ब्रह्मा और विष्णु को दीक्षा किसने दी — सदाशिव, गुरु माता पार्वती और पांच मुखों से प्रणव
ब्रह्मा और विष्णु जी को भगवान सदाशिव से दीक्षा कैसे मिली।
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ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति महादेव और महाशक्ति से; हरिहर में भेद नहीं
तीनों का एक ही स्रोत, हर कल्प में नई रचना
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कहा गया है कि हरिहर में भेद नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों की उत्पत्ति महादेव और भगवती महामाया जगदम्बा — अर्थात महादेव और महाशक्ति दोनों — के द्वारा होती है। वे जोड़ते हैं कि प्रलय के पश्चात, जब एक कल्प का अंत और नए कल्प का आरंभ होता है, तो पुराणों में वर्णन है कि सृष्टि की रचना अनेक प्रकार से नए सिरे से होती है।
वक्ता एक कही हुई बात से आधार रखते हैं: हरिहर में भेद नहीं करना चाहिए। एक ओर महादेव हैं, दूसरी ओर भगवती महामाया जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। हैं। इन दोनों — महादेव और महाशक्तिमहाशक्ति — वक्ता इसे सामान्य शक्ति साधना से पृथक् बताते हैं। — के द्वारा ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति होती है। फिर वे इसे काल में रखते हैं। प्रलयकल्प के अंत में होने वाला प्रलय, जिसके पश्चात सृष्टि पुनः आरंभ की जाती है। के पश्चात, कल्प भेद के अनुसार, जब कल्प का अंत और नए कल्प का आरंभ होता है, तो पुराणों में वर्णन है कि सृष्टि की रचना अनेकों प्रकार से होती है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इंद्र कर्म से प्राप्त होने वाले पद हैं
संचित पुण्य से जीव पद तक पहुँचता है
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान देवादिदेव महादेव के द्वारा रचित पद हैं, और इंद्र भी एक पद है। अपने कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति सृष्ट कर्म और सृष्ट पुण्य प्राप्त करके इस प्रकार के पद तक पहुँचता है।
ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध, ज्योतिर्लिंग, केतकी की गवाही और वरदान
ब्रह्मा को दंड, विष्णु को वरदान, फिर ब्रह्मा को वरदान
वक्ता शिव पुराण से बताते हैं कि ब्रह्मा और विष्णु में इस बात पर युद्ध हुआ कि श्रेष्ठ कौन है, और भगवान सदाशिव दोनों के बीच ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए; उसका आदि और अंत पता करने के लिए ब्रह्मा ऊपर और विष्णु नीचे की ओर गए। ब्रह्मा जी ने केतकी के पुष्प से झूठी गवाही दिलाई, जिस पर उन्हें दंड मिला और विष्णु जी को वरदान। बाद में ब्रह्मा जी को पुनः अनेक वरदान दिए गए: समग्र संसार में उनकी मूर्ति और मंदिर नहीं होंगे, परंतु यज्ञ इत्यादि कर्म उनके और उनके पूजन के बिना कभी पूर्ण नहीं होंगे, और विश्वकर्मा स्वरूप में उनका प्रतिपादन हुआ।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा और विष्णु जी के बीच स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने को लेकर — मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ — युद्ध हुआ। तब भगवान सदाशिव प्रकट हुए। इसका वर्णन शिव पुराण में आता है, वे कहते हैं: सदाशिव दोनों के बीच ज्योतिर्लिंग स्वरूप में उत्पन्न हुए। उसका आदि और अंत पता करने के लिए ब्रह्मा और विष्णु जी ऊपर और नीचे की ओर गए। फिर ब्रह्मा जी के द्वारा केतकी के पुष्प से झूठी गवाही दिलाना, ब्रह्मा जी को दंड मिलना, विष्णु जी को वरदान मिलना, और पुनः ब्रह्मा जी को अनेकों प्रकार से वरदान देना। वे वरदान, वक्ता बताते हैं, यह थे कि समग्र संसार में ब्रह्मा जी की मूर्ति और मंदिर तो नहीं होंगे, लेकिन यज्ञ इत्यादि कर्म ब्रह्मा जी के बिना, उनके पूजन इत्यादि के बिना कभी पूर्ण नहीं होंगे; और विश्वकर्मा स्वरूप में ब्रह्मा जी का प्रतिपादन हुआ। ऐसे अनेक वरदान वहाँ प्राप्त हुए।
प्रथम मंत्रोपदेश: पंचानन स्वरूप में सदाशिव, अरुणाचल का स्थान
पाँच मुख, एक स्थान, दो शिष्य
वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण में वर्णन है कि वरदानों के पश्चात भगवान सदाशिव अपने पाँच मुख वाले पंचानन स्वरूप में प्रकट होते हैं और उन पाँच मुखों के द्वारा ब्रह्मा और विष्णु जी को उपदेश देते हैं। जिस शिवलिंग स्वरूप में वे उनके लिए प्रकट हुए, वह पुराण के वर्णन के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में स्थित है, और वही वह स्थान है जहाँ सदाशिव ने प्रथम बार विष्णु और ब्रह्मा जी को मंत्रोपदेश दिया।
वरदानों के पश्चात, वक्ता कहते हैं, वहीं पर वर्णन आता है कि भगवान सदाशिव अपने पंचानन स्वरूप से प्रकट होते हैं। वे किस प्रकार पंचानन स्वरूप में प्रकट होते हैं, इसका वर्णन आता है, और पाँच मुखों के द्वारा उनके द्वारा उपदेश दिया जाता है। किसको? ब्रह्मा और विष्णु जी को। जिस शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। स्वरूप में सदाशिव उन दोनों के लिए प्रकट हुए, वे कहते हैं, पुराण में उसके विषय में कहा गया है कि वह अरुणाचल प्रदेश में स्थित है। और वही वह स्थान है, वे कहते हैं, जहाँ भगवान सदाशिव प्रथम बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी को मंत्रोपदेश देते हैं।
रुद्र और महेश्वर को महामाया कभी विमोहित नहीं करती, पर ब्रह्मा और विष्णु विमोहित हुए
दो क्यों लड़े और दो कभी क्यों नहीं गिरे
वक्ता कहते हैं कि रुद्र और महेश्वर भगवान सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप से उत्पन्न विभूति स्वरूप हैं; महामाया उन्हें कभी अत्यधिक विमोहित नहीं करती, इसलिए उनकी बुद्धि स्थिर रहती है और उन्हें कहीं कभी दंड नहीं मिला। इसके विपरीत ब्रह्मा और विष्णु जी अपने पहले के कर्मों को भुला चुके थे या कहीं न कहीं महामाया के द्वारा विमोहित थे, और इसी कारण उनमें श्रेष्ठता को लेकर युद्ध हुआ, जिसके लिए सदाशिव उनके सामने शिवलिंग स्वरूप में प्रकट हुए।
उस प्रसंग में, वक्ता कहते हैं, बताया गया है कि भगवान सदाशिव के विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर उत्तम कृत्य हैं। अर्थात रुद्र और महेश्वर सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप से उत्पन्न हैं। महामाया उन्हें कभी अत्यधिक विमोहित नहीं करती, वे कहते हैं। इसी कारण उनकी बुद्धि स्थिर रहती है और उन्हें कहीं कभी दंड प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि वे साक्षात सदाशिव के स्वरूप हैं। समय के कारण, वे कहते हैं, यहाँ यह बताया गया कि ब्रह्मा और विष्णु जी अपने पहले के कर्मों को भुला दिए थे या महामाया के द्वारा कहीं न कहीं विमोहित किए गए थे। इसी कारण उन दोनों के बीच युद्ध हुआ — मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ। इन दोनों के लिए भगवान सदाशिव वहाँ शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के स्वरूप में प्रकट हुए।
प्रथम उपदेश के रूप में प्रणव, और पाँच मुखों से उसका प्राकट्य
ओंकार वाचक, शिव वाच्य; बिंदु महामाया
वक्ता कहते हैं कि भगवान सदाशिव ने सर्वप्रथम प्रणव का उपदेश दिया: ओंकार वाचक है और शिव वाच्य, यह मंत्र उन्हीं का स्वरूप है, और प्रतिदिन प्रणव का स्मरण उन्हीं का स्मरण है। उत्तर मुख से अकार, पश्चिम मुख से उकार, दक्षिण मुख से मकार, पूर्व मुख से बिंदु और मध्य मुख से नाद उत्पन्न हुआ; इन पाँच अवयवों से युक्त होकर प्रणव का पूर्ण विस्तार हुआ और वह एक अक्षर हो गया, और उसी से समग्र संसार की उत्पत्ति हुई। वे ध्यान रखने को कहते हैं कि बिंदु का स्वरूप महामाया का स्वरूप है, जैसा देवी अथर्वशीर्ष में बिंदु रूपेण कहा गया है: पूर्व मुख से बिंदु रूप में भगवती ही प्रादुर्भूत हुईं और ओंकार का स्वरूप धारण किया।
पाँच मुखों से पंचाक्षर, त्रिपदा गायत्री, वेद और करोड़ों मंत्र
प्रणव और पंचाक्षर हर मंत्र का मूल
वक्ता कहते हैं कि उन्हीं पाँच मुखों से क्रम से जो अलग-अलग अक्षर उत्पन्न हुए, वही भगवान सदाशिव का पंचाक्षर है, और पंचाक्षरी मंत्र से पाँच भेद वाले मातृका वर्ण प्रकट हुए; पंचाक्षर को साक्षात शिव स्वरूप माना गया है, और सदाशिव के पूर्ण पंचमुख स्वरूप का वर्णन उसी में आता है। विश्वेश्वर संहिता के नौवें और दसवें अध्याय का हवाला देकर वे कहते हैं कि उसी शिरोमंत्र से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री मंत्र का प्राकट्य हुआ, गायत्री से संपूर्ण वेद, वेदों से करोड़ों मंत्र, और उन मंत्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। अतः मूल में प्रणव और पंचाक्षर हैं, और उनके द्वारा इस संसार के समस्त कार्य सिद्ध हो सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि उन्हीं पाँच मुखों से क्रम से जो आया, उससे जो अलग-अलग अक्षर उत्पन्न हुए, भगवान सदाशिव के पंचाक्षर को क्रमशः देखेंगे तो वही आएगा। इसी पंचाक्षरी मंत्र से पाँच भेद वाले मातृका वर्ण प्रकट हुए। यानी शिव जी के पाँच मुखों का, सदाशिव के पूर्ण स्वरूप का वर्णन अगर कहीं आता है तो पंचाक्षरी मंत्र में आता है। इसकी इतनी विशेष महिमा है, वे कहते हैं: पंचाक्षर को साक्षात शिव स्वरूप माना गया है। वे विश्वेश्वर संहिता के नौवें और दसवें अध्याय की ओर संकेत करते हैं, जहाँ वर्णन है कि उसी शिरोमंत्र से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री मंत्र का प्राकट्य हुआ। उस गायत्री से संपूर्ण वेद प्रकट हुए, उन वेदों से करोड़ों मंत्र निकले, और उन मंत्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। मूल में जाएँगे, वे कहते हैं, तो पता चलेगा कि प्रणव और पंचाक्षर ही सबसे मूल हैं, आदि हैं, और उनके द्वारा इस संसार के समस्त कार्य सिद्ध हो सकते हैं। वे क्रम को शुरू से फिर दोहराते हैं: पाँच मुखों से पाँच अक्षर प्रकट हुए; जब सब सायुज्यदेवी द्वारा वध किए गए प्राणियों को प्रदत्त दिव्य सायुज्य — उन्हें केवल नष्ट नहीं किया जाता, अपितु उनकी अनुचरी सेना (गणों) में सम्मिलित कर लिया जाता है। हुए, एक साथ मिले, तो साकार रूप — प्रणव का रूप — धारण किया। जो अलग रहते हैं, उन्हीं से पंचाक्षर मंत्र का निर्माण हुआ; पंचाक्षर से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री; गायत्री से वेद; वेद से मंत्र; और मंत्र से करोड़ों कार्य सिद्ध होते हैं। यही, वे कहते हैं, मूल है।
प्रथम दीक्षा कैसे दी गई: पार्वती गुरु माता, महेश्वर गुरु, उत्तराभिमुख
पर्दा, मस्तक पर हाथ, तीन बार मंत्र, स्वयं ही दक्षिणा
वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण में वर्णन है कि जब यह मंत्र ब्रह्मा और विष्णु जी को दिया गया तो भगवती जगदम्बा पार्वती गुरु माता के रूप में और भगवान महेश्वर गुरु के रूप में उत्तराभिमुख होकर बैठे; गुरु मंत्र देने की जो पद्धति और परंपरा है, उसका यह प्रथम वर्णन है। ब्रह्मा और विष्णु जी ने भी उत्तर की ओर मुख किया। शिव जी ने उन्हें पर्दा करने वाले वस्त्र से ढका, मस्तक पर हाथ रखा, धीरे-धीरे उच्चारण करके उत्तम मंत्र का उपदेश दिया, और यंत्र-तंत्र में बताई विधि के अनुसार तीन बार मंत्र का उच्चारण करके मंत्र दीक्षा दी। गुरु दक्षिणा में ब्रह्मा और विष्णु जी ने स्वयं को समर्पित कर दिया।
वक्ता कहते हैं कि इसी मंत्र का उपदेश भगवान सदाशिव के द्वारा ब्रह्मा और विष्णु जी को दिया गया, और यह कैसे और कब दिया गया, इसे सुनना और जानना चाहिए। भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। गुरु माता के रूप में और भगवान महेश्वर गुरु के रूप में उत्तराभिमुख होकर बैठे। गुरु और गुरु माता एक साथ बैठे, और महादेव जी ने उत्तर की ओर मुख किया। गुरु मंत्र देने की जो पद्धति है, जो परंपरा है, उसका वर्णन, वे कहते हैं, प्रथम बार यहीं आता है। ब्रह्मा और विष्णु जी ने भी उत्तर की ओर मुख किया। फिर शिव जी ने उन्हें पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित करके, यानी ढक कर, मस्तक पर अपना हाथ रखकर, धीरे-धीरे उच्चारण करके उत्तम मंत्र का उपदेश दिया। यंत्र-तंत्र में बताई हुई विधि के पालन पूर्वक तीन बार मंत्र का उच्चारण करके भगवान शिव ने उन शिष्यों — ब्रह्मा और विष्णु जी — को मंत्र की दीक्षा दी। और गुरु दक्षिणा के रूप में, वे कहते हैं, ब्रह्मा और विष्णु जी ने स्वयं को ही समर्पित कर दिया।
ब्रह्मा और विष्णु के गुरु कौन हैं?
सदाशिव परम गुरु, पार्वती गुरु माता, शिष्य पुत्र कहलाए
वक्ता कहते हैं कि विष्णु जी के अवतारों के गुरुओं का वर्णन तो आता है, पर प्रश्न स्वयं नारायण और ब्रह्मा जी का है। शिव पुराण से उनका उत्तर है कि भगवान सदाशिव ने जो प्रथम दीक्षा दी, वह ब्रह्मा और विष्णु जी को दी, भगवती पार्वती गुरु माता के रूप में; सदाशिव उनके परम गुरु हैं और जगदंबा पार्वती उनकी गुरु माता। इसीलिए शिव महापुराण में बार-बार सदाशिव ब्रह्मा और विष्णु जी को पुत्र कहकर संबोधित करते हैं। वे जोड़ते हैं कि यह कपोल कल्पित नहीं है, और ब्रह्मा-विष्णु ने जो स्तुति की, वह विश्वेश्वर संहिता के दसवें अध्याय में मिलेगी।
वक्ता आरंभ में विषय रखते हैं: विष्णु जी के अवतारों में तो गुरुओं का वर्णन आता है, परंतु साक्षात भगवान श्री नारायण को कब और कैसे गुरु से दीक्षा मिली, और ब्रह्मा जी के गुरु कौन हैं, उन्हें दीक्षा कब मिली? वे इसे जानने योग्य विषय बताते हैं। दीक्षा के वृत्तांत के बाद उनका उत्तर: भगवान सदाशिव ने जो प्रथम दीक्षा दी, वह ब्रह्मा और विष्णु जी को दी गई, भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। गुरु माता के रूप में। इसीलिए, वे कहते हैं, जब आप शिव पुराण पढ़ेंगे तो अनेकों बार सदाशिव ब्रह्मा और विष्णु जी को पुत्र रूप में बोलते हैं; बार-बार उन्हें पुत्र कहकर संबोधित करते हैं। तो ब्रह्मा और विष्णु जी के परम गुरु साक्षात सदाशिव हुए, और जगदंबा पार्वती उनकी गुरु माता हैं। इसका वर्णन शिव महापुराण में मिलेगा, वे कहते हैं; यह कोई कपोल कल्पित नहीं है। उसके पश्चात ब्रह्मा और विष्णु जी ने स्तुति भी की, जो विश्वेश्वर संहिता के दसवें अध्याय में मिलेगी। अपने पुराणों को जानिए, वे कहते हैं: बहुत कुछ ऐसा जानने को मिलेगा जिससे अज्ञानता का नाश होगा और महादेव में प्रीति बढ़ेगी।
नारायण भक्त और शिव महापुराण: अपने स्वरूप का पुराण पढ़ें, पर अठारह सबको जानें
एक स्वरूप की भक्ति, सब स्वरूपों का ज्ञान
इस आपत्ति का पूर्वानुमान करते हुए कि शिव पुराण में तो शिव जी को श्रेष्ठ दिखाया गया है जबकि श्रोता नारायण के सेवक हैं और नारायण को श्रेष्ठ मानते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं कि जिस स्वरूप में आपका आकर्षण और समर्पण है, उसी से संबंधित पुराणों का पाठ करें। परंतु जानकारी अवश्य होनी चाहिए: अठारह पुराणों और उपमहापुराणों के माध्यम से सभी स्वरूपों के विषय में सही जानकारी होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक विषय उठेगा: आप शिव पुराण इत्यादि की बात कर रहे हैं, वहाँ तो शिव जी को श्रेष्ठ दिखाया गया है; हम तो नारायण के सेवक हैं, नारायण को श्रेष्ठ मानते हैं। वे इसे वहीं स्पष्ट कर देते हैं। जिस स्वरूप में आपका आकर्षण है, आपका समर्पण है, उस स्वरूप से संबंधित पुराण इत्यादि का पाठ करें। लेकिन जानकारी ज़रूर होनी चाहिए, वे कहते हैं। अठारह पुराण हैं और जितने उपमहापुराण हैं, उनके माध्यम से सभी स्वरूपों के विषय में सही जानकारी होनी चाहिए।
वेदों के होते हुए पुराणों की रचना क्यों हुई?
वेद को अधिकार और गुरु चाहिए; पुराण सबको सुलभ
वक्ता कहते हैं कि वेदों को अच्छी प्रकार समझने के लिए ही पुराणों की रचना हुई, क्योंकि वेद पाठ हर कोई नहीं कर सकता: उन मंत्रों के पाठ का अधिकार सबको प्राप्त नहीं है, और विशेष गुरु के बिना उनका सही अध्ययन नहीं हो सकता, वेद अध्ययन का विषय है। पुराण के द्वारा वह सब कुछ व्यक्ति को सहज ही प्राप्त हो जाता है, इसलिए समय-समय पर अपने सनातन पुराणों का पाठ करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि वेदों को अच्छी प्रकार से समझने के लिए ही पुराण इत्यादि की रचना की गई है, क्योंकि वेद पाठ हर कोई नहीं कर सकता। उन मंत्रों का पाठ करने का अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। सबको प्राप्त नहीं है, वे कहते हैं, और विशेष गुरु के बिना उन सबका सही अध्ययन भी नहीं किया जा सकता। वेद अध्ययन का विषय है। पुराण के द्वारा वह सब चीज़ सही और आराम से हमें प्राप्त हो जाती है। इसलिए, वे कहते हैं, व्यक्ति को समय-समय पर अपने सनातन से संबंधित पुराणों का पाठ इत्यादि करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।