दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र अनुष्ठान — दरिद्रता के दहन की मास भर की विधि
नाग केसर और शिव स्तोत्र का मास भर का प्रयोग, जो दरिद्रता और रोग से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है।
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घर की दरिद्रता के दहन हेतु दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र अनुष्ठान
सदाशिव का दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र, जब घर अन्न, धन, वस्त्र और छोटी-छोटी इच्छाओं तक के लिए तरस जाए
वक्ता कहते हैं कि जब दरिद्रता घर कर जाती है तब लोग न सिर्फ अन्न, धन और वस्त्र के लिए, बल्कि अपनी छोटी से छोटी इच्छा की पूर्ति के लिए भी तरस कर रह जाते हैं, और घर का गृह स्वामी दैनिक जीवन के साधन जुटा पाने में सक्षम नहीं हो पाता। इसके लिए वे भगवान सदाशिव के दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र की साधना और अनुष्ठान करने को कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब दरिद्रता घर में बैठ जाती है, तब परिवार केवल अन्न, धन और वस्त्र के लिए ही नहीं तरसता, बल्कि अपनी छोटी से छोटी इच्छा तक पूरी नहीं कर पाता। वे कहते हैं कि दैनिक जीवन के जो साधन होते हैं, वे भी अधूरे रह जाते हैं, और घर का गृह स्वामी उन्हें पूर्ण कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता। इसलिए इस दरिद्रता के दहन के लिए वे भगवान सदाशिव के दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र का उपयोग करने को कहते हैं — उसकी साधना, उसका अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। — और कहते हैं कि इसका पूरा विधि-विधान वे बता रहे हैं।
मासिक शिवरात्रि, प्रदोष या श्रेष्ठतः महाशिवरात्रि से अनुष्ठान का आरंभ
किसी भी महीने की शिवरात्रि या प्रदोष, और यदि संयोग महाशिवरात्रि का बने तो अति उत्तम
वक्ता कहते हैं कि यह अनुष्ठान किसी भी महीने की मासिक शिवरात्रि या प्रदोष से आरंभ किया जा सकता है, परंतु यदि महाशिवरात्रि का संयोग प्राप्त हो रहा हो तो वह अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि यह अनुष्ठान किसी भी महीने की मासिक शिवरात्रि से, अथवा प्रदोष से आरंभ किया जा सकता है। यदि संयोग ऐसा बन जाए कि इसे महाशिवरात्रि से आरंभ किया जा सके, तो वे कहते हैं कि वह सबसे उत्तम है।
सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं; दिन में दो बार — 8 बजे से पहले और प्रदोष काल में
क्या दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र को प्रयोग से पहले सिद्ध करना पड़ता है, और इसका पाठ कब करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि इस स्तोत्र को पहले सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है — वस्तुतः इसका लगातार पाठ करना है। वे जोड़ते हैं कि कुछ विधान हैं, जिनके साथ यदि यह किया जाए तो प्रभाव शीघ्र आरंभ हो जाता है, और यह कि इसका पाठ प्रमुख रूप से दिन में दो समय करना चाहिए — सुबह 8 बजे से पहले, और शाम को गोधुली बेला में, यानी प्रदोष काल के आसपास।
वक्ता कहते हैं कि इस स्तोत्र पर पहले सिद्धि प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है — वस्तुतः आवश्यक यह है कि इसका लगातार पाठ किया जाए। वे जोड़ते हैं कि कुछ विधान हैं, जिनके साथ यदि यह किया जाए तो यह स्तोत्र बहुत जल्दी अपना प्रभाव देना आरंभ कर देता है। इसका पाठ प्रमुख रूप से दो समय करना चाहिए — यदि सुबह कर रहे हों तो 8 बजे से पहले कर लेना चाहिए; यदि शाम को कर रहे हों तो गोधूलि बेलासांयकाल का गोधूलि समय — परंपरागत रूप से आकर्षण प्रयोगों हेतु उपयुक्त माना जाता है। में, यानी प्रदोष काल के आसपास कर लेना चाहिए।
दैनिक पूजन पूर्ण करके दरिद्रता और रोग दोनों के लिए संकल्प
पहले घर का दैनिक पूजन, फिर दरिद्रता और रोग दोनों को नाम लेकर संकल्प, क्योंकि रोग भी एक प्रकार की दरिद्रता है
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम घर में जो दैनिक पूजन किया जा रहा है उसे पूर्ण कर लेना चाहिए। उसके पश्चात संकल्प लेना चाहिए कि हे सदाशिव, मेरे घर और परिवार में जो दरिद्रता की उपस्थिति बनी हुई है वह समाप्त हो और आपकी कृपा से धन-धान्य की वृद्धि हो। वे जोड़ते हैं कि रोग भी कहीं न कहीं एक प्रकार की दरिद्रता है, इसलिए उसी संकल्प में रोग और दुख से मुक्ति की कामना भी कर लेनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम घर में जो दैनिक पूजन किया जा रहा है, उसे पूर्ण कर लें। उसके पश्चात संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। ले लें — सदाशिव को संबोधित करते हुए, कि मेरे घर में, मेरे परिवार में जो दरिद्रता की उपस्थिति बनी हुई है वह दरिद्रता समाप्त हो, और आपकी कृपा से धन-धान्य की वृद्धि हो। वे जोड़ते हैं कि रोग भी कहीं न कहीं एक प्रकार की दरिद्रता का ही प्रकार है। इसलिए उसी संकल्प में रोग और दुख से मुक्ति की कामना भी कर लें, और उसके पश्चात ही यह पाठ करें।
मुट्ठी में नाग केसर रखकर स्तोत्र का आठ या सोलह बार पाठ
आसन पर बैठकर एक मुट्ठी नाग केसर हाथ में रखकर स्तोत्र का आठ बार, या अति उत्तम रूप से सोलह बार पाठ
वक्ता कहते हैं कि इसमें नाग केसर का प्रयोग करना चाहिए, जो पूजन की दुकान पर मिल जाता है — या तो पीले कपड़े की एक छोटी सुंदर थैली बना लें या पीला कपड़ा रख लें, और प्रतिदिन एक मुट्ठी नाग केसर का प्रयोग करें। अपने आसन पर बैठकर नाग केसर को मुट्ठी में रखकर दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र का कम से कम आठ बार, और अति उत्तम रूप से सोलह बार पाठ करना चाहिए, उसके पश्चात नाग केसर को पीले कपड़े में बाँधकर गाँठ लगा देनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए नाग केसर चाहिए, और वह पूजन-सामग्री की दुकान पर मिल जाता है। या तो पीले कपड़े की एक छोटी, सुंदर थैली बना लेनी चाहिए, या पीला कपड़ा रख लेना चाहिए; प्रतिदिन एक मुट्ठी नाग केसर की आवश्यकता पड़ती है, और उतना नाग केसर एक साथ लेकर आना चाहिए जितने दिनों तक करना है, क्योंकि प्रतिदिन एक-एक मुट्ठी की आवश्यकता पड़ेगी। अपने स्थान पर, अपने आसन पर बैठकर नाग केसर को मुट्ठी में रखना चाहिए, और उसके पश्चात दरिद्र धन (दहन) स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। पाठ कम से कम आठ बार करना है; सोलह बार करें तो अति उत्तम है। आठ या सोलह बार पाठ करने के पश्चात उस नाग केसर को पीले कपड़े में रखकर गाँठ लगा देनी चाहिए।
चौखट स्पर्श कराकर मिश्री-युक्त जल, घी के दीपक और बिल्व पत्र मंदिर ले जाना
मिश्री मिला एक लोटा जल, घी के दो दीपक, पुष्प और बिल्व पत्र — और निकलने से पहले लोटे से घर की चौखट का स्पर्श
वक्ता कहते हैं कि यदि यह सुबह के समय कर रहे हों तो एक लोटा जल लें, उसमें थोड़ी मिश्री (और संभव हो तो दूध भी) डालें, घी के दो दीपक, पुष्प और बिल्व पत्र लेकर शिव मंदिर की ओर जाएँ। जाने से पहले जिस घर में रह रहे हैं — भले वह किराए का ही क्यों न हो — उसकी चौखट, यानी जिस क्षेत्र में रहते हैं और जिसका पैसा देते हैं उसकी चौखट, को लोटे से स्पर्श करा लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि यह सुबह के समय किया जा रहा है, तो अब एक लोटा जल ले लेना चाहिए। जल में थोड़ी मिश्री डाल देनी चाहिए — संभव हो तो दूध भी। घी के दो दीपक लेने चाहिए, साथ में पुष्प और बिल्व पत्र, और शिव मंदिर की ओर चल देना चाहिए। मंदिर जाने से पहले जिस घर में रह रहे हैं उसकी चौखट को लोटे से स्पर्श करा लेना चाहिए — भले ही वह घर किराए का क्यों न हो, जिस हिस्से में रहते हैं और जिसका किराया देते हैं उसकी चौखट का स्पर्श कराना चाहिए — और उसके बाद ही मंदिर जाना चाहिए।
दीपक प्रज्वलन, अभिषेक और श्रृंगार, फिर शिवलिंग पर नाग केसर अर्पण
दोनों दीपक प्रज्वलित, अभिषेक और श्रृंगार, गणपति, गौरी, नंदी और स्कंद का पूजन, फिर पूरा नाग केसर शिवलिंग पर अर्पित
वक्ता कहते हैं कि मंदिर में सर्वप्रथम घी के दोनों दीपक प्रज्वलित करें, फिर कपड़े में बँधा नाग केसर लेकर जाएँ, शिव जी का अभिषेक करें और उसके पश्चात श्रृंगार करें, तथा गणपति, गौरी, नंदी और स्कंद जी सभी के ऊपर जल की धार दें — गणपति जी को दुर्बा और शेष को बिल्व पत्र तथा पुष्प अर्पित करें, और शमी जी का पत्र मिल जाए तो वह भी शिवलिंग पर अवश्य चढ़ाएँ। उसके बाद नाग केसर की पोटली खोलकर, अपनी कामना पुनः बोलकर, पूरा नाग केसर शिवलिंग पर अर्पित कर देना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि शिव मंदिर पहुँचकर सर्वप्रथम घी के दोनों दीपक प्रज्वलित करने चाहिए। जो नाग केसर कपड़े में बाँधा था, उसे साथ लेकर जाना है। उसके पश्चात शिव जी का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। किया जाता है; दीपक जलाने के पश्चात उनका श्रृंगार किया जाता है। गणपति जी का पूजन अवश्य करें — गणपति, गौरी, नंदी और स्कंद जी सभी के ऊपर जल की धार दें। गणपति जी को दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। अर्पित करें, और शेष को बिल्व पत्र तथा पुष्प, जो सामर्थ्य हो और जो उपलब्ध हो। यदि शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। जी का पत्र मिल जाए, तो वह भी शिवलिंग के ऊपर अवश्य अर्पित करना चाहिए। इसके पश्चात नाग केसर की पोटली खोलनी चाहिए, अपनी कामना पुनः बोलकर, नाग केसर को कपड़े से खोलकर पूरा का पूरा शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के ऊपर चढ़ा देना चाहिए।
कुछ दाने घर लाकर धन के स्थान पर रखना और वही कपड़ा बार-बार प्रयोग करना
कुछ दाने वापस उठाकर घर में धन रखने के स्थान पर, और वही पीला कपड़ा प्रतिदिन दोबारा प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि नाग केसर चढ़ाने के पश्चात उसमें से कुछ दाने वापस उठाकर पोटली में रख लेने चाहिए और उन्हें घर लाकर उस स्थान पर रख देना चाहिए जहाँ घर में धन रखा जाता है। जिस दिन का कपड़ा प्रयोग किया गया वह रख दिया जाता है, और अगले दिन से वही एक कपड़ा बार-बार प्रयोग किया जा सकता है, तथा मंदिर से लौटकर प्रतिदिन दो-तीन दाने उसी स्थान पर रखते जाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि चढ़ाने के पश्चात शिवलिंग से नाग केसर के कुछ दाने वापस उठाकर पुनः पोटली में रख लेने चाहिए, और उसे लेकर घर आ जाना चाहिए। घर में धन रखने का जो स्थान है, वहाँ उसे रख देना चाहिए। प्रतिदिन यही क्रम चलता है — अगले दिन से वही कपड़ा, जो आज प्रयोग किया, बार-बार प्रयोग किया जा सकता है, हर बार नया लेने की आवश्यकता नहीं। नाग केसर चढ़ाकर वापस आते समय जो दो दाने, तीन दाने उठाकर लाए जाएँ, वे उसी स्थान पर रखते जाने चाहिए।
एक शिवरात्रि से अगले मास की शिवरात्रि तक प्रतिदिन जारी रखना
एक शिवरात्रि से अगले मास की शिवरात्रि तक प्रतिदिन — पूरा एक मास, जैसे फाल्गुन की महाशिवरात्रि से चैत्र की मासिक शिवरात्रि तक
वक्ता कहते हैं कि यह काम शिवरात्रि से आरंभ करके कम से कम अगले मास की मासिक शिवरात्रि तक जारी रखना चाहिए — यानी पूरे एक मास तक। यदि महाशिवरात्रि से आरंभ किया जाए तो वह अति उत्तम है, तब भी उस दिन से अगली मासिक शिवरात्रि तक अवश्य करना चाहिए; जैसे फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि से आरंभ करें तो चैत्र मास में पड़ने वाली मासिक शिवरात्रि में इसे पूर्ण करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह काम शिवरात्रि से आरंभ करना चाहिए और कम से कम अगली मासिक शिवरात्रि तक जारी रखना चाहिए — यानी यह प्रयोग पूरे एक मास तक करना है। यदि महाशिवरात्रि से किया जाए तो अति उत्तम है; तब भी उस दिन से आरंभ करके अगली मासिक शिवरात्रि तक इस विधि-विधान को अवश्य कर लेना चाहिए। वे उदाहरण देते हैं कि यदि फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि से आरंभ करें, तो चैत्र मास में जो मासिक शिवरात्रि पड़ेगी, उसमें इसे पूर्ण करना है।
अंतिम दिन यथाशक्ति गौ वंश को भोजन कराना
अंतिम दिन यथाशक्ति गौ वंश को भोजन — गौशाला में या अन्यत्र, सौ रुपये का भी पर्याप्त, और आवारा पशु हों तो अति उत्तम
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन अनुष्ठान पूर्ण हो, उस दिन यथाशक्ति गौ वंश को भोजन देना चाहिए — या तो सीधे, या फिर किसी गौशाला में। यह आवश्यक नहीं कि दस हज़ार या पाँच हज़ार का दिया जाए, सौ रुपये का भी पर्याप्त है, पर देना अवश्य चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यदि भोजन आवारा पशुओं को कराया जाए — चाहे बैल हो, सांड हो या गौ माता — तो अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन अंतिम दिन अनुष्ठान पूर्ण करेंगे — यानी अगली शिवरात्रि में — उस दिन अपनी यथाशक्ति के अनुसार गौ वंश को भोजन देना चाहिए, या तो सीधे उन्हें, या फिर किसी गौशाला में व्यवस्था करके। यह आवश्यक नहीं कि दस हज़ार का देना है या पाँच हज़ार का। सौ रुपये का दीजिए, पर दीजिए अवश्य। गौ वंश को भोजन कराना चाहिए, और वे कहते हैं कि यदि आवारा पशुओं को कराया जाए तो अति उत्तम है — चाहे बैल मिल जाए, सांड मिल जाए या गौ माता मिल जाए।
रोग या अभिचार बाधा में नाग केसर के साथ बिल्व गिरी जोड़ना
रोग या अभिचार बाधा होने पर नाग केसर के साथ एक बिल्व गिरी, जिसे वापस नहीं लाना — शिवलिंग पर ही छोड़ देना है
वक्ता कहते हैं कि दूसरा प्रयोग विशेष रूप से तब करना चाहिए जब रोग बहुत अधिक हो और बिल्कुल पीछा ही न छोड़ रहा हो — तब बिल्व गिरी (बिल्व वृक्ष का सूखा हुआ गोंद, जो पूजन की दुकान पर मिलता है) जोड़नी चाहिए, प्रतिदिन एक, नाग केसर के साथ। वे कहते हैं कि यह तब भी लागू होता है जब धन की समस्या के साथ-साथ अभिचार की बाधा भी हो — एक बिल्व गिरी नाग केसर के साथ लेकर मंदिर जाना है। नाग केसर के विपरीत बिल्व गिरी वापस नहीं लानी है — उसे शिवलिंग पर चढ़ाकर वहीं छोड़ देना है, और रोग से मुक्ति की कामना भी करनी है।
वक्ता कहते हैं कि यह दूसरा प्रयोग विशेष रूप से तब करना चाहिए जब रोग बहुत अधिक हो जाए — जब रोग किसी का पीछा ही न छोड़ रहा हो। यहाँ बिल्वबेल वृक्ष की पवित्र लकड़ी, भगवान शिव हेतु बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त। वृक्ष के गुदे (गोंद) का प्रयोग किया जाता है। सूखा हुआ बेल गोंद, जिसे बिल्व गिरी भी कहते हैं, उसी पूजन-सामग्री की दुकान पर मिलता है, और प्रतिदिन एक बिल्व गिरी की आवश्यकता नाग केसर के साथ पड़ती है। यदि रोग बहुत अधिक हो — यदि घर में सभी का शरीर पीड़ित हो, कुछ न कुछ कष्ट हो — अथवा रोग के अतिरिक्त अभिचार की बाधा भी हो, तो भी यही प्रयोग करना है। यानी चाहे धन की समस्या हो या उसके साथ अभिचार की बाधा, प्रयोग यही रहेगा। अंतर केवल इतना है कि नाग केसर जब मुट्ठी में लें तो उसमें एक बिल्व गिरी भी ले लें, और कपड़े के ऊपर उसे भी रखकर साथ में मंदिर लेकर जाएँ। परंतु वक्ता कहते हैं कि बिल्व गिरी वापस नहीं लानी है — शिवलिंग के ऊपर चढ़ाने के पश्चात उसे वहीं छोड़ देना है, और रोग से मुक्ति की कामना भी करनी है।
जलधारा देते समय महामृत्युंजय महादेव के 108 नामों का पाठ
शिव जी के अभिषेक में पतली धार देते हुए महामृत्युंजय महादेव की 108 नामावली का पाठ
वक्ता सुझाते हैं कि यदि संभव हो तो दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र के साथ-साथ महामृत्युंजय महादेव की 108 नामावली का पाठ करते हुए वहाँ शिव जी का अभिषेक करें — इसके लिए लोटा कुछ बड़ा रखना होगा, पहले दोनों दीपक प्रज्वलित कर लें, और फिर जल की पतली धार देते हुए 108 नामों का पाठ करें।
वक्ता कहते हैं कि दरिद्र धन (दहन) पाठ के साथ-साथ, यदि संभव हो, तो महामृत्युंजय महादेव की 108 नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। का पाठ करते हुए वहाँ शिव जी का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। भी करना चाहिए। इसके लिए जल का लोटा कुछ बड़ा रखना होगा। पहले मंदिर में शिवलिंग के आगे दोनों दीपक प्रज्वलित कर देने चाहिए, फिर जल लेकर पतली धार देते हुए महामृत्युंजय महादेव के 108 नामों का पाठ करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह आसान है, किया जा सकता है।
जलहरी के छिद्र वाले लोटे में मंदिर का और घर का जल एक साथ भरना
जलहरी के छिद्र के ऊपर रखे लोटे को मंदिर के जल और घर से लाए जल से भरकर पाठ करना
वक्ता एक विकल्प बताते हैं कि शिवलिंग के ऊपर जो जलहरी टँगी होती है, उसके छिद्र वाले लोटे में मंदिर की बाल्टी से मंदिर का ही जल और घर से लाया हुआ जल भरकर, उसके बाद पाठ किया जा सकता है। वे कहते हैं कि यह भी करेंगे तो भगवान शिव बहुत जल्दी आपकी सुनेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अथवा, शिव जी के ऊपर जो जलहरी टँगी होती है उसमें एक छिद्र होता है — उस छिद्र के ऊपर रखे लोटे में जल डाल कर उसे भर दीजिए, मंदिर की बाल्टी से मंदिर का ही जल, और उसमें घर से ले गया हुआ जल भी डाल दीजिए, और उसके पश्चात पाठ कीजिए। वे कहते हैं कि यह भी करेंगे तो भगवान शिव बहुत जल्दी आपकी सुनेंगे।
सुबह श्रेष्ठ; शाम को जल अर्पण की रोक हो तो केवल दीप और अर्पण से भी काम चलेगा
सुबह करना अति उत्तम, क्योंकि कई मंदिरों में शाम को अभिषेक नहीं करने दिया जाता; ऐसी स्थिति में केवल दीप और नाग केसर अर्पण भी पर्याप्त
वक्ता कहते हैं कि यह काम सुबह करें तो अति उत्तम है, क्योंकि शाम के समय बहुत सारे मंदिरों में अभिषेक नहीं करने दिया जाता। ऐसी स्थिति में भी जाकर दीप प्रज्वलित करके नाग केसर (और बिल्व गिरी, यदि लागू हो) चढ़ाकर आया जा सकता है — और यदि जल भी न चढ़ाने दें, तो भी कोई बात नहीं। वे कहते हैं कि सुविधा अनुसार यह प्रयोग मास भर करें और महादेव से निवेदन करें, वे शीघ्र ही सुनेंगे, कामना पूर्ति करेंगे, धन प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा और व्यक्ति तथा उसके परिवार की दरिद्रता से मुक्ति हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि यह काम सुबह करें तो अति उत्तम है — शाम के समय बहुत सारे मंदिरों में अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। नहीं करने दिया जाता। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, जाकर दीप प्रज्वलित करके वहाँ नाग केसर और बिल्व गिरी चढ़ाकर आया जा सकता है। यदि जल भी न चढ़ाने दें, तो भी कोई बात नहीं है। तो सुविधा अनुसार यह प्रयोग मास भर करें, महादेव से निवेदन करें — वे शीघ्र ही सुनेंगे और कामना पूर्ति करेंगे, तथा धन प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। वक्ता कहते हैं कि इससे व्यक्ति की और उसके परिवार की दरिद्रता से मुक्ति अवश्य हो जाएगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।