पितृदोष असल में क्यों लगता है — छूटे हुए घरेलू नियम, राहु, अधूरे संस्कार और धीमा निकास
वक्ता के अनुसार पितृदोष कैसे धीरे-धीरे जमा होता है जब परिवार पूर्वजों के नित्य नियम और मृत्यु-संस्कार छोड़ देते हैं, और त्वरित टोटकों की जगह वे कौन-सा लंबा, प्रचंड उपाय बताते हैं।
20 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
2 also answer a common question
Questions this answers
2 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
भ्रांति: पितृदोष आसानी से और रातों-रात लग जाता है
हर कोई बोल देता है, इसलिए उपहास बन गया
वक्ता कहते हैं कि जब दिक्कत बहुत बढ़ जाती है और व्यक्ति किसी योग्य ज्योतिषी या तांत्रिक से चर्चा करता है, तो उसे बताया जाता है कि पितृ दोष लगा है, या कुंडली में ग्रहण योग है, नवम या दूसरे भाव में पितृदोष का योग है, पंचम में नागदोष है। चूँकि आजकल कोई भी यह बोल देता है, लोगों ने इसे उपहास बना दिया है और पूछते हैं कि क्या यह इतना सस्ता है। वे मानते हैं कि नहीं: पितृदोष इतनी आसानी से नहीं लगता और कभी भी आज किया, कल लग गया, ऐसा नहीं होता।
वक्ता आरंभ में यह प्रश्न उठाते हैं कि पितृ दोष आखिर कब लगता है। वे आम दृश्य बताते हैं: जब जीवन में दिक्कत बहुत बढ़ जाती है और व्यक्ति किसी योग्य ज्योतिषी या तांत्रिक से चर्चा करता है, तो उसे बताया जाता है कि पितृदोष लगा हुआ है, या जन्म कुंडली में ग्रहण योग है, नवम या दूसरे भाव में पितृदोष का योग है, पंचम में नागदोष है। वे कहते हैं कि बार-बार यही सुनकर लोगों ने इस विषय को उपहास का विषय बना दिया है: जिसको देखो वही मुँह उठाकर बोल देता है कि पितृदोष लगा है, तो क्या यह इतना सस्ता है, इतना आसान है? वे उत्तर देते हैं कि बात बिल्कुल सही है। इतना आसान नहीं है, और पितृदोष कभी भी बहुत शीघ्रता से, आज किया और कल लग गया, ऐसे नहीं लगता।
पूर्वजों के नित्य नियम जो पितृदोष से बचाते थे
संध्या, कुलदेवी, यज्ञोपवीत, सूर्य अर्घ्य, गौ सेवा
वक्ता कहते हैं कि जब आपसे कहा जाए कि पितृ दोष लगा है, तो सबसे पहले यह देखें कि क्या आप वैसे जी रहे हैं जैसे आपके परदादा, दादा और पिता जीते थे। वे कम से कम सुबह-शाम संध्या नित्य नियम से करते होंगे, कुलदेवी की परंपरा का पूजन करते रहे होंगे, यज्ञोपवीत धारण करके उसके नियम की गायत्री संध्या, चाहे दस मिनट की ही हो, अवश्य करते होंगे, सूर्य को नित्य अर्घ्य देते होंगे, और घर की गाय-गोवंश की विधिवत सेवा करते होंगे, जिसमें कोई कमी नहीं रहती होगी।
वक्ता कहते हैं कि जब वर्तमान समय में आपसे कहा जाए कि पितृ दोष लगा है या इससे संबंधित कोई दिक्कत है, तो सबसे पहला विषय यह देखें: क्या आप अभी अपने जीवन का निर्वहन उसी तरह कर रहे हैं जैसे आपके परदादा, दादा और पिता के समय में चला करता था? वे कहते हैं कि वे लोग कम से कम सुबह और शाम को संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। कर लिया करते होंगे; यह उनका नित्य का नियम रहा होगा। कुलदेवी की परंपरा का जो पूजन होगा, वह अवश्य करते रहे होंगे। यज्ञोपवीत अवश्य धारण करते रहे होंगे, और उसके नियम के अनुसार गायत्री संध्या आदि, चाहे दस मिनट की ही क्यों न हो, अवश्य करते होंगे। सूर्य को नित्य अर्घ्य देते होंगे। अगर घर में गाय, गोवंश आदि हैं तो उनकी विधिवत सेवा करते होंगे, और उस सेवा में कोई कमी नहीं रहती होगी।
वार्षिक श्राद्ध तिथि से होता है, कैलेंडर की तारीख से नहीं
गलत महीने में खिसका श्राद्ध हो ही नहीं सकता
वक्ता कहते हैं कि पूर्वज अपने ज्ञात पूर्वजों, पिता और दादा, का वार्षिक श्राद्ध तिथि के अनुसार ही करते थे। आज लोग कैलेंडर से करते हैं: इस साल 12 सितंबर, अगले साल भी 12 सितंबर, इसकी परवाह किए बिना कि मृत्यु किस तिथि और किस महीने में हुई थी। जो बरसात में मरा, उसका श्राद्ध अगहन में हो रहा है, और वे पूछते हैं कि वह श्राद्ध कहाँ से होगा।
वक्ता कहते हैं कि नित्य नियमों के अलावा पूर्वज जिन पहले के पूर्वजों के बारे में जानते थे, अपने पिता और दादा, उनका वार्षिक श्राद्ध तिथि के अनुसार अवश्य करते होंगे। आजकल, वे कहते हैं, लोग कैलेंडर के अनुसार कर देते हैं: तिथि को भूल जाइए, 12 सितंबर था तो अगले साल भी 12 सितंबर। जिस दिन मरे थे उस दिन कौन सी तिथि, कौन सा महीना था, उससे कोई लेना-देना नहीं। कोई बरसात में मरा, और अब तारीख खिसकाकर उसका श्राद्ध अगहन में हो रहा है। वे पूछते हैं कि वह श्राद्ध कहाँ से होगा? ऐसे अनेक विषय, वे कहते हैं, मिल जाएंगे।
पंचबली और भूमि पर बैठकर भोजन
गाय, कुत्ता, कौवा, मनुष्य, चींटी को रोज़ भोजन
वक्ता कहते हैं कि पहले के लोग पंचबलि अवश्य करते थे, यानी गाय, कुत्ते, कौवे, मनुष्य और चींटी को भोजन कराना, और इन सब नियमों का पालन करते थे। वे नीचे भूमि पर बैठकर खाते थे, सोफे और टेबल पर नहीं। इन सबका, वे ज़ोर देकर कहते हैं, बिल्कुल असर पड़ता है, और इन्हें छोड़ना उन चूकों में है जिनसे पितृ दोष बनता है।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में लोग पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ। अवश्य करते थे: गाय को, कुत्ते को, कौवे को, मनुष्य को और चींटी को भोजन कराना। इन सभी नियमों का पालन करते थे। वे नीचे बैठकर, भूमि पर खाते थे, सोफे और टेबल पर बैठकर नहीं। इन सभी का, वे ज़ोर देकर कहते हैं, बिल्कुल असर पड़ता है, और इन्हें छोड़ने को वे उन चूकों में गिनते हैं जिनसे पितृ दोष धीरे-धीरे बनता है।
चूल्हे की अग्नि प्रथम देवता है: बिना नहाए स्पर्श नहीं
बिना नहाए चाय की गैस जलाना अग्नि का अपमान
वक्ता कहते हैं कि घर के चूल्हे की अग्नि को प्रथम देवता कहा जाता था, और घर की कोई स्त्री या कुलवधू बिना स्नान किए उसे स्पर्श नहीं करती थी, न चूल्हा जलाती थी; उन्होंने अपने बड़ों को यह नियम कड़ाई से निभाते देखा है। आज रात में गृहस्थी का काम करके सुबह उठते ही गैस जलाकर चाय बनती है, तो सबसे पहले अग्नि का अपमान होता है। वे पूछते हैं कि यह कहाँ भोगोगे?
वक्ता कहते हैं कि घर के चूल्हे की अग्नि को घर की स्त्री बिना नहाए स्पर्श नहीं करती थी। उसे सबसे प्रथम देवता कहा जाता था। वे कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में स्वयं देखा है कि उनके परिवार के बड़े लोग इन नियमों का कितना पालन करते थे: घर की स्त्रियाँ, कुलवधुएँ बिना स्नान किए अग्नि को स्पर्श नहीं करती थीं, चूल्हे में आग नहीं जलाती थीं। आजकल क्या स्थिति है? रात में गृहस्थी का काम किया, सुबह उठकर गैस जलाकर चाय बना रहे हैं। तो अग्नि का अपमान सबसे पहले वहीं हो रहा है, और वे पूछते हैं कि यह कहाँ भोगोगे?
पितृदोष की प्रबलता में राहु सबसे बड़ा कारक
बुद्धि भ्रमित, बर्बादी आनंद जैसी लगती है
वक्ता कहते हैं कि राहु सबसे पहले बुद्धि को इतना भ्रमित कर देते हैं कि घर के नियमों की सारी चूकें राहु दोष के कारण बनती हैं, और पितृ दोष की प्रबलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राहु की ही है। राहु व्यक्ति को जर्जर अवस्था तक ले जाते हैं जबकि वह सोचता है कि सब आनंद में चल रहा है, और उसके अपने दुष्कृत्य ही काम करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले तो राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। बुद्धि को इतना भ्रमित कर देते हैं कि ये सभी चूकें राहु दोष के कारण बनती हैं। पितृ दोष की प्रबलता में सबसे महत्वपूर्ण कारक, जो भूमिका निभाता है, वह यही राहु देव हैं। वे कहते हैं कि राहु व्यक्ति को इतनी जर्जर अवस्था तक ले जाते हैं कि वह सोचता है कि सब आनंद में चल रहा है, जबकि उसके अपने सारे दुष्कृत्य कार्य कर रहे होते हैं।
चौखट: तुलसी के साथ पूजी जाने वाली देहरी, जो अब घरों से गायब है
देहरी पर दीपदान, एक खोई हुई घरेलू विधि
वक्ता कहते हैं कि चौखट, यानी देहरी, घरों से गायब हो चुकी है जबकि उसका बहुत विशेष महत्व है। पहले तुलसी जी के पूजन के साथ-साथ चौखट का पूजन होता था, और वहाँ दीपदान की विधि थी। वे कहते हैं कि चैनल पर चौखट पर तीन-चार वीडियो हैं और वे एक और बनाएंगे कि उसका पूजन क्यों होता था; वे यह भी पूछते हैं कि चौखट लगवाकर पूजने से कौन सी मर्यादा टूट जाएगी।
वक्ता एक और कमी बताते हैं: चौखट, यानी देहरी, घरों से गायब हो चुकी है। चौखट का बहुत विशेष महत्व है, वे कहते हैं। चैनल पर उस पर पहले से तीन-चार वीडियो हैं और वे उसका महत्व समझाने के लिए एक और बनाएंगे: चौखट का पूजन क्यों होता था और वहाँ दीपदान की विधि क्यों थी। पहले तुलसी जी के पूजन के साथ-साथ चौखट का पूजन हुआ करता था। बाद में वे इसे उन लोगों के जवाब में दोहराते हैं जो कहते हैं कि समय बदल गया: चौखट लगवा लोगे तो कौन सी मर्यादा का उल्लंघन हो जाएगा? चौखट का पूजन कर दोगे तो कौन से नियम का उल्लंघन हो जाएगा?
प्रबल पितृदोष तभी लगता है जब परिवार अपने नियमों से पतित हो जाए
"समय बदल गया" वाले बहाने का जवाब
वक्ता कहते हैं कि जब तक कोई परिवार देवयोग से या अपने कर्म से पतित नहीं हो जाता था और इन घरेलू नियमों को निभाता रहता था, तब तक प्रबल पितृ दोष जल्दी नहीं लगता था; प्रेत, पिशाच और अभिचार का विषय अलग है। पूछने पर कि आप कौन सा नियम पालते हैं, एक ही जवाब मिलता है कि समय बदल गया। वे कहते हैं कि तब भी खाना खाते थे, अब भी खाते हो, बस खाने का तरीका बदल दिया तो दोष लग रहा है; चौखट लगवाने से कोई मर्यादा नहीं टूटती, और जो पचास सजावटी पेड़ लगाता है उसकी आत्मा तुलसी लगाने में काँपती है।
वक्ता कहते हैं कि इन सभी कारणों से, जब तक कोई परिवार देवयोग से या अपने कर्म के कारण पतित नहीं हो जाता था, तब तक उस परिवार में पितृ दोष जल्दी नहीं लगता था। प्रेत, पिशाच और अभिचार का विषय इससे हमेशा अलग रहा है; लेकिन जो पूरा, प्रबल पितृदोष होता है, वह इन नियमों का लगातार पालन करने वालों को जल्दी नहीं लगता था। वे पूछते हैं: इन नियमों में से आप कौन सा पालते हैं? एक ही जवाब मिलेगा: वह समय अलग था, अभी का अलग है, हम समय के अनुसार बदल चुके हैं, आज के समय में ऐसे कौन रहेगा? वे जवाब देते हैं कि उस समय भी खाना खाते थे, अभी भी खाते हो; खाने का तरीका बदल दिया तो दोष लग रहा है। तब भी लोग घर में रहते थे, अब भी रहते हैं। चौखट लगवा लोगे तो कौन सी मर्यादा का उल्लंघन होगा? चौखट का पूजन कर दोगे तो कौन सा नियम टूटेगा? घर में पचास तरह के सजावटी पेड़-पौधे लगा सकते हो, लेकिन तुलसी लगाने में आत्मा काँप जाती है। तो दिक्कत तो है ना?
सुबह देवताओं का समय, शाम की संध्या पितरों की
दोनों संधियाँ जिम, चाय और टहलने में गँवाई
वक्ता कहते हैं कि देवताओं का समय सुबह का है और शाम की संध्या पितृों के निमित्त मानी गई है; इन दोनों संध्याओं में की गई संध्या उपासना, पूजन और दीपदान से देव और पितर दोनों तृप्त और प्रसन्न होते हैं। फिर भी लोग दोनों समय गायब रहते हैं: शिफ्ट हो तो चार बजे उठ जाते हैं, वरना नौ बजे तक सोते हैं, मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग और जिम के लिए तैयार, पर स्नान, संध्या और सूर्यनारायण को अर्घ्य, जिससे पितर तृप्त रहें, वह नहीं होता। शाम की संध्या का समय चाय-कॉफी और टहलने में जाता है।
वक्ता कहते हैं कि शिफ्ट की ड्यूटी हो तो आप सुबह चार-पाँच बजे उठ सकते हो, लेकिन सामान्य दिनों में आराम से नौ बजे तक सोते हो। जबकि देवताओं का समय सुबह का होता है, और शाम की संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। पितृों के निमित्त मानी गई है। इन दोनों संध्याओं में जो संध्या उपासना, पूजन और दीपदान होता है, उससे देव और पितर दोनों तृप्त और प्रसन्न होते हैं। वे कहते हैं कि इन दोनों समयों में आप गायब रहते हो। सुबह उठ नहीं सकते, पर मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग, जिम, योग, शरीर को तोड़ना-मरोड़ना, यह सब करोगे। लेकिन अगर कहा जाए कि पहले स्नान करके संध्या कर लो, सूर्यनारायण को अर्घ्य दे दो, इससे पितरों की कृपा रहेगी, पितर तृप्त रहेंगे, देवता प्रसन्न रहेंगे, तो वह आपसे नहीं होगा। और शाम को जब संध्या का समय होता है, तो वह चाय-कॉफी का, घूमने-टहलने का समय हो जाता है, अगर कोई घर पर हो भी तो। तो नहीं होता।
कलिकाल में वैदिक संध्या का विकल्प: तंत्र मार्ग
तंत्र आगम मार्ग है, जादू-टोना नहीं
वक्ता कहते हैं कि जिनके पास समय नहीं है, उनके लिए यह देखें कि आज के समय में वेदोक्त वैध मार्ग पर चलने वाले वैसे भी कम हैं; कलिकाल में यह संभव नहीं है, और भगवान ने स्वयं कहा है कि कलिकाल में वैदिक कार्य जल्दी सफल नहीं होंगे। इसीलिए विकल्प के रूप में तंत्र मार्ग बनाया गया। लोग सोचते हैं तंत्र का मतलब भूत-प्रेत, जादू-टोना, गला काटना, तंत्र से मार देना, और वहीं उनकी बुद्धि अटकी है। तंत्रोक्त मार्ग आगम मार्ग है: पौराणिक और तांत्रिक मार्ग से तांत्रिक या पौराणिक संध्या की जा सकती है, और उसमें तुरीय संध्या के लिए भी कहा गया है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप ऑफिस में हैं या आपका ऐसा समय है कि बिल्कुल समय नहीं मिलता, तो यह देखिए: अभी के समय में वेदोक्त वैध मार्ग से चलने वाले लोग वैसे भी कम हैं। कलिकाल में यह संभव भी नहीं है, और इसीलिए भगवान ने कहा है कि कलिकाल में वैदिक कार्य जल्दी सफल नहीं होंगे। उस कथन के पीछे का कारण, वे कहते हैं, यही कठिनाई है। तो इसके लिए, वे कहते हैं, विकल्प बनाया गया: तंत्र मार्ग। वे टिप्पणी करते हैं कि तंत्र सुनकर लोग भूत-प्रेत, जादू-टोना, गला काट देना, तंत्र से मार देना सोचते हैं; इतने में ही उनकी बुद्धि अटकी पड़ी है, और यह भी उनकी दिक्कत है। तंत्रोक्त मार्ग आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। मार्ग है। पौराणिक मार्ग और तांत्रिक मार्ग के माध्यम से तांत्रिक या पौराणिक संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। की जा सकती है, जिसमें तुरीय संध्या के लिए भी कहा गया है।
तुरीय संध्या: जिनके पास समय नहीं, उनके लिए रात के पंद्रह मिनट
इतना भी छोड़ना पितृ और राहु दोष को जन्म देता है
वक्ता पूछते हैं कि जो सुबह-शाम समय नहीं दे सकता, क्या वह रात को पंद्रह मिनट भी नहीं दे सकता। देवता देश, काल, परिस्थिति समझेंगे, क्योंकि गृहस्थ को आजीविका कमानी है, लेकिन जिस कुल, देवता और पितृ ने आपको जन्म दिया, उनके निमित्त आप कोई नियम नहीं मानते। तो तुरीय संध्या कीजिए: नहा-धोकर रात दस बजे बैठिए और पंद्रह मिनट अपने देवी-देवताओं के निमित्त धूप, दीप, कपूर के साथ पाठ कीजिए। इसकी जगह चार घंटे मूवी, रील्स, फेसबुक और किसी को गाली देने में जाते हैं, जबकि नहाकर धोती पहनकर दीप दिखाने को पाखंड कहा जाता है; और यही छोड़ना, वे कहते हैं, प्रबलतम रूप में पितृ दोष और राहु से जुड़े हर दोष को जन्म देता है, जो तुरंत नहीं, धीरे-धीरे आते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर ऑफिस से देर से छुट्टी होती है और आप शाम और सुबह समय नहीं दे सकते, तो क्या अपने जीवन में रात को पंद्रह मिनट भी नहीं दे सकते? देवता देश, काल, परिस्थिति समझेंगे: हाँ, इसके पास समय नहीं है, गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। आजीविका कमाएगा तभी तो सद्गृहस्थ अपने घर-परिवार, देवताओं और पितरों को पूछेगा। लेकिन जिस कुल, जिस देवता, जिस पितृ ने आपको जन्म दिया, जिनकी कृपा से आप जन्मे, उनके निमित्त आप कोई नियम नहीं मानते। तो तुरीय संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। कीजिए, वे कहते हैं: समय नहीं है तो रात दस बजे नहा-धोकर बैठिए और पंद्रह मिनट जो भी आपके देवी-देवता हैं उनके निमित्त धूप, दीप, कपूर के साथ पाठ कर लीजिए। वह भी नहीं होगा। उन पंद्रह मिनट की जगह, जब तक नींद नहीं आती, चार घंटे मूवी देखेंगे, रील्स देखेंगे, फेसबुक स्क्रॉल करेंगे, किसी को चार गाली देंगे, और वह सब अपनी जगह ठीक है; उसमें कोई समस्या नहीं, उसमें आनंद है। लेकिन कोई कह दे कि नहाकर धोती पहन लो और धूप-दीप दिखा दो, तो उसमें आपकी मौत आ जाती है: अरे ऐसा बोल रहे हैं, यह पाखंड है। यही तथाकथित पाखंड, वे कहते हैं, यह सब जो आप छोड़ते हो, वही आपके घर में प्रबलतम रूप से पितृ दोष और राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। से संबंधित जितने दोष हैं, उनके रूप में जन्म लेता है। और जब यह व्याधि जन्म लेती है, जब पूरे प्रभाव में आती है, तो तुरंत नहीं आती; धीरे-धीरे आती है।
वार्षिकी मृत्यु के एक साल बाद क्यों की जाती है?
पितरों का दिन-रात गणना; अकाल मृत्यु के छूटे कर्म
वक्ता कहते हैं कि जब घर में किसी की अकाल मृत्यु होती है तो कोई नारायण बलि, कोई त्रिपिंडी श्राद्ध, कोई वार्षिकी नहीं होती, क्योंकि कोई साल भर रुकता ही नहीं। जबकि जीवात्मा के लिए कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन पितरों का दिन हैं और शुक्ल पक्ष उनकी रात, इसलिए हमारा एक महीना उनका एक दिन है; यमलोक की बारह दिन की यात्रा हमारे बारह महीनों में पूरी होती है, और इसीलिए वार्षिकी एक साल बाद होती है। अब लोग तेरहवीं के दिन ही वार्षिकी करा देते हैं या भूल जाते हैं, हर महीने का कर्म कोई नहीं करता, अकाल मृत्यु पर तीर्थ में नारायण बलि, श्रीमद्भागवत, गया या दान-पुण्य कोई नहीं करता; मर गए, चले गए, कौन देखने जा रहा है कि पानी लेने आएंगे या नहीं।
वक्ता कहते हैं कि दोष तब बनता है जब आपके घर में किसी की अकाल मृत्यु हुई और उसके लिए कोई नारायण बलि नहीं करवाई गई, कोई त्रिपिंडी श्राद्ध नहीं हुआ, कोई वार्षिकी नहीं हुई। वार्षिकी के लिए कोई रुकता ही नहीं, क्योंकि कौन साल भर रुकेगा? वे गणना समझाते हैं: जीवात्मावर्तमान भौतिक शरीर को सक्रिय करने वाली व्यष्टि आत्मा — जो मूलतः निराकार व निर्लिंग आत्मा से भिन्न प्रतीत होती है। के लिए, आपके और हमारे, माना गया है कि हमारे कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन पितरों के लिए दिन होते हैं, और शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिन जो हमारे लिए होते हैं वे उनके लिए रात होते हैं। यानी यमलोक की जो बारह दिन की यात्रा होती है वह हमारे बारह महीनों में पूरी होती है; हमारा एक महीना उनका एक ही दिन है। जिनकी मृत्यु हुई है, चाहे अकाल मृत्यु हो या सामान्य, प्राकृतिक मृत्यु, उनके बारह दिन हमारे लिए एक साल के बराबर हैं। इसीलिए एक साल बाद वार्षिकी की जाती है। अब, वे कहते हैं, लोग तेरहवीं के दिन ही वार्षिकी करा देते हैं, या नहीं करते, भूल जाते हैं। हर महीने कौन करे, और एक साल बाद वार्षिकी करके कौन निवृत्त हो? अकाल मृत्यु हुई हो तो तीर्थ में जाकर नारायण बलि कौन करवाए, उनके लिए श्रीमद्भागवत कौन कराए, गया जाकर कौन कराए, उनके लिए दान-पुण्य कौन करे? मर गए, चले गए; कौन देखने जा रहा है कि हम पानी दे रहे हैं तो लेने आएंगे या नहीं? लोग सुनकर इसका उपहास बना देते हैं।
पीढ़ियों की भ्रूण हत्या और देखा-देखी छोड़े नियम मिलकर पितृदोष बनते हैं
दो-तीन पीढ़ियों के पाप, धीरे-धीरे आते हुए
वक्ता कहते हैं कि आपने पिता और दादा को ये कर्म करते देखा, फिर आस-पड़ोस को देखकर इस भ्रम में पड़ गए कि इनकी कोई ज़रूरत नहीं, और फेसबुक-यूट्यूब ने इस भ्रम को कई गुना कर दिया है, संभलने वाले और संभले, बिगड़ने वाले और बिगड़े। इसमें भ्रूण हत्याएँ जोड़िए: पाँचवें-छठे महीने में लिंग जाँच कराकर कन्या को गर्भ में मरवा देना, जो आपके पिता, चाचा, दादा या परदादा ने करवाया होगा, और पिछली दो-तीन पीढ़ियों में यह हुआ ही होगा। यह सब इकट्ठा होकर प्रबलतम पितृ दोष के रूप में आज आपको परेशान कर रहा है, तुरंत नहीं, धीरे-धीरे।
वक्ता कहते हैं कि तो यह एक बार हुआ: आपने अपने पिताजी को ऐसा करते देखा, दादाजी को देखा होगा। अब आस-पड़ोस के लोगों को, किसी और को देखकर आप इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि इन सब चीज़ों को करने की कोई आवश्यकता नहीं है, और फेसबुक-यूट्यूब के आने के बाद से यह और बढ़ गया है। संभलने वाले और अधिक संभल गए हैं और बिगड़ने वाले, बर्बाद होने वाले और अधिक बिगड़े हैं। फिर गर्भ में हत्याएँ, कन्याओं की, या किसी भी अन्य कारण से हुई भ्रूण हत्याएँ: पाँचवें-छठे महीने में लिंग जाँच करवाकर कि कन्या है तो मरवा दो। आपके पिताजी, चाचाजी, दादाजी, परदादाजी, जिन्होंने भी पहले करवाया होगा; पिछली दो-तीन पीढ़ियों में, वे कहते हैं, यह सब हुआ ही होगा। तो ये चीज़ें कहाँ जाएँगी? इकट्ठा होते-होते ये आज प्रबलतम पितृ दोष के रूप में उपस्थित होकर आपको परेशान कर रही हैं। तुरंत नहीं लगीं, वे ज़ोर देते हैं; यह ध्यान रखिए, प्रभाव ऐसे नहीं आता।
प्रबल पितृदोष के लक्षण
संतान नहीं, धन हानि, शत्रु, निष्फल पूजा
वक्ता जमा हुए प्रबल पितृ दोष के दुष्प्रभाव गिनाते हैं: संतान सुख नहीं मिलता, धन की अत्यंत हानि होती है, शत्रु पीछे पड़े रहते हैं, कोई चीज़ प्रचंड रूप से ऊपर प्रभाव डालती है, और पूजा-पाठ फलित नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि इस जमा हुए पितृ दोष के दुष्प्रभाव से आपको संतान सुख नहीं मिल रहा है, धन की अत्यंत हानि हो रही है, शत्रु पीछे पड़े हैं, कोई चीज़ एकदम प्रचंड रूप से आपके ऊपर प्रभाव डाल रही है, और आपका पूजा-पाठ फलित नहीं हो रहा है।
विरासत के धन के साथ विरासत का पाप भी
मंत्र निष्फल नहीं, तीन पीढ़ियों का कर्ज़ भारी है
वक्ता कहते हैं कि इसी पीड़ित अवस्था में लोग बैठकर देवताओं को गाली देते हैं कि मंत्र में प्रभाव नहीं है और पंडित-तांत्रिक जो बताते हैं वह फालतू है। फालतू नहीं है, वे कहते हैं, यह कारगर है, लेकिन जो आपने दो-तीन पीढ़ियों का जमा कर रखा है उसे कौन भोगेगा? अगर आप अपने बाप की कमाई भोग रहे हो और दादा के दिए घर में रह रहे हो, तो दादा और पिता के पाप भी आपको भोगने हैं; पाप और पुण्य दोनों आपको ही मिलेंगे। पुण्य, धन, खेत, घर सब ले लो और जब पाप भोगने की बारी आए तो पूछो कि बाप का किया हम क्यों भोगें, ऐसा नहीं चलता।
वक्ता कहते हैं कि उसी अवस्था में आप बैठकर पानी पी-पीकर देवताओं को गाली देते हो: कि मंत्र में प्रभाव नहीं है, कि ये पंडित-तांत्रिक जो बताते हैं उसमें कोई प्रभाव नहीं, सब फालतू का विषय है। फालतू का विषय नहीं है, वे कहते हैं; यह बिल्कुल कारगर विषय है। लेकिन जो आपने दो-तीन पीढ़ियों का जमा करके रखा है, उसे कौन भोगेगा? जब आप अपने बाप की कमाई भोग रहे हो, अपने दादा के दिए घर में रह रहे हो, तो दादा का पाप भी आपको भोगना है। पिता के पाप भी आपको भोगने हैं। पाप और पुण्य दोनों आपको ही मिलेंगे। पुण्य तुम ले लो, सारा धन ले लो, खेत-द्वार सब ले लो, और जब पाप भोगने की बारी आए तो बोलो कि हम क्यों भोगें अपने बाप का किया हुआ? भोगना पड़ेगा, वे कहते हैं।
विरासत में मिले पाप को काटने वाले उपाय
तीर्थ, परिक्रमा, शिव-भैरव, पीपल, गंगा में जप
विरासत में मिले पाप की निवृत्ति के लिए, वक्ता कहते हैं, मार्ग है: तीर्थ यात्रा करो; गोवर्धन की, विंध्याचल में त्रिकोण पर्वत की (त्रिकोण यात्रा) और जहाँ भी जाओ वहाँ के प्रमुख मंदिरों की परिक्रमा करो; शिव और भैरव की पूजा करो। कई विधानों में पीपल वृक्ष की पूजा का विधान है, जिससे पाप शीघ्र कटता है। गंगा में स्नान करके, नाभि तक जल में खड़े होकर अपने इष्ट के मंत्रों का जप करो, दीक्षित हो तो गुरु मंत्र का। इससे पुण्य बढ़ेगा और ये पाप क्षय होंगे।
वक्ता कहते हैं कि उस विरासत के पाप की निवृत्ति के लिए मार्ग है। तीर्थ यात्रा करो। परिक्रमा करो: गोवर्धन जी की परिक्रमा करो, विंध्याचल में त्रिकोण पर्वत की परिक्रमा करो, त्रिकोण यात्रादेवी के तीन पीठों के मध्य त्रिकोण पूर्ण करने वाली यात्रा। करो। जहाँ भी जाओ, वहाँ के प्रमुख मंदिरों के चारों ओर परिक्रमा करो। शिव जी की पूजा करो; भैरव जी की पूजा करो। कई विधान हैं, वे कहते हैं, और उनमें पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष की पूजा का विधान है, जिससे पाप की निवृत्ति शीघ्र अति शीघ्र होती है। गंगा जी में स्नान करो, वे कहते हैं, और वहाँ नाभि तक जल में खड़े होकर अपने इष्ट, आराध्य के मंत्रों का जप करो; दीक्षित हो तो गुरु मंत्र का जप करो। इससे पुण्य की वृद्धि होगी और ये पाप क्षय होंगे।
सामर्थ्य के अनुसार दान दो और उसकी चर्चा कभी न करो
पुण्य की चर्चा से पुण्य क्षय, पाप की चर्चा से पाप क्षय
वक्ता कहते हैं कि सामर्थ्य के अनुसार दान करो, एक रुपये का सामर्थ्य है तो एक रुपया, दस का तो दस, एक लाख का तो एक लाख, लेकिन उसकी चर्चा कभी न करो, किसी को न बताओ कि दान किया है। जितनी चर्चा करोगे उतना उस पुण्य का क्षय होगा। पाप की चर्चा से पाप का क्षय होता है और पुण्य की चर्चा से पुण्य का: चोरी बता दो तो चार लोग निंदा करेंगे और उस निंदा से पाप कट जाएगा; पुण्य का बखान करो तो पुण्य नष्ट। यह सब करोगे तभी, वे कहते हैं, पितृ दोष में कमी आएगी।
वक्ता कहते हैं कि दान करने का सामर्थ्य रखो और जितना सामर्थ्य है उतना दो: एक रुपये का सामर्थ्य है तो एक रुपया; दस का तो दस; एक लाख का तो एक लाख। उतना दान करो। लेकिन दान के विषय में, वे कहते हैं, कभी किसी से चर्चा न करो; किसी को न बताओ कि हमने दान किया है। जितनी चर्चा करोगे उतना उस पुण्य का क्षय होगा। पुण्य के बारे में कभी चर्चा ही नहीं करनी चाहिए। पाप की चर्चा से पाप का क्षय होता है, और पुण्य की चर्चा से पुण्य का। अगर हम बताएँ कि हमने चोरी की है तो चार लोग निंदा करेंगे, और उस निंदा से हमारा पाप क्षय हो जाएगा। और अगर पुण्य करके बताएँ कि हमने यह पुण्य किया, वह पुण्य किया, तो पुण्य का क्षय हो जाएगा। तो यह भी नहीं बताना है। यह सब करोगे तभी, वे कहते हैं, पितृ दोष में कमी आएगी।
पूरे प्रभाव में आया पितृदोष हटने में कितना समय लेता है?
पचास साल का लेखा-जोखा, दो से पाँच साल की प्रचंड साधना
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष लगने में समय लेता है, और जब वह पूरे प्रचंड आवेग में आ चुका हो तो उस स्तर का त्वरित फल नहीं मिलेगा। आपको प्रचंड साधनाएँ और अपने कुल देवी-देवताओं की नियमित उपासना करनी होगी; दस दिन, ग्यारह दिन, एक-दो साल कोई पैमाना नहीं जब पचास साल का लेखा-जोखा सिर पर आया है, और साल-दो साल में बहुत कम लोगों की सुनी जाती है। जैसे धन, संतान, पति-पत्नी के रूप में पुण्य भोगा, वैसे ही पाप धैर्य से भोगो, साथ में प्रचंडतम उपाय करते रहो, तो दो-चार, पाँच साल में वह हटेगा।
वक्ता आशा करते हैं कि श्रोता मूल विषय समझेंगे: पितृ दोष ऐसे ही नहीं लग जाता, और कोई ऐसे ही बोल रहा है तो ऐसा नहीं है; समय लगता है। लेकिन अब जब वह लग चुका है, पूरे प्रभाव में आ चुका है और दिक्कत हो रही है, तो त्वरित रूप से उस स्तर का फल नहीं मिलेगा, क्योंकि वह अपने प्रचंड आवेग में है। इसी कारण आपको भी प्रचंड साधनाएँ करनी होंगी, अपने कुल देवी-देवताओं की नियमित साधना और उपासनाइष्ट देवता की निरंतर आराधना, जिसे साधक वर्षों तक नियमपूर्वक निभाता है। करनी होगी। दस दिन, ग्यारह दिन, एक साल, दो साल, यह पैमाना नहीं है: पचास साल का लेखा-जोखा अभी सिर पर आया है। साल-दो साल में बहुत कम लोगों की सुनी जाती है; यह भी सत्य है। जिस तरह पुण्य का भोग धन, संतान, पत्नी, पति और अन्य सभी सुखों के रूप में किया है, वैसे ही पाप को धैर्यपूर्वक भोगो, और भोगने के साथ उसे काटने के लिए प्रचंडतम उपाय करो। तब, वे कहते हैं, दो-चार साल, पाँच साल में वह हटेगा।
सावधानी: हताशा में देवता, पितर, ब्राह्मण या ग्रंथ को अपशब्द कहना कमाया पुण्य मिटा देता है
वज्र प्रहार जो खाता शून्य पर ला देता है
वक्ता चेतावनी देते हैं कि पितृ दोष के लंबे उपाय के बीच-बीच में आप हतोत्साहित होंगे, टूटेंगे, मनोबल गिरेगा। उस अवस्था में अगर देवताओं, अपने कुल पितृों, ब्राह्मणों, किसी विद्वान या किसी ग्रंथ के प्रति अपशब्द निकलें, जैसे शिव महापुराण में लिखी बात को बकवास कहना, तो तुरंत वज्र प्रहार होता है, कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो जाता है और आप शून्य पर आ जाते हैं। इन सबसे बचिए, वे कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष के उपाय के वर्षों के बीच-बीच में आप हतोत्साहित भी होंगे, टूटेंगे भी, मनोबल भी गिरेगा। और उस मनोबल के गिरने के कारण अगर आपके मुख से देवताओं के प्रति, अपने कुल पितृों के प्रति, ब्राह्मणों के प्रति, किसी विद्वान के प्रति, किसी ग्रंथ के प्रति अपशब्द निकलते हैं, कि फलाने शिव महापुराण में ऐसा लिखा है, बकवास है, तो जहाँ आपने यह बोला, तुरंत आप पर वज्र प्रहार हुआ। आपका किया हुआ पुण्य तुरंत नष्ट हुआ, और आप फिर शून्य पर आ गए। इन सबसे बचिए, वे कहते हैं।
त्वरित टोटके पितृदोष खत्म नहीं कर सकते
एक दिन की राहत बनाम स्थायी काम
वक्ता कहते हैं कि त्वरित उपाय, नारियल बहा दो तो पितृ दोष खत्म, फलानी चीज़ जला दो तो खत्म, उसे खत्म नहीं करेंगे। ऐसा क्षणिक, एकाध दिन का लाभ देगा और आप सोचोगे कि ऐसे ही होता है। टोटकों का विषय अलग है; स्थायी चाहिए तो स्थायी काम करना होगा। नहीं तो अब तक पचास साल का पुण्य भोगा, अब सौ साल का पाप भोगो, तो दिक्कत तो होगी ही।
वक्ता कहते हैं कि जितने त्वरित उपाय हैं, नारियल बहा दो तो पितृ दोष खत्म, फलानी चीज़ जला दो तो पितृदोष खत्म: खत्म नहीं होगा। वह आपको क्षणिक, एकाध दिन का लाभ देगा और आप सोचोगे कि ऐसे ही होता है। टोटकों का विषय अलग है। स्थायी चाहिए, वे कहते हैं, तो स्थायी काम करोगे तो होगा। नहीं तो अब तक पचास साल का पुण्य भोग रहे थे; अब सौ साल का पाप भोगो, तो दिक्कत तो होगी ही।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।