता कहते हैं कि मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि को दत्तात्रेय जयंती यानी उनके अवतरण दिवस के रूप में माना जाता है। वे कहते हैं कि कथा सबको पता होगी: जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश माता अनुसूया की परीक्षा के लिए, उनके सतीत्व की परीक्षा के लिए आए और उनसे प्रार्थना की, तब माता अनुसूया ने अपने सतीत्व और पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए उसके प्रभाव से तीनों को बाल स्वरूप कर दिया। इन तीनों की कृपा से, वे कहते हैं, जो स्वरूप प्रकट हुआ वह तीन थे: एक स्वरूप भगवान चंद्रमा कहे गए, एक भगवान दुर्वासा कहे गए, और एक भगवान दत्तात्रेय कहे गए। वे कहते हैं कि दत्तात्रेय को प्रमुख रूप से विष्णु जी के अंश से माना गया है, लेकिन सम्यक रूप इसमें तीनों महाशक्तियों का है: तीन मस्तक, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों हैं, और छह भुजाएँ। इस प्रकार से भगवान दत्तात्रेय हैं।
महागुरु दत्तात्रेय: उनका आश्रय लेने पर कोई गुरु मंडल दूर नहीं रहता
हर गुरु परंपरा ब्रह्मा, विष्णु, महेश से निकली है
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय का नित्य महागुरु स्वरूप में पूजन करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मांड की हर गुरु परंपरा और हर गुरु मंडल ब्रह्मा, विष्णु, महेश की ही परंपरा से निकला है, और वे माँ जगदंबा भगवती महाशक्ति की कृपा से ही सबसे बड़ी शक्ति बने। इसलिए जब साधक गिरनार के इस महाप्रभु का आश्रय लेता है, वे कहते हैं, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह किसी गुरु या किसी गुरु मंडल की कृपा से वंचित रह जाए। जिस भी परंपरा में जाना हो पर पता न हो कि क्या करना है, और बहुत विकल्पों में निर्णय न हो पा रहा हो, वे कहते हैं, तो दत्तात्रेय की शरण लें — उनकी कृपा से हर मनोकामना सिद्ध होगी।
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की प्रसन्नता के लिए उनका नित्य ही महागुरु के स्वरूप में पूजन करना चाहिए। उनका कारण: इस ब्रह्मांड में जितनी भी गुरु परंपराएँ हैं, जितने भी गुरु मंडल हैं, वे सब ब्रह्मा, विष्णु, महेश की ही परंपरा से निकले हैं — कहीं न कहीं उन्हीं की परंपरा है। और ये तीनों, वे कहते हैं, माँ जगदंबा भगवती महाशक्ति के सम्यक प्रभाव, उनकी कृपा और आशीर्वाद से ही सबसे बड़ी शक्ति बने। इसलिए जब साधक गिरनार के इस महाप्रभु, इस महाशक्ति का आश्रय ग्रहण करता है, वे कहते हैं, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह किसी गुरु या किसी गुरु मंडल की कृपा से वंचित रह जाए। जिस भी परंपरा में जाना चाहें, वे कहते हैं, पर पता ही न हो कि क्या करना है और क्या नहीं, विकल्प बहुत हों और निर्णय न हो पा रहा हो — ऐसी अवस्था में भगवान दत्तात्रेय की शरण ग्रहण करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों महाशक्तियाँ उनके भीतर सम्यक रूप से हैं, उनकी कृपा से साधक की हर मनोकामना सिद्ध होगी।
नए और पुराने साधकों के लिए दत्त माला मंत्र अनुष्ठान के फल
बुरे प्रारब्ध कटते हैं, तपोबल बढ़ता है, आगे रक्षण
वक्ता कहते हैं कि हर साधक को, नया हो या पुराना, dattatreya-mala-mantra का जप, प्रयोग और अनुष्ठान करना चाहिए। नए साधक के लिए, वे कहते हैं, सबसे पहले पुराने अर्जित कर्मों से बना बुरा प्रारब्ध कटता है; फिर भीतर तपोबल बढ़ता है, और भविष्य में रक्षण प्राप्त होता है।
वक्ता कहते हैं कि जो साधना-आराधना वे सबके सामने रख रहे हैं — दत्त माला मंत्र का जप, इसका प्रयोग और इसका अनुष्ठान — वह हर साधक को करना चाहिए, चाहे नया हो या पुराना। नए साधक अगर इसे करते हैं, वे कहते हैं, तो सबसे पहले यह होगा कि पुराने अर्जित कर्मों के कारण जो भी बुरा प्रारब्ध है, वह कटेगा। उनके भीतर तपोबल बढ़ेगा, वे कहते हैं, और भविष्य में रक्षण प्राप्त होगा।
दत्त माला मंत्र के साथ अलग से आसन, दिशा या शरीर बंधन की आवश्यकता नहीं
मंत्र अपने प्रभाव से स्वयं बंधन कर देता है
वक्ता कहते हैं कि जब साधक dattatreya-mala-mantra की साधना करता है, तो आसन बंधन, दिशा बंधन इत्यादि या शरीर बंधन अलग से करने की आवश्यकता नहीं पड़ती; इस मंत्र के प्रभाव से हर चीज़ हो जाती है। यही, वे कहते हैं, इसकी सबसे बड़ी बात है।
वक्ता कहते हैं कि जब साधक दत्त माला मंत्र की यह साधना करेगा, तो उसे आसन बंधन, दिशा बंधन इत्यादि या शरीर बंधन अलग से करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इस मंत्र के प्रभाव से, वे कहते हैं, हर चीज़ हो जाएगी। यही, वे कहते हैं, इसकी सबसे बड़ी बात है।
गुरु मंत्र के रूप में दत्तात्रेय बीज मंत्र और भौतिक गुरु के लिए नित्य प्रार्थना
जब तक भौतिक गुरु की प्राप्ति न हो
वक्ता कहते हैं कि माला मंत्र के साथ-साथ गुरु मंत्र के हेतु साधक दत्तात्रेय के बीज मंत्र मंत्र का जप कर सकता है, मानसिक रूप से भी। अगर भौतिक रूप से किसी गुरु से गुरु मंत्र या नाम मंत्र नहीं मिला है, वे कहते हैं, तो जब तक उसकी प्राप्ति न हो, साधक दत्तात्रेय के शरणागत होकर उनसे नित्य प्रार्थना करे कि प्रभु उसे शिष्य स्वरूप में आशीर्वाद देते हुए भौतिक रूप से गुरु प्रदान करें।
वक्ता कहते हैं कि माला मंत्र के साथ-साथ गुरु मंत्र के हेतु साधक भगवान दत्तात्रेय के बीज मंत्र का जप कर सकता है। वे कहते हैं कि मानसिक रूप से भी जप कर सकता है। अगर साधक को भौतिक रूप से किसी गुरु के द्वारा गुरु मंत्र या नाम मंत्र नहीं मिला है, वे कहते हैं, तो जब तक उसकी प्राप्ति न हो जाए, तब तक वह भगवान दत्तात्रेय के शरणागत होकर उनसे नित्य यह प्रार्थना करे: हे प्रभु, मुझे शिष्य स्वरूप में आशीर्वाद देते हुए भौतिक रूप से गुरु प्रदान करें।
दत्तात्रेय को आदि गुरु के रूप में स्थापित करना और पूर्णिमा से दत्त माला मंत्र आरंभ
छह इंच से छोटा विग्रह, यंत्र, या सदाशिव के सम्मुख
वक्ता कहते हैं कि dattatreya-mala-mantra का जप किसी भी महीने की पूर्णिमा से आरंभ करें; मार्गशीर्ष पूर्णिमा से करें तो उस दिन दत्तात्रेय जयंती है। घर में दत्तात्रेय का छह इंच से छोटा विग्रह या दत्तात्रेय यंत्र स्थापित कर सकते हैं, या दोनों के बिना भगवान सदाशिव के सम्मुख जप कर सकते हैं। जिसे कोई दीक्षा नहीं मिली और वह भौतिक रूप से दीक्षा चाहता है, वह दत्तात्रेय को प्रथम, आदि गुरु के रूप में स्थापित करे — विग्रह या यंत्र, या यंत्र को पीले वस्त्र में लपेटकर उसके ऊपर विग्रह। उस पूर्णिमा को, वे कहते हैं, पंचामृत से अभिषेक करें, विग्रह को अच्छे से सजाएँ, यथाशक्ति धूप-दीप-नैवेद्य करें, और घी का दीपक जलाएँ जिसके घी में थोड़ी हल्दी डाल दें।
वक्ता कहते हैं कि अगर साधक मार्गशीर्ष पूर्णिमा से करता है तो उस दिन दत्तात्रेय जयंती है और उस दिन से आरंभ कर सकता है; अन्यथा किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि से जप आरंभ करे। विधि विधान के लिए, वे कहते हैं, चाहें तो घर में भगवान दत्तात्रेय की छह इंच से छोटी प्रतिमा यानी श्री विग्रह स्थापित कर सकते हैं, या दत्तात्रेय यंत्र स्थापित कर सकते हैं; और यह भी न करना चाहें तो भगवान सदाशिव के सम्मुख इनके मंत्र का जप कर सकते हैं। अगर साधक को किसी भी प्रकार की दीक्षा प्राप्त नहीं हुई है और वह भौतिक रूप से दीक्षा प्राप्त करना चाहता है, वे कहते हैं, तो वह भगवान दत्तात्रेय को प्रथम गुरु, आदि गुरु के रूप में स्थापित करे। स्थापना दो प्रकार से हो सकती है: या तो उनका श्री विग्रह, या उनका यंत्र — अथवा यंत्र को पीले वस्त्र में लपेटकर उसके ऊपर भगवान दत्तात्रेय का श्री विग्रह स्थापित करें। किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को, वे कहते हैं, पंचामृत इत्यादि से अभिषेक करके श्री विग्रह को अच्छे से सुसज्जित करें, धूप, दीप, नैवेद्य इत्यादि से यथाशक्ति पूजन करें, और उनके समक्ष घी का दीपक जलाएँ, जिसके घी में थोड़ी सी हल्दी डाल दें।
दत्त माला मंत्र की नित्य जप विधि
संकल्प, विनियोग एक बार, पंचमुखी रुद्राक्ष माला पर 108 पाठ
वक्ता कहते हैं कि साधक पीला या श्वेत वस्त्र, या भगवा (सैफ़्रॉन) पहनकर कुश आसन या पीले आसन पर बैठे। संकल्प दत्तात्रेय की परम कृपा, समस्त बुरे प्रारब्ध के शमन, पुण्यों के उदय, भौतिक जीवन में गुरु की प्राप्ति और आगामी साधनाओं में पूर्ण सफलता के लिए लिया जाता है; जल समर्पित करके dattatreya-mala-mantra का 108 बार पाठ पंचमुखी रुद्राक्ष की माला पर करें। विनियोग और आरंभ के श्लोक केवल एक बार, वे कहते हैं, और जप भगवान के दाहिने हाथ में समर्पित करें। विग्रह या यंत्र न रखें तो सदाशिव के विग्रह या शिवलिंग के सम्मुख दीप जलाकर वैसे ही करें और जप उन्हें समर्पित कर दें।
स्थापना और पूजन के बाद, वक्ता कहते हैं, साधक पीला या श्वेत वस्त्र पहनकर कुशा के आसन या पीले आसन पर बैठे — अथवा नारंगी यानी भगवा, सैफ़्रॉन वस्त्र पहनकर — और दत्त माला मंत्र का जप आरंभ करे। संकल्प में, वे कहते हैं, यह लें: भगवान दत्तात्रेय की परम कृपा प्राप्ति हेतु, तथा उनकी कृपा से अपने समस्त बुरे प्रारब्ध के शमन हेतु, पुण्यों के उदय हेतु, भौतिक जीवन में गुरु की प्राप्ति हेतु, तथा आगामी समय में की जाने वाली साधनाओं में पूर्ण सफलता हेतु मैं दत्त माला मंत्र के जप का संकल्प लेता हूँ या लेती हूँ। यह बोलकर जल समर्पित करें, और उसके बाद दत्त माला मंत्र का 108 बार पाठ करें। विनियोग और आरंभ की चीज़ें, वे कहते हैं, केवल एक बार करनी हैं: आरंभ के सारे श्लोक एक बार पढ़ें, विनियोग एक बार लें, और उसके बाद जो माला मंत्र दिया है उसे रुद्राक्ष की माला — पंचमुखी रुद्राक्ष की माला — से 108 बार जपें, और वह जप भगवान के दाहिने हाथ में समर्पित करें। अगर साधक श्री विग्रह या यंत्र नहीं रखना चाहता, वे कहते हैं, तो भगवान सदाशिव के विग्रह या उनके शिवलिंग के सम्मुख इसी प्रकार दीप प्रज्वलित करके जप करे, और उसे उन्हें समर्पित कर दे।
दत्त माला मंत्र अनुष्ठान की अवधि: पूर्णिमा से पंद्रह, ग्यारह या सत्ताईस दिन
पूर्णिमा से अमावस्या अति उत्तम, ग्यारह न्यूनतम, सत्ताईस सर्वश्रेष्ठ
वक्ता कहते हैं कि dattatreya-mala-mantra का जप पूर्णिमा से अमावस्या तक पंद्रह दिन करना अति उत्तम है; कम से कम ग्यारह दिन तो अवश्य करना चाहिए; और सत्ताईस दिन करें तो सर्वश्रेष्ठ है। 108 जप प्रतिदिन सुबह के समय करें, वे कहते हैं, यही सर्वश्रेष्ठ समय है।
वक्ता कहते हैं कि अगर साधक यह कार्य पूर्णिमा तिथि से लेकर अमावस्या तक पंद्रह दिन करता है तो अति उत्तम है। अथवा कम से कम, वे कहते हैं, ग्यारह दिन तो अवश्य करें — ग्यारह दिन करना चाहिए। और अगर सत्ताईस दिन तक करते हैं तो सर्वश्रेष्ठ है। प्रतिदिन 108 बार जप सुबह के समय करें, वे कहते हैं; सुबह का समय सर्वश्रेष्ठ है।
दत्त माला मंत्र अनुष्ठान के दौरान प्रतिदिन पक्षियों, कुत्तों और गाय को भोजन
दत्तात्रेय का स्वरूप पूर्णतः प्रकृति को समर्पित
जब तक अनुष्ठान चले, वक्ता कहते हैं, साधक प्रतिदिन यथाशक्ति पक्षियों को दाना डाले, कुत्तों को भोजन कराए और गाय को भोजन कराए। कारण: दत्तात्रेय के पीछे गौ माता खड़ी होती हैं, चरणों के पास कुत्ते रहते हैं और आसपास पक्षी उड़ते रहते हैं — भगवान का यह स्वरूप पूर्ण रूप से प्रकृति को समर्पित है, इसलिए इनकी सेवा अति आवश्यक है। अगर साधक रोज़ गाय को ग्रास खिलाए, साथ में कुत्तों और पक्षियों को भोजन दे, वे कहते हैं, तो 100 प्रतिशत लिखकर रख लें कि अनुष्ठान काल में ही दत्तात्रेय की पूर्ण कृपा प्राप्त होगी।
वक्ता कहते हैं कि यह जप, यह अनुष्ठान जब तक चलेगा, तब तक प्रतिदिन साधक यथाशक्ति पक्षियों को दाना ज़रूर डाले, कुत्तों को भोजन ज़रूर कराए, और गाय को भोजन कराए। कारण: वे कहते हैं, सदैव देखेंगे कि भगवान दत्तात्रेय के पीछे गौ माता खड़ी होती हैं, चरणों के पास कुत्ते रहते हैं, और उनके आसपास पक्षी ज़रूर उड़ते रहते हैं। यानी वे प्रकृति से पूर्ण रूप से संबंध रखते हैं; भगवान का यह स्वरूप पूर्ण रूप से प्रकृति को समर्पित है। इसलिए इनकी सेवा साधक के लिए अति आवश्यक है। अगर साधक गाय को रोज़ ग्रास खिला सके, साथ में कुत्तों और पक्षियों को भोजन दे, तो, वे कहते हैं, 100 प्रतिशत लिखकर रख लें: भगवान दत्तात्रेय की पूर्ण कृपा उसे इसी साधना-अनुष्ठान के काल में ही प्राप्त होगी ही होगी।
दत्त माला मंत्र के लिए दीक्षा क्यों आवश्यक नहीं
तंत्र ग्रंथों में सौ से अधिक अक्षरों के मंत्र दीक्षा से मुक्त
वक्ता कहते हैं कि चूँकि यह माला मंत्र है, इसके लिए किसी भी प्रकार की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए साधक मन से संशय निकाल दे। तंत्र ग्रंथों में, वे कहते हैं, वर्णन आता है कि सौ से अधिक शब्दों या बीजाक्षरों के मंत्र के लिए दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए बिना दीक्षा के इसका जप कर सकते हैं। इसका कोई तिर्यक प्रभाव नहीं है, वे कहते हैं, क्योंकि मंत्र सर्वश्रेष्ठ और स्वयं सिद्ध है; साधक का काम है स्वयं को इसके योग्य बनाना ताकि इसका प्रभाव प्राप्त हो।
एक विशेष बात, वक्ता कहते हैं: चूँकि यह माला मंत्र है, इसके लिए किसी भी प्रकार की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए साधक मन से संशय निकाल दे। जहाँ मंत्र सौ से अधिक शब्दों का, सौ से अधिक अक्षरों या बीजाक्षरों का हो, वे कहते हैं, वहाँ ग्रंथों में — तंत्र ग्रंथों में — यह वर्णन आता है कि उसके लिए दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए साधक बिना किसी दीक्षा के इस मंत्र का जप कर सकता है। इसका कोई तिर्यक प्रभाव नहीं है, वे कहते हैं, क्योंकि यह मंत्र अपने आप में सर्वश्रेष्ठ और सिद्ध है — स्वयं सिद्ध। साधक को स्वयं को इसके योग्य, इस मंत्र के योग्य बनाना है ताकि इसका प्रभाव प्राप्त हो। यह मंत्र, वे दोहराते हैं, सिद्ध है।
दत्त माला मंत्र अनुष्ठान का अंतिम दिन: ब्राह्मण को दान और पाँच बच्चों को भोजन
जिससे मंत्र आगे के प्रयोग के लिए तीक्ष्ण और सिद्ध होता है
वक्ता कहते हैं कि जितने दिन का संकल्प हो — ग्यारह, इक्कीस या सत्ताईस दिन, या पूर्णिमा से अमावस्या तक — उसके अंतिम दिन साधक मंदिर जाकर ब्राह्मण को यथाशक्ति दान ज़रूर दे: दक्षिणा सहित अन्नदान। संभव हो तो उस दिन कम से कम पाँच बच्चों को भोजन भी कराए, हो सके तो मीठी खीर, पर खिलाए ज़रूर, चाहे मंदिर में या घर में। इतना करने से, वे कहते हैं, यह मंत्र और इसकी शक्ति साधक के लिए अत्यंत तीक्ष्ण और सिद्ध हो जाती है, और जब भी वह इसका प्रयोग करेगा अच्छा फल मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि जब साधक ग्यारह दिन, इक्कीस दिन या सत्ताईस दिन, अथवा पूर्णिमा से अमावस्या तक, यथाशक्ति जितने दिन जप कर ले, तो अंतिम दिन — जितने दिन का भी संकल्प हो — उसे मंदिर जाकर ब्राह्मण को यथाशक्ति दान ज़रूर देना है। दान अन्न का है, वे कहते हैं, दक्षिणा सहित। और संभव हो तो उस अंतिम दिन कम से कम पाँच बच्चों को भोजन ज़रूर कराना चाहिए। पाँच बच्चों को भोजन ज़रूर कराएँ, वे कहते हैं: हो सके तो मीठी खीर ही खिलाएँ, पर खिला दें, चाहे मंदिर में खिलाएँ या घर में। साधक इतना करेगा, वे कहते हैं, तो यह मंत्र और इस मंत्र की शक्ति उसके लिए अत्यंत तीक्ष्ण हो जाएगी, सिद्ध हो जाएगी, और जब भी वह इसका प्रयोग करेगा अच्छा फल प्राप्त होगा।
अनुष्ठान के बाद दत्त माला मंत्र का नित्य पाठ और चौंसठ कोटि मंत्रों का जागरण
पाँच से सत्ताईस पाठ, आसन पर सबसे पहले
साधना पूर्ण होने के बाद, वक्ता कहते हैं, साधक dattatreya-mala-mantra का पाठ प्रतिदिन निर्विघ्न, निरंतर करता रहे — कम से कम पाँच बार, या सात, ग्यारह, इक्कीस या सत्ताईस बार — और जब भी आसन पर बैठे, सबसे पहले इसी मंत्र का जप करे, जितनी शक्ति और सामर्थ्य हो। वे कहते हैं कि हर व्यक्ति, नया या पुराना साधक, यह साधना कर सकता है और अवश्य करे, क्योंकि इस मंत्र के जागरण और दत्तात्रेय की कृपा से चौंसठ कोटि के मंत्र चलते हैं — हर प्रकार के मंत्र जागृत, चलायमान और प्रभावी हो जाते हैं।
यह साधना पूर्ण करने के बाद, वक्ता कहते हैं, साधक प्रतिदिन कम से कम पाँच बार, या सात, ग्यारह, इक्कीस या सत्ताईस बार इसका पाठ करता रहे — निर्विघ्न, निरंतर। प्रत्येक दिन जब भी साधक आसन पर बैठे, वे कहते हैं, सबसे पहले इसी मंत्र का जप करे, चाहे पाँच बार या सत्ताईस बार, जितनी उसकी शक्ति और सामर्थ्य हो। इस प्रकार, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति यह साधना-अनुष्ठान कर सकता है; नया साधक हो या पुराना, यह साधना अवश्य करनी चाहिए। इसके प्रभाव से — इस मंत्र के जागरण के प्रभाव से, भगवान दत्तात्रेय की कृपा से — चौंसठ कोटि के मंत्र चलते हैं: यानी हर प्रकार के मंत्र जागृत, चलायमान हो जाते हैं और प्रभाव देने लगते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक को यह साधना अवश्य करनी चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।