बटुक भैरव ब्रह्म कवच: सिद्धि विधि और प्रयोग विधि
बटुक भैरव ब्रह्म कवच का पाठ, अभिमंत्रण और धारण — सुरक्षा के लिए पूरी विधि।
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घर में भैरव पूजन: कौन सा स्वरूप उचित है, और भैरव कवच सिद्ध करके क्यों रखना चाहिए
उग्र स्वरूप बाहर; कुल भैरव या बटुक भैरव घर में
वक्ता कहते हैं कि सभी सनातन धर्मियों को घर में भैरव जी का पूजन अवश्य करना चाहिए, और यह शंका कि घर में भैरव पूजा नहीं हो सकती, सबसे पहले दूर कर लेनी चाहिए; बस यह जानकारी होनी चाहिए कि किस स्वरूप की पूजा करनी है। भैरव के उग्र (उग्रात्मक) स्वरूपों का पूजन घर पर नहीं किया जाता। जिसे अपने कुल भैरव की जानकारी हो, वह उनका पूजन करे; अन्यथा घर में बटुक भैरव का पूजन अवश्य करे। वे जोड़ते हैं कि घर का कोई एक सदस्य — विशेषकर घर का मुखिया, या जो साधक हो — जीवन में सुरक्षा के लिए भैरव जी का कवच सिद्ध करके अवश्य रखे; भैरव कवच अनेक हैं, सभी अपने आप में सामर्थ्यवान हैं, और जो वे यहाँ बता रहे हैं वह बटुक भैरव ब्रह्म कवच है।
वक्ता कहते हैं कि हम सभी सनातन धर्मियों को घर में भैरव जी का पूजन अवश्य करना चाहिए। यह शंका कि घर में भैरव पूजा नहीं कर सकते, सबसे पहले दूर कर लेनी चाहिए। हाँ, वे कहते हैं, यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि किस स्वरूप की पूजा करनी है: भगवान भैरव के उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। स्वरूपों का पूजन घर पर नहीं करेंगे। उनका नियम सरल है। यदि व्यक्ति अपने कुल भैरव की जानकारी रखता है तो उनका पूजन करे। अन्यथा घर में भगवान बटुक भैरव का पूजन अवश्य करे। बटुक भैरव पूजन के संदर्भ में वे एक विषय उठाते हैं: उनके कवच की जागृति। घर का कोई एक सदस्य — विशेषकर घर का मुखिया, या श्रोता स्वयं यदि साधक हैं — जीवन में सुरक्षा के निमित्त भैरव जी का कवच सिद्ध करके अवश्य रखे। वे कहते हैं कि भैरव कवच अनेक प्रकार के हैं, सबकी अपनी-अपनी महत्ता है और सभी अपने आप में सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं; कोई भी सिद्ध करके उसका लाभ लिया जा सकता है। जो वे यहाँ रख रहे हैं वह बटुक भैरव जी का ब्रह्म कवच है।
अभिचार, ब्रह्म पिशाच, मसान और शाकिनी के विरुद्ध बटुक भैरव ब्रह्म कवच
सिद्धि पर इस कवच का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव ब्रह्म कवच का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग उस व्यक्ति के लिए है जो अभिचार से ग्रसित हो — विशेषकर ब्रह्म पिशाच, मसान या शाकिनी से, जिसे लोग चुड़ैल या dakini भी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति यदि इस कवच की सिद्धि कर लेता है तो, वे कहते हैं, बटुक भैरव की कृपा से इन सबसे उसकी अवश्य मुक्ति हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग तब है जब कोई व्यक्ति अभिचार आदि से ग्रसित हो। अभिचार में वे विशेष रूप से इन्हें गिनाते हैं: ब्रह्म पिशाच, मसान और शाकिनी — या जिसे लोग चुड़ैललोकभाषा में बाधा देने वाली स्त्री-प्रेत के लिए प्रयुक्त नाम। या dakini कहते हैं। इनमें से किसी से पीड़ित व्यक्ति यदि इस कवच की सिद्धि कर लेता है तो, वे कहते हैं, भगवान बटुक भैरव की कृपा से उसे इनसे अवश्य मुक्ति मिल जाती है।
मसान दोष का लक्षण: बार-बार छोटे बच्चों, प्रसव या स्तनपान के दृश्य दिखना
बार-बार दिखने वाला दृश्य जो मसान की ओर संकेत करता है
वक्ता कहते हैं कि जब घर का कोई स्त्री या पुरुष बार-बार स्वयं को छोटे बच्चों से घिरा देखे — या कोई स्त्री, विवाहित हो या अविवाहित, अपनी गोद में बच्चा देखे, बार-बार स्वयं का प्रसव होते देखे, या स्वयं को स्तनपान कराते देखे — तो यह कहीं न कहीं मसान दोष का लक्षण है। ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, बटुक भैरव ब्रह्म कवच का आश्रय लेने से भैरव की कृपा से पूर्ण रक्षण होता है।
वक्ता एक लक्षण बताते हैं जिस पर ध्यान देना चाहिए। यदि घर का कोई स्त्री या पुरुष बार-बार स्वयं को छोटे बच्चों से घिरा हुआ देखे तो यह संकेत है। स्त्रियों के लिए — विवाहित हों या अविवाहित — दृश्य और स्पष्ट है: अपनी गोद में बच्चा देखना, स्वयं की डिलीवरी होते देखना, बार-बार अपना प्रसव होते देखना, या स्वयं को स्तनपान कराते देखना। वे कहते हैं कि यह कहीं न कहीं मसान दोष का लक्षण होता है। ऐसी अवस्था में यदि बटुक भैरव जी के ब्रह्म कवच का आश्रय लिया जाए तो उनकी कृपा से पूर्ण रूप से रक्षण होता है।
गर्भवती स्त्री की रक्षा बटुक भैरव ब्रह्म कवच से
सरसों तेल के दीप के साथ सामान्य पाठ ही पर्याप्त
वक्ता कहते हैं कि यदि घर की गर्भवती स्त्री पर गर्भावस्था में किसी प्रकार का प्रयोग हो रहा हो, पेट में परेशानी हो रही हो, या बहुत स्वप्न आ रहे हों, तो बटुक भैरव ब्रह्म कवच उसका पूर्ण रक्षण करता है। यह इस पर निर्भर नहीं कि कवच का अनुष्ठान किया है या नहीं: सरसों तेल का दीप प्रज्वलित करके इसका सामान्य पाठ भी उसका पूर्ण रक्षण करता है।
वक्ता घर की गर्भवती स्त्री का प्रसंग लेते हैं। गर्भावस्था में यदि उस पर किसी प्रकार का प्रयोग हो रहा हो, पेट में परेशानी हो रही हो, या बहुत स्वप्न आ रहे हों, तो इसका उपाय वे यह कवच बताते हैं। वे कहते हैं कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि बटुक भैरव ब्रह्म कवच का अनुष्ठान पहले कर रखा है या नहीं। सरसों तेल का दीप प्रज्वलित करके इसका सामान्य पाठ करने से भी उसका पूर्ण रूप से रक्षण होता है।
मारक दशा और दुर्घटना के भय में संकल्प सहित बटुक भैरव ब्रह्म कवच
संकटपूर्ण दशा के लिए तुरंत प्रभाव देने वाला सामर्थ्यशाली कवच
वक्ता कहते हैं कि यह कवच अपने आप में अति सामर्थ्यशाली है और तुरंत प्रभाव देता है। यदि जन्म कुंडली या लग्न कुंडली में मारकेश की दशा या अंतर्दशा चल रही हो, या मारकेश के किसी प्रभाव से अपघात और दुर्घटना की आशंका हो, तो इस विषय का संकल्प लेकर कवच का पाठ करना चाहिए; उससे भी रक्षण होता है।
वक्ता कहते हैं कि यह कवच अपने आप में अति सामर्थ्यशाली और तुरंत प्रभाव देने वाला है। फिर वे इसका एक ज्योतिषीय प्रयोग बताते हैं। यदि जन्म कुंडली या लग्न कुंडली में मारकेश की दशा या अंतर्दशा चल रही हो, या मारकेश का कोई प्रभाव हो जिसके कारण जीवन में अपघात, दुर्घटना आदि की आशंका हो, तो इस विषय का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर कवच का पाठ किया जाता है। इससे, वे कहते हैं, रक्षण होता है।
शनि-राहु पिशाच योग: उसके प्रभाव और उपाय के रूप में बटुक भैरव ब्रह्म कवच
अभिचार को न्योता देने वाली कुंडली के विरुद्ध महाब्रह्मास्त्र
वक्ता कहते हैं कि यदि कुंडली में कहीं भी शनि और राहु का योग बना हो — एक ही भाव में, एक ही राशि में, या दृष्टि से — तो पैशाचिक योग बनता है। जब वह फलीभूत होता है तो अभिचार की अवस्था बनती है या रास्ते-घाट से चीजें लग जाती हैं; नकारात्मक ऊर्जाएँ परेशान करती हैं, व्यक्ति भ्रमित होता है, अवसाद में जाता है, और किसी नकारात्मक शक्ति से आवेशित भी हो सकता है। इन सभी परिस्थितियों में, वे कहते हैं, बटुक भैरव ब्रह्म कवच महाब्रह्मास्त्र है जो झटके से और तीव्रता से प्रभाव देता है।
वक्ता एक कुंडली योग की बात करते हैं। यदि कुंडली में कहीं भी शनि और राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। का योग बना हुआ हो — दोनों एक ही भाव में हों, एक ही राशि में हों, या दृष्टि से मिल रहे हों — तो पैशाचिक योग उत्पन्न होता है। जब कभी यह पिशाच योग फलीभूत होता है, वे कहते हैं, तो अभिचार की अवस्था बनती है, या रास्ते-घाट से व्यक्ति को चीजें लग जाती हैं। नकारात्मक ऊर्जाएँ परेशान करती हैं, व्यक्ति भ्रमित होता है, अवसाद की अवस्था बन जाती है, और वह किसी नकारात्मक शक्ति से आवेशित भी हो सकता है। इन सभी परिस्थितियों में, वे कहते हैं, बटुक भैरव ब्रह्म कवच अपने आप में महाब्रह्मास्त्र है। यह बड़े झटके से और बड़ी तीव्रता से प्रभाव देता है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच कितनी बार पढ़ें, और इसकी सिद्धि का समय-विधान
नित्य कोई भी संख्या; पर्व काल, या कृष्ण अष्टमी से चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि यह कवच सामान्य रूप से प्रतिदिन जितना चाहें उतना पढ़ा जा सकता है — एक, पाँच, ग्यारह या इक्कीस पाठ — इसमें कोई दिक्कत नहीं; परंतु इसकी जागृति करके, सिद्धि करके फिर नित्य पाठ करना कहीं उत्तम है। सिद्धि के लिए किसी भी पर्व काल में — नवरात्रि, महाशिवरात्रि, ग्रहण काल, दीपावली, होली — पाठ आरंभ करें और उस समय में जितनी आवृत्ति हो सके करें। पर्व काल न हो तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके चतुर्दशी तक प्रतिदिन 121, 100 या 27 पाठ, जितना हो सके, करें; शाम या निशा काल में करना सर्वोत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्य रूप से यह कवच प्रतिदिन जैसे चाहें पढ़ सकते हैं — एक पाठ, पाँच, ग्यारह, इक्कीस, जितना चाहें। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। परंतु यदि इस कवच की जागृति कर लें, सिद्धि कर लें और उसके बाद नित्य पाठ करें तो अत्यंत उत्तम होता है। वे कहते हैं कि किसी भी पर्व काल में पाठ आरंभ कर दें: कोई नवरात्रि आ रही हो, महाशिवरात्रि आ रही हो, ग्रहण काल पड़ रहा हो, दीपावली, होली आदि का समय हो। इन समयों में कवच की जितनी अधिक आवृत्ति हो सके — जितना पाठ-जप कर लें — उतना ही श्रेष्ठ है। अन्यथा, यदि सामान्य रूप से सिद्ध करना हो और कोई पर्व काल न हो, तो कृष्ण पक्ष की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। से आरंभ करके चतुर्दशी तक प्रतिदिन 121 पाठ, 100 पाठ या 27 पाठ — जितना हो सके — करें। शाम को या निशा काल में करें तो सर्वोत्तम है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच के आसन के नियम: खानपान, आरंभिक विधि, वस्त्र, कौन पढ़ सकता है, दिशा और समर्पण
हल्के नियम; कोई भी कर सकता है
वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखें: सात्विक भोजन और ब्रह्मचर्य; दिन में खाना खा लिया हो तो भी रात को स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पाठ कर सकते हैं। आरंभिक विषय — आसन पर बैठना, आचमन, प्राणायाम आता हो तो, शिखा बंधन, संकल्प — कर लेने चाहिए। वस्त्र लाल, पीले या श्वेत हो सकते हैं; स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े, विवाहिता या अविवाहिता, सभी इसका पाठ कर सकते हैं। दिशा, विशेषकर सिद्धि के समय, पूर्व या उत्तर रहे; कवच का समर्पण बटुक भैरव के छायाचित्र या श्री विग्रह पर उनके पूजन के बाद हो, अन्यथा शिवलिंग पर; और गुरु व गणपति स्मरण के बाद पाठ आरंभ हो।
खानपान और आचरण पर वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखें: सात्विक भोजन रहे और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन रहे। दिन में खाना खा लिया हो तो भी रात को स्नान आदि करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पाठ बिल्कुल कर सकते हैं। आरंभिक जो सारे विषय होते हैं, वे कर लेने चाहिए: आसन पर बैठना, आचमन, प्राणायामजप से पूर्व की क्रमबद्ध तैयारी में किया जाने वाला श्वास-नियमन। आता हो तो वह, शिखा बंधन, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेना। वस्त्र का रंग लाल, पीला या श्वेत — कोई भी धारण कर सकते हैं। वे कहते हैं कि स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सभी इस कवच का पाठ कर सकते हैं; विवाहिता, अविवाहिता सभी कर सकती हैं। पाठ के समय, और विशेषकर सिद्ध करने के समय, दिशा पूर्व या उत्तर रखें। यदि भगवान बटुक भैरव का छायाचित्र रखते हैं या उनका श्री विग्रह स्थापित है, तो कवच का समर्पण उन्हीं पर होगा और उससे पहले उनका पूजन होगा; अन्यथा भगवान शिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर समर्पण करेंगे। गुरु और गणपति स्मरण के बाद बटुक भैरव ब्रह्म कवच का पाठ आरंभ करेंगे।
बार-बार आवृत्ति के लिए बटुक भैरव ब्रह्म कवच की संरचना: पूर्व पीठिका, ग्यारह श्लोकों का मूल कवच, फल श्रुति
केवल मध्य भाग दोहराया जाता है, दसवें से इक्कीसवें श्लोक तक
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म कवच के तीन भाग हैं — पूर्व पीठिका, मूल पाठ और फलश्रुति — और अधिक बार जाप करते समय हर बार पूरा पाठ करने की आवश्यकता नहीं: पूर्व पीठिका आरंभ में एक बार पढ़ी जाती है, मूल कवच की बार-बार आवृत्ति होती है, और अंतिम पाठ के साथ फल श्रुति पढ़ी जाती है। उनके दिए गए पीडीएफ में विनियोग हाथ में जल लेकर किया जाता है, और उसके बाद का दसवाँ श्लोक मूल कवच का पहला श्लोक है, जो इक्कीसवें श्लोक 'श्री ब्रह्म कवचं कवचं भैरवस्य प्रकीर्तितम्' तक चलता है — लगभग ग्यारह श्लोक। यही ग्यारह श्लोक दोहराकर 108, 27 या जितनी चाहें आवृत्ति पूरी की जाती है।
वक्ता समझाते हैं कि ब्रह्म कवच के तीन भाग हैं: पूर्व पीठिका, मूल पाठ और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है।। जब कभी इसका अधिक बार जाप करना हो तो हर बार पूरा पाठ करने की आवश्यकता नहीं है। पूर्व पीठिका केवल पहली बार पढ़ते हैं; मूल कवच की बार-बार आवृत्ति होती है; और अंतिम पाठ करते समय फल श्रुति पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि कवच का पीडीएफ वीडियो के डिस्क्रिप्शन या कमेंट के लिंक से मिल जाता है। उस पीडीएफ से पढ़ने वाले के लिए वे सटीक सीमाएँ बताते हैं। पूर्व पीठिका एक बार पढ़ लेने के बाद मूल कवच शुरू होता है: विनियोग के बाद वाला दसवाँ श्लोक मूल कवच का प्रथम श्लोक है। विनियोग स्वयं हाथ में जल लेकर किया जाता है। उस दसवें श्लोक से इक्कीसवें श्लोक तक पाठ करते हैं, जो 'श्री ब्रह्म कवचं कवचं भैरवस्य प्रकीर्तितम्' पर समाप्त होता है। यहाँ तक मूल कवच है — लगभग ग्यारह श्लोक। यही ग्यारह श्लोक बार-बार दोहराए जाते हैं। इस तरह, वे कहते हैं, पूरी 108 आवृत्ति, या 27, या जितनी करनी हो, पूर्ण होती है।
बटुक भैरव का मूल मंत्र इस कवच पाठ से क्यों हटाया गया
श्रापित, कीलित मंत्र: केवल गुरु से प्राप्त होने पर
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने बटुक भैरव के मूल मंत्र की आवृत्ति इस कवच पाठ में जान-बूझकर नहीं रखी है, और जो इस पर कुतर्क करना चाहें उनके लिए उनके पास कोई जवाब नहीं है। उनके अनुसार वह मंत्र कहीं न कहीं श्रापित मंत्र है; उसका अध्ययन शक्ति संगम आदि में किया जा सकता है, और गुरु से उपदेश मिलने पर निष्कीलन विधान करके ही उसका स्वतंत्र जाप होता है। वे किसी को करने या न करने को नहीं कहते — यह उसकी इच्छा है — पर वे नहीं चाहते कि सामान्य, पहले से ग्रस्त जन एक श्रापित, कीलित विषय को करने जाएँ। चूँकि वह मंत्र मूल कवच के अलग-अलग भागों में स्वयं दोहराया जाता है और उससे भैरव रक्षण करते हैं, इसलिए उसे अलग से करने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
वक्ता अपने दिए हुए पाठ के बारे में एक विषय उठाते हैं: बटुक भैरव का मूल मंत्र। उसकी आवृत्ति उन्होंने इस कवच में नहीं रखी है। वे साफ कहते हैं कि इस पर कोई कंट्रोवर्सी या कुतर्क करना चाहे तो उनके पास उसका कोई जवाब नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसा विदित है कि जब कोई इस विषय का अध्ययन करता है और गुरु मुख से मंत्र प्राप्त करता है, तब कहा जाता है कि वह मंत्र किया जा सकता है। सामान्य रूप से उस मंत्र की पूरी आवृत्ति कवच में वैसे भी आ जाती है, इसलिए उसे अलग से करने की कोई विशेष अनिवार्यता नहीं है। उन्होंने उसे इसलिए हटाया क्योंकि लोग बाद में पूछेंगे कि उनकी किताब में यह मंत्र दिया है और यहाँ नहीं — और उनका उत्तर है कि वह मंत्र कहीं न कहीं श्रापित मंत्र रहता है। उसका अध्ययन शक्ति संगम आदि में किया जा सकता है; गुरु द्वारा उपदेश मिलने पर उसका निष्कीलन विधान करके ही उसका स्वतंत्र जाप किया जाता है। वे कहते हैं कि यह श्रोता का अपना विषय है। करो या मत करो — ऐसी उनकी कोई राय नहीं है, यह उसकी इच्छा है। वे चाहते हैं कि सामान्य जन, जो पहले से ग्रस्त हैं, किसी श्रापित, कीलित विषय को करने न जाएँ; ऐसा कोई विषय हो तो उसे हटा दिया गया है। मूल कवच में वह मंत्र स्वयं अलग-अलग भाग में दोहराया जाता है और उससे भगवान भैरव रक्षण करते हैं, इसलिए अलग से करने की कोई अनिवार्यता नहीं बनती।
फूल, बेल पत्र या अग्नि में लौंग से बटुक भैरव ब्रह्म कवच की आवृत्ति गिनना
हर वस्तु पर दस पाठ, अंतिम पर आठ
वक्ता कहते हैं कि आवृत्ति फूलों पर गिनी जा सकती है: 108 फूल लें या 11, हर फूल पर दस पाठ और अंतिम फूल पर आठ पाठ करके समर्पित करें। बेल पत्र पर भी पाठ करके इसी तरह समर्पित किया जा सकता है। या 11 लौंग लें, हर लौंग पर दस पाठ और अंतिम पर आठ, उन्हें मिट्टी के पात्र में कपूर के साथ रखकर भैरव जी या शिवलिंग के समक्ष प्रज्वलित करें और प्रार्थना करें कि यह आपको समर्पित है, स्वीकार करें। इस तरह भी, वे कहते हैं, कवच की सिद्धि होती है।
आवृत्ति की गिनती रखने के लिए वक्ता कहते हैं कि पुष्प का सहयोग लिया जा सकता है। 108 फूल लें, या 11 फूल; हर फूल पर दस-दस पाठ करें और अंतिम फूल पर आठ पाठ करके समर्पित करें। यही बेल पत्र से भी हो सकता है: पत्रों पर पाठ करके उन्हें समर्पित करें। या लौंग और अग्नि से। 11 लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। लें, हर लौंग पर दस-दस पाठ और अंतिम लौंग पर आठ, फिर उन्हें मिट्टी के पात्र में कपूर के साथ रखकर भगवान भैरव जी या शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के समक्ष प्रज्वलित कर दें और प्रार्थना करें कि भगवान, यह आपको समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। इस तरह भी, वे कहते हैं, कवच की सिद्धि होती है।
कवच अनुष्ठान में बटुक भैरव का नैवेद्य, और उसे कौन ग्रहण कर सकता है
घर का पूजन: घर की स्त्रियाँ भी ग्रहण करती हैं
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी का नैवेद्य बूंदी के लड्डू, मिश्री, या घर पर बना बढ़िया दही बड़ा हो सकता है; जलेबी, मिश्री या लड्डू बाहर से खरीदकर भी ला सकते हैं। जो नैवेद्य लगेगा उसे स्त्री-पुरुष सभी ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि बटुक भैरव का यह नैवेद्य घर का पूजन है — ऐसा नहीं है कि घर की कोई स्त्री उसे ग्रहण न करे।
पाठ के बाद वक्ता भगवान भैरव के नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। की बात करते हैं। या तो बूंदी वाले लड्डू भोग में लगाएँ, या मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है।, या फिर घर पर स्वयं बनाया हुआ बढ़िया दही बड़ा। बाकी जलेबी, मिश्री या लड्डू बाहर से खरीदकर भी लगा सकते हैं। वे कहते हैं कि जो नैवेद्य लगाया जाएगा उसे स्त्री-पुरुष सभी स्वीकार कर सकते हैं — क्योंकि बटुक भैरव जी का यह नैवेद्य घर का पूजन है। इसलिए ऐसा नहीं है कि इस नैवेद्य को घर की कोई स्त्री स्वीकार न करे; ऐसा कोई विषय यहाँ नहीं है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच अनुष्ठान में जीव सेवा और नित्य पंचबलि
जिससे भैरव तृप्त होते हैं और कृपा शीघ्र मिलती है
वक्ता कहते हैं कि जब तक इस कवच का अनुष्ठान चले, जीव सेवा बड़ी अनिवार्य है — और वैसे भी पंचबलि प्रतिदिन करनी चाहिए। इससे भैरव जी की तृप्ति होती है और कृपा शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि प्रतिदिन, जब तक इस कवच का अनुष्ठान करें — और ऐसे भी पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ। प्रतिदिन करनी चाहिए — इस कवच में जीव सेवा बड़ी अनिवार्य है। करनी चाहिए। इससे, वे कहते हैं, भगवान भैरव की तृप्ति होती है और कृपा शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त होती है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच सिद्ध होने पर रक्षण: स्मरण मात्र से, और 11,000 आवृत्ति के बाद धर्म युक्त जीवन पर
अधर्म पर कोई भी शक्ति साथ छोड़ देती है, जैसे रावण का
वक्ता कहते हैं कि यह कवच सिद्ध हो जाने पर स्मरण मात्र से भगवान बटुक भैरव अपने अन्य-अन्य गणों को आदेश देकर तुरंत रक्षा करवाते हैं। जब मूल कवच की आवृत्ति 11,000 से ऊपर हो जाए तो जान लें कि आप भैरव जी के प्रत्यक्ष संरक्षण में हैं — बशर्ते जीवन धर्म युक्त हो, अधर्म युक्त नहीं। अधर्म करेंगे तो कोई भी शक्ति साथ छोड़ देगी: भगवान शिव ने रावण का साथ छोड़ा, भगवती तारा ने रावण का साथ छोड़ा, तो आप और हम कौन हैं। वे कहते हैं, धर्म युक्त काम करें, तो जिस कवच का महापुरश्चरण किया है वह अवश्य रक्षा करेगा।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का एक विषय यह है कि इसे सिद्ध कर लेने के बाद जब कभी भी आप स्मरण मात्र करेंगे, भगवान बटुक भैरव अपने अन्य-अन्य गणों को आदेश देकर तुरंत आपकी रक्षा करवाते हैं। और जब कवच की मूल आवृत्ति 11,000 से ऊपर हो जाती है तो जान लीजिए कि आप भैरव जी के प्रत्यक्ष संरक्षण में अपना जीवन यापन कर रहे हैं — धर्म युक्त जीवन यापन। अधर्म नहीं। अधर्म करेंगे तो, वे कहते हैं, कोई भी शक्ति हो, साथ छोड़ देगी। भगवान शिव ने जब रावण का साथ छोड़ दिया, भगवती तारा ने जब रावण का साथ छोड़ दिया, तो आप और हम कौन होते हैं? इसलिए ध्यान रखें, वे कहते हैं: धर्म युक्त काम करते हैं और कवच आदि का महापुरश्चरण किया है तो आपकी रक्षा अवश्य होगी।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच की सिद्धि के बाद हवन, तर्पण और मार्जन
कवच का हवन नहीं होता: 108 या 1008 नामों से करें
वक्ता कहते हैं कि कवच का अपना हवन नहीं होता; अंतिम दिन बटुक भैरव जी के 108 नाम या 1008 नामों की सहस्रनामावली से हवन किया जाता है, जिसकी विधि चैनल पर अलग से बताई गई है। मुख्य आहुति में, भैरव जी की आरंभिक आहुतियों के बाद, सामान्य शाकल्य में मधु और पंचमेवा मिलाकर पौष्टिक हवन करें; 108 या 1008 नामों से पूरी आहुति देने के बाद पूर्णाहुति करें। फिर केवल प्रथम नाम से — जैसे 'बटुक भैरवाय नमः' — तर्पण और मार्जन करें; हजार आहुति दी हो तो 108 तर्पण और 10 मार्जन। इस तरह कवच सिद्ध हो जाता है।
सिद्धि पूर्ण होने पर हवन का क्या विधान रहेगा, इस पर वक्ता कहते हैं कि कवच का हवन नहीं होता। इसके स्थान पर अंतिम दिन भगवान बटुक भैरव जी के 108 नाम से या 1008 नामों की सहस्रनामावली से हवन किया जा सकता है। हवन की विधि, वे कहते हैं, चैनल और फेसबुक पेज पर पहले बताई जा चुकी है, पीडीएफ में सारे मंत्र दिए हैं, एक-दो साल पहले का अलग हवन वीडियो है; उसे देखें। उस हवन में भैरव जी की आरंभिक आहुतियों के बाद जब मुख्य आहुति देनी हो तो सामान्य शाकल्य में मधु और पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है। मिलाकर पौष्टिक हवन करें। 108 या 1008 नामों से पूर्ण मंत्र की आहुति देने के बाद जैसा पूरा विधान है वैसे पूर्णाहुति करें। उसके बाद केवल प्रथम मंत्र से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जनहवन-तर्पण-मार्जन की अनुष्ठान त्रयी को पूर्ण करने वाला पवित्र जल का शुद्धिकरण-छिड़काव। करें। वे नामों के उदाहरण देते हैं — 'बटुक भैरवाय नमः', 'काल संकर्षणाय नमः', 'रुद्रावताराय नमः', ऐसे अनेक नाम — और कहते हैं कि सहस्रनामावली या 108 नामों में जो पहला नाम हो, बाद में उसी नाम से तर्पण-मार्जन करें: जैसे हजार आहुति दी हो तो 108 बार तर्पण और 10 मार्जन। इस तरह, वे कहते हैं, कवच सिद्ध हो जाता है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच धारण करना: भोजपत्र पर लिखना, अभिमंत्रित करना, और स्त्री-पुरुष के लिए भुजा
पुरुष की बाईं भुजा, स्त्री की दाहिनी — विपरीत
वक्ता कहते हैं कि यदि स्वयं लिखना आता हो तो मूल कवच के ग्यारह श्लोक भोजपत्र पर छोटे-छोटे लिखकर पुनः 108 पाठ और हवन आदि से अभिमंत्रित व जागृत करें। चाँदी के कवच में डालकर पीले धागे या चाँदी की चेन में पहनें; इससे शरीर पूर्ण रूप से सुरक्षित होता है। गले में न पहनें तो स्त्री दाहिनी भुजा में और पुरुष बाईं भुजा में पहने — वे जोर देते हैं कि यहाँ विपरीत चलेगा। इस तरह सिद्ध करके पहनने से, वे कहते हैं, हर जगह जय और सुरक्षा मिलती है और आत्मविश्वास सातवें आसमान पर रहता है।
प्रयोग की बात पर वक्ता कहते हैं कि यदि स्वयं लिखना आता हो तो एक भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर केवल मूल कवच — ग्यारह श्लोक — छोटा-छोटा लिखें। फिर उस पर पुनः 108 पाठ करके और हवन आदि करके उसे अभिमंत्रित और जागृत करें। उसे चाँदी के कवच में डालकर पीले धागे में या चाँदी की चेन में पहन सकते हैं। इससे, वे कहते हैं, शरीर पूर्ण रूप से सुरक्षित होता है। स्त्री यदि गले में न पहनकर भुजा में पहने तो दाहिनी भुजा में, पुरुष अपनी बाईं भुजा में। वे ध्यान दिलाते हैं कि यहाँ विपरीत चलेगा: पुरुष की बाईं भुजा, स्त्रियों की दाहिनी भुजा। कवच सिद्ध करके वहाँ पहनने से, वे कहते हैं, हर तरफ हर जगह जय मिलती है, सुरक्षा भी मिलती है, और कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर रहता है।
संकल्प द्वारा दूसरे व्यक्ति या ग्रह शांति के लिए बटुक भैरव ब्रह्म कवच का पाठ
वे जहाँ भी हों, वहाँ उनकी सुरक्षा
वक्ता कहते हैं कि जिसके निमित्त भी इस कवच का पाठ करना हो, उसके नाम से संकल्प करके पाठ करें; वह जहाँ कहीं भी हो, वहाँ उसकी सुरक्षा होगी। ग्रह शांति के लिए ग्रह के निमित्त संकल्प लें — जैसे किसी की राहु की महादशा चल रही हो और परेशानी हो रही हो, तो संकल्प लें कि फलाने व्यक्ति की राहु महादशा में शांति हो, वह शीघ्रातिशीघ्र स्वस्थ हो, रोग मुक्त हो — और फिर पाठ करें; इससे, वे कहते हैं, होता है।
वक्ता दूसरों के लिए प्रयोग विधि बताते हैं। जिसके निमित्त भी इस कवच का पाठ करना हो, उसके नाम से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके पाठ करें; तो वह जहाँ कहीं भी हो, वहाँ उसकी सुरक्षा होगी। ग्रह शांतिपीड़ा देने वाले ग्रह की शांति के लिए किया जाने वाला कर्म। के लिए ग्रह के निमित्त संकल्प लें। मान लीजिए किसी की राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। की महादशाज्योतिष में किसी एक ग्रह की दीर्घ शासन-अवधि, जिसमें उसी ग्रह के फल प्रमुख रूप से प्रकट होते हैं। चल रही है और परेशानी हो रही है: तो संकल्प लें कि फलाने व्यक्ति की राहु की महादशा में शांति हो, शीघ्रातिशीघ्र उनके शरीर में स्वस्थ स्वास्थ्य हो, वे स्वस्थ हों, रोग मुक्त हों — इसके निमित्त हम यह पाठ करने का संकल्प ले रहे हैं। फिर पाठ करें, और इससे, वे कहते हैं, होता है।
बटुक भैरव ब्रह्म कवच के प्रायोगिक प्रयोग जानकार के संरक्षण में ही; सामान्य पाठ से घर की सुरक्षा
अभिमंत्रित जल, आवेश पर भस्म, बंधन: सबके लिए नहीं
वक्ता कहते हैं कि कवच से अभिमंत्रित जल किसी को पिलाना थोड़ा अलग विषय है जो हर व्यक्ति को नहीं करना चाहिए — किसी एक्सपर्ट व्यक्ति के संरक्षण में ही करें। किसी पर आवेश आया हो तो कवच के हवन की भस्म, या पाठ के समय ताँबे के लोटे में अभिमंत्रित जल, घर पर या आवेशित व्यक्ति पर छिड़कने से मुक्ति मिलती है। इस कवच में बंधन आदि का भी पूरा विषय है, पर वह सब प्रायोगिक विषय है, जानकार व्यक्ति के लिए, किसी गुरु के संरक्षण में। सामान्यतः, वे कहते हैं, पाठ और उसकी ध्वनि से ही घर-परिवार की सुरक्षा हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रित करके जल किसी को पिलाना बाद की अवस्था है और थोड़ा अलग विषय है — इसलिए हर व्यक्ति को यह नहीं करना चाहिए। यह कार्य किसी एक्सपर्ट व्यक्ति के संरक्षण में ही करें। किसी के ऊपर आवेशकिसी बाहरी सत्ता का व्यक्ति में प्रवेश, चाहे वह आमंत्रित हो अथवा बाधा के रूप में। आदि आया हो तो इस कवच से अभिमंत्रित भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। — पाठ के बाद किए हवन की भस्म — या पाठ के समय ताँबे के लोटे में भरकर अभिमंत्रित किया जल, घर पर छिड़कने से या जिस व्यक्ति पर आवेश है उस पर छिड़कने से उसे मुक्ति मिलती है। इसमें बंधन आदि का भी पूरा विषय है, वे कहते हैं, पर वह सब प्रायोगिक विषय है और जानकार व्यक्ति को किसी गुरु के संरक्षण में ही करना चाहिए। सामान्यतः पाठ और ध्वनि आदि करने से ही घर-परिवार की सुरक्षा हो जाती है।
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