किसी भी अनुष्ठान से पहले गणपति की प्रसन्नता क्यों आवश्यक है — इस प्रश्न का उत्तर इन प्रवचनों में बार-बार एक ही रूप में मिलता है: उनके बिना कोई भी कर्मकांड, तंत्र-कांड या अनुष्ठान फल नहीं देता, स्वयं जगदंबा भी बिना गणपति पूजन के किए गए अनुष्ठान को स्वीकार नहीं करतीं। प्रत्येक माह की चतुर्थी उन्हीं के दिव्य स्वरूपों को समर्पित है, और भाद्रपद की दस दिवसीय विनायक नवरात्र इसी क्रम की सबसे प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है।
मार्ग सीधा दिया गया है: संकटनाशन गणेश स्तोत्र से आरंभ करें — कोई संस्कृत, कोई दीक्षा आवश्यक नहीं — और तभी आगे अष्टविनायक व तांत्रिक स्वरूपों की ओर बढ़ें, वह भी क्रम से, एक साथ नहीं।