बगलामुखी सावर हवन की सत्य घटना — पंचबली, गीता का 11वाँ अध्याय और वह तीन चरणों का क्रम जिसने पारिवारिक अभिचार तोड़ा

पंचबली, गीता के 11वें अध्याय और रात्रि के बगलामुखी सावर हवन से टूटे पारिवारिक अभिचार की सत्य घटना, और शत्रु के अंततः क्षमा माँगने से वक्ता क्या सीख निकालते हैं।

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The notes
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01

परिवार में निश्चित अंतराल पर मृत्यु: नारायण बलि, त्रिपिंडी और भागवत, और उनका वास्तविक खर्च

"लाखों" का हौवा बनाम सादगी से 50–60 हजार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:18–02:17

वक्ता कहते हैं कि जब किसी परिवार में निश्चित अंतराल पर — हर पाँचवें या दसवें साल — किसी की मृत्यु होती है, तो उसे प्रायः पितृ दोष मान लिया जाता है, और ऐसी बार-बार की अकाल मृत्यु का उपाय है कि अब तक की सभी अकाल मृत्युओं की एक साथ नारायण बलि, फिर त्रिपिंडी श्राद्ध, फिर भागवत करवा दी जाए। समाज ने इनका इतना हौवा बना दिया है कि लोगों को कहा जाता है इसमें लाखों लगेंगे — एक-एक लाख — पर वह तो बड़े आयोजन, पंडाल और सात दिन की कथा में लगता है; सादगी से कराएँ तो पूरा 11–12 दिन का क्रम लगभग 50–60 हजार में हो सकता है। फिर भी, वे कहते हैं, जो परिवार कर्ज लेकर अस्पताल के बिल भरते हैं उनके मन में इस पूजा-पाठ के प्रति ऐसा द्वेष भर दिया गया है कि वे इसे फालतू कहते हैं, और नियति ही ऐसे लोगों को भटकाकर और बाँधकर रखती है कि वे इसमें आगे नहीं बढ़ पाते।

02

अपने ही परिवार के सदस्य द्वारा कराए अभिचार की जड़ में धन का द्वेष

बीस हजार अधिक, और उसका सुख हमारा दुख

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:18–02:56

वक्ता कहते हैं कि इस घटना में सबको पता था कि घर का ही एक सदस्य धन को लेकर तांत्रिक प्रयोग करवा रहा है। वे इसका तंत्र समझाते हैं: यदि आप 50 हजार कमा रहे हैं और आपका पड़ोसी या भाई 70 हजार कमाने लगे, तो वे 20 हजार अधिक द्वेष पैदा करते हैं; उसके सुख को देखकर हमें दुख होता है, और उस दुख का 'निराकरण' यह बन जाता है कि उसे कष्ट दिया जाए — इसी क्रम में अभिचार कर्म आदि करवा दिए जाते हैं। कभी-कभी अभिचार इतना तगड़ा होता है, वे कहते हैं, कि परिवार उससे निकल ही नहीं पाता।

03

तगड़े अभिचार से ग्रस्त परिवार के लक्षण: निश्चित अंतराल पर मृत्यु, शिशुओं की मृत्यु और घूमी हुई बुद्धि

पीड़ित दैवी दंड की प्रतीक्षा करता है, स्वयं कुछ नहीं सीखता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:57–04:37

वक्ता घटना बताते हैं: सात लोगों का परिवार, हर पाँच से छह साल के बीच एक मृत्यु अवश्य — बूढ़ा हो, जन्मता बच्चा हो, कोई भी — पाँच-छह बच्चे जन्म के दो-तीन साल के भीतर मर चुके, कोई गर्भ में ही छठे-सातवें महीने में; और परिवार ने इसे मान लिया था। उन्हें पता था कि अभिचार कौन और कैसे करवा रहा है, फिर भी सबकी बुद्धि ऐसी घूम चुकी थी कि काट कराने की कोई सोच ही नहीं रहा था: 'सब तांत्रिक लुटेरे हैं, भगवान सुनते नहीं, खुद पूजा-पाठ की जरूरत नहीं, जब मरना होगा मरेंगे।' वे इसे तंत्र-समस्या का वैश्विक ढर्रा कहते हैं: करवाने वाला मजे में रहता है, और पीड़ित बस प्रतीक्षा करता है कि उसे कभी दंड मिलेगा, स्वयं कुछ जानना नहीं चाहता, और उसकी बुद्धि उच्चाटन में रहती है। सेवा-पूजा में विश्वास रखने वाले एक सदस्य को अंततः सद्बुद्धि आई और उसने विषय उनके सामने रखा।

04

पितरों के निमित्त प्रतिदिन प्रातः पंचबली और शिव मंदिर में आटे का दीपक

गुड़ के साथ चार रोटी, फिर महादेव से कुल के पितरों की रक्षा की प्रार्थना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:38–05:47

वक्ता ने परिवार को पहला काम दिया प्रतिदिन प्रातः हर प्रकार के पितृ के निमित्त पंचबलि — पाँच प्रकार के जीवों को भोजन। सुबह की पहली ताजी रोटियों में से चार निकालें: एक गाय को गुड़ के साथ, एक कुत्ते को गुड़ के साथ, एक तोड़कर गुड़ के साथ कहीं कौवों के लिए, और चौथी किसी निर्जन स्थान पर वृक्ष के नीचे थोड़ी चीनी या गुड़ मिलाकर चींटियों के लिए। पाँचवाँ, सरसों तेल का आटे का दीपक बनाएँ, शिव मंदिर में मीठे जल से शिव का अभिषेक करें, दीप जलाएँ और भगवान महादेव से कहें कि कुल के सभी पितरों का संरक्षण करें और उन्हें प्रसन्न करें। चाहें तो वहीं बैठकर रुद्राष्टकम् का आठ बार पाठ कर लें। यह काम एक व्यक्ति को सौंपा गया; जीवों को खिलाना और दीप जलाना घर का कोई भी कर सकता है।

05

परिवार पर अभिचार के विरुद्ध प्रतिदिन गीता का 11वाँ अध्याय और कुशा से पूरे घर में जल छिड़काव

हिंदी में पर्याप्त; बचा जल सब पी लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:48–06:09

वक्ता कहते हैं कि दूसरा काम था कि परिवार का कोई भी सदस्य दोपहर में श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का कम से कम एक बार पाठ करे — हिंदी में ही ठीक है, संस्कृत की जरूरत नहीं। आरंभ में ही एक लोटा जल वहाँ रखा रहे; पाठ के बाद वह जल कुश से पूरे घर में छिड़कें, और बचा हुआ जल सब पी लें। जब दोपहर में कोई खाली नहीं होता था तो उन्होंने इसे सुबह करवा दिया; बाद में जगदंबा की कृपा से परिवार ने YouTube से अध्याय संस्कृत में सीखा और एक सदस्य ने बाकी को सिखाया, जिसे वे एक कदम आगे मानते हैं।

06

अभिचार के विरुद्ध रात्रि में अपामार्ग की लकड़ी पर सरसों, गुग्गल और काली मिर्च का बगलामुखी साबर हवन

10–11 आरंभिक आहुति, फिर 108 की एक माला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:10–06:58

तीसरा काम, रात्रि के लिए, स्वयं अभिचार के विरुद्ध था: सरसों, गुग्गुल और काली मिर्च मिलाकर अपामार्ग की लकड़ी पर भगवती बगलामुखी के सबर मंत्र से प्रतिदिन 108 बार हवन। वक्ता कहते हैं कि पूरी सामग्री बनाकर रख दी जाती है; शाम या रात होते-होते पहले गुरु, गणपति, भगवती और कुल के देवी-देवताओं के नाम से 10–11 आरंभिक आहुति लगती हैं, फिर बगलामुखी के अघोर साबर का पाठ करते हुए एक माला — 108 आहुति — दी जाती है। जब पूरी सामग्री जलने लगे तो उसे घर में घुमाकर मुख्य द्वार के पास रख देना है। दिनचर्या का यही एक हिस्सा था जिसे कभी छूटने नहीं दिया गया।

07

अभिचार-विरोधी दिनचर्या को 11 से 21, 36 और 41 दिन तक बढ़ाना, और राहत किस क्रम में आती है

पहले बुद्धि, फिर विश्वास, फिर स्वप्न शांत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:59–07:55

वक्ता कहते हैं कि पहला स्टेप दिया गया कि तीन भागों वाली यह दिनचर्या कम से कम 11 दिन करें; दूसरी बार बढ़ाकर 21 दिन, तीसरी बार 36, चौथी बार 41, और फिर धीरे-धीरे बढ़ाते हुए उसे निरंतर कर दिया गया। लाभ इस क्रम में आया: पहले परिवार की जो मति इतनी घूम गई थी वह सही होने लगी; फिर देवताओं और शक्तियों के प्रति जो खंडित विश्वास था वह जागृत हुआ; फिर मरे हुए लोगों के स्वप्न — किसी को खाना नहीं मिल रहा, कोई रो रहा, कोई नदी में बह गया, कोई जल गया — और श्मशान बन चुके घर का सारा उत्पात दो-तीन महीने होते-होते धीरे-धीरे कम हो गया। विश्वास और बढ़ा और वे इसे बढ़ाते गए। नारायण बलि या त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए धन था ही नहीं, इसलिए यही दिनचर्या पहला मार्ग बनी, और उन्हें कहा गया कि छोड़ें नहीं, जारी रखें।

08

पितरों, देवताओं और जीवों की सेवा प्रारब्ध काटती है और सद्बुद्धि, आत्मबल व मेधा देती है

फँसे परिवार को आगे बढ़ने की सूझ अचानक क्यों आती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:56–09:01

वक्ता सिखाते हैं कि जैसे ही आप अपने कुल के पितृ के निमित्त कार्य शुरू करते हैं, देवी-देवताओं के प्रति कार्य करते हैं और जीवों की सेवा शुरू करते हैं, प्रारब्ध तुरंत कटने लगता है। जैसे-जैसे कटता है, सद्बुद्धि प्राप्त होने लगती है; फिर आपके भीतर आत्मबल आता है; और आत्मबल आने पर मेधा बुद्धि का विकास होता है — यह सूझ कि इस मार्ग में और आगे कैसे चलें कि हमारा कार्य शुद्ध हो। उनका उदाहरण घटना का वह परिवार है जिसे जगदम्बा की कृपा से गीता का 11वाँ अध्याय संस्कृत में सीखने की बुद्धि आई।

09

थोक में अभिमंत्रित हवन सामग्री ताकि प्रतिदिन की बगलामुखी आहुति कभी न छूटे

पर्व काल में पाँच माला; फिर कोई भी 5 या 11 आहुति दे सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:02–09:59

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने परिवार को यह भी बताया कि पर्व काल में लगभग एक किलो गुग्गुल और दो-तीन किलो पीली सरसों तथा काली मिर्च — अपामार्ग की लकड़ी अलग रहेगी — किसी बड़े नए पात्र में रखें जिसमें कोई भोजन न किया गया हो, और उस पर अघोर बगलामुखी सबर मंत्र की पाँच माला जप कर दें; दो-तीन घंटे लगते हैं और पूरी सामग्री अभिमंत्रित हो जाती है। फिर जब भी साधना करने वाले सदस्य घर में न हों, घर का कोई भी उसमें से पाँच या ग्यारह आहुति दे दे और धुआँ घर में दिखा दे — नियम टूटना नहीं चाहिए। गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी को खिलाना और शिव मंदिर में दीपक जलाना कोई भी कर सकता था; पाठ-पूजा केवल दो-तीन नियमित सदस्य कर सकते थे, इसलिए बाकी उनकी अनुपस्थिति में इतना कर लेते थे।

10

पारिवारिक अभिचार के मामले का समाधान और वक्ता की असली परिणाम की कसौटी

पकड़कर चलते रहें, छोड़ें नहीं; शत्रु पर चोट पड़नी चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:00–11:03

वक्ता कहते हैं कि परिवार जब सब मिलकर करता रहा तो देवताओं की कृपा हुई, घूमी हुई बुद्धि शांत हुई और उच्चाटन धीरे-धीरे कट गया। वर्ष भर बाद त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि और भागवत का मार्ग भी बना, और पूरा विषय क्लियर हो गया — कुल लगभग दो साल। उनकी सीख: विश्वास करते रहें, छोड़ें नहीं, पकड़कर चलते रहें; आत्मविश्वास बनेगा, देव कृपा शुरू होगी, और वही सामर्थ्य फिर आपका पूरा विषय संभाल लेगा। लेकिन शत्रुओं पर अंतिम चोट ही मुख्य है: वे अनुभव तभी साझा करते हैं जब शत्रु को चोट पड़ चुकी हो, क्योंकि जो उत्पात मचा रहा है उसे दंड मिलना चाहिए। यहाँ भगवती पीताम्बरा और कुल के अपने पितरों ने सारी समस्याएँ करवाने वालों पर डाल दीं — जो उसी परिवार के सदस्य थे — और उनके घर में मृत्यु और बँटवारा हुआ।

11

विशेष स्थिति: अभिचार करने वाले घर में हुई मृत्यु का सूतक मानना

टूटे संबंध से बड़ा है निकट का नाता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:04–11:13

बँटवारे के बाद जब करवाने वालों के घर में मृत्यु हुई, तो वक्ता कहते हैं कि परिवार उसका सूतक मानना नहीं चाहता था — खाना-पीना अब चलता नहीं था। उन्होंने फिर भी मानने को कहा: 'सूतक लगा है, मानिए।' भले वे लोग न मानें, दोनों घर निकट के, आमने-सामने के थे, इसलिए इस परिवार को भी सूतक मानना था।

12

क्षमा माँगने वाले अभिचार-शत्रु को क्षमा, और रुद्राभिषेक से उपसंहार

दंड देना साधक का काम नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:14–12:15

वक्ता कहते हैं कि अपने घर में तीसरी मृत्यु पर करवाने वालों ने परिवार के पैर पकड़ लिए — 'तुम लोग कुछ करवा रहे हो क्या? मत करवाओ' — और सामने से गलती मान ली, क्योंकि अब तलवार उनकी अपनी प्रिय संतान पर तनी थी, जो माँ-बाप के कर्म के लिए मरणासन्न पड़ी थी। उन्होंने हाथ जोड़े, शिव जी को छूकर और तुलसी को छूकर कसम खाई कि अब कभी अपराध नहीं होगा, और कान पकड़कर उठक-बैठक की। उनका निर्णय: कोई सामने से क्षमा माँगे तो क्षमा करना ही है — दंड देना अपना काम नहीं। उपसंहार विधि थी रुद्राभिषेक आदि, भगवती से प्रार्थना कि शांत हों, अपना कोप शांत करें, यथोचित दंड मिल चुका, अब मृत्यु आदि न हो। यह होगा या नहीं, वे कहते हैं, उन्हें नहीं पता; वर्तमान में जिन पर भगवती ने घात किया वे पड़े ही हुए हैं।

13

बगलामुखी प्रसंग की सीख: माई अपने भक्त का शीश कभी झुकने नहीं देतीं

बड़बोला तांत्रिक तभी झुकता है जब बच्चों पर पड़े

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:16–13:49

वक्ता कहते हैं कि जो साधक उनके संपर्क में रहकर यह सब करते रहे वे अब बम-बम हैं: भगवती ने उन्हें दिखा दिया, वे जीवन भर माई का चरण नहीं छोड़ेंगे, उन्होंने उन्हें सामर्थ्य और योग्यता दी, अपनी साधना भी करवाई, और शत्रु को यथोचित दंड दिया — जो नाक रगड़कर, कान पकड़कर, कसम खाकर गया कि जीवन में ऐसा अपराध कभी नहीं करेगा। वह शत्रु कहा करता था कि कोई तांत्रिक उसका कुछ नहीं उखाड़ सकता; उसके पास धन का बल था, सीखी हुई तंत्र विद्या का बल था, और तांत्रिकों का पूरा ग्रुप था। जब तक अपने ऊपर पड़ता है व्यक्ति सोचता है संभाल लेंगे; बच्चों पर पड़ता है तो पैर पकड़ना पड़ता है। इसे बताने का उनका मंतव्य: देखिए परिणाम कैसे आया — क्षमा माँगनी पड़ी; माई अपने भक्त का शीश कभी झुकने नहीं देतीं, लाज रखती हैं; आप में विश्वास, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए। लगे रहें, भगवती की सेवा कभी न छोड़ें; जब जगदम्बा की इच्छा होगी और आपका कर्म आपको योग्य बना देगा, तो जो आप चाहते हैं वह उनके अनुसार होगा, और वही उचित होगा।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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