तंत्रोक्त बजरंग बाण की सिद्धि एवं प्रयोग विधि (भाग-2)
तंत्रोक्त बजरंग बाण को सिद्ध करने की 11 दिन की विधि, और सिद्ध हो जाने के बाद रक्षण हेतु उसका प्रयोग।
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बजरंग बाण सिद्धि से पहले पहले दिन का मंदिर में पत्र समर्पण
पहले दिन की पूजा में मंदिर में "राम" लिखा पीपल का पत्ता, या कम से कम पाँच तुलसी पत्र, समर्पित करना
वक्ता कहते हैं कि साधक पीपल के पत्ते पर "राम" लिखकर, और यदि पीपल का पत्ता न मिले तो कम से कम पाँच तुलसी पत्रों पर "राम" लिखकर, पहले दिन की पूजा के रूप में मंदिर में समर्पित करे, और फिर घर लौटकर लाल वस्त्र धारण करके साधना आगे बढ़ाए — यह साधना स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह पूरी तरह कर सकती हैं।
वक्ता कहते हैं कि पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्ते पर "राम" लिखकर समर्पित करें — जितने अधिक पत्ते इस प्रकार चढ़ाए जाएँ, उतना ही अच्छा है। यदि पीपल का पत्ता न जुट सके, तो कम से कम पाँच तुलसी पत्रों पर "राम" लिखकर उन्हें समर्पित करवा दें। यह पहले दिन की पूजा के रूप में मंदिर में किया जाता है। मंदिर से लौटकर साधक घर आता है, पूजा कक्ष में जाता है और लाल वस्त्र धारण करता है — पुरुष के लिए लाल धोती, स्त्री के लिए लाल वस्त्र — और साधना आगे बढ़ाता है। वे विशेष रूप से कहते हैं कि कोई भी स्त्री यह सिद्धि पूरी तरह और निश्चिंत होकर कर सकती है, इसमें कोई रोक नहीं है। वे यह भी आश्वस्त करते हैं कि इस बजरंग बाण सिद्धि के समय हनुमान के पास आराम से, निश्चिंत होकर, बिना भ्रम और भय के जाना चाहिए — हनुमान जी सिद्ध देवता हैं, रुद्र के अवतार हैं, महारुद्र हैं, देवता हैं, इंसान नहीं, इसलिए उनसे उस तरह डरने की आवश्यकता नहीं जैसे लोग डरते हैं।
बजरंग बाण के संकल्प से पहले घर पर की जाने वाली तैयारी
लाल वस्त्र और लाल कंबल का आसन, फिर आचमन तथा आरंभिक पवित्रीकरण
घर लौटकर लाल वस्त्र धारण करने के बाद साधक लाल कंबल के आसन पर बैठता है और आगे बढ़ने से पहले आरंभिक क्रियाएँ — आचमन तथा अन्य पवित्रीकरण — पूर्ण करता है।
घर आने के बाद साधक सबसे पहले लाल वस्त्र धारण करता है, फिर ऐसे आसन पर बैठता है जो स्वयं लाल हो — लाल कंबल का आसन। आसन पर विराजमान होने के बाद सर्वप्रथम आरंभिक क्रियाएँ — आचमन तथा जो भी पवित्रीकरण किया जाता है — पूर्ण की जाती हैं और आगे बढ़ने से पहले शरीर शुद्ध कर लिया जाता है।
11 दिन की बजरंग बाण सिद्धि का संकल्प
ग्यारह तुलसी पत्र, ग्यारह रुपये और नारियल हाथ में लेकर 11 दिन तक प्रतिदिन 11, 21 या 27 पाठ का संकल्प
ग्यारह तुलसी पत्र, ग्यारह रुपये और एक नारियल हाथ में लेकर साधक अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलते हुए संकल्प लेता है कि हनुमान जी की कृपा प्राप्ति हेतु, बजरंग बाण को जागृत करने हेतु और आगे प्रयोग करने पर उसका पूर्ण प्रभाव मिलने हेतु वह 11 दिन तक प्रतिदिन निश्चित संख्या में पाठ करेगा।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले हाथ में ग्यारह तुलसी पत्र, ग्यारह रुपये और घर में रखा हुआ नारियल लें, और तब संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें। जिन्हें संस्कृत आती है वे संस्कृत में करें; अन्यथा हिंदी में, सारा सामान हाथ में लेकर साधक अपना नाम, गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। और स्थान बोले — "मैं फलाने शहर का रहने वाला, मेरा यह गोत्र है…" — और संकल्प ले कि हनुमान जी की कृपा की प्राप्ति हेतु, बजरंग बाण की सिद्धि हेतु, तथा जब कभी मैं इसका प्रयोग करूँ तब उसके पूर्ण प्रभाव की प्राप्ति हेतु, आज से 11 दिन तक प्रतिदिन निश्चित संख्या में पाठ करके इसे जागृत करने का संकल्प लेता हूँ या लेती हूँ। संकल्प बोलने के बाद वह सारा सामान हनुमान जी के पास, या पूजन के स्थान पर रख दिया जाता है — नारियल को फोड़ना नहीं है, उसे वहीं रख दिया जाएगा; तुलसी पत्र भी वहीं रखे जाएँगे और दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। भी वहीं रख दी जाएगी। वे जोड़ते हैं कि वे कम से कम ग्यारह पाठ प्रतिदिन का सुझाव देते हैं, क्योंकि संपूर्ण बजरंग बाण कुछ बड़ा है; किंतु जिस साधक का सामर्थ्य अधिक हो वह संकल्प में ही 21 या 27 पाठ प्रतिदिन का संकल्प ले सकता है — जो भी संख्या चुनी जाए, वह पूरे 11 दिन प्रतिदिन निभानी होगी।
राम दरबार पूजन से पहले गुरु-गणपति पूजन और दीप प्रज्वलन
राम दरबार के पूजन से पहले गुरु-गणपति पूजन, कुलदेवी का स्मरण और पहले से प्रज्वलित कर्म-साक्षी दीपक
संकल्प के बाद साधक आरंभिक गुरु और गणपति पूजन करता है, कुलदेवी का स्मरण करता है, साक्षी के रूप में "कर्म साक्षी" दीपक प्रज्वलित रखता है, और तभी राम दरबार का पूजन करता है — श्री राम, माता जानकी, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का — चाहे श्री विग्रह हो या फोटो, और उसके बाद हनुमान जी की ओर बढ़ता है।
संकल्प लेने के पश्चात साधक आरंभिक गुरु पूजन और गणपति (गणेश) पूजन यथावत करता है, और कुलदेवी का स्मरण करता है। वे बताते हैं कि संकल्प लेने से पहले ही एक दीपक "कर्म साक्षी दीप" के रूप में प्रज्वलित कर देना चाहिए — यदि वह सुबह से जल रहा है तो कोई दिक्कत नहीं, किंतु प्रज्वलित अवश्य होना चाहिए। इस गुरु-गणपति पूजन और स्मरण के बाद साधक राम दरबार का पूजन करता है: श्री विग्रह या फोटो पर जल छिड़ककर श्री राम भगवान, माता जानकी, लक्ष्मण जी, भरत और शत्रुघ्न जी सभी का तिलक करता है। यदि घर में राम दरबार का श्री विग्रह है तो हनुमान जी के साथ उसी का पूजन करें, अन्यथा फोटो पर ही पूजन कर लें।
प्रतिदिन के अभिषेक से पहले हनुमान जी का आवाहन
श्री विग्रह में सीधे आवाहन, या फूल में आवाहन करके उसे फोटो के सामने प्लेट में रखना
वक्ता कहते हैं कि यदि श्री विग्रह उपलब्ध हो तो हनुमान जी का आवाहन उसी में करें; यदि केवल फोटो हो तो एक फूल लेकर उसमें आवाहन करें और उस फूल को फोटो के सामने एक प्लेट में रख दें — उसी पर उस दिन का पूजन होगा।
राम दरबार के पूजन के पश्चात हनुमान जी का आवाहन किया जाता है। यदि हनुमान जी का श्री विग्रह है तो आवाहन उसी में किया जाता है। यदि केवल फोटो है तो एक फूल लेकर उससे आवाहन किया जाता है और वह फूल फोटो के सामने एक प्लेट में रख दिया जाता है — फिर उसी फूल के सामने पूजन किया जाता है।
हनुमान जी का अभिषेक, सिंदूर लेपन और जनेऊ अर्पण
बजरंग बाण के पूजन में हनुमान जी के श्री विग्रह का अभिषेक, सिंदूर लेपन और जनेऊ धारण कैसे किया जाता है?
हनुमान जी के श्री विग्रह का पञ्चामृत, गंगाजल और अगरू से अभिषेक किया जाता है, फिर अच्छे से पोंछकर पान के पत्ते पर चमेली तेल में मिलाया हुआ सिंदूर नीचे से ऊपर की ओर लेपन किया जाता है; पूरा लेपन हो जाने पर हनुमान जी को जनेऊ (यज्ञोपवीत) अवश्य पहनाया जाता है, चाहे पूजा करने वाला स्वयं जनेऊ पहनता हो या नहीं।
यदि श्री विग्रह हो तो पूजन पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। से आरंभ होता है — हनुमान जी को पहले पंचामृत से, फिर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से, फिर अगरू से नहलाया जाता है — इसके बाद विग्रह को अच्छे से पोंछा जाता है। फिर सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। लेपन किया जाता है: पान का पत्ता रखा जाता है, उस पर चमेली का तेल और नारंगी सिंदूर मिलाया जाता है, और उसी से पूरे विग्रह पर नीचे से ऊपर की ओर लेपन किया जाता है। वे बताते हैं कि पान के पत्ते का उल्लेख वे सामग्री गिनाते समय शुरू में करना भूल गए थे। सिंदूर लेपन पूरा हो जाने के बाद हनुमान जी को जनेऊ (यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है।) अवश्य पहनाया जाता है, चाहे पूजा करने वाला स्वयं जनेऊ पहनता हो या नहीं — वे कहते हैं कि जनेऊ लाने की बात भी वे शुरू में बताना भूल गए थे, और इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
हनुमान जी को वस्त्र या कलावा पहनाना और अष्टगंध तिलक लगाना
बड़े श्री विग्रह पर नया वस्त्र, अन्यथा वस्त्र के रूप में कलावा, फिर अष्टगंध का तिलक
यदि श्री विग्रह बड़ा हो तो नया वस्त्र पहनाया जा सकता है; अन्यथा कलावा ही वस्त्र के रूप में पहना दिया जाता है, इसके बाद अष्टगंध का तिलक लगाकर हनुमान जी को सुंदर रूप से सजाया जाता है।
यदि श्री विग्रह बड़ा है और साधक चाहे तो नया वस्त्र पहनाया जा सकता है; यदि नहीं, तो कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। ही वस्त्र के रूप में हनुमान जी को पहना दिया जाता है। इसके बाद अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। से तिलक लगाकर उन्हें सुंदर रूप से सजाया जाता है।
प्रतिदिन का लड्डू भोग और दीपक का आटा तैयार करना
प्रतिदिन दो लड्डू और उन पर एक तुलसी पत्र, फिर दीपक के लिए पाँच अनाजों का आटा घी मिलाकर कड़ा सानना
11 दिनों में प्रतिदिन दो लड्डू, उन पर एक तुलसी पत्र रखकर, हनुमान जी को भोग लगाए जाते हैं — रोज ताजे लड्डू लाना अधिक अच्छा है और घर पर बना बेसन का लड्डू सबसे उत्तम — इसके बाद पहले से तैयार आटे को थोड़े पानी और घी के साथ कुछ कड़ा सानकर उस दिन का दीपक बनाया जाता है।
पूरे 11 दिन प्रतिदिन दो लड्डू लाकर हनुमान जी को चढ़ाए जाते हैं। लड्डू एक ही बार लाकर फ्रिज में रखकर रोज चढ़ाए जा सकते हैं, किंतु वक्ता कहते हैं कि रोज ताजे लड्डू लाकर चढ़ाना अधिक बढ़िया है, और सबसे उत्तम यह है कि घर पर स्वयं बेसन का लड्डू बनाकर उसी का भोग लगाया जाए। प्रतिदिन पहले दो लड्डू और उनके ऊपर एक तुलसी पत्र रखकर हनुमान जी को भोग लगाया जाता है। उसके बाद पहले से तैयार पाँच प्रकार के आटे को थोड़ा पानी लेकर — थोड़ा कड़ा ही रखते हुए — और उसमें हल्का सा घी मिलाकर सान लिया जाता है, जिससे उस दिन का दीपक बनेगा। वे सावधान करते हैं कि यदि आटा बहुत सूखा रह गया तो दीपक जलते-जलते वह भी जल सकता है, इसलिए दीपक को कुछ दूर प्रज्वलित करना चाहिए ताकि आसपास का कोई श्री विग्रह न जले और किसी के कपड़े में आग न लगे।
प्रतिदिन का एक मुखी दीपक बनाना और उसमें सामग्री डालना
शरीर से नापे कलावे की बाती वाला एक मुखी आटे का दीपक, जिसमें तेल, ग्यारह लौंग, पाँच काली मिर्च, सरसों और कपूर डाले जाते हैं
साने हुए आटे से एक मुखी दीपक बनाया जाता है, जिसकी बाती साधक के अपने शरीर से नापे गए कलावा से बनती है, और उसमें प्रतिदिन तेल, ग्यारह लौंग, पाँच काली मिर्च, थोड़ी पीली सरसों और कपूर का एक गोटा डाला जाता है; दीपक इतना बड़ा बनाया जाता है कि कम से कम आधा घंटा जल सके।
साने हुए आटे से एक बढ़िया एक मुखी दीपक बनाया जाता है, ऐसा बनाया जाता है कि उसमें डाला गया तेल बाहर न बहे — मिट्टी का बड़ा दीपक, या दीपक को किसी प्लेट में रख देना, ठीक रहता है। बाती उसी कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। से बनाई जाती है जिसे पहले साधक ने अपने शरीर से नापा था। दीपक में प्रतिदिन डाला जाता है: तेल, ग्यारह लौंग, पाँच काली मिर्च, थोड़ी पीली सरसों, और कपूर का एक अच्छा गोटा। फिर हनुमान जी के नाम से दीप प्रज्वलित किया जाता है। दीपक इतना बड़ा बनना चाहिए कि कम से कम आधा घंटा जल सके, ताकि उतनी देर में उस दिन का पूरा पाठ पूर्ण हो जाए।
ग्यारह तुलसी पत्रों से प्रतिदिन पाठ करने की विधि
प्रत्येक पूरे पाठ के लिए "राम" लिखा एक तुलसी पत्र हाथ में लेकर बाद में चढ़ाना, इस प्रकार ग्यारह बार
दीप प्रज्वलित होने के बाद साधक पहले राम जी का नाम उच्चारण करता है और हनुमान जी का ध्यान करता है, फिर "राम" लिखे ग्यारह तुलसी पत्रों में से एक पत्ता हाथ में लेकर पूरा बजरंग बाण एक बार पढ़ता है और वह पत्ता हनुमान जी पर चढ़ा देता है — ऐसा ग्यारह बार करने पर उस दिन का पाठ पूर्ण होता है।
दीप जल जाने के बाद साधक पाठ आरंभ करने से पहले राम जी का नाम उच्चारण करता है और हनुमान जी का ध्यान करता है। विधि यह है: पहले से रखे गए ग्यारह तुलसी पत्रों में से — जिन पर "राम" लिखा है — एक पत्ता हाथ में लें, उसे हाथ में रखते हुए पूरा बजरंग बाण एक बार पढ़ें, फिर वह पत्ता हनुमान जी पर चढ़ा दें। यही ग्यारह बार दोहराया जाता है, जिससे उस दिन का पाठ पूर्ण होता है। वे जोड़ते हैं कि जो चाहें वे इसके साथ प्रतिदिन एक छोटा सा हवन भी कर सकते हैं, और यदि यह हो सके तो बहुत बढ़िया है।
बजरंग बाण का हवन विधान और चौपाई-वार आहुति
गुरु, गणपति, कुलदेवी और नवग्रह के नाम से घी-गुगल की साबर पद्धति की आहुतियाँ, फिर क्रमशः प्रत्येक चौपाई पर एक आहुति
चूँकि बजरंग बाण सबर मंत्र पद्धति का है, इसलिए उसका हवन साबर पद्धति से होता है: घी और गुग्गुल को मिलाकर पहले गुरु जी, गणपति जी, कुलदेवी और नवग्रह के नाम से आहुति दी जाती है, और उसके बाद बजरंग बाण की प्रत्येक चौपाई पर क्रमशः एक-एक आहुति दी जाती है, उसी चौपाई को मंत्र की तरह बोलते हुए।
वक्ता बताते हैं कि बजरंग बाण एक सबर मंत्र है, साबर पद्धति का है, अत्यंत अचूक और जागृत है, इसलिए उसका हवन विधान साबर पद्धति से ही होगा। वे कहते हैं कि वे एक अलग वीडियो का लिंक दे रहे हैं जिसमें साबर पद्धति से हवन की पूरी विधि बताई गई है और साधक चाहे तो उसी विधि से करे; अन्यथा सामान्य रूप से गाय के गोबर के कंडे या आम की लकड़ी को किसी छोटे मिट्टी के पात्र या जिस भी पात्र में हवन किया जाता है, उसमें जलाकर छोटा सा हवन किया जा सकता है। इस विधान में घी और गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। दोनों को एक ही में अच्छे से मिलाकर उसी से हर आहुति दी जाती है, चाहे साधक स्त्री हो या पुरुष। आहुति का क्रम: एक आहुति गुरु जी के नाम से, एक गणपति (गणेश) जी के नाम से, एक कुलदेवी तथा कुलदेवता के नाम से, और नवग्रहों (नवग्रह) के नाम से एक ही बार "ओम नवग्रह भयो स्वाहा" बोलते हुए एक आहुति। इन आरंभिक आहुतियों के बाद बजरंग बाण की प्रत्येक चौपाई पर शुरू से लेकर अंत तक एक-एक आहुति दी जाती है — जैसे "निश्चय प्रेम प्रतीत ते विनय करे सन्मान, ते ही कार्य सकल सिद्ध करे हनुमान, स्वाहा" या "जय हनुमान संत हित कार्य, सुन लीजिए प्रभु अरज हमारी, स्वाहा" — इस प्रकार क्रमशः हर चौपाई के साथ केवल एक आहुति देते जाना है।
प्रतिदिन के हवन में नींबू बलि और समापन आरती
बिना निचोड़ा साबुत नींबू हवन में नींबू-बलि के रूप में डालना, फिर प्रणाम और कपूर से पाँच बार आरती
सारी चौपाई आहुतियाँ पूर्ण हो जाने पर एक साबुत नींबू — बिना निचोड़े — हवन में निंबू बलि के रूप में डाला जाता है, यह कार्य स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते हैं; इसके बाद प्रणाम किया जाता है और चाहें तो कपूर पर दो लौंग रखकर पाँच बार आरती दिखाई जाती है।
सारी चौपाई आहुतियाँ पूर्ण हो जाने के बाद नींबू अर्पित किया जाता है। वे बताते हैं कि नींबू का उल्लेख विधि में पहले करना छूट गया था, इसलिए एक नींबू अवश्य रखना चाहिए। यह निंबू बलि का कार्य स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते हैं — इसमें लिंग के आधार पर कोई रोक नहीं है। नींबू को काटकर, बिना निचोड़े हुए साबुत ही हवन में डाल दिया जाता है, और फिर प्रणाम किया जाता है। इसके बाद यदि इच्छा हो तो हनुमान जी की आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। की जा सकती है — या एक कपूर के ऊपर दो लौंग रखकर जलाकर भी आरती दिखाई जा सकती है, पाँच बार।
जल के साथ उस दिन का पुण्य फल हनुमान जी को समर्पित करना
क्षमा प्रार्थना के लिए हाथ में जल लेकर उस दिन के पूरे जप का फल हनुमान जी को समर्पित करना और जल उनके दाहिने हाथ में छोड़ना
एक हाथ में जल लेकर साधक क्षमा प्रार्थना करता है और उस दिन के पूरे जप का पुण्य फल हनुमान जी को समर्पित करता है, राम जी का नाम लेते हुए — या केवल "जय श्री राम" बोलते हुए — और वह जल हनुमान जी के दाहिने हाथ में छोड़ देता है।
आरती के बाद साधक एक हाथ में जल लेकर क्षमा प्रार्थना करता है और कहता है कि आज का किया हुआ पूर्ण जप और उसके पुण्य का फल वह हनुमान जी को समर्पित करता है। वक्ता कहते हैं कि यह राम जी का नाम लेते हुए — "जय श्री राम" बोलते हुए — या जिस मंत्र पर साधक की श्रद्धा हो, उससे किया जा सकता है; वे शब्द जानबूझकर बिल्कुल सरल रखते हैं ताकि किसी मंत्र के कारण कोई इसे क्लिष्ट न समझे। फिर वह जल हनुमान जी के दाहिने हाथ में समर्पित कर दिया जाता है, और उस दिन की क्षमा प्रार्थना पूर्ण हो जाती है।
सिद्धि काल में ब्रह्मचर्य और समय के नियम
11 दिन की बजरंग बाण सिद्धि में ब्रह्मचर्य और समय का कौन सा नियम पालन करना होता है?
स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, पूरे 11 दिन कड़ाई से ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है — मानसिक रूप से भी — और यह पूजा सुबह 8 बजे से पहले करनी चाहिए; यदि रात में करें तो उस दिन लहसुन-प्याज नहीं खाना होगा और भोजन पूर्ण रूप से सात्विक होना चाहिए।
साधक स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, पूरे 11 दिन सही तरीके से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करना होता है — विशेष ध्यान इस बात का कि मानसिक रूप से भी किसी प्रकार का ब्रह्मचर्य खंडन न हो। वे सलाह देते हैं कि यह साधना सुबह, 8 बजे या उससे पहले कर लें; रात में करने पर साधक उपवास नहीं रख पाएगा, इसलिए सुबह करना ही श्रेष्ठ है। यदि रात में ही करना पड़े तो ध्यान इस एक बात का रखना है कि उसके बाद दिन भर लहसुन-प्याज नहीं खाना होगा — और यह तभी चलेगा जब भोजन पूर्ण रूप से सात्विक हो; यदि साधक को बाहर का खाना खाना पड़ता हो तो वे इसे करने से मना करते हैं।
नियम केवल सिद्धि काल में लागू, बाद के प्रयोग में नहीं
ये नियम केवल सिद्धि काल तक बाँधते हैं, और हवन के साथ राम जी के नाम से भी आहुति दी जाती है
ये नियम केवल सिद्धि काल में ही लागू होते हैं; सिद्धि पूर्ण हो जाने के बाद बजरंग बाण का प्रयोग कभी भी बिना इन नियमों के किया जा सकता है। हवन (हवन) के साथ राम जी के नाम से भी कम से कम पाँच आहुति "सीताराम चंद्राय स्वाहा" बोलते हुए देनी चाहिए — वक्ता कहते हैं कि "नमः" नहीं, "स्वाहा" बोलना है।
वे स्पष्ट करते हैं कि ये सारे नियम — ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य।, समय, आहार — केवल सिद्धि काल तक लागू होते हैं। उसके बाद, प्रयोग के काल में, बजरंग बाण का प्रयोग कभी भी निश्चिंत होकर किया जा सकता है; किंतु सिद्धि काल में इन सभी बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है। हवन (हवन) के विषय में वे कहते हैं कि जो साधक प्रतिदिन हवन नहीं करते वे अंतिम दिन हवन करें, और राम जी के नाम से भी कम से कम पाँच आहुति अवश्य देनी चाहिए — "सीताराम चंद्राय स्वाहा" बोलते हुए, और वे विशेष रूप से कहते हैं कि "नमः" नहीं, "स्वाहा" बोलना है। प्रतिदिन हवन करना अति उत्तम है; अन्यथा 11वें और अंतिम दिन, उस दिन के पाठ पूर्ण होने के बाद, हवन कर लिया जाए।
11वें दिन मंदिर जाना और गड़ी नारियल से पूर्णाहुति
11वें दिन दूसरी बार मंदिर में पूजा, और खीर या गुड़ भरे तथा लाल कपड़े में लपेटे छोटे गड़ी नारियल की पूर्णाहुति
11वें दिन, हवन और समर्पण-आरती के बाद, साधक फिर मंदिर जाकर हनुमान जी की पूरी पूजा करता है, और पूर्णाहुति करता है जिसमें "गड़ी" नारियल — काटकर, उसमें खीर या गुड़ भरकर, लाल कपड़े में लपेटकर पान के पत्ते पर रखकर — पूर्णाहुति मंत्र बोलते हुए अर्पित किया जाता है; गड़ी छोटी ही रखी जाती है क्योंकि हवन पात्र छोटा होता है।
हवन पूर्ण होने के बाद, समर्पण और आरती करने के पश्चात, साधक फिर मंदिर जाता है — चाहे उसने प्रतिदिन हवन किया हो या केवल अंतिम दिन, 11वें और अंतिम दिन सभी मंदिर जाते हैं, वह चाहे कोई भी वार पड़े, और वहाँ हनुमान जी की पूरी पूजा फिर से करते हैं। अंतिम दिन के हवन में नींबू बलि देने के बाद एक "गड़ी" नारियल — वही जिससे नारियल का तेल बनता है — लाया जाता है। उसे उस ओर से काटा जाता है जिधर से वह पेड़ की ओर लगा रहता है, और उसका ऊपरी मुख खोल दिया जाता है; उसके अंदर खीर या गुड़ भरा जाता है, फिर उसे लाल कपड़े में लपेटकर पान के पत्ते पर रखकर पूर्णाहुति मंत्र बोलते हुए पूर्णाहुति के रूप में अर्पित किया जाता है। वे बताते हैं कि गड़ी का गोला छोटा ही रखना चाहिए, क्योंकि हवन पात्र प्रायः छोटा होता है, ताकि वह जल्दी पूरा जल जाए और अधजला न बचे।
पहले दिन का नारियल प्रसाद रूप में फोड़ना और समापन का लड्डू अर्पण
पहले दिन रखा नारियल प्रसाद के रूप में फोड़ना जिसे कोई भी खा सकता है, और अंत में मंदिर में कम से कम सवा किलो लड्डू चढ़ाना
पहले दिन रखा हुआ नारियल अंतिम पूर्णाहुति के बाद फोड़ा जा सकता है और उसे प्रसाद के रूप में कोई भी खा सकता है, इसमें कोई रोक नहीं; और अंतिम दिन मंदिर में हनुमान जी को कम से कम सवा किलो लड्डू चढ़ाने चाहिए, जिनमें से कुछ घर लाए जाएँ और बाकी बाँट दिए जाएँ; इतना पूरा करने पर बजरंग बाण जागृत और सिद्ध हो जाता है।
सबसे पहले दिन रखा हुआ नारियल अंतिम पूर्णाहुति के बाद घर में ही फोड़कर सभी लोग प्रसाद के रूप में खा सकते हैं — वे विशेष रूप से कहते हैं कि इसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है, ऐसा नहीं कि यह नहीं खाएँगे या वह नहीं खाएँगे; हर कोई खा सकता है। या फिर उसे मंदिर में ले जाकर वहाँ चढ़ाकर बाद में घर में प्रसाद रूप में खाया जा सकता है। अंतिम दिन एक काम और शेष रहता है: मंदिर में यथाशक्ति, कम से कम सवा किलो लड्डू हनुमान जी को चढ़ाने चाहिए। उनमें से कुछ लड्डू घर लाए जाते हैं और बाकी पंडित जी को दे दिए जाते हैं कि वे सभी में बाँट दें, या साधक स्वयं वहाँ उपस्थित सभी लोगों में बाँट सकता है। वे कहते हैं कि इस प्रकार साधना पूर्ण करने पर उस साधक के लिए बजरंग बाण जागृत, सिद्ध और चैतन्यदेवता के प्रकट होने से पूर्व पढ़े गए विशेष स्तोत्रों के पाठ से जागृत होने वाली उनकी पूर्ण चैतन्य व सजीव उपस्थिति। हो जाता है।
बजरंग बाण से सरसों अभिमंत्रित करके बच्चे का रक्षण
सिद्ध बजरंग बाण से सरसों को अभिमंत्रित करके परेशान बच्चे का रक्षण कैसे किया जाता है?
हाथ में पीली सरसों लेकर साधक राम जी और हनुमान जी का आवाहन करता है, पूरा बजरंग बाण पढ़ते हुए प्रार्थना करता है कि यह सरसों जागृत और अभिमंत्रित हो जाए तथा नाम लिए गए बच्चे का रक्षण हो, फिर उस सरसों को बच्चे के ऊपर से उल्टा तीन या सात बार उतारकर घर से बाहर ले जाकर जला दिया जाता है।
प्रयोग के एक उदाहरण के रूप में — मान लीजिए घर में कोई छोटा बच्चा लगातार रो रहा है और लगता है कि उसे नज़र या कोई और बाधा लग गई है — साधक हाथ में पीली सरसों लेता है और पहले पूरा बजरंग बाण पढ़ता है, राम जी का नाम लेते हुए ("सीताराम, सीताराम") उनकी कृपा की प्रार्थना करता है। फिर हनुमान जी से कहता है कि मैं आपका बजरंग बाण का पाठ कर रहा हूँ, कृपया इसे जागृत करें, इस पूरी राई को अभिमंत्रित (अभिमंत्रण) करें, इसे पूर्ण चैतन्य करें; बच्चे का नाम लेकर प्रार्थना करता है कि उसके ऊपर जो भी बाधा है वह दूर हो और उसका रक्षण हो, तथा यह कार्य सिद्ध हो। इसके बाद एक बार और बजरंग बाण का पाठ किया जाता है, और वह सरसों बच्चे के ऊपर से उल्टा तीन बार या सात बार, जितनी इच्छा हो, उतारी जाती है, फिर घर से बाहर ले जाकर जला दी जाती है। वे जोड़ते हैं कि भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। को भी उसी तरीके से अभिमंत्रित किया जा सकता है — साधक उसे स्वयं भी लगा सकता है जिससे सदैव रक्षण होगा, या घर-परिवार में किसी और को भी दे सकता है।
बजरंग बाण से गाँठ लगे लाल धागे को अभिमंत्रित करना
कष्ट में पड़े बच्चे के लिए बजरंग बाण से रक्षा-धागा कैसे अभिमंत्रित किया जाता है?
लाल धागे में आठ से लेकर अठारह तक गाँठें लगाई जाती हैं — क्योंकि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता हैं — और जितनी गाँठें, उतनी बार बजरंग बाण का पाठ किया जाता है; कष्ट में पड़े बच्चे के लिए धागे को मंगलवार के दिन पहले कच्चे दूध, गोमूत्र और पञ्चामृत या गंगाजल से धोया जाता है, फिर आठ गाँठें लगाकर हर गाँठ पर राम जी का नाम लिया जाता है।
वे बताते हैं कि धागा कैसे अभिमंत्रित किया जाता है: कम से कम आठ गाँठें लगाई जाती हैं, क्योंकि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता हैं, और अधिकतम अठारह गाँठें तक लगाई जा सकती हैं; जितनी गाँठें लगाई जाएँगी, उतनी ही बार बजरंग बाण का पाठ करना होता है, हर गाँठ पर एक बार। उदाहरण के रूप में, यदि घर-परिवार में किसी बच्चे को कष्ट है — कोई बच्चा बाहर पढ़ाई कर रहा हो और उसे दिक्कत-परेशानी हो रही हो, या रात में कोई बच्चा डर रहा हो — तो लाल रंग का धागा लेकर मंगलवार के दिन उसे पहले कच्चे दूध से धोया जाता है, फिर गोमूत्र (गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है।) से, और फिर पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से, अन्यथा गंगाजल से। इसके बाद उसमें आठ गाँठें लगाई जाती हैं, और हर गाँठ को पकड़कर राम जी का नाम लेते हुए हर गाँठ पर एक बार बजरंग बाण का पाठ किया जाता है — आठ गाँठ के लिए कुल आठ पाठ।
अभिमंत्रित धागा बाँधना और सिद्ध बजरंग बाण के आगे के प्रयोग
धागा बाँधने से पहले धूप, दीप और कपूर की आरती, तथा सिद्ध बजरंग बाण से खुलने वाले व्यापक प्रयोग
पाठ पूर्ण होने के बाद हनुमान जी को धूप और कपूर-लौंग की आरती दिखाकर प्रार्थना की जाती है, फिर वह धागा उस व्यक्ति को बाँधा जाता है जिसका रक्षण करना है; वक्ता कहते हैं कि सिद्ध हो जाने पर बजरंग बाण के अनंत प्रयोग हैं, जिनमें गोमूत्र और गंगाजल मिले जल को अभिमंत्रित करके घर की बाधा दूर करना, और यहाँ तक कि अभिचार करने वाले शत्रु को स्तंभित करके उसकी विद्या बाँधना भी सम्मिलित है — यद्यपि ऐसे गहरे प्रयोगों के लिए साधक का मनोबल वास्तव में सक्षम होना चाहिए।
गाँठ-दर-गाँठ पाठ पूर्ण हो जाने के बाद वह धागा हनुमान जी के पास रखा जाता है; धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और दीप दिखाए जाते हैं, एक कपूर के ऊपर दो लौंग जलाकर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। दी जाती है, और हनुमान जी से प्रार्थना करके वह धागा उस व्यक्ति को बाँध दिया जाता है जिसका रक्षण करना है — इसके बाद, वे कहते हैं, उस व्यक्ति का पूर्ण रूप से रक्षण हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि इस प्रकार बजरंग बाण के सिद्ध हो जाने पर उसका अनंत तरीकों से प्रयोग किया जा सकता है। घर में बाधा हो तो शाम के समय बजरंग बाण का पाठ करते हुए जल को अभिमंत्रित किया जाता है, उसमें थोड़ा गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। और गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। डाला जाता है, और फिर वह जल पूरे घर में छिड़का जाता है। वे यह भी कहते हैं कि सिद्ध हो जाने पर केवल बजरंग बाण के द्वारा अभिचार कर्म कर रहे शत्रु को स्तंभित किया जा सकता है और उसकी विद्या को बाँधा जा सकता है। वे कहते हैं कि जिन्हें यह ज्ञात हो कि कौन सा शत्रु अभिचार कर्म कर रहा है, उनके लिए एक अलग विधि है जो माँग होने पर वे बताएँगे। वे जोड़ते हैं कि हर विद्या के बहुत सारे प्रयोग हैं और जो चाहे वह उन्हें आराम से कर सकता है — किंतु उसे मजबूत होना होगा, मनोबल को उतना सक्षम बनाना होगा, तभी बहुत सारी चीजें संभव होंगी।
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