स्त्री साधना कैसे आरंभ करे — अविवाहित, नवविवाहित, संतानहीन और माँ के लिए नियम, और दीक्षा कैसे लें
तंत्र साधना में प्रवेश करने वाली स्त्री के लिए वक्ता द्वारा बताए गए चरण-दर-चरण नियम — अविवाहित कन्या, नवविवाहिता, संतानहीन पत्नी और माँ के रूप में — तथा हर स्थिति में दीक्षा कैसे लें।
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एक स्त्री यह कैसे तय करे कि साधना किस शक्ति से आरंभ करे?
कुंडली, मन का झुकाव और नियम निभा पाने की क्षमता
वक्ता कहते हैं कि साधना में उतरने का निर्णय लेने वाली स्त्री पहले यह देखती है कि किन शक्तियों से आरंभ करना है, और इंटरनेट से पता चलता है कि साधना घर की शक्तियों, कुल पितृ और कुल शक्ति से आरंभ होती है। पर उससे भी पहले, वे कहते हैं, उसे अपनी जन्म कुंडली से देख लेना चाहिए कि किस क्षेत्र में साधना उसके लिए फलीभूत होगी, जो पुरुष और स्त्री दोनों पर लागू है, और उसका मन किधर लगता है: किस प्रकार की साधना में, किस देवता के स्वरूप में, और भगवती का कौन सा स्वरूप उसे सबसे अधिक आकर्षित करता है। वे कहते हैं कि यह सब पहले तय करना चाहिए क्योंकि शक्ति का जो भी स्वरूप पकड़ेंगी उसे लंबे समय तक लेकर चलना होगा, और यह भी देख लेना चाहिए कि उस शक्ति के नियम मान सकेंगी या नहीं और किस क्रम से चलेंगी। पूरी जानकारी के बिना, वे जोड़ते हैं, सेवा, पूजा और एक सीमा तक साधना की जा सकती है।
वक्ता उस अविवाहित स्त्री से आरंभ करते हैं जिसका भविष्य में विवाह होना है। जब वह साधना मार्ग पर चलना आरंभ करती है, वे कहते हैं, तो पहले यह देखती है कि किन शक्तियों से उपासना आरंभ करनी है। आजकल लोग इंटरनेट और YouTube पर सर्च करते हैं और वहीं से पता चलता है कि साधना का आरंभ घर की शक्तियों से, कुल पितरों से, कुल की शक्तियों से होता है। पर उससे भी पहले, वे कहते हैं, अपनी जन्म कुंडली के अनुसार देख लेना चाहिए कि किस क्षेत्र में साधना करेंगी तो वह फलीभूत होगी। यह पुरुष और स्त्री दोनों के लिए है। साथ ही: मन किधर लगता है, किस प्रकार की साधना में, किस देवता के स्वरूप में, और भगवती के स्वरूप में हो तो भगवती का कौन सा स्वरूप मुख्य रूप से आकर्षित करता है। इन सभी विषयों पर, वे कहते हैं, पहले निर्णय ले लेना चाहिए। कारण यह है कि किसी एक शक्ति के स्वरूप को पकड़ना है तो लंबे समय तक लेकर चलना होगा। उनके नियम मान सकेंगी या नहीं, यह भी पहले देख लेना चाहिए, और किस क्रम से चलने वाली हैं। सारी जानकारी लिए बिना, वे कहते हैं, उनकी सेवा कर सकती हैं, पूजा कर सकती हैं, एक सीमा तक साधना कर सकती हैं।
अविवाहित कन्या अपने कुल के पितरों और कुल शक्ति की पूजा अपने हाथों से क्यों न करे
कुल शक्ति एक बार, एक के द्वारा पूजित होती है; कन्या दूसरे घर के लिए सुरक्षित रखी जाती है
वक्ता कहते हैं कि अविवाहित कन्या को अपने मातृकुल के पितृ और कुल शक्ति की पूजा कभी अपने हाथों से नहीं करनी चाहिए। वे बिना नकारात्मकता के समझाते हैं: मातृशक्ति इसलिए कही गई क्योंकि उसमें नया जीवन देने की क्षमता है, और कन्या का पिता इतना बड़ा त्याग करता है कि अपनी पुत्री दूसरे वंश को उनके कुल की वृद्धि के लिए दान कर देता है; कुल शक्ति एक ही बार, किसी एक के द्वारा पूजित होती है, और कन्या ससुराल जाने वाली है, जहाँ की शक्तियाँ उसे पूजित करनी हैं। अगर वह पहले अपने कुल की शक्तियों और पितरों की पूजा कर लेगी तो, तंत्र क्षेत्र के नियम से, बहुत लोगों के घरों में कुल शक्तियों में जो अनेक चीज़ें समाविष्ट हो गई हैं वे उसके साथ चलने लगती हैं, जो नहीं होना चाहिए; वे कहते हैं कि आज यह इसलिए लग रहा है कि लोग ध्यान नहीं देते, पहले ऐसी चीज़ें क्लासिफाइड थीं। उसके साथ कुछ गलत नहीं होता, वे कहते हैं, पर जिस घर में वह जाएगी उन्हें परेशानी होगी, क्योंकि वहाँ की शक्तियाँ उसके साथ समाविष्ट नहीं हो सकेंगी।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि अविवाहित कन्या को कभी भी, विशेष रूप से, अपने कुल के पितरों की, यानी मातृकुल के पितरों की, और मातृकुल की कुल शक्ति की पूजा अपने हाथों से नहीं करनी चाहिए। यहाँ नकारात्मक होने की ज़रूरत नहीं, वे कहते हैं; बहुत लोग पूछते हैं कि स्त्री है तो क्यों नहीं कर सकती, कन्या अपने घर की शक्तियों की सेवा-पूजा क्यों नहीं कर सकती। इसलिए नहीं कर सकती, वे कहते हैं, क्योंकि संपूर्ण विश्व में, संपूर्ण ब्रह्मांड में मातृशक्ति को मातृशक्ति इसलिए कहा गया कि उसके भीतर नया जीवन देने की क्षमता है। और इसीलिए कुँवारी कन्या के पिता में यह सामर्थ्य होता है कि वह अपनी पुत्री को अन्य लोगों को, अन्य व्यक्ति को, उनके वंश की वृद्धि के लिए दान करता है; तब जाकर दूसरे के कुल की वृद्धि होती है। इतना बड़ा त्याग कन्या का पिता करता है। अगर उस कन्या के हाथ से अपने ही कुल की शक्तियों का पूजन हो गया तो एक बात ध्यान रखें: कुल शक्ति कभी भी एक ही बार, किसी एक के द्वारा पूजित होती है। इसलिए मना किया जाता है, क्योंकि कन्या दूसरे घर जाने वाली है; मातृकुल छोड़कर ससुराल पक्ष में जाएगी, और वहाँ की शक्तियाँ उसे पूजित करनी हैं। अगर वह यहाँ की शक्तियों और कुल पितरों की पूजा कर लेगी तो, तंत्र साधना की भाषा में, तंत्र क्षेत्र के नियम के अनुसार, बहुत लोगों के घरों में कुल शक्तियों में बहुत सी ऐसी चीज़ें समाविष्ट हो चुकी होती हैं जो उसके साथ रहने और चलने लगती हैं, जो नहीं होना चाहिए। यह सब आज के समय भी है, वे कहते हैं; पहले ऐसा नहीं था, बहुत सी चीज़ें क्लासिफाइड थीं, और अब ये चीज़ें इसलिए लग जाती हैं कि लोग ध्यान नहीं देते। वे कहते हैं कि इस विषय पर पहले थोड़ा बोल चुके हैं, आज विस्तार से कह रहे हैं। कारण, वे कहते हैं, उसी के लिए है: जिस घर की वृद्धि करने वह जाएगी, जहाँ वह लक्ष्मी बनेगी, उनके लिए उसे सुरक्षित रखा जा रहा है। यहाँ पूजा करेगी तो उसके साथ कुछ गलत नहीं होगा; पर जिस घर में वह जाएगी उन्हें परेशानी होगी, क्योंकि वहाँ की शक्तियाँ उसके साथ समाविष्ट नहीं हो सकेंगी। वे श्रोताओं से इसे समझने का प्रयास करने को कहते हैं।
अविवाहित कन्या स्वयं पूजा किए बिना अपनी कुल शक्ति का आशीर्वाद कैसे पाए
पिता या भाई उसके नाम से पूजा करें; वह एक दीपक जला सकती है
वक्ता कहते हैं कि अविवाहित कन्या जब साधना आरंभ करना चाहे तो उसके पिता उसके लिए प्रार्थना और कुल शक्ति का पूजन करें और वह हाथ जोड़कर बैठे और प्रार्थना करे; अगर उसे पता हो कि कुल की शक्तियाँ कौन हैं तो वह उनके लिए एक दीपक जला सकती है, पर पूरी पूजन व्यवस्था नहीं करनी चाहिए। कहीं-कहीं, वे कहते हैं, जहाँ कुल देवता पूजित होते हैं वहाँ अविवाहित कन्याओं का प्रवेश ही वर्जित होता है। क्योंकि तंत्र में कन्या की ऊर्जा बहुत महत्वपूर्ण है, और विशेषकर कौल मार्ग में उसे साक्षात शक्ति का स्वरूप मानकर पूजा जाता है, वह अपने पिता, बड़े भाई या छोटे भाई से कुल शक्ति के स्थान पर जो पूजा चाहे करवाए, फूल और चढ़ाने की चीज़ें उनके हाथ में दे, और वे उसके नाम से करें, शक्तियों से कहें कि हमारे कुल-वंश की बेटी साधना करना चाहती है, उसे सुरक्षा और आशीर्वाद दें। उसे अपने हाथ से भोग नहीं लगाना और पूजा नहीं करनी, विशेषकर जहाँ चौका या थान बना हो और कुलदेवी जागृत हों।
तो उस स्थिति में क्या करें, वक्ता पूछते हैं। जब आरंभ करना हो तो पिताजी उसके लिए प्रार्थना करेंगे, पूजन करेंगे। वह सिर्फ हाथ जोड़कर वहाँ बैठेगी; प्रार्थना-पूजा ज़रूर करे। अगर सिर्फ इतना पता हो कि हाँ, ये हमारी कुल की शक्तियाँ हैं, तो उनके लिए एक दीपक बिल्कुल जला सकती है, पर पूरी की पूरी पूजन व्यवस्था तो करनी ही नहीं चाहिए। कहीं-कहीं, वे कहते हैं, इतना तक होता है कि जहाँ कुल के देवता पूजित होते हैं वहाँ अविवाहित कन्याओं का प्रवेश ही वर्जित कर दिया जाता है। कारण उसी के लिए है: जिस दूसरे घर की वृद्धि वह करेगी, जहाँ वह लक्ष्मी बनेगी, उनके लिए उसे सुरक्षित रखा जा रहा है। इसीलिए, वे कहते हैं, अविवाहित कन्या की ऊर्जा तंत्र मार्ग में बहुत महत्वपूर्ण होती है; खासकर कौल मार्ग में अविवाहित कन्या को बहुत ऊँचा दर्जा देकर साक्षात शक्ति का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। तो ध्यान रखें: नहीं करना है। हाँ, वह अपने पिताजी, बड़े भाई या छोटे भाई के द्वारा स्वयं के लिए जो भी पूजन चाहे करवा सकती है। कुल शक्तियों का स्थान-थान सजवाना चाहे तो अपने हाथ से चीज़ें दे: ये फूल लीजिए, सजा दीजिए, यह चढ़ा दीजिए, यह कर दीजिए। वे उसके नाम से वहाँ कर देंगे कि हाँ, यह हमारे कुल-वंश की बेटी है, हमारी बहन है, इन्हें सुरक्षा दें, ये साधना करना चाहती हैं, इन्हें आशीर्वाद दें। वह होगा। पर अपने हाथ से जाकर भोग नहीं लगाना, अपने हाथ से जाकर पूजा नहीं करनी। जहाँ चौका बना हो, थान-स्थान बना हो, कुलदेवी जागृत हों, वहाँ विशेष रूप से इन बातों का ध्यान रखना है।
अविवाहित कन्या कुल पितरों के निमित्त कोई कार्य नहीं करती, अग्यारी भी नहीं
भाई या पिता करें; विवाह के बाद बात अलग हो जाती है
वक्ता कहते हैं कि अविवाहित कन्या को कुल पितृ के निमित्त कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। कुल पितरों के लिए जो भी करना है वह भाई या पिताजी करेंगे, उसी प्रक्रिया से और जो भी विधि-विधान परिवार करता है, और विशेषकर अग्यारी करने की विधि कन्या को कभी नहीं करनी चाहिए। विवाह के बाद, वे कहते हैं, अगर कोई और नहीं कर रहा तो बात अलग हो जाती है, हालाँकि तब भी पितरों के निमित्त उसे करना ही नहीं चाहिए।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, कुल पितरों का पूजन: अविवाहित कन्या को कुल पितरों के निमित्त कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। कुल पितरों के निमित्त जो भी करना है वह भाई करेंगे या पिताजी करेंगे। वहाँ भी वही प्रक्रिया होगी, जो भी विधि-विधान परिवार करता है। और अग्यारी करने की जो विधि है, वह कन्याओं को कभी नहीं करनी चाहिए। वह नहीं कर सकती, वे कहते हैं, खासकर अविवाहित हो तो। विवाह होने के बाद बात अलग हो जाती है, अगर कोई और नहीं कर रहा हो; हालाँकि तब भी, वे जोड़ते हैं, पितरों के निमित्त उसे करना ही नहीं चाहिए। इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
नवविवाहिता के लिए साधना नियम: एक वर्ष तक तामसिक और उग्र साधना, बलि और खप्पर वर्जित, तब तक पौराणिक उपासना
पहले जप, स्तोत्र और स्तुति; तंत्रोक्त मार्ग बाद में
वक्ता कहते हैं कि नवविवाहिता को एक वर्ष तक भूलकर भी किसी प्रकार की तामसिक साधना नहीं करनी है; गृहस्थ आश्रम में हो तो स्त्री को तामसिक साधना करनी ही नहीं चाहिए, वे जोड़ते हैं। किसी उग्र शक्ति का सात्विक रूप से पूजन भी कम से कम एक वर्ष नहीं करना चाहिए: पूजा और सेवा हाँ, साधना नहीं। क्योंकि तंत्र साधना में बलि देनी होगी, चाहे नींबू या नारियल की, और शक्ति साधना पूरी तरह करने पर खप्पर चढ़ाना पड़ेगा, यह सब पहले वर्ष वर्जित है; गृहस्थी में है तो गृहस्थी के नियम का पालन करे। अगर उसी वर्ष में आरंभ करना चाहे तो वे कहते हैं कि अपनी चुनी शक्ति की तंत्रोक्त नहीं, पौराणिक साधना करे: उनके मंत्रों का यथाशक्ति जप, शतनाम का पाठ, किसी स्तोत्र का गायन, स्तुति, उन्हें प्रसन्न करना, और उसके बाद ही तंत्रोक्त मार्ग पर आगे बढ़े।
विवाहित स्त्री के लिए, वक्ता कहते हैं, तीन कंडीशन हैं: नवविवाहिता, पुत्रवती, और जिसे अभी संतान की प्राप्ति नहीं हुई। पहले नवविवाहिता। अगर आप नवविवाहिता हैं, वे कहते हैं, तो ध्यान रखें कि एक वर्ष तक कभी भी भूलकर भी किसी प्रकार की तामसिक साधना नहीं करनी है। गृहस्थ आश्रम में हो तो स्त्री को तामसिक साधना करनी ही नहीं चाहिए, वे जोड़ते हैं। दूसरा: सात्विक रूप से भी किसी उग्र शक्ति का पूजन करने जा रही हैं, नवविवाहिता हैं, तो भी वे कहेंगे कि कम से कम एक वर्ष तक उग्र शक्तियों की पूजा-साधना नहीं करनी चाहिए; पूजा कर सकती हैं, सेवा कर सकती हैं, साधना नहीं। तीसरा, बलि विधान: क्योंकि तंत्र साधना करना चाहेंगी तो वहाँ बलि देनी होगी, चाहे नींबू की हो या नारियल की, और वह सब विधान करना होगा, इसलिए एक वर्ष तक वह नहीं करना है। नया-नया विवाह हुआ है; एक वर्ष यह न करें। गृहस्थी में हैं तो गृहस्थी के नियम का पालन करें। इसके बाद खप्पर: शक्ति की साधना कर रही हैं तो वहाँ खप्पर चढ़ता है, और पूरी तरह करेंगी तो वह भी चढ़ाना पड़ेगा। ये सब चीज़ें नवविवाहित स्थिति में एक वर्ष तक नहीं करनी चाहिए। तो इतने समय क्या करें? अगर एक वर्ष नहीं हुआ और इसी समय साधना आरंभ करना चाहती हैं, तो जिस भी शक्ति की सेवा-पूजा करनी चाहें उनकी तंत्रोक्त साधना न करके शुरू में पौराणिक साधना करें: उनके मंत्रों का यथाशक्ति जप करें, शतनाम का पाठ करें, उनके किसी स्तोत्र का गायन करें, उन्हें प्रसन्न करें, स्तुति करें। पहले यह करें, वे कहते हैं, उसके बाद तंत्रोक्त मार्ग पर आगे बढ़ें।
जिस विवाहिता को अभी संतान नहीं हुई, वह साधना कहाँ से आरंभ करे
कम से कम एक वर्ष ससुराल की कुल शक्ति; पितृ कार्य पति के हाथ से
जिस विवाहिता को अभी संतान नहीं हुई और आगे की योजना है, उसके लिए वक्ता कहते हैं कि उसकी पहली साधना उसी कुल की सेवा-पूजा होनी चाहिए जिसमें विवाह हुआ है: वहाँ की कुल शक्ति, कुल देवता, कुलदेवी और कुल भैरव, क्रम अनुसार पूजन। पितृ के निमित्त कार्य वह पति के हाथ से, ससुर जी के हाथ से, या जो भी वहाँ सेवा-पूजा करता हो उसके हाथ से करवाए; पति करेंगे तो उसे स्वतः प्राप्ति होगी, बोलने की भी ज़रूरत नहीं। वह स्वयं कुलदेवी, कुल देवता और कुल भैरव की सेवा-पूजा की विधि से आरंभ करे और, वे कहते हैं, कम से कम एक वर्ष यह करे, क्योंकि वहाँ की कृपा प्राप्ति उसके लिए सबसे आवश्यक है।
अब दूसरी स्थिति, वक्ता कहते हैं: विवाह हो चुका है और अभी पुत्र या पुत्री की प्राप्ति नहीं हुई; फैमिली प्लानिंग है कि कुछ समय बाद संतान होगी। ऐसी स्थिति में जब भी साधना आरंभ करेंगी, पहली साधना इसी हेतु होनी चाहिए। वहाँ कुल पितरों की साधना-सेवा कर सकती हैं, वे कहते हैं, और कुल शक्ति की पूजा; वहीं से सही तरीके से आरंभ करें। जिस कुल में विवाह हुआ है, वहाँ की जो कुल शक्ति हैं, कुल देवता हैं, कुल देवी हैं, कुल के भैरव हैं: क्रम अनुसार उनका पूजन करें। पितरों के निमित्त जो पति के हाथ से, ससुर जी के हाथ से, या जो भी वहाँ सेवा-पूजा करता हो उसके हाथ से होता है, वह आपके लिए स्वतः हो जाता है; बोलने की भी ज़रूरत नहीं। पति करेंगे तो स्वतः प्राप्ति हो जाएगी। उनके हाथ से करवा दें, और स्वयं कुलदेवी, कुल देवता और अपने कुल के भैरव की सेवा-पूजा की विधि से आरंभ करें। यह, वे कहते हैं, कम से कम एक वर्ष तो करना ही चाहिए। वहाँ की कृपा प्राप्ति आपके लिए सबसे आवश्यक है।
सावधानी: जहाँ मसानिक शक्तियाँ पूजित हों, संतानहीन पत्नी स्वप्न में दिया जाने वाला कोई वचन न ले
वचन लेने से कोख बंधित हो जाती है
खुलकर बोलते हुए वक्ता कहते हैं कि किसी-किसी के घर में मसान शक्तियाँ पूजित होती हैं। जिस विवाहिता को अभी संतान नहीं हुई, उसे तब ध्यान रखना है कि स्वप्न के माध्यम से या किसी भी माध्यम से कोई वचन देने का प्रयास हो रहा हो तो वह उसे न ले। नहीं तो, वे कहते हैं, गर्भ बंधन स्वतः हो जाएगा: कोख बंधित हो जाएगी, और संतान होने से पहले ही कोई ऐसा लाग लग जाएगा कि संतान की प्राप्ति होगी ही नहीं।
वहाँ, वक्ता कहते हैं, एक बात और ध्यान रखनी है, और वे कहते हैं कि खुलकर बोल रहे हैं: किसी-किसी के घर में किसी प्रकार की मसानिक शक्तियाँ पूजित होती हैं। उस स्थिति में जिस विवाहिता को अभी संतान नहीं हुई, उसे ध्यान रखना है कि स्वप्न के माध्यम से या किसी भी माध्यम से कोई वचन देने का प्रयास किया जा रहा हो तो वह उसे न ले। नहीं तो क्या होगा, वे कहते हैं, गर्भ बंधन स्वतः हो जाएगा। कोख बंधित हो जाएगी; संतान की प्राप्ति अभी हुई नहीं है, और कुछ न कुछ ऐसा लाग लग जाएगा कि संतान की प्राप्ति होगी ही नहीं।
जिस पत्नी को अभी संतान नहीं हुई, उसके लिए श्मशानिक साधना, धार पूजन और चौराहा पूजन वर्जित
सात्विक रूप में भी नहीं, किसी के मार्गदर्शन में भी नहीं
वक्ता कहते हैं कि जिस विवाहिता को अभी संतान नहीं हुई, उसे कोई श्मशानिक साधना नहीं करनी चाहिए, सात्विक रूप से भी नहीं, ऐसी भी नहीं जिसमें थोड़ा सा प्रावधान हो कि श्मशान में यह चीज़ डालनी है, क्योंकि उसे इन चीज़ों की सही जानकारी नहीं है; कहीं पढ़-सुनकर या किसी के मार्गदर्शन में भी कर रही हो तो भी वे मना करेंगे। वे स्पष्ट करते हैं कि यह वहाँ लागू है जहाँ उसमें या पति में कोई कमी नहीं और संतान की योजना बस दो-चार साल बाद की है। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, श्मशानिक या मसान साधना, कोई धार पूजन, घर के बाहर जो करना हो, और चौक-चौराहा का पूजन, ये सब बिल्कुल न करें, क्योंकि कुछ गड़बड़ हुई तो जीवन भर परेशान होकर रह जाएँगी।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, श्मशानिक साधना। सात्विक रूप से भी करना चाहें, कोई ऐसी साधना जिसमें थोड़ा-बहुत प्रावधान हो कि श्मशान में यह चीज़ डालनी है, ऐसा करना है, और अभी संतान की प्राप्ति नहीं हुई है, तो कृपा करके वे सब चीज़ें न करें। कारण यह है कि आपको इन चीज़ों की जानकारी सही तरीके से नहीं है; कहीं पढ़-सुनकर या किसी के मार्गदर्शन में भी कर रही हों तो भी वे कहते हैं कि मना करेंगे। एक बात वे स्पष्ट करते हैं: यह उस स्थिति के लिए है जहाँ संतान अभी नहीं हुई और आपमें या आपके पति में कोई कमी नहीं है, बस अभी प्राप्ति नहीं हुई क्योंकि योजना है कि दो-चार साल बाद वंश की वृद्धि करेंगे। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, कभी भी श्मशानिक साधना, मसानिक साधना, कोई धार पूजन, घर के बाहर जो करना हो, चौक-चौराहे का पूजन; यह सब बिल्कुल न करें। ध्यान रखें, नहीं तो कुछ भी गड़बड़ हुई तो जीवन भर के लिए परेशान होकर रह जाएँगी।
उग्र तंत्रोक्त साधना से पहले एक माँ को क्या करना चाहिए
पहले बच्चा दूध छोड़े, फिर संतान, घर और पति की लंबी सुरक्षात्मक साधना
जिस विवाहिता को पुत्र या पुत्री हो चुकी है और जो पूरी तरह तंत्रोक्त मार्ग में किसी ऐसी उग्र शक्ति की साधना में जा रही है जिसमें चौक-चौराहा का पूजन करना है, उसके लिए वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह है कि उसका बच्चा इतना बड़ा हो कि माँ का दूध न पी रहा हो। दूसरी, तंत्रोक्त साधना में बढ़ने से पहले वह लंबे समय तक सुरक्षात्मक साधनाएँ करे: संतान की सुरक्षा हेतु कवच का निर्माण, घर की सुरक्षा हेतु घर का बंधन, और पति की सुरक्षा। उनकी सुरक्षा आवश्यक है, वे कहते हैं; उसके बाद ही ऐसी तंत्रोक्त साधनाएँ या पूजन करे।
तीसरी स्थिति, वक्ता कहते हैं: विवाहिता हैं और पुत्र या पुत्री की प्राप्ति हो चुकी है; वंश की वृद्धि हो चुकी है। ऐसी स्थिति में अगर किसी प्रकार की उग्र शक्ति की साधना करने जा रही हैं जिसमें चौक-चौराहे का पूजन इत्यादि करना है, पूरी तरह तंत्रोक्त मार्ग में जा रही हैं, तो सबसे पहले ध्यान रखना है कि पुत्र या पुत्री इतनी बड़ी हो कि वह स्तनपान न कर रही हो; बच्चा माँ का दूध न पी रहा हो। यह सबसे पहली बात। बच्चा इतना बड़ा हो गया हो। दूसरी बात, वे कहते हैं, जब तंत्रोक्त साधना में बढ़ रही हैं तो सबसे पहले सुरक्षात्मक साधनाएँ, वे सब, लंबे समय तक करें: संतान की सुरक्षा हेतु कवच का निर्माण, घर की सुरक्षा हेतु घर का बंधन, और पति की सुरक्षा भी। उनकी सुरक्षा आवश्यक है। पहले वह करेंगी, उसके पश्चात ही इस प्रकार की तंत्रोक्त साधनाओं या पूजन को करेंगी।
विवाह की इच्छा रखने वाली अविवाहित स्त्री दीक्षा का मार्ग कैसे चुने
अघोर या उग्र दीक्षा ली तो उसी मार्ग का जीवनसाथी खोजना होगा
वक्ता कहते हैं कि जिस अविवाहित स्त्री का भविष्य में विवाह होना है, वह दीक्षा सोच-समझकर चुने, क्योंकि उसे पता नहीं कि विवाह कहाँ होगा और जिस पंथ और गुरु परंपरा में गई है उसका विधि-निषेध विवाह के बाद न निभा पाई तो पूरी परेशानी होगी। आज बहुत लोग अविवाहित अवस्था में अघोर दीक्षा ले लेते हैं; ठीक है, वे कहते हैं, पर फिर ऐसा जीवनसाथी खोजना होगा जो कम से कम उस परंपरा का हो या उसकी जानकारी रखता हो। अघोर पंथ या उसी प्रकार की उग्र परंपरा में दीक्षित हो, सात्विक की बजाय तामसिक-उग्र साधना की ओर हो, और विवाह ऐसे व्यक्ति से हो जो ये सब सुनकर ही डर जाए, तो वह रात को ही भाग जाएगा। बहुत सी चीज़ें उसके शरीर पर प्रभाव डालेंगी, वे कहते हैं, और कुँवारेपन में की गई ऐसी साधनाओं का विवाह के बाद सबसे अधिक प्रभाव स्त्री पर पड़ता है, इसलिए दीक्षा का मार्ग ऐसा चुने कि विवाह के बाद परेशानी न हो।
वक्ता दीक्षा पर आते हैं, जिसे वे कहते हैं कि शुरू में ही उठाना चाहिए था। अविवाहित हैं और दीक्षा लेने जा रही हैं, तो वे स्पष्ट कहना चाहते हैं: भविष्य में विवाह करना है तो ध्यान रखें कि जो दीक्षा ले रही हैं, जिस भी पंथ से, जिस भी मार्ग से, जिस भी गुरु परंपरा में, आपको पता नहीं कि विवाह कहाँ होने वाला है, तो आपके साथ दिक्कत-परेशानी हो सकती है। क्योंकि जिस गुरु परंपरा में गई हैं वहाँ का विधि-विधान, विधि-निषेध विवाह के बाद न निभा पाईं तो पूरी परेशानी होगी। इसलिए यह पहले सोचना है। जैसे, वे कहते हैं, बहुत सारे लोग आज के समय कुँवारेपन में अघोर मार्ग में दीक्षित हो जाते हैं; यह सब अब बहुत चलता है। ठीक है, जाइए, दीक्षित होइए, कोई दिक्कत नहीं। पर फिर उसी अनुसार अपने लिए ऐसे जीवनसाथी की तलाश करनी होगी जो कम से कम उस परंपरा, उस मार्ग का हो, या उसकी जानकारी रखता हो, ताकि कोई दिक्कत न हो। नहीं तो, अगर अघोर पंथ में या उसी प्रकार की किसी उग्र परंपरा में दीक्षित हो गई हैं, सात्विक साधनाएँ न करके तमस की ओर हैं कि हम तामसिक साधना करेंगे, उग्र साधना करेंगे, और विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से हो जो ये सब सुनकर ही डर जाए, तो वह रात को ही भाग जाएगा। बहुत सी चीज़ें हैं, वे कहते हैं, जो आपके शरीर पर प्रभाव डालेंगी। विवाह के बाद स्त्री पर ही इन सब चीज़ों का सबसे अधिक प्रभाव होता है, अगर कुँवारेपन में कोई ऐसी साधना कर ली हो। इसलिए अविवाहित कन्या को विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि किस मार्ग से दीक्षित होना है ताकि विवाह के बाद भी कोई परेशानी न हो; यह चयन सही तरीके से करना चाहिए।
क्या विवाहित स्त्री बिना पति के अकेले दीक्षा ले सकती है?
गुरु दीक्षा दोनों को एक ही गुरु से; मंत्र दीक्षा उसे अकेले भी दी जा सकती है
वक्ता कहते हैं कि विवाहित स्त्री को कभी अकेले दीक्षा नहीं लेनी चाहिए, मार्ग कोई भी हो; तंत्र मार्ग में विवाहित स्त्री को बिना पति के दीक्षा लेनी ही नहीं चाहिए। पति की बात अलग हो सकती है: पत्नी साथ नहीं दे रही या नहीं ले सकती, और वह वीर मार्ग में जा रहा है, तो वह पहले अकेले दीक्षा लेकर साधना कर सकता है। पर स्त्री साधिका के लिए गुरु दीक्षा दोनों को एक साथ, एक ही गुरु से होनी चाहिए; साधना के मंत्र जो गुरु बाद में दीक्षा रूप में देते हैं वे उसे अकेले दें तो कोई दोष नहीं, पर दोनों की एक ही दीक्षा एक ही गुरु से होना अति आवश्यक है। वे जोड़ते हैं कि उग्र या तामसिक दीक्षा ले रही है और अभी पुत्रवती नहीं है, तो उस अवस्था के लिए बताए सारे नियम लागू रहेंगे।
विवाहित हैं और दीक्षा ले रही हैं, वक्ता कहते हैं, तो कभी भी अकेले दीक्षा नहीं लेनी चाहिए, मार्ग चाहे कोई भी हो। तंत्र मार्ग में विवाहित स्त्री को कभी भी बिना पति के दीक्षा लेनी ही नहीं चाहिए। पति की बात, वे कहते हैं, अलग हो सकती है: पत्नी साथ नहीं दे रही या नहीं ले सकती, और वह वीर मार्ग में जा रहा है, तो वह पहले अकेले दीक्षा लेकर साधना करता है; वह अलग बात है। पर अगर आप स्त्री साधिका हैं और दीक्षा लेने जा रही हैं, तो कभी अकेले दीक्षा नहीं लेनी है। दीक्षा दोनों को एक साथ होगी; गुरु दीक्षा दोनों को एक साथ होगी। साधना के मंत्र इत्यादि जो गुरु जी को दीक्षा स्वरूप में फिर से देने हैं, वे आपको अकेले दें तो उसमें कोई दोष नहीं। पर दोनों की एक ही दीक्षा एक ही गुरु से होना अति आवश्यक है। यह दीक्षा, वे कहते हैं, आप कभी अकेले नहीं ले सकतीं। उसके बाद भी, वे जोड़ते हैं, ध्यान रखें कि किसी प्रकार की उग्र या तामसिक दीक्षा ले रही हैं और अभी पुत्रवती नहीं हैं, तो उस अवस्था के लिए जो पहले बताया वह सब ध्यान रखना होगा। ये सब चीज़ें, वे कहते हैं, बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।