बटुक भैरव ब्रह्म कवच: सिद्धि विधि और प्रयोग विधि
बटुक भैरव ब्रह्म कवच का पाठ, अभिमंत्रण और धारण — सुरक्षा के लिए पूरी विधि।
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घर में भैरव पूजन, और घर के कवच के लिए बटुक भैरव का चयन
क्या घर में भैरव जी का पूजन करना चाहिए, और घर में किस स्वरूप का पूजन उचित है?
वक्ता कहते हैं कि प्रत्येक घर में भैरव के किसी न किसी स्वरूप का पूजन होना चाहिए, परंतु उनके उग्रात्मक स्वरूपों का नहीं — वे घर के लिए नहीं हैं। जिस घर को अपने कुल भैरव की जानकारी न हो, वह बटुक भैरव का पूजन करे, और सुरक्षा के निमित्त उनके कवच को जागृत करके रखे।
वक्ता कहते हैं कि सनातन धर्म का पालन करने वाले सभी लोगों को घर में भैरव जी का किसी न किसी रूप में पूजन अवश्य करना चाहिए, और सबसे पहले यह शंका दूर कर लेनी चाहिए कि घर में भैरव पूजा हो ही नहीं सकती — हो सकती है, बशर्ते सही स्वरूप चुना जाए। भैरव के उग्रात्मक स्वरूपों का पूजन घर पर नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अपने कुल भैरव की जानकारी रखता है, वह उन्हीं का पूजन करे; शेष सभी बटुक भैरव का पूजन करें। वे आगे कहते हैं कि यदि घर में बटुक भैरव का कवच सिद्ध करके जागृत रखा जाए, तो घर का कोई एक सदस्य — विशेष रूप से घर के मुखिया या कोई साधक — पूरे परिवार की सुरक्षा के निमित्त उसका उत्तरदायित्व ले। वे बताते हैं कि भैरव कवच अनेक प्रकार के हैं, प्रत्येक की अपनी महत्ता है और सभी अपने आप में सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं; आज की चर्चा उनमें से एक — बटुक भैरव ब्रह्म कवच — पर है।
अभिचार, ब्रह्म पिशाच और मसान की पीड़ा में बटुक भैरव ब्रह्म कवच का प्रयोग
अभिचार, ब्रह्म पिशाच या मसान से पीड़ित व्यक्ति की बटुक भैरव ब्रह्म कवच किस प्रकार सहायता करता है?
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग उस व्यक्ति के लिए है जो अभिचार से ग्रसित हो — विशेष रूप से ब्रह्म पिशाच, मसान या शाकिनी से, या जिसे लोग चुड़ैल या डाकनी कहते हैं। इस कवच की सिद्धि कर लेने पर बटुक भैरव की कृपा से इन सभी से मुक्ति हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव ब्रह्म कवच का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग उस व्यक्ति के लिए है जो अभिचार आदि से ग्रसित है, विशेष रूप से जब उसमें ब्रह्म पिशाच, मसान, शाकिनी, या जिसे लोग चुड़ैल या डाकनी कहते हैं, इनका प्रभाव हो। वे कहते हैं कि यदि व्यक्ति इस कवच की सिद्धि कर लेता है तो बटुक भैरव की कृपा से इन सभी से उसकी अवश्य मुक्ति हो जाती है।
बार-बार बच्चों या प्रसव के दृश्य दिखना — मसान दोष का लक्षण
मसान दोष के दर्शन-संबंधी लक्षण क्या हैं, और यह कवच कैसे सहायता करता है?
वक्ता कहते हैं कि यदि घर की स्त्री या पुरुष बार-बार स्वयं को छोटे बच्चों से घिरा हुआ देखते हैं — स्त्री, चाहे विवाहित हो या अविवाहित, अपनी गोद में बच्चा देखे, बार-बार स्वयं की डिलीवरी होते देखे, या स्तनपान कराते देखे — तो यह कहीं न कहीं मसान दोष का लक्षण है, और ऐसी अवस्था में बटुक भैरव ब्रह्म कवच का आश्रय लेने से पूर्ण रक्षण होता है।
वक्ता एक लक्षण बताते हैं जिसे वे मसान दोष से जोड़ते हैं: घर की स्त्री या पुरुष का बार-बार स्वयं को छोटे बच्चों से घिरा हुआ देखना। विशेष रूप से स्त्रियों में — चाहे विवाहित हों या अविवाहित — यह अपनी गोद में बच्चे को देखने, बार-बार स्वयं की डिलीवरी होते देखने, या स्तनपान कराते हुए देखने के रूप में आता है। वे कहते हैं कि ऐसे बार-बार आने वाले दृश्य कहीं न कहीं मसान दोष का लक्षण होते हैं। ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, बटुक भैरव ब्रह्म कवच का आश्रय लेने पर बटुक भैरव की कृपा से पूर्ण रूप से रक्षण होता है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच और सरसों तेल के दीपक से गर्भवती स्त्री की रक्षा
गर्भवती स्त्री की रक्षा के लिए बटुक भैरव ब्रह्म कवच का प्रयोग कैसे किया जाए?
वक्ता कहते हैं कि यदि घर की स्त्री गर्भावस्था में परेशान है — उस पर किसी प्रकार का प्रयोग हो रहा हो, पेट में परेशानी हो, या बहुत स्वप्न आ रहे हों — तो सरसों तेल का दीप प्रज्वलित करके बटुक भैरव ब्रह्म कवच का सामान्य पाठ करने मात्र से, चाहे उसका अनुष्ठान किया हो या न किया हो, उनका पूर्ण रक्षण होता है।
वक्ता उस स्थिति की बात करते हैं जिसमें घर की स्त्री गर्भावस्था में परेशान हो: उस पर किसी प्रकार का प्रयोग हो रहा हो, पेट में परेशानी हो रही हो, या बहुत अधिक स्वप्न आ रहे हों। वे कहते हैं कि ऐसे समय में, चाहे घर में बटुक भैरव ब्रह्म कवच का अनुष्ठान पहले से किया गया हो या न किया गया हो, सरसों तेल का दीप प्रज्वलित करके इस कवच का सामान्य पाठ कर लेना ही उनके पूर्ण रक्षण के लिए पर्याप्त है।
मारक दशा के प्रतिकार में बटुक भैरव ब्रह्म कवच का संकल्प
मारक दशा और दुर्घटना की आशंका वाली ग्रह दशाओं में यह कवच कैसे सहायक है?
वक्ता कहते हैं कि यदि जन्म कुंडली में चल रही दशा-अंतर्दशा पर मारकेश का प्रभाव हो, जिससे जीवन में अपघात या दुर्घटना की आशंका बने, तो उस विषय का संकल्प लेकर इस कवच का पाठ करने से रक्षण होता है।
वक्ता कहते हैं कि यह कवच अपने आप में अति सामर्थ्यशाली है और तुरंत प्रभाव देने वाला है। यदि किसी की जन्म कुंडली या लग्न कुंडली में चल रही दशा-अंतर्दशा पर मारकेश का प्रभाव हो — जिसके कारण जीवन में अपघात जैसी समस्या या दुर्घटनाओं की आशंका बने — तो इस विषय का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर इस कवच का पाठ करने से उससे भी रक्षण होता है।
शनि-राहु पिशाच योग और बटुक भैरव ब्रह्म कवच द्वारा उसका उपाय
शनि-राहु के योग (पिशाच योग) का क्या प्रभाव होता है, और यह कवच उसका प्रतिकार कैसे करता है?
वक्ता कहते हैं कि जब शनि और राहु एक ही भाव में, एक ही राशि में, या दृष्टि से मिलते हैं तो पैशाचिक योग बनता है, और वह योग जब फलीभूत होता है तो अभिचार जैसी अवस्था, रास्ते-घाट से चीजों का लग जाना, भ्रम, अवसाद, या नकारात्मक शक्ति का आवेश हो सकता है — और इन सब में बटुक भैरव ब्रह्म कवच महा ब्रह्मास्त्र है।
वक्ता बताते हैं कि यदि कुंडली में कहीं भी शनि और राहु का योग बना हो — दोनों एक ही भाव में स्थित हों, एक ही राशि में हों, या दृष्टि से मिल रहे हों — तो पैशाचिक योग उत्पन्न होता है। वे कहते हैं कि यह पिशाच योग जब फलीभूत होता है तो अभिचार की अवस्था बनती है, या रास्ते-घाट से चीजें लग जाती हैं। नकारात्मक ऊर्जाएं परेशान करती हैं, व्यक्ति भ्रमित होता है, अवसाद की अवस्था बन जाती है, और वह किसी नकारात्मक शक्ति से आवेशित भी हो सकता है। वे कहते हैं कि इन सभी परिस्थितियों में बटुक भैरव ब्रह्म कवच अपने आप में महा ब्रह्मास्त्र है — बड़ी झटके से और बड़ी तीव्रता से प्रभाव देने वाला।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच के नित्य पाठ की संख्या और शुभ पर्व काल
प्रतिदिन एक, पांच, ग्यारह या इक्कीस पाठ — जितना चाहें, कोई बंधन नहीं
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का सामान्य रूप से प्रतिदिन एक, पांच, ग्यारह या इक्कीस — जितना चाहें उतना — पाठ किया जा सकता है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है; परंतु पहले इसकी सिद्धि करके फिर नित्य पाठ करना अत्यंत उत्तम है। किसी भी पर्व काल में, जैसे नवरात्र, महाशिवरात्रि, ग्रहण काल, दीपावली या होली में, पाठ आरंभ करना विशेष फलदायी है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का सामान्य रूप से प्रतिदिन जितना चाहें उतना पाठ किया जा सकता है — एक, पांच, ग्यारह, इक्कीस — इसमें आपको कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन यदि पहले इस कवच की जागृति और सिद्धि कर ली जाए और उसके पश्चात नित्य पाठ किया जाए, तो वह अत्यंत उत्तम होता है। वे कहते हैं कि किसी भी पर्व काल में इसका पाठ आरंभ कर दीजिए — जैसे कोई नवरात्र आ रहा हो, महाशिवरात्रि आ रही हो, ग्रहण काल पड़ रहा हो, या दीपावली, होली आदि का समय हो। इन समयों में, वे कहते हैं, जितनी अधिक आवृत्ति हो जाए, जितना अधिक पाठ-जप कर लें, उतना ही श्रेष्ठ होता है।
कवच सिद्धि के लिए कृष्ण पक्ष अष्टमी से चतुर्दशी तक का क्रम
जब कोई पर्व काल निकट न हो — कृष्ण पक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तक
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई पर्व काल न हो और सामान्य रूप से सिद्धि करनी हो, तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके चतुर्दशी तक प्रतिदिन 121, 100 या 27 पाठ — जितना हो सके — करें; शाम को या निशा काल में करना सर्वोत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि जब कोई पर्व काल निकट न हो और फिर भी सामान्य रूप से इस कवच की सिद्धि करनी हो, तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके चतुर्दशी तक प्रतिदिन 121 पाठ, 100 पाठ या 27 पाठ — जितना हो सके — करना चाहिए। वे कहते हैं कि शाम को या निशा काल में पाठ करना सर्वोत्तम है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच साधना में खानपान, आरंभिक विधि, वस्त्र और अधिकार
सात्विक भोजन और ब्रह्मचर्य — दिन में भोजन के बाद भी रात्रि में पाठ किया जा सकता है
वक्ता कहते हैं कि साधक बस इतना ध्यान रखे कि भोजन सात्विक रहे और ब्रह्मचर्य का पालन हो; दिन में भोजन कर लेने पर भी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर रात्रि में पाठ किया जा सकता है। आरंभिक विषय — आसन, आचमन, प्राणायाम (यदि आता हो), शिखा बंधन और संकल्प — कर लेने चाहिए। लाल, पीला या श्वेत किसी भी रंग के वस्त्र धारण किए जा सकते हैं, और स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े तथा विवाहिता-अविवाहिता सभी इसका पाठ कर सकते हैं।
खानपान और आचरण के विषय में वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखिए कि भोजन सात्विक रहे और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन रहे। दिन में भोजन कर लिया हो तो भी रात्रि में पाठ किया जा सकता है — स्नान आदि करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पाठ बिल्कुल किया जा सकता है। वे पाठ से पहले किए जाने वाले आरंभिक विषय गिनाते हैं: आसन पर बैठना, आचमन करना, प्राणायाम यदि आता हो तो वह करना, शिखा बंधन आदि करना, और संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेना। वस्त्र के विषय में वे कहते हैं कि लाल, पीला, श्वेत — किसी भी रंग के वस्त्र धारण किए जा सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सभी इस कवच का पाठ कर सकते हैं, और विवाहिता तथा अविवाहिता सभी इसे कर सकती हैं।
दिशा, और बटुक भैरव के छाया चित्र या शिवलिंग के समक्ष कवच का समर्पण
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख, और बटुक भैरव के चित्र या शिवलिंग के समक्ष समर्पण
वक्ता कहते हैं कि पाठ के समय, विशेष रूप से सिद्ध करने के समय, दिशा पूर्व या उत्तर रखें। कवच का समर्पण बटुक भैरव के छाया चित्र या स्थापित श्री विग्रह पर होता है, और उससे पहले उनका पूजन होता है; यदि वह न हो तो शिवलिंग पर समर्पण करेंगे। गुरु और गणपति (गणेश) का स्मरण करने के पश्चात पाठ आरंभ होता है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का पाठ करते समय — और विशेष रूप से इसे सिद्ध करते समय — दिशा पूर्व या उत्तर रखनी चाहिए। यदि घर में बटुक भैरव का छाया चित्र रखा हो या उनका श्री विग्रह स्थापित किया हो, तो कवच का समर्पण उन्हीं पर होगा और उससे पहले उनका पूजन आदि होगा। यदि ऐसा न हो, तो भगवान शिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर समर्पण करेंगे। गुरु और गणपति (गणेश) का स्मरण करने के पश्चात साधक बटुक भैरव ब्रह्म कवच का पाठ आरंभ करेगा।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच के तीन भाग और अधिक बार जाप करने पर उनका क्रम
पूर्व पीठिका, मूल पाठ और फल श्रुति — अनेक आवृत्तियों में केवल मध्य भाग दोहराया जाता है
वक्ता कहते हैं कि इस कवच में तीन भाग हैं — पूर्व पीठिका, मूल पाठ और फल श्रुति। अधिक बार जाप करते समय पूरा पाठ हर बार करने की आवश्यकता नहीं है: पूर्व पीठिका केवल पहली बार पढ़ी जाती है, मूल कवच की बार-बार आवृत्ति होती है, और अंतिम पाठ के समय फल श्रुति का पाठ किया जाता है।
वक्ता बताते हैं कि ब्रह्म कवच में तीन भाग हैं: पूर्व पीठिका, मूल पाठ और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है।। वे कहते हैं कि जब आप अधिक बार जाप करने वाले हों तो हर बार पूरा पाठ करने की आवश्यकता नहीं है। पूर्व पीठिका केवल पहली बार पढ़ेंगे; मूल कवच की बार-बार आवृत्ति होगी; और जब अंतिम पाठ कर रहे हों उस समय फल श्रुति का पाठ करेंगे।
बटुक भैरव का मूल मंत्र इस कवच से क्यों हटाया गया — एक श्रापित, गुरु-मुख से प्राप्त होने वाला मंत्र
मूल मंत्र जानबूझकर हटाया गया — उसे श्रापित और केवल गुरु-मुख से प्राप्त होने वाला बताया गया है
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने बटुक भैरव के मूल मंत्र की आवृत्ति इस कवच में जानबूझकर नहीं रखी है; वे उसे श्रापित मंत्र बताते हैं जिसका स्वतंत्र जाप गुरु-मुख से उपदेशित होने और निष्कीलन का विधान करने के पश्चात ही किया जाता है। वे कहते हैं कि उस मंत्र की पूरी आवृत्ति कवच में ही आ जाती है, इसलिए उसे अलग से करने की कोई विशेष अनिवार्यता नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच से जुड़ा एक विषय है — बटुक भैरव जी का मूल मंत्र — जिसकी आवृत्ति उन्होंने इस कवच में नहीं रखी है। वे यह अनुमान करते हैं कि लोग यह कहकर प्रश्न करेंगे कि उनके पास जो किताब है उसमें यह मंत्र दिया है, और कहते हैं कि जो कुतर्क करना चाहें उनका कोई जवाब नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसा विदित है कि जब आप अध्ययन करेंगे और गुरु मुख होकर उसे प्राप्त करेंगे, तब वह मंत्र किया जा सकता है। उनके शब्दों में वह मंत्र कहीं न कहीं श्रापित मंत्र रहता है: उसका अध्ययन शक्ति संगम आदि में किया जा सकता है, परंतु गुरु के द्वारा उपदेशित होने पर और उसका निष्कीलन का विधान करके ही उसका स्वतंत्र रूप से जाप किया जाता है। वे स्पष्ट कहते हैं कि इसमें उनकी ऐसी कोई राय नहीं है कि करो या मत करो — यह आपकी इच्छा है। हटाने का कारण वे यह बताते हैं कि वे नहीं चाहते कि सामान्य जन एक श्रापित, कीलित विषय को करने जाएं और फिर उससे कोई वैसी बात हो। वे यह भी कहते हैं कि मूल कवच में वह मंत्र स्वयं ही अलग-अलग भागों में रिपीट होता है और उससे भगवान भैरव रक्षण करते ही हैं, इसलिए अलग से करने की कोई अनिवार्यता नहीं बनती।
ग्यारह श्लोकों का मूल कवच भाग, जिसे पूरी आवृत्ति संख्या के लिए दोहराया जाता है
दोहराया जाने वाला भाग विनियोग के बाद दसवें श्लोक से इक्कीसवें श्लोक तक चलता है
वक्ता कहते हैं कि पहले हाथ में जल लेकर विनियोग किया जाता है; उसके बाद जो दसवां श्लोक है वही मूल कवच का प्रथम श्लोक है, और मूल कवच इक्कीसवें श्लोक तक चलता है — लगभग ग्यारह श्लोक। इन्हीं ग्यारह श्लोकों को बार-बार दोहराकर 108, 27 या जितनी भी आवृत्ति करनी हो वह पूर्ण होती है।
वक्ता पीडीएफ से पाठ करने वाले साधक के लिए क्रम बताते हैं: पहले हाथ में जल लेकर विनियोग किया जाता है। विनियोग के बाद पाठ में जो दसवां श्लोक है वही मूल कवच का प्रथम श्लोक है, और मूल पाठ इक्कीसवें श्लोक तक चलता है — वे इसकी सीमा "श्री ब्रह्म कवच कवचं भैरवस प्रकृति तम" पंक्ति तक बताते हुए कहते हैं कि यहां तक मूल कवच है, यानी लगभग ग्यारह श्लोक। इन्हीं ग्यारह श्लोकों को बार-बार दोहराया जाता है, और इस तरीके से साधक जितनी भी आवृत्ति करना चाहे — 108 आवृत्ति, 27 आवृत्ति — वह पूर्ण होती है।
फूल, बेल पत्र या अग्नि में समर्पित लौंग से कवच की आवृत्ति गिनना
108 या 11 फूलों पर, या बेल पत्र अथवा अग्नि में समर्पित लौंग पर गिनती
वक्ता कहते हैं कि आवृत्ति की गिनती पुष्प से की जा सकती है — 108 या 11 फूल लेकर, हर फूल पर दस-दस पाठ और अंतिम फूल पर आठ पाठ — या इसी प्रकार बेल पत्र से, या मिट्टी के पात्र में कपूर के साथ ग्यारह लौंग को भगवान भैरव या शिवलिंग के समक्ष प्रज्वलित करके, जिसमें भी प्रत्येक लौंग पर दस-दस और अंतिम पर आठ पाठ होते हैं। इस तरीके से भी कवच की सिद्धि होती है।
वक्ता कवच की आवृत्ति गिनने के कई तरीके बताते हैं। एक यह है कि 108 फूल या 11 फूल ले लीजिए, हर फूल पर दस-दस पाठ करके उसे समर्पित करिए, और अंतिम फूल पर आठ पाठ करके संख्या पूर्ण करिए। बेल पत्र से भी इसी प्रकार किया जा सकता है — बेल पत्र पर पाठ करके उसे समर्पित करें। इसके अतिरिक्त वे लौंग से अग्नि प्रज्वलन का तरीका बताते हैं: जैसे 11 लौंग लिए, प्रत्येक लौंग पर दस-दस पाठ किए और अंतिम लौंग पर आठ पाठ किए। फिर उन्हें किसी मिट्टी के पात्र में कपूर के साथ भगवान भैरव के समक्ष या शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के समक्ष प्रज्वलित कर दिया और प्रार्थना की कि भगवान यह आपको समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। वे कहते हैं कि इस तरीके से भी इस कवच की सिद्धि होती है।
बटुक भैरव के लिए नैवेद्य, और घर की स्त्रियों द्वारा उसका ग्रहण
बूंदी के लड्डू, मिश्री या घर का बना दही बड़ा — और घर की स्त्रियां भी इसे ग्रहण कर सकती हैं
वक्ता भगवान भैरव के नैवेद्य के लिए बूंदी वाले लड्डू, मिश्री, या घर पर बना बढ़िया दही बड़ा बताते हैं, और विकल्प के रूप में बाहर से खरीदी जलेबी, मिश्री या लड्डू। वे कहते हैं कि चूंकि यह बटुक भैरव का घर का पूजन है, इसलिए यह नैवेद्य स्त्री-पुरुष सभी स्वीकार कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव को लगाया जाने वाला नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। बूंदी वाले लड्डू, मिश्री, या घर पर स्वयं बनाया हुआ बढ़िया दही बड़ा हो सकता है। अन्यथा जलेबी, मिश्री या लड्डू बाहर से खरीद कर भी लगाए जा सकते हैं। वे कहते हैं कि जो नैवेद्य लगाया जाएगा उसे स्त्री-पुरुष सभी स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि बटुक भैरव का यह नैवेद्य घर का पूजन है — ऐसा नहीं है कि इस नैवेद्य को घर की कोई स्त्री स्वीकार नहीं करेंगी; ऐसा कोई विषय नहीं है।
अनुष्ठान में जीव सेवा और पंचबली, और कवच सिद्ध होने पर तत्काल रक्षा
पूरे अनुष्ठान भर जीव सेवा और प्रतिदिन पंचबली — यही उन्हें सबसे अधिक तृप्त करता है
वक्ता कहते हैं कि जब तक इस कवच का अनुष्ठान चले तब तक जीव सेवा इसमें बड़ी अनिवार्य है, और पंचबलि तो प्रतिदिन करनी ही चाहिए — इससे भगवान भैरव की तृप्ति होती है और कृपा शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त होती है। वे कहते हैं कि कवच सिद्ध कर लेने के बाद बटुक भैरव का स्मरण मात्र करने पर वे अपने अन्य गणों को आदेश देकर तुरंत साधक की रक्षा करवाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब तक साधक इस कवच का अनुष्ठान कर रहा है, तब तक इसमें जीव सेवा बड़ी अनिवार्य है, और पंचबलि तो वैसे भी प्रतिदिन करनी चाहिए। वे कहते हैं कि इससे भगवान भैरव की तृप्ति होती है और उनकी कृपा शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त होती है। इसका कारण वे बताते हैं: इस कवच का यह विषय है कि जब आप इसे सिद्ध कर लेने के बाद बटुक भैरव का स्मरण मात्र करेंगे, तो वे अपने अन्य-अन्य गणों को आदेश देकर तुरंत आपकी रक्षा करवाते हैं।
प्रत्यक्ष संरक्षण के लिए 11,000 आवृत्ति की सीमा, और उसकी धर्म-शर्त
11,000 आवृत्तियों के बाद प्रत्यक्ष संरक्षण — इस शर्त पर कि साधक धर्म में बना रहे
वक्ता कहते हैं कि जब इस कवच की मूल आवृत्ति 11,000 से ऊपर हो जाती है, तो यह जान लीजिए कि आप भैरव जी के प्रत्यक्ष संरक्षण में जीवन यापन कर रहे हैं — धर्म युक्त जीवन यापन, अधर्म नहीं। वे कहते हैं कि अधर्म करेंगे तो कोई भी शक्ति साथ छोड़ देगी: भगवान शिव ने रावण का साथ छोड़ दिया, भगवती तारा ने रावण का साथ छोड़ दिया, तो आप और हम कौन होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब इस कवच की मूल आवृत्ति 11,000 से ऊपर हो जाती है, तो यह जान लीजिए कि आप भैरव जी के प्रत्यक्ष संरक्षण में अपना जीवन यापन कर रहे हैं — वे स्पष्ट करते हैं, धर्म युक्त जीवन यापन, अधर्म नहीं। वे कहते हैं कि अधर्म करिएगा तो कोई भी शक्ति हो, साथ छोड़ देगी: भगवान शिव ने रावण का साथ छोड़ दिया, भगवती तारा ने रावण का साथ छोड़ दिया, तो आप और हम कौन होते हैं। वे कहते हैं कि इसलिए ध्यान रखिएगा — यदि धर्म युक्त काम करते हैं और कवच आदि का महापुरश्चरण किया है तो अवश्य आपकी रक्षा होगी।
सिद्धि के पश्चात बटुक भैरव के 108 या 1008 नामों से हवन, फिर तर्पण और मार्जन
कवच का अपना हवन नहीं होता: अंतिम दिन 108 या 1008 नामों से हवन, फिर तर्पण और मार्जन
वक्ता कहते हैं कि कवच का अपना हवन नहीं होता — अंतिम दिन हवन बटुक भैरव के 108 नामों या 1008 सहस्त्रनामावली से किया जाता है, जिसमें मुख्य आहुति सामान्य शाकल्य में मधु और पंचमेवा मिलाकर पौष्टिक हवन के रूप में दी जाती है, और फिर पूर्णाहुति होती है। इसके बाद तर्पण और मार्जन केवल उसी नामावली के प्रथम नाम से किए जाते हैं — 108 तर्पण और 10 मार्जन।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि कवच का अपना हवन नहीं होता है। इसके बजाय अंतिम दिन बटुक भैरव के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। (108 नाम) से या 1008 सहस्त्रनामावली से हवन किया जा सकता है — वे बताते हैं कि हवन की विधि चैनल पर और Facebook पेज पर, एक-दो वर्ष पहले के एक अलग वीडियो में बताई गई है, और उसका पूरा मंत्र पीडीएफ में दिया गया है। मुख्य आहुति के लिए, जो भैरव जी की आरंभिक आहुतियों के पश्चात दी जाती है, वे कहते हैं कि सामान्य शाकल्यहवन में प्रयुक्त एक मानक जड़ी-बूटी मिश्रण। आदि में मधु और साथ में पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है। — इन सभी का मिश्रण करके पौष्टिक हवन करेंगे। 108 नाम या 1008 नाम से पूर्ण मंत्र की आहुति देने के बाद, जैसा पूरा विधान है, पूर्णाहुति करेंगे। उसके बाद तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन केवल प्रथम मंत्र से किए जाते हैं — जैसे "बटुक भैरवाय नमः", "काल संकर्षणाय नमः", "रुद्रावताराय नमः" — उनके ऐसे अनेक नाम हैं। सहस्त्रनामावली या 108 नाम में जो पहला नाम होगा, उसी नाम से आहुतियां देने के बाद 108 बार तर्पण और 10 मार्जन किए जाते हैं।
भोजपत्र पर कवच को अभिमंत्रित करना और चांदी के कवच में भुजा पर धारण करना
भोजपत्र पर छोटा-छोटा लिखकर, 108 और पाठ से अभिमंत्रित करके, चांदी के कवच में भुजा पर धारण
वक्ता कहते हैं कि जिसे स्वयं लिखना आता हो, वह मूल कवच के ग्यारह श्लोकों को भोजपत्र पर छोटा-छोटा लिखकर, पुनः 108 पाठ और हवन आदि करके उसे अभिमंत्रित और जागृत करे, और चांदी के कवच में डालकर पीले धागे या चांदी की चैन में धारण करे। स्त्रियां इसे दाहिनी भुजा में और पुरुष बाईं भुजा में पहनते हैं — वे कहते हैं कि यहां अपोजिट चलेगा।
वक्ता बताते हैं कि इस कवच को धारण योग्य रूप में कैसे तैयार करें। यदि साधक को स्वयं लिखना आता हो, तो वह एक भोजपत्र (भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में।) पर केवल मूल कवच के जो ग्यारह श्लोक हैं उन्हें छोटा-छोटा लिखे, और फिर पुनः 108 पाठ करके, हवन आदि करके उसे अभिमंत्रित और जागृत करे। फिर उसे चांदी के कवच में डालकर पीले धागे में या चांदी की चैन में पहना जा सकता है; वे कहते हैं कि इससे आपका शरीर पूर्ण रूप से सुरक्षित होगा। स्त्रियां इसे गले में न पहनकर अपनी दाहिनी भुजा में पहनें, और पुरुष अपनी बाईं भुजा में — वे कहते हैं कि यहां अपोजिट चलेगा: पुरुष का बाईं भुजा रहेगा, स्त्रियों की दाहिनी भुजा। कवच को सिद्ध करके इस प्रकार धारण करने पर, वे कहते हैं, हर जगह जय भी मिलती है, सुरक्षा भी प्राप्त होती है, और आत्मविश्वास सातवें आसमान पर रहता है।
इस कवच से किसी अन्य की सुरक्षा या ग्रह शांति के लिए संकल्प लेना
दूसरे के निमित्त उनके नाम से संकल्प लेकर पाठ, ग्रह शांति सहित
वक्ता कहते हैं कि जिनके भी निमित्त आप इस कवच का पाठ करना चाहते हैं, उनके नाम से संकल्प करके पाठ करेंगे तो वे जहां कहीं भी हों, वहां उनकी सुरक्षा होगी। ग्रह शांति के लिए ग्रह के निमित्त संकल्प लिया जाता है, जैसे किसी की राहु की महादशा चल रही हो तो उसमें शांति हो, वे शीघ्रातिशीघ्र स्वस्थ हो जाएं और रोग मुक्त हों।
वक्ता इस कवच की दूसरों के लिए प्रयोग विधि बताते हैं। जिनके भी निमित्त आप इस कवच का पाठ करना चाहते हैं, उनके नाम से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके पाठ करेंगे; वह व्यक्ति जहां कहीं भी है, वहां उसकी सुरक्षा होगी। ग्रह शांति के लिए, वे कहते हैं, ग्रह के निमित्त संकल्प लिया जाता है: मान लीजिए किसी की राहु की महादशाज्योतिष में किसी एक ग्रह की दीर्घ शासन-अवधि, जिसमें उसी ग्रह के फल प्रमुख रूप से प्रकट होते हैं। चल रही है और परेशानी हो रही है — तो संकल्प लेंगे कि उस व्यक्ति की राहु की महादशा में शांति हो, शीघ्रातिशीघ्र उनके शरीर में स्वास्थ्य हो, वे स्वस्थ हो जाएं, रोग मुक्त हों, और इसी निमित्त हम यह पाठ करने का संकल्प ले रहे हैं। इसके बाद पाठ करने से, वे कहते हैं, यह होता है।
कवच के उन्नत प्रयोग — अभिमंत्रित जल, आवेश में भस्म, और बंधन — जिनमें विशेषज्ञ का संरक्षण चाहिए
अभिमंत्रित जल, अभिमंत्रित भस्म और बंधन — ये अनुभवी साधक के विषय हैं, नए साधक के नहीं
वक्ता कहते हैं कि किसी को अभिमंत्रण करके जल पिलाना थोड़ा अलग विषय हो जाता है, प्रत्येक व्यक्ति को यह नहीं करना चाहिए, और यह कार्य किसी एक्सपर्टाइज व्यक्ति के संरक्षण में ही करना चाहिए। जिस पर आवेश आया हो, उसके लिए अभिमंत्रित भस्म या तांबे के लोटे में अभिमंत्रित जल घर पर या उस व्यक्ति पर छिड़कने से मुक्ति मिलती है। वे कहते हैं कि इसमें बंधन आदि का भी पूरा विषय है, परंतु वे प्रयोगिक विषय हैं और किसी गुरु के संरक्षण में ही किए जाने चाहिए।
वक्ता इस कवच के और आगे के प्रयोग बताते हैं, साथ ही बिना मार्गदर्शन उन्हें करने से सावधान करते हैं। किसी को अभिमंत्रण करके जल पिलाना एक ऐसी ही अवस्था है, परंतु वे कहते हैं कि यह थोड़ा अलग विषय हो जाता है और प्रत्येक व्यक्ति को यह नहीं करना चाहिए — यह कार्य किसी एक्सपर्टाइज व्यक्ति के संरक्षण में ही करें। यदि किसी के ऊपर आवेश आया हो, तो वे कहते हैं कि इससे अभिमंत्रित की हुई भस्म (भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है।) — जो पाठ पूर्ण करने के बाद किए गए हवन से मिलती है — या पाठ करते समय तांबे के लोटे में जल भरकर अभिमंत्रित किया हुआ जल, घर पर छिड़कने से या जिस व्यक्ति पर आवेश है उस पर छिड़कने से उसे मुक्ति मिलती है। वे यह भी कहते हैं कि इसमें बंधन आदि का भी पूरा विषय है, परंतु वह सब प्रयोगिक विषय है, और जानकार व्यक्ति को भी वह सब किसी गुरु के संरक्षण में ही करना चाहिए।
कवच के सामान्य पाठ और ध्वनि से घर-परिवार की सुरक्षा
सामान्य पाठ और उसकी ध्वनि मात्र से घर-परिवार की सुरक्षा बताई गई है
वक्ता अंत में कहते हैं कि सामान्यतः पाठ और ध्वनि आदि करने से घर-परिवार की सुरक्षा हो जाती है, और आशा करते हैं कि सभी सनातनी भगवान बटुक भैरव के इस कवच से लाभ उठाएंगे।
चर्चा समाप्त करते हुए वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः पाठ और उसकी ध्वनि आदि करने से घर-परिवार की सुरक्षा हो जाती है। वे आशा व्यक्त करते हैं कि सभी सनातनी भगवान बटुक भैरव के इस कवच से लाभ उठाएंगे।
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