संधि पूजा में चामुंडा तंत्रोक्त बलि पूजन — कौशिकी की कथा और पूरा विधान
संधि पूजा के पीछे की कौशिकी-चामुंडा कथा, और अष्टमी-नवमी के संधिकाल में घर पर चामुंडा के तंत्रोक्त बलि पूजन का विधान।
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नवरात्र में संधि पूजा क्या है, और यह कब होती है?
चामुंडा उग्र रूप में समस्त जगत में व्याप्त
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में एक ऐसा समय है जब शत्रु-नाश, अभिचार-नाश, प्रेत-पिशाच आदि नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए भगवती से विशेष विधि-विधान से पूजा-पाठ-प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है: अष्टमी तिथि के समापन और नवमी तिथि के आरंभ का संक्रमण काल, यानी संधि काल, जिसे दुर्गा पूजा के पंडालों में संधि पूजा के समय के रूप में अनाउंस किया जाता है। वे कहते हैं कि यह काल इतना दिव्य और परम प्रभावी है कि माना जाता है कि इसमें भगवती चामुंडा पूरे प्रत्यक्ष उग्र रूप से संपूर्ण जगत में व्याप्त रहती हैं, और उस उग्रता से समग्र संसार की सारी नकारात्मक शक्तियों पर ग्रहण लग जाता है, वे बंध जाती हैं, पूरी तरह उनके चरणों के नीचे दब जाती हैं।
पार्वती के शरीर से कौशिकी और कालिका की उत्पत्ति
कौशिकी महासरस्वती और विंध्य की अष्टभुजा के रूप में
वक्ता वह कथा सुनाते हैं जो, उनके अनुसार, दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित है। शुंभ-निशुंभ ने देवताओं को स्वर्ग से निकाला तो देवता हिमालय पर जाकर भगवती की स्तुति करते हैं और उनके पुराने वरदान — विपत्ति में आवाहन करने पर अवश्य प्रकट होने — का स्मरण कराकर आवाहन करते हैं। पार्वती वहीं तपस्या के लिए गई थीं; स्तुति पर उनके शरीर से एक देवी प्रकट हुई। उनके बाहर निकलते ही पार्वती का स्वरूप कृष्ण वर्ण का हो गया — वह काला स्वरूप हिमालय पर स्थित होकर हिमालय की कालका के रूप में प्रसिद्ध हुआ, वही महाशक्ति कालिका हैं। जो प्रकट हुईं वे गौर वर्ण की थीं, नाम कौशिकी; उन्हें महासरस्वती का स्वरूप भी माना जाता है, और विंध्य पर्वत पर भगवती का अष्टभुजा स्वरूप अंश रूप से यही महासरस्वती कही जाती हैं। कौशिकी ने हिमालय पर ही आश्रय लिया, शुंभ-निशुंभ के वध के लिए योजनाबद्ध रूप से वहां उपस्थित हुईं।
वक्ता कहते हैं कि जब हम दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं तो सप्तम अध्याय में इसका वर्णन है। सर्वप्रथम जब शुंभ-निशुंभ देवताओं को स्वर्ग लोक से निकाल देते हैं, तो देवता हिमालय पर्वत पर जाकर भगवती की स्तुति करते हैं और स्तुति के द्वारा आवाहन करते हैं: "हे जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम।, आपने पूर्व काल में हमें वरदान दिया था कि जब कभी हम पर विपत्ति आएगी और हम आवाहन करेंगे तो आप अवश्य प्रकट होकर सहायता करेंगी।" उसी समय भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। तपस्या के उद्देश्य से हिमालय पर गई हुई थीं। देवताओं की स्तुति पर जगदंबा पार्वती के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं। वह देवी जब पार्वती के शरीर से बाहर निकलीं तो मां पार्वती का स्वरूप कृष्ण वर्ण का, काला पड़ गया। वह काला स्वरूप जो हिमालय पर स्थित हुआ, आगे चलकर हिमालय की कालका के रूप में प्रसिद्ध हुआ — वही महाशक्ति कालिका हैं। जो स्वरूप भगवती के शरीर से बाहर निकला था वह गौर वर्ण का था, जिनका नाम कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है। था। इन्हीं को महासरस्वतीसप्तशती के तृतीय चरित्र की अधिष्ठात्री देवी। का स्वरूप भी माना जाता है, और अंश रूप से कहा जाता है कि विंध्य पर्वत पर भगवती का जो अष्टभुजा स्वरूप है, वह यही महासरस्वती का स्वरूप है। यह महासरस्वती, भगवती कौशिकी, हिमालय पर्वत पर ही आश्रय लीं, शुंभ-निशुंभ के वध के लिए योजनाबद्ध तरीके से वहां उपस्थित हुईं।
कौशिकी के लिए दैत्यों की मांग और केवल विजेता को पति बनाने का उनका प्रण
भगवान पहले मति हर लेते हैं
वक्ता सप्तशती की कथा आगे बढ़ाते हैं: शुंभ-निशुंभ के दूत चंड-मुंड ने सबसे पहले कौशिकी को देखा और जाकर उनकी सुंदरता का वर्णन किया — राक्षसों का यही काम है, वे कहते हैं; पहले देवताओं को निकालते हैं, फिर, जैसा कहा जाता है कि जिसे कष्ट देना हो भगवान पहले उसकी मति हर लेते हैं, जगदंबा इनकी मति हर लेती हैं, ये मोहित होकर अपनी मृत्यु का आमंत्रण देने चल पड़ते हैं। चंड-मुंड ने तर्क दिया कि वरुण का सोना बरसाने वाला छत्र, इंद्र का ऐरावत और यमराज का कालदंड भाइयों के पास है ही, तो संसार की सबसे सुंदर स्त्री भी उन्हीं के पास हो। दूत सुग्रीव को भेजा गया, जिसने चाटुकारिता और धमकी से कहा कि दोनों विजेताओं में से किसी एक को पति चुन लो; भगवती ने गर्व से कहा कि उन्होंने प्रण कर रखा है कि जो उन्हें संग्राम में जीतेगा वही पति बनेगा, और इस धमकी पर कि शुंभ-निशुंभ उनका अभिमान धूल में मिलाकर बाल पकड़कर घसीट ले जाएंगे, बोलीं कि कमिटमेंट ले लिया है, अब प्रण कैसे बदलें।
वक्ता कहते हैं कि शुंभ-निशुंभ के दो दूत चंड-मुंड ने सबसे पहले भगवती कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है। को देखा और जाकर उनकी सुंदरता का वर्णन किया। राक्षसों का तो यही काम है, वे कहते हैं: पहले देवताओं को स्वर्ग से निकालेंगे, फिर अपने अंत के लिए अपनी बुद्धि — जैसा कहा जाता है कि जब किसी को कष्ट देना होता है तो भगवान पहले मति हर लेते हैं। जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। इनकी मति हर लेती हैं, ये मोहित हो जाते हैं, और मोहित होकर अपनी मृत्यु का आमंत्रण देने चल पड़ते हैं। चंड-मुंड ने बढ़ाई की: "अरे, बड़ी सुंदर स्त्री है! इस संसार की समग्र उत्तम वस्तुएं आपके और आपके भाई के पास हैं — वरुण देवता का छत्र जिससे सोने की वर्षा होती है आपके पास है, इंद्र का ऐरावत हाथी आपके पास है, यमराज का कालदंड भी आपके पास है — तो संसार की सबसे सुंदर और उत्तम स्त्री भी आपके ही पास क्यों न हो?" यह सुनकर शुंभ-निशुंभ ने अपना दूत सुग्रीव भेजा: "जाओ, बात करो और उस स्त्री को यहां ले आओ।" सुग्रीव ने बहुत चाटुकारिता से, डरा-धमकाकर भगवती से कहा कि लोकों के विजेता शुंभ-निशुंभ में से किसी एक का चयन कर लो और उसकी अर्धांगिनी बन जाओ। भगवती ने बड़े गर्व से कहा: "मैंने प्रण कर रखा है कि जो मुझे संग्राम में जीत लेगा वही मेरा पति बनेगा।" सुग्रीव बोला कि इतना अभिमान ठीक नहीं: "अभी नहीं चलोगी तो शुंभ-निशुंभ तुम्हारे इस अभिमान और गौरव को धूल में मिलाते हुए बाल पकड़कर घसीटते ले जाएंगे — तब तुम्हें अच्छा लगेगा।" भगवती बोलीं: "अब मैं क्या करूं? प्रण तो ले लिया है, उसे कैसे बदलूं? कमिटमेंट ले लिया है।" सुग्रीव ने जाकर बताया कि वे ऐसा-ऐसा कह रही हैं।
हुंकार मात्र से धूम्रलोचन भस्म: मंत्र का शुद्ध उच्चारण क्यों आवश्यक है
सही जगह हुं, अनुस्वार या मकार
वक्ता कहते हैं कि एक स्त्री के अभिमान से शुंभ का ईगो हर्ट हुआ तो उसने धूम्रलोचन को भेजा कि कौशिकी को बाल पकड़कर घसीट लाओ। धुएं जैसे शरीर वाला धूम्रलोचन, जो जहां-तहां प्रकट हो जाता था, धमकाने लगा और फिर पकड़ने को लपका। तंत्र ग्रंथों में दो प्रकार का वर्णन है, वे कहते हैं: भगवती के सिंह ने — जो धर्मराज, शिव और विष्णु के साक्षात स्वरूप माने गए हैं — दहाड़ा और उस गर्जना से धूम्रलोचन की सेना का नाश हो गया; और भगवती ने स्वयं हुंकार किया, केवल हुंकार की ध्वनि से धूम्रलोचन जलकर भस्म हो गया। इसीलिए, वे कहते हैं, मंत्र का उच्चारण अत्यंत आवश्यक है: लोग बिना जाने-सुने "हुं हुं फट फट" फटाफट पढ़ देते हैं, वहीं दिक्कत होती है — जानना चाहिए कि किस जगह हुंकार का हुं रहेगा, मकार रहेगा या अनुस्वार, अनुस्वार में पढ़ेंगे कि मकार में।
वक्ता कहते हैं कि शुंभ का ईगो हर्ट हो गया: "एक लड़की, एक स्त्री होकर इतना अभिमान कि मुझे इस तरह बोल रही है!" तो चंड-मुंड से पहले उसने धूम्रलोचन को भेजा: "जाओ, उसे बाल पकड़कर घसीटते हुए मेरे पास लाओ।" धूम्रलोचन तुरंत गया — धुएं जैसा शरीर, जहां-तहां प्रकट हो जाता — और प्रकट हुआ: "चलो, स्वामी ने बुलाया है।" भगवती बोलीं, नहीं, मैं नहीं जाऊंगी। उसने फिर डराना-धमकाना शुरू किया, और जब देखा कि नहीं जा रहीं तो कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है। की ओर लपका कि पकड़कर ले जाएगा। तंत्र ग्रंथों में दो प्रकार का वर्णन आता है, वे कहते हैं, और यहां प्रयोग के अनुसार माना गया है। भगवती के सिंह — केसरी, जो धर्मराज के साक्षात स्वरूप, शिव और विष्णु के स्वरूप माने गए हैं — ने हुंकार किया, दहाड़ा, और उस गर्जना से धूम्रलोचन की सेना का नाश हो गया। और भगवती ने हुंकारशस्त्र के रूप में की गई हुंकार, जो सप्तशती में बिना प्रहार किए ही संहार कर देती है। किया: केवल हुंकार की ध्वनि से धूम्रलोचन जलकर भस्म हो गया। भगवती ने केवल हुंकार मात्र से धूम्रलोचन का वध कर दिया, जलाकर खत्म कर डाला। इसीलिए, वक्ता कहते हैं, कहा जाता है कि मंत्र का उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। जो "हुं हुं फट फट" हम फटाफट पढ़ लेते हैं — जो लोग कहीं भी मंत्र को बिना जाने-सुने पढ़ देते हैं — वहीं दिक्कत हो जाती है। किस जगह हुंकार का हुं रहेगा, मकार रहेगा, अनुस्वार रहेगा; अनुस्वार में पढ़ेंगे कि मकार में — यह जानना, वे कहते हैं, बड़ा आवश्यक है।
कौशिकी के ललाट से चामुंडा का प्रकट होना और उन्हें अपना नाम मिलना
चंड-मुंड के मस्तक कौशिकी को अर्पित
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद भेजे गए चंड-मुंड जब कौशिकी के सामने आए, तो उनके ललाट से एक देवी प्रकट हुईं — शरीर में केवल हड्डियां, ऊपर केवल चमड़ा, एकदम पतली-दुबली, बहुत बड़ी, अत्यंत भयानक, दांत कटकटाती, जीभ मुंह से बाहर लटकी। प्रकट होते ही वे चंड-मुंड की सेना पर टूट पड़ीं और इतनी तीव्रता से दानवों का वध करने लगीं कि भय व्याप्त हो गया; रथ का रथ उठाकर मुंह में डालकर खा जातीं, हाथी-घोड़ों को सीधा चबा जातीं, और सेना धराशायी होकर भागी। चंड-मुंड स्वयं युद्ध को आए तो उन्होंने बांधकर दोनों के सिर काट डाले और क्रोध में भरी उन्हें कौशिकी के पास ले जाकर चढ़ा दिया: "इन महापशु चंड-मुंड के शीश स्वीकार कीजिए, और शुंभ-निशुंभ का वध आप स्वयं कीजिए।" प्रसन्न होकर कौशिकी ने कहा कि चंड और मुंड का वध करने के कारण भविष्य में उनका नाम चामुंडा हर जगह व्याप्त और प्रसिद्ध होगा — और यही स्वरूप, वे कहते हैं, संधि पूजा में पूजा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जैसे ही शुंभ-निशुंभ को धूम्रलोचन के अंत का पता चला, उन्होंने तुरंत चंड-मुंड को भेजा। चंड-मुंड आए और कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है। ने उन्हें देखा तो उनके ललाट से एक देवी प्रकट हुईं। उनके शरीर में केवल हड्डियां ही हड्डियां थीं, शरीर केवल मांस से, केवल चमड़े से ढका था — एकदम पतली-दुबली। अत्यंत भयानक दिख रही थीं, दांत कटकटा रही थीं; बहुत बड़ी थीं, जीभ मुंह से बाहर लटक रही थी; अत्यंत भयावह स्वरूप। प्रकट होते ही वे चंड-मुंड की सेना पर टूट पड़ीं। इतने जबरदस्त और तीव्रतम तरीके से दानवों का वध करने लगीं कि दानवों की हालत खराब हो गई, भय व्याप्त हो गया। युद्धक्षेत्र में, वे कहते हैं, जब शत्रु इतनी तीव्रता से वार करता है तो दूसरे सैनिक अपने साथियों पर वार होते देखकर भी भय में चले जाते हैं कि कितनी निर्दयता से वध कर रहा है — और यह देवी तो इनकी सेना के रथ का रथ उठाकर मुंह में डालकर खा जा रही थीं, हाथी-घोड़ों को सीधा चबा जा रही थीं। इतनी भयावह मारकाट मचाई कि चंड-मुंड की सेना धराशायी होकर भागने लगी। चंड-मुंड जब सामने युद्ध करने आए तो भगवती ने बांधकर दोनों का सिर ही काट डाला। क्रोध में व्याप्त वे उन मस्तकों को लेकर भगवती कौशिकी के पास गईं और चढ़ा दिया: "हे भगवती, हे कौशिकी, इन महापशु चंड-मुंड के शीश स्वीकार कीजिए, और शुंभ-निशुंभ का वध आप स्वयं कीजिए।" भगवती कौशिकी प्रसन्न होकर उन देवी से बोलीं: "क्योंकि आपने चंड और मुंड का वध किया है, इसलिए भविष्य में आपका नाम चामुंडाचंड और मुंड का वध करने पर देवी को प्राप्त हुआ स्वरूप, जिससे यह नाम पड़ा। हर जगह व्याप्त होगा, प्रसिद्ध होगा।" और वही भगवती चामुंडा का स्वरूप, वक्ता कहते हैं, आज हम सब इस संधि पूजा में पूजते हैं।
चामुंडा प्रयोग के लिए 25 से 45 मिनट का संधिकाल इतना तीव्र क्यों है
खिड़की भर में करोड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का सफाया
वक्ता कहते हैं कि चामुंडा इसलिए इतनी उग्र और तीव्र हैं क्योंकि तंत्र ग्रंथों में उनके प्रकट होने का काल वही संधि काल माना गया है जिसमें वे प्रकट हुई थीं। संधिकाल का समय बड़ा कम होता है, और उन्होंने चंड-मुंड का युद्ध उसी में समाप्त कर दिया था — अभी के हिसाब से, जैसे हम संधिकाल का पूजन करते हैं, लगभग 25 मिनट से अधिकतम 45 मिनट का समय। गुरु परंपरा के उच्च वर्ग के बुजुर्ग, अनुभवी तांत्रिक जब इसका वर्णन करते हैं तो बताते हैं कि भगवती ने इतने ही क्षण में न जाने कितने करोड़ अक्षौहिणी सेनाओं को साफ कर दिया था — इतनी वेगवान, इतनी तीव्र थीं। इसीलिए, वे कहते हैं, यह प्रयोग अत्यंत तीव्र, उत्तम और लाभ देने वाला है।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए चामुंडाचंड और मुंड का वध करने पर देवी को प्राप्त हुआ स्वरूप, जिससे यह नाम पड़ा। इतनी उग्र, इतनी तीव्र हैं: तंत्र ग्रंथों में उनके प्रकट होने का काल यही संधि कालएक तिथि के दूसरी में बदलने का संधि-समय, विशेषतः नवरात्र की अष्टमी-नवमी की संधि, जो सर्वाधिक प्रभावी मानी जाती है। माना गया है जिसमें वे प्रकट हुई थीं। और संधिकाल का समय बड़ा कम होता है। उन्होंने उस युद्ध को संधिकाल में ही समाप्त कर दिया था। मान के चलिए, वे कहते हैं, कि चंड-मुंड का युद्ध इतने कम समय में हुआ — अभी के हिसाब से, जैसे हम लोग संधिकाल का पूजन करते हैं, लगभग 25 मिनट से लेकर अधिकतम 45 मिनट तक का समय मिलता है। तो ऐसा माना गया है, वे कहते हैं, कि गुरु परंपरा के उच्च वर्ग के बुजुर्ग, वयोवृद्ध अनुभवी तांत्रिक जब इन सबका वर्णन करते हैं तो बताते हैं कि भगवती ने इतने ही क्षण में न जाने कितनी अक्षौहिणी सेनाओं को — अक्षौहिणी का मतलब न जाने कितने कोटि; गणना कई करोड़ अक्षौहिणी सेना की है — इतनी जल्दी साफ कर दिया था। इतनी वेगवान थीं, इतनी तीव्र थीं। इसलिए, वे कहते हैं, जो प्रयोग वे बताने वाले हैं वह अत्यंत तीव्र और उत्तम प्रयोग है, लाभ देने वाला प्रयोग है।
चामुंडा संधि पूजा बलि विधान के लिए पूरा नवरात्र व्रत आवश्यक नहीं
केवल अष्टमी का उपवास ही पर्याप्त
वक्ता कहते हैं कि इस विधि को करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि इसे वही करें जिन्होंने नवरात्रि में व्रत इत्यादि किया हो। जिन्होंने नवरात्र व्रत नहीं किया, वे यदि केवल अष्टमी का उपवास कर रहे हैं तो भी इस विधान को कर सकते हैं।
विधि-विधान कैसे करेंगे, इस पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम यह आवश्यक नहीं है कि इस विधि को वही करें जिन्होंने नवरात्रि में व्रतउपवास और संयम के साथ निभाया जाने वाला संकल्प, जो अनुष्ठान की अवधि तक चलता है। इत्यादि किया हो। जिन्होंने नवरात्र व्रत नहीं किया है, वे कहते हैं, यदि केवल अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। का उपवास कर रहे हैं तो भी इस विधान को कर सकते हैं।
संधिकाल के चामुंडा तांत्रोक्त बलि पूजन की सामग्री
सरसों तेल, मौली से जुड़ी जोड़ा बाती, हर चढ़ावा तेरह-तेरह
वक्ता सामग्री गिनाते हैं: एक लंबा, बड़ा केले का पत्ता; 11 चौमुख दीपक दिये और 3 एकमुखी दिये, सबमें रुई की बाती जिसे दो-दो बाती लाल मौली धागे से जोड़कर जोड़ा बाती बनाया हो; सबमें केवल सरसों का तेल — शुद्ध सरसों तेल, क्योंकि तिल के तेल में काफी मिलावट मिलती है, चाहें तो शुद्ध घी ले सकते हैं, पर सरसों तेल सर्वोत्तम है क्योंकि प्रयोग शत्रु-नाश और तंत्र-विचार-नाश के लिए है। फिर नारियल — 11 से भी अधिक, कम से कम 13 रखें — 13 नींबू, 13 कपूर और 26 फूल वाले लौंग।
इस विधान में क्या-क्या सामग्री लगेगी, इस पर वक्ता गिनाते हैं। केले का पत्ता — एक लंबा, बड़ा। उसके पश्चात चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। दिया 11, और तीन दिया एक मुंह वाले; सभी में रुई की बाती, लाल कलावे के साथ — यानी एक रुई की बाती रहेगी और उसे मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत। धागे से जोड़कर जोड़ा बाती कर देंगे, दो-दो बाती, इस तरह। सभी में केवल सरसों का तेल — शुद्ध सरसों का तेल। तिल का तेल, वे कहते हैं, काफी मिलावट वाला मिलता है; चाहें तो शुद्ध घी का प्रयोग कर सकते हैं, पर सरसों का तेल सर्वोत्तम रहेगा, क्योंकि शत्रु-नाश, तंत्र-विचार-नाश इत्यादि के लिए प्रयोग कर रहे हैं। उसके पश्चात लगेंगे 11 नारियल — 11 से भी अधिक; कम से कम 13 नारियल रखिए। 13 नारियल रखेंगे, 13 नींबू रखेंगे। 13 कपूर रहेगा और 26 लौंग, फूल वाला लौंग। इतना सामान, वे कहते हैं, आपको चाहिए।
चामुंडा बलि कौन करे: लाल वस्त्र, और महिलाओं पर प्रतिबंध
महिला तभी जब बेटा बारह से ऊपर; बलि स्वयं पुरुष द्वारा
वक्ता कहते हैं कि नहा-धोकर संधि काल से पहले लाल रंग के वस्त्र पहनें। महिलाएं इसे कर सकती हैं या नहीं, इस प्रश्न पर वे पहले ही उत्तर देते हैं कि वैसी ही महिलाएं यह प्रयोग करें जिनका बेटा कम से कम 12 वर्ष से अधिक का हो चुका हो; संभव हो तो यह प्रयोग अपने पुत्र या पति के द्वारा करवाएं। बाकी सब महिला स्वयं कर सकती है, पर बलि विधान — बलि चढ़ाना — लड़के करें तो ज्यादा उत्तम है।
वक्ता कहते हैं: नहा-धोकर संधि कालएक तिथि के दूसरी में बदलने का संधि-समय, विशेषतः नवरात्र की अष्टमी-नवमी की संधि, जो सर्वाधिक प्रभावी मानी जाती है। से पहले लाल रंग के वस्त्र पहनेंगे। एक प्रश्न वे पहले ही बता देते हैं: महिलाएं इसे कर सकती हैं या नहीं? ध्यान रहे, वे कहते हैं, कि वैसी ही महिलाएं इस प्रयोग को करें जिनका बेटा कम से कम 12 वर्ष से अधिक का हो चुका हो। संभव हो तो यह प्रयोग अपने पुत्र के द्वारा, पति के द्वारा करवा सकते हैं — यानी बलि का प्रयोग। बाकी सब आप स्वयं कर सकते हैं, वे कहते हैं, पर बलि विधान, बलि चढ़ाना, लड़के करें तो ज्यादा उत्तम है।
चामुंडा संधि पूजा बलि विधान: दीपक, संकल्प, चढ़ावा और आरती क्रम से
ग्यारह दीपक, तेरह नारियल-नींबू, बलि से पहले देवी सूक्तम
वक्ता विधि बताते हैं। सबसे पहले तीन एकमुखी दियों में से एक जलाकर उसकी ज्योति में भगवती दुर्गा का जातवेद अग्नि के स्वरूप में आवाहन करें; वही कर्मसाक्षी दीपक है जिससे बाकी सब दीपक जलेंगे। हाथ में अक्षत, पुष्प, जल, दक्षिणा लेकर नाम, गोत्र, स्थान के उच्चारण से संकल्प लें: अपने सभी शत्रुओं के सर्वनाश और उनके द्वारा किए जा रहे हर तंत्र-विचार व षड्यंत्र के नाश हेतु आज संधि काल में भगवती चामुंडा का यथाशक्ति, यथाबुद्धि, यथा उपलब्ध उपचारों से पूजन। जातवेद दीपक से पहला एकमुखी दीपक गुरु जी के नाम से, दूसरा गणेश जी के नाम से जलाएं; फिर केले के पत्ते के सामने लाइन से 11 चौमुख दीपक दिये — बीच के नौ चामुंडा के नौ स्वरूप, अपनी बाईं ओर वाला हनुमान जी, दाहिनी ओर सबसे अंतिम बटुक भैरव — इसी क्रम में: हनुमान जी, नौ, अंत में बटुक भैरव। हर दीपक के सामने एक नारियल और एक नींबू रखें, सब पर गंगाजल छिड़कें और लाल सिंदूर का सुंदर टीका लगाएं। हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करें — जिससे कौशिकी का आवाहन हुआ था — और पुष्प समर्पित करें। फिर बलि: पहले सभी नारियल उसी क्रम में (गुरु, गणपति, हनुमान, नौ दुर्गा, बटुक भैरव), फिर हर नींबू खड़ा काटते हुए उस पर रोली लगाते और आचमन से हर नींबू के पास तीन-तीन बार थोड़ा जल गिराते जाएं। चाहें तो कोई स्तुति करें; आरती से पहले हर दीपक के सामने एक कपूर पर दो फूल वाले लौंग रखकर प्रज्वलित करें, फिर आरती और क्षमा प्रार्थना। नींबू देववृक्ष के नीचे या नदी में विसर्जित करें; नारियल केवल घर-परिवार के लोग खाएं, बाहर के नहीं। जगदंबा की कृपा से, वे कहते हैं, चामुंडा अनेक कष्ट, दुख और संकट क्षण भर में नष्ट कर देती हैं।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम एक दीपक प्रज्वलित करेंगे — तीन एकमुखी दियों में से एक — और उसमें भगवती दुर्गा का, जातवेद दुर्गा का, उस ज्योति में आवाहन करेंगे: "हे भगवती, जातवेद अग्नि के स्वरूप में आप आकर इस दीप में प्रज्वलित होइए, उपस्थित होइए।" वही कर्मसाक्षी दीपक है, उसी से बाकी सभी दीपक प्रज्वलित करेंगे। हर चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। दिये में चार-चार बाती, जोड़े में — दो बाती मिलाकर एक, एक रुई की और दूसरी पर लाल मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत। धागा लपेटा हुआ, जिससे जोड़ा बाती भी हो, लाल धागा भी, और अच्छे से जले भी — सबमें सरसों का तेल भरा। फिर हाथ में अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, पुष्प, जल, दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। लेकर नाम, गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है।, स्थान का उच्चारण करके संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करेंगे: "मैं अपने सभी शत्रुओं के सर्वनाश हेतु, शत्रुओं द्वारा किए जा रहे तंत्र-विचार के नाश हेतु, जो भी षड्यंत्र कर रहे हैं उन सबके नाश हेतु, आज संधि कालएक तिथि के दूसरी में बदलने का संधि-समय, विशेषतः नवरात्र की अष्टमी-नवमी की संधि, जो सर्वाधिक प्रभावी मानी जाती है। में भगवती चामुंडाचंड और मुंड का वध करने पर देवी को प्राप्त हुआ स्वरूप, जिससे यह नाम पड़ा। का यथाशक्ति, यथाबुद्धि, यथा उपलब्ध उपचारों से पूजन करने का संकल्प लेता हूं।" यह बोलकर अक्षत-फूल भगवती के चरणों में समर्पित करेंगे। जातवेद दुर्गा के नाम से जले दीपक से पहला दीपक अपने गुरु जी के नाम से जलाएंगे, दूसरा एकमुखी दीपक गणेश जी के नाम से। नौ चौमुख दीपक केले के पत्ते के सामने सजे रहेंगे; दो और मिलाकर 11 दीपक लाइन से — नौ बीच में, दो किनारे-किनारे। बीच के नौ दीपक भगवती चामुंडा के नौ स्वरूप हैं; किनारे के दो चौमुख में, आप जहां बैठेंगे उसके बाईं ओर वाला हनुमान जी के नाम से, और दाहिनी ओर सबसे अंतिम बटुक भैरव के नाम से। गुरु-गणपति का दीपक जला लेने के बाद हनुमान जी का दीप प्रज्वलित करेंगे, फिर बीच के नौ भगवती के दीपक, और सबसे अंत में जाकर बटुक भैरव का दीप। फिर सभी दीपकों के सामने एक-एक नारियल रखेंगे — गुरु-गणपति के दीपक के सामने भी, हनुमान जी और भैरव जी के सामने भी, और नौ दुर्गा के नौ स्वरूप के दीपकों के सामने भी। सब पर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। छिड़केंगे, सब पर लाल सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। का खूब सुंदर टीका लगाएंगे, सबके सामने एक-एक नींबू भी रखेंगे। उसके बाद हाथ में अक्षत-फूल लेकर तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करेंगे: देवी सूक्तम के पाठ से ही भगवती कौशिकी का आवाहन हुआ था, वे प्रकट हुई थीं, और संधि पूजा में बलि चढ़ाने से पहले देवी सूक्तम का ही पाठ करना है। पाठ के बाद पुष्प जगदंबा को समर्पित करेंगे। उसके बाद बलि आरंभ। सर्वप्रथम जितने नारियल हैं सबको चढ़ाना है, क्रम वही — पहले गुरु जी का नारियल, फिर गणपति का, फिर हनुमान जी का, फिर नौ दुर्गा का, अंत में बटुक भैरव का। फिर नींबू काटेंगे; नींबू खड़ा काटना है। काटते-काटते उस पर रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। लगाते जाएंगे और आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। से जल डालते जाएंगे — हर नींबू के पास तीन-तीन बार थोड़ा-थोड़ा जल गिराते जाएंगे। इस तरह, वे कहते हैं, बलि पूजन संपन्न हो जाएगा। इसके बाद चाहें तो भगवती की कोई स्तुति, कोई पाठ कर सकते हैं, फिर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। करेंगे; पर आरती से पहले सबके सामने एक-एक कपूर रखकर उस पर दो-दो फूल वाले लौंग रखेंगे और उसे भी प्रज्वलित करेंगे, तभी आरती। आरती के बाद क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है। इत्यादि। बलि पूजा में चढ़ाए सभी नींबू देववृक्ष के नीचे या नदी में विसर्जित करने हैं, और नारियल केवल घर-परिवार के लोग खाएंगे — बाहर के लोग नहीं खाएंगे। इस प्रकार संधि पूजा का बलि विधान पूर्ण कीजिए, वे कहते हैं: भगवती जगदंबा की कृपा से भगवती चामुंडा आपके अनेक कष्ट, दुख और संकटों का नाश क्षण भर में कर देंगी।
किसी से सुनकर किए विधान का ऋण दोष, और उसे मिटाने वाला दीपक
विधान सिखाने वाले का ऋण
वक्ता एक छोटा सा निवेदन करते हैं: जो भी विधान किसी से सुनकर किया जाता है — उनसे या किसी और से — उससे ऋण दोष लगता है। उससे मुक्ति के लिए भगवती के समक्ष एक दीपक अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए, और यदि खुशी से इच्छा हो तो कुछ दान-दक्षिणा इत्यादि दें।
वक्ता अंत में सबसे एक छोटा सा निवेदन करते हैं: जो कुछ भी विधान आप किसी से भी सुनकर करते हैं — उनसे या किसी अन्य से सुनकर कोई विधान-पूजा कर रहे हैं — तो उससे ऋण दोषकिसी विशेष अनुष्ठानिक भूल से उत्पन्न ऋण जैसा दोष — जैसे एक जलते दीपक से दूसरा दीपक सीधे प्रज्वलित करना। लगता है। उसकी मुक्ति के लिए, वे कहते हैं, भगवती के समक्ष एक दीपक अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए; और यदि खुशी से कुछ दान-दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। इत्यादि की इच्छा हो तो दे सकते हैं।
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