उम्र भर का इंतज़ार
A lifetime of waiting — Śabarī waits for years on her guru’s word — and Śrī Rāma comes
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अद्य मे सफलं जन्म स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥
जय श्री राम।
किसी बुज़ुर्ग के घर कभी ध्यान दिया है? फ़ोन हमेशा पास रखा रहता है। तकिए के बगल में। खाना खाते हुए भी मेज़ पर।
क्यों? क्योंकि बेटा कहकर गया था, "माँ, रविवार को फ़ोन करूँगा।" और रविवार की सुबह से वो फ़ोन… बार-बार देखा जाता है।
इंतज़ार। उम्र के साथ बढ़ता जाता है। बच्चों के आने का इंतज़ार। किसी के याद करने का इंतज़ार। और कहीं मन के कोने में एक सवाल — "मेरी बारी कब आएगी? भगवान मुझे कब याद करेंगे?"
और इंतज़ार सिर्फ़ बुज़ुर्गों का नहीं होता। कोई पाँच साल से नौकरी की राह देख रहा है। कोई बेटी के रिश्ते की। कोई गोद भरने की। कोई बस इतनी-सी बात की, कि घर में एक दिन शांति रहे। और हर बीतता साल पूछता है — "कब?"
आज एक ऐसी स्त्री की कथा, जिसने पूरी उम्र राह देखी। और जिसकी राह देखना… बेकार नहीं गया।
सीता जी का हरण हो चुका है। श्रीराम और लक्ष्मण उन्हें ढूँढते हुए वन-वन भटक रहे हैं। रास्ते में कबन्ध मिला, जिसका उन्होंने उद्धार किया। और जाते-जाते कबन्ध ने उन्हें रास्ता बताया — "पम्पा सरोवर जाइए। वहाँ सुग्रीव मिलेंगे।"
और फिर कबन्ध ने एक अद्भुत बात बताई। पम्पा के किनारे मतंग ऋषि का वन है। उनके शिष्य अपने गुरु के लिए जंगल से फल-लकड़ी ढोकर लाते थे। बोझ से थक जाते, पसीना बहता…
ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात्स्वेदबिन्दवः ।
तानि जातानि माल्यानि मुनीनां तपसा तदा ।
और उनके पसीने की जो बूँदें धरती पर गिरीं… वो फूल बन गईं। ऐसे फूल, जो कभी मुरझाते नहीं।
सेवा का पसीना कभी बेकार नहीं जाता। फूल बनकर खिलता है।
और कबन्ध ने ये भी बताया कि उस वन में तरह-तरह के बड़े हाथी घूमते हैं… पर मतंग ऋषि के बनाए उस आश्रम में हाथी घुस नहीं सकते। जंगल के बीच, एक शांत, सुरक्षित कोना।
और कबन्ध ने आगे कहा —
तेषामद्यापि तत्रैव दृश्यते परिचारिणी ।
श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी ॥
"उन मुनियों की एक सेविका आज भी वहीं है। एक तपस्विनी। नाम है शबरी। बहुत लंबी उम्र वाली।"
त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम् ।
दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥
"वो आपको देखेगी… और फिर स्वर्ग जाएगी।"
यानी शबरी के जीवन में एक ही काम बचा था। श्रीराम को देखना।
अब ज़रा पीछे चलिए। शबरी उस आश्रम में कैसे पहुँची थी, ये कथा में नहीं बताया। पर ये बताया है कि उसने बरसों तक वहाँ उन मुनियों की सेवा की।
और फिर एक दिन… मुनियों के जाने का समय आया। दिव्य विमान आए, और वो सब स्वर्ग चले गए।
पर जाते-जाते उन्होंने शबरी से कहा —
आगमिष्यति ते रामः सुपुण्यमिममाश्रमम् ।
"श्रीराम तुम्हारे इस आश्रम में आएँगे। लक्ष्मण के साथ। उनका स्वागत करना। उन्हें देखकर तुम भी अक्षय लोकों में जाओगी।"
बस। इतना कहकर गुरु चले गए। और शबरी अकेली रह गई। एक वचन के सहारे।
अब एक बात सोचिए। गुरुओं ने ये नहीं बताया कि कब आएँगे। कौन-सा साल। कौन-सा महीना। कोई तारीख़ नहीं। बस — "आएँगे।"
और शबरी ने राह देखी। बाल सफ़ेद हुए, जटा बनी, शरीर जर्जर हुआ। पर भरोसा नहीं टूटा।
अब हम अपने आप को देखें। दो दिन पूजा की, तीसरे दिन शिकायत — "कुछ हुआ ही नहीं!" मंदिर में नारियल चढ़ाया, और अगले हफ़्ते रिज़ल्ट का इंतज़ार, जैसे भगवान कोई कूरियर कंपनी हों। शबरी के पास न कोई तारीख़ थी, न कोई रसीद। बस गुरु का एक वचन। और वही उसके लिए काफ़ी था।
और अब पहली चौंकाने वाली बात। ये गुरु कब गए थे?
शबरी ख़ुद बताती है —
चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभैः ।
इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम् ॥
"जब आप चित्रकूट पहुँचे थे… तभी मेरे गुरु स्वर्ग चले गए।"
सोचिए। जिस दिन श्रीराम वनवास में चित्रकूट पहुँचे, उसी दिन से शबरी की प्रतीक्षा शुरू हो गई। श्रीराम चित्रकूट में रहे, दण्डकारण्य में घूमे, पंचवटी गए, सीता जी का हरण हुआ, जटायु मिले, कबन्ध मिले… और इस पूरे समय, पम्पा के किनारे, एक बूढ़ी तपस्विनी हर सुबह रास्ता देख रही थी।
भगवान का रास्ता लंबा था। पर वो रास्ता… उसी की ओर आ रहा था।
और फिर एक दिन… पम्पा का पश्चिमी किनारा। पेड़ों से घिरा एक सुंदर आश्रम। और दो राजकुमार, धनुष लिए, अंदर आते हैं।
तौ च दृष्ट्वा तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलिः ।
रामस्य पादौ जग्राह लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥
शबरी ने उन्हें देखा… हाथ जोड़कर उठ खड़ी हुई… और श्रीराम के पैर पकड़ लिए। फिर लक्ष्मण के। पैर धोने का जल दिया, आचमन दिया, सब कुछ विधि से।
और अब दूसरी बात, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। श्रीराम ने बैठते ही क्या पूछा? अपनी कोई बात? सीता की खोज?
नहीं। उन्होंने उस बूढ़ी तपस्विनी का हालचाल पूछा। "माँ, तुम्हारा तप ठीक चल रहा है? क्रोध पर, भोजन पर क़ाबू है? मन में सुख है? गुरुओं की सेवा सफल हुई?"
भगवान अपना दुःख लेकर आए थे। पर पहले उन्होंने भक्त का दुःख पूछा।
और हम? मंदिर जाते हैं, तो पूरी लिस्ट लेकर। "ये कर दो, वो कर दो, इसकी नौकरी, उसकी शादी।" कभी भगवान से पूछा — "प्रभु, आप कैसे हैं?" शबरी के आश्रम में भगवान ने सिखाया कि रिश्ता हालचाल पूछने से शुरू होता है।
और शबरी ने जो कहा, वो उम्र भर के इंतज़ार का उत्तर है —
अद्य प्राप्ता तपःसिद्धिस्तव सन्दर्शनान्मया ।
अद्य मे सफलं तप्तं गुरवश्च सुपूजिताः ॥
"आज… आपके दर्शन से मेरा तप सफल हो गया। आज मेरे गुरुओं की पूजा पूरी हुई।"
चक्षुषा तव सौम्येन पूतास्मि रघुनन्दन ।
"आपकी एक कोमल नज़र से… मैं पवित्र हो गई।"
और फिर बोली — "प्रभु, मैंने आपके लिए पम्पा के किनारे का तरह-तरह का वन-भोजन इकट्ठा करके रखा है।"
मया तु विविधं वन्यं संचितं पुरुषर्षभ ।
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसंभवम् ॥
"संचितम्" — इकट्ठा किया हुआ। एक दिन में नहीं। धीरे-धीरे। किसी दिन आएँगे, इस भरोसे में।
बेरों की कथा तो हम सबने सुनी है। वाल्मीकि बस इतना कहते हैं — "आपके लिए इकट्ठा किया है।" और इतना ही काफ़ी है।
अब तीसरी बात। वाल्मीकि शबरी के बारे में एक छोटा-सा वाक्य लिखते हैं, जो बहुत बड़ा है।
राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम् ॥
वो स्त्री, जो "सच्चे ज्ञान से कभी बाहर नहीं रखी गई।" एक वनवासी सेविका। न राजकुल की, न किसी बड़े घराने की। और वाल्मीकि कहते हैं, ज्ञान के दरवाज़े उसके लिए हमेशा खुले थे।
फिर शबरी ने श्रीराम को मतंग वन दिखाया। वो वेदी, जहाँ बूढ़े गुरु काँपते हाथों से फूल चढ़ाते थे। वो पेड़, जिन पर मुनियों ने नहाकर वल्कल टाँगे थे… और वो आज तक सूखे नहीं। वो मालाएँ, जो आज तक मुरझाई नहीं।
जहाँ सच्ची सेवा होती है, वहाँ समय रुक जाता है।
और फिर शबरी ने हाथ जोड़कर कहा — "प्रभु, अब आज्ञा दीजिए। मैं अपने गुरुओं के पास जाना चाहती हूँ।"
अर्चितोऽहं त्वया भक्त्या गच्छ कामं यथासुखम् ॥
श्रीराम बोले — "तुमने भक्ति से मेरी पूजा की है। जाओ, सुख से जाओ।"
और वो बूढ़ी, जटाधारी तपस्विनी… अपना जर्जर शरीर अग्नि को सौंपकर… जलती आग जैसी चमकती हुई… स्वर्ग चली गई। दिव्य वस्त्रों में। बिजली की तरह चमकती हुई।
जिस दिन का इंतज़ार था… वो दिन आया। और वही दिन उसका अंतिम दिन बना। क्योंकि उसके बाद इंतज़ार करने को कुछ बचा ही नहीं था।
गीता में भगवान ने यही कहा है —
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
"जो प्रेम से मुझे भजते हैं… वो मुझमें हैं, और मैं उनमें।"
तो जो आज किसी इंतज़ार में बैठे हैं, उनके लिए तीन बातें।
पहली। भगवान का रास्ता लंबा दिख सकता है। चित्रकूट, पंचवटी, न जाने कहाँ-कहाँ से घूमकर आता है। पर वो रास्ता आपकी ओर ही आ रहा है।
दूसरी। इंतज़ार ख़ाली मत बैठिए। शबरी ने आश्रम सँवारा, सेवा की, भोजन इकट्ठा किया। आप भी रोज़ थोड़ा "संचित" कीजिए। एक नाम, एक भलाई, एक प्रार्थना।
और तीसरी। बुज़ुर्गों का इंतज़ार ख़त्म कीजिए। आज ही उस फ़ोन की घंटी बजा दीजिए, जो तकिए के बगल में रखा है। कभी-कभी भगवान किसी बेटे के रूप में ही दर्शन देते हैं।
तो अगर आपकी उम्र ढल रही है… और लगता है, "मेरी बारी कब आएगी"…
तो पम्पा के किनारे की उस बूढ़ी माँ को याद कीजिए।
उम्र भर का इंतज़ार… और एक कोमल नज़र में सब सफल हो गया।
जय श्री राम।
चक्षुषा तव सौम्येन पूतास्मि रघुनन्दन ।
गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिन्दम ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.भगवान का रास्ता लंबा दिख सकता है। चित्रकूट, पंचवटी, न जाने कहाँ-कहाँ से घूमकर आता है। पर वो रास्ता आपकी ओर ही आ रहा है।
- 2.इंतज़ार ख़ाली मत बैठिए। शबरी ने आश्रम सँवारा, सेवा की, भोजन इकट्ठा किया। आप भी रोज़ थोड़ा "संचित" कीजिए। एक नाम, एक भलाई, एक प्रार्थना।
- 3.बुज़ुर्गों का इंतज़ार ख़त्म कीजिए। आज ही उस फ़ोन की घंटी बजा दीजिए, जो तकिए के बगल में रखा है। कभी-कभी भगवान किसी बेटे के रूप में ही दर्शन देते हैं।