संधि पूजा में चामुंडा तंत्रोक्त बलि पूजन — कौशिकी की कथा और पूरा विधान

संधि पूजा के पीछे की कौशिकी-चामुंडा कथा, और अष्टमी-नवमी के संधिकाल में घर पर चामुंडा के तंत्रोक्त बलि पूजन का विधान।

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01

नवरात्र में संधि पूजा क्या है, और यह कब होती है?

चामुंडा उग्र रूप में समस्त जगत में व्याप्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–01:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में एक ऐसा समय है जब शत्रु-नाश, अभिचार-नाश, प्रेत-पिशाच आदि नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए भगवती से विशेष विधि-विधान से पूजा-पाठ-प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है: अष्टमी तिथि के समापन और नवमी तिथि के आरंभ का संक्रमण काल, यानी संधि काल, जिसे दुर्गा पूजा के पंडालों में संधि पूजा के समय के रूप में अनाउंस किया जाता है। वे कहते हैं कि यह काल इतना दिव्य और परम प्रभावी है कि माना जाता है कि इसमें भगवती चामुंडा पूरे प्रत्यक्ष उग्र रूप से संपूर्ण जगत में व्याप्त रहती हैं, और उस उग्रता से समग्र संसार की सारी नकारात्मक शक्तियों पर ग्रहण लग जाता है, वे बंध जाती हैं, पूरी तरह उनके चरणों के नीचे दब जाती हैं।

02

पार्वती के शरीर से कौशिकी और कालिका की उत्पत्ति

कौशिकी महासरस्वती और विंध्य की अष्टभुजा के रूप में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:22–02:45

वक्ता वह कथा सुनाते हैं जो, उनके अनुसार, दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित है। शुंभ-निशुंभ ने देवताओं को स्वर्ग से निकाला तो देवता हिमालय पर जाकर भगवती की स्तुति करते हैं और उनके पुराने वरदान — विपत्ति में आवाहन करने पर अवश्य प्रकट होने — का स्मरण कराकर आवाहन करते हैं। पार्वती वहीं तपस्या के लिए गई थीं; स्तुति पर उनके शरीर से एक देवी प्रकट हुई। उनके बाहर निकलते ही पार्वती का स्वरूप कृष्ण वर्ण का हो गया — वह काला स्वरूप हिमालय पर स्थित होकर हिमालय की कालका के रूप में प्रसिद्ध हुआ, वही महाशक्ति कालिका हैं। जो प्रकट हुईं वे गौर वर्ण की थीं, नाम कौशिकी; उन्हें महासरस्वती का स्वरूप भी माना जाता है, और विंध्य पर्वत पर भगवती का अष्टभुजा स्वरूप अंश रूप से यही महासरस्वती कही जाती हैं। कौशिकी ने हिमालय पर ही आश्रय लिया, शुंभ-निशुंभ के वध के लिए योजनाबद्ध रूप से वहां उपस्थित हुईं।

03

कौशिकी के लिए दैत्यों की मांग और केवल विजेता को पति बनाने का उनका प्रण

भगवान पहले मति हर लेते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:46–04:54

वक्ता सप्तशती की कथा आगे बढ़ाते हैं: शुंभ-निशुंभ के दूत चंड-मुंड ने सबसे पहले कौशिकी को देखा और जाकर उनकी सुंदरता का वर्णन किया — राक्षसों का यही काम है, वे कहते हैं; पहले देवताओं को निकालते हैं, फिर, जैसा कहा जाता है कि जिसे कष्ट देना हो भगवान पहले उसकी मति हर लेते हैं, जगदंबा इनकी मति हर लेती हैं, ये मोहित होकर अपनी मृत्यु का आमंत्रण देने चल पड़ते हैं। चंड-मुंड ने तर्क दिया कि वरुण का सोना बरसाने वाला छत्र, इंद्र का ऐरावत और यमराज का कालदंड भाइयों के पास है ही, तो संसार की सबसे सुंदर स्त्री भी उन्हीं के पास हो। दूत सुग्रीव को भेजा गया, जिसने चाटुकारिता और धमकी से कहा कि दोनों विजेताओं में से किसी एक को पति चुन लो; भगवती ने गर्व से कहा कि उन्होंने प्रण कर रखा है कि जो उन्हें संग्राम में जीतेगा वही पति बनेगा, और इस धमकी पर कि शुंभ-निशुंभ उनका अभिमान धूल में मिलाकर बाल पकड़कर घसीट ले जाएंगे, बोलीं कि कमिटमेंट ले लिया है, अब प्रण कैसे बदलें।

04

हुंकार मात्र से धूम्रलोचन भस्म: मंत्र का शुद्ध उच्चारण क्यों आवश्यक है

सही जगह हुं, अनुस्वार या मकार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:55–06:13

वक्ता कहते हैं कि एक स्त्री के अभिमान से शुंभ का ईगो हर्ट हुआ तो उसने धूम्रलोचन को भेजा कि कौशिकी को बाल पकड़कर घसीट लाओ। धुएं जैसे शरीर वाला धूम्रलोचन, जो जहां-तहां प्रकट हो जाता था, धमकाने लगा और फिर पकड़ने को लपका। तंत्र ग्रंथों में दो प्रकार का वर्णन है, वे कहते हैं: भगवती के सिंह ने — जो धर्मराज, शिव और विष्णु के साक्षात स्वरूप माने गए हैं — दहाड़ा और उस गर्जना से धूम्रलोचन की सेना का नाश हो गया; और भगवती ने स्वयं हुंकार किया, केवल हुंकार की ध्वनि से धूम्रलोचन जलकर भस्म हो गया। इसीलिए, वे कहते हैं, मंत्र का उच्चारण अत्यंत आवश्यक है: लोग बिना जाने-सुने "हुं हुं फट फट" फटाफट पढ़ देते हैं, वहीं दिक्कत होती है — जानना चाहिए कि किस जगह हुंकार का हुं रहेगा, मकार रहेगा या अनुस्वार, अनुस्वार में पढ़ेंगे कि मकार में।

05

कौशिकी के ललाट से चामुंडा का प्रकट होना और उन्हें अपना नाम मिलना

चंड-मुंड के मस्तक कौशिकी को अर्पित

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:14–08:13

वक्ता कहते हैं कि इसके बाद भेजे गए चंड-मुंड जब कौशिकी के सामने आए, तो उनके ललाट से एक देवी प्रकट हुईं — शरीर में केवल हड्डियां, ऊपर केवल चमड़ा, एकदम पतली-दुबली, बहुत बड़ी, अत्यंत भयानक, दांत कटकटाती, जीभ मुंह से बाहर लटकी। प्रकट होते ही वे चंड-मुंड की सेना पर टूट पड़ीं और इतनी तीव्रता से दानवों का वध करने लगीं कि भय व्याप्त हो गया; रथ का रथ उठाकर मुंह में डालकर खा जातीं, हाथी-घोड़ों को सीधा चबा जातीं, और सेना धराशायी होकर भागी। चंड-मुंड स्वयं युद्ध को आए तो उन्होंने बांधकर दोनों के सिर काट डाले और क्रोध में भरी उन्हें कौशिकी के पास ले जाकर चढ़ा दिया: "इन महापशु चंड-मुंड के शीश स्वीकार कीजिए, और शुंभ-निशुंभ का वध आप स्वयं कीजिए।" प्रसन्न होकर कौशिकी ने कहा कि चंड और मुंड का वध करने के कारण भविष्य में उनका नाम चामुंडा हर जगह व्याप्त और प्रसिद्ध होगा — और यही स्वरूप, वे कहते हैं, संधि पूजा में पूजा जाता है।

06

चामुंडा प्रयोग के लिए 25 से 45 मिनट का संधिकाल इतना तीव्र क्यों है

खिड़की भर में करोड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का सफाया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:14–09:12

वक्ता कहते हैं कि चामुंडा इसलिए इतनी उग्र और तीव्र हैं क्योंकि तंत्र ग्रंथों में उनके प्रकट होने का काल वही संधि काल माना गया है जिसमें वे प्रकट हुई थीं। संधिकाल का समय बड़ा कम होता है, और उन्होंने चंड-मुंड का युद्ध उसी में समाप्त कर दिया था — अभी के हिसाब से, जैसे हम संधिकाल का पूजन करते हैं, लगभग 25 मिनट से अधिकतम 45 मिनट का समय। गुरु परंपरा के उच्च वर्ग के बुजुर्ग, अनुभवी तांत्रिक जब इसका वर्णन करते हैं तो बताते हैं कि भगवती ने इतने ही क्षण में न जाने कितने करोड़ अक्षौहिणी सेनाओं को साफ कर दिया था — इतनी वेगवान, इतनी तीव्र थीं। इसीलिए, वे कहते हैं, यह प्रयोग अत्यंत तीव्र, उत्तम और लाभ देने वाला है।

07

चामुंडा संधि पूजा बलि विधान के लिए पूरा नवरात्र व्रत आवश्यक नहीं

केवल अष्टमी का उपवास ही पर्याप्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:13–09:31

वक्ता कहते हैं कि इस विधि को करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि इसे वही करें जिन्होंने नवरात्रि में व्रत इत्यादि किया हो। जिन्होंने नवरात्र व्रत नहीं किया, वे यदि केवल अष्टमी का उपवास कर रहे हैं तो भी इस विधान को कर सकते हैं।

विधि-विधान कैसे करेंगे, इस पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम यह आवश्यक नहीं है कि इस विधि को वही करें जिन्होंने नवरात्रि में व्रतउपवास और संयम के साथ निभाया जाने वाला संकल्प, जो अनुष्ठान की अवधि तक चलता है। इत्यादि किया हो। जिन्होंने नवरात्र व्रत नहीं किया है, वे कहते हैं, यदि केवल अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। का उपवास कर रहे हैं तो भी इस विधान को कर सकते हैं।

08

संधिकाल के चामुंडा तांत्रोक्त बलि पूजन की सामग्री

सरसों तेल, मौली से जुड़ी जोड़ा बाती, हर चढ़ावा तेरह-तेरह

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:32–10:36

वक्ता सामग्री गिनाते हैं: एक लंबा, बड़ा केले का पत्ता; 11 चौमुख दीपक दिये और 3 एकमुखी दिये, सबमें रुई की बाती जिसे दो-दो बाती लाल मौली धागे से जोड़कर जोड़ा बाती बनाया हो; सबमें केवल सरसों का तेल — शुद्ध सरसों तेल, क्योंकि तिल के तेल में काफी मिलावट मिलती है, चाहें तो शुद्ध घी ले सकते हैं, पर सरसों तेल सर्वोत्तम है क्योंकि प्रयोग शत्रु-नाश और तंत्र-विचार-नाश के लिए है। फिर नारियल — 11 से भी अधिक, कम से कम 13 रखें — 13 नींबू, 13 कपूर और 26 फूल वाले लौंग।

09

चामुंडा बलि कौन करे: लाल वस्त्र, और महिलाओं पर प्रतिबंध

महिला तभी जब बेटा बारह से ऊपर; बलि स्वयं पुरुष द्वारा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:37–11:07

वक्ता कहते हैं कि नहा-धोकर संधि काल से पहले लाल रंग के वस्त्र पहनें। महिलाएं इसे कर सकती हैं या नहीं, इस प्रश्न पर वे पहले ही उत्तर देते हैं कि वैसी ही महिलाएं यह प्रयोग करें जिनका बेटा कम से कम 12 वर्ष से अधिक का हो चुका हो; संभव हो तो यह प्रयोग अपने पुत्र या पति के द्वारा करवाएं। बाकी सब महिला स्वयं कर सकती है, पर बलि विधान — बलि चढ़ाना — लड़के करें तो ज्यादा उत्तम है।

10

चामुंडा संधि पूजा बलि विधान: दीपक, संकल्प, चढ़ावा और आरती क्रम से

ग्यारह दीपक, तेरह नारियल-नींबू, बलि से पहले देवी सूक्तम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:08–15:37

वक्ता विधि बताते हैं। सबसे पहले तीन एकमुखी दियों में से एक जलाकर उसकी ज्योति में भगवती दुर्गा का जातवेद अग्नि के स्वरूप में आवाहन करें; वही कर्मसाक्षी दीपक है जिससे बाकी सब दीपक जलेंगे। हाथ में अक्षत, पुष्प, जल, दक्षिणा लेकर नाम, गोत्र, स्थान के उच्चारण से संकल्प लें: अपने सभी शत्रुओं के सर्वनाश और उनके द्वारा किए जा रहे हर तंत्र-विचार व षड्यंत्र के नाश हेतु आज संधि काल में भगवती चामुंडा का यथाशक्ति, यथाबुद्धि, यथा उपलब्ध उपचारों से पूजन। जातवेद दीपक से पहला एकमुखी दीपक गुरु जी के नाम से, दूसरा गणेश जी के नाम से जलाएं; फिर केले के पत्ते के सामने लाइन से 11 चौमुख दीपक दिये — बीच के नौ चामुंडा के नौ स्वरूप, अपनी बाईं ओर वाला हनुमान जी, दाहिनी ओर सबसे अंतिम बटुक भैरव — इसी क्रम में: हनुमान जी, नौ, अंत में बटुक भैरव। हर दीपक के सामने एक नारियल और एक नींबू रखें, सब पर गंगाजल छिड़कें और लाल सिंदूर का सुंदर टीका लगाएं। हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करें — जिससे कौशिकी का आवाहन हुआ था — और पुष्प समर्पित करें। फिर बलि: पहले सभी नारियल उसी क्रम में (गुरु, गणपति, हनुमान, नौ दुर्गा, बटुक भैरव), फिर हर नींबू खड़ा काटते हुए उस पर रोली लगाते और आचमन से हर नींबू के पास तीन-तीन बार थोड़ा जल गिराते जाएं। चाहें तो कोई स्तुति करें; आरती से पहले हर दीपक के सामने एक कपूर पर दो फूल वाले लौंग रखकर प्रज्वलित करें, फिर आरती और क्षमा प्रार्थना। नींबू देववृक्ष के नीचे या नदी में विसर्जित करें; नारियल केवल घर-परिवार के लोग खाएं, बाहर के नहीं। जगदंबा की कृपा से, वे कहते हैं, चामुंडा अनेक कष्ट, दुख और संकट क्षण भर में नष्ट कर देती हैं।

11

किसी से सुनकर किए विधान का ऋण दोष, और उसे मिटाने वाला दीपक

विधान सिखाने वाले का ऋण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:38–15:49

वक्ता एक छोटा सा निवेदन करते हैं: जो भी विधान किसी से सुनकर किया जाता है — उनसे या किसी और से — उससे ऋण दोष लगता है। उससे मुक्ति के लिए भगवती के समक्ष एक दीपक अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए, और यदि खुशी से इच्छा हो तो कुछ दान-दक्षिणा इत्यादि दें।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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