तंत्रोक्त बजरंग बाण की सिद्धि एवं प्रयोग विधि (भाग-2)
तंत्रोक्त बजरंग बाण को सिद्ध करने की 11 दिन की विधि, और सिद्ध हो जाने के बाद रक्षण हेतु उसका प्रयोग।
10 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
महिलाएं बजरंग बाण सिद्धि कर सकती हैं: हनुमान जी देवता हैं, डरने लायक इंसान नहीं
भ्रम: महिलाएं हनुमान जी की पूजा न करें
वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी की पूजा से bajrang-baan सिद्ध करना महिला बिल्कुल कर सकती है — कोई भी स्त्री, कोई दिक्कत नहीं — इसलिए निश्चिंत रहिए और भ्रम में पड़े बिना कीजिए। हनुमान जी, वे कहते हैं, देवता हैं, सिद्ध देवता हैं, रुद्र के अवतार हैं, महारुद्र हैं; वे इंसान नहीं हैं जिनसे लोग इतना डरते हैं। इसलिए आराम से, निश्चिंत होकर सिद्ध कीजिए।
साधना के लिए पहनी जाने वाली लाल धोती का वर्णन करते हुए वक्ता जोड़ते हैं कि यदि महिला कर रही हैं तो महिला भी बिल्कुल कर सकती हैं — निश्चिंत रहिए, कोई भी स्त्री इसे कर सकती है, कोई दिक्कत नहीं है। हनुमान जी की पूजा से bajrang-baan सिद्ध करना, वे कहते हैं, आराम से कीजिए, निश्चिंत होकर कीजिए, भ्रम में मत पड़िए। वे देवता हैं — सिद्ध देवता हैं, रुद्र के अवतार हैं, महारुद्र हैं। वे देवता हैं, इंसान नहीं, जो आप लोग इतना डरते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, आराम से सिद्ध करें।
ग्यारह दिन की बजरंग बाण सिद्धि का संकल्प और आरंभिक पूजन
हाथ में तुलसी, ग्यारह रुपये और नारियल; हनुमान जी से पहले राम दरबार
वक्ता कहते हैं कि पहले दिन की पूजा मंदिर में होती है — पीपल के पत्ते पर, या कम से कम पांच तुलसी पत्रों पर "राम" लिखकर वहां समर्पित — फिर घर आकर लाल वस्त्र पहनें, लाल कंबल के आसन पर बैठें और सामान्य आचमन व पवित्रीकरण करें। फिर हाथ में तुलसी पत्र, ₹11 और घर में रखा नारियल लेकर सामान्य हिंदी में (संस्कृत आती हो तो संस्कृत में) नाम, गोत्र, स्थान के उच्चारण से संकल्प लें: हनुमान जी की कृपा-प्राप्ति, bajrang-baan की सिद्धि और जब भी प्रयोग करूं उसके पूर्ण प्रभाव हेतु, आज से 11 दिन तक प्रतिदिन 11 पाठ करके इसे जागृत करने का — कम से कम 11, या सामर्थ्य हो तो 21 या 27, क्योंकि संपूर्ण बजरंग बाण थोड़ा बड़ा है। हाथ का सब सामान हनुमान जी के पास रख दें, नारियल फोड़ना नहीं है, वहीं रहेगा। संकल्प से पहले कर्मसाक्षी दीपक अवश्य जल रहा हो (सुबह से जल रहा हो तो भी ठीक)। फिर गुरु और गणेश पूजन, कुलदेवी स्मरण, और सबसे पहले राम दरबार का पूजन — श्री राम, माता जानकी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न सब पर जल छिड़ककर तिलक, श्री विग्रह हो तो उस पर, नहीं तो फोटो पर।
वक्ता कहते हैं कि पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्ते पर "राम" लिखकर समर्पित करें — कम से कम इतना जरूर करें; जितना करें उतना अच्छा। पीपल का पत्ता ले जाकर ऐसा न कर पाएं तो कम से कम पांच तुलसी पत्रों पर "राम" लिखकर समर्पित करवा दें। इस तरह पहले दिन की पूजा पहले मंदिर में हो जाती है; फिर घर आकर पूजा रूम में जाएं और लाल वस्त्र — लाल धोती — पहनें। आसन पर बैठें, आसन लाल होना चाहिए, लाल कंबल का; सर्वप्रथम आरंभिक आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। और पवित्रीकरण, जो भी आचमन-पवित्रीकरण करते हों, कर लें, शरीर शुद्ध कर लें। उसके बाद हाथ में तुलसी पत्र, ₹11 और घर में रखा एक नारियल लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें। संस्कृत आती हो तो संस्कृत में; सामान्य हिंदी में, सब सामान हाथ में लेकर नाम, गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है।, स्थान का उच्चारण करें: "मैं फलाना शहर का रहने वाला, यह मेरा गोत्र, यह नाम, हनुमान जी की कृपा की प्राप्ति हेतु, bajrang-baan की सिद्धि हेतु, तथा जब कभी भी मैं इसका प्रयोग करूं उसके पूर्ण प्रभाव की प्राप्ति हेतु, आज से 11 दिन तक बजरंग बाण का प्रतिदिन 11 पाठ करके इसे जागृत करने हेतु संकल्प लेता हूं / लेती हूं।" यह बोलकर सारा सामान हनुमान जी के पास या पूजन के स्थान पर रख दें। नारियल फोड़ना नहीं है — वहीं रखा रहेगा; तुलसी पत्र वहीं रखें, दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। भी वहीं। संपूर्ण बजरंग बाण थोड़ा बड़ा है, वे कहते हैं, इसलिए 11 पाठ का संकल्प लें, या 21 या 27, जितना सामर्थ्य हो: 11 दिन तक प्रतिदिन कम से कम 11 पाठ करने हैं, या 21-27 भी कर सकते हैं। संकल्प के बाद आरंभिक गुरु और गणेश पूजन। गुरु-गणपति पूजन और संकल्प से पहले, वे कहते हैं, एक दीपक जरूर प्रज्वलित कर दें — सुबह से जल रहा हो तो कोई दिक्कत नहीं — जो कर्मसाक्षी दीपक होता है; यह जरूर जला लें। गुरु, गणपति, कुलदेवी पूजन-स्मरण के बाद पहले राम दरबार का पूजन करें: सब पर जल छिड़कें और फिर सबका तिलक — श्री राम भगवान, माता जानकी, लक्ष्मण जी, भरत, शत्रुघ्न जी। घर में राम दरबार का श्री विग्रह हो तो उस पर सबका पूजन करें, नहीं तो फोटो पर ही पूजन कर लें।
बजरंग बाण सिद्धि में हनुमान जी के विग्रह की दैनिक पूजा: आवाहन, अभिषेक, सिंदूर लेपन, जनेऊ और तिलक
पान के पत्ते पर चमेली तेल और नारंगी सिंदूर, नीचे से ऊपर
वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी का आवाहन उनके श्री विग्रह में करें यदि हो; केवल फोटो हो तो एक फूल में आवाहन करके उसे फोटो के सामने प्लेट में रखें और उसी पर पूजा करें। विग्रह हो तो पञ्चामृत से अभिषेक, गंगाजल से और अगर से स्नान, अच्छे से पोंछकर रखें, फिर सिंदूर लेपन: पान के पत्ते पर चमेली का तेल और नारंगी सिंदूर मिलाकर पूरे विग्रह पर नीचे से ऊपर की ओर लेपन। पूरा लेपन हो जाने पर हनुमान जी को यज्ञोपवीत अवश्य पहनाएं, आप स्वयं पहनते हों या नहीं। विग्रह बड़ा हो तो नया वस्त्र पहना सकते हैं; नहीं तो कलावा ही वस्त्र के रूप में पहनाएं। अंत में अष्टगंध का तिलक और सुंदर शृंगार।
राम दरबार के पूजन के बाद, वक्ता कहते हैं, हनुमान जी का आवाहन करें — श्री विग्रह हो तो उसमें; हनुमान जी का फोटो हो तो एक फूल लेकर उसमें आवाहन करके प्लेट में रख दें और उनके सामने रखे उसी फूल पर पूजा करें। आवाहन कर लेने पर, श्री विग्रह हो तो पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करें: हनुमान जी को नहलाएं, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से नहलाएं, अगर से नहलाएं, फिर अच्छे से पोंछकर रखें और उन पर सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। लेपन करें। सिंदूर लेपन की विधि, वे कहते हैं, यह है: पान का पत्ता रखें — वे कहते हैं कि शुरू में शायद पान का पत्ता नहीं बोला — उसी पर चमेली का तेल और नारंगी सिंदूर मिलाएं; उसी से पूरे विग्रह पर नीचे से ऊपर की ओर सिंदूर का लेपन करें। पूरा लेपन हो जाने पर हनुमान जी को यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनाएं — आप स्वयं जनेऊ पहनते हों या नहीं, कोई दिक्कत नहीं; हनुमान जी को जनेऊ जरूर पहनाना है (वे कहते हैं कि जनेऊ लाने के लिए शुरू में बोलना भूल गए)। उसके बाद श्री विग्रह बड़ा हो और वस्त्र पहनाना चाहें तो नया वस्त्र पहना सकते हैं; नहीं तो कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। ही वस्त्र के रूप में हनुमान जी को पहना दें। सिंदूर लेपन तो हो गया, पर तिलक अलग है: अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। से तिलक लगाकर उन्हें सुंदर सजा दें।
बजरंग बाण सिद्धि में दैनिक भोग, पंचधान्य आटे का दीपक और तुलसी पत्रों के साथ ग्यारह पाठ
आधा घंटा जलने लायक दीपक, हर पाठ पर एक पत्ता
वक्ता कहते हैं कि 11 दिन का दैनिक भोग है दो लड्डू और ऊपर एक तुलसी पत्र — फ्रिज में रखे स्टॉक से रोज ताजा लाना बेहतर, और घर के बने बेसन के लड्डू सर्वोत्तम। फिर पहले बनाया पांच तरह का आटा हल्के पानी से थोड़ा टाइट सानें, उसमें थोड़ा घी मिलाएं, और एक बढ़िया एकमुखी दीपक बनाएं — मिट्टी के बड़े दीपक में या प्लेट पर रखें ताकि तेल न रिसे — जिसकी बाती अपने शरीर से नापा कलावा हो; उसमें रोज 11 लौंग, पांच काली मिर्च, थोड़ा पीला सरसों और एक बढ़िया कपूर का गोटा डालें। इसे हनुमान जी के नाम से विग्रहों और कपड़ों से थोड़ा दूर जलाएं, क्योंकि सूखा आटा स्वयं जल जाएगा; दीपक इतना बड़ा हो कि कम से कम आधा घंटा जले ताकि पाठ पूरा हो सके। फिर राम जी का नाम लेकर, हनुमान जी का ध्यान करके पाठ: "राम" लिखे 11 तुलसी पत्रों में से एक हाथ में लें, एक बार पूरा bajrang-baan पढ़ें, पत्ता हनुमान जी पर चढ़ा दें, ऐसे 11 बार।
हनुमान जी के शृंगार के बाद, वक्ता कहते हैं, भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य।: 11 दिन के पाठ में रोज दो लड्डूनैवेद्य के रूप में अर्पित गोल मिष्ठान्न, विशेषतः गणपति और हनुमान को। — रोज दो-दो लड्डू लाकर चढ़ाने हैं। एक बार लाकर फ्रिज में रखकर रोज चढ़ा भी सकते हैं, पर वे कहते हैं कि रोज ताजा लड्डू लाकर चढ़ाएं तो ज्यादा बढ़िया, और घर में खुद बनाना चाहें तो बेसन का लड्डू, वह अति उत्तम। तो रोज दो लड्डू और ऊपर एक तुलसी पत्र रखकर पहले हनुमान जी को भोग लगाएं। अब पहले बनाया पांच तरह का आटा सानना है — हल्का सा पानी लेकर, थोड़ा टाइट रखें, थोड़ा घी मिला लें। बाद में जब दीपक जलते-जलते पूरा आटा सूख जाएगा तो वह जल भी जाएगा, उसमें कोई दिक्कत नहीं; इसलिए दीपक थोड़ा दूर जलाना है ताकि आसपास का कोई श्री विग्रह न जले, किसी के कपड़े में आग न लगे। मिलाकर एक बढ़िया एकमुखी दीपक बनाएं, ऐसा कि तेल डालने पर पूरा रिसने न लगे; मिट्टी का बड़ा दीपक रख सकते हैं, या किसी दीपक में उसे रख दें, या बनाकर प्लेट में रख दें। जो कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। अपने शरीर से नापा था वह उसकी बाती बनेगा। उसमें, जैसा पहले बताया, रोज 11 लौंग, पांच काली मिर्च, थोड़ा पीला सरसों और एक बढ़िया कपूर का गोटा, पत्थर वाला, डाल दें। फिर हनुमान जी के नाम से दीप प्रज्वलित करें। दीपक इतना बड़ा हो कि कम से कम आधा घंटा जल सके, ताकि उतनी देर में पाठ पूर्ण हो जाए। दीप प्रज्वलित होने पर सबसे पहले राम जी का नाम उच्चारण इत्यादि, हनुमान जी का पूरा ध्यान, और फिर पाठ। विधि: "राम" लिखे 11 तुलसी पत्तों में से एक पत्ता हाथ में लें, एक बार bajrang-baan का पूरा पाठ करें, फिर पत्ता हनुमान जी पर चढ़ा दें। ऐसे 11 बार करें, पाठ पूर्ण।
बजरंग बाण का दैनिक हवन: हर चौपाई पर आहुति, साबुत नींबू, आरती और पुण्य-समर्पण
साबर पद्धति से घी-गुग्गुल; पुण्य हनुमान जी के दाहिने हाथ में
वक्ता कहते हैं कि पाठ के बाद रोज छोटा सा हवन हो तो बहुत बढ़िया, क्योंकि bajrang-baan एक सबर मंत्र है, अचूक और जागृत, इसलिए उसका विधान साबर पद्धति से होगा (वे साबर हवन पर अपने अलग वीडियो का हवाला देते हैं); नहीं तो गाय के गोबर के कंडे या थोड़ी आम की लकड़ी मिट्टी या किसी पात्र में जलाएं। घी और गुग्गुल एक में मिलाकर उसी से हर आहुति दी जाती है, स्त्री हो या पुरुष: एक-एक आहुति गुरु जी, गणेश जी, कुलदेवी-देवता के नाम से, और नवग्रह के लिए एक बार "ॐ नवग्रहेभ्यो स्वाहा"; फिर बजरंग बाण की हर चौपाई पर पहली से अंतिम तक एक-एक आहुति, हर एक के अंत में "स्वाहा"। वे जोड़ते हैं कि राम जी के नाम से भी रोज कम से कम पांच आहुति दें — "सीतारामचंद्राय स्वाहा", "नमः" नहीं। आहुति पूरी होने पर एक नींबू (एक जरूर रखें; वे कहते हैं बताना भूल गए) काटकर बिना निचोड़े साबुत हवन में ही डालें, फिर प्रणाम। फिर हनुमान जी की आरती, या एक कपूर पर दो लौंग रखकर पांच बार आरती; फिर क्षमा प्रार्थना, और हाथ में जल लेकर आज का पूरा जप और उसका पुण्य हनुमान जी को समर्पित — "जय श्री राम" या जिसमें श्रद्धा हो वह बोलते हुए — उनके दाहिने हाथ में छोड़ दें। जो रोज हवन न कर सके वह 11वें दिन 11 पाठ के बाद करे।
पाठ के बाद, वक्ता कहते हैं, चाहें तो छोटा सा हवन करें; रोज करें तो बहुत बढ़िया। क्योंकि bajrang-baan एक साबर पद्धति है, सबर मंत्र है — बहुत अचूक, जागृत — इसलिए उसका विधान साबर पद्धति से होगा, जिसके लिए वे साबर में हवन कैसे किया जाता है, उस अपने वीडियो का लिंक देते हैं। नहीं तो सामान्य रूप से गाय के गोबर के कंडे या थोड़ी आम की लकड़ी मिट्टी के छोटे पात्र में या जिसमें भी हवन करते हों, जलाएं। पहले गुरु जी के नाम से घी और गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। की एक आहुति। ध्यान रहे, वे कहते हैं, इस विधान में — स्त्री हो या पुरुष — घी और गुग्गुल दोनों एक ही में अच्छे से मिलाकर उसी से आहुति देनी है। एक आहुति गुरु जी के नाम से, एक गणेश जी के नाम से, कुलदेवी-देवता के नाम से एक-एक, और नवग्रह के नाम से एक ही बार: "ॐ नवग्रहेभ्यो स्वाहा।" इन आरंभिक आहुतियों के बाद बजरंग बाण की प्रत्येक चौपाई से एक आहुति — "निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान, तेहि के कारज सकल सिद्ध करैं हनुमान, स्वाहा; जय हनुमान संत हित कारी, सुन लीजै प्रभु अरज हमारी, स्वाहा" — इसी तरह शुरू से अंतिम तक हर चौपाई की एक-एक आहुति। राम जी के नाम से भी रोज कम से कम पांच आहुति जरूर दें, वे जोड़ते हैं: "सीतारामचंद्राय स्वाहा" — "नमः" नहीं, स्वाहा। पूरी आहुति हो जाने पर नींबू — वे कहते हैं शुरू में बताना भूल गए; एक नींबू जरूर रखें — काटकर, बिना निचोड़े, साबुत नींबू हवन में ही डाल दें; नींबू वाली बलि का यह काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। फिर प्रणाम। उसके बाद आरती करना चाहें तो हनुमान जी की आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है।, या एक कपूर पर दो लौंग रखकर भी आरती दिखा सकते हैं — पांच बार दिखाकर रख दें। फिर क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है।, और एक हाथ में जल लेकर सारा जप समर्पित: "आज का किया हुआ पूर्ण जप, पूरे पुण्य का फल, मैं हनुमान जी आपको समर्पित करता हूं" — श्री राम जी का नाम लेते हुए, "जय श्री राम" बोलते हुए, या जो श्रद्धा हो; वे कहते हैं कि मंत्र वे बिल्कुल सरल बता रहे हैं ताकि किसी को मंत्र के कारण यह क्लिष्ट न लगे। वह जल हनुमान जी के दाहिने हाथ में समर्पित कर दें। इतने में दिन का काम हो गया। रोज हवन न करें, वे कहते हैं, तो अंतिम दिन, 11वें दिन, 11 पाठ के बाद करें; रोज करें तो अति उत्तम, नहीं तो अंतिम दिन।
बजरंग बाण सिद्धि-काल में ब्रह्मचर्य, समय और भोजन के नियम
सुबह आठ से पहले; नियम केवल सिद्धि के दिनों में
वक्ता कहते हैं कि स्त्री हो या पुरुष, विवाहित या अविवाहित, इन 11 दिनों में सही तरीके से ब्रह्मचर्य का पालन करना है — विशेष ध्यान कि मानसिक रूप से भी ब्रह्मचर्य खंडित न हो। यह काम सुबह 8 बजे या उससे पहले करें; रात में करेंगे तो उपवास नहीं रख पाएंगे, इसलिए सुबह-सुबह करना ही उचित है। रात में भी कर सकते हैं, पर तब एक बात का ध्यान: दिन भर लहसुन-प्याज नहीं खाना। पूरा सात्विक भोजन करते हों तो चलेगा; बाहर खाना पड़ता हो तो मत करिए। यह सब केवल सिद्धि-काल तक है; बाद में प्रयोग-काल में कभी भी कर लें, कोई दिक्कत नहीं।
वक्ता कहते हैं: स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, इन 11 दिनों में सही तरीके से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करना है। विशेष ध्यान रखें कि मानसिक रूप से भी किसी प्रकार का ब्रह्मचर्य खंडन न हो। यह काम सुबह 8 बजे या 8 बजे से पहले करें। रात को करेंगे तो उपवास नहीं रख पाएंगे, इसलिए सुबह-सुबह किया कीजिए; जो भी विधि है, सुबह ही कर लीजिए। चाहें तो रात के समय भी कर सकते हैं, पर उसमें एक बात का ध्यान: लहसुन-प्याज फिर दिन भर नहीं खाना होगा। पूरा सात्विक खाना खाते हों तो चलेगा; नहीं तो बाहर खाना पड़ता हो तो मत करिए। यह, वे कहते हैं, जब तक सिद्धि का काल है। बाद में प्रयोग के काल में कभी भी कर लीजिए, कोई दिक्कत नहीं; पर सिद्धि-काल में इन सभी बातों का विशेष ध्यान रखना है।
बजरंग बाण सिद्धि का ग्यारहवां दिन: अंतिम हवन, गरी-नारियल की पूर्णाहुति, मंदिर पूजा और प्रसाद
मंदिर में सवा किलो लड्डू; पहले दिन का नारियल सबका प्रसाद
वक्ता कहते हैं कि 11वें दिन, चाहे कोई भी दिन पड़े, 11 पाठ और हवन (रोज वाला, या जो रोज न कर सके उसका अंतिम दिन का हवन) के बाद पूर्णाहुति, सबके लिए समान: नींबू की निंबू बलि के बाद एक छोटी गरी का नारियल — जिससे गरी का तेल बनता है — जिस ओर से वह पेड़ से लगा रहता है उधर से काटकर उसमें खीर या गुड़ भरें, लाल कपड़े में लपेटें, पान के पत्ते पर रखें, पूर्णाहुति का मंत्र बोलकर अंत में रख दें। गरी छोटी रखें, क्योंकि हवन पात्र छोटा होगा, ताकि जल्दी जल जाए और बचे नहीं। समर्पण-आरती के बाद उस दिन मंदिर जाएं, वहां हनुमान जी की पूरी पूजा करें और यथाशक्ति कम से कम सवा किलो लड्डू चढ़ाएं — कुछ ही घर लाएं, बाकी पंडित जी से बंटवा दें या स्वयं वहां आए सबमें बांट दें। पहले दिन रखा नारियल पूर्णाहुति के बाद घर में फोड़ लें या मंदिर में चढ़ाएं, और प्रसाद रूप में सब खाएं — स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं। इस तरह करने पर, वे कहते हैं, bajrang-baan साधक के लिए जागृत, सिद्ध और चैतन्य हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि रोज हवन न करें तो अंतिम दिन, 11वें दिन, 11 पाठ के बाद हवन करें; रोज करें तो अति उत्तम, नहीं तो अंतिम दिन। हवन, समर्पण और आरती के बाद उस दिन मंदिर जाएं — 11वां दिन चाहे कोई भी दिन पड़े — और वहां फिर हनुमान जी की पूरी पूजा करें। अंतिम दिन की एक बात रोज हवन करने वालों और केवल अंतिम दिन हवन करने वालों, दोनों के लिए है: अंतिम दिन हवन में नींबू की निंबू बलि देने के बाद एक नारियल लाएं जिससे गरी का तेल बनता है — जिसे गरी कहते हैं। उसे ऊपर से, जिधर से वह पेड़ से लगा रहता है उधर से काटा जाता है। काटकर उसके अंदर खीर या गुड़ भरें, लाल कपड़े में लपेटें, और उससे पूर्णाहुति दी जाती है: लाल कपड़े में लपेटकर पान के पत्ते पर रखें, पूर्णाहुति का मंत्र बोलें और अंत में रख दें। गरी का गोला छोटा ही रखें, वे कहते हैं, क्योंकि आप छोटा हवन करेंगे, पात्र छोटा हो सकता है — छोटी गरी रखें ताकि जल्दी जल जाए और बचे नहीं। इस तरह अंतिम दिन पूर्णाहुति कर लें। पहले दिन रखा नारियल चाहें तो पूर्णाहुति के बाद घर में फोड़कर प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। रूप में सब खा सकते हैं — ऐसा नहीं कि स्त्री खाएगी, पुरुष नहीं; हर कोई प्रसाद खा सकता है — या चाहें तो मंदिर ले जाकर वहां चढ़ाएं और प्रसाद रूप में घर में खाएं। अंतिम दिन एक काम और: मंदिर जाएं तो यथाशक्ति कम से कम सवा किलो लड्डूनैवेद्य के रूप में अर्पित गोल मिष्ठान्न, विशेषतः गणपति और हनुमान को। हनुमान जी को चढ़ाएं; कुछ ही लड्डू घर लाएं, बाकी पंडित जी को बोल दें कि सबमें बांट दें, या चाहें तो स्वयं वहां आए सबको बांट दें। यह सब कर लेने पर, वे कहते हैं, bajrang-baan आपके लिए जागृत, सिद्ध और चैतन्य हो जाता है।
सिद्ध बजरंग बाण का प्रयोग: नजर लगे बच्चे के लिए सरसों या भस्म
सरसों जागृत करें, बच्चे पर से उतारें, बाहर जलाएं
वक्ता कहते हैं कि bajrang-baan सिद्ध हो जाने पर उसका विभिन्न तरीकों से प्रयोग किया जा सकता है — जैसे घर में छोटा बच्चा बहुत रो रहा हो और लगे कि नज़र इत्यादि लग गई है। हाथ में पीला सरसों लेकर पहले पूरा निवेदन बोलें: राम जी का नाम जरूर लेना है — "हे राम जी, कृपा करें, सीताराम, सीताराम" — फिर "हे हनुमान जी, मैं आपके बजरंग बाण का पाठ कर रहा हूं; इसे जागृत करें, इस पूरे सरसों को अभिमंत्रण करें, पूर्ण चैतन्य करें; (बच्चे का नाम) के रक्षण हेतु, उस पर जो भी बाधा है उसे दूर करने हेतु मैं इसका प्रयोग कर रहा हूं — इसे जागृत करें और मेरे कार्य को सिद्ध करें।" फिर एक बार बजरंग बाण का पाठ करें, सरसों बच्चे के ऊपर से उल्टा तीन बार, सात बार, जितनी इच्छा हो उतारें, और घर से बाहर ले जाकर जला दें। भस्म को भी इसी तरह अभिमंत्रित करके स्वयं लगा सकते हैं, हमेशा रक्षण होगा, या घर-परिवार में किसी को दे सकते हैं।
वक्ता प्रयोग की विधि पर आते हैं: जब कभी प्रयोग करना हो — जैसे घर में छोटा बच्चा है, बहुत रो रहा है, और लग रहा है कि कुछ नज़र इत्यादि लग गई है — तो bajrang-baan का विभिन्न तरीकों से प्रयोग कर सकते हैं। बच्चे के लिए हाथ में पीला सरसों लें और पहले पूरा बोलें: राम जी का नाम जरूर लेना है — "हे राम जी, कृपा करें; सीताराम, सीताराम" — और फिर, "हे हनुमान जी, मैं आपके बजरंग बाण का पाठ कर रहा हूं; कृपया इसे जागृत करें, इस पूरे सरसों को अभिमंत्रण करें, पूर्ण चैतन्य करें; और (बच्चे का नाम लेकर) उसके रक्षण हेतु, उस पर जो भी बाधा है उसे दूर करने हेतु मैं इसका प्रयोग कर रहा हूं — इसे जागृत करें और मेरे कार्य को सिद्ध करें।" यह बोलकर एक बार बजरंग बाण का पाठ करें, बच्चे के ऊपर से उल्टा उतारें — तीन बार, सात बार, जितनी इच्छा हो — और घर से बाहर ले जाकर जला दें। यह एक तरह का प्रयोग हुआ। भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। को भी उसी तरह अभिमंत्रित कर सकते हैं, वे कहते हैं; स्वयं भी लगा सकते हैं, हमेशा रक्षण होगा, या घर-परिवार में किसी को दे भी सकते हैं।
सिद्ध बजरंग बाण का प्रयोग: गांठ लगा लाल रक्षा-धागा
आठ से अठारह गांठ, हर गांठ पर एक पाठ, मंगलवार को
वक्ता कहते हैं कि धागे को आठ गांठ लगाकर अभिमंत्रित किया जाता है — हनुमान जी अष्ट सिद्धि, नौ निधि के दाता हैं — और आठ से अठारह गांठ तक लगाई जाती हैं, जितनी गांठ उतने पाठ। घर-परिवार में किसी को कष्ट हो, कोई बच्चा बाहर पढ़ाई कर रहा हो और परेशानी हो रही हो, या कोई बच्चा रात में डरता हो: मंगलवार के दिन लाल धागा पहले कच्चे दूध से, फिर गोमूत्र से, फिर पञ्चामृत से या नहीं तो गंगाजल से धोएं; आठ गांठ लगाएं, और हर गांठ को पकड़कर राम जी का नाम लेते हुए हर गांठ पर एक bajrang-baan का पाठ — कुल आठ पाठ। फिर हनुमान जी के पास रखकर धूप-दीप दिखाएं, एक कपूर पर दो लौंग जलाएं, हनुमान जी से प्रार्थना करें, और जिसे बांधना है उसे बांध दें; उसका पूर्ण रूप से रक्षण हो जाएगा।
धागे को कैसे अभिमंत्रित किया जाता है, इस पर वक्ता कहते हैं कि आठ गांठ लगाई जाती हैं — हनुमान जी अष्ट सिद्धि, नौ निधि के दाता हैं — और आठ गांठ से लेकर अठारह गांठ तक लगाई जाती हैं; जितनी गांठ लगाएंगे उतनी बार पाठ करना होता है। तो मान लीजिए, वे कहते हैं, आपके घर-परिवार में किसी को कष्ट है, आपने इसे सिद्ध किया है, कोई बच्चा बाहर पढ़ाई-लिखाई कर रहा है और उसे कोई दिक्कत-परेशानी हो रही है, या रात में कोई बच्चा डर रहा है। ऐसे समय में मंगलवार के दिन लाल रंग का धागा पहले कच्चे दूध से धोएं, गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। से धोएं, और उसके बाद पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से धो सकते हैं, नहीं तो गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से। फिर उसमें आठ गांठ लगाएं, और हर गांठ को पकड़कर राम जी का नाम लेते हुए हर गांठ पर एक बार bajrang-baan का पाठ करें — यानी आठ बार बजरंग बाण का पाठ करना है। फिर हनुमान जी के पास रखकर धूप-दीप दिखाएं, एक कपूर पर दो लौंग जलाएं, हनुमान जी से प्रार्थना करें, और वह धागा जिसे बांधना है उसे बांध दें। उसका पूर्ण रूप से रक्षण हो जाएगा।
सिद्ध बजरंग बाण के और प्रयोग: बाधित घर के लिए अभिमंत्रित जल, शत्रु-स्तंभन अभी नहीं बताया
अनंत प्रयोग, पर मनोबल चाहिए
वक्ता कहते हैं कि bajrang-baan सिद्ध हो जाने पर उसे अनंत तरीकों से प्रयोग किया जा सकता है। घर में बाधा हो तो शाम के समय बजरंग बाण का पाठ करते हुए जल अभिमंत्रित करें, उसमें थोड़ा गोमूत्र और गंगाजल डालें और पूरे घर में छिड़कें। यदि पता हो कि कौन सा शत्रु अभिचार कर्म कर रहा है, तो उसकी अलग विधि है — केवल बजरंग बाण के द्वारा शत्रु को कैसे स्तंभित किया जा सकता है, उसकी विद्या बांधी जा सकती है — जो वे लोगों के सिद्ध कर लेने के बाद मांगने पर बताएंगे; यहां नहीं बताते। हर विद्या के बहुत सारे प्रयोग हैं, वे कहते हैं, और चाहें तो आराम से कर पाएंगे, पर मजबूत होना होगा, मनोबल उतना सक्षम बनाना होगा।
इस तरह bajrang-baan को सिद्ध करके, वक्ता कहते हैं, आप अनंत तरीकों से प्रयोग कर सकते हैं। घर में बाधा हो तो जल अभिमंत्रित करें: शाम के समय बजरंग बाण का पाठ करते हुए जल अभिमंत्रित करें, उस जल में थोड़ा गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। और गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। डालें, और पूरे घर में छिड़कें। शत्रु के विषय में — यदि पता हो कि कौन सा शत्रु अभिचार कर्म कर रहा है — तो वे कहते हैं कि उसकी अलग से विधि बता देंगे; जरूरत हो तो सिद्ध करने के बाद कमेंट या टेलीग्राम ग्रुप में बोलें: केवल बजरंग बाण के द्वारा शत्रु को कैसे स्तंभित किया जा सकता है, उसकी विद्या कैसे बांधी जा सकती है। बहुत सारे प्रयोग हैं, वे कहते हैं; हर विद्या के बहुत सारे प्रयोग हैं, और चाहेंगे तो आराम से कर पाएंगे — पर मजबूत होना होगा, मनोबल उतना सक्षम बनाना होगा; तब बहुत सारी चीजें हो जाएंगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।