थावे की भवानी, कुलदेवी, ने घर पर छाई तामसिक शक्ति को कैसे वश में किया — एक सत्य घटना
एक परिवार के घर पर तामसिक शक्ति के दावे और उनकी कुलदेवी थावे वाली भवानी द्वारा उसे नियंत्रित करने की सत्य घटना — रहसू भगत की कथा और अपनी कुल शक्ति की सेवा पर वक्ता की सीख के साथ।
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अपने कुल की शक्ति की कृपा बाहरी देवताओं से जल्दी मिलती है
कुल शक्ति को जानकर सेवा करें तो क्षण भर में कृपा दृष्टि; प्रारब्ध फिर भी आड़े आता है
वक्ता कहते हैं कि यह सर्वविदित है कि बाहर की जितनी भी शक्तियाँ हैं, उनकी कृपा पाने में भले देर लगे, लेकिन यदि हमें अपने कुल की शक्ति के विषय में सही जानकारी हो और हम उनकी सेवा करें तो उनकी कृपा दृष्टि क्षण भर में प्राप्त हो सकती है। वे जोड़ते हैं कि वहाँ भी हमारे कर्मों से निर्मित प्रारब्ध आड़े आता ही है और उसका कहीं न कहीं प्रभाव पड़ता है। जो सत्य घटना वे सुनाते हैं, वे कहते हैं, उसका उद्देश्य अपने कुल की शक्तियों और मुख्य देवता के प्रति विश्वास को और दृढ़ करना है।
वक्ता कहते हैं कि अनुभव हर किसी के जीवन का भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वे एक ऐसी साधना का अनुभव प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे जानने के बाद अपने कुल की शक्तियों — कुल की अभीष्ट मुख्य शक्ति, मुख्य देवता — के प्रति श्रोता का विश्वास और भी दृढ़ हो जाएगा। यह सर्वविदित है, वे कहते हैं, कि बाहर की जितनी भी शक्तियाँ होती हैं, उनकी कृपा प्राप्त करने में हमें भले देर लगे। लेकिन यदि हमें अपने कुल शक्तिपरिवार-वंश की सामूहिक रक्षक व जनक शक्ति, जिसे कुलदेवी व कुल भैरव के साथ आवाहित व सम्मानित किया जाता है। के विषय में सही जानकारी प्राप्त है और हम उनकी सेवा करते हैं, तो उनकी कृपा दृष्टि हमें क्षण भर में प्राप्त हो सकती है। वे एक शर्त जोड़ते हैं: वहाँ भी हमारे कर्मों से निर्मित प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। आड़े आता ही है, और उसका भी कहीं न कहीं प्रभाव पड़ता है।
घटना: खरीदी ज़मीन पर बने घर में नवरात्र षष्ठी को सवारी आना शुरू
सात्विक पर साधक नहीं परिवार; पूजन स्थान पर झूमना, याद न रहना, क्रोध भरी परायी बोली, "यह मेरी जगह है"
वक्ता एक सत्य घटना सुनाते हैं, लगभग डेढ़ वर्ष पुरानी, जो उनके दिल्ली के एक साधक मित्र ने साझा की: बिहार के सारण जिले का एक व्यक्ति, जो राजस्थान-दिल्ली मार्ग के औद्योगिक क्षेत्र में नौकरी करता था, एक पुराने घर वाली ज़मीन खरीदकर घर बनवाता है और माता-पिता व नवविवाहिता पत्नी के साथ रहने लगता है। परिवार सात्विक था पर आध्यात्मिक बिल्कुल नहीं — सुबह-शाम धूप-दीप, अधिक से अधिक हनुमान चालीसा। सात-आठ महीने बाद शारदीय नवरात्र की षष्ठी रात्रि को पत्नी पूजन स्थान पर जाकर आधा घंटा ऐसे झूमती है जैसे सवारी आती है, फिर रात भर बेहोश पड़ी रहती है और उसे भारी शरीर के सिवा कुछ याद नहीं रहता। अगली शाम वह गेट पर खड़ी होकर हरियाणा की ओर की क्रोध भरी जाट बोली में चिल्लाती है कि मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी, "यह मेरी जगह है"।
नवरात्र में जानकार साधना में रहते हैं और किसी का मामला नहीं देखते
नौ रातों में सहायता क्यों नहीं मिलती
वक्ता घटना से एक व्यावहारिक बात बताते हैं: नवरात्र के समय जितने भी जानकार होते हैं, वे सभी साधना में होते हैं और सामान्य रूप से उस समय कोई किसी का मामला देखता-सुनता नहीं है। पीड़ित परिवार ने जहाँ भी पता किया, सब व्यस्त थे, और सवारी की घटना रोज़ शाम को होती रही, नवमी तक, जब एक मंदिर के महंत ने अंततः उन्हें बुलाया।
घटना: भस्म का कवच केवल अस्थायी राहत देता है; शरद पूर्णिमा को शक्ति उसे तोड़ देती है
सवारी वाली स्त्री का असामान्य बल, और उसकी बोली जानने वाला उसे चुप बैठा देता है
वक्ता कहते हैं कि नवमी को मंदिर के महंत ने जो क्रिया उन्हें आती थी, की; स्त्री का शरीर हल्का हो गया पर शक्ति ने कुछ न कहा, कुछ पता न चला। महंत ने अपने नवरात्र के भगवती हवन की भस्म उसके हाथ पर बाँध दी और यह कहकर घर भेज दिया कि दोबारा कुछ हो तो घर आकर देखेंगे। दो-तीन दिन ठीक रहा; फिर शरद पूर्णिमा की रात उसने पूरा कवच तोड़कर फेंक दिया, चिल्लाने लगी, और पतली-दुबली होते हुए भी पास आने वाले को चार-पाँच फीट दूर फेंकती थी। महंत उसकी बोली के क्षेत्र के एक जानकार मित्र के साथ आए तो वह और भड़क गई; उस मित्र ने कुछ कहा, वह चुपचाप बैठ गई, और तभी पूछा जा सका कि तुम कौन हो, क्या चाहती हो।
वक्ता बताते हैं कि जब महंत जी ने अपनी क्रिया इत्यादि, जो भी उन्हें आती थी, की, तो स्त्री का शरीर बिल्कुल हल्का हो गया, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं — जो शक्ति, जो सवारी आई थी, उसने कुछ न कहा, न कुछ पता चला। महंत जी ने नवरात्र में किए भगवती के हवन की भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। उसके हाथ पर बाँध दी और वापस भेज दिया, यह कहकर कि दोबारा कुछ हो तो घर आकर देखेंगे, यहाँ से कुछ पता नहीं चल रहा। अगले दो-तीन दिन कोई दिक्कत न हुई तो सबको लगा कि दिखाने से ठीक हो गया। फिर शरद पूर्णिमा की रात्रि में उसने पहनाया गया पूरा कवच तोड़कर फेंक दिया और काफी चिल्लाने लगी। वक्ता बल की बात कहते हैं: देखने में बिल्कुल पतली-दुबली, पर जो पास जाता उसे पकड़कर ऐसे झटके से फेंकती कि आदमी कम से कम चार-पाँच फीट दूर गिरे। महंत जी को तुरंत सूचना दी गई; वे एक जानकार मित्र के साथ लगभग एक-डेढ़ घंटे में पहुँचे; उन्हें देखकर वह और भड़क गई और चिल्लाने लगी। वह मित्र उसी क्षेत्र के थे और समझते थे कि वह क्या बोल रही है; उन्होंने कुछ कहा तो वह चुपचाप बैठ गई, और तब जाकर पूछना शुरू हुआ कि आखिर तुम कौन हो, क्या चाहती हो, क्या दिक्कत है।
घटना: स्थान की शक्ति का ज़मीन पर दावा और बलि की माँग
छोटे आम के पेड़ के नीचे पूजित, जिसे नए मालिकों ने कटवाया; बलि माँगना तामसिक शक्ति का लक्षण; बेचने वाले मुकर गए
वक्ता बताते हैं कि शक्ति ने स्त्री के माध्यम से कहा कि वह उस जगह पर बहुत लंबे समय से पूजित रही है; उसका स्थान एक छोटे आम के पेड़ के नीचे था जो कभी बड़ा नहीं हुआ, पुराना परिवार वहीं पूजा करता था, और नए लोगों ने वह पेड़ कटवा दिया। "मुझे मेरी पूजा चाहिए। मैं बलि लेती हूँ, मुझे बलि चाहिए।" वह किसी भी स्थिति में जगह नहीं छोड़ेगी, और पूजा न मिली तो परिवार पर घात होगा। मानने को तैयार न होना और ऊपर से बलि माँगना, वे कहते हैं, दिखाता है कि यह कोई तामसिक शक्ति थी। पुराने मालिकों से संपर्क करने पर वे स्वामित्व, अधिकार और जानकारी सबसे साफ मुकर गए, और कोई हल दिखाई नहीं दे रहा था।
जब पूछा गया कि तुम कौन हो और क्या चाहती हो, वक्ता कहते हैं, तो शक्ति ने बताया कि वह इस जगह पर काफी लंबे समय से पूजित रही है और यह स्थान उसका है। यहाँ एक पेड़ था — आम का, पर बहुत छोटा, पतला, जो कभी बड़ा नहीं हुआ — और उसी के नीचे उसका स्थान बना था; पुराने परिवार वहीं उसकी पूजा किया करते थे। इन नए लोगों ने वह पेड़ कटवा दिया। और दूसरी बात: "मुझे मेरी पूजा चाहिए। मैं बलि लेती हूँ। मुझे बलि चाहिए।" पूरा परिवार परेशान हो गया, क्योंकि उन्हें कोई जानकारी नहीं थी और जिन्होंने ज़मीन बेची थी उन्होंने भी कभी नहीं बताया कि यहाँ ऐसी कोई चीज़ है या ऐसा कुछ करना है। पुराने परिवार से फिर संपर्क किया गया और कहा गया कि आप इसे शांत कीजिए या लेकर जाइए, हमें विधि-विधान की जानकारी नहीं है। जानकार ने जब पूछा तो शक्ति ने कहा कि स्थिति जो भी हो, वह जगह नहीं छोड़ेगी: "यह जगह आज से मेरी नहीं है, बहुत पुरानी है। मैं यहीं रहूँगी और पूजा लूँगी, नहीं तो परिवार पर घात होगा।" वक्ता निष्कर्ष निकालते हैं: वह मानने को तैयार नहीं थी और ऊपर से बलि माँग रही थी — यानी कोई न कोई तामसिक शक्ति थी। ऐसी स्थिति में कोई हल दिखाई नहीं दे रहा था। पुराने मालिकों ने साफ-साफ मना कर दिया कि ज़मीन दे चुके हैं, कोई स्वामित्व नहीं, कोई अधिकार नहीं, कोई जानकारी नहीं — साफ मुकर गए।
किसी शक्ति का स्थान भंग करने वाला अनजाने में भी दोषी होता है
जिस शक्ति का स्थान आपने तोड़ा, उस पर बल प्रयोग पहला उत्तर क्यों नहीं
जब कोई मार्ग न दिखा, वक्ता कहते हैं, तो जानकार मित्र अपने गुरु के पास गए। वे गुरु का पहला सिद्धांत बताते हैं: यहाँ बल प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि आप उसके स्थान पर जाकर बसे हो और आपने उसका स्थान भंग किया है। वह चाहे कितनी भी नकारात्मक चीज़ हो, परेशानी यह है कि आपने उसे सही तरीके से हटाया नहीं। ये सारी चीज़ें अनजाने में हुईं — फिर भी दोषी आप हो।
जब कोई मार्ग न दिखा, वक्ता कहते हैं, तो जानकार अपने गुरु के पास गए और सारी बात बताई कि इसमें क्या किया जाए। वे गुरु का तर्क बताते हैं: यहाँ बल प्रयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि उनके स्थान पर आप जाकर बसे हो और उनके स्थान को आपने भंग किया है। चाहे वह कोई भी, कितनी भी नकारात्मक चीज़ हो, परेशानी यह है कि आपने उसे सही तरीके से हटाया नहीं। हालाँकि ये सारी चीज़ें अनजाने में हुई हैं, लेकिन फिर भी दोषी आप हो।
स्थान की शक्ति के लिए बलपूर्वक हटाना बनाम शांति विधान
शांत की गई शक्ति को बार-बार शांत करना पड़ता है; सात्विक परिवार तामसिक पूजा नहीं कर सकता
वक्ता बताते हैं कि जिस शक्ति का स्थान भंग हुआ हो उसके लिए गुरु ने दो मार्ग बताए: या तो तंत्रों के विधि-विधान से उसे बलपूर्वक हटाया जाए, या शांति विधान करके शांत किया जाए। लेकिन शांत की गई शक्ति हमेशा के लिए शांत नहीं होती — उसे बार-बार शांत करना पड़ता है, यानी शांत रखने के लिए भी पूजा ही माध्यम बनती है। और यह परिवार पूर्ण रूप से सात्विक था, इसलिए वहाँ किसी प्रकार की तामसिक पूजा भी नहीं हो सकती थी; दोनों मार्ग बंद थे।
तो अब क्या किया जा सकता है? वक्ता गुरु के बताए दो मार्ग रखते हैं। या तो तंत्रों के विधि-विधान से बलपूर्वक चीज़ों को हटाया जा सकता है, या शांति विधान करके शांत किया जा सकता है। लेकिन शांति विधान करने पर, वे कहते हैं, उसे बार-बार शांत करना होगा — ऐसी शक्तियाँ हमेशा के लिए शांत नहीं होतीं — यानी शांत रखने के लिए भी पूजा ही एक माध्यम बनेगी। और यहीं असली अड़चन थी: यह परिवार पूर्ण रूप से सात्विक था, तो वहाँ किसी प्रकार की तामसिक पूजा भी नहीं हो सकती थी। दोनों स्पष्ट मार्ग बंद थे, और इसीलिए गुरु ने आगे एक अलग प्रश्न पूछा।
थावे धाम के रहसू भगत कौन हैं?
कामाख्या का उनमें प्रवेश, कंगन, राजा मनन सिंह की परीक्षा, राज्य का विनाश और वहाँ स्थापित हाथ का स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि बिहार के सारण जिले के पास थावे एक प्रमुख धाम है, और रहसू भगत वहाँ के सबसे प्रमुख, एक तरह से लोक देवता हैं। कथा है कि कामरूप की भगवती कामाख्या साक्षात उनके शरीर में प्रवेश करके सिर से निकल गई थीं। उन्होंने रहसू भगत को एक कंगन दिया था जिसके माध्यम से अकाल पड़ने पर वे लोगों की सेवा करते थे; राजा मनन सिंह ने ईर्ष्यावश इस पर विश्वास न किया, उन्हें बंदी बनाया और भगवती को बुलाकर दिखाने को कहा। भगवती ने चेताया कि उनके आने से राजा और राज्य का विनाश होगा; राजा न माना, भगवती भक्त की परीक्षा लेने आईं, महल और राज्य नष्ट हुआ, और रहसू भगत का सिर फाड़कर कंगन पहने हाथ के रूप में जो स्वरूप निकला, वही थावे में स्थापित है।
जब गुरु ने परिवार से पूछा कि उनकी कुलदेवी कौन हैं, वक्ता कहते हैं, तो पिताजी ने बताया कि वे मूलतः बिहार के सारण जिले के पास के हैं, जहाँ थावे नामक धाम है। वक्ता श्रोताओं को बताते हैं कि थावे एक प्रमुख धाम है, और उसकी कथा सुनाते हैं। रहसू भगत, वे कहते हैं, वहाँ के सबसे प्रमुख हैं — एक तरीके से लोक देवता के रूप में। उनकी कथा है कि कामरूप की भगवती कामाख्या साक्षात उनके शरीर में प्रवेश करके सिर से निकल गई थीं। राजा मनन सिंह की पूरी कथा है, जो रहसू भगत पर विश्वास नहीं करते थे। भगवती कामाख्या ने रहसू भगत को एक कंगन दिया था, और उसी कंगन के माध्यम से जब कभी अकाल पड़ता था तो वे लोगों की सेवा किया करते थे। इसी ईर्ष्यावश राजा ने उन्हें बंदी बनाया और कहा कि हम नहीं मानते कि देवी ने दिया है — सामर्थ्य है तो बुलाकर दिखाइए। रहसू भगत ने आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। किया। भगवती ने कहा कि यदि वे आईं तो राजा और पूरे राज्य का विनाश हो जाएगा; राजा न माने। तो भगवती भक्त की परीक्षा लेकर आईं, और महल और पूरे राज्य का विनाश हो गया। भगवती ने रहसू भगत का सिर फाड़ा, और उसमें से कंगन पहने उनका हाथ निकला — और वही स्वरूप, वक्ता कहते हैं, थावे में स्थापित है।
शक्ति को जाति से नहीं तोला जाता: रहसू भगत और वाल्मीकि समाज
ज़मीन की तामसिक शक्ति और थावे के लोक देवता दोनों वाल्मीकि समाज के
वक्ता श्रोता से दो बातें ध्यान में रखने को कहते हैं: उस घर में पहले पूजित शक्ति वाल्मीकि समाज की एक तामसिक शक्ति थी, और रहसू भगत भी वाल्मीकि समाज से संबंध रखते हैं, ऐसा कहा जाता है, और लोक देवता के रूप में पूजित हैं। वे कहते हैं कि सनातन संस्कृति में हर जगह इसका ध्यान रखा गया है — जात-पात के आधार पर किसी शक्ति को कभी आदर-सम्मान से वंचित या निकृष्ट नहीं माना गया। सीधी सी बात है: जिस पर साक्षात जगदंबा की परम कृपा हो, उसे जाति के अनुसार भला कोई कैसे तोल सकता है?
यहाँ वक्ता कथा रोककर श्रोता से दो बातें जान लेने को कहते हैं। पहली, उस घर में जो शक्ति पूजित थी — जिसका स्थान वहाँ पहले से था — वह वाल्मीकि समाज की एक तामसिक शक्ति थी। दूसरी, रहसू भगत भी एक तरीके से वाल्मीकि समाज से संबंध रखते हैं, ऐसा कहा जाता है, और लोक देवता के रूप में पूजित हैं। इससे वे एक सैद्धांतिक बात निकालते हैं: सनातन संस्कृति में इन सभी चीज़ों का हर जगह ध्यान रखा गया है। कभी भी जात-पात को लेकर किसी शक्ति को बहुत अधिक आदर-सम्मान से वंचित या जाति के अनुसार निकृष्ट नहीं माना गया। सीधी सी बात है, वे कहते हैं — जिसके ऊपर साक्षात जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। की परम कृपा हो, उन्हें भला जाति के अनुसार कोई कैसे तोल सकता है?
स्थान की शक्ति को बिना दोष केवल परिवार की अपनी कुल शक्ति ही नियंत्रित कर सकती है
गुरु का पहला प्रश्न — कुलदेवी कौन — और उनका निर्णय; अन्य प्रयोग में दोष, ज़रा सी चूक घातक
वक्ता कहते हैं कि दोनों मार्ग बंद होने पर गुरु ने पीड़ित परिवार से पूछा कि आप किसकी पूजा करते हैं, आपकी कुलदेवी-देवता कौन हैं; उन्होंने कहा कि कुछ विशेष नहीं करते, तो गुरु ने फिर पूछा और पिताजी ने बिहार के सारण के पास थावे धाम का नाम लिया। जब उन्होंने कहा कि गाँव में वे कुलदेवी के रूप में पूजित हैं पर यहाँ हमने कुछ नहीं किया, तब गुरु ने निर्णय दिया: इस शक्ति का नियंत्रण केवल वही, कुल की शक्ति ही कर सकती हैं। यदि हम लोग कोई प्रयोग करेंगे तो कहीं न कहीं दोष लगेगा; चीज़ हो तो सकती है, पर ज़रा सी चूक हुई तो कुछ भी गड़बड़ हो सकता है। वक्ता जोड़ते हैं कि तंत्र में कुछ भी असंभव नहीं — भगवती ऐसी हैं कि किसको न बाँध दिया जाए — लेकिन फिर भी।
वक्ता कहते हैं कि जब सीधे मार्ग बंद हो गए, तो गुरु उस परिवार की ओर मुड़े जिस पर संकट था, और पूछा: आप लोग किसकी पूजा करते हैं, आपकी कुलदेवी-देवता कौन हैं? उन्होंने कहा कि हम ऐसा कुछ नहीं करते, कोई विशेष पूजन-पाठ नहीं। तो गुरु ने फिर पूछा: आपके कुल के देवी-देवता कौन हैं या कौन हो सकते हैं, यह बताइए। पिताजी ने बताया कि वे मूलतः बिहार के सारण जिले के पास के हैं, जहाँ थावे धाम है। परिवार ने गुरु को बताया कि हाँ — वे हमारी कुलदेवी के रूप में पूजित रही हैं; गाँव में हम पूजा करते थे, पर यहाँ हमने कुछ न किया। यह सुनकर गुरु ने निर्णय दिया: अब इस शक्ति का नियंत्रण केवल वही कर सकती हैं। कुल की शक्ति ही कर सकती हैं। बाकी यदि हम लोग कुछ प्रयोग करेंगे, गुरु ने कहा, तो कहीं न कहीं दोष लगेगा। चीज़ें हो तो सकती हैं — लेकिन ज़रा सी भी चूक हुई तो कुछ भी गड़बड़ हो सकता है। वक्ता अपनी ओर से जोड़ते हैं: तंत्र में ऐसा कुछ नहीं जो न किया जा सके; भगवती ऐसी हैं कि क्या से क्या हो जाए, किसको न बाँध दिया जाए — लेकिन फिर भी, यहाँ कुल शक्ति ही सही अधिकारी थीं।
घर में कुलदेवी की स्थापना और ज़मीन की शक्ति को उनके नीचे स्थान
थावे धाम में आह्वान, स्वरूप घर लाना, दो छोटे स्थान, पूरा तंत्रोक्त विधान जिसके विवरण नहीं बताए
वक्ता कहते हैं कि पूरा परिवार गुरु के साथ थावे धाम गया और कुलदेवी के आह्वान की पद्धति के अनुसार भगवती का आह्वान, यानी निमंत्रण हुआ: उनका एक स्वरूप वहीं स्थापित करके, थावे धाम में ही पूजित करके, निमंत्रण देकर अपने घर लाया गया। घर के अंदर दो छोटे मंदिर, दो स्थान बने — एक कुलदेवी के लिए, और दूसरा, थावे वाली महारानी के नीचे, उस शक्ति के लिए जो ज़मीन पर पूजित थी। यह सब गुरु ने पूरे तंत्रोक्त विधि-विधान से किया, जिसकी बहुत सी बातें, वे कहते हैं, वे नहीं बता रहे।
वक्ता उपाय को वैसे ही बताते हैं जैसे किया गया। पूरा परिवार, कुलदेवी के आह्वान की जो पद्धति होती है उसके अनुसार, गुरु के साथ थावे धाम पहुँचा। वहाँ भगवती का आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। हुआ — यानी निमंत्रण दिया गया। भगवती का एक स्वरूप वहीं स्थापित करके, थावे धाम में ही पूजित करके, निमंत्रण देकर अपने स्थान पर लाया गया। फिर घर के अंदर ही दो छोटे-छोटे मंदिर बने — घर के भीतर दो स्थान। एक स्थान में परिवार की कुलदेवी को स्थान दिया गया। दूसरा स्थान उस शक्ति को दिया गया जो उस ज़मीन पर पूजित थी — भगवती थावे वाली महारानी के नीचे। ये सारी प्रक्रियाएँ, वक्ता कहते हैं, पूरे तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। विधि-विधान से की गईं; इसमें बहुत सी चीज़ें हैं जो वे श्रोताओं के समक्ष नहीं रख रहे। गुरुजी ने उन सारी क्रियाओं को सही तरीके से किया।
कुलदेवी के नीचे स्थान पाने पर तामसिक शक्ति की प्रकृति कैसे बदलती है
स्थापना के बाद फिर बुलाने पर वह स्वयं को दूध के भोग पर रहने वाली सेविका घोषित करती है
वक्ता कहते हैं कि सब पूर्ण होने के बाद उस शक्ति का पुनः स्त्री के शरीर पर आह्वान हुआ, और उसने स्वयं कहा: "यहाँ अब मैं दूध के भोग पर रहूँगी, क्योंकि जिन महाशक्ति के सान्निध्य में मेरी स्थापना हुई है, उनके नियंत्रण में मैं पूरी तरह हूँ; भगवती का जो अंश यहाँ विराजमान है, उनकी सेविका के रूप में मैं यहाँ नित्य उपस्थित रहूँगी।" वे श्रोता से सोचने को कहते हैं कि इतनी प्रचंड शक्ति ने यह स्वयं कहा — किसी शक्ति की प्रकृति ऐसे बदलती है।
वक्ता आगे की बात को इस रूप में रखते हैं कि किसी शक्ति की प्रकृति कैसे बदलती है। जब सारी क्रियाएँ पूर्ण हो गईं, तब उस शक्ति का पुनः आह्वान हुआ: उसे स्त्री के शरीर पर बुलाया गया। और इस बार उसने स्वयं कहा। उसके शब्द, जैसा वे बताते हैं: "यहाँ पर दूध के भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। पर अब मैं रहूँगी, क्योंकि जिन महाशक्ति के सान्निध्य में मेरा स्थापन हुआ है, उनके नियंत्रण में मैं पूरी तरह हूँ। भगवती का जो अंश यहाँ विराजमान है, उनके निकट सेविका के रूप में मैं यहाँ नित्य उपस्थित रहूँगी।" सोचिए, वक्ता कहते हैं: जो शक्ति इतनी प्रचंड रही है, वही यह कह रही थी।
घटना: बेची गई ज़मीन पर श्मशान शक्ति का अघोषित स्थान
पहले के वाल्मीकि परिवार के सदस्य ने पेड़ के नीचे स्थापित की; किसी की गलती नहीं, फिर भी न बताने से खरीदार ने कष्ट भोगा
वक्ता कहते हैं कि बाद में पता चला कि वहाँ पहले रहने वाले वाल्मीकि परिवार के किसी सदस्य ने काफी पहले श्मशान में जाकर श्मशान की शक्ति को शुद्ध किया था, अपने घर में स्थापित करके पूजा देता था और कुछ भक्ति के कार्य भी करता था। यह बात उसके अपने परिवार को भी सही से पता न थी; वे बस घर के बाहर पेड़ के नीचे के स्थान पर नित्य धूप-दीप करते रहे। बाद में ज़मीन दो-तीन लोगों को बेची गई, वह स्थान इसी खरीदार के हिस्से में आया, और किसी को जानकारी न थी — तो कोई पक्ष गलत न था, फिर भी न बताने के कारण इस परिवार को कष्ट भुगतना पड़ा। कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ; भगवती की कृपा से समय रहते बच गए।
वक्ता फिर वह पृष्ठभूमि बताते हैं जो बाद में, पूरी तरह देखने पर, सामने आई। उस ज़मीन पर पहले रहने वाले वाल्मीकि परिवार के किसी सदस्य ने काफी पहले श्मशान में, मरघट में जाकर श्मशान की शक्ति को शुद्ध किया था; अपने घर में स्थापित करके पूजा देता था, और कुछ-कुछ भक्ति के कार्य भी करता था। यह बात उसके अपने परिवार के लोगों को भी सही तरीके से पता नहीं थी। वे बस नित्य धूप-दीप या जो विधि-विधान होता है वह पेड़ के नीचे के स्थान पर करते रहे — जो घर से बाहर था। बाद में ज़मीन दो-तीन लोगों को बेची गई, और इन्होंने जो हिस्सा खरीदा उसी में वह स्थान आ गया। किसी को जानकारी ही न थी, तो बेचने वाले भी कहीं गलत न थे। लेकिन क्योंकि जानकारी न दी गई थी, उसके कारण इस परिवार को कष्ट भुगतना पड़ा। वक्ता जोड़ते हैं कि कोई बहुत बड़ा हादसा नहीं हो पाया — भगवती की कृपा से समय रहते बच गए।
कुलदेवी के नीचे कच्चे दूध और खीर से शांत हुई तामसिक शक्ति
भोग पर चलने वाली भगतई क्षेत्र की शक्ति जगदंबा का स्वरूप ऊपर आने पर शांत-सौम्य
वक्ता कहते हैं कि जगदंबा का वह स्वरूप ऊपर विराजने से परिवार को कुलदेवी की कृपा तो मिली ही, और वहाँ की तामसिक शक्ति — भोग आदि पर चलने वाली भगतई क्षेत्र की शक्ति — भी शांत और सौम्य हो गई। उसके लिए दूध की धार लगी; वह दूध में ही नहाई, दूध से ही शांत हुई, और उसका भोग कच्चा दूध रहा, उसी में खीर आदि उसका भोजन चढ़ा। उसी से वह संतुष्ट, सौम्य हुई और उसका स्वरूप भी बदला।
वक्ता परिणाम समेटते हैं। जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। का वह स्वरूप ऊपर आने के कारण कुलदेवी की कृपा तो प्राप्त हुई ही हुई। लेकिन उनके उस स्वरूप के कारण वहाँ जो शक्ति थी — भोग आदि पर चलने वाली भगतई क्षेत्र की तामसिक शक्ति — वह भी शांत, सौम्य हो गई। उसके लिए दूध की धार लगी; वह दूध में ही नहाई, दूध से ही शांत हुई, और कच्चे दूध का ही भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगा। उसी में उसका भोजन चढ़ा — खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। इत्यादि — और उसी से वह संतुष्ट, सौम्य हुई और उसका स्वरूप भी बदला।
तामसिक तत्व के जाने का स्वप्न संकेत: मुंड और रक्त का प्याला लिए साँवली स्त्री
स्थापना के तीसरे दिन दिखा; सौम्य अंश परिवार की सवारी बनकर रहा
वक्ता कहते हैं कि परिवार ने एक स्वप्न बताया: स्थापना के तीसरे दिन, जिस स्त्री पर वह शक्ति आती थी, उसे स्वप्न में एक पूरी साँवली, बिल्कुल काले रंग की स्त्री दिखी, बाल खुले, एक हाथ में मुंड और दूसरे में रक्त से भरा प्याला, जो बाहर की ओर जा रही थी। वह, वे कहते हैं, उस शक्ति का पहले वाला तत्व या गुण था, जो थावे वाली महारानी, जगदंबा कामाख्या की कृपा से चला गया; उसका सौम्य स्वरूप अंश रूप में वहाँ रह गया, जिसने कहा कि इस परिवार के लिए वह नित्य सवारी के रूप में आती रहेगी।
परिवार ने एक और बात बताई, वक्ता कहते हैं। स्थापना के तीसरे दिन, जिस स्त्री के ऊपर वह शक्ति आती थी, उसे स्वप्न में दिखा कि कोई स्त्री है जो पूरी साँवली, बिल्कुल काले रंग की है, बाल खुले हुए, एक हाथ में मुंड पकड़े और दूसरे हाथ में रक्त से भरा प्याला, जो बाहर की ओर जा रही है। वह, वक्ता कहते हैं, उस देवी का — तत्व बोलिए या गुण बोलिए — वह स्वरूप था जो वहाँ पहले से विराजमान थी, उस शक्ति का; और वह थावे वाली महारानी की कृपा से, जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। कामाख्या की कृपा से चली गई। वहाँ उसका सौम्य स्वरूप अंश रूप में रह गया, जिसने कहा कि इस परिवार के लिए वह नित्य सवारी के रूप में आती रहेगी।
घटना की सीख: कुलदेवी की नियमित सेवा जीवन के संकट दूर करती है
नकारात्मक घटना ने परिवार को साधक बनाया जो अब संपन्न हैं; सही लोग मिलने से जल्दी राहत
वक्ता कहते हैं कि आज पति-पत्नी दोनों साधक-साधिका हैं, अच्छी साधना करते हैं और भगवती की कृपा से किसी चीज़ की कमी नहीं — धन-धान्य, पुत्र-पौत्र सब है। घटना बहुत नकारात्मक रही, पर उसने सब कुछ बदलकर उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर ला दिया। कष्ट उनके संक्षिप्त कथन से कहीं अधिक था; भगवती की कृपा यह रही कि सही लोग मिलने से चीज़ें जल्दी सुलझ गईं। उनकी समापन सीख यह है कि श्रोता अपनी कुलदेवी और कुल शक्ति की नियमित, सही और विश्वासपूर्वक सेवा-पूजा करके अपने जीवन में आए संकटों को दूर करें।
वक्ता इस बात से समाप्त करते हैं कि परिवार अब कहाँ है। एक तरीके से वे साधना के क्षेत्र में आ गए हैं: पति-पत्नी दोनों साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी।-साधिका हैं, और काफी अच्छे से साधनाएँ करते हैं। भगवती की कृपा से काफी कुछ प्राप्त है — धन-धान्य से परिपूर्ण, पुत्र-पौत्र से परिपूर्ण; किसी तरह की कोई कमी नहीं और जीवन बहुत अच्छे से चल रहा है। घटना उनके जीवन में काफी नकारात्मक रही, वे कहते हैं, लेकिन सब कुछ बदलकर उन्हें आध्यात्मिक मार्ग में ले आई। यही अनुभव, वे कहते हैं, वे सबके सामने रखना चाहते थे: किस प्रकार किसी स्थान की शक्ति — जहाँ न उसकी गलती थी, न घर लेने वाले की — ऐसी परिस्थितियाँ बना देती है कि परिवार कष्ट पाता है। उन्होंने काफी संक्षेप में बताया है, पर कष्ट काफी अधिक था; भगवती की कृपा बस इतनी हुई कि चीज़ें बहुत जल्दी सुलझ गईं, क्योंकि सही लोग मिल गए और मामला जल्दी नियंत्रण में आ गया। उनकी आशा है कि सब इस सत्य घटना से सीख लेंगे और अपनी कुलदेवी और कुल शक्तिपरिवार-वंश की सामूहिक रक्षक व जनक शक्ति, जिसे कुलदेवी व कुल भैरव के साथ आवाहित व सम्मानित किया जाता है। की नियमित, सही और विश्वासपूर्वक सेवा-पूजा करके अपने जीवन में आए संकटों को दूर करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।