ब्रह्मा और विष्णु को दीक्षा किसने दी — सदाशिव, गुरु माता पार्वती और पांच मुखों से प्रणव

ब्रह्मा और विष्णु जी को भगवान सदाशिव से दीक्षा कैसे मिली।

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01

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति महादेव और महाशक्ति से; हरिहर में भेद नहीं

तीनों का एक ही स्रोत, हर कल्प में नई रचना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:35–01:00

वक्ता कहते हैं कि ऐसा कहा गया है कि हरिहर में भेद नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों की उत्पत्ति महादेव और भगवती महामाया जगदम्बा — अर्थात महादेव और महाशक्ति दोनों — के द्वारा होती है। वे जोड़ते हैं कि प्रलय के पश्चात, जब एक कल्प का अंत और नए कल्प का आरंभ होता है, तो पुराणों में वर्णन है कि सृष्टि की रचना अनेक प्रकार से नए सिरे से होती है।

02

ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इंद्र कर्म से प्राप्त होने वाले पद हैं

संचित पुण्य से जीव पद तक पहुँचता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:01–01:23

वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान देवादिदेव महादेव के द्वारा रचित पद हैं, और इंद्र भी एक पद है। अपने कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति सृष्ट कर्म और सृष्ट पुण्य प्राप्त करके इस प्रकार के पद तक पहुँचता है।

दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश — ये भगवान देवादिदेव महादेव के द्वारा रचित पद हैं। साथ ही इंद्र भी एक पद है। अपने कर्मों के कारण ही, वे कहते हैं, कोई व्यक्ति सृष्ट कर्म और सृष्ट पुण्य को प्राप्त करके इस प्रकार के पद तक पहुँचता है।

03

ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध, ज्योतिर्लिंग, केतकी की गवाही और वरदान

ब्रह्मा को दंड, विष्णु को वरदान, फिर ब्रह्मा को वरदान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:24–02:20

वक्ता शिव पुराण से बताते हैं कि ब्रह्मा और विष्णु में इस बात पर युद्ध हुआ कि श्रेष्ठ कौन है, और भगवान सदाशिव दोनों के बीच ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए; उसका आदि और अंत पता करने के लिए ब्रह्मा ऊपर और विष्णु नीचे की ओर गए। ब्रह्मा जी ने केतकी के पुष्प से झूठी गवाही दिलाई, जिस पर उन्हें दंड मिला और विष्णु जी को वरदान। बाद में ब्रह्मा जी को पुनः अनेक वरदान दिए गए: समग्र संसार में उनकी मूर्ति और मंदिर नहीं होंगे, परंतु यज्ञ इत्यादि कर्म उनके और उनके पूजन के बिना कभी पूर्ण नहीं होंगे, और विश्वकर्मा स्वरूप में उनका प्रतिपादन हुआ।

04

प्रथम मंत्रोपदेश: पंचानन स्वरूप में सदाशिव, अरुणाचल का स्थान

पाँच मुख, एक स्थान, दो शिष्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:21–02:42

वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण में वर्णन है कि वरदानों के पश्चात भगवान सदाशिव अपने पाँच मुख वाले पंचानन स्वरूप में प्रकट होते हैं और उन पाँच मुखों के द्वारा ब्रह्मा और विष्णु जी को उपदेश देते हैं। जिस शिवलिंग स्वरूप में वे उनके लिए प्रकट हुए, वह पुराण के वर्णन के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में स्थित है, और वही वह स्थान है जहाँ सदाशिव ने प्रथम बार विष्णु और ब्रह्मा जी को मंत्रोपदेश दिया।

05

रुद्र और महेश्वर को महामाया कभी विमोहित नहीं करती, पर ब्रह्मा और विष्णु विमोहित हुए

दो क्यों लड़े और दो कभी क्यों नहीं गिरे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:43–03:38

वक्ता कहते हैं कि रुद्र और महेश्वर भगवान सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप से उत्पन्न विभूति स्वरूप हैं; महामाया उन्हें कभी अत्यधिक विमोहित नहीं करती, इसलिए उनकी बुद्धि स्थिर रहती है और उन्हें कहीं कभी दंड नहीं मिला। इसके विपरीत ब्रह्मा और विष्णु जी अपने पहले के कर्मों को भुला चुके थे या कहीं न कहीं महामाया के द्वारा विमोहित थे, और इसी कारण उनमें श्रेष्ठता को लेकर युद्ध हुआ, जिसके लिए सदाशिव उनके सामने शिवलिंग स्वरूप में प्रकट हुए।

06

प्रथम उपदेश के रूप में प्रणव, और पाँच मुखों से उसका प्राकट्य

ओंकार वाचक, शिव वाच्य; बिंदु महामाया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:57–05:09

वक्ता कहते हैं कि भगवान सदाशिव ने सर्वप्रथम प्रणव का उपदेश दिया: ओंकार वाचक है और शिव वाच्य, यह मंत्र उन्हीं का स्वरूप है, और प्रतिदिन प्रणव का स्मरण उन्हीं का स्मरण है। उत्तर मुख से अकार, पश्चिम मुख से उकार, दक्षिण मुख से मकार, पूर्व मुख से बिंदु और मध्य मुख से नाद उत्पन्न हुआ; इन पाँच अवयवों से युक्त होकर प्रणव का पूर्ण विस्तार हुआ और वह एक अक्षर हो गया, और उसी से समग्र संसार की उत्पत्ति हुई। वे ध्यान रखने को कहते हैं कि बिंदु का स्वरूप महामाया का स्वरूप है, जैसा देवी अथर्वशीर्ष में बिंदु रूपेण कहा गया है: पूर्व मुख से बिंदु रूप में भगवती ही प्रादुर्भूत हुईं और ओंकार का स्वरूप धारण किया।

07

पाँच मुखों से पंचाक्षर, त्रिपदा गायत्री, वेद और करोड़ों मंत्र

प्रणव और पंचाक्षर हर मंत्र का मूल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:10–06:47

वक्ता कहते हैं कि उन्हीं पाँच मुखों से क्रम से जो अलग-अलग अक्षर उत्पन्न हुए, वही भगवान सदाशिव का पंचाक्षर है, और पंचाक्षरी मंत्र से पाँच भेद वाले मातृका वर्ण प्रकट हुए; पंचाक्षर को साक्षात शिव स्वरूप माना गया है, और सदाशिव के पूर्ण पंचमुख स्वरूप का वर्णन उसी में आता है। विश्वेश्वर संहिता के नौवें और दसवें अध्याय का हवाला देकर वे कहते हैं कि उसी शिरोमंत्र से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री मंत्र का प्राकट्य हुआ, गायत्री से संपूर्ण वेद, वेदों से करोड़ों मंत्र, और उन मंत्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। अतः मूल में प्रणव और पंचाक्षर हैं, और उनके द्वारा इस संसार के समस्त कार्य सिद्ध हो सकते हैं।

08

प्रथम दीक्षा कैसे दी गई: पार्वती गुरु माता, महेश्वर गुरु, उत्तराभिमुख

पर्दा, मस्तक पर हाथ, तीन बार मंत्र, स्वयं ही दक्षिणा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:48–08:03

वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण में वर्णन है कि जब यह मंत्र ब्रह्मा और विष्णु जी को दिया गया तो भगवती जगदम्बा पार्वती गुरु माता के रूप में और भगवान महेश्वर गुरु के रूप में उत्तराभिमुख होकर बैठे; गुरु मंत्र देने की जो पद्धति और परंपरा है, उसका यह प्रथम वर्णन है। ब्रह्मा और विष्णु जी ने भी उत्तर की ओर मुख किया। शिव जी ने उन्हें पर्दा करने वाले वस्त्र से ढका, मस्तक पर हाथ रखा, धीरे-धीरे उच्चारण करके उत्तम मंत्र का उपदेश दिया, और यंत्र-तंत्र में बताई विधि के अनुसार तीन बार मंत्र का उच्चारण करके मंत्र दीक्षा दी। गुरु दक्षिणा में ब्रह्मा और विष्णु जी ने स्वयं को समर्पित कर दिया।

09

ब्रह्मा और विष्णु के गुरु कौन हैं?

सदाशिव परम गुरु, पार्वती गुरु माता, शिष्य पुत्र कहलाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:04–09:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि विष्णु जी के अवतारों के गुरुओं का वर्णन तो आता है, पर प्रश्न स्वयं नारायण और ब्रह्मा जी का है। शिव पुराण से उनका उत्तर है कि भगवान सदाशिव ने जो प्रथम दीक्षा दी, वह ब्रह्मा और विष्णु जी को दी, भगवती पार्वती गुरु माता के रूप में; सदाशिव उनके परम गुरु हैं और जगदंबा पार्वती उनकी गुरु माता। इसीलिए शिव महापुराण में बार-बार सदाशिव ब्रह्मा और विष्णु जी को पुत्र कहकर संबोधित करते हैं। वे जोड़ते हैं कि यह कपोल कल्पित नहीं है, और ब्रह्मा-विष्णु ने जो स्तुति की, वह विश्वेश्वर संहिता के दसवें अध्याय में मिलेगी।

10

नारायण भक्त और शिव महापुराण: अपने स्वरूप का पुराण पढ़ें, पर अठारह सबको जानें

एक स्वरूप की भक्ति, सब स्वरूपों का ज्ञान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:01–09:31

इस आपत्ति का पूर्वानुमान करते हुए कि शिव पुराण में तो शिव जी को श्रेष्ठ दिखाया गया है जबकि श्रोता नारायण के सेवक हैं और नारायण को श्रेष्ठ मानते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं कि जिस स्वरूप में आपका आकर्षण और समर्पण है, उसी से संबंधित पुराणों का पाठ करें। परंतु जानकारी अवश्य होनी चाहिए: अठारह पुराणों और उपमहापुराणों के माध्यम से सभी स्वरूपों के विषय में सही जानकारी होनी चाहिए।

11

वेदों के होते हुए पुराणों की रचना क्यों हुई?

वेद को अधिकार और गुरु चाहिए; पुराण सबको सुलभ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:32–10:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वेदों को अच्छी प्रकार समझने के लिए ही पुराणों की रचना हुई, क्योंकि वेद पाठ हर कोई नहीं कर सकता: उन मंत्रों के पाठ का अधिकार सबको प्राप्त नहीं है, और विशेष गुरु के बिना उनका सही अध्ययन नहीं हो सकता, वेद अध्ययन का विषय है। पुराण के द्वारा वह सब कुछ व्यक्ति को सहज ही प्राप्त हो जाता है, इसलिए समय-समय पर अपने सनातन पुराणों का पाठ करना चाहिए।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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