ब्रह्मा और विष्णु को दीक्षा किसने दी — सदाशिव, गुरु माता पार्वती और पांच मुखों से प्रणव
ब्रह्मा और विष्णु जी को भगवान सदाशिव से दीक्षा कैसे मिली।
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स्वयं नारायण और ब्रह्मा की दीक्षा का प्रश्न
ब्रह्मा और विष्णु जी के गुरु कौन हैं?
वक्ता कहते हैं कि विष्णु जी के अवतारों में तो गुरुओं का वर्णन आता है, परंतु प्रश्न स्वयं साक्षात भगवान श्री नारायण का है — उन्हें कब और कैसे गुरु दीक्षा मिली, किस प्रकार दीक्षा मंत्र मिला, तथा ब्रह्मा जी के गुरु कौन हैं और उन्हें दीक्षा कब मिली। वे इसे अत्यंत उत्तम विषय बताते हैं, जिसे जानना चाहिए।
वक्ता इस विषय को एक अति उत्तम विषय बताते हुए आरंभ करते हैं। वे कहते हैं कि विष्णु जी के अवतारों में तो गुरुओं का वर्णन आता है; परंतु जो साक्षात भगवान श्री नारायण हैं, भगवान विष्णु हैं — उन्हें कब और कैसे गुरु से दीक्षा मिली, किस प्रकार से उन्हें दीक्षा मंत्र इत्यादि मिला? यही प्रश्न ब्रह्मा जी के विषय में भी है: उनके गुरु कौन हैं, और उन्हें दीक्षा कब मिली? वे कहते हैं कि यह जानने योग्य विषय है, और आज इसी को वे सब जानेंगे।
हरिहर में अभेद तथा महादेव-महाशक्ति से तीनों की उत्पत्ति
हरिहर में भेद नहीं — ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति महादेव तथा महाशक्ति से
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कहा गया है कि हरिहर में भेद नहीं करना चाहिए। जो महादेव हैं और जो भगवती महामाया जगदंबा हैं — महादेव और महाशक्ति — उन दोनों के ही द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति होती है।
वक्ता बताते हैं कि ऐसा कहा गया है कि हरिहर में भेद नहीं करना चाहिए। जो महादेव हैं, और जो भगवती महामाया जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। हैं — उन दोनों के ही द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की उत्पत्ति होती है, अर्थात महादेव और महाशक्ति के द्वारा।
कल्प भेद और पुराणों में वर्णित सृष्टि रचना के अनेक प्रकार
प्रलय के पश्चात सृष्टि पुनः किस प्रकार आरंभ होती है?
प्रलय काल के पश्चात, कल्प भेद के अनुसार — जब एक कल्प का अंत होता है और नए कल्प का आरंभ होता है — पुराणों में इस बात का वर्णन है कि अनेकों प्रकार से सृष्टि की रचना होती है।
वक्ता कहते हैं कि प्रलय काल के पश्चात पुनः, कल्प भेद के अनुसार — जब कल्प का अंत होता है और नए कल्प का आरंभ होता है — पुराणों में इस बात का वर्णन आता है। अनेकों प्रकार से सृष्टि की रचना होती है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इंद्र — कर्मों से प्राप्त होने वाले पद
ब्रह्मा, विष्णु और महेश व्यक्ति हैं या पद?
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश पद हैं — भगवान देवादिदेव महादेव के द्वारा रचित पद। साथ ही इंद्र भी एक पद है। अपने कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति सृष्ट कर्म और सृष्ट पुण्य को प्राप्त करके इस प्रकार के पद तक पहुंचता है।
श्रेष्ठता का विवाद और सदाशिव का ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होना
ब्रह्मा और विष्णु के युद्ध से ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य कैसे हुआ?
वक्ता कहते हैं कि "मैं श्रेष्ठ हूं" इस बात को लेकर दोनों में युद्ध हुआ और भगवान सदाशिव प्रकट होते हैं। शिव पुराण में वर्णन आता है कि जब वे दोनों के बीच ज्योतिर्लिंग स्वरूप में उत्पन्न हुए, तब आदि और अंत पता करने के लिए ब्रह्मा और विष्णु जी ऊपर और नीचे की ओर जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब ब्रह्मा और विष्णु जी दोनों ही स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए — "मैं श्रेष्ठ हूं" — इस बात को लेकर आपस में युद्ध करते हैं। और भगवान सदाशिव प्रकट होते हैं। इस विषय का वर्णन शिव पुराण में आता है: कि किस प्रकार जब वे दोनों के बीच ज्योतिर्लिंग स्वरूप में उत्पन्न हुए, जब भगवान सदाशिव प्रकट हुए, तब आदि और अंत पता करने के लिए ब्रह्मा और विष्णु जी ऊपर और नीचे की ओर जाते हैं।
ब्रह्मा की झूठी गवाही, उनका दंड और उन्हें प्राप्त वरदान
केतकी की झूठी गवाही — ब्रह्मा को दंड, विष्णु को वरदान, और फिर ब्रह्मा को वरदान
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने केतकी के पुष्प के द्वारा झूठी गवाही दिलाई; ब्रह्मा जी को दंड मिला और विष्णु जी को वरदान मिला, तथा पुनः ब्रह्मा जी को अनेकों प्रकार से वरदान दिए गए — कि समग्र संसार में उनकी मूर्ति और मंदिर नहीं होंगे, परंतु यज्ञ इत्यादि कर्म ब्रह्मा जी और उनके पूजन के बिना कभी पूर्ण नहीं होंगे, तथा विश्वकर्मा स्वरूप में उनका प्रतिपादन होता है।
वक्ता कहते हैं कि फिर ब्रह्मा जी के द्वारा केतकी के पुष्प के द्वारा झूठी गवाही दिलाई गई; ब्रह्मा जी को दंड मिला, विष्णु जी को वरदान मिला, और पुनः ब्रह्मा जी को अनेकों प्रकार से वरदान दिए गए। कि समग्र संसार में उनकी मूर्ति और मंदिर तो नहीं होंगे; लेकिन यज्ञ इत्यादि कर्म ब्रह्मा के बिना, उनके पूजन इत्यादि के बिना कभी पूर्ण नहीं होंगे। विश्वकर्मा स्वरूप में ब्रह्मा जी का प्रतिपादन इत्यादि अनेकों प्रकार के वरदान वहां प्राप्त होते हैं।
पंचानन स्वरूप और पांच मुखों से दिया गया उपदेश
सदाशिव का पंचानन स्वरूप में प्रकट होना और पांच मुखों से उपदेश
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात भगवान सदाशिव अपने पंचानन स्वरूप से प्रकट होते हैं, और इस बात का वर्णन आता है कि वे किस प्रकार पांच मुखों वाले उस स्वरूप में प्रकट होते हैं; उन्हीं पांच मुखों के द्वारा उपदेश दिया जाता है — किसको? ब्रह्मा और विष्णु जी को।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात भगवान सदाशिव अपने पंचानन स्वरूप से प्रकट होते हैं। पांच मुखों के द्वारा वे किस प्रकार पंचानन स्वरूप में प्रकट होते हैं, इसका वर्णन आता है — और उनके द्वारा उपदेश दिया जाता है। किसको? ब्रह्मा और विष्णु जी को।
रुद्र और महेश्वर — सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप
रुद्र और महेश्वर कभी विमोहित या दंडित क्यों नहीं होते?
वक्ता कहते हैं कि उसी उपदेश में बताया गया है कि भगवान सदाशिव के विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप से उत्पन्न हैं। उन्हें महामाया कभी अत्यधिक विमोहित नहीं करती, जिसके कारण उनकी बुद्धि स्थिर रहती है, और उन्हें कहीं कभी दंड प्राप्त नहीं हुआ है, क्योंकि वे साक्षात सदाशिव के ही स्वरूप हैं।
वक्ता कहते हैं कि वहां उन्होंने बताया है कि भगवान सदाशिव के ही विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर जो और उत्तम कृत्य हैं। यानी कि रुद्र और महेश्वर भगवान सदाशिव के साक्षात पूर्ण स्वरूप से उत्पन्न हैं। परंतु उन्हें महामाया कभी अत्यधिक विमोहित इत्यादि नहीं करती, जिसके कारण उनकी बुद्धि स्थिर रहती है, और उन्हें कहीं कभी दंड प्राप्त नहीं हुआ है — क्योंकि वे साक्षात सदाशिव के स्वरूप हैं।
पूर्व कर्मों का विस्मरण और महामाया द्वारा विमोहन
ब्रह्मा और विष्णु में युद्ध हुआ ही क्यों?
वक्ता कहते हैं कि वहां बताया गया कि समय के कारण ब्रह्मा और विष्णु जी अपने पहले के कर्मों को भुला दिए थे, या कहीं ना कहीं महामाया के द्वारा विमोहित किए गए थे — जिसके कारण ही उन दोनों के बीच युद्ध हुआ कि "मैं श्रेष्ठ हूं, मैं श्रेष्ठ हूं"। इन्हीं के लिए भगवान सदाशिव वहां शिवलिंग के स्वरूप में प्रकट होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि समय के कारण यह बात वहां बताई गई: कि ब्रह्मा और विष्णु जी अपने पहले के कर्मों को भुला दिए थे, या कहीं ना कहीं महामाया के द्वारा विमोहित किए गए थे। उसी के कारण उन दोनों के बीच युद्ध हो गया — "मैं श्रेष्ठ हूं, मैं श्रेष्ठ हूं"। इन दोनों के लिए भगवान सदाशिव वहां शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के स्वरूप में प्रकट होते हैं।
प्रथम मंत्रोपदेश का स्थान — अरुणाचल प्रदेश
पुराण इस स्थान को अरुणाचल प्रदेश में बताता है और उसका वर्णन करता है
वक्ता कहते हैं कि इसके विषय में कहा गया है कि यह अरुणाचल प्रदेश में स्थित है; पुराण में इसका वर्णन होता है। वही वह स्थान है जहां भगवान सदाशिव प्रथम बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी को मंत्रोपदेश देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके विषय में कहा गया है कि यह अरुणाचल प्रदेश में स्थित है। पुराण में इसका वर्णन आता है। और वही वह स्थान है जिस जगह पर भगवान सदाशिव प्रथम बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी को मंत्रोपदेश देते हैं।
प्रणव — ओंकार वाचक और सदाशिव वाच्य
सर्वप्रथम प्रणव का उपदेश — ओंकार वाचक, सदाशिव वाच्य
सर्वप्रथम कौन सा उपदेश मिला, इस पर वक्ता बताते हैं कि प्रणव का उपदेश भगवान सदाशिव के द्वारा दिया गया है। जो महामंगलकारी प्रणव प्रकट हुआ, उसके विषय में कहा गया है कि ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूं; यह मंत्र मेरा ही स्वरूप है; प्रतिदिन प्रणव का स्मरण करते रहने से मेरा ही स्मरण होता है।
पांच मुखों से अकार, उकार, मकार, बिंदु और नाद
प्रणव की उत्पत्ति पांच मुखों से किस प्रकार होती है?
वक्ता बताते हैं कि उत्तरवर्ती मुख से अकार, पश्चिम मुख से उकार, दक्षिण मुख से मकार, पूर्ववर्ती मुख से बिंदु तथा मध्यवर्ती मुख से नाद उत्पन्न हुआ। इस प्रकार पांच अवयवों से युक्त होकर प्रणव का पूर्ण रूप से विस्तार हुआ और वह एक अक्षर हो गया, और उसी प्रणव से इस समग्र संसार की उत्पत्ति हुई।
बिंदु ही महामाया, और देवी अथर्वशीर्षम् का प्रमाण
बिंदु से नाद, और बिंदु का स्वरूप ही महामाया का स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि यह बात ध्यान रखें कि बिंदु से नाद होता है, और बिंदु का स्वरूप ही महामाया का स्वरूप है। जब आप भगवती के अथर्वशीर्ष, देवी अथर्वशीर्षम् का पाठ करेंगे तो वहां बिंदु रूपेण कहा गया है। तो पूर्व के मुख से भगवान सदाशिव ने जिसे बिंदु स्वरूप में उत्पन्न किया, भगवती ही वहां से प्रादुर्भूत हुईं, इस प्रकार अपनी लीला रची और ओंकार यानी प्रणव का स्वरूप धारण किया।
पंचाक्षर, मातृका वर्ण और सदाशिव का पूर्ण स्वरूप
उन्हीं पांच मुखों से निकले अलग-अलग अक्षर ही पंचाक्षर हैं, और उन्हीं से मातृका वर्ण
वक्ता कहते हैं कि उन्हीं पांच मुखों से क्रम से जो अलग-अलग अक्षर उत्पन्न हुए, वही भगवान सदाशिव का पंचाक्षर है जो आपको क्रमशः देखने पर मिलेगा। इसी पंचाक्षरी मंत्र से मातृका वर्ण प्रकट हुए, जो पांच भेद वाले हैं। यदि शिव जी के पांच मुखों का, अर्थात भगवान सदाशिव के पूर्ण स्वरूप का वर्णन कहीं आता है तो वह पंचाक्षरी मंत्र में आता है; पंचाक्षर को साक्षात शिव स्वरूप माना गया है।
वक्ता कहते हैं कि उन्हीं पांच मुखों से क्रम से जो आया, उससे जो अलग-अलग अक्षर उत्पन्न हुए — इसी को भगवान सदाशिव का पंचाक्षर कहते हैं, जिसे आप क्रमशः देखेंगे तो आएगा। और इसी पंचाक्षरी मंत्र से मातृका वर्ण प्रकट हुए, जो पांच भेद वाले हैं। यानी शिव जी के पांच मुखों का पूर्ण, यानी कि भगवान सदाशिव के पूर्ण स्वरूप का वर्णन अगर कहीं आता है तो वह पंचाक्षरी मंत्र में आता है। इसकी इतनी विशेष महिमा है; पंचाक्षर को साक्षात शिव स्वरूप माना गया है।
चार मुखों से त्रिपदा गायत्री, फिर वेद और करोड़ों मंत्र
उसी शिरो मंत्र से चार मुखों द्वारा त्रिपदा गायत्री, फिर वेद और करोड़ों मंत्र
विश्वेश्वर संहिता के नवम अध्याय का हवाला देते हुए वक्ता कहते हैं कि उसी शिरो मंत्र से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री मंत्र का प्राकट्य हुआ; उस गायत्री से संपूर्ण वेद प्रकट हुए, और उन वेदों से करोड़ों मंत्र निकले, जिनसे भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। मूल में जाने पर पता चलता है कि प्रणव और पंचाक्षर ही सबसे मूल हैं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा वर्णन आता है कि उसी मंत्र से — विश्वेश्वर संहिता के नवम अध्याय को पढ़िए — उसी शिरो मंत्र से चार मुखों से त्रिपदा गायत्री मंत्र का प्राकट्य हुआ है। और उस गायत्री से संपूर्ण वेद प्रकट हुए हैं, और उन वेदों से करोड़ों मंत्र निकले हैं। उन मंत्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। यानी कि मूल में जब आप जाएंगे तो पता चलेगा कि प्रणव और जो पंचाक्षर है, वही सबसे मूल है, आदि है, और उसके द्वारा इस संसार के समस्त कार्य सिद्ध हो सकते हैं।
पांच मुखों से लेकर कार्य सिद्धि तक का पुनरावलोकन
पांच मुखों से पांच अक्षर, सायुज्य में मिलन, साकार रूप — और वहीं से समस्त कार्यों की सिद्धि
वक्ता कहते हैं कि पांच मुखों से पांच अक्षर प्रकट हुए; सभी जब सायुज्य हुए, एक साथ जब मिले, तो उन्होंने साकार रूप धारण किया, प्रणव का रूप धारण किया। और जो अलग रहते हैं, उन्हीं से पंचाक्षर मंत्र का निर्माण हुआ; उस पंचाक्षर से चार मुखों द्वारा त्रिपदा गायत्री का प्राकट्य हुआ; गायत्री से वेद, वेद से मंत्र, और मंत्र से करोड़ों इत्यादि कार्य सिद्ध होते हैं।
महेश्वर गुरु रूप में, पार्वती गुरु माता रूप में, उत्तर की ओर मुख
गुरु माता के रूप में पार्वती और गुरु के रूप में महेश्वर, उत्तराभिमुख होकर
वक्ता कहते हैं कि वर्णन आता है कि भगवती जगदम्बा पार्वती गुरु माता के रूप में और भगवान महेश्वर गुरु के रूप में बैठकर, उत्तराभिमुख होकर यह विषय दिए। गुरु और गुरु माता एक साथ बैठे, महादेव जी ने उत्तर की ओर मुख किया, और ब्रह्मा तथा विष्णु जी ने भी उत्तर की ओर मुख किया — गुरु मंत्र देने की जो पद्धति और परंपरा है, उसी के अनुसार।
वक्ता कहते हैं कि अब इसी मंत्र का उपदेश भगवान सदाशिव के द्वारा भगवान ब्रह्मा और विष्णु जी को दिया गया है। जिसमें यह वर्णन आता है कि भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। पार्वती गुरु माता के रूप में, और भगवान महेश्वर गुरु के रूप में बैठकर, उत्तराभिमुख होकर इस विषय को कैसे दिए, कब दिए — इसे सुनिए, इसे जानिए। कि गुरु और गुरु माता एक साथ बैठे और महादेव जी ने उत्तर की ओर मुख किया। उत्तर की ओर मुख किए हुए, गुरु मंत्र देने की जो पद्धति है, जो परंपरा है, उस अनुसार प्रथम बार इस विषय का वर्णन आता है — कि ब्रह्मा और विष्णु जी ने उत्तर की ओर मुख किया।
आच्छादन वस्त्र, मस्तक पर हाथ, और तीन बार मंत्रोच्चार
पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित, मस्तक पर हाथ, और धीरे-धीरे तीन बार मंत्र का उच्चारण
वक्ता कहते हैं कि फिर उन्हें पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित करके, यानी ढककर, मस्तक पर हाथ रखकर, धीरे-धीरे उच्चारण करके उत्तम मंत्र का उपदेश दिया गया। यंत्र तंत्र में बताई हुई विधि के पालन पूर्वक तीन बार मंत्र का उच्चारण करके भगवान शिव ने उन शिष्यों को, यानी ब्रह्मा और विष्णु जी को, मंत्र की दीक्षा दी। और गुरु दक्षिणा के रूप में उन दोनों ने स्वयं को ही समर्पित कर दिया।
वक्ता कहते हैं कि फिर उनको पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित करके — यानी ढककर — मस्तक पर अपना हाथ रखकर, धीरे-धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मंत्र का उपदेश दिया। यंत्र तंत्र में बताई हुई विधि के पालन पूर्वक, तीन बार मंत्र का उच्चारण करके, भगवान शिव ने उन शिष्यों को, यानी ब्रह्मा और विष्णु जी को, मंत्र की दीक्षा दी। और गुरु दक्षिणा के रूप में ब्रह्मा और विष्णु जी ने स्वयं को ही समर्पित कर दिया।
प्रथम दीक्षा और परम गुरु का संबंध
शिव महापुराण में ब्रह्मा और विष्णु को पुत्र क्यों कहा गया है?
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि भगवान सदाशिव की दी गई प्रथम दीक्षा ब्रह्मा और विष्णु जी को दी गई, जिसमें भगवती पार्वती गुरु माता के रूप में थीं। इसीलिए जब आप शिव पुराण पढ़ेंगे तो अनेकों बार भगवान सदाशिव ब्रह्मा और विष्णु जी को पुत्र कहकर संबोधित करते हैं। उनके परम गुरु साक्षात भगवान सदाशिव हुए और जगदंबा पार्वती उनकी गुरु माता होती हैं — यह वर्णन शिव महापुराण में मिलेगा, यह कोई कपोल कल्पित नहीं है।
तो वक्ता कहते हैं कि भगवान सदाशिव की जो प्रथम दीक्षा दी गई है, वह ब्रह्मा और विष्णु जी को दी गई — भगवती पार्वती गुरु माता के रूप में। इसीलिए जब आप शिव पुराण पढ़ेंगे तो अनेकों बार भगवान सदाशिव के द्वारा ब्रह्मा और विष्णु जी को पुत्र रूप में बोला गया है — बार-बार वे उन्हें पुत्र कहकर संबोधित करते हैं। और ब्रह्मा और विष्णु जी के जो परम गुरु हुए, वह साक्षात भगवान सदाशिव हुए, और जगदंबा पार्वती उनकी गुरु माता होती हैं। वक्ता कहते हैं कि इसका वर्णन आपको शिव महापुराण में मिलेगा; यह कोई कपोल कल्पित नहीं है।
विश्वेश्वर संहिता का दशम अध्याय
उसके पश्चात की गई स्तुति विश्वेश्वर संहिता के दशम अध्याय में है
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात ब्रह्मा और विष्णु जी के द्वारा स्तुति इत्यादि भी की गई है, जो आपको विश्वेश्वर संहिता के दशम अध्याय में मिलेगी। वे आगे कहते हैं कि अपने पुराणों को जानिए, क्योंकि वहां ऐसी बहुत जानकारी मिलेगी जिसके द्वारा आपकी अज्ञानता का नाश होगा और महादेव में आपकी प्रीति बढ़ेगी।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात ब्रह्मा और विष्णु जी के द्वारा स्तुति इत्यादि भी की गई है। यह आपको विश्वेश्वर संहिता के दशम अध्याय में मिलेगा। इसलिए, वे कहते हैं, अपने पुराणों को जानिए: आपको बहुत कुछ ऐसी जानकारी मिलेगी जिसके द्वारा आपकी अज्ञानता का नाश होगा और महादेव में आपकी प्रीति बढ़ेगी।
अपने इष्ट का पुराण पढ़िए, पर सभी अठारह की जानकारी रखिए
यदि नारायण का भक्त कहे कि शिव महापुराण तो शिव को श्रेष्ठ बताता है, तो क्या करें?
यह आपत्ति उठ सकती है कि शिव महापुराण में तो शिव जी को श्रेष्ठ दिखाया गया है जबकि हम नारायण के सेवक हैं और नारायण को श्रेष्ठ मानते हैं — इस पर वक्ता स्पष्ट करते हैं: आपका जिस स्वरूप में आकर्षण और समर्पण है, उसी स्वरूप से संबंधित पुराण इत्यादि का पाठ करें। लेकिन जानकारी जरूर होनी चाहिए — 18 पुराण हैं और जितने उपमहापुराण हैं, उनके माध्यम से आपको सभी स्वरूपों के विषय में सही जानकारी होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यहां एक विषय उठेगा: कि आप शिव महापुराण इत्यादि के विषय में बता रहे हैं, तो वहां तो शिव जी को श्रेष्ठ दिखाया गया है, जबकि हम तो नारायण के सेवक हैं, नारायण को श्रेष्ठ मानते हैं। वे इस विषय को वहीं स्पष्ट कर देते हैं। आपका जिस स्वरूप में आकर्षण है, आपका समर्पण है, उस स्वरूप से संबंधित पुराण इत्यादि का पाठ करें। लेकिन आपको जानकारी जरूर होनी चाहिए। 18 पुराण हैं, और जितने उपमहापुराण हैं — उनके माध्यम से आपको सभी स्वरूपों के विषय में सही से जानकारी होनी चाहिए।
वेद पाठ का अधिकार और पुराणों की सुलभता
जब वेद हैं तो पुराणों की रचना क्यों की गई?
वक्ता कहते हैं कि वेदों को अच्छी प्रकार से समझने के लिए ही पुराणों की रचना की गई है, क्योंकि वेद पाठ हर कोई कर नहीं सकता। उन मंत्रों का पाठ करने के लिए सभी को अधिकार की प्राप्ति भी नहीं है, और बिना विशेष गुरु के उन सभी का सही पूर्वक अध्ययन भी नहीं किया जा सकता — वेद अध्ययन का विषय होता है। पुराण के द्वारा वे सभी चीजें आराम से हमें प्राप्त हो जाती हैं, इसलिए व्यक्ति को समय-समय पर अपने सनातन संबंधित पुराणों का पाठ करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि वेदों को अच्छी प्रकार से समझने के लिए ही पुराण इत्यादि की रचना की गई है, क्योंकि वेद पाठ हर कोई कर नहीं सकता है। उन मंत्रों का पाठ करने के लिए सभी कोई को अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। की प्राप्ति भी नहीं है, और बिना विशेष गुरु के उन सभी का सही पूर्वक से अध्ययन भी नहीं किया जा सकता। वेद अध्ययन का विषय होता है। तो पुराण के द्वारा वे सभी चीजें सही और आराम से हमें प्राप्त हो जाती हैं। इसलिए व्यक्ति को समय-समय पर अपने सनातन संबंधित पुराणों का पाठ इत्यादि करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।