क्या पितृ पक्ष में घर के देवी-देवता बँध जाते हैं?
पितृ पक्ष में घर के देवी-देवताओं पर एक चर्चा।
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यह मान्यता कि पितृ पक्ष में देवता बँध जाते हैं
क्या पितृ पक्ष में घर के देवी-देवता अभिचार रोकने में असक्षम हो जाते हैं?
मान्यता यह है कि पितृ पक्ष में शुभ शक्तियाँ अपने स्थान को प्रस्थान कर जाती हैं, जिससे घर के देवी-देवता शत्रु के अभिचार को रोक नहीं पाते। वक्ता इसी प्रश्न को सीधे उठाते हैं और कहते हैं कि यह हर वर्ष तब आता है जब इन सोलह दिनों में लोगों की तबीयत खराब होती है या अचानक परेशानी आती है।
हर पितृ पक्ष में वक्ता के समक्ष यही प्रश्न रखा जाता है: क्या सच में ऐसा है कि इस समय शत्रु अभिचार कर दे तो हानि अधिक होती है, क्योंकि घर के देवी-देवता उसे रोकने में असक्षम रहते हैं? इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि पितृ पक्ष वह समय है जब शुभ शक्तियाँ अपने विशेष स्थान को प्रस्थान कर गई रहती हैं। वे इसी को आज का विषय बनाते हैं, क्योंकि चैनल पर पितृ दोष और इस पक्ष के विधानों पर पहले जो दस-पंद्रह वीडियो हैं उनमें यह विषय नहीं आया — वे बताते हैं कि पितृ दोष क्या है, इस काल का लाभ कैसे उठाएँ, और असमर्थ व्यक्ति क्या करे। यह प्रश्न उनसे अलग है, और तभी उठता है जब पक्ष आरंभ होते ही लोग बीमारी और कठिनाई बताने लगते हैं।
दैनिक पूजन वास्तव में कौन छोड़ते हैं और किन्हें नहीं छोड़ना चाहिए
क्या पितृ पक्ष में दैनिक पूजन पाठ छोड़ देना चाहिए?
नहीं — जब तक कि यह परिवार की चली आ रही परंपरा न हो। जो वास्तव में छोड़ते हैं वे पूरे सोलह दिन तर्पण करने वाले घर होते हैं, और वे भी अपना नित्य कर्म नहीं छोड़ते; सुनकर नया-नया यह करने वाले को वे मना करते हैं।
वक्ता दो स्थितियाँ अलग करते हैं। यदि किसी परिवार में सदा से पितृ पक्ष में दैनिक पूजन छोड़कर केवल पितरों के निमित्त कार्य होता आया है, तो वे मना नहीं करते — उस परंपरा का पालन कीजिए। परंतु जो सुनकर नया-नया यह कर रहा है, उससे वे स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। जो लोग वास्तव में छोड़ते हैं वे पूरे सोलह दिन तर्पण विधान करने वाले, विशेष रूप से ब्राह्मण वर्ग के साधक होते हैं, और वे भी नित्य कर्म कभी नहीं छोड़ते: नित्य गायत्री और सुबह का नित्य कर्म चलता रहता है, तर्पण अलग से लगभग साढ़े आठ-नौ बजे से दोपहर तक के अपने समय में होता है। उनका तर्क संगति का है — जिसे गायत्री का अधिकार है वह उसे नहीं छोड़ता, तो जिसका दैनिक पाठ चालीसा है वह भी क्यों छोड़े। अधकचरी जानकारी पर आधारित इस त्याग को वे सबसे पहले दिमाग से हटाने वाली बात कहते हैं, और जोड़ते हैं कि लोग वैदिक रीति से जी भी नहीं रहे हैं, और घर के देवी-देवता उस आधार पर फल देने को बाध्य भी नहीं हैं।
इस पक्ष में वास्तव में कौन-से अभ्यास रुकते हैं
पितृ पक्ष में वास्तव में क्या नहीं करना चाहिए?
कोई नया अनुष्ठान आरंभ नहीं करना है, अस्त्र मंत्र की साधना नहीं करनी है, और देवी-देवताओं के आवाहन वाली कोई विशेष साधना नहीं करनी है — शताक्षरी और सहस्राक्षरी मंत्रों का पाठ इस काल में वर्जित बताया गया है।
निषेध सीमित और विशिष्ट है, पूजा का पूर्ण त्याग नहीं। इस पक्ष में कोई नया अनुष्ठान आरंभ नहीं करना है। अस्त्र मंत्रों की साधना छोड़ दी जाती है। देवी-देवताओं के आवाहन वाली कोई भी विशेष साधना भी टाल दी जाती है, और शताक्षरी तथा सहस्राक्षरी मंत्रों का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया है कि इस समय इनका पाठ मत करिए, क्योंकि उस समय यह कारण बन जाता है। वक्ता संकेत देते हैं कि इसका कारण आगे पितरों के स्वरूप के विवरण से स्पष्ट होगा।
पितर हर योनि में विद्यमान हैं
मृत्यु के बाद पितरों को किस-किस प्रकार का शरीर प्राप्त होता है?
केवल वायवीय शरीर नहीं, जैसा लोग मानते हैं। अपने कर्म के अनुसार पितृ हर प्रकार की योनि में गति करते हैं — वायवीय, देव, वृक्ष, कीट-पतंग, पशु और मनुष्य — और वक्ता कहते हैं कि हम-आप भी पूर्व जन्म में किसी के पितर रहे हैं।
सामान्य धारणा यह है कि पितृ का एक ही प्रकार का शरीर होता है, वायवीय। वक्ता इसे सुधारते हैं: पितरों को अपने जीवन में किए कर्मों के अनुसार शरीर की प्राप्ति होती है, और वे हर प्रकार की योनि में गति करते हैं। इसमें वायवीय शरीर है, देव शरीर है, जड़ अर्थात वृक्ष आदि का शरीर है, कीट-पतंग का शरीर है, और मनुष्य का शरीर भी है। वे यह बात श्रोता तक बढ़ाते हैं — आज अपने घर में बैठा हर व्यक्ति स्वयं पूर्व जन्म में किसी का पितर रहा है। आगे यह बताने का यही आधार है कि पितर जहाँ भी हों, अर्पण उन तक कैसे पहुँचता है।
गया श्राद्ध से वार्षिक कर्तव्य समाप्त क्यों नहीं होता
क्या गया में श्राद्ध कर देने से हर वर्ष का दायित्व समाप्त हो जाता है?
नहीं — वक्ता इसे बहुत बड़ी भ्रांति कहते हैं। गया श्राद्ध के बाद भी हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में कम से कम तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करना चाहिए, और यह दायित्व छोड़ा नहीं जा सकता।
लोक प्रचलन में यह बात आ गई है कि गया में श्राद्ध कर देने के बाद पितरों के निमित्त कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। वक्ता इसे बहुत बड़ी भ्रांति कहते हैं और बताते हैं कि शास्त्र प्रमाण के अनुसार यह और स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है — वे श्री शंकराचार्य परंपरा के विद्वानों को सुनने का उल्लेख करते हैं। गया श्राद्ध के बाद भी हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में कम से कम तिथि के अनुसार अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म करना चाहिए। यह छोड़ा नहीं जा सकता। इसके बाद वे प्रश्न का कठिन रूप उठाते हैं: यदि पितरों की गति हो चुकी है, कोई प्रेत योनि में नहीं है, और पूरे कुल के पितरों को उतार दिया गया है, तब भी क्या करना आवश्यक है?
श्राद्ध किसी भी योनि में पितर तक कैसे पहुँचता है
जो पितर अगला जन्म ले चुके हैं, उन तक अर्पण कैसे पहुँचता है?
वे जिस स्वरूप में हैं उसी के अनुरूप रूप में पहुँचता है — मनुष्य योनि में अन्न के रूप में, सर्प योनि में विष के रूप में, देव लोक में गंध के रूप में, पशु योनि में जो वह जीव खाता है उस रूप में — और श्राद्ध करने का फल करने वाले को लौटकर प्राप्त होता है।
जहाँ पितर पितृ योनि से मुक्त हो चुके हों — मोक्ष प्राप्त कर लिया हो या अगला जन्म ले लिया हो — वहाँ भी किया गया श्राद्ध और तर्पण उन तक पहुँचता है, उनके वर्तमान स्वरूप के अनुरूप बदलकर। मनुष्य योनि में वह अन्न के रूप में पहुँचता है। सर्प योनि में वह उस विष के रूप में पहुँचता है जिसे वे ग्रहण करते हैं। देव लोक में वह गंध के रूप में पहुँचता है, जिससे देवता तृप्त और पुष्ट होते हैं। जो अपने कर्म से पशु योनि में गए हैं, उनके लिए वह उसी रूप में पहुँचता है जो वह जीव खाता है। उनके प्राप्त कर लेने के बाद श्राद्ध करने का फल करने वाले को प्राप्त होता है। इसी आधार पर वक्ता कहते हैं कि कहीं भी इसे करते रहने का निषेध नहीं है। वे तर्क को दूसरी दिशा में भी बढ़ाते हैं: यदि हमें किसी भी प्रकार से अपना भोजन प्राप्त हो रहा है, तो शास्त्र के अनुसार हम इसे कभी अस्वीकार नहीं कर सकते कि हमारे पूर्व जन्म के वंशजों द्वारा कहीं किया जा रहा श्राद्ध भी उस भोजन के पहुँचने का कारण बनता है।
पिंड दान और श्राद्ध का अधिकार
श्राद्ध कर्म का अधिकारी कौन है?
यदि पिताजी जीवित हैं तो पिंड दान और श्राद्ध कर्म उन्हीं को करना चाहिए; केवल तब, जब वे अस्वस्थता या शारीरिक कारण से असक्षम हों, ज्येष्ठ पुत्र उनके स्थान पर यह कर सकते हैं।
सीधा प्रश्न यह उठता है कि माता-पिता के जीवित रहते श्राद्ध करें या नहीं। उत्तर यह है कि यदि पिताजी हैं तो पिंड दान और श्राद्ध कर्म पिताजी को ही करना चाहिए। पुत्र यह तभी करते हैं जब पिताजी असक्षम हों — अस्वस्थता के कारण, या ऐसी शारीरिक स्थिति के कारण जिसमें वे उठ-बैठ न सकें या उतनी देर तक क्रिया कर्म न कर सकें। उस स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र कर सकते हैं। यही अधिकार का नियम सत्र में आगे भी लौटता है, जहाँ वे इसे अविवाहित कन्याओं और उन विवाहित स्त्रियों पर लागू करते हैं जिनके घर में यह कर्म नहीं होता।
सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध, केवल हाथ उठाकर प्रार्थना तक
जो श्राद्ध करने में आर्थिक रूप से असमर्थ हो वह क्या करे?
जो सामर्थ्य में हो वही कीजिए — कम से कम जीव सेवा कीजिए। एक दिन की पूरी कमाई श्राद्ध में लगाने की बात कही गई है; वह न हो तो शाक-सब्जी बोलकर अर्पित कीजिए; वह भी न हो तो दक्षिण की ओर मुख करके दोनों हाथ उठाकर की गई प्रार्थना भी स्वीकार होती है।
वक्ता एक उतरता हुआ क्रम रखते हैं ताकि असमर्थता कुछ न करने का कारण कभी न बने। जहाँ विस्तृत कर्म सामर्थ्य से बाहर हो, वहाँ जितना अपना कर्म बनता है उतना कीजिए और कम से कम जीव सेवा कीजिए — इसके अनेक विधान चैनल पर बताए जा चुके हैं। कहा गया है कि एक दिन की पूरी कमाई पितरों के श्राद्ध में लगानी चाहिए। जहाँ विधिवत श्राद्ध भी संभव न हो, वहाँ कहा गया है कि शाक-सब्जी अर्पित की जा सकती है — हाथ उठाकर, ब्राह्मण को या जो ग्रहण करने योग्य हो उससे यह कहकर कि यह श्रद्धा सहित अर्पित है, कृपया स्वीकार कीजिए; वह भी स्वीकार होता है। और अंत में, यदि कर्म ने किसी को ऐसी स्थिति में ला दिया है कि एक दिन की कमाई भी नहीं है, तो वह दक्षिण की ओर मुख करके दोनों हाथ उठाकर अपने पूरे कुल को संबोधित कर सकता है — श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हुए यह कहकर कि मैं किसी वस्तु से श्राद्ध करने में असमर्थ हूँ, कृपया इस श्रद्धा को ही स्वीकार कीजिए। वक्ता कहते हैं कि शास्त्र यहाँ तक जाता है: पितर इससे तृप्त होते हैं और कृपा करते हैं। वे जोड़ते हैं कि जिनके पिताजी नहीं हैं वे स्वयं अधिकारी हैं और विधि विधान के अनुसार कर सकते हैं — सक्षम हों तो तर्पण आदि कीजिए, अन्यथा जो सामान्य विधि विधान बताया गया है वही कीजिए।
पूजन छोड़ना ही रक्षा कवच को तोड़ता है
दैनिक पूजन छोड़ देने से व्यक्ति शत्रु के अभिचार के सामने क्यों खुल जाता है?
क्योंकि दैनिक साधना ही कवच है। उसे छोड़ देने पर कवच कहीं न कहीं टूटता है, कोई हानि होती है, और वही कारण बन जाता है जिससे शत्रु का अभिचार प्रभावी हो जाता है।
यहाँ वक्ता सत्र के दोनों हिस्सों को जोड़ते हैं। देवताओं के रक्षा न कर पाने का प्रश्न उठता ही इसलिए है कि चारों ओर यह सलाह चलती है कि इस पक्ष में पूजा छोड़ दीजिए। यदि व्यक्ति सचमुच छोड़ देता है तो उसका कवच कहीं न कहीं टूटता है, कोई हानि होती है, और कुछ न कुछ वह कारण बन जाता है जिससे शत्रु का अभिचार विशेष प्रभाव डालता है। उपाय बस यह है कि रोकिए मत: जो नियमित शिव सहस्रनाम का पाठ कर रहे हैं उन्हें श्राद्ध पक्ष में उसे छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं, और जो आरंभ से कवच का पाठ करते आए हैं वे अब उसे नहीं हटाने जा रहे। अपवाद वे साधनाएँ हैं जिनमें सहस्राक्षरी, बंधन और अस्त्र मंत्र प्रधान हैं — प्रत्यंगिरा का नाम सीधे लिया गया है कि इस काल के लिए उसे छोड़ दीजिए। सामान्य पूजा, सामान्य जप और नाम-स्मरण चलते रहते हैं।
सोलह दिन का भगवद्गीता पाठ
सोलह दिनों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ किस प्रकार करें?
प्रतिदिन एक अध्याय, उसके माहात्म्य सहित, जिससे पंद्रह दिनों में पंद्रह अध्याय पूरे होते हैं; शेष तीन अध्याय अंतिम दिन माहात्म्य सहित एक साथ पढ़े जाते हैं। हिंदी स्पष्ट रूप से स्वीकार्य है — संस्कृत आवश्यक नहीं।
यदि इस काल में और कुछ संभव न हो, तो वक्ता श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ को सबसे मूल्यवान कार्य मानते हैं। वे ऐसा संस्करण लेने को कहते हैं जिसमें हर अध्याय का माहात्म्य हो — यह वर्णन पद्म पुराण में आता है, जिसमें शिव पार्वती को अठारह अध्यायों में से प्रत्येक का अलग माहात्म्य सुनाते हैं — और किसी भी प्रकाशक का माहात्म्य वाला संस्करण चल जाएगा। विधि है प्रतिदिन एक अध्याय: श्राद्ध पक्ष के पहले दिन पहले अध्याय का माहात्म्य, फिर स्वयं पहला अध्याय, भगवान के सम्मुख बैठकर। संस्कृत आवश्यक नहीं है; माहात्म्य हिंदी में पढ़िए और उसके बाद अध्याय। पंद्रह दिन में पंद्रह अध्याय पूरे होते हैं, और शेष तीन अध्याय अंतिम दिन माहात्म्य सहित एक साथ पढ़े जाते हैं।
काले तिल और कुशा के साथ संकल्प और समर्पण
पितृ पक्ष के पाठ के साथ किया जाने वाला संकल्प और समर्पण
हाथ में काला तिल, कुशा और गंगाजल या शुद्ध जल लीजिए; अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलिए; पाठ की घोषणा कीजिए और प्रार्थना कीजिए कि उसका पूरा फल कुल के पितरों तक पहुँचे। पाठ के बाद फिर जल लेकर पाठ का फल विधिवत समर्पित कीजिए।
पितृ पक्ष में लिया गया हर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। पितरों की गति, तृप्ति, संतुष्टि और मुक्ति के निमित्त होता है। पितरों के लिए संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करते समय दो वस्तुएँ आवश्यक बताई गई हैं: काला तिल और कुशा, साथ में गंगाजल या अन्य शुद्ध जल। इन्हें हाथ में लेकर साधक अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलता है। फिर वह विशिष्ट कर्म की घोषणा करता है — जैसे कि वह आज अपनी क्षमता और समझ के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का माहात्म्य सहित पाठ करने का संकल्प लेता है; कि उसका पूरा फल उसके कुल के पितरों तक पहुँचे; कि वे पितर जहाँ भी और जिस भी योनि में हों वहीं तृप्त हों और तृप्त होकर कुल की वृद्धि करने वाले बनें; और यदि जाने-अनजाने उससे या उसके परिवार से उनका कोई अनादर हुआ हो तो दोनों उस दोष और उससे उत्पन्न श्राप से मुक्त हों। इसके बाद काला तिल, कुशा और जल नारायण के, अथवा जिस देवता की वह उपासना करता है उनके, चरणों में छोड़ दिया जाता है। पाठ के बाद फिर हाथ में जल लेकर पूर्ण किए गए पाठ का फल विधिवत समर्पित किया जाता है, इस प्रार्थना के साथ कि वह उन देवता के माध्यम से पितरों तक पहुँचे।
श्राद्ध पक्ष में अभिचार का लौटना
श्राद्ध पक्ष में किया गया अभिचार करने वाले पर ही क्यों लौटता है?
क्योंकि जिन आत्माओं से वह कार्य कराया जाता है वे स्वयं किसी के पितर हैं, और इन सोलह दिनों में वे भी चाहती हैं कि उनके अपने वंशज उनकी मुक्ति के लिए कुछ करें। वक्ता कहते हैं कि करने वाले के अपने पितर सबसे पहले उस पर रुष्ट होते हैं, क्योंकि इस काल में शक्ति का प्रयोग वर्जित है।
वक्ता का प्रतिवाद इस तथ्य पर टिका है कि अभिचार करने वालों के भी पितृ पूर्वज होते हैं। वे बताते हैं कि घर में सूतक-पातक के समय 99% संभावना यही रहती है कि तंत्र अभिचार प्रभावी नहीं होता, और वही सुरक्षा श्राद्ध पक्ष में भी काम करती है। उनका तर्क: जो दूसरे पर अभिचार करता है, सबसे पहले उसके अपने पितर उस पर रुष्ट होते हैं, क्योंकि इस काल में शक्ति का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है — चातुर्मास में वास्तविक अभिचार पूरी तरह मना है, और यह उससे भी कठिन स्थिति है। जिन आत्माओं से यह कार्य कराया जाता है उन्हें भी हानि होती है, क्योंकि हर प्रेत किसी न किसी का पितर है। इन सोलह दिनों में, वे कहते हैं, दुर्भावना रखने वाले तांत्रिक के वचनों में बँधी आत्माएँ भी — चाहे वे प्रेत हों, ब्रह्म हों, पिशाच हों या डाकिनी — यही चाहेंगी कि उनके अपने वंशज उनके निमित्त कुछ शुभ करें, जिससे वे अपने बंधन से मुक्त होकर अपनी गति पा सकें। जब ठीक उसी समय उनके वंशज कोई शुभ कर्म कर रहे हों, संभवतः गीता का पाठ, और उससे उन्हें क्षमता और आगे बढ़ने की सद्बुद्धि मिल रही हो, तो जिसने उन्हें वचनों में बाँधकर किसी पर छोड़ा है, हानि सबसे पहले वे उसी को पहुँचाती हैं।
करने वाले पर लौटने वाली हानि का गुणक
पितृ पक्ष में अभिचार करने वाले पर लौटने वाली हानि का गुणक
जितनी भेजी गई उससे कई गुना। वक्ता कहते हैं कि जिस पर अभिचार हुआ उसे दस हानि पहुँचती है तो करने वाले को पचास पहुँचती है; जहाँ एक व्यक्ति मरता है वहाँ करने वाले के यहाँ वर्ष भर के भीतर पाँच मरते हैं, और यह पीड़ा उसके वंशजों तक चलती है।
वक्ता इस लौटाव का अनुपात बताते हैं। जिस व्यक्ति पर अभिचार किया गया उसे यदि बँधी आत्माओं के माध्यम से दस हानि पहुँच रही है, तो वही आत्माएँ करने वाले को पचास हानि पहुँचाएँगी। यदि इस कृत्य से कोई मारा जा रहा है, तो करने वाले की ओर वर्ष भर के भीतर पाँच मरेंगे। ऐसे ही लोगों को, वे कहते हैं, कोढ़ जैसी व्याधि होती है और फिर वे पूछते हैं कि हमने क्या गलती की। इससे आगे यह परिणाम आगामी पीढ़ियों तक जाता है: वंशजों पर कष्ट आते रहते हैं, संतान जन्म से विकलांग, जन्मांध, या मूक-बधिर उत्पन्न होती है — और फिर वे परिवार पूछते हैं कि हमने कौन सा पाप किया था कि इस प्रकार जन्म लेना पड़ा। अंत में वे श्रोताओं से कहते हैं कि अपने देवी-देवताओं के विषय में निश्चिंत रहें, और जोड़ते हैं कि इस काल में वही घर के देवी-देवता कुल के पितरों को तृप्त करने का माध्यम भी बनते हैं।
देव वृक्ष पितरों तक पहुँचने का माध्यम
तुलसी और देव वृक्षों की सेवा पितरों को किस प्रकार लाभ पहुँचाती है?
देव वृक्ष पर किया गया तर्पण — दूध और जल से तुलसी का, या नारायण के 108 नामों से, और तुलसी न होने पर पीपल पर — एक छोटे अभिषेक जैसा बताया गया है, जो भगवत्कृपा से कुल के पितरों की तृप्ति का माध्यम बनता है।
वक्ता कहते हैं कि वे दो-तीन वर्षों से सोशल मीडिया पर बार-बार यही कहते आ रहे हैं: पितृ पक्ष में देव वृक्षों की सेवा और पूजा करनी चाहिए। कम से कम तुलसी जी का दूध और जल से भरपूर तर्पण कीजिए, या नारायण के 108 नामों से तर्पण कीजिए — इसका विधान वे अलग से बता चुके हैं। इस वर्ष उन्होंने भगवान दत्तात्रेय से संबंधित एक अलग विधान भी दिया है, जो पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष पर किया जाता है; जिनके घर तुलसी नहीं है वे पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। पर कर सकते हैं। देव वृक्ष पर तर्पण स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं। यद्यपि इसे तर्पण कहा जाता है, वे बताते हैं कि वास्तव में जो हो रहा है वह एक छोटा अभिषेक है, और कहते हैं कि यही भगवत्कृपा से कुल के पितरों की तृप्ति का माध्यम बनते हैं।
घर के जल स्थान पर संध्या का दीपक
श्राद्ध पक्ष में घर में दीपक कहाँ जलाना चाहिए?
जहाँ पीने का जल रखा जाता है, वही पितरों का स्थान माना गया है — कुशा पर रखा घी का दीपक, संध्या के समय, दक्षिण की ओर मुख करके। शरीर का जल पितृ कृपा से टिकता है, और उसकी कमी पितरों के रुष्ट होने का संकेत बताई गई है।
घर में जहाँ पीने का जल रखा जाता है वह स्थान पितरों का स्थान माना जाता है, क्योंकि शरीर में जल पितृ की कृपा से टिकता है। शरीर में जल की कमी को पितरों के रुष्ट होने का संकेत कहा गया है; जल का स्थान पितरों का और चंद्रमा का है। उसी स्थान पर संध्या के समय मिट्टी का घी वाला दीपक कुशा पर रखकर, दक्षिण की ओर मुख करके जलाना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि कम से कम श्राद्ध पक्ष में यह अवश्य करना चाहिए, इससे अनेक दोषों से मुक्ति मिलती है और पितर तृप्त होते हैं। उनका तर्क यह है कि जहाँ पूरे कुल की गति हो भी चुकी हो, वहाँ भी इन सोलह दिनों में पितर पितृलोक से उपस्थित रहते हैं, और उनके लिए एक स्थान होता है — घर के मुख्य द्वार से थोड़ा भीतर का स्थान — इसीलिए वहाँ दीपक जलाया जाता है। वे जोड़ते हैं कि उस स्थान पर दीपक जलाना व्यक्ति के अपने जीवन के कई अंधकारों को दूर करने में समर्थ है। सत्र में अन्यत्र वे कुशा का विवरण भी देते हैं: तीन लंबी कुशा, दक्षिण से उत्तर की ओर मुख करके रखी हुई, और घी का दीपक लंबी बाती के साथ दक्षिण की ओर।
अध्याय का चयन, और प्रेत बाधा में ग्यारहवाँ
गीता का कौन सा अध्याय पढ़ें, और प्रेत बाधा में कौन सा?
रुचि के अनुसार कोई भी — तीसरा, सातवाँ या नौवाँ सुझाए गए हैं। परंतु जिन्हें ज्ञात है कि उनके पितर प्रेत योनि में हैं, या जिनके घर में भारी प्रेत बाधा है, उन्हें श्राद्ध पक्ष भर ग्यारहवें अध्याय का माहात्म्य सहित बार-बार पाठ करने को कहा गया है।
एक ही अध्याय बताने को कहे जाने पर वक्ता उसे सीमित करने से मना कर देते हैं: जो रुचे वही पढ़िए, छोटा चाहिए तो छोटा, बड़ा चाहिए तो बड़ा — तीसरा, सातवाँ, नौवाँ सभी सुझाए गए हैं — पर पढ़िए अवश्य। एक अपवाद वे स्पष्ट रखते हैं। जिन्हें ज्ञात है कि उनके पितर प्रेत योनि में हैं, या पितरों के साथ आत्माएँ हैं, या घर में भारी प्रेत बाधा है, उन्हें किसी भी स्थिति में श्राद्ध पक्ष भर ग्यारहवें अध्याय का माहात्म्य सहित बार-बार पाठ करना चाहिए। वे श्रोताओं को माहात्म्य पढ़ने को कहते हैं ताकि समझ आए कि वे इस अध्याय की बार-बार संस्तुति क्यों करते हैं। संस्कृत आवश्यक नहीं — हिंदी चलेगी — और संख्या खुली है: एक बार, पाँच बार, ग्यारह बार, जितनी सामर्थ्य हो।
सामर्थ्य के अनुसार देना, गिनती वाले टोटके से नहीं
पितृ पक्ष में दान और जीव सेवा किस प्रकार करनी चाहिए?
अपनी सामर्थ्य के अनुसार और सच्ची श्रद्धा से, गिनी हुई संख्या से नहीं। वक्ता दो या चार रोटी गिनकर देने वाले टोटकों को अस्वीकार करते हैं, और कहते हैं कि मन मारकर दिया गया कुछ भी फल नहीं देता।
पंडित जी को देने के विषय में वक्ता निर्णय श्रोता पर छोड़ देते हैं — दीजिए या मत दीजिए, पर जो दीजिए वह श्रद्धा से दीजिए, क्योंकि तभी वह पितरों तक पहुँचता है। इस आपत्ति पर कि ब्राह्मण के खाने से पितर को क्या लाभ, वे प्रश्नकर्ता को गीता के तीसरे अध्याय की ओर भेजते हैं, जहाँ उनके अनुसार श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोगों को उत्तर नहीं देना चाहिए: जिन्होंने पहले से हर बात को गलत सिद्ध करना तय कर रखा है और जो शास्त्र प्रमाण मानते ही नहीं, उन्हें शास्त्र प्रमाण से नहीं समझाया जा सकता, उन्हें छोड़ देना ही अच्छा है। जीव सेवा पर, जिसकी चर्चा वे कहते हैं कि वर्ष भर लगभग हर वीडियो में करते हैं, सिद्धांत यह है कि अपने पेट से पहले भोजन किसी दूसरे जीव के पेट में जाना चाहिए, और श्राद्ध पक्ष में यह अवश्य करना चाहिए। गिनती वाले विधानों को वे नकारते हैं — बड़े-बड़े लोगों द्वारा प्रचलित यह टोटका कि केवल दो रोटी या केवल चार रोटी देनी है — और कहते हैं कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीजिए: दो ही सामर्थ्य हो तो दो, और सामर्थ्य हो तथा प्रसन्नता से देना चाहें तो दस, गाय को, कुत्ते को, कौए को, या तीनों को।
दिखावे के लिए किया गया कर्म निष्फल क्यों है
पितरों के निमित्त किए गए कर्म का प्रचार क्यों नहीं करना चाहिए?
क्योंकि दिखावे के लिए किया गया कर्म केवल करने वाले को ही संतुष्ट करता है। वक्ता एक व्यक्ति का उदाहरण देते हैं जिसे उन्होंने गणेश विसर्जन पर मिठाई बाँटते देखा, और जिसे पहले दस रुपये पर एक गरीब को अपमानित करते देखा था — और कहते हैं कि भगवान पहले दूसरे कर्म को देखते हैं।
वक्ता इस बात को उसी दिन देखी गई घटना से समझाते हैं, अनंत चतुर्दशी के विसर्जन पर नदी किनारे: एक व्यक्ति बच्चों को बुला-बुलाकर जबरदस्ती लड्डू खिला रहा था, जिसे उन्होंने पहले एक गरीब व्यक्ति से दस रुपये पर झगड़ते और बात न छोड़ते देखा था। वह व्यक्ति एक बड़ी दवा दुकान का मालिक है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक रूप से बाँटी गई हजारों रुपये की मिठाई दस रुपये पर किसी को अपमानित करने की भरपाई नहीं करती, और भगवान पहले को नहीं, दूसरे को पहले देखते हैं। दिखावा स्वयं — सोशल मीडिया पर डाली गई वे तस्वीरें और वीडियो कि दस किलो मिठाई बाँटी और बच्चों को प्रसन्न किया, वे सेल्फियाँ — किसी देवता को प्रसन्न नहीं करतीं; उससे केवल करने वाले की आत्मतुष्टि होती है। वे इसे सीधे श्राद्ध पक्ष पर लागू करते हैं: श्राद्ध या तर्पण करते हुए अपनी तस्वीरें डालना और यह लिखना कि हमारे पितर तृप्त हो गए, बचकाना व्यवहार है। जो किया जाए वह गुप्त रखा जाए। इसमें वे एक सीमा स्वीकार करते हैं — दूसरों को प्रेरित करने के लिए डाली गई तस्वीरें अलग हैं, और वे कहते हैं कि चैनल की अपनी पोस्ट इसीलिए होती हैं कि दस लोगों को करते देखकर किसी को सद्बुद्धि और प्रेरणा मिले, लाइक के लिए नहीं।
बार-बार आने वाले साँप के स्वप्न का संकेत
क्या बार-बार साँप का सपना आना पितृ दोष का लक्षण है?
वक्ता के आकलन में 99% संभावना है। वे कुंडली में राहु को भी देखने को कहते हैं — सूर्य या चंद्रमा के साथ युति या दृष्टि इसे और स्पष्ट कर देती है — और बताते हैं कि यही स्वप्न इस या पूर्व जन्म में साँप मारने से लगे नाग दोष से भी जुड़ा है।
यह पूछे जाने पर कि स्वप्न में साँप दिखना या साँप का काटना पितृ दोष का लक्षण है क्या, वक्ता कहते हैं कि जहाँ यह बार-बार होता है वहाँ 99% संभावना है कि हाँ। वे प्रश्नकर्ता को जन्म कुंडली में राहु देखने को भी कहते हैं: यदि राहु सूर्य या चंद्रमा के साथ युति में हो, या उन पर दृष्टि हो, या उनके साथ बैठा हो, तो पितृ दोष और स्पष्ट हो जाता है। वे एक दूसरा पक्ष भी जोड़ते हैं — यही स्वप्न नाग दोष से भी संबंधित माना गया है, जो पितरों द्वारा या स्वयं स्वप्न देखने वाले द्वारा पूर्व या इस जन्म में लगा हो सकता है; साँप मारने से यह दोष लगता है और उसी से बार-बार साँप के काटने के स्वप्न आते हैं। उपाय यह बताया गया है कि पितृ पक्ष में संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करते समय इसी स्वप्न को कारण के रूप में बोल दीजिए, और फिर जो पाठ या पूजन बताया गया है उसमें से जो चाहें वह कीजिए। इसी प्रसंग में वे यह भी बताते हैं कि पितृ पक्ष के किसी भी दिन पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का वृक्ष लगाया जा सकता है।
लंबी प्रेत बाधा के लिए ग्यारहवें अध्याय और लोटे का विधान
जहाँ दशकों से किसी परिजन पर प्रेत बाधा हो, वहाँ क्या किया जा सकता है?
सुबह साढ़े आठ बजे से संकल्प लेकर गीता के ग्यारहवें अध्याय का प्रतिदिन ग्यारह बार पाठ कीजिए, पास में पीतल के लोटे में जल, मिश्री, कुशा और काला तिल रखकर; पाठ के बाद वही जल सूर्यनारायण को प्रणाम करके, दक्षिण की ओर मुख करके तुलसी में डाल दीजिए।
जिस प्रश्नकर्ता की माताजी पच्चीस-तीस वर्षों से पीड़ित हैं, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता पहले सावधान करते हैं कि जहाँ वास्तव में प्रेत उपस्थित है वहाँ पितरों के निमित्त दिया गया भोग उन तक नहीं पहुँचेगा — इसीलिए वे अगियारी वाली विधि से मना करते हैं — और यह कि ब्रह्म से जुड़े मामले में गायत्री जप उस आत्मा को लाभ और साधक को हानि पहुँचाएगा। इसके स्थान पर वे श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवाँ अध्याय बताते हैं, प्रतिदिन सुबह आठ या साढ़े आठ बजे से पहले बताई गई संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। विधि के साथ आरंभ करके, संभव हो तो दिन में ग्यारह बार, अभी हिंदी में और धीरे-धीरे आगे संस्कृत में। पाठ के साथ पीतल का एक लोटा रखा रहता है जिसमें थोड़ी मिश्री हो, उसमें कुशा और काला तिल डाला जाता है, और वह पूरे समय वहीं रहता है। पाठ पूर्ण होने और उसका फल नारायण को समर्पित करने के बाद वह लोटा बाहर तुलसी के पास ले जाया जाता है। पहले सूर्यनारायण को प्रणाम किया जाता है, फिर दक्षिण की ओर मुख करके वह जल तुलसी में यह कहते हुए डाला जाता है कि यह जल मैं नारायण को और उनके माध्यम से अपने कुल के पितरों को अर्पित करता हूँ, वे तृप्त हों और घर की प्रेत बाधा पूर्णतः समाप्त हो। जल डालते समय ग्यारहवें अध्याय का कोई श्लोक याद करके बोला जा सकता है। उनका दावा है कि तब तक वह जल विश्वरूप के पाठ से ग्यारह बार अभिमंत्रित हो चुका होता है, और कोई भी आत्मा — बावन प्रकार के ब्रह्मों में से कोई भी, यहाँ तक कि कपाल में रक्त पिलाकर भेजा गया खूनी ब्रह्म भी — न उसे रोक सकती है और न ग्यारहवें अध्याय के सामने टिक सकती है। वे दूसरा ताँबे का लोटा भी सुझाते हैं जिसमें काला तिल और कुशा डालकर पाठ के बाद पूरे घर में और पीड़ित व्यक्ति पर हल्का छिड़काव किया जाए।
विधान से उठने वाले उपद्रव की उपेक्षा
ग्यारहवें अध्याय के विधान से उठने वाला उपद्रव और उसे अनदेखा करने का निर्देश
काफी उपद्रव होगा। वक्ता चेतावनी देते हैं कि आत्मा ऐसा हंगामा कर सकती है कि पाठ पूरा ही न हो, या घर में झगड़ा खड़ा हो जाए, और निर्देश देते हैं कि पूरे सोलह दिन इस सबकी पूरी तरह उपेक्षा की जाए।
वक्ता सावधान करते हैं कि यह साधना करने पर प्रतिक्रिया होने की संभावना है। जहाँ आत्मा किसी शरीर पर है वहाँ वह बहुत उपद्रव करेगी, चाहेगी कि साधक पाठ पूरा ही न कर पाए, या घर में किसी बात पर झगड़ा खड़ा हो जाएगा। उनका निर्देश है कि सोलह दिन इस सबकी पूरी तरह उपेक्षा कीजिए — झगड़ा होता है तो होने दीजिए, मारपीट होती है तो होने दीजिए, आप शांत बैठे रहिए। वे सुझाते हैं कि आत्मा से बिना घबराए सीधे कह दीजिए कि जो करना है कर लो, आनंद कर लो, क्योंकि वह हानि तो कर ही रही है। पीड़ित व्यक्ति को उसके स्थान पर रहने दीजिए और इतना ध्यान रखिए कि उसे अत्यधिक कष्ट न हो। वे जोर देकर कहते हैं कि इसमें कोई तंत्र-मंत्र नहीं है — यह नारायण पर अटूट श्रद्धा के साथ करना है, और नारायण की एक बार भी दृष्टि पड़ जाए तो आत्मा को सद्गति मिलती है और घर का कल्याण होता है।
गंगा के नाम और शिव महापुराण का गंगावतरण प्रसंग
क्या पितरों के निमित्त गंगा कवच या उनके 108 नामों का पाठ किया जा सकता है?
हाँ। जिनकी श्रद्धा भगवती में है वे श्राद्ध पक्ष में भगवती गंगा के 108 नाम, उनका कवच या उनके स्तोत्र पढ़ सकते हैं, और शिव महापुराण का गंगावतरण वाला अध्याय भी पितरों को सद्गति देने वाला बताया गया है।
यह पूछे जाने पर कि पितरों की सद्गति के लिए माता गंगा का कवच और अष्टोत्तर नाम पढ़े जा सकते हैं क्या, वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं और उत्तर देते हैं — हाँ। वे इसे उन सभी श्रोताओं तक बढ़ाते हैं जिनके पितर उनके पिछले वीडियो में बताए किसी भी कारण से अशुद्ध हो गए हैं: यदि उनकी श्रद्धा भगवती के किसी स्वरूप में प्रबल है, तो वे श्राद्ध पक्ष में भगवती गंगा के 108 नाम, उनका कवच या उनके स्तोत्र भी पढ़ सकते हैं। अथवा शिव महापुराण का वह अध्याय पढ़ा जा सकता है जिसमें गंगा के अवतरण का वर्णन है, और उससे भी पितरों को सद्गति प्राप्त होती है।
मुक्ति क्षेत्र के रूप में पुष्कर, और बंधन की आवश्यकता
क्या कर्म गया में ही करना आवश्यक है, या पुष्कर से भी मुक्ति मिल सकती है?
गया अनिवार्य नहीं — पुष्कर मुक्ति क्षेत्र माना गया है और जहाँ श्रद्धा हो और कोई तांत्रिक जटिलता न हो वहाँ वह पर्याप्त है। पर वक्ता चेताते हैं कि यदि पितर स्वीकार न करें तो कहीं भी कराया गया कर्म लौट आता है।
वक्ता कहते हैं कि अलग-अलग पितरों के लिए अलग-अलग स्थान बताए गए हैं, पर वे किसी भी तीर्थ पर लागू होने वाली एक पूर्व शर्त जोड़ते हैं: कलियुग में बहुत कुछ शास्त्र के अनुसार नहीं चलता, और यदि वह वस्तु पितर को स्वीकार्य नहीं है तो जहाँ भी कराइए, वे लौट आते हैं। इस युग में जबरदस्ती संभव नहीं है। इस चेतावनी के साथ, यदि किसी की श्रद्धा पुष्कर में है और जो वे करा रहे हैं वह सामान्य है — कोई तांत्रिक जटिलता उसमें नहीं है — तो वहाँ मुक्ति अवश्य प्राप्त होगी, क्योंकि पुष्कर मुक्ति क्षेत्र माना जाता है। जबरदस्ती वाली बात वे शिव महापुराण के बिंदु के प्रसंग से समझाते हैं, जो प्रेत योनि में गए और विंध्य क्षेत्र में ब्रह्म पिशाच बनकर रहे, जबकि उनकी पत्नी मुक्ति पाकर पार्वती की सखी बनीं और दुखी होकर उनकी मुक्ति की प्रार्थना की कि वे भी कैलाश आ सकें। पार्वती ने तुंबुरु गंधर्व को उन्हें लाने भेजा। वक्ता का बिंदु यह है कि केवल जाकर उनके पास शिव महापुराण सुना देना पर्याप्त नहीं था: पहले उन्हें बाँधना पड़ा। बाँधकर, विंध्य क्षेत्र में बैठाकर उन्हें शिव महापुराण सुनाया गया, और उसके प्रभाव से उन्हें दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ और वे कैलाश गए। वे कहते हैं कि जो लोग कहते हैं कि केवल पाठ से यह हो जाता है, उन्हें यह समझना चाहिए।
जिस कक्ष में मांस-मदिरा का प्रयोग हो वहाँ पूजा
जिस कमरे में मांस-मदिरा का सेवन होता है वहाँ पूजा करने में दोष है क्या?
हाँ, और वक्ता कहते हैं कि इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। देवता सब कुछ गंध के रूप में ग्रहण करते हैं, इसलिए परदा रखने से भी कुछ नहीं होता — जहाँ मांस-मदिरा का सेवन होता है वहाँ सात्विक पूजा नहीं की जा सकती।
यह पूछे जाने पर कि जिस कमरे में मांस और मदिरा का सेवन होता है उसी में पूजा करने से दोष लगता है क्या और उससे कैसे बचें, वक्ता उत्तर देते हैं कि बचने की कोई संभावना नहीं है। जहाँ मांस-मदिरा का सेवन होता है वहाँ सात्विक पूजा सार्थक रूप से हो ही नहीं सकती — इसका कोई अर्थ नहीं बनता। परदा रखने से भी बात नहीं बनती, क्योंकि मांस पकने पर उसकी गंध फैलती है, और देवता सब कुछ गंध के रूप में ग्रहण करते हैं। इसलिए वे निष्कर्ष देते हैं कि यह संभव नहीं है, और दोष बना रहता है।
नवदुर्गा के हर नाम से नौ आहुति वाला देवी कवच हवन
देवी कवच का हवन किस प्रकार किया जाता है?
आदर्श रूप से कवच में आने वाली सभी देवियों के नामों से, पर सामान्य नियम यह कि नवदुर्गा के नौ नामों में से प्रत्येक से नौ आहुति — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक। पुरुष घी से आहुति देते हैं, स्त्रियाँ हवन सामग्री से।
देवी कवच के हवन की विधि और मंत्र पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि आदर्श रूप से हवन उसमें आने वाली सभी देवियों के नामों से करना चाहिए। सामान्य नियम के रूप में, देवी कवच का पाठ पूर्ण होने के बाद नवदुर्गा के नौ नामों में से प्रत्येक से कम से कम नौ आहुति दी जा सकती हैं। वे क्रम से नाम बताते हैं: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इनमें से प्रत्येक नाम से नौ आहुति को वे सर्वोत्तम मार्ग कहते हैं, यह बताते हुए कि अष्ट मातृका और अष्ट दुर्गा भी होती हैं, पर यहाँ नवदुर्गा प्रमुख हैं। सामग्री साधक के अनुसार बदलती है: आहुति के लिए घी, और स्त्री साधक होने पर हवन सामग्री।
आधार साधना कितनी बार दोहराई जाए
आधार साधना का दोहराव: ग्यारह दिन के पाँच क्रम, या इक्कीस दिन के तीन क्रम
ग्यारह-ग्यारह दिन के क्रम में कम से कम पाँच बार, या इक्कीस-इक्कीस दिन के क्रम में तीन बार — लगभग 108 दिन की आधार साधना। इससे तपोबल बनता है, पूर्व कर्म कटता है, और आगे की साधना के साधन जुटते हैं।
यह पूछे जाने पर कि दत्त माला मंत्र जैसी आधार साधना कब तक और वर्ष में कितनी बार करनी चाहिए, वक्ता ग्यारह-ग्यारह दिन के क्रम में कम से कम पाँच बार, या इक्कीस-इक्कीस दिन के क्रम में तीन बार बताते हैं — अर्थात कम से कम 108 दिन की आधार साधना। इस दोहराव के वे चार कारण देते हैं: तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। बनाना पड़ता है; पूर्व में किए गए कर्मों के प्रभाव को काटना पड़ता है; आगे की साधना निर्विघ्न चले; और कुंडली में जो दोष है वह नियंत्रण में आए। एक चौथा पक्ष आर्थिक है — संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। में यह भी रखना चाहिए कि आर्थिक कठिनाई न आए, क्योंकि धूप, फूल, बाती और हवन सामग्री सब में धन लगता है, और बहुत लगता है। इसे वे गुरु साधना से जोड़ते हैं: गुरु ही आगे का सब प्रबंध करते हैं और साधक के माता-पिता बन जाते हैं। भगवान दत्त की उपासना में उनकी महाशक्ति अनघा लक्ष्मी हैं, जो लक्ष्मी स्वरूप में वे संभावनाएँ बनाती हैं जिनसे साधक मार्ग पर आगे बढ़ता है। वे बताते हैं कि उनके कुछ साधक एक ही साधना को साल-डेढ़ साल तक करते रहे हैं और आगे बढ़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, और दत्त के साथ दो-तीन साधनाओं के बाद सांसारिक इच्छाएँ उसी के भीतर पूरी होने लगती हैं — माला मंत्र से आरंभ कीजिए, सक्षम होने पर एकाक्षरी लीजिए, और भगवती अनघा को जोड़ लीजिए, जिसे वे मार्ग खोलने के लिए पर्याप्त से अधिक कहते हैं।
अंतिम चरण में कार्य बिगड़ने पर भद्रकाली और विनायक
जब हर कार्य अंतिम चरण में बिगड़ जाए तो क्या करना चाहिए?
भगवती भद्रकाली की उपासना भगवान विनायक के साथ कीजिए — संकटनाशन गणेश स्तोत्र का अनुष्ठान अर्गला के प्रथम मंत्र के साथ, जिसमें भद्रकाली का नाम आता है, कम से कम सवा महीने तक।
अपने ही विशेषज्ञता वाले कार्य में सफलता न पाने वाली प्रश्नकर्ता को उत्तर देते हुए वक्ता एक बात दोहराते हैं जो वे पहले भी कह चुके हैं: जहाँ कोई लक्ष्य या कार्य ठीक अंतिम चरण में बिगड़ जाए, जहाँ लगे कि काम बन ही जाएगा और फिर बिगड़ जाए, और यह बार-बार हो, वहाँ भगवती भद्रकाली की उपासना भगवान विनायक के साथ करनी चाहिए। वे बताते हैं कि चैनल पर इस पर एक मिनट का छोटा वीडियो पहले से है, और मंत्र बिल्कुल सामान्य रखे गए हैं। साधना है संकटनाशन गणेश स्तोत्र का अनुष्ठान अर्गला के प्रथम मंत्र के साथ — यह मंत्र इसलिए चुना गया क्योंकि उसमें भद्रकाली का नाम आता है — कम से कम सवा महीने तक। इसके काम करने का उनका कारण यह है कि संकटनाशन तात्कालिक इच्छा को पहले संबोधित करता है, जबकि भद्रकाली उस विशिष्ट संकट को और लक्ष्य में आने वाली बाधा को हटाती हैं, चाहे वह ग्रह-नक्षत्र से हो या अपने ही कर्म से उत्पन्न दोष से। दोनों सिद्ध होने पर, वे कहते हैं, व्यक्ति के कार्य बनने लगते हैं। वे जोड़ते हैं कि इसके साथ कवच का पाठ भी किया जा सकता है, और संभव हो तो हवनात्मक विधान भी।
सूर्य की ओर या दक्षिण की ओर — पिता के जीवित होने के अनुसार
पितरों के निमित्त कर्म करते समय किस दिशा की ओर मुख करना चाहिए?
यदि पिताजी जीवित हैं तो सूर्य की ओर मुख कीजिए — अर्पण सूर्यनारायण के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है। यदि पिताजी नहीं रहे तो दक्षिण की ओर मुख कीजिए, जहाँ वह पितृ स्वरूप में स्थित यम के माध्यम से पहुँचता है।
वक्ता दो स्थितियाँ अलग करते हैं और श्रोताओं से ध्यान देने को कहते हैं। जहाँ पिताजी जीवित हैं वहाँ साधक को वैसे भी पिंड दान का अधिकार नहीं है, और जो भी पाठ या तर्पण वह करे वह सूर्य की ओर मुख करके करे; वह सूर्यनारायण के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है। यह दत्तात्रेय तर्पण और नारायण के एक सौ आठ नामों से किए जाने वाले तुलसी तर्पण पर लागू होता है, पर पितृ तर्पण पर नहीं, जो पिता के न रहने पर ही किया जाता है। जहाँ पिताजी नहीं रहे वहाँ साधक दक्षिण की ओर मुख करता है, और अर्पण पितृ स्वरूप में स्थित यम के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है। वे सावधानी से कहते हैं कि पिता के जीवित रहते दक्षिण की ओर मुख करके करना सर्वथा गलत नहीं कहा जा सकता, पर जो वे बता रहे हैं वह उन्हें अपने गुरुजनों और वृद्ध साधकों से प्राप्त है और उनके अपने अनुभव में खरा उतरा है।
यह चैनल तामसिक विधियाँ क्यों नहीं देता
यह चैनल गृहस्थों के लिए है, और भगवती तथा महादेव अपने गृहस्थ स्वरूप में पूर्णतः सात्विक मार्ग पर चले।
क्योंकि चैनल का नाम ही गृहस्थ तंत्र है और वह गृहस्थों के लिए है। वक्ता कहते हैं कि भगवती और महादेव अपने गृहस्थ स्वरूप में पूर्णतः सात्विक मार्ग पर चले, और उसके साथ तामसिक विधि नहीं दी जा सकती।
तामसिक विधि से गुरु प्राप्ति की साधना बताने को कहे जाने पर वक्ता सीधे मना कर देते हैं और कहते हैं कि चैनल का तामसिक विधि से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कारण चैनल की अपनी बुनियाद है: इसका नाम गृहस्थ तंत्र है, यह गृहस्थों के लिए है, और उन्होंने जो सीखा और समझा है वह यह कि भगवती और महादेव अपने गृहस्थ स्वरूप में पूर्णतः सात्विक मार्ग पर चले। उस प्रतिबद्धता के साथ तामसिक विधि यहाँ नहीं दी जा सकती। यही सीमा सत्र में अन्यत्र भी दिखती है, जहाँ वे बेल वृक्ष और अपराजिता के किसी भी प्रकार के तांत्रिक पक्ष पर चर्चा से यह कहकर मना कर देते हैं कि ये साक्षात जगदंबा का स्वरूप माने गए हैं, और सुनने वाले गृहस्थ हैं।
अपने आराध्य के माध्यम से पितरों को जप अर्पित करना
क्या मंत्र जप का फल पितरों को अर्पित किया जा सकता है?
सीधे कभी नहीं। जप अपने आराध्य को समर्पित किया जाता है और वही उसे पहुँचाते हैं — पहले संकल्प कर लीजिए कि यह जप पितरों की गति और तृप्ति के निमित्त है, और बाद में हाथ में जल लेकर उसका फल विधिवत समर्पित कीजिए।
जिस प्रश्नकर्ता ने सुना है कि अर्पित किया गया जप कभी-कभी दुष्ट शक्तियाँ ले लेती हैं, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि हर मंत्र पितरों को अर्पित नहीं किया जा सकता, और जप का फल पितरों को सीधे कभी अर्पित नहीं करना चाहिए। वह अपने इष्ट देव या आराध्य को समर्पित किया जाता है, जिनके माध्यम से वह उन तक पहुँचता है। विधि के दो हिस्से हैं। पहले संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लिया जाता है — जैसे कि मैं अपनी क्षमता के अनुसार, अथवा पाँच या ग्यारह माला की संख्या से, अपने पितरों की गति, मुक्ति, तृप्ति, कृपा और आशीर्वाद के निमित्त पंचाक्षरी जप कर रहा हूँ। बाद में हाथ में जल लेकर अभी-अभी किया गया पूरा जप इन शब्दों के साथ समर्पित किया जाता है कि मैं इसे भगवान श्री सदाशिव को अर्पित करता हूँ, इसका फल मेरे पितरों को प्रदान कीजिए और उनकी गति तथा मुक्ति कीजिए। मानसिक जप भी इसी प्रकार समर्पित किया जाता है।
महामृत्युंजय के लिए वैदिक अधिकार आवश्यक
महामृत्युंजय जप का अधिकारी कौन है?
यह वैदिक मंत्र है और इसके लिए वैदिक अधिकार तथा वैदिक विधि चाहिए। वक्ता यज्ञोपवीत, महामृत्युंजय की दीक्षा, या कम से कम 24,000 की गायत्री पुरश्चरण की अपेक्षा रखते हैं, साथ ही वैदिक आचार्य से सीखा हुआ शुद्ध उच्चारण।
यह पूछे जाने पर कि महामृत्युंजय जप केवल सुबह ही करना चाहिए या अनुष्ठान जल्दी पूरा करने के लिए शाम को भी किया जा सकता है, वक्ता पहले अधिकार का प्रश्न उठाते हैं। महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है, और इसका जप, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। और अनुष्ठान वैदिक अधिकार तथा वैदिक विधि से ही करना चाहिए। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है, जो जनेऊ धारण करते हैं और गायत्री करते हैं, उन्हें महामृत्युंजय की दीक्षा भी लेनी चाहिए। ऐसा न हो तो कम से कम गायत्री की एक बड़ी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। — वे 24,000 बताते हैं — पूर्ण होनी चाहिए, उसके बाद वैदिक आचार्य से शुद्ध उच्चारण सीखना चाहिए, न्यास सहित पूरी विधि की जानकारी लेनी चाहिए, और समय का प्रश्न उन्हीं आचार्य से पूछना चाहिए। वे एक और सावधानी जोड़ते हैं: महामृत्युंजय एक ही प्रकार का नहीं है, उसके अनेक स्वरूप मिलते हैं, और साधक को पता होना चाहिए कि वह कौन सा कर रहा है। सत्र में अन्यत्र वे चेताते हैं कि बिना अधिकार वैदिक मंत्र करने वाले को उल्टा फल भुगतना पड़ता है।
गाड़ी गई वस्तु पर हवन और राख गाड़ने का उपाय
यदि घर में कोई नकारात्मक वस्तु गाड़ दी गई हो तो क्या करें?
हवनात्मक प्रयोग कीजिए, और उसके बाद हवन की राख तथा सामग्री बार-बार भूमि में गाड़िए — संभव हो तो घर के मध्य के ब्रह्म भाग में, अन्यथा चारों कोणों में।
घर में किसी के गाड़कर छोड़ी गई नकारात्मक वस्तु की शक्ति कैसे समाप्त करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि जब यह पता चल गया है कि घर में नकारात्मक गतिविधि है, तो वहाँ हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए। हवन के बाद राख और सामग्री को बार-बार भूमि में गाड़ना चाहिए — संभव हो तो ब्रह्म भाग में, अर्थात घर के मध्य भाग में, अन्यथा चारों कोणों में। कौन सा हवनात्मक प्रयोग करना है, वे कहते हैं, यह चैनल पर पहले बताया जा चुका है।
आधार के बिना सिद्ध कुंजिका खतरनाक क्यों है
बिना समझे पाठ करने वालों के लिए सिद्ध कुंजिका खतरनाक क्यों है?
वक्ता इसे दोधारी तलवार कहते हैं जिसके बीजाक्षरों में सारी शक्तियाँ समाई हैं। वे त्रेता युग में मेघनाद की मृत्यु का कारण इसी में हुई एक त्रुटि बताते हैं, और उन लोगों से सावधान करते हैं जो भैरव या गुरु की पूजा किए बिना इसका पाठ करते हैं।
सिद्ध कुंजिका की पूरी सत्यता पूछने वाले प्रश्नकर्ता को उत्तर देते हुए वक्ता पहले बताते हैं कि वे सामान्यतः सिद्ध कुंजिका, नवार्ण मंत्र, तथा शताक्षरी और सहस्राक्षरी स्वरूपों पर कुछ कहते ही नहीं। फिर वे अपवाद करते हैं। प्रश्नकर्ता को उनके नाम से संबोधित करते हुए वे कहते हैं कि त्रेता युग में मेघनाद ने सिद्ध कुंजिका से ही महान सिद्धि प्राप्त की थी, और उसी सिद्ध कुंजिका के कारण — उसमें हुई एक त्रुटि से — उनका वध हुआ। उनका आकलन यह है कि सिद्ध कुंजिका इतनी तेज तलवार है कि और कुछ याद हो या न हो, यह सबको कंठस्थ है, और लोगों ने लिख रखा है कि इसके पाठ से हर दोष कट जाता है, इससे हवन करना चाहिए, इत्यादि। वे कहते हैं कि लोग जिससे खेल रहे हैं वह बहुत खतरनाक वस्तु है। उनकी विशेष चिंता उन लोगों को लेकर है जो आज पूरी जानकारी के बिना इसे बड़ी मात्रा में उठा लेते हैं, जो कभी भैरव की पूजा नहीं करेंगे, कभी गुरु पूजन नहीं करेंगे, और सीधे सिद्ध कुंजिका आरंभ कर देते हैं। इस दृष्टि से वे इसकी तुलना भगवती बगला की साधना से करते हैं — ऐसी साधना जिसका फल इस पर निर्भर करता है कि साधक कौन है और उसके कुल में क्या कठिनाइयाँ हैं।
पूरे पक्ष में भोजन संबंधी नियम
पितृ पक्ष में क्या नहीं खाना चाहिए?
पूर्णतः सात्विक भोजन, लहसुन और प्याज भी छोड़कर। वक्ता इससे आगे भी सुझाते हैं — अभी से छोड़कर कार्तिक पूर्णिमा के बाद ही आरंभ कीजिए, और जो मार्गशीर्ष में भैरव साधना करना चाहते हैं वे उसके पूरे होने तक इसे जारी रखें।
पितृ पक्ष में क्या नहीं खाना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भोजन पूर्णतः सात्विक होना चाहिए और लहसुन-प्याज से भी बचना चाहिए। फिर वे इच्छुक लोगों के लिए एक लंबा क्रम सुझाते हैं: पक्ष भर छोड़कर फिर आरंभ करने के बजाय, अभी से छोड़िए और कार्तिक पूर्णिमा के बाद ही आरंभ कीजिए, बीच में मत खाइए। एक विशेष वर्ग के लिए वे इसे और आगे बढ़ाते हैं — जो कार्तिक पूर्णिमा के बाद आने वाले मार्गशीर्ष मास में भैरव साधना करना चाहते हैं, वे उस काल में भी संयम रखें और भैरव साधना पूर्ण होने के बाद आरंभ करें।
वक्ता का यह दावा कि गति केवल सनातन धर्म में है
क्या अन्य धर्मों में भी पितरों की गति और पुनर्जन्म का सिद्धांत है?
वक्ता मानते हैं कि नहीं है। वे कहते हैं कि मुक्ति के लिए सनातन धर्म में आना ही पड़ता है, पुनर्जन्म और पितरों का विषय और कहीं नहीं है, और हैलोवीन या शब-ए-बरात जैसे आयोजन यह दावा नहीं करते कि उनसे मृतकों की गति होती है।
वक्ता गीता प्रेस के जयदयाल गोयंदका के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग सुनाते हैं, जिनके विषय में कहा जाता है कि वे मुंबई के जुहू बीच पर प्रतिदिन हरे राम हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने जाते थे, और वहाँ हर संध्या एक व्यक्ति उनके पास आकर बैठता था जो अंततः एक पारसी प्रेत निकला। उसी के कथन से वे यह स्थापना निकालते हैं कि गिद्ध या चील को खिलाकर यह मानना कि उससे आत्मा को मुक्ति मिल जाएगी, काम नहीं करता, और गति के लिए सनातन धर्म में आना ही पड़ता है। वे इसे सामान्य रूप में कहते हैं: अन्य धर्मों में पुनर्जन्म को पूरी तरह माना ही नहीं गया, और पुनर्जन्म तथा पितरों का विषय सनातन के अतिरिक्त कहीं नहीं है। वे ईसाई धर्म में हैलोवीन और शब-ए-बरात का उदाहरण देते हैं, जिसमें कब्रों पर मोमबत्ती जलाई जाती है, और कहते हैं कि इनमें से कोई यह दावा नहीं करता कि इससे मृतकों की गति हो गई। स्पष्ट आपत्ति की आशंका करते हुए — कि तब तो भारत के बाहर सब मृतक भटक रहे होंगे — वे कहते हैं कि कनाडा या लंदन में रहने वालों से पूछा जाए कि वहाँ की क्या स्थिति है, और गायत्री शक्तिपीठ तथा श्रीराम शर्मा आचार्य के साहित्य का हवाला देते हैं जिसमें प्रेत संबंधी घटनाएँ लगभग पूरी तरह विदेश की ही मिलती हैं। वे स्वीकार करते हैं कि विषय उलझा हुआ है और इस पर अलग से बात करनी होगी।
पाँच ऋण और पंचबलि महायज्ञ
जन्म से ही व्यक्ति किन ऋणों से बँधा होता है?
पाँच ऋण माने गए हैं। पितृ ऋण इसलिए है कि यह जीवन और यह शरीर पितृ के माध्यम से मिला; ऋषि ऋण इसलिए कि ऋषियों ने ज्ञान की हर शाखा दी। इनसे मुक्ति पंचबलि महायज्ञ, पूजन तथा जीव और प्रकृति की सेवा से होती है।
यह पूछे जाने पर कि व्यक्ति जन्म से ही देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण से कैसे बँध जाता है, वक्ता पाँच में से दो को सीधे समझाते हैं। पितृ ऋण इसलिए है कि पितृ के माध्यम से ही हमें यह जीवन और यह शरीर प्राप्त हुआ, इसलिए उनका ऋण हम पर है। ऋषि ऋण उस सबके कारण है जो ऋषियों ने दिया — मंत्र ज्ञान, हर प्रकार का मंत्र और तंत्र, तथा अर्थशास्त्र सहित सारी विद्याएँ। वे टिप्पणी करते हैं कि जिसे आज आधुनिक विज्ञान और आधुनिक अर्थशास्त्र समझा जाता है वह वास्तव में पुराना है, कहीं से लिया हुआ है, और इन सभी विषयों के कारण ऋषियों का ऋण हम पर है। इन ऋणों से मुक्ति पंचबलि महायज्ञ से होती है, जिसे नियमित कर्तव्य माना गया है और जिसका अर्थ वे पशु-पक्षियों को अन्न देना और अतिथि सत्कार बताते हैं, साथ ही देवताओं के लिए पूजन और गायत्री जप, तथा प्रकृति और पर्यावरण की सेवा।
सर्प दोष का बताया गया पारिस्थितिक कारण
साँप मारने से पितृ दोष और सर्प दोष क्यों लगता है?
क्योंकि सर्प पृथ्वी के भीतर से निकलने वाली विषैली गैसों को पीते हैं, और उसी से उनकी ग्रंथियों में विष बनता है। उनके बिना पृथ्वी की विषैली गैस बहुत बढ़ जाएगी और ऑक्सीजन घट जाएगी — यही मुख्य कारण बताया गया है।
साँप मारने से लगने वाले दोष का वक्ता प्राकृतिक कारण बताते हैं। पृथ्वी के गर्भ से जो भी विषैली गैसें निकलती हैं उन्हें सर्प ग्रहण करते और पीते हैं; उसी से वे तृप्त होते हैं और उसी कारण उनकी ग्रंथियों में विष रहता है। यदि सर्प न हों तो पृथ्वी में विषैली गैस की मात्रा बहुत बढ़ जाएगी और ऑक्सीजन की मात्रा घट जाएगी। वे स्पष्ट कहते हैं कि सर्प मारने से दोष लगने का यही कारण है, और इसे सबसे बड़ा कारण बताकर श्रोताओं से इसी आधार पर समझने को कहते हैं।
बेल, पीपल और बरगद — ये तीन वृक्ष
पितरों के निमित्त कर्म किन वृक्षों के नीचे करने चाहिए?
बेल, पीपल और बरगद। श्राद्ध पक्ष में इन तीन के नीचे किया गया कोई भी शुभ कर्म भगवत्कृपा से सीधे पितरों तक पहुँचता है, और बेल वृक्ष में स्वयं भगवती का वास बताया गया है।
यह पूछे जाने पर कि बेल वृक्ष में कोई शक्ति रहती है क्या और क्या वह कोई योगिनी है, वक्ता उत्तर देते हैं कि बेल वृक्ष में साक्षात भगवती का वास है। इससे आगे कहने से वे मना करते हैं, यह टिप्पणी करते हुए कि ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें वे पूरी तरह नहीं खोलना चाहते, और सलाह देते हैं कि निश्चिंत होकर बेल वृक्ष की सेवा कीजिए। फिर वे समूह बताते हैं: देव वृक्षों में बेल, और पितरों के लिए पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के नीचे तथा बरगद के नीचे भी। श्राद्ध पक्ष में इन तीन वृक्षों के नीचे किया गया कोई भी शुभ कर्म भगवत्कृपा से सीधे अपने पितरों तक पहुँचता है।
घर की ऊर्जा के सूचक — अपराजिता और तुलसी
अपराजिता और तुलसी के पौधे घर के विषय में क्या बताते हैं?
तुलसी को सबसे संवेदनशील पौधा बताया गया है, जो नकारात्मकता खींचते हुए बार-बार सूखती है; वक्ता कहते हैं कि फिर भी लगाते रहिए। जहाँ अपराजिता फैलकर फूलने लगे, वहाँ वे कहते हैं कि उस घर में शुभ शक्ति आने लगी है।
नील अपराजिता में किसी शक्ति के वास के विषय में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि उसमें साक्षात भगवती का वास है, पर तांत्रिक विवरण देने से यह कहकर मना कर देते हैं कि सुनने वाले गृहस्थ हैं — यही सीमा वे बेल वृक्ष पर और श्वेत तथा लाल अपराजिता पर भी रखते हैं। सामान्य रूप से वे इतना कहते हैं कि अपराजिता साक्षात जगदंबा का स्वरूप मानी गई है, और जिस घर में वह जड़ पकड़कर फूलने लगे, वहाँ यह प्रश्न छोड़ दीजिए कि जीवन में क्या कठिनाइयाँ हैं: वहाँ शुभ शक्ति उपस्थित है। वे तुलसी से इसकी तुलना करते हैं, जिसे सबसे संवेदनशील पौधा बताया गया है और जो नकारात्मकता आने पर सूख जाती है। जिस घर की तुलसी एक के बाद एक सूखती रहती है, उसका कारण यह है कि वे नकारात्मकता खींच रही हैं। उनका निर्देश है कि लगाना बंद मत कीजिए — दोष लगता है तो लगने दीजिए, भगवती का नाम स्मरण करते रहिए, नारायण का जप करते रहिए, ग्यारहवें अध्याय का पाठ करते रहिए, और तुलसी लगाते रहिए। इसी प्रकार, जब अपराजिता की लताएँ फैलकर फूलने लगें तो समझिए कि दिव्य शक्ति आने लगी है।
पितृ पक्ष और नवरात्रि में ब्रह्मचर्य
क्या पितृ पक्ष में ब्रह्मचर्य आवश्यक है?
हाँ — पितृ पक्ष में भी नवरात्रि की तरह पूर्ण ब्रह्मचर्य का महत्व है, और वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि किसी भी विधान को करते समय इसका पालन मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से करना है।
वक्ता यह नियम संक्षेप में और बिना किसी शर्त के रखते हैं: पितृ पक्ष हो या मातृ पक्ष — जिससे उनका आशय नवरात्रि है — ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पूर्ण महत्व है। पितृ पक्ष के सारे विधान पूर्ण ब्रह्मचारी रहते हुए करने हैं, और वे स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ शारीरिक के साथ मानसिक भी है। यही आवश्यकता वे सत्र में आगे भी दोहराते हैं, जब एक प्रश्नकर्ता को लंबे समय तक हनुमान साधना बताते हैं और फिर से जोर देते हैं कि केवल शारीरिक रूप से पालन पर्याप्त नहीं है।
विवाह के बाद के वर्ष में घर पर श्राद्ध
क्या विवाह के अगले वर्ष घर पर श्राद्ध करना चाहिए?
होलिका दहन पर संवत बदलने तक घर के भीतर नहीं। वार्षिक श्राद्ध छोड़ा नहीं जाता — वह बाहर किया जाता है: नदी किनारे, पीपल या बेल वृक्ष के नीचे, मंदिर में या तीर्थ स्थान पर।
यह पूछे जाने पर कि जिस घर में विवाह हुआ है वहाँ एक वर्ष तक श्राद्ध नहीं करना चाहिए क्या, वक्ता अपनी समझ के अनुसार नियम स्पष्ट करते हैं। जिस मास में विवाह हुआ है उससे लेकर संवत बदलने तक घर पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। संवत बदलने को वे स्पष्ट रूप से होलिका दहन बताते हैं: होलिका दहन से पहले घर में या घर के स्थान पर श्राद्ध नहीं होना चाहिए। वे उसे अलग करते हैं जो नियंत्रण में नहीं है — मृत्यु हो जाए तो उसे रोका नहीं जा सकता — और वार्षिक श्राद्ध को, जो हर वर्ष हो रहा है और जिसे इस कारण रोकना नहीं चाहिए। जहाँ वार्षिक श्राद्ध इस अवधि में पड़े, वहाँ उसे घर के बाहर करना चाहिए: नदी किनारे, या पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। अथवा बेल वृक्ष के नीचे, जिसे वे उत्तम कहते हैं, या मंदिर अथवा तीर्थ स्थान पर। उनका जोर इसी पर है कि इसे छोड़ना नहीं है — केवल स्थान बदलना है।
देव दीक्षा प्रवेश का द्वार, और उसकी सीमा
जिसने गुरु दीक्षा नहीं ली, क्या वह किसी मंत्र को सिद्ध कर सकता है?
देव दीक्षा की विधि करने के बाद सात्विक और सामान्य मंत्रों का जप किया जा सकता है। परंतु उपदेव श्रेणी से जुड़ा कार्य — प्रेत और पिशाच से संबंधित मंत्र-तंत्र — दिक्कत देगा; उसके लिए प्रत्यक्ष विधि विधान से सब कुछ करना पड़ेगा।
एक प्रश्नकर्ता, जिन्होंने गुरु दीक्षा नहीं ली है, पूछते हैं कि किसी के दिए हुए मंत्र को कैसे सिद्ध करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह देव दीक्षा लेने के बाद हो सकता है: देव दीक्षा की विधि कर लेने के बाद सात्विक मंत्रों और सामान्य मंत्रों का जप किया जा सकता है। सीमा वे उपदेव श्रेणी पर खींचते हैं — यदि कोई प्रेत और पिशाच से संबंधित कोई मंत्र-तंत्र कार्य करना चाहता है तो दिक्कत होगी, और उसके लिए सब कुछ प्रत्यक्ष विधि विधान से करना पड़ेगा।
सोलह दिन का ग्यारहवाँ अध्याय क्या कर सकता है और क्या नहीं
क्या गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ तुलसी को अर्पित करने से नकारात्मक शक्ति समाप्त होती है?
वक्ता सीधे कहते हैं कि बिल्कुल समाप्त होगा — यह पूछते हुए कि ऐसा कैसे हो सकता है कि न हो — और प्रश्नकर्ता से श्रद्धा और विश्वास के साथ करने को कहते हैं। पर वे एक सीमा जोड़ते हैं: सोलह दिन में तीस साल की समस्या जड़ से नहीं हटेगी, यद्यपि उसकी जड़ें हिल जाएँगी और उसका रास्ता अवरुद्ध हो जाएगा।
यह पूछे जाने पर कि भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह पाठ माता तुलसी को समर्पित कर देने से नकारात्मक शक्ति समाप्त होगी क्या, वक्ता बिना किसी शर्त के कहते हैं कि बिल्कुल होगी — ऐसा कैसे हो सकता है कि न हो — और प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि करके तो देखिए, विश्वास रखिए, श्रद्धा रखिए, कीजिए। इसके बाद वे सिद्धांत नहीं, मात्रा को सीमित करते हैं। सत्र में पहले आए उस प्रश्नकर्ता का उल्लेख करते हुए जिनकी माताजी पर तीस वर्ष से प्रेत है, वे कहते हैं कि सोलह दिन में तीस साल की समस्या को जड़ से हटाना संभव नहीं होगा। जो हो सकता है वह यह कि सोलह दिन लगातार ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह पाठ करने से उसकी जड़ें हिल जाएँगी और उसका रास्ता कहीं न कहीं अवरुद्ध हो जाएगा, और भगवान कृपा करके बहुत कुछ करा सकते हैं। वे जोड़ते हैं कि हो सकता है उस बाधा की नियति ही अब आगे जाने की आ गई हो, और भगवान ने यूट्यूब तथा ऐसे माध्यमों से उन लोगों को यह करने की प्रेरणा दे दी हो। फिर वे करेंगे या नहीं, यह उनके अपने कर्म की गति पर है: जहाँ प्रारब्ध अभी भोगना शेष है, वहाँ अगले व्यक्ति की न श्रद्धा बन पाएगी और न वह कर पाएगा, वह सब कुछ जानने के बाद भी बैठा रहेगा।
पितृ गायत्री की संख्या, तीन कुशा, और दूब क्यों नहीं चलेगी
क्या सामान्य गृहस्थ पितृ गायत्री का जप कर सकते हैं, और क्या कुशा के स्थान पर दूब चलेगी?
हाँ — संख्या 27 रखिए, या 54, अधिकतम 108, और श्राद्ध पक्ष तक ही रखिए। सामग्री के विषय में: तीन कुशा का अर्थ तीन लंबी पत्तियाँ हैं, हर एक लगभग एक उँगली के माप की काट लीजिए। दूर्वा इसका स्थान नहीं ले सकती — उसका प्रयोग भूतों के लिए होता है, पितरों के लिए कुशा ही चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि सामान्य गृहस्थ पितृ गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं क्या, वक्ता हाँ कहते हैं और संख्या तय करते हैं: 27 रखिए, या 54, अधिकतम 108, और श्राद्ध पक्ष तक ही रखिए। इसके बाद वे सामग्री से जुड़े दो प्रश्नों का उत्तर देते हैं। तीन कुशा का क्या अर्थ है, इस पर वे बताते हैं कि उनके यहाँ तीन कुशा की गड्डी मिलती है जिस पर पूरे तीन झाड़ मिलते हैं; एक कुशा का अर्थ एक लंबी पत्ती है, और उसे काटकर लगभग एक उँगली के माप के बराबर रख लीजिए। कुशा के अभाव में पितृ तर्पण और श्राद्ध में दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। का प्रयोग किया जा सकता है क्या, इस पर वे कहते हैं कि उनके अनुसार कुशा ही चाहिए, दूब से नहीं कहा जा सकता — दूब का प्रयोग भूतों के लिए होता है, पितरों के लिए कुशा ही चाहिए।
अविवाहित कन्या, विवाहित स्त्री और घूँघट का नियम
क्या अविवाहित कन्या या विवाहित स्त्री पितरों के निमित्त कुछ कर सकती हैं?
अविवाहित कन्या को पितरों के निमित्त कुछ करने की आवश्यकता नहीं — वह गीता पढ़कर उसे नारायण को अर्पित कर सकती है, पितरों का नाम लिए बिना, क्योंकि विवाह पर उसका कुल पति का हो जाता है। विवाहित स्त्री संकल्प लेकर सात्विक विधान कर सकती हैं।
जिस प्रश्नकर्ता के घर वाले पितरों के निमित्त कुछ नहीं करते, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता वैवाहिक स्थिति के अनुसार भेद करते हैं। अविवाहित स्त्री को पितरों के निमित्त कुछ करने की आवश्यकता नहीं: वह श्राद्ध पक्ष में भगवद्गीता का पाठ करके उसे नारायण को अर्पित कर सकती है, यह कहे बिना कि पितरों की गति या तृप्ति हो। उनका तर्क यह है कि विवाह पर स्त्री का पितृ कुल और कुल देवता पति के परिवार के हो जाते हैं, और कन्यादान से पहले वे उसके नहीं गिने जाते; पाठ नारायण को अर्पित करने पर नारायण स्वयं पितरों को तृप्त कर देंगे। जहाँ स्त्री विवाहित है और पति के घर में यह कर्म नहीं होता पर वह करना चाहती है, वहाँ वह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर जो भी वैदिक या सात्विक विधान बताया गया है वह कर सकती हैं — भगवद्गीता का पाठ, या दत्तात्रेय तर्पण — पर अगियारी वाली विधि नहीं, जिससे वे नए लोगों को यह कहकर रोकते हैं कि वह बिना मार्गदर्शन के नहीं की जा सकती। एक शर्त इसके साथ है: पितरों के निमित्त कोई भी कार्य करने वाली विवाहित स्त्री सिर ढककर करे, और वे कहते हैं कि कम से कम साड़ी का पल्लू सिर पर रखा जाए। वे बताते हैं कि इसका कारण उन्होंने अलग से समझाया है, और निर्देश देते हैं कि जहाँ घर के पुरुष उपलब्ध हैं वहाँ वही, विशेषकर ज्येष्ठ पुत्र, यह कर्म करें।
रक्षक के रूप में कुल भैरव, और भैरव पद पाने वाले पितर
अपने कुल के भैरव को प्रसन्न करना क्यों आवश्यक है?
क्योंकि रक्षण भैरव ही देते हैं। जैसे भैरव शक्तिपीठों के रक्षक हैं, वैसे ही कुल भैरव कुल के रक्षक हैं — और जिन पितरों ने जीवन में बड़ी उपासना की, वे मृत्यु के बाद भैरव पद प्राप्त करते हैं।
अपने कुल के भैरव को प्रसन्न करना क्यों आवश्यक है, यह पूछे जाने पर वक्ता इसे उत्तर की आवश्यकता से परे मानते हैं: कुलदेवी के साथ कुल भैरव को अवश्य प्रसन्न करना चाहिए, क्योंकि रक्षण भैरव ही देते हैं। वे तुलना देते हैं — जैसे भैरव शक्तिपीठों के रक्षक हैं, वैसे ही वे अपने कुल के रक्षक हैं, और जो कुछ भी हो, रक्षा वही करेंगे। फिर वे एक बात जोड़ते हैं जिसे वे कहते हैं कि वे बार-बार दोहराते हैं: पितरों में जिन्होंने अपने जीवनकाल में भगवती की बड़ी सेवा और उपासना की, अनेक अनुष्ठान और पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किए, वे स्वयं मृत्यु के बाद भैरव का पद प्राप्त करते हैं। वे जोड़ते हैं कि जिनके पास वास्तव में दिव्य दृष्टि और वैसा ज्ञान है वे इसे स्पष्ट देख और जान सकते हैं, और बड़बोले लोगों को वे खारिज कर देते हैं।
देवी साधना पितृ पक्ष में नहीं, नवरात्रि में आरंभ करना
क्या पितृ पक्ष में माता की साधना आरंभ की जा सकती है?
नहीं। वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि अभी साधना आरंभ मत कीजिए — माता की साधना नवरात्र में आरंभ कीजिए।
यह सीधे पूछे जाने पर कि पितृ पक्ष में माता की साधना आरंभ की जा सकती है क्या, वक्ता उत्तर देते हैं — नहीं, और प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि माता की साधना नवरात्र में आरंभ कीजिए। वे निर्देश दोहराते हैं: अभी साधना आरंभ मत कीजिए। यह वही निषेध है जो उन्होंने सत्र के आरंभ में रखा था कि इस पक्ष में कोई नया अनुष्ठान आरंभ नहीं करना है, यहाँ एक विशेष स्थिति पर लागू किया गया।
ननिहाल पक्ष के पितरों के लिए अर्पण
क्या ननिहाल पक्ष के पितरों को भी अर्पण किया जा सकता है?
हाँ, और वक्ता कहते हैं कि यह अवश्य करना चाहिए — ननिहाल पक्ष के पितरों को जल, तिल, जौ और फूल आदि अर्पित किए जा सकते हैं, और उनका श्राद्ध भी जब होता है तब होता है।
यह पूछे जाने पर कि ननिहाल पक्ष के पितरों को जल, तिल, जौ, फूल आदि अर्पित किए जा सकते हैं क्या, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। वे जोड़ते हैं कि जब श्राद्ध होता है तो ननिहाल का भी होता है, और स्पष्ट कहते हैं कि यह एकदम करना चाहिए।
सेवा के नियम विधान पर भारी पड़ते हैं, और कोई दोष नहीं लगता
जहाँ नौकरी के नियम पितृ पक्ष में दाढ़ी-बाल बनाने के लिए बाध्य करते हों, वहाँ दोष लगता है क्या?
कोई दोष नहीं लगता। पैरामिलिट्री में सेवारत पति के विषय में पूछे जाने पर, जिन्हें रोज दाढ़ी-बाल बनाना पड़ता है, वक्ता कहते हैं कि वहाँ के नियम का पालन करना चाहिए — वे किसी के अधीन हैं और देश की सेवा कर रहे हैं — और इससे न दोष लगता है न लगेगा।
एक प्रश्नकर्ता बताती हैं कि उनके पति पैरामिलिट्री में हैं, जहाँ रोज दाढ़ी-बाल बनाना पड़ता है, और पूछती हैं कि क्या करें। वक्ता प्रश्न को इस रूप में दोहराते हैं कि क्या ऐसी सेवा में पितृ पक्ष या बृहस्पतिवार आदि के नियम माने जा सकते हैं। उनका उत्तर है कि कोई दिक्कत नहीं है: वे पैरामिलिट्री में हैं, वहाँ नौकरी कर रहे हैं, किसी के अधीन हैं, और यहाँ यह विशेष बात भी है कि वे देश की सेवा कर रहे हैं — इसलिए वहाँ का नियम मानकर उसी के अनुसार चलना चाहिए। इससे न कोई दोष लगता है और न लगेगा, और प्रश्नकर्ता से वे निश्चिंत रहने को कहते हैं। वे जोड़ते हैं कि सैनिक के कर्तव्य और कार्य में ऐसे बहुत से विषय होते हैं।
जब अपने ही पितरों का अभिचार में प्रयोग हो
जब किसी परिवार के अपने ही पितरों को उसी के विरुद्ध कर दिया जाए तो क्या करें?
वक्ता इसे सबसे टेढ़ा मामला कहते हैं। पहले जिम्मेदार व्यक्ति के नाम से क्षेत्रपाल का पूजन कराइए, फिर पूरे श्राद्ध पक्ष ग्यारहवें अध्याय का विधान कीजिए, फिर पीपल या बरगद पर दत्तात्रेय तर्पण कीजिए।
वक्ता इस प्रश्न को उत्तम और स्थिति को सबसे टेढ़ी बताते हैं: कोई तांत्रिक, चाहे रिश्तेदार हो या बाहरी, घर के ही पितरों को मंत्र-तंत्र से बाँधकर उसी घर के लोगों पर छोड़ देता है। यह दोहरी कठिनाई है क्योंकि पितर घर के हैं और उन्हें अपने ही लोगों को कष्ट देने के लिए बाध्य किया गया है, जिससे पूरा मामला उल्टा हो जाता है। वे क्रम से तीन चरण देते हैं। पहला, जहाँ जिम्मेदार व्यक्ति स्पष्ट ज्ञात है वहाँ उसी के नाम से क्षेत्रपाल का पूजन कराना चाहिए — भगवान भैरव का क्षेत्रपाल स्वरूप, या ग्राम देवता, जिसे क्षेत्र के अनुसार डीह या खेरी पूजन कहा जाता है। पहला अवरोध यहीं लगता है, और इससे उन लोगों का उस ओर से प्रवेश रुक जाता है, चाहे वे उसी स्थान पर रहते हों। दूसरा, सत्र के आरंभ में बताया गया ग्यारहवें अध्याय का विधान पूरे श्राद्ध पक्ष करना चाहिए, जो उनके अनुसार सबसे पहले उन्हें हटाता है। तीसरा, पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। या बरगद वृक्ष पर किया जाने वाला दत्तात्रेय तर्पण का विधान, जो चैनल पर अलग से दिया गया है, करना चाहिए। इन तीनों से वे नब्बे प्रतिशत राहत का अनुमान देते हैं, और सुझाते हैं कि उसके बाद किसी जानकार से घर का बंधन करा लीजिए या स्वयं कर लीजिए। उनकी अंतिम बात यह है कि एक बार अपने पितर उस बंधन से मुक्त हो गए तो फिर कोई उन्हें बाँध नहीं पाएगा, और जहाँ अभिचार बहुत प्रबल हो वहाँ सहायता लेने की सलाह देते हैं।
कुल गम्य विद्या के लिए उसकी परंपरा क्यों आवश्यक है
कुल गम्य विद्याएँ उस परंपरा में दीक्षित हुए बिना नहीं करनी चाहिए
क्योंकि गृहस्थ ऐसी साधना को जीवन भर नहीं ढो सकता, और जब वह छूटती है तब उसे रोकने और बचाने के लिए कुछ चाहिए — जो परंपरा के बिना संभव नहीं है। निग्रह दारुण सप्तक कर रहे एक प्रश्नकर्ता से वक्ता कहते हैं कि उनकी स्थिति सुरक्षित नहीं है।
अभिचार से जिनकी स्थिति मृत्यु तुल्य हो गई है, वे प्रश्नकर्ता निग्रह दारुण सप्तक के विषय में पूछते हैं। वक्ता सामान्य सिद्धांत पर उत्तर देते हैं। जो विद्याएँ कुल गम्य होती हैं — परंपरागत विद्याएँ — उन्हें परंपरा के बिना लेकर चला जा सकता है, और व्यक्ति कुछ समय चला भी लेगा; पर मनुष्य का जीवन है और प्रश्नकर्ता गृहस्थ हैं, वे आगे गृहस्थी में जाएँगे या जीवन ऐसा नहीं रहेगा कि वे निग्रह दारुण सप्तक को जीवन भर ढो सकें। उस समय उन्हें रोकने और बचाने के लिए कुछ चाहिए, और परंपरा के बिना वह संभव नहीं है। यदि वे इसे पूरी तरह करना चाहते हैं तो कम से कम तंत्र की किसी विशिष्ट परंपरा में दीक्षित होकर, फिर क्रमगत चीजें करनी चाहिए। वे जोड़ते हैं कि अभिचार की स्थिति में निग्रह दारुण सप्तक का ही प्रयोग करना आवश्यक नहीं है — प्रश्नकर्ता ने पहले जो किया है और वक्ता ने जो उन्हें भेजा है, वह इसीलिए दिया गया था कि वे उसके बाद अपने कार्य स्पष्ट रूप से कर सकें। ऊपर से धूमावती भी कर रखी है और निग्रह दारुण सप्तक का पाठ भी पढ़ रखा है — इस स्थिति को वे स्पष्ट कहते हैं कि सुरक्षित नहीं है।
जीवों को खीर-पूरी, और घूँघट रखकर हिंदी में गीता का एक अध्याय
घर में अकेली स्त्री पितरों के निमित्त क्या कर सकती हैं?
वे खीर और पूरी बनाकर कौआ, कुत्ता और गौ माता को खिला सकती हैं; और यदि वे हिंदी पढ़ना जानती हैं तो भगवान नारायण के सम्मुख बैठकर, घूंघट रखकर, श्रीमद्भगवद्गीता का जो अध्याय इच्छा हो वह हिंदी में पढ़कर भगवान को समर्पित कर दें।
जिन प्रश्नकर्ता के पति बाहर हैं और जो घर में अकेली हैं, वे पूछती हैं कि पितरों के निमित्त क्या कर सकती हैं, और क्या खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। और पूरी बनाकर कौआ, कुत्ता और गौ माता को खिला सकती हैं जैसा एक पंडित जी ने बताया। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल खिला सकती हैं। वे जोड़ते हैं कि यदि वे पाठ करना, अर्थात हिंदी पढ़ना जानती हैं, तो कल से भगवान नारायण के सम्मुख बैठकर श्रीमद्भगवद्गीता का जो भी अध्याय इच्छा हो वह हिंदी में घूंघटसिर पर डाला जाने वाला घूंघट, जो कुछ कर्मों में आवश्यक और कुछ में वर्जित है। रखकर पढ़ें, और फिर उसे भगवान को समर्पित कर दें।
मांस-मदिरा पाठ को निष्फल कर देते हैं
जो मांस खाता हो, उसके भगवद्गीता पाठ का फल होगा क्या?
वक्ता का उत्तर है कि पाठ ही मत कीजिए। यह पूछे जाने पर कि मांसाहारी व्यक्ति के ग्यारह पाठ का फल होगा क्या, वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि मत करिए — भगवद्गीता का पाठ करके और मांस खाकर क्यों परेशान होइएगा।
यह पूछे जाने पर कि यदि कोई नॉनवेज खाता हो और भगवद्गीता के ग्यारह पाठ कर रहा हो तो उसका फलित होगा क्या, वक्ता तीखी प्रतिक्रिया देते हैं और कहते हैं कि पाठ ही मत करिए — मत करिए, भगवद्गीता का पाठ करके काहे परेशान होइएगा। यही बात वे आगे भी दोहराते हैं जब एक प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि ग्यारहवें अध्याय के पाठ के बाद साधक को स्वप्न में अनुभव आते हैं क्या: जो मांस-मदिरा लेते हैं, वे कहते हैं, उनके लिए अनुभव छोड़िए — पढ़ना ही मत करिए, क्या आवश्यकता है।
दिवंगत बुजुर्ग के लिए सातवें अध्याय और श्वेत पुष्प का विधान
जब कोई दिवंगत बुजुर्ग भोजन या वस्त्र माँगते दिखाई दें तो क्या करना चाहिए?
भगवान के सम्मुख हाथ में श्वेत पुष्प या गेंदे का फूल लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य सहित हिंदी में, सात बार तक पाठ कीजिए, फिर उसी फूल पर जल लेकर उसका फल नारायण के चरणों में समर्पित कीजिए — और सर्व पितृ अमावस्या के दिन अन्न-वस्त्र किसी पंडित जी या घर के पुरुष के हाथ से दिलवाइए।
एक प्रश्नकर्ता को उनकी दादी, जिनका दो वर्ष पहले देहांत हुआ, कभी खाना और कभी कपड़ा माँगते दिखाई देती हैं; वे घर में कहती हैं पर कोई कुछ नहीं करता, और यह देखकर उन्हें दुख होता है। वक्ता उन्हें विधान बताते हैं। कल से वे भगवान के सम्मुख बैठकर श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का, माहात्म्य सहित, हिंदी में पाठ करें। हाथ में एक श्वेत पुष्प लें, श्वेत न मिले तो गेंदे का फूल लें, मानसिक रूप से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें, और भगवान तथा अपने कुल के पितरों को स्थिति निवेदित करें — दादी का नाम लिए बिना, यह कहकर कि स्वप्न में इस प्रकार की बात हो रही है, और प्रार्थना करें कि हे नारायण, कृपा करके मेरी दादी को तृप्त और संतुष्ट करके उन्हें गति प्रदान कीजिए, और यह कि वे उनके निमित्त श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने जा रही हैं। फूल हाथ में रखते हुए वे सात बार तक पाठ कर सकती हैं, और उसके बाद उसी फूल पर थोड़ा जल लेकर नारायण के चरणों में यह कहते हुए समर्पित कर दें कि आज के पाठ का पूरा फल मैं आपके चरणों में समर्पित करती हूँ, और इसके माध्यम से मेरी दादी को तृप्त और संतुष्ट कीजिए। इसके साथ, चूँकि घर के लोग कुछ नहीं कर रहे, सर्व पितृ अमावस्या के दिन — पितृ पक्ष की अमावस्या, नवरात्रि से एक दिन पहले — यथाशक्ति अन्न और वस्त्र किसी पंडित जी को दे देना चाहिए और उनसे संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करा लेना चाहिए, क्योंकि वे अपने हाथ से संकल्प नहीं कर सकतीं; ऐसा न हो सके तो कम से कम यह प्रयास करें कि दान-पुण्य उनके पिताजी या भाइयों के हाथ से हो जाए।
पंचमुखी हनुमत कवच में मरकट स्वरूप
कुछ लोग पंचमुखी हनुमत कवच का पाठ करने से मना क्यों करते हैं?
क्योंकि उसमें मरकट स्वरूप का वर्णन है, जिसे वहाँ एक प्रकार से मरकट भैरव का स्वरूप माना गया है — उग्र स्वरूप, जिसे मसानी हनुमान कहा जाता है। इस आपत्ति का वक्ता का अपना उत्तर यह है कि कह दीजिए कि हम पूरे विश्व के कल्याण के लिए पाठ कर रहे हैं।
पंचमुखी हनुमत कवच का पाठ करने वाले एक प्रश्नकर्ता बताते हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि अपना कल्याण चाहने वाले को यह पाठ नहीं करना चाहिए। वक्ता पहले उन्हें उत्तर देने का तरीका बताते हैं: कह दीजिए कि हम अपना कल्याण नहीं चाहते, हम पूरे विश्व का कल्याण चाहते हैं, इसीलिए हनुमान कवच का पाठ कर रहे हैं। फिर वे बताते हैं कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं। कारण उसमें आने वाले मरकट स्वरूप के वर्णन में है — मरकट भैरव का स्वरूप, जैसा वहाँ एक तरीके से माना गया है — और मरकटेश्वर का मंत्र होने के कारण ही कुछ लोग हनुमत कवच के पाठ से मना करते हैं। यह उग्र स्वरूप है, वे कहते हैं, जिसे मसानी हनुमान कहा जाता है। वे श्रोताओं से ब्रह्म पिशाच प्रपंच खोजने को कहते हैं, जिसमें इसका थोड़ा वर्णन किया गया है।
तंत्र दीक्षा स्वयं नहीं ली जा सकती; गृहस्थों के लिए शंकराचार्य परंपरा
जिसका कोई गुरु न हो, क्या वह स्वयं तंत्र दीक्षा ले सकता है?
यह नहीं होगा — तंत्र दीक्षा इस प्रकार नहीं होगी, यद्यपि देव दीक्षा की जो विधियाँ बताई गई हैं वे हो सकती हैं। गृहस्थ रहते हुए भगवती की उपासना के लिए वक्ता शंकराचार्य परंपरा की ओर भेजते हैं, पत्नी के साथ, गृहस्थ रहते हुए दीक्षा।
जिसका कोई गुरु न हो वह स्वयं तंत्र दीक्षा कैसे ले, यह पूछे जाने पर वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि नहीं होगा — तंत्र दीक्षा इस प्रकार नहीं ली जा सकती — जबकि देव दीक्षा की जो विधियाँ उन्होंने बताई हैं वे सब हो सकती हैं। एक अन्य प्रश्नकर्ता, जो हरि शक्ति की दीक्षा लेना चाहते हैं, उन्हें वे शंकराचार्य परंपरा में दीक्षा लेने को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं: आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से अभी तीन शंकराचार्य हैं, और उन्हीं तीनों की परंपरा में दीक्षा लेनी चाहिए, जिस पीठ के आप निकट हैं या जिनमें आपकी श्रद्धा है। यदि कोई तंत्र में जाना चाहता है तो बात अलग है, तब शक्तिपीठ से लीजिए। वे स्पष्ट करते हैं कि शंकराचार्य परंपरा की सलाह देने का अर्थ किसी को संन्यासी बनने को कहना नहीं है: सनातन संस्कृति में हर गृहस्थ उन चार पीठों पर दीक्षित हो सकता है, और दीक्षा गृहस्थ रहते हुए, पत्नी के साथ जाकर लेनी है। जिस देव या शक्ति में श्रद्धा हो उनका मंत्र स्वीकार कीजिए, मंत्र दीक्षा या नाम दीक्षा लीजिए, और फिर गृहस्थ रहते हुए अपनी पत्नी के साथ विधिवत अनुष्ठान कीजिए।
पितृ गायत्री सबसे अंत में, दैनिक पूजन के समर्पण के बाद
दैनिक पूजन में पितृ गायत्री का जप कहाँ रखना चाहिए?
सबसे अंत में। अपना दैनिक पूजन पितृ गायत्री छोड़कर पूरा कीजिए, भगवती का जप समर्पित कीजिए और आरती आदि कर लीजिए, तभी पितृ जप कीजिए — और कम से कम कीजिए, 27 बार, उससे अधिक नहीं।
एक प्रश्नकर्ता, जो पीतांबरा कवच, शतनाम और मंत्र जप से पहले पितृ गायत्री का जप करते हैं, पूछते हैं कि उसे जारी रखें या छोड़ दें। वक्ता उनसे कहते हैं कि पहले अपना दैनिक पूजन, पितृ गायत्री छोड़कर, पूरा कीजिए, और भगवती का जप समर्पित करने तथा आरती आदि हो जाने के बाद ही पितृ जप कीजिए। संख्या भी वे सीमित करते हैं: 27 बार कीजिए, उससे अधिक मत कीजिए। इसी सत्र में अन्यत्र वे पितृ गायत्री को विशेष रूप से भगवती पीतांबरा की पूजा के साथ जोड़ने से मना करते हैं — दोनों करना, वे कहते हैं, दो तरीके वाली बात हो जाती है, और पितृ गायत्री करने वाले को पीतांबरा के अतिरिक्त भगवती का कोई अन्य स्वरूप, जैसे दुर्गा स्वरूप, लेना चाहिए।
केवल पश्चाताप से पाप क्यों नष्ट नहीं होते
क्या केवल पश्चाताप से संचित पाप नष्ट हो जाते हैं?
नहीं — पश्चाताप के साथ सत्कर्म भी करना होगा, अन्यथा साथ-साथ नया पाप बनता रहेगा। तब भी केवल संचित ब्याज नष्ट होता है; मूल तो भोगना ही पड़ता है, यद्यपि सेवा किए गए जीवों का आशीर्वाद उसे सहज कर देता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या पश्चाताप से पाप नष्ट हो जाते हैं, वक्ता कहते हैं कि केवल पश्चाताप से वे नष्ट नहीं होंगे। उसके साथ सत्कर्म करने पड़ेंगे। यदि कोई पश्चाताप करते हुए जीव हत्या करता रहे तो पाप नष्ट नहीं होंगे — नए बनेंगे। यदि कोई पश्चाताप करते हुए किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहे, तो पुराने पाप नष्ट हों और नए बन जाएँ। पश्चाताप के साथ अपने आचरण, विचार और व्यवहार को बदलना होगा, अपने आराध्य की सेवा-उपासना और जीव सेवा करनी होगी; तब पाप नष्ट होते हैं। इतने पर भी, वे कहते हैं, मूल तो भोगना ही पड़ता है। वे इसे मूलधन और ब्याज के रूप में रखते हैं: कहा गया है कि जो कर्म किया जाता है वह सौ गुना लौटता है, और ब्याज के रूप में जुड़े निन्यानबे कट जाएँगे, पर मूल एक भोगना ही पड़ेगा। सेवा से जो मिलता है वह सेवा किए गए जीवों का आशीर्वाद है, जिससे भगवत्कृपा से वह भी सहज ही कट जाता है।
त्रिपिंडी श्राद्ध पूरी तरह निष्फल क्यों हो सकता है
त्रिपिंडी श्राद्ध से कभी-कभी कोई लाभ क्यों नहीं होता?
दो कारण। यदि पितर पहले से अभिचार में बँधे हैं तो पहले उन्हें मुक्त कराना होगा — बँधी आत्मा पर यह कर्म थोपा नहीं जा सकता। और यदि पितर की अपनी इच्छाएँ और विकार समाप्त नहीं हुए हैं तो कितने भी कर्म कराइए, उनकी गति नहीं होगी।
जिस प्रश्नकर्ता ने त्रिपिंडी श्राद्ध कराया और कोई लाभ नहीं हुआ, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता वही बात दोहराते हैं जो उनके अनुसार सत्र के आरंभ में और एक अलग वीडियो में कही गई है। पितर के साथ कभी भी जबरदस्ती कुछ नहीं किया जा सकता। यदि पितर पहले से बंधन में हैं तो इसका अर्थ है कि वे किसी अभिचार में उसी प्रयोजन से बाँधे गए हैं — और उस स्थिति में त्रिपिंडी श्राद्ध करा देना केवल विषय को वैदिक विधि में ले जाता है, कारण को छूता नहीं। पहले उस बंधन से मुक्ति होनी चाहिए, बताए गए विधानों से, किसी जानकार द्वारा या स्वयं। जहाँ पितर किसी शरीर पर आते हों वहाँ उनसे सीधे पूछना चाहिए, और उनकी सहमति हो तभी त्रिपिंडी श्राद्ध कराना चाहिए। दूसरा कारण बंधन से स्वतंत्र है: पूर्णतः मुक्त पितर भी यह न चाहते हों, और उनकी सहमति के बिना उनकी गति चाहना संभव नहीं है। जब तक उनके भीतर के विकार और इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं, कितने भी त्रिपिंडी कराए जाएँ गति नहीं होगी। यही कारण है, वे कहते हैं, कि त्रिपिंडी, नारायण बलि आदि सब निष्फल सिद्ध हो सकते हैं — या तो अभिचार के कारण, या पितर की अपनी इच्छा न होने के कारण। इसे वे घर की साधना से जोड़ते हैं: अपने आराध्य का नियमित पूजन साधक में एक वैराग्य उत्पन्न करता है जिसमें गृहस्थ जीवन की इच्छाएँ छूटने लगती हैं, और वैसी ही स्थिति पितर में भी बन सकती है।
क्या पितर मांस का भोग माँगते हैं
क्या पितर कभी मांस का भोग माँगते हैं?
वक्ता के अनुसार कभी नहीं। मांस केवल प्रेत या पिशाच माँगते हैं, या पितरों के नाम पर कोई और माँगता है — जो वास्तव में पितृ स्वरूप को प्राप्त हो चुका है वह नहीं माँगेगा, चाहे जीवन में उसने कितना भी मांस-मदिरा लिया हो।
यह पूछे जाने पर कि किसी पर आने वाले पितर मांस का भोग माँगते हैं क्या, वक्ता उत्तर देते हैं कि पितर कभी मांस का भोग नहीं माँगते। माँगने वाले प्रेत होते हैं, और विशेष रूप से पिशाच। जिसे पितृ स्वरूप प्राप्त हो चुका है — जिसे पितृ पिंड में उसका भाग मिल चुका है और जो उस स्थिति में आ चुका है — वह कभी मांस नहीं माँगेगा, चाहे जीवित रहते उसने कितना भी मांस और मदिरा लिया हो। यदि मांस माँगा जा रहा है तो या तो कोई प्रेत माँग रहा है, या कोई पिशाच, या पितरों के नाम पर कोई और माँग रहा है। वे जोड़ते हैं कि पितरों के लिए भोग और ऐसे विषय बिल्कुल अलग तरीके से काम करते हैं। इससे जुड़े एक उत्तर में वे चेताते हैं कि जहाँ पितर बंधन में हैं वहाँ जो भी भोग दिया जाएगा वह वही ले जाएगा जिसने उन्हें बाँध रखा है।
सातवीं पुश्त में मुक्ति, और पंचमी को नाग पूजन
जिस पितर को नाग योनि प्राप्त हुई हो, उनके लिए क्या किया जा सकता है?
जहाँ उनके लिए मंदिर बन चुका है, वहाँ उनकी मुक्ति उनकी अपनी इच्छा से होगी। वक्ता कहते हैं कि पितृ योनि में जाने के बाद मुक्ति सातवीं पुश्त में होती है, और तीसरी के बाद उसकी संभावना आरंभ हो जाती है, तथा महादेव की सेवा-पूजा — अभिषेक के साथ पंचमी तिथि को वासुकी नाग, नव नाग और द्वादश नाग का पूजन — से उन्हें शांति प्राप्त होती है।
जिन प्रश्नकर्ता के पितर को नाग योनि प्राप्त हुई है और जिनके लिए खेत में मंदिर बनवा दिया गया है, वे पूछते हैं कि उन्हें मुक्ति दिलाने के क्या उपाय करें। वक्ता कहते हैं कि जब उनका मंदिर बन गया है तो अब उनकी मुक्ति उनकी अपनी इच्छा से होगी। फिर वे सामान्य नियम बताते हैं: पितृ योनि में जाने के बाद मुक्ति सातवीं पुश्त में होती है, और यद्यपि तीसरे और सातवें की बात कही जाती है, तीसरे के बाद उसकी संभावना आरंभ हो जाती है, जो स्वयं पितरों पर निर्भर करता है। वे टिप्पणी करते हैं कि नाग योनि में जाने पर क्या होता है, गिलहरी की योनि में जाने पर क्या होता है, और वे किस स्वरूप में दिखते हैं — इस पर अलग से बताना होगा। जहाँ भोग न मिलने पर पितर परेशान करते हैं, वहाँ उपाय महादेव की सेवा-पूजा है: उनका अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करके पंचमी तिथि को वासुकी नाग तथा नव नाग और द्वादश नाग का पूजन करने से उन्हें भी शांति प्राप्त होती है।
दत्तात्रेय की विधि में गुरु की आवश्यकता नहीं, यह सबके लिए खुली है
पीपल पर दत्तात्रेय के 108 नामों वाली पूजा विधि बिना गुरु के की जा सकती है?
हाँ — सभी कर सकते हैं और गुरु की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि भगवान दत्तात्रेय साक्षात गुरु हैं। वक्ता कहते हैं कि उन्हीं को लेकर यह किया जा सकता है, और स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि भगवान दत्तात्रेय के 108 नामों वाली पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष पर की जाने वाली पूजा विधि अपने पितरों के लिए बिना गुरु के की जा सकती है क्या, वक्ता उत्तर देते हैं कि सभी कोई कर सकते हैं, गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका कारण यह है कि भगवान दत्त साक्षात गुरु हैं, इसलिए उन्हीं को लेकर यह किया जा सकता है और इसमें कोई दिक्कत नहीं होगी। वे जोड़ते हैं कि स्त्री-पुरुष सभी यह कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।