बगलामुखी सावर हवन की सत्य घटना — पंचबली, गीता का 11वाँ अध्याय और वह तीन चरणों का क्रम जिसने पारिवारिक अभिचार तोड़ा
पंचबली, गीता के 11वें अध्याय और रात्रि के बगलामुखी सावर हवन से टूटे पारिवारिक अभिचार की सत्य घटना, और शत्रु के अंततः क्षमा माँगने से वक्ता क्या सीख निकालते हैं।
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परिवार में निश्चित अंतराल पर मृत्यु: नारायण बलि, त्रिपिंडी और भागवत, और उनका वास्तविक खर्च
"लाखों" का हौवा बनाम सादगी से 50–60 हजार
वक्ता कहते हैं कि जब किसी परिवार में निश्चित अंतराल पर — हर पाँचवें या दसवें साल — किसी की मृत्यु होती है, तो उसे प्रायः पितृ दोष मान लिया जाता है, और ऐसी बार-बार की अकाल मृत्यु का उपाय है कि अब तक की सभी अकाल मृत्युओं की एक साथ नारायण बलि, फिर त्रिपिंडी श्राद्ध, फिर भागवत करवा दी जाए। समाज ने इनका इतना हौवा बना दिया है कि लोगों को कहा जाता है इसमें लाखों लगेंगे — एक-एक लाख — पर वह तो बड़े आयोजन, पंडाल और सात दिन की कथा में लगता है; सादगी से कराएँ तो पूरा 11–12 दिन का क्रम लगभग 50–60 हजार में हो सकता है। फिर भी, वे कहते हैं, जो परिवार कर्ज लेकर अस्पताल के बिल भरते हैं उनके मन में इस पूजा-पाठ के प्रति ऐसा द्वेष भर दिया गया है कि वे इसे फालतू कहते हैं, और नियति ही ऐसे लोगों को भटकाकर और बाँधकर रखती है कि वे इसमें आगे नहीं बढ़ पाते।
वक्ता एक ऐसी समस्या से आरंभ करते हैं जो उनके अनुसार सबने अपने आस-पास सुनी होगी, और जिसका हल लोग भगवान पर छोड़ देते हैं जब कोई मार्ग नहीं दिखता: परिवार के सदस्य एक निश्चित समय पर मरते जाते हैं — हर पाँचवें साल, हर दसवें साल किसी न किसी की मृत्यु। इसमें प्रमुखता से जो विषय निकलता है वह पितृ दोष है, पितरों का दोष। लेकिन व्यक्ति धन से इतना सक्षम नहीं होता कि कोई बहुत बड़ा विशेष अनुष्ठान कराए, और समाज में इतनी भ्रांति फैली है कि लोग पितरों के निमित्त कुछ कराना भी नहीं चाहते। वे जोड़ते हैं कि यह भी सत्य है कि यह नियति ही होती है जो आपको इन विषयों में आगे बढ़ने नहीं देती; वह आपको भटकाकर और बाँधकर रखती है। उपाय, उनके उदाहरण से: यदि पितृ से संबंधित बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है और अकाल मृत्यु बार-बार हो रही है, तो अब तक जितनी अकाल मृत्यु हुई हैं उन सबकी एक साथ नारायण बलि करवा दी जाए; फिर त्रिपिंडी श्राद्ध, और भागवत। यहाँ सबसे बड़ी समस्या, वे कहते हैं, यह है कि इन चीजों का इतना हौवा बना दिया गया है — 'बाबू, यह कराने जाओगे तो लाखों लाख का खर्च होगा: एक लाख नारायण बलि, एक लाख त्रिपिंडी, एक लाख भागवत।' उतना तब लगता है जब बड़ा आयोजन करो; छोटे आयोजन में इतना नहीं लगने वाला। भागवत का पंडाल लगाकर सात दिन का सप्ताह लोगों को सुनाना हो, कथा करानी हो, तो विषय अलग है। सामान्य रूप से कराएँ तो पूरा — कुल 11–12 दिन का — 50–60 हजार में हो सकता है, थोड़ा-बहुत अधिक। फिर भी समस्या आती है कि 50–60 हजार एक बार में लाएँ कहाँ से। और दूसरी ओर, वे कहते हैं, देखिए: प्राण जा रहा है, अस्पताल में भर्ती हो रही है, कर्ज ले-लेकर अस्पताल के बिल भरे जा रहे हैं — लेकिन इस पूजा-पाठ, त्रिपिंडी श्राद्ध श्राद्ध, नारायण बलि, नाग बलि, भागवत को लेकर समाज ने मन में ऐसा द्वेष भर दिया है कि यह फालतू चीज है, इससे कुछ नहीं होगा। ठीक ऐसी ही, वे कहते हैं, यह घटना थी।
अपने ही परिवार के सदस्य द्वारा कराए अभिचार की जड़ में धन का द्वेष
बीस हजार अधिक, और उसका सुख हमारा दुख
वक्ता कहते हैं कि इस घटना में सबको पता था कि घर का ही एक सदस्य धन को लेकर तांत्रिक प्रयोग करवा रहा है। वे इसका तंत्र समझाते हैं: यदि आप 50 हजार कमा रहे हैं और आपका पड़ोसी या भाई 70 हजार कमाने लगे, तो वे 20 हजार अधिक द्वेष पैदा करते हैं; उसके सुख को देखकर हमें दुख होता है, और उस दुख का 'निराकरण' यह बन जाता है कि उसे कष्ट दिया जाए — इसी क्रम में अभिचार कर्म आदि करवा दिए जाते हैं। कभी-कभी अभिचार इतना तगड़ा होता है, वे कहते हैं, कि परिवार उससे निकल ही नहीं पाता।
वक्ता कहते हैं कि इस परिवार में सबको पता था कि घर का ही एक सदस्य धन को लेकर कोई तांत्रिक प्रयोग करवा रहा है। आज के समय की सबसे बड़ी समस्या, वे कहते हैं, यह है: यदि आप 50 हजार कमा रहे हैं और आपका पड़ोसी या आपका भाई 70 हजार कमाने लगे, तो वह 20 हजार अधिक कमाएगा, और उन 20 हजार के चलते द्वेष हो जाएगा। उसके सुख को देखकर हमें दुख होगा। और उस दुख का निराकरण कैसे होगा? उसे कष्ट देकर। इसी क्रम में — कष्ट देने के क्रम में — अभिचार कर्म आदि करवा दिए जाते हैं। कभी-कभी, वे कहते हैं, ऐसा तगड़ा अभिचार हो जाता है कि परिवार उससे निकल ही नहीं पाता। यही समस्या इस घटना में थी।
तगड़े अभिचार से ग्रस्त परिवार के लक्षण: निश्चित अंतराल पर मृत्यु, शिशुओं की मृत्यु और घूमी हुई बुद्धि
पीड़ित दैवी दंड की प्रतीक्षा करता है, स्वयं कुछ नहीं सीखता
वक्ता घटना बताते हैं: सात लोगों का परिवार, हर पाँच से छह साल के बीच एक मृत्यु अवश्य — बूढ़ा हो, जन्मता बच्चा हो, कोई भी — पाँच-छह बच्चे जन्म के दो-तीन साल के भीतर मर चुके, कोई गर्भ में ही छठे-सातवें महीने में; और परिवार ने इसे मान लिया था। उन्हें पता था कि अभिचार कौन और कैसे करवा रहा है, फिर भी सबकी बुद्धि ऐसी घूम चुकी थी कि काट कराने की कोई सोच ही नहीं रहा था: 'सब तांत्रिक लुटेरे हैं, भगवान सुनते नहीं, खुद पूजा-पाठ की जरूरत नहीं, जब मरना होगा मरेंगे।' वे इसे तंत्र-समस्या का वैश्विक ढर्रा कहते हैं: करवाने वाला मजे में रहता है, और पीड़ित बस प्रतीक्षा करता है कि उसे कभी दंड मिलेगा, स्वयं कुछ जानना नहीं चाहता, और उसकी बुद्धि उच्चाटन में रहती है। सेवा-पूजा में विश्वास रखने वाले एक सदस्य को अंततः सद्बुद्धि आई और उसने विषय उनके सामने रखा।
घटना जैसे वक्ता बताते हैं: सात लोगों का परिवार, और बार-बार मृत्यु। हर निश्चित समय पर — पाँचवें से छठे साल के बीच — एक मृत्यु होनी ही होनी थी, चाहे बूढ़े की हो, जन्मते बच्चे की, या किसी की। परिवार ने इसे मान लिया था: होने दो, अब क्या कर सकते हैं। यह समस्या उनके सामने उस परिवार के एक ऐसे सदस्य ने रखी जो सेवा-पूजा में विश्वास रखते थे। जब देखा गया तो उन्हें पता था कि अभिचार कौन कर रहा है, कैसे करवा रहा है — सब पता था — लेकिन सबकी बुद्धि ऐसी हो चुकी थी कि काट कराने के लिए कोई सोच ही नहीं रहा था: कैसे कराएँगे, कौन करेगा, सब तांत्रिक लुटेरे हैं, सब जानकार लुटेरे हैं, भगवान सुनने वाले नहीं, खुद पूजा-पाठ की जरूरत नहीं, जब मरना होगा मरेंगे ही, मरने दो। लेकिन कहीं न कहीं एक सदस्य को सद्बुद्धि आई, विषय रखा गया, पूरा देखा गया। परिवार का सबसे बड़ा विषय था अकाल मृत्यु की संख्या, विशेषकर छोटे बच्चों की: पाँच-छह बच्चे मर चुके थे जो दो से तीन साल के भीतर के थे — जन्म लेकर दो-तीन साल के होते-होते मृत्यु; कोई गर्भ में ही छठे-सातवें महीने में। और जो सदस्य यह अभिचार करवा रहा था वह 'बम-बम' था। यही, वे कहते हैं, वैश्विक समस्या है — देखिएगा: कई घरों में तंत्र से संबंधित समस्या होती है, जो करवा रहा होता है और दूसरे को प्रताड़ित कर रहा होता है वह उस समय पूरे मजे में होता है, और सामने वाला इस प्रतीक्षा में रहता है कि कभी न कभी उसे दंड मिलेगा ही। स्वयं कुछ करने में फायदा नहीं दिखता; स्वयं कुछ जानना भी नहीं चाहते; और बुद्धि उच्चाटन में रहती है।
पितरों के निमित्त प्रतिदिन प्रातः पंचबली और शिव मंदिर में आटे का दीपक
गुड़ के साथ चार रोटी, फिर महादेव से कुल के पितरों की रक्षा की प्रार्थना
वक्ता ने परिवार को पहला काम दिया प्रतिदिन प्रातः हर प्रकार के पितृ के निमित्त पंचबलि — पाँच प्रकार के जीवों को भोजन। सुबह की पहली ताजी रोटियों में से चार निकालें: एक गाय को गुड़ के साथ, एक कुत्ते को गुड़ के साथ, एक तोड़कर गुड़ के साथ कहीं कौवों के लिए, और चौथी किसी निर्जन स्थान पर वृक्ष के नीचे थोड़ी चीनी या गुड़ मिलाकर चींटियों के लिए। पाँचवाँ, सरसों तेल का आटे का दीपक बनाएँ, शिव मंदिर में मीठे जल से शिव का अभिषेक करें, दीप जलाएँ और भगवान महादेव से कहें कि कुल के सभी पितरों का संरक्षण करें और उन्हें प्रसन्न करें। चाहें तो वहीं बैठकर रुद्राष्टकम् का आठ बार पाठ कर लें। यह काम एक व्यक्ति को सौंपा गया; जीवों को खिलाना और दीप जलाना घर का कोई भी कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि जब विषय उनके सामने रखा गया तो सबसे पहला काम जो उन्होंने शुरू करवाया वह था हर प्रकार के पितृ के निमित्त पंचबलि — पंचबली यानी पाँच प्रकार से जीवों को भोजन कराना। प्रतिदिन एकदम सुबह जो ताजी रोटी बने उसमें से चार रोटी निकाल लें। एक रोटी गाय को गुड़ के साथ खिलाएँ; एक कुत्ते को गुड़ के साथ; एक तोड़कर गुड़ के साथ कहीं कौवों के लिए रख दें। चौथी रोटी लेकर किसी निर्जन स्थान पर, किसी वृक्ष के नीचे, थोड़ी चीनी या गुड़ मिलाकर चींटियों के निमित्त डाल दें। ये चार जगह — सबसे पहले चार प्रकार के जीवों को भोजन कराएँ। पाँचवाँ: आटे का दीपकगेहूं के आटे से बना एक छोटा दीपक (धातु या मिट्टी के स्थान पर), जिसमें सरसों का तेल भरकर रक्षक या कुल देवता के समक्ष जलाया जाता है — इसे कभी सीधे भूमि पर नहीं रखा जाता। बनाकर उसमें सरसों का तेल डालें, शिव मंदिर में मीठे जल से शिव जी का अभिषेक करें, वह दीप प्रज्वलित करें और भगवान महादेव से कहें: हमारे कुल के सभी पितरों को संरक्षण दें, उन्हें प्रसन्न करें, कृपा करें कि वे प्रसन्न हो जाएँ। यह काम प्रतिदिन सुबह करना है। इसके अलावा चाहें तो वहीं शिव जी के पास बैठकर रुद्राष्टकम् का आठ बार पाठ कर लें। इतना काम एक व्यक्ति को सौंपा गया। आगे कहानी में वे बताते हैं कि यह क्यों टिक सका: गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी को खिलाने का नियम कोई भी निभा सकता है, और शिव मंदिर में दीपक कोई भी जला सकता है, जल कोई भी चढ़ा सकता है, इसलिए नियमित साधकों के बाहर होने पर भी यह छूटा नहीं।
परिवार पर अभिचार के विरुद्ध प्रतिदिन गीता का 11वाँ अध्याय और कुशा से पूरे घर में जल छिड़काव
हिंदी में पर्याप्त; बचा जल सब पी लें
वक्ता कहते हैं कि दूसरा काम था कि परिवार का कोई भी सदस्य दोपहर में श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का कम से कम एक बार पाठ करे — हिंदी में ही ठीक है, संस्कृत की जरूरत नहीं। आरंभ में ही एक लोटा जल वहाँ रखा रहे; पाठ के बाद वह जल कुश से पूरे घर में छिड़कें, और बचा हुआ जल सब पी लें। जब दोपहर में कोई खाली नहीं होता था तो उन्होंने इसे सुबह करवा दिया; बाद में जगदंबा की कृपा से परिवार ने YouTube से अध्याय संस्कृत में सीखा और एक सदस्य ने बाकी को सिखाया, जिसे वे एक कदम आगे मानते हैं।
दूसरा काम, दोपहर के लिए: परिवार का कोई भी सदस्य श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का कम से कम एक बार पाठ करे। वक्ता कहते हैं कि हिंदी में ही करें — संस्कृत में करने की जरूरत नहीं। आरंभ में ही एक लोटे में जल वहाँ रखा रहे। पाठ के बाद वह जल कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। से पूरे घर में छिड़कना है, और बचा हुआ जल सब कोई पी जाएँ। यह काम दोपहर के समय का है। बाद में जब समस्या हुई कि दोपहर में पाठ कौन करेगा, तो उन्होंने कहा कि सुबह ही कर लीजिए, और दूसरे-तीसरे महीने से पाठ सुबह होने लगा। फिर, वे कहते हैं, जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने ऐसी कृपा की कि बुद्धि आई कि पाठ संस्कृत में करना चाहिए — YouTube पर उपलब्ध है — और परिवार के एक सदस्य ने धीरे-धीरे 11वें अध्याय का पाठ संस्कृत में बाकी को सिखाया, और सुबह का पाठ संस्कृत में शुरू हो गया: एक कदम और आगे।
अभिचार के विरुद्ध रात्रि में अपामार्ग की लकड़ी पर सरसों, गुग्गल और काली मिर्च का बगलामुखी साबर हवन
10–11 आरंभिक आहुति, फिर 108 की एक माला
तीसरा काम, रात्रि के लिए, स्वयं अभिचार के विरुद्ध था: सरसों, गुग्गुल और काली मिर्च मिलाकर अपामार्ग की लकड़ी पर भगवती बगलामुखी के सबर मंत्र से प्रतिदिन 108 बार हवन। वक्ता कहते हैं कि पूरी सामग्री बनाकर रख दी जाती है; शाम या रात होते-होते पहले गुरु, गणपति, भगवती और कुल के देवी-देवताओं के नाम से 10–11 आरंभिक आहुति लगती हैं, फिर बगलामुखी के अघोर साबर का पाठ करते हुए एक माला — 108 आहुति — दी जाती है। जब पूरी सामग्री जलने लगे तो उसे घर में घुमाकर मुख्य द्वार के पास रख देना है। दिनचर्या का यही एक हिस्सा था जिसे कभी छूटने नहीं दिया गया।
वक्ता कहते हैं कि तीसरा काम स्वयं अभिचार के लिए था, रात्रि काल में। तीन चीजें — सरसों, गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। और काली मिर्च — मिलाकर अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी पर भगवती बगलामुखी के सबर मंत्र से हवन, प्रतिदिन 108 बार। पूरी सामग्री बनाकर रख दी गई। शाम के समय या रात होते-होते: पहले गुरु-गणपति के नाम से आहुति, भगवती के नाम से आरंभिक आहुति, और कुल के देवी-देवताओं के नाम से आहुति — यानी आरंभ में 10 से 11 आहुति लग जाती हैं। उसके बाद भगवती बगलामुखी के अघोर साबर का पाठ करते हुए इस मंत्र से 108 बार, एक माला, आहुति दें। जब वह पूरी सामग्री जलने लगे तो उसे घर में घुमाकर अपने घर के मुख्य द्वार के पास रख देना है। यह काम शाम का है। वे बाद में बताते हैं कि परिवार बीच-बीच में छोड़ता भी था — कोई काम, किसी की परीक्षा — लेकिन कम से कम आहुति जरूर हो जाती थी; और नियमित साधकों के बाहर होने पर बाकी घर का काम बस इस आहुति को चालू रखना था।
अभिचार-विरोधी दिनचर्या को 11 से 21, 36 और 41 दिन तक बढ़ाना, और राहत किस क्रम में आती है
पहले बुद्धि, फिर विश्वास, फिर स्वप्न शांत
वक्ता कहते हैं कि पहला स्टेप दिया गया कि तीन भागों वाली यह दिनचर्या कम से कम 11 दिन करें; दूसरी बार बढ़ाकर 21 दिन, तीसरी बार 36, चौथी बार 41, और फिर धीरे-धीरे बढ़ाते हुए उसे निरंतर कर दिया गया। लाभ इस क्रम में आया: पहले परिवार की जो मति इतनी घूम गई थी वह सही होने लगी; फिर देवताओं और शक्तियों के प्रति जो खंडित विश्वास था वह जागृत हुआ; फिर मरे हुए लोगों के स्वप्न — किसी को खाना नहीं मिल रहा, कोई रो रहा, कोई नदी में बह गया, कोई जल गया — और श्मशान बन चुके घर का सारा उत्पात दो-तीन महीने होते-होते धीरे-धीरे कम हो गया। विश्वास और बढ़ा और वे इसे बढ़ाते गए। नारायण बलि या त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए धन था ही नहीं, इसलिए यही दिनचर्या पहला मार्ग बनी, और उन्हें कहा गया कि छोड़ें नहीं, जारी रखें।
अवधि। वक्ता कहते हैं कि पहला स्टेप दिया गया कि पहले कम से कम 11 दिन करें। दूसरी बार इसे बढ़ाकर 21 दिन, और तीसरी बार 36 दिन किया गया। चौथी बार 41 दिन तक बढ़ा दीजिए। इसे धीरे-धीरे बढ़ाते-बढ़ाते फिर निरंतर करना शुरू कीजिए। लाभ का क्रम। लाभ मिलना शुरू हुआ। सबसे पहले लोगों की बुद्धि — जो मति इतनी घूम गई थी — वह मति पहले सही होने लगी। देवताओं और शक्तियों के प्रति जो विश्वास खंडित था वह जागृत होने लगा। स्वप्न में जो मरे हुए लोग बार-बार दिखते थे — किसी को खाना नहीं मिल रहा, कोई रो रहा है, कोई नदी में बह गया, कोई जल गया, कोई कुछ, बच्चे — क्योंकि सबको पता है कि इतनी अकाल मृत्यु होंगी तो घर एक तरह से श्मशान ही बन गया। जितना उत्पात आप मान सकते हैं, जो सारा उत्पाद मच रहा था, वह दो महीने, तीन महीने होते-होते धीरे-धीरे कम हो गया। लोगों का विश्वास थोड़ा और बढ़ा, और इसी चीज को वे बढ़ाते गए। आर्थिक स्थिति ऐसी थी — समृद्धि थी ही नहीं — कि नारायण बलि या त्रिपिंडी श्राद्ध करा सकें। तो पहला मार्ग यही बना: इसे छोड़ा नहीं गया; कहा गया, जारी रखिए।
पितरों, देवताओं और जीवों की सेवा प्रारब्ध काटती है और सद्बुद्धि, आत्मबल व मेधा देती है
फँसे परिवार को आगे बढ़ने की सूझ अचानक क्यों आती है
वक्ता सिखाते हैं कि जैसे ही आप अपने कुल के पितृ के निमित्त कार्य शुरू करते हैं, देवी-देवताओं के प्रति कार्य करते हैं और जीवों की सेवा शुरू करते हैं, प्रारब्ध तुरंत कटने लगता है। जैसे-जैसे कटता है, सद्बुद्धि प्राप्त होने लगती है; फिर आपके भीतर आत्मबल आता है; और आत्मबल आने पर मेधा बुद्धि का विकास होता है — यह सूझ कि इस मार्ग में और आगे कैसे चलें कि हमारा कार्य शुद्ध हो। उनका उदाहरण घटना का वह परिवार है जिसे जगदम्बा की कृपा से गीता का 11वाँ अध्याय संस्कृत में सीखने की बुद्धि आई।
परिवार का पाठ धीरे-धीरे क्यों बेहतर हुआ, यह समझाते हुए वक्ता एक सामान्य नियम कहते हैं। देखिए, वे कहते हैं: जैसे ही आप पितरों के — अपने कुल के पितृ के — निमित्त कार्य करना शुरू करते हैं, देवी-देवताओं के प्रति कार्य करना शुरू करते हैं, जीवों की सेवा शुरू करते हैं, प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। तुरंत कटने लगता है। जैसे ही कटना शुरू होगा वैसे ही सद्बुद्धि प्राप्त होने लगेगी। आपके भीतर आत्मबल आने लगेगा। और जब आत्मबल आने लगेगा तो मेधा बुद्धि का विकास होगा — कि इस मार्ग में हम कैसे और आगे चलें कि हमारा कार्य शुद्ध हो। तो जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने ऐसी कृपा की कि बुद्धि आने लगी कि हमें संस्कृत में पाठ करना चाहिए। YouTube पर उपलब्ध है; 11वें अध्याय का पाठ धीरे-धीरे परिवार के एक सदस्य ने संस्कृत में सिखाया, और सुबह का पाठ संस्कृत में शुरू हो गया — एक स्टेप और आगे। वे यह जोड़ना नहीं भूलते कि वे यह नहीं कह रहे कि इन लोगों ने कभी छोड़ा नहीं: कुछ दिन करने के बाद छोड़ते भी थे — कोई काम, किसी की परीक्षा — लेकिन कम से कम आहुति जरूर हो जाती थी।
थोक में अभिमंत्रित हवन सामग्री ताकि प्रतिदिन की बगलामुखी आहुति कभी न छूटे
पर्व काल में पाँच माला; फिर कोई भी 5 या 11 आहुति दे सकता है
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने परिवार को यह भी बताया कि पर्व काल में लगभग एक किलो गुग्गुल और दो-तीन किलो पीली सरसों तथा काली मिर्च — अपामार्ग की लकड़ी अलग रहेगी — किसी बड़े नए पात्र में रखें जिसमें कोई भोजन न किया गया हो, और उस पर अघोर बगलामुखी सबर मंत्र की पाँच माला जप कर दें; दो-तीन घंटे लगते हैं और पूरी सामग्री अभिमंत्रित हो जाती है। फिर जब भी साधना करने वाले सदस्य घर में न हों, घर का कोई भी उसमें से पाँच या ग्यारह आहुति दे दे और धुआँ घर में दिखा दे — नियम टूटना नहीं चाहिए। गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी को खिलाना और शिव मंदिर में दीपक जलाना कोई भी कर सकता था; पाठ-पूजा केवल दो-तीन नियमित सदस्य कर सकते थे, इसलिए बाकी उनकी अनुपस्थिति में इतना कर लेते थे।
वक्ता कहते हैं कि एक विषय उन्होंने और बोलकर रखा था: पर्व काल में कम से कम एकाध किलो गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त।, दो-तीन किलो पीली सरसों, और काली मिर्च — अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी अलग रहेगी — बाकी सारी सामग्री मिलाकर किसी बड़े पात्र में रखें जिसमें कोई भोजन न किया गया हो, नया पात्र हो, और उस पर अघोर बगलामुखी सबर मंत्र की पाँच माला जप कर दें। दो-तीन घंटे लगेंगे, और वह पूरी सामग्री अभिमंत्रित हो जाएगी। फिर जब परिवार के ऐसे सदस्य घर में उपस्थित न हों जो ये सभी काम करते थे, उस समय कोई भी इस अभिमंत्रित सामग्री से घर में आहुति दे दे — पाँच बार, ग्यारह बार — और उसे घर में दिखा दे। बस नियम हो जाना चाहिए। और नियम हो रहा था। वे बँटवारा समझाते हैं: गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी को खिलाने का नियम छूट नहीं सकता था — कोई भी खिला सकता है। भगवान शिव के मंदिर में दीपक कोई भी जला सकता था, जल कोई भी चढ़ा सकता था। लेकिन पाठ-पूजा आदि सब कोई नहीं कर सकते थे; पाठ सब कोई नहीं कर पाएगा। तो जो दो-तीन सदस्य मिलकर कर रहे थे, उन्हें किसी कारणवश कहीं ज्यादा जाना पड़े और घर में न हों, तो बाकी सदस्य इतना कर लिया करते थे।
पारिवारिक अभिचार के मामले का समाधान और वक्ता की असली परिणाम की कसौटी
पकड़कर चलते रहें, छोड़ें नहीं; शत्रु पर चोट पड़नी चाहिए
वक्ता कहते हैं कि परिवार जब सब मिलकर करता रहा तो देवताओं की कृपा हुई, घूमी हुई बुद्धि शांत हुई और उच्चाटन धीरे-धीरे कट गया। वर्ष भर बाद त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि और भागवत का मार्ग भी बना, और पूरा विषय क्लियर हो गया — कुल लगभग दो साल। उनकी सीख: विश्वास करते रहें, छोड़ें नहीं, पकड़कर चलते रहें; आत्मविश्वास बनेगा, देव कृपा शुरू होगी, और वही सामर्थ्य फिर आपका पूरा विषय संभाल लेगा। लेकिन शत्रुओं पर अंतिम चोट ही मुख्य है: वे अनुभव तभी साझा करते हैं जब शत्रु को चोट पड़ चुकी हो, क्योंकि जो उत्पात मचा रहा है उसे दंड मिलना चाहिए। यहाँ भगवती पीताम्बरा और कुल के अपने पितरों ने सारी समस्याएँ करवाने वालों पर डाल दीं — जो उसी परिवार के सदस्य थे — और उनके घर में मृत्यु और बँटवारा हुआ।
यह सब मिल-मिलाकर जब चलने लगा, वक्ता कहते हैं, तो देवताओं की कृपा हुई; जो बुद्धि इतनी विचलित थी वह शांत हो गई; उच्चाटन धीरे-धीरे कट गया। वर्ष भर बाद ऐसा मार्ग भी बन गया कि त्रिपिंडी श्राद्ध भी हुई, नारायण बलि भी हुई, भागवत भी हुई, और पूरा विधान, पूरा विषय क्लियर हो गया। समय, जहाँ तक उन्हें लगता है, दो साल लगा — डेढ़ या दो साल, पूरी व्यवस्था बनते-बनते। वे जो सीख निकालते हैं: विश्वास करते रहें, छोड़ें नहीं, पकड़कर चलते रहें। आत्मविश्वास बन जाएगा, देव कृपा शुरू हो जाएगी, और वही सामर्थ्य देकर फिर आपका पूरा विषय भी संभाल लेंगे। लेकिन शत्रुओं पर अंतिम चोट — वही मुख्य है। 'अनुभव हम तभी डालते हैं जब शत्रु को चोट पड़ गई हो। उससे पहले तो ठीक है, आप ठीक हो रहे हैं; लेकिन रिजल्ट अंततः चाहिए: जो उत्पात मचा रहा है उसे दंड मिलना चाहिए।' तो दंड मिला। जो-जो समस्याएँ इनके यहाँ हो रही थीं — यही भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम।, यही कुल के पितृ, यही सब — वह सब धीरे-धीरे उन लोगों पर पड़ना शुरू हुआ, जो उसी परिवार के सदस्य थे। यह आनंद का विषय हो सकता है, वे कहते हैं; उनके लिए आनंद का विषय नहीं है, लेकिन लौकिक रूप से देखें तो अब उनके घर में मृत्यु हो गई, बँटवारा हो गया, अलग हो गए।
विशेष स्थिति: अभिचार करने वाले घर में हुई मृत्यु का सूतक मानना
टूटे संबंध से बड़ा है निकट का नाता
बँटवारे के बाद जब करवाने वालों के घर में मृत्यु हुई, तो वक्ता कहते हैं कि परिवार उसका सूतक मानना नहीं चाहता था — खाना-पीना अब चलता नहीं था। उन्होंने फिर भी मानने को कहा: 'सूतक लगा है, मानिए।' भले वे लोग न मानें, दोनों घर निकट के, आमने-सामने के थे, इसलिए इस परिवार को भी सूतक मानना था।
एक निर्णय जो वक्ता ने बीच में दिया। बँटवारे के बाद उन परिवार-सदस्यों के घर में मृत्यु हुई जिन्होंने अभिचार करवाया था। दोनों घर अब अलग थे; खाना-पीना चलता नहीं था। तो परिवार ने कहा कि उस घर का सूतक यहाँ मानेंगे नहीं। उन्होंने कहा: मानिए। 'सूतक लगा है — मानिए। वे नहीं मानते, लेकिन आप आमने-सामने के हैं, तो आप भी सूतक मानिए।'
क्षमा माँगने वाले अभिचार-शत्रु को क्षमा, और रुद्राभिषेक से उपसंहार
दंड देना साधक का काम नहीं
वक्ता कहते हैं कि अपने घर में तीसरी मृत्यु पर करवाने वालों ने परिवार के पैर पकड़ लिए — 'तुम लोग कुछ करवा रहे हो क्या? मत करवाओ' — और सामने से गलती मान ली, क्योंकि अब तलवार उनकी अपनी प्रिय संतान पर तनी थी, जो माँ-बाप के कर्म के लिए मरणासन्न पड़ी थी। उन्होंने हाथ जोड़े, शिव जी को छूकर और तुलसी को छूकर कसम खाई कि अब कभी अपराध नहीं होगा, और कान पकड़कर उठक-बैठक की। उनका निर्णय: कोई सामने से क्षमा माँगे तो क्षमा करना ही है — दंड देना अपना काम नहीं। उपसंहार विधि थी रुद्राभिषेक आदि, भगवती से प्रार्थना कि शांत हों, अपना कोप शांत करें, यथोचित दंड मिल चुका, अब मृत्यु आदि न हो। यह होगा या नहीं, वे कहते हैं, उन्हें नहीं पता; वर्तमान में जिन पर भगवती ने घात किया वे पड़े ही हुए हैं।
पहली मृत्यु हुई, दूसरी हुई, और तीसरी मृत्यु पर, वक्ता कहते हैं, उन्होंने परिवार के पैर पकड़ लिए: 'तुम लोग कुछ करवा रहे हो क्या? मत करवाओ।' गलती मान ली, सामने से। यह इसलिए भी कि अब ऐसे व्यक्ति की अपनी प्रिय संतान पर तलवार तन गई थी — कि अब ये मरेंगे; बच्चे मरणासन्न अवस्था में पड़े थे। यह माँ-बाप का कर्म था जो अब बच्चा भुगत रहा था। तो उन्होंने हाथ जोड़ लिए: कृपा करके क्षमा कर दो; अब कभी अपराध नहीं होगा। शिव जी को छूकर कसम खाई, तुलसी जी को छूकर कसम खाई — माफ कर दो — कान पकड़कर उठक-बैठक की; सब किया। यहाँ से, वे कहते हैं, यह निर्णय आया: भैया, क्षमा तो करना ही है। कोई सामने से क्षमा माँगे तो क्षमा कर देना है; वह काम अपना नहीं है। फिर बात आई कि उपसंहार विधि कैसे होगी: रुद्राभिषेक आदि — 'भगवती, आप शांत हो जाएँ, अपना कोपसही जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद जानबूझकर त्रुटि दोहराने पर उत्पन्न देवी का कोप। शांत कर लें; इन्हें यथोचित दंड मिल चुका है, मृत्यु आदि न हो।' अब, वे कहते हैं, उन्हें नहीं पता कि वह होगा या नहीं; वर्तमान में तो वे लोग पड़े ही हुए हैं जिन पर भगवती ने घात किया या जो भी दंड दिया।
बगलामुखी प्रसंग की सीख: माई अपने भक्त का शीश कभी झुकने नहीं देतीं
बड़बोला तांत्रिक तभी झुकता है जब बच्चों पर पड़े
वक्ता कहते हैं कि जो साधक उनके संपर्क में रहकर यह सब करते रहे वे अब बम-बम हैं: भगवती ने उन्हें दिखा दिया, वे जीवन भर माई का चरण नहीं छोड़ेंगे, उन्होंने उन्हें सामर्थ्य और योग्यता दी, अपनी साधना भी करवाई, और शत्रु को यथोचित दंड दिया — जो नाक रगड़कर, कान पकड़कर, कसम खाकर गया कि जीवन में ऐसा अपराध कभी नहीं करेगा। वह शत्रु कहा करता था कि कोई तांत्रिक उसका कुछ नहीं उखाड़ सकता; उसके पास धन का बल था, सीखी हुई तंत्र विद्या का बल था, और तांत्रिकों का पूरा ग्रुप था। जब तक अपने ऊपर पड़ता है व्यक्ति सोचता है संभाल लेंगे; बच्चों पर पड़ता है तो पैर पकड़ना पड़ता है। इसे बताने का उनका मंतव्य: देखिए परिणाम कैसे आया — क्षमा माँगनी पड़ी; माई अपने भक्त का शीश कभी झुकने नहीं देतीं, लाज रखती हैं; आप में विश्वास, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए। लगे रहें, भगवती की सेवा कभी न छोड़ें; जब जगदम्बा की इच्छा होगी और आपका कर्म आपको योग्य बना देगा, तो जो आप चाहते हैं वह उनके अनुसार होगा, और वही उचित होगा।
वक्ता इस बात से समापन करते हैं कि यह घटना क्या दिखाती है। उनके अपने साधक, जो उनके संपर्क में रहकर इतना कुछ करते रहे, अब 'बम-बम' हैं। भगवती ने उन्हें दिखा दिया; अब ये जीवन पर्यंत माई का चरण कभी नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने इन्हें सामर्थ्य दिया, हर प्रकार से सामर्थ्यशाली और योग्य बनाया, अपनी साधना भी करवाई, और शत्रु को यथोचित दंड भी दिया। शत्रु नाक रगड़कर, कान पकड़कर, संकल्प करके, कसम खाकर गया कि जीवन में कभी ऐसा अपराध नहीं करेगा — 'माई की इच्छा होगी तो ऐसा करे।' एक समय, वे कहते हैं, वह व्यक्ति बहुत बोलता था: 'का करई? जहाँ दिखाना है दिखा लो, हमारा कुछ नहीं उखाड़ पाओगे; कोई तांत्रिक मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।' बिगड़ गया। धन का बल था और साथ में तंत्र विद्या का बल था — सीखे थे — और तांत्रिकों का पूरा ग्रुप भी था। जब तक अपने ऊपर पड़ता है तब तक व्यक्ति सोचता है 'हम तो संभाल लेंगे'; लेकिन जब बच्चों के ऊपर पड़ जाता है तो पैर पकड़ना पड़ जाता है। पकड़ना पड़ा पैर। यह विषय सबके सामने रखने का उनका सबसे बड़ा मंतव्य: जब यहाँ परिणाम आया है तो देखिए किस प्रकार आया — क्षमा माँगनी पड़ती है। माई कभी अपने भक्त का शीश झुकने नहीं देतीं; लाज रखती हैं। आप में विश्वास, श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। और समर्पण होना चाहिए। वे आशा करते हैं कि श्रोता इस सत्य घटना से लाभान्वित होंगे और उनके समर्पण में वृद्धि होगी: लगे रहें, भगवती की सेवा कभी न छोड़ें। माई जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। जैसे चाहती हैं — जब उनकी इच्छा होगी, जब हमारा कर्म वैसा हो जाएगा, वे हमें योग्य बना देंगी — तो जो हम चाहते हैं वह भी उनके अनुसार होगा, और वही उचित होगा।
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