पार्वती की तपस्या

Pārvatī’s penance — Pārvatī’s long tapas, and Śiva in disguise testing her

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

अद्यप्रभृति ते दासस्तपोभिः क्रीत एव ते।
शिव पुराण, पार्वतीखण्ड 28.44

हर हर महादेव।

शादी में गए हैं कभी… और किसी मौसी ने कंधे पर हाथ रखकर पूछा हो — "बेटा, तुम्हारा नंबर कब आएगा?"

हँसकर टाल दिया होगा। पर घर लौटकर रात को… वही सवाल मन में घूमता रहता है।

रिश्ते आते हैं, बात चलती है, फिर बात रुक जाती है। फ़ोन पर प्रोफ़ाइलें आती रहती हैं। उम्र का एक-एक साल गिना जाता है। माँ-पापा कुछ कहते नहीं… पर उनकी आँखों में चिंता दिखती है।

और कभी-कभी तो दिल किसी एक पर टिका होता है… और सारी दुनिया कहती है, "वो तुम्हारे लायक़ नहीं।"

आज की कथा उसी इंतज़ार के बारे में है। जगदम्बा पार्वती के इंतज़ार के बारे में।

शिव पुराण कहता है — हिमालय की बेटी पार्वती ने मन में ठान लिया था, "मेरे पति होंगे तो बस शंकर।"

पर शंकर तो ध्यान में बैठे योगी थे। और एक दिन, कामदेव को भस्म करके, वो वहाँ से चले भी गए।

तब देवर्षि नारद ने समझाया — "शिव तप से ही मिलते हैं।" और पार्वती ने तय किया — "तो मैं तप करूँगी।"

अब सुनिए। आज के घरों जैसी ही बात हुई। पार्वती ने अपनी दो सखियों, जया और विजया को आगे किया। पहले पिता के पास भेजा। बेटियाँ जानती हैं, पापा जल्दी मान जाते हैं!

हिमवान बोले, "मुझे तो बहुत अच्छा लगता है। बस मेना को भी अच्छा लगे।"

पर माँ? माँ नहीं मानीं। मेना बोलीं — "बेटी, तेरा शरीर कोमल है, तप बहुत कठोर है। घर में ही पूजा कर ले। घर में ही सब देवता हैं, सब तीर्थ हैं। बाहर मत जा।"

माँ ने बहुत तरह से रोका। और शिव पुराण एक बहुत प्यारी बात कहता है — माँ के इसी रोकने के कारण पार्वती का एक नाम पड़ा… "उमा"।

पर बेटी उदास रहने लगी। उसे किसी बात में सुख नहीं मिलता था। और जब माँ ने उसे दुखी देखा… तो माँ ने ही आज्ञा दे दी।

राजकुमारी ने रेशमी कपड़े उतार दिए। हार उतार दिया। पेड़ की छाल के कपड़े पहने, मृगचर्म ओढ़ा। और चल पड़ीं हिमालय के उस शिखर पर, जहाँ शिव ने कामदेव को भस्म किया था।

वहाँ पहुँचीं… और जगह ख़ाली थी। शिव वहाँ नहीं थे। "हा हर!" कहकर वो रो पड़ीं।

बहुत देर बाद धीरज बाँधा। ज़मीन साफ़ की, एक वेदी बनाई। और पहले क्या किया, पता है? वहाँ पेड़ लगाए। फल देने वाले पेड़। और रोज़ सखियों के साथ उन्हें पानी देतीं।

फिर तप शुरू हुआ। गर्मी में चारों ओर आग जलाकर बीच में खड़ी रहतीं। बरसात में खुली चट्टान पर बैठकर भीगती रहतीं। सर्दी में पानी के भीतर खड़ी रहतीं। और होंठों पर एक ही मंत्र — पंचाक्षर। "नमः शिवाय।"

प्रथमं फलभोगेन द्वितीयं पर्णभोजनैः। तपः प्रकुर्वती देवी क्रमान्नीत्येमिताः समाः॥
22.47

पहले कुछ बरस फल खाकर बिताए। फिर बस पत्ते खाकर। और फिर… पत्ते भी छोड़ दिए।

आहारे त्यक्तपर्णाभूद्यस्माद्धिमवतः सुता। तेन देवैरपर्णेति कथिता नामतः शिवा॥
22.49

और यहाँ से उनका दूसरा नाम पड़ा। जिसने पर्ण यानी पत्ते भी छोड़ दिए… देवताओं ने उन्हें कहा — "अपर्णा।"

फिर एक पैर पर खड़ी होकर जप। जटा बँध गई। ऐसा तप कि बड़े-बड़े मुनि भी पीछे रह गए।

त्रीणि वर्षसहस्राणि जग्मुः काल्यास्तपोवने॥
22.52

तीन हज़ार वर्ष। सोचिए। हम तीन साल के इंतज़ार में टूट जाते हैं।

और एक दिन, थककर, पार्वती के मन से एक शिकायत निकली।

नियमस्थां महादेव किं मां जानासि नाधुना।
22.54

"महादेव… क्या आप अब भी मुझे नहीं जानते? मैं इतने समय से तप कर रही हूँ… और आप आए नहीं।"

ये शिकायत आपकी भी है न? "भगवान, मैंने सब ठीक किया। फिर भी क्यों नहीं?"

पर उसी समय उस वन में कुछ अजीब हो रहा था। शिव पुराण कहता है — वहाँ के जानवर, जो स्वभाव से दुश्मन थे, उनका बैर मिट गया। शेर और गाय पास-पास रहते, एक-दूसरे को नहीं सताते। बिल्ली और चूहा भी। और जो पेड़ पार्वती ने लगाए थे, सब फलों से लद गए। पूरा वन कैलास जैसा हो गया।

यानी इंतज़ार ख़ाली नहीं जा रहा था। फल आ रहे थे… बस उस तरफ़ से नहीं, जिधर आँखें लगी थीं।

अब कथा का सबसे बड़ा मोड़।

एक दिन आश्रम में एक बहुत बूढ़ा ब्राह्मण आया। जटाधारी। हाथ में डंडा, सिर पर छाता। वो स्वयं शिव थे। परीक्षा लेने आए थे।

पार्वती ने उठकर उनकी पूजा की, आदर से कुशल पूछा। और ब्राह्मण ने वही सवाल पूछा, जो आज भी हर लड़की से पूछा जाता है —

न बाला न च वृद्धासि तरुणी भासि शोभना। कथं पतिं विना तीक्ष्णं तपश्चरसि वै वने॥
26.11

"न तुम बच्ची हो, न बूढ़ी। जवान हो, सुंदर हो। बिना पति के इस वन में ऐसा कठोर तप क्यों कर रही हो?"

पार्वती ने अपनी पूरी कहानी कही। फिर बोलीं —

गच्छ त्वं प्रविशाम्यग्नौ शिवेनाङ्गीकृता न हि। यत्र यत्र जनुर्लप्स्ये वरिष्यामि शिवं वरम्॥
26.20

"अब आप जाइए। शिव ने मुझे स्वीकार नहीं किया, तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी। पर जहाँ-जहाँ जन्म लूँगी… वर तो शिव को ही चुनूँगी।"

ब्राह्मण बार-बार रोकते रहे। और पार्वती आग में उतर गईं।

और फिर वो हुआ, जिसकी कोई कल्पना नहीं करता।

बभूव तत्क्षणं सद्यो वह्निश्चन्दनपङ्कवत्॥
26.22

उनके तप के प्रभाव से… आग उसी क्षण चन्दन के लेप जैसी ठंडी हो गई!

अब ब्राह्मण ने असली परीक्षा शुरू की। वो शिव की ही निन्दा करने लगे। ख़ुद अपनी!

"जानती हो वो कैसे हैं? राख मलते हैं। साँप लपेटे रहते हैं। हाथी की खाल ओढ़ते हैं। भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं। जन्म का पता नहीं, घर-गृहस्थी का पता नहीं।"

दत्त्वा सुवर्णमुद्रां च ग्रहीतुं काचमिच्छसि।
27.21

"तुम सोने का सिक्का देकर काँच लेना चाहती हो!"

यदि द्रव्यं भवेत्तस्य कथं स्यात्स दिगम्बरः। वाहनं च बलीवर्दः सामग्री कापि तस्य न॥
27.31

"अगर उनके पास पैसा होता, तो कपड़े न पहनते? सवारी के नाम पर एक बैल है, और घर में कोई सामान नहीं!"

सुना आपने? नौकरी कैसी है, घर अपना है या नहीं, गाड़ी कौन-सी है… रिश्ते की ये बातें तब भी होती थीं। और स्वयं भगवान ने अपने बारे में कहलवाईं!

पार्वती का चेहरा तमतमा गया। और उन्होंने जो कहा, वो सुनने लायक़ है।

"आप शिव को जानते ही नहीं। जानते, तो ऐसी उल्टी बातें न करते। आप कहते हैं चिता की राख अपवित्र है? तो देवता वही राख अपने सिर पर क्यों लगाते हैं?"

और फिर वो पंक्ति, जो इस कथा का दिल है —

यथा तथा भवेद्रुद्रो यथा वा बहुरूपवान्। ममाभीष्टतमो नित्यं निर्विकारी सतां प्रियः॥
28.29

"रुद्र जैसे भी हों, कितने ही रूपों वाले हों… वो मुझे सबसे प्यारे हैं।"

उन्होंने सखी से कहा, "चलो, ये फिर निन्दा करेंगे। यहाँ से चलते हैं।" और जाने के लिए जैसे ही पैर उठाया…

शिव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

वही रूप। वही सुंदर रूप, जिसका पार्वती ध्यान करती थीं।

कुत्र यास्यसि मां हित्वा न त्वं त्याज्या मया पुनः।
28.43

"मुझे छोड़कर कहाँ जाओगी? अब मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा।"

अद्यप्रभृति ते दासस्तपोभिः क्रीत एव ते। क्रीतोऽस्मि तव सौन्दर्यात्क्षणमेकं युगाय ते॥
28.44

और सुनिए, महादेव क्या कहते हैं — "आज से मैं तुम्हारा दास हूँ। तुम्हारे तप ने मुझे ख़रीद लिया है। तुम्हारे बिना एक क्षण भी मुझे युग जैसा लगता है।"

जिन्हें देवता मनाते हैं… वो एक तपस्विनी के सामने कह रहे हैं, "मैं तुम्हारा दास हूँ।" और माफ़ी भी माँगते हैं — "मैंने तुम्हारी बहुत परीक्षा ली। क्षमा करना।"

तो जो आज किसी के इंतज़ार में बैठे हैं, उनके लिए तीन बातें।

पहली। इंतज़ार में पेड़ लगाइए। पार्वती ने तप से पहले पेड़ लगाए, रोज़ सींचे, आए हुए मेहमानों की सेवा की। अपनी पढ़ाई, अपना काम, अपनी सेहत, अपने माँ-बाप… इन्हें सींचिए। जिस दिन जवाब आएगा, आपका वन फलों से भरा मिलेगा।

दूसरी। लोग "काँच और सोने" का हिसाब लगाएँगे। पैसा, गाड़ी, घर। सुनिए, पर मन मत डोलने दीजिए। पार्वती ने देखा कि सामने वाला भीतर से कैसा है, ऊपर का वेश नहीं देखा। सही साथी की पहचान भी यही है।

और तीसरी। जब मन कहे, "भगवान, क्या आप मुझे अब भी नहीं जानते?"… तो याद रखिए, वो जानते हैं। वो पास ही खड़े हैं, किसी और वेश में। बस आपकी लगन देख रहे हैं।

फले जाते श्रमः पूर्वो जन्तोर्नाशमवाप्नुयात्॥
28.50

शिव पुराण कहता है — फल मिलते ही पहले की सारी थकान मिट जाती है। पार्वती के तीन हज़ार साल… एक पल में भूल गए।

तो अगली बार, जब कोई पूछे, "शादी कब?"… जब रात को अकेले में आँख भर आए…

तो उस वन को याद कीजिए, जहाँ आग भी चन्दन बन गई थी।

पार्वती की तपस्या… कभी ख़ाली नहीं जाती।

और जो सच्चा है, वो आएगा। और आकर कहेगा, "अब कभी नहीं छोड़ूँगा।"

हर हर महादेव।

अद्यप्रभृति ते दासस्तपोभिः क्रीत एव ते। क्रीतोऽस्मि तव सौन्दर्यात्क्षणमेकं युगाय ते॥
शिव पुराण, पार्वतीखण्ड 28.44

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.इंतज़ार में पेड़ लगाइए। पार्वती ने तप से पहले पेड़ लगाए, रोज़ सींचे, आए हुए मेहमानों की सेवा की। अपनी पढ़ाई, अपना काम, अपनी सेहत, अपने माँ-बाप… इन्हें सींचिए। जिस दिन जवाब आएगा, आपका वन फलों से भरा मिलेगा।
  2. 2.लोग "काँच और सोने" का हिसाब लगाएँगे। पैसा, गाड़ी, घर। सुनिए, पर मन मत डोलने दीजिए। पार्वती ने देखा कि सामने वाला भीतर से कैसा है, ऊपर का वेश नहीं देखा। सही साथी की पहचान भी यही है।
  3. 3.जब मन कहे, "भगवान, क्या आप मुझे अब भी नहीं जानते?"… तो याद रखिए, वो जानते हैं। वो पास ही खड़े हैं, किसी और वेश में। बस आपकी लगन देख रहे हैं।

इस सत्संग के श्लोक

शिव पुराण, पार्वतीखण्ड 28.44 22.47 22.49 22.52 22.54 26.11 26.20 26.22 27.21 27.31 28.29 28.43 28.44 28.50