बूढ़े पंख, बड़ा हौसला
Old wings, great courage — Jaṭāyu fights Rāvaṇa, and Śrī Rāma cremates him like a father
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नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम् ।
जय श्री राम।
घर के एक कोने में एक कुर्सी है। उस पर बैठे दादाजी। या नानी। चश्मा, अख़बार, और दवाइयों का डिब्बा।
घर में सब अपने-अपने काम में व्यस्त। कोई उनसे सलाह नहीं लेता। कोई उनसे कुछ नहीं पूछता। और कभी-कभी वो धीरे से कहते हैं — "अब हम किस काम के? बस बोझ हैं।"
या शायद आप ख़ुद उस उम्र में हैं। रिटायर हो गए। बच्चे विदेश में। घुटनों में दर्द। और मन पूछता है — "अब मेरी ज़िंदगी का क्या मतलब?"
आज एक बूढ़े पक्षी की कथा। जिसके पंख कमज़ोर थे, जो थक जाता था। और जिसके लिए स्वयं भगवान ने अपने हाथों से चिता सजाई।
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण पंचवटी जा रहे थे। रास्ते में एक बरगद पर एक विशाल गिद्ध बैठा था।
दोनों भाइयों ने पहले तो सोचा, कोई राक्षस है! पूछा, "आप कौन हैं?" और उस पक्षी ने बड़े मीठे स्वर में कहा —
उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मनः ॥
"बेटा, मुझे अपने पिता का मित्र समझो।"
और फिर अपना परिचय दिया — "मेरा नाम जटायु है। अरुण का बेटा। मेरा बड़ा भाई सम्पाति है।" और फिर वो बात कही, जो एक बुज़ुर्ग ही कह सकता है — "ये जंगल ख़तरनाक है। जब तुम और लक्ष्मण बाहर जाओगे, तो मैं सीता की रक्षा करूँगा।"
श्रीराम ने उन्हें गले लगाया, उनके आगे झुके। क्योंकि उनके मुँह से बार-बार पिता दशरथ की दोस्ती की बातें सुनी थीं। जैसे पिता का कोई पुराना दोस्त, बरसों बाद, जंगल में मिल गया हो।
और फिर वो दिन आया। रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया। रथ आकाश में उड़ रहा है। सीता रो रही हैं, पुकार रही हैं।
जटायु पेड़ पर ऊँघ रहे थे। अधसोए। पुकार सुनी। आँख खोली। और देखा — रावण, और उसकी गोद में वैदेही।
और वो बूढ़ा पक्षी रावण के सामने खड़ा हो गया।
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः ।
जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः ॥
"रावण! मैं पुराने धर्म पर टिका हूँ। सत्य पर चलता हूँ। मेरा नाम जटायु है।"
पहले उसने समझाया। "राजा होकर पराई स्त्री को छूते हो? जैसे अपनी पत्नी की रक्षा करते हो, वैसे दूसरों की करो। तुमने गले में काल का फंदा डाल लिया है, और देख नहीं रहे।"
और अब पहली चौंकाने वाली बात। जटायु ने अपनी उम्र बताई —
षष्टिर्वर्षसहस्राणि मम जातस्य रावण ।
"रावण, मुझे जन्मे साठ हज़ार बरस हो गए।"
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सशरः कवची रथी ।
तथाप्यादाय वैदेहीं कुशली न गमिष्यसि ॥
"मैं बूढ़ा हूँ। तुम जवान हो। तुम्हारे पास धनुष है, बाण हैं, कवच है, रथ है। फिर भी… वैदेही को लेकर तुम सकुशल नहीं जा पाओगे।"
सुना आपने? उसने अपनी कमज़ोरी छिपाई नहीं। मान ली। और फिर भी पीछे नहीं हटा।
नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम् ।
"मेरे जीते जी… तुम इसे नहीं ले जा पाओगे।"
और फिर एक बड़ी प्यारी बात कही — "रुको रावण! मैं तुम्हारा युद्ध से सत्कार करूँगा!" "युद्धातिथ्यं" — युद्ध की मेहमाननवाज़ी! बूढ़े दादाजी का अंदाज़ ही अलग था।
और युद्ध शुरू हुआ! रावण ने बाणों की बौछार की। जटायु ने पंखों से झाड़ दिए। पंजों से रावण का धनुष तोड़ दिया। फिर दूसरा धनुष भी! कवच गिरा दिया। रथ खींचने वाले गधे मार दिए। रथ तोड़ डाला। सारथि का सिर काट दिया!
और रावण, सीता को गोद में लिए, धरती पर गिर पड़ा। और सब प्राणियों ने कहा — "शाबाश! शाबाश!"
सोचिए। जिस रावण से देवता डरते थे, उसे एक बूढ़े गिद्ध ने ज़मीन पर गिरा दिया। न तलवार, न धनुष। बस नाख़ून, पंख और चोंच।
पर फिर… वाल्मीकि एक बहुत सच्ची बात लिखते हैं। रावण ने देखा कि पक्षी बुढ़ापे से थक गया है। और उसी थकान का फ़ायदा उठाकर, रावण सीता को लेकर फिर उड़ा।
पर जटायु ने फिर रास्ता रोका। और ललकारा — "रावण, जो तुमने किया है, ये चोरों का रास्ता है, वीरों का नहीं! हिम्मत है तो रुककर लड़ो!"
और जटायु फिर झपटे। रावण की पीठ पर चढ़ गए। नाख़ूनों से, चोंच से वार किया। और तब रावण ने तलवार उठाई… और जटायु के पंख, पैर, सब काट डाले।
और वो बूढ़ा पक्षी धरती पर गिर पड़ा। ख़ून से भीगा। और सीता दौड़ीं उसकी ओर, जैसे कोई अपना गिरा हो। उसे गले लगाकर रोईं।
फिर श्रीराम सीता को ढूँढते-ढूँढते वहाँ पहुँचे। और पहले तो उन्हें लगा, ये कोई राक्षस है जिसने सीता को खा लिया! धनुष पर बाण चढ़ा लिया।
तब उस पक्षी ने, ख़ून उगलते हुए, कमज़ोर आवाज़ में कहा — "बेटा, जिसे तुम ढूँढ रहे हो, उसे और मेरे प्राण, दोनों रावण ले गया। मैंने उसका रथ तोड़ा। ये देखो, उसका टूटा धनुष। ये उसका सारथि। मैं थक गया था… उसने मेरे पंख काट दिए।"
श्रीराम ने धनुष फेंक दिया। और उस गिद्ध को गले लगाकर ज़मीन पर गिर पड़े। लक्ष्मण के साथ रोए।
और अब एक बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं। जटायु ने मरते-मरते श्रीराम को एक अनोखी बात बताई —
विन्दो नाम मुहूर्तोऽयं स च काकुत्स्थ नाबुधत् ।
"राम, रावण जिस घड़ी में सीता को ले गया, उस मुहूर्त का नाम 'विन्द' है। उस घड़ी में जो धन खोता है, उसका मालिक उसे जल्दी वापस पा लेता है। और रावण ये नहीं जानता था।"
सोचिए। पंख कटे हैं, साँस टूट रही है… और वो बूढ़ा पक्षी अपना सारा ज्ञान, सारा अनुभव, एक आख़िरी तसल्ली में बदल रहा है। "राम, जानकी की चिंता मत करो। तुम उस राक्षस को मारोगे, और उसे वापस पाओगे।"
मरते हुए भी, तसल्ली दे रहे थे। जैसे दादाजी देते हैं।
और फिर, "वो विश्रवा का बेटा है, कुबेर का भाई"… ये कहते-कहते प्राण छूट गए। श्रीराम हाथ जोड़े कहते रहे, "बोलो! बोलो!" पर पक्षी के प्राण आकाश में चले गए।
और अब वो पंक्तियाँ, जो इस कथा को अमर बनाती हैं।
गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत् ।
मम हेतोरयं प्राणान्मुमोच पतगेश्वरः ॥
श्रीराम बोले — "लक्ष्मण, इसने अपने बाप-दादों का बड़ा राज्य छोड़ा… और मेरे लिए प्राण दे दिए।"
सीताहरणजं दुःखं न मे सौम्य तथागतम् ।
यथा विनाशे गृध्रस्य मत्कृते च परंतप ॥
"सीता के हरण का दुख मुझे उतना नहीं हुआ… जितना मेरे लिए मरे इस गिद्ध की मृत्यु का।"
और दूसरी बात, जो सबसे बड़ी है —
राजा दशरथः श्रीमान्यथा मम महायशाः ।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः ॥
"जैसे मेरे पिता राजा दशरथ मेरे लिए पूज्य हैं… वैसे ही ये पक्षियों के राजा।"
और श्रीराम ने कहा, "लक्ष्मण, लकड़ियाँ लाओ। मैं इनका दाह-संस्कार करूँगा।" अपने हाथों से आग जलाई। चिता पर रखा।
ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः ॥
और दुखी मन से, अपने सगे की तरह, उनका अंतिम संस्कार किया। पिंड दिए। पितरों का मंत्र पढ़ा। और गोदावरी में जाकर जल-तर्पण किया।
जो पिता के अंतिम संस्कार में नहीं पहुँच पाए थे… उन्होंने एक बूढ़े पक्षी को पिता मानकर विदा किया।
गीता में भगवान कहते हैं —
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
"धर्म के लिए किया गया थोड़ा-सा प्रयास भी… बड़े डर से बचा लेता है।" जटायु सीता को बचा नहीं पाए। पर उनकी कोशिश व्यर्थ नहीं गई। श्रीराम को रास्ता मिला — "वो दक्षिण की ओर गया।" और जटायु को वो गति मिली, जो बड़े-बड़े यज्ञ करने वालों को मिलती है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। बुढ़ापा बेकार होने का नाम नहीं। जटायु ने कहा, "मैं बूढ़ा हूँ, तुम जवान हो।" और फिर भी लड़े। आपका अनुभव, आपकी सलाह, आपकी एक दुआ — किसी के लिए रावण का रथ तोड़ सकती है।
दूसरी। जो बच्चे सुन रहे हैं — घर के बुज़ुर्गों को श्रीराम की नज़र से देखिए। "जैसे मेरे पिता पूज्य, वैसे ये।" उनकी कुर्सी के पास बैठिए। उनसे पूछिए। वो बोझ नहीं, आपके घर के जटायु हैं। आपके घर की रखवाली आज भी वही कर रहे हैं।
और तीसरी। परिणाम पर मत अटकिए। जटायु जीते नहीं, फिर भी जीत गए। भगवान ये नहीं देखते कि आप सफल हुए या नहीं। वो देखते हैं कि आप सही के लिए खड़े हुए या नहीं।
तो अगली बार, जब घुटनों का दर्द कहे "अब हमसे क्या होगा"… जब घर के कोने वाली कुर्सी अकेली लगे…
तो पंचवटी के उस आकाश को याद कीजिए। साठ हज़ार बरस का एक पक्षी। थके पंख। और सामने रावण का चमचमाता रथ।
"मेरे जीते जी… तुम इसे नहीं ले जा पाओगे।"
बूढ़े पंख। बड़ा हौसला। और भगवान के हाथों से सजी चिता।
जय श्री राम।
राजा दशरथः श्रीमान्यथा मम महायशाः ।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.बुढ़ापा बेकार होने का नाम नहीं। जटायु ने कहा, "मैं बूढ़ा हूँ, तुम जवान हो।" और फिर भी लड़े। आपका अनुभव, आपकी सलाह, आपकी एक दुआ — किसी के लिए रावण का रथ तोड़ सकती है।
- 2.जो बच्चे सुन रहे हैं — घर के बुज़ुर्गों को श्रीराम की नज़र से देखिए। "जैसे मेरे पिता पूज्य, वैसे ये।" उनकी कुर्सी के पास बैठिए। उनसे पूछिए। वो बोझ नहीं, आपके घर के जटायु हैं। आपके घर की रखवाली आज भी वही कर रहे हैं।
- 3.परिणाम पर मत अटकिए। जटायु जीते नहीं, फिर भी जीत गए। भगवान ये नहीं देखते कि आप सफल हुए या नहीं। वो देखते हैं कि आप सही के लिए खड़े हुए या नहीं।