संधि पूजा में चामुंडा तंत्रोक्त बलि पूजन — कौशिकी की कथा और पूरा विधान

संधि पूजा के पीछे की कौशिकी-चामुंडा कथा, और अष्टमी-नवमी के संधिकाल में घर पर चामुंडा के तंत्रोक्त बलि पूजन का विधान।

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The notes
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01

अष्टमी-नवमी के संधिकाल का शत्रु और नकारात्मक शक्तियों के नाश में प्रभावी होना

संधि पूजा क्या है, और वह कब पड़ती है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:05–00:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नवरात्र में एक ऐसा समय होता है जिसमें शत्रु के नाश के लिए, अभिचार के नाश के लिए या प्रेत-पिशाच जैसी नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए भगवती से विशेष विधि-विधान द्वारा की गई पूजा-प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है — वह क्षण जब अष्टमी तिथि का समापन और नवमी तिथि का आरंभ होता है, अर्थात् संक्रमण काल जिसे संधिकाल कहते हैं, और जिसकी घोषणा दुर्गा पूजा पंडालों में संधि पूजा के समय के रूप में की जाती है।

02

संधिकाल में चामुंडा की व्यापक उग्र उपस्थिति और हर नकारात्मक शक्ति का दबना

कहा जाता है कि उस काल में भगवती चामुंडा उग्र रूप में संपूर्ण जगत में व्याप्त रहती हैं और हर नकारात्मक शक्ति ग्रहणग्रस्त, बंधी और उनके चरणों के नीचे दबी रहती है

· Reviewed Sep 2026 · 00:51–01:21

वक्ता कहते हैं कि संधिकाल अपने आप में इतना दिव्य और परम प्रभावी होता है कि कहा जाता है इस काल में भगवती चामुंडा प्रत्यक्ष उग्र रूप से संपूर्ण जगत में व्याप्त रहती हैं, और उनकी उस उग्रता के कारण संसार की समस्त नकारात्मक शक्तियों पर ग्रहण लग जाता है, वे बंध जाती हैं और पूरी तरह उनके चरणों के नीचे दब जाती हैं।

03

हिमालय पर पार्वती के शरीर से कौशिकी और कालिका महाशक्ति का प्राकट्य

दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय के अनुसार कौशिकी और कालिका का प्राकट्य कहाँ से हुआ?

· Reviewed Sep 2026 · 01:22–02:45 · Also a question

वक्ता दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय की कथा सुनाते हैं: शुंभ-निशुंभ द्वारा देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिए जाने पर देवता हिमालय पर्वत पर जाकर भगवती की स्तुति करते हैं और उसी से उनका आवाहन करते हैं; उसी समय भगवती पार्वती वहाँ तपस्या के उद्देश्य से गई हुई थीं। स्तुति पर पार्वती के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं; पीछे रह गया स्वरूप कृष्ण वर्ण का हो गया और हिमालय की कालिका (कालिका महाशक्ति) के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जबकि जो स्वरूप बाहर निकला वह गौर वर्ण का था और उनका नाम कौशिकी था — जिन्हें महासरस्वती का स्वरूप माना जाता है और अंश रूप से विंध्य पर्वत की अष्टभुजा भगवती से भी जोड़ा जाता है। कौशिकी ने हिमालय पर ही आश्रय लिया और शुंभ-निशुंभ के वध हेतु योजनाबद्ध रूप से वहाँ उपस्थित हुईं।

04

चंड-मुंड द्वारा शुंभ-निशुंभ से कौशिकी की सुंदरता का वर्णन

सबसे पहले उन्हें देखने वाले दो दूत, जिन्होंने तर्क दिया कि जैसे वरुण का सोना बरसाने वाला छत्र और ऐरावत उनके पास हैं वैसे ही संसार की सर्वोत्तम स्त्री भी उन्हीं की होनी चाहिए

· Reviewed Sep 2026 · 02:46–03:48

शुंभ-निशुंभ के दो दूत चंड और मुंड ने सबसे पहले भगवती कौशिकी को देखा और जाकर अपने स्वामियों से उनकी सुंदरता का वर्णन किया, तथा उनके पास पहले से उपलब्ध वैभव गिनाया — वरुण देवता का सोना बरसाने वाला छत्र, इंद्र का ऐरावत हाथी, यमराज का कालदंड — और तर्क दिया कि संसार की सबसे सुंदर और उत्तम स्त्री भी उन्हीं के पास होनी चाहिए।

05

कौशिकी का संग्राम में जीतने वाले से ही विवाह का प्रण, और सुग्रीव की धमकी

यह प्रण कि जो संग्राम में जीतेगा वही पति बनेगा, और उसके उत्तर में सुग्रीव की बाल पकड़कर घसीट ले जाने की धमकी

· Reviewed Sep 2026 · 03:49–04:54

उनकी सुंदरता का वर्णन सुनकर शुंभ-निशुंभ अपने दूत सुग्रीव को भेजते हैं कि उन्हें ले आए, और कहलवाते हैं कि वे दोनों भाइयों में से किसी एक का पति के रूप में चयन कर लें। भगवती बड़े गर्व से उत्तर देती हैं कि उन्होंने प्रण कर रखा है कि जो उन्हें संग्राम में जीत लेगा, वही उनका पति बनेगा। सुग्रीव इस अभिमान को ठीक नहीं बताता और चेतावनी देता है कि यदि वे अभी नहीं चलीं तो शुंभ-निशुंभ इस अभिमान को धूल में मिलाते हुए उन्हें बाल पकड़कर घसीटते हुए ले जाएँगे — किंतु भगवती कहती हैं कि वे लिए हुए प्रण को अब बदल नहीं सकतीं।

06

केवल हुंकार मात्र से धूम्रलोचन का जलकर भस्म हो जाना

धूम्रलोचन का नाश किस प्रकार हुआ?

· Reviewed Sep 2026 · 04:55–05:47 · Also a question

इनकार सुनकर अहंकार आहत होने पर शुंभ-निशुंभ दूत धूम्रलोचन को भेजते हैं, जो धुएँ जैसे शरीर से प्रकट होता है और भगवती के पुनः चलने से मना करने पर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने के लिए लपकता है। तंत्र ग्रंथों में दो प्रकार का वर्णन आता है: कि भगवती के सिंह केसरी ने — जिन्हें धर्मराज का साक्षात स्वरूप तथा शिव और विष्णु का स्वरूप माना गया है — हुंकार किया जिसकी गर्जना से धूम्रलोचन की सेना का नाश हो गया, अथवा कि स्वयं भगवती ने हुंकार किया — और केवल उस हुंकार की ध्वनि मात्र से धूम्रलोचन जलकर भस्म हो गया।

07

केवल तेज़ पाठ नहीं, मंत्र का सही उच्चारण क्यों आवश्यक है

तीव्र गति से पाठ करने की तुलना में मंत्र का शुद्ध उच्चारण अधिक क्यों मायने रखता है?

· Reviewed Sep 2026 · 05:48–06:13 · Also a question

धूम्रलोचन के नाश से वक्ता यह शिक्षा निकालते हैं कि मंत्र का उच्चारण अत्यंत आवश्यक है: जो लोग बिना जाने-सुने कहीं भी हुं-हुं फट-फट करके फटाफट मंत्र पढ़ लेते हैं, और यह नहीं जानते कि किस स्थान पर हुंकार का हुं रहेगा, कहाँ मकार रहेगा, कहाँ अंहकार रहेगा, तथा कोई अक्षर अनुस्वार में पढ़ा जाएगा या मकार में — उन्हें इसी कारण दिक्कत होती है।

08

कौशिकी के ललाट से प्रकट कृशकाय भयावह देवी और सेना का संहार

कौशिकी के ललाट से प्रकट केवल हड्डियों वाली देवी, जो दाँत कटकटाती हुई रथ, हाथी और घोड़े समूचे चबा जाती थीं

· Reviewed Sep 2026 · 06:14–07:28

धूम्रलोचन की मृत्यु का पता चलते ही शुंभ-निशुंभ तुरंत चंड-मुंड को भेजते हैं। उन्हें देखकर भगवती कौशिकी के ललाट से एक देवी प्रकट होती हैं — शरीर में केवल हड्डियाँ ही हड्डियाँ, ऊपर मात्र चमड़ा और मांस की पतली परत, अत्यंत भयानक, दाँत कटकटाती हुई, जीभ मुँह से बाहर लटकी हुई। प्रकट होते ही वे चंड-मुंड की सेना पर टूट पड़ती हैं और इतनी तीव्रता से वध करती हैं — रथ के रथ उठाकर मुँह में डालकर खा जाना, हाथी-घोड़ों को सीधा चबा जाना — कि भयभीत सेना धराशायी होकर भागने लगती है।

09

चंड-मुंड का शीश काटा जाना और चामुंडा नाम का प्राप्त होना

चंड और मुंड का वध कैसे हुआ, और चामुंडा को यह नाम कैसे मिला?

· Reviewed Sep 2026 · 07:29–08:13 · Also a question

जब चंड और मुंड स्वयं युद्ध करने सामने आए, तो देवी ने दोनों को बाँधकर उनके शीश काट डाले और वे मस्तक लेकर क्रोध में व्याप्त भगवती कौशिकी के पास गईं और उन्हें अर्पित करते हुए कहा कि इन महापशु चंड-मुंड के शीश स्वीकार कीजिए और स्वयं शुंभ-निशुंभ का वध कीजिए। प्रसन्न होकर कौशिकी ने उन देवी से कहा कि चूँकि उन्होंने चंड और मुंड का वध किया है, इसलिए आगे उनका नाम चामुंडा के रूप में सर्वत्र व्याप्त और प्रसिद्ध होगा — और यही भगवती चामुंडा का स्वरूप है जिसका पूजन आज संधि पूजा में किया जाता है।

10

25 से 45 मिनट के संधिकाल में पूरा युद्ध और असंख्य अक्षौहिणी सेनाओं का अंत

चंड-मुंड का युद्ध और असंख्य अक्षौहिणी सेनाएँ, 25 से 45 मिनट के भीतर समाप्त

· Reviewed Sep 2026 · 08:14–09:12

तंत्र ग्रंथों में माना गया है कि चामुंडा के प्रकट होने का काल यही संधिकाल है, और संधिकाल स्वयं बहुत कम समय का होता है — आज के हिसाब से लगभग 25 से अधिकतम 45 मिनट। उन्होंने चंड-मुंड के साथ का पूरा युद्ध इसी अल्प अवधि में समाप्त कर दिया; गुरु परंपरा के वृद्ध, अनुभवी तांत्रिक बताते हैं कि उतने ही क्षणों में भगवती ने असंख्य अक्षौहिणी सेनाओं को — जिसकी गणना कई करोड़ में होती है — साफ कर दिया था, और इसीलिए वक्ता आज बताए जाने वाले प्रयोग को अत्यंत तीव्र और उत्तम प्रयोग कहते हैं।

11

नवरात्र व्रत आवश्यक नहीं — केवल अष्टमी का उपवास भी पर्याप्त

क्या चामुंडा बलि विधान करने के लिए पूरे नवरात्र का व्रत रखा होना आवश्यक है?

· Reviewed Sep 2026 · 09:13–09:31 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह आवश्यक नहीं है कि इस विधि को केवल वही करे जिसने नवरात्र में व्रत किया हो। जिसने नवरात्र का व्रत नहीं किया है और केवल अष्टमी का उपवास कर रहा है, वह भी इस विधान को कर सकता है।

विधि की ओर मुड़ते हुए वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले यह जान लें कि यह आवश्यक नहीं है कि इस विधि को वही करे जिसने नवरात्र में व्रत इत्यादि किया हो। जिसने नवरात्र व्रत नहीं किया है और केवल अष्टमी का उपवास कर रहा है, वह भी इस विधान को कर सकता है।

12

केला का पत्ता, जोड़ा बाती वाले 11+3 दीये, सरसों का तेल, 13-13 नारियल-नींबू-कपूर और 26 लौंग

एक लंबा केला का पत्ता, 11 चौमुख और 3 एक-मुँह वाले दीये जिनमें मौली से बँधी जोड़ा बातियाँ और शुद्ध सरसों का तेल, तथा 13-13 नारियल, नींबू व कपूर के साथ 26 लौंग

· Reviewed Sep 2026 · 09:32–10:36

बताई गई सामग्री है: एक लंबा-बड़ा केला का पत्ता; 11 चौमुख दीये और 3 एक-मुँह वाले दीये, जिनमें हर बाती रुई की जोड़ा बाती हो और लाल मौली/कलावा धागे से बँधी हो; सभी में शुद्ध सरसों का तेल (तिल के तेल की अपेक्षा, जो प्रायः मिलावटी मिलता है, हालाँकि शुद्ध घी भी लिया जा सकता है); 11 से अधिक अर्थात् कम से कम 13 नारियल, 13 नींबू, 13 कपूर और 26 फूल वाले लौंग।

13

संधिकाल से पूर्व स्नान और लाल वस्त्र, तथा बलि कौन चढ़ाए इस पर प्रतिबंध

संधिकाल से पहले स्नान कर लाल वस्त्र, महिला द्वारा तभी जब पुत्र 12 वर्ष से अधिक का हो, और बलि स्वयं पुरुष सदस्य द्वारा दी जाना अधिक उत्तम

· Reviewed Sep 2026 · 10:37–11:07

स्नान करके संधिकाल आरंभ होने से पहले लाल रंग के वस्त्र पहने जाते हैं। महिलाएँ यह कर सकती हैं या नहीं, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि महिला यह प्रयोग तभी करे जब उसका पुत्र कम से कम 12 वर्ष से अधिक का हो चुका हो, और जहाँ संभव हो, बलि चढ़ाने का कार्य पुत्र या पति के द्वारा करवाना सर्वोत्तम है — शेष सब वह स्वयं कर सकती है, पर बलि विधान घर के पुरुष सदस्य द्वारा हो तो अधिक उत्तम है।

14

जातवेद दुर्गा का कर्म-साक्षी दीपक जिससे बाकी सभी दीपक जलाए जाते हैं

एक एक-मुँह वाले दीये में भगवती दुर्गा का जातवेद अग्नि रूप में आवाहन, जो कर्म-साक्षी बनकर शेष सभी दीपों को प्रज्वलित करता है

· Reviewed Sep 2026 · 11:08–11:55

सर्वप्रथम तीन एक-मुँह वाले दीयों में से एक दीपक प्रज्वलित किया जाता है और उस ज्योत में भगवती दुर्गा का जातवेद अग्नि के स्वरूप में आवाहन किया जाता है, उन्हें सीधे संबोधित करते हुए कि आकर इस दीप में उपस्थित हों। वही कर्म-साक्षी दीपक बनता है, जिससे शेष सभी दीपक जलाए जाते हैं; फिर सभी चौमुख दीयों में चार-चार जोड़ा बातियाँ, लाल मौली धागे से बँधी हुई, लगाई जाती हैं और उनमें सरसों का तेल भरा जाता है।

15

नाम, गोत्र और स्थान बोलकर शत्रुओं तथा उनके षड्यंत्रों के नाश का संकल्प

अक्षत, पुष्प, जल और दक्षिणा लेकर नाम, गोत्र और स्थान का उच्चारण, समस्त शत्रुओं और उनके षड्यंत्रों के नाश हेतु

· Reviewed Sep 2026 · 11:56–12:21

हाथ में अक्षत, पुष्प, जल और दक्षिणा लेकर साधक अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलता है और संकल्प लेता है कि आज संधिकाल में, यथाशक्ति और यथाविधि तथा जो भी उपचार उपलब्ध हैं उनसे, भगवती चामुंडा का पूजन अपने समस्त शत्रुओं के सर्वनाश हेतु, शत्रुओं द्वारा किए जा रहे किसी भी तंत्र विचार के नाश हेतु, तथा अपने अहित के लिए रचे जा रहे सभी षड्यंत्रों के नाश हेतु किया जा रहा है। इसके बाद अक्षत और फूल भगवती के चरणों में समर्पित किए जाते हैं।

16

गुरु, गणपति, हनुमान जी, चामुंडा के नौ स्वरूप और बटुक भैरव — इसी क्रम में

केला के पत्ते के सामने पंक्ति में ग्यारह दीये — बीच के नौ चामुंडा के नौ स्वरूपों के, बाईं ओर हनुमान जी, और दाहिनी ओर सबसे अंत में बटुक भैरव

· Reviewed Sep 2026 · 12:22–13:17

जातवेद दुर्गा वाले दीपक से पहला दीपक अपने गुरुजी के नाम से जलाया जाता है, और दूसरा एक-मुँह वाला दीपक गणपति जी के नाम से। फिर नौ चौमुख दीये केला के पत्ते के सामने पंक्ति में सजाए जाते हैं, जो चामुंडा के नौ स्वरूपों (नवदुर्गा) के रूप में होते हैं; बैठने वाले की बाईं ओर का दीपक हनुमान जी के नाम से और दाहिनी ओर का सबसे अंतिम दीपक बटुक भैरव के नाम से जलाया जाता है। प्रज्वलन का क्रम है: पहले गुरु और गणपति, फिर हनुमान जी, फिर बीच के नौ, और सबसे अंत में बटुक भैरव।

17

हर दीपक के सामने नारियल, गंगाजल, सिंदूर का टीका और नींबू

हर एक दीपक के सामने एक नारियल और एक नींबू, सभी पर गंगाजल छिड़ककर लाल सिंदूर का टीका

· Reviewed Sep 2026 · 13:18–13:36

हर दीपक के सामने एक-एक नारियल रखा जाता है — गुरु, गणपति, हनुमान जी, बटुक भैरव और नवदुर्गा के नौ दीपकों, सभी के सामने। फिर सभी पर गंगाजल छिड़का जाता है, सभी पर लाल रंग का सुंदर सिंदूर का टीका लगाया जाता है, और सभी के सामने एक-एक नींबू भी रखा जाता है।

18

देवी सूक्तम — वही पाठ जिससे कौशिकी का मूल रूप से आवाहन हुआ था

देवी सूक्तम, वही पाठ जिससे कौशिकी का आवाहन हुआ था, बलि चढ़ाने से पहले अक्षत और पुष्प लेकर पढ़ा जाना

· Reviewed Sep 2026 · 13:37–13:57

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर देवी सूक्तम का पाठ किया जाता है — वक्ता बताते हैं कि इसी पाठ से भगवती कौशिकी का आवाहन हुआ था और वे प्रकट हुई थीं, और संधि पूजा में बलि चढ़ाने से पहले इसी का पाठ करना है। पाठ के बाद पुष्प जगदंबा को समर्पित किए जाते हैं, और तभी बलि आरंभ होती है।

19

पहले क्रम से सभी नारियल, फिर हर दीपक के सामने नींबू काटकर जल चढ़ाना

पहले सभी नारियल दीपकों के उसी क्रम में चढ़ाए जाते हैं, फिर नींबू खड़े काटे जाते हैं, रोली लगाई जाती है और आचमनी से तीन-तीन बार जल गिराया जाता है

· Reviewed Sep 2026 · 13:58–14:24

सर्वप्रथम सभी नारियल चढ़ाए जाते हैं, और क्रम वही रहता है जो दीपकों का था — पहले गुरुजी, फिर गणपति, फिर हनुमान जी, फिर नवदुर्गा के नौ स्वरूप, और सबसे अंत में बटुक भैरव। सभी नारियल चढ़ जाने के बाद नींबू काटे जाते हैं — खड़े काटे जाते हैं, आड़े नहीं — और हर काटे गए नींबू पर रोली लगाई जाती है तथा आचमनी से हर नींबू के पास तीन-तीन बार थोड़ा-थोड़ा जल गिराया जाता है। इस प्रकार बलि पूजन संपन्न होता है।

20

आरती, क्षमा प्रार्थना, नींबू का विसर्जन, और नारियल केवल परिवार तक सीमित

हर दीपक के सामने कपूर पर दो लौंग जलाकर, फिर आरती और क्षमा प्रार्थना; नींबू देव वृक्ष के नीचे या नदी में विसर्जित, नारियल केवल घर-परिवार के लोग ही खाएँ

· Reviewed Sep 2026 · 14:25–15:02

बलि पूर्ण होने के बाद चाहें तो भगवती की कोई स्तुति या पाठ किया जा सकता है, उसके पश्चात आरती और फिर क्षमा प्रार्थना की जाती है। बलि पूजा में चढ़ाए गए सभी नींबुओं का विसर्जन बाद में देव वृक्ष के नीचे या नदी में करना है; नारियल, इसके विपरीत, केवल घर-परिवार के लोग ही खाएँगे — बाहर के लोग नहीं। आरती से ठीक पहले हर दीपक के सामने एक-एक कपूर और उस पर दो-दो फूल वाले लौंग रखकर उन्हें भी प्रज्वलित किया जाता है।

21

संधि पूजा का बलि विधान पूर्ण करने पर बताया गया फल

बताया गया फल: जगदंबा की कृपा से भगवती चामुंडा अनेक कष्ट, दुख और संकटों का नाश क्षण भर में कर देती हैं

· Reviewed Sep 2026 · 15:03–15:37

विधि का समापन करते हुए वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार संधि पूजा का विधान, अर्थात् बलि विधान, पूर्ण करना चाहिए — और भगवती जगदंबा की कृपा से भगवती चामुंडा आपके अनेक कष्ट, दुख और संकटों का नाश क्षण भर में कर देंगी। अंत में वे यह बात दोहराते हैं कि भगवती चामुंडा हम सभी के दुखों का नाश करेंगी।

22

सुनी हुई विधि से लगने वाला ऋण दोष, और उससे मुक्ति हेतु दीपक जलाना

किसी और से सुनकर कोई विधि करने पर कौन-सा दोष लगता है?

· Reviewed Sep 2026 · 15:38–15:49 · Also a question

वक्ता एक सावधानी के साथ समापन करते हैं: जो भी विधि या पूजा किसी और से सुनकर की जाती है — चाहे उनसे सुनकर या किसी अन्य स्रोत से — उससे ऋण दोष लगता है। उस दोष से मुक्ति हेतु भगवती के समक्ष एक दीपक अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए, और यदि इच्छा हो तो अपनी खुशी से कुछ दान-दक्षिणा भी दी जा सकती है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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