चिंता किसकी?
Whose worry is it? — “Yoga-kṣemaṃ vahāmy aham” — I carry what my devotee needs
योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
जय श्री कृष्ण।
रात के ढाई बजे हैं। घर में सब सो रहे हैं। और एक आदमी छत की तरफ़ देख रहा है।
दिमाग़ में हिसाब चल रहा है। बेटे की फ़ीस अगले महीने। माँ की दवाइयाँ हर हफ़्ते। घर का किराया। और आज ऑफ़िस में सुना कि छँटनी होने वाली है।
उसे अपनी चिंता नहीं है। उसे उनकी चिंता है, जो उस पर निर्भर हैं। बच्चे, बूढ़े माँ-बाप, पत्नी। "मुझे कुछ हो गया, तो इनका क्या होगा? नौकरी गई, तो ये कैसे खाएँगे?"
आप में से बहुत लोग इस रात को जानते हैं। कमाने वाले की रात। घर चलाने वाली की रात।
आज की कथा एक ऐसे आदमी की है, जिसकी ये रात… बारह साल लंबी थी।
युधिष्ठिर। कल तक सम्राट थे। इन्द्रप्रस्थ का वैभव, राजसूय यज्ञ, हज़ारों लोगों को रोज़ भोजन। और आज? जुए में सब हार चुके हैं। बारह साल का वनवास।
सुबह होती है। पाण्डव वन जाने को निकलते हैं। और देखते हैं — दरवाज़े पर सैकड़ों ब्राह्मण खड़े हैं। वो भी साथ चलने को तैयार।
युधिष्ठिर हाथ जोड़कर बोले — "हमारा सब छिन गया है। राज्य, धन, सब। हम ख़ुद फल-मूल खाकर जिएँगे। जंगल में साँप हैं, जंगली जानवर हैं। आप सब लौट जाइए। मैं आपको कष्ट में नहीं देख सकता।"
और ब्राह्मणों ने जो कहा, वो बहुत सुंदर है —
अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव ।
स्वयमाहृत्य वन्यानि त्वानुयास्यामहे वयम् ॥
"राजन्, हमारे खाने की चिंता अपने मन में मत लाइए। हम ख़ुद जंगल से फल-मूल लाकर खा लेंगे। बस आपके साथ चलेंगे।"
पर युधिष्ठिर का मन नहीं माना। बोले — "मैं आप सबको अपने हाथ से खाना ढूँढकर खाते कैसे देखूँगा? मेरी वजह से?" और इतना कहकर… ज़मीन पर बैठ गए। शोक में डूबकर।
सम्राट ज़मीन पर। सिर पकड़े हुए। बिल्कुल उस आदमी की तरह, जो रात के ढाई बजे छत देख रहा है।
तब शौनक नाम के एक ज्ञानी ब्राह्मण आगे आए। और उन्होंने एक बात कही, जो सीधे दिल पर लगती है —
शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च ।
दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
"शोक के हज़ार कारण, और ख़ुशी के सौ कारण… रोज़-रोज़ नासमझ को घेरते हैं। समझदार को नहीं।"
अब ध्यान दीजिए। हज़ार शोक के, सौ ख़ुशी के। यानी चिंता के कारण हमेशा ख़ुशी के कारणों से दस गुना ज़्यादा मिलेंगे! अगर कारण ढूँढने निकलेंगे, तो कभी कमी नहीं पड़ेगी।
और फिर शौनक ने समझाया — धन कमाने में दुःख, बचाने में दुःख, खोने में दुःख, ख़र्च करने में भी दुःख। और एक उपमा दी — जैसे मांस के टुकड़े को आकाश में पक्षी, ज़मीन पर जानवर, और पानी में मछलियाँ नोचती हैं… वैसे ही धन वाले को चारों तरफ़ से लोग नोचते हैं।
यानी जिनके पास नहीं है, वो इसलिए परेशान हैं कि नहीं है। और जिनके पास है… वो इसलिए परेशान हैं कि है! और एक बात कही, जो हमारी पीढ़ी पर बिल्कुल फ़िट बैठती है —
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
"आदमी बूढ़ा हो जाता है… पर उसकी चाह बूढ़ी नहीं होती।"
अब युधिष्ठिर ने जो उत्तर दिया, उस पर ध्यान दीजिए। क्योंकि यही आज के हर कमाने वाले का उत्तर है।
कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे ।
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥
"महाराज, मुझे धन अपने भोग के लिए नहीं चाहिए। मैं गृहस्थ हूँ। जो मेरे भरोसे चले आए हैं, उनका पेट मैं कैसे न भरूँ?"
और फिर उन्होंने एक श्लोक कहा, जो मुझे पूरे वनपर्व में सबसे प्यारा लगता है —
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥
"बैठने को घास का आसन, ज़मीन, पानी… और चौथी चीज़ — मीठी, सच्ची बोली। सज्जनों के घर में ये चार चीज़ें कभी ख़त्म नहीं होतीं।"
सोचिए! जिसके पास सब कुछ छिन गया हो, वो भी ये चार चीज़ें दे सकता है। एक कुर्सी। एक गिलास पानी। और एक मीठा शब्द। और इनकी EMI भी नहीं भरनी पड़ती!
अब युधिष्ठिर पहुँचे अपने पुरोहित धौम्य के पास। "महाराज, ये ब्राह्मण मेरे साथ आ रहे हैं। न मैं इन्हें छोड़ सकता हूँ, न खिला सकता हूँ। क्या करूँ?"
और धौम्य ने एक बहुत सुंदर बात बताई। ध्यान से सुनिए, ये पहली चौंकाने वाली बात है।
"राजन्, ये अन्न आता कहाँ से है? सूर्य अपनी किरणों से धरती का पानी ऊपर खींचता है। फिर वही पानी बादल बनकर लौटता है। चंद्रमा पौधों को सींचता है। और धरती पर अनाज उगता है।"
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् ।
नाथोऽयं सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज ॥
"इस तरह जो अन्न सबके प्राण टिकाए है, वो सूर्य से बना है। वो सब प्राणियों का पालनहार है। उसकी शरण में जाओ।"
सोचिए। आपकी थाली की रोटी… आसमान से होकर आई है। आपने गेहूँ ख़रीदा, पर उसे उगाया किसने? पानी किसने उठाया? बादल किसने भेजा? रोटी हम कमाते हैं। पर अन्न… कोई और भेजता है।
और युधिष्ठिर गंगा में उतरे। गले तक पानी में खड़े हुए। सिर्फ़ हवा पीकर, मन को साधकर… और सूर्य की स्तुति की। और स्तुति के अंत में एक बहुत सीधी-सी प्रार्थना —
त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः ।
अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयाऽर्हसि ॥
"हे अन्न के स्वामी! मेरी इच्छा संकट में है। मैं सबका सत्कार करना चाहता हूँ। मुझे अन्न दीजिए।"
अपने लिए नहीं माँगा। मेहमानों के लिए माँगा।
और सूर्य देव प्रकट हुए! जलती आग की तरह चमकते हुए। और बोले —
यत्तेऽभिलषितं किंचित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि ।
अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः ॥
"जो चाहा, सब मिलेगा। सात और पाँच — बारह साल तक मैं तुम्हें अन्न दूँगा।"
और एक ताँबे का बर्तन दिया। "जब तक द्रौपदी इससे परोसेगी, फल, मूल, साग, जो भी पकेगा… वो कभी नहीं घटेगा।" और फिर दूसरी चौंकाने वाली बात — सूर्य ने साथ में एक वचन और दिया, जो किसी ने माँगा भी नहीं था — "अब से चौदहवें साल में… तुम्हें तुम्हारा राज्य वापस मिलेगा।"
बारह साल का खाना भी, और उसके बाद का भविष्य भी। भगवान से एक चीज़ माँगिए, वो पूरा रास्ता दिखा देते हैं।
और अब तीसरी बात, जो मुझे सबसे गहरी लगती है। उस बर्तन से खाना कैसे बँटता था?
पहले ब्राह्मण खाते। फिर युधिष्ठिर अपने भाइयों को खिलाते। फिर जो बचता, वो युधिष्ठिर ख़ुद खाते। और सबसे आख़िर में… द्रौपदी। और द्रौपदी के खाते ही उस दिन का अन्न समाप्त।
यानी जिसके हाथ में घर था… वो सबसे आख़िर में खाता था। जैसे हमारे घरों में माँ।
और यही तो वो आदमी है जो रात के ढाई बजे जागता है। जो सबसे आख़िर में खाता है। उसके लिए भगवान ने एक वचन दिया है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा —
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
इस श्लोक के दो शब्द समझिए। "योग" — जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे दिलाना। और "क्षेम" — जो तुम्हारे पास है, उसे बचाए रखना।
नौकरी नहीं है, तो नौकरी — वो योग। नौकरी है, तो उसकी रक्षा — वो क्षेम। बच्चे की फ़ीस — योग। माँ की सेहत — क्षेम।
और भगवान कहते हैं — "वहामि"। "मैं ढोता हूँ।" "देता हूँ" नहीं कहा। "ढोता हूँ" कहा। जैसे कोई कुली आपका भारी सामान अपने सिर पर उठा ले।
पर शर्त क्या है? "अनन्याः चिन्तयन्तः" — जो मेरी चिंता करते हैं। देखिए, कितना सुंदर सौदा है! आप भगवान की चिंता कीजिए… भगवान आपकी चिंता करेंगे।
तो सवाल ये है — आज रात आप किसकी चिंता करेंगे?
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। कमाना आपका काम है। मेहनत कीजिए, नौकरी ढूँढिए, हिसाब रखिए। युधिष्ठिर ने भी उपाय पूछा, तप किया। पर ढोना… भगवान पर छोड़िए। "वहाम्यहम्।"
दूसरी। जब हाथ ख़ाली हों, तब भी चार चीज़ें दी जा सकती हैं। आसन, ज़मीन, पानी, और मीठा शब्द। ग़रीबी में भी घर का दरवाज़ा खुला रखिए।
और तीसरी। आज रात सोने से पहले, थाली की रोटी को एक पल देखिए। वो सूरज से होकर आई है। बादल से होकर। किसी किसान के हाथ से होकर। जिसने आज तक हर दिन भेजी… वो कल भी भेजेगा।
तो जब रात के ढाई बजे हिसाब चलने लगे… जब छत की ओर देखते-देखते सुबह होने लगे…
तो उस सम्राट को याद कीजिए, जो ज़मीन पर बैठा था… और जिसके हाथ में बारह साल का अन्न आ गया।
चिंता किसकी? वो ढो रहे हैं।
जय श्री कृष्ण।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.कमाना आपका काम है। मेहनत कीजिए, नौकरी ढूँढिए, हिसाब रखिए। युधिष्ठिर ने भी उपाय पूछा, तप किया। पर ढोना… भगवान पर छोड़िए। "वहाम्यहम्।"
- 2.जब हाथ ख़ाली हों, तब भी चार चीज़ें दी जा सकती हैं। आसन, ज़मीन, पानी, और मीठा शब्द। ग़रीबी में भी घर का दरवाज़ा खुला रखिए।
- 3.आज रात सोने से पहले, थाली की रोटी को एक पल देखिए। वो सूरज से होकर आई है। बादल से होकर। किसी किसान के हाथ से होकर। जिसने आज तक हर दिन भेजी… वो कल भी भेजेगा।