सप्तशती के चार स्तोत्र जिनके लिए दीक्षा आवश्यक नहीं
दुर्गा सप्तशती के चार स्तोत्रों के प्रयोग पर नोट्स।
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पूर्ण पाठ के विकल्प के रूप में दुर्गा सप्तशती के भीतर की चार स्तुतियाँ
नए और समय-कम लोगों के लिए, पूर्ण पाठ करने वालों के लिए नहीं
वक्ता बिल्कुल नए साधक-साधिकाओं से बात करते हैं जो दुर्गा सप्तशती की ओर आकर्षित हैं और इस नवरात्रि में पाठ करना चाहते हैं पर समय की कमी या संस्कृत उच्चारण न आने से पूर्ण पाठ नहीं कर पा रहे। वे कहते हैं कि सप्तशती के भीतर की चार स्तुतियों में नवदुर्गा, दसों महाविद्या, अष्टमातृका और 64 योगिनी की उपस्थिति बन जाती है, इसलिए वे 700 मंत्रों का अर्क, निचोड़ हैं, और इनका पाठ करने से भगवती की विशेष कृपा और सप्तशती पाठ का फल मिल जाता है। वे स्पष्ट हैं कि यह नए लोगों और समय न रखने वालों के लिए है — नवरात्रि खाली नहीं जानी चाहिए, और पढ़ना जानने वाले स्कूली बच्चों से भी यह करवाना चाहिए — जो पूर्ण पाठ करते हैं वे इसे छोड़कर यह न करें।
वक्ता कहते हैं कि यह वीडियो बिल्कुल नए साधक-साधिकाओं के लिए है जो अभी चलना शुरू किए हैं — जो वीडियो या किसी और को सुनकर दुर्गा सप्तशती की ओर आकर्षित हुए हैं और इस नवरात्रि में पाठ करना चाहते हैं, पर सीधे पाठ की संभावना नहीं दिख रही, चाहे समय की कमी से या संस्कृत उच्चारण न आने से। अगर सीख रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है; पहली बार में नहीं होगा, पर भगवती कृपा करेंगी तो सप्तशती पाठ अवश्य कर लेंगे, और जीवन में जितना जल्दी हो उतना अच्छा। फिर भी यह नवरात्रि खाली नहीं जानी चाहिए। वे कहते हैं कि छोटे भाई-बहनों से, घर के उन बच्चों से जो 9वीं-10वीं में आ गए हैं और पढ़ना जानते हैं — जिनके पास समय की कमी है, उन सबसे यह जरूर करवाइए। जिनके पास समय है वे सप्तशती पाठ करें; सबके पास नहीं होगा। पर जो किसी भी कारण से पूर्ण पाठ का सामर्थ्य नहीं रखते और सप्तशती के भीतर की ये चार स्तुतियाँ पढ़ लेते हैं, उन्हें भगवती की विशेष कृपा और सप्तशती पाठ का फल मिल जाएगा। कारण वे यह बताते हैं: इन स्तुतियों के श्लोकों में दस महाविद्या की उपस्थिति बन जाती है — जो महाशक्तियाँ हैं, भगवती के प्रचंडतम प्रमुख स्वरूप, नवदुर्गा, दसों महाविद्या, अष्टमातृका, 64 योगिनी — इन सबकी उपस्थिति इन मंत्रों में बन जाती है। तो दुर्गा सप्तशती के 700 मंत्रों का प्रभाव इसमें अर्क, निचोड़ के रूप में है। वे एक पहले के वीडियो की ओर संकेत करते हैं जिसमें तंत्रोक्त स्तुति के 15 श्लोकों में कौन-कौन सी महाविद्याओं की उपस्थिति है, यह पूरा वर्णन है; यहाँ केवल इतना जान लेने को कहते हैं कि इन सभी स्तुतियों में सभी महाविद्याओं की उपस्थिति है, इसी कारण पूरा फल मिलता है। सीमा वे स्पष्ट खींचते हैं: यह उनके लिए है जो पूर्ण पाठ नहीं कर पाते। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि जो पूर्ण पाठ करते हैं वे उसे छोड़कर यह करने लगें। यह नए लोगों के लिए है जो अभी आरंभ कर रहे हैं, और उनके लिए जिनके पास समय नहीं है और जो कहें "छोड़ो, कुछ नहीं करना" — उससे अच्छा है यह करिए।
तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम: सप्तशती की सबसे छोटी स्तुति और उसका फल
पंद्रह श्लोक, रोज़ पाँच-दस मिनट
वक्ता जिन चार स्तुतियों को बताते हैं उनमें पहली है तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम्: 15 श्लोक, दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय (प्रथम चरित्र) के 73 से 87 तक के श्लोक, जो ब्रह्मा जी द्वारा भगवती योगनिद्रा की स्तुति है, जो मधु-कैटभ के वध के लिए विष्णु जी के नेत्रों से प्रकट हुईं। वे कहते हैं कि इन 15 श्लोकों में सभी शक्तियाँ उपस्थित हैं, इसलिए भगवती की प्रचंडतम कृपा होती है; इन्हें पढ़ने में 5 से 10 मिनट लगते हैं, 15 भी नहीं। यह चारों में सबसे छोटी है, इसलिए नवरात्रि में घर के बच्चे-बूढ़े जो और कुछ नहीं कर सकते, रोज़ एक धूप-दीप जलाकर इसका पाठ कर लें। वे कहते हैं कि बल की कमी, धन की कमी, रोग, धन की समस्या — सबमें भगवती कृपा करती हैं, और जो भी आपका शत्रु बने उस पर इनका प्रहार होता है।
वक्ता कहते हैं कि चारों में सबसे पहली स्वयं तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् है, 15 श्लोक। प्रथम अध्याय, प्रथम चरित्र में जाइए: 73 से 87 नंबर तक के श्लोक — यही 15 श्लोक तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम हैं, जो ब्रह्मा जी ने भगवती योगनिद्रा की स्तुति की है, जो भगवान विष्णु के नेत्र से मधु-कैटभ के वध के लिए प्रकट होती हैं। इससे, वे कहते हैं, भगवती की प्रचंडतम कृपा हो जाती है, क्योंकि इसमें सबकी उपस्थिति है — इन 15 श्लोकों में सभी शक्तियाँ उपस्थित हैं। तो इनका पाठ करें, और जिनके पास समय की कमी है उनसे करवाएँ: 15 श्लोक पढ़ने में 15 मिनट भी नहीं लगेंगे; आराम से 5 से 10 मिनट में हो जाएगा। कम से कम, वे कहते हैं, नवरात्रि में हर दिन एक धूप-दीप जलाकर घर के बच्चे-बूढ़े जो और कुछ नहीं कर सकते, इनका पाठ कर लें। यह सबसे छोटा है, और इसमें सबकी कृपा भी हो जाती है: चाहे बल की कमी हो, धन की कमी हो, रोग की समस्या हो, धन की समस्या हो — सबमें भगवती कृपा करती हैं। और जो भी आपके शत्रु बनते हैं, सबके ऊपर इनका प्रहार होता है। इसकी कृपा से, वे कहते हैं, आपको पूरा फल मिल जाएगा।
शक्रादि स्तुति: धन की समस्या के लिए सप्तशती की स्तुति
ऐश्वर्य छिन जाने पर देवताओं की स्तुति
वक्ता की दूसरी स्तुति है शक्रादि स्तुति, दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के पहले से 27वें श्लोक तक, जो इंद्र आदि देवताओं द्वारा भगवती की स्तुति है। वे कहते हैं कि इन 27 श्लोकों का पाठ करने पर लक्ष्मी से जुड़ी बड़ी से बड़ी समस्या भगवती दूर कर देती हैं, क्योंकि यह मध्यम चरित्र की स्तुति है, ऐश्वर्यशाली देवताओं ने ऐश्वर्य की पुनः प्राप्ति के लिए की थी जब महिषासुर ने सब छीन लिया था — इसलिए इन श्लोकों से महालक्ष्मी विशेष कृपा करती हैं। वे जोड़ते हैं कि हर श्लोक का स्वतंत्र प्रयोग भी है जिसमें सभी महाविद्याओं की उपस्थिति है, पर उसे गुप्ततम विषय बताकर कहते हैं कि धीरे-धीरे उजागर कर रहे हैं; अभी जिनके पास समय नहीं है वे 27 श्लोक पढ़ें।
दूसरी स्तुति, वक्ता कहते हैं, दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में है: पहले श्लोक से लेकर 27वें श्लोक तक, शक्रादि स्तुति, जो इंद्र आदि देवताओं द्वारा भगवती की स्तुति है। अगर आप यह 27 श्लोकों की स्तुति कर लेते हैं, वे कहते हैं, तो लक्ष्मी से संबंधित जितनी भी बड़ी से बड़ी समस्या हो, भगवती दूर कर देती हैं। कारण: यह मध्यम चरित्र की स्तुति है, ऐश्वर्यशाली देवताओं द्वारा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए की गई — जब महिषासुर ने सारा ऐश्वर्य छीन लिया था, संपदाएँ छिन जाने के बाद इन श्लोकों से स्तुति करके भगवती की उपस्थिति कराई गई। इसलिए इन श्लोकों के प्रभाव से महालक्ष्मी विशेष कृपा करती हैं। वे जोड़ते हैं कि इसके अलावा हर श्लोक का जो स्वतंत्र प्रयोग है, जिसमें सभी महाविद्या की उपस्थिति है — वह विषय ही अलग है, गुप्ततम विषय है, जिसे वे धीरे-धीरे सबके सामने रख रहे हैं। अभी इतना जानने को कहते हैं कि अगर आपके पास समय नहीं है तो इन 27 श्लोकों का पाठ करने से भी भगवती की विशेष कृपा अवश्य मिलेगी।
सप्तशती के हृदय के रूप में तंत्रोक्त देवी सूक्तम
इसके बिना घटस्थापना अधूरी
तीसरी स्तुति है तांत्रोक्त देवीसूक्तम्, दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय के 9वें से 82वें श्लोक तक, जिसे वक्ता देवी भक्तों का और सप्तशती का हृदय कहते हैं — कुछ न करें तो भी यह करें, और नवरात्रि करते हैं तो यह अति अनिवार्य है: घटस्थापना के बाद जब तक इसका पाठ नहीं होता, माना जाता है कि भगवती का आगमन हुआ ही नहीं। वे कहते हैं कि किसी भी यंत्र, विग्रह या अस्त्र की प्रतिष्ठा और पीठ की स्थापना के समय अथर्वशीर्ष के साथ इसका पाठ अवश्य होता है, क्योंकि इसके पाठ मात्र से भगवती का सान्निध्य मिल जाता है। यह सप्तशती में स्वतंत्र रूप से भी उपस्थित है, इसलिए अकेले भी इसका पाठ किया जा सकता है।
रात्रि सूक्तम और शक्रादि स्तुति के बाद वक्ता पंचम अध्याय पर आते हैं, जिसे वे हृदय कहते हैं — देवी भक्तों का हृदय। आप कुछ न करते हों तो भी यह करें; और नवरात्रि करते हैं तो आपके लिए यह अति अनिवार्य है। घटस्थापना के बाद जब तक इसका पाठ नहीं किया जाता, तब तक माना जाता है कि भगवती का आवागमन हुआ ही नहीं। वे कहते हैं कि किसी भी प्रकार के यंत्र, विग्रह, अस्त्र आदि की प्रतिष्ठा के समय और पीठ आदि की स्थापना के समय अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। के साथ तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ अवश्य होता है, क्योंकि इनके पाठ मात्र से भगवती का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है। इसे, वे कहते हैं, सप्तशती का हृदय मान लीजिए। स्थान: दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में 9वें श्लोक से 82वें श्लोक तक। तंत्रोक्त देवी सूक्तम स्वतंत्र रूप से भी दिया गया है — सप्तशती में अपनी अलग इकाई के रूप में उपस्थित रहता है — तो आप इसका पाठ अलग से भी कर सकते हैं।
देवी सूक्तम में 82 श्लोक क्यों गिने जाते हैं: हर नमस्तस्यै अपने आप में मंत्र
हवन करने वालों के लिए गिनती का नियम
यह पूछे जाने पर कि तांत्रोक्त देवीसूक्तम् में 81–82 श्लोक कैसे हो जाते हैं जबकि दिखने में उतने नहीं हैं, वक्ता कहते हैं कि हवन करने वालों को विशेष ध्यान रखना चाहिए कि देवी सूक्तम का हवन सीधे पूरे मंत्र से नहीं होता: हर \"नमस्तस्यै\" को भी एक पूरा श्लोक माना गया है। \"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः\" में पहले नमस्तस्यै तक एक श्लोक, अगला नमस्तस्यै दूसरा श्लोक, और \"नमस्तस्यै नमो नमः\" तीसरा श्लोक। इनमें से हर एक, वे कहते हैं, स्वतंत्र मंत्र है जिसके अपने देवता, ऋषि, छन्दस्, कीलक और शक्ति हैं, इसी कारण संख्या बढ़ जाती है। वे प्रसंगवश बताते हैं कि ऐसे नमस्कार मंत्र अपने आप में अलग विषय हैं — नमस्कार अस्त्र, जिनसे किसी का वध किया जाता है, जिनका वर्णन पाशुपतास्त्र पाठ में गुरु-उपदिष्ट लोगों को मिला होगा — और वहीं छोड़ देते हैं।
वक्ता एक प्रश्न उठाते हैं जो यहाँ आता है: तांत्रोक्त देवीसूक्तम् में 82 — 81, 82 — श्लोक कैसे हो जाते हैं, जबकि श्लोक तो उतने नहीं हैं? उनका उत्तर एक नियम है जिस पर हवन करने वालों को विशेष ध्यान देना चाहिए: देवी सूक्तम का हवन सीधे पूरे मंत्र से एक इकाई मानकर नहीं होता। इसमें हर "नमस्तस्यै" को एक पूरा श्लोक माना गया है। उनका उदाहरण: "या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै" — इस नमस्तस्यै तक एक श्लोक। फिर "नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः": जो अगला नमस्तस्यै आया वह दूसरा श्लोक, और "नमस्तस्यै नमो नमः" तीसरा श्लोक। तो पूरी पंक्ति तीन श्लोकों में बँट जाती है। इसी कारण श्लोकों की संख्या बढ़ जाती है: नमस्तस्यै अपने आप में एक स्वतंत्र मंत्र है, और नमस्तस्यै नमो नमः अपने आप में एक स्वतंत्र मंत्र है। क्यों, इस पर वे थोड़ा छूते हैं। एक प्रकरण है, वे कहते हैं, जिसमें एक राजा को ऐसी सिद्धि थी कि वह जिसे भी नमस्कार कर दे — और वह नमस्कार मंत्र पाशुपतास्त्रभगवान शिव का सर्वोच्च, अजेय अस्त्र, जो समस्त सृष्टि का विनाश करने में सक्षम है। का पाठ करने वालों को पता होगा, अगर वे गुरु-दीक्षित हैं और गुरु का उपदेश मिला है: उस पाठ में एक-एक अस्त्र का वर्णन है, और वह केवल फटाफट पढ़ देने से नहीं होता — ज्ञानी गुरु ने पूरा समुच्चय बताया होगा कि यह कैसे होता है, कौन से ऋषि, कौन से देवता, सबसे पहले किसने प्रयोग किया। मंत्र में तो मात्र एक बार उच्चारण है, पर उसका पूरा स्वतंत्र विषय अलग है — नमस्कार अस्त्रों से किसी का वध कैसे किया जाता है। इसे वे अपने आप में विचित्र विषय कहते हैं और आगे नहीं जाते। तो, वे निष्कर्ष देते हैं, सप्तशती के पंचम अध्याय में जितने भी नमस्तस्यै आदि मंत्र हैं, वे स्वतंत्र श्लोक, स्वतंत्र मंत्र हैं, जिनके अपने देवता, ऋषि, छन्दस्छंद — किसी स्तुति या ग्रंथ के पाठ हेतु निर्धारित लयबद्ध संरचना (जैसे अनुष्टुभ का आठ-अक्षरीय चरण), जो उसके विनियोग में निर्दिष्ट होती है।, कीलक, शक्ति सब कुछ हैं — और इसी कारण संख्या बढ़ जाती है।
घी, कच्चे दूध और देवी सूक्तम से घर पर धातु के विग्रह की प्रतिष्ठा
ठोस धातु, मिट्टी नहीं, कभी न बदलें
वक्ता किसी भी देवता के विग्रह — हनुमान जी, शिव जी, भगवती दुर्गा, काली, देवी-देवताओं का कोई भी स्वरूप — की प्रतिष्ठा की एक सरल घरेलू विधि देते हैं, उन घरों के लिए जो पंडित जी नहीं बुलाएँगे। उनके नियम: लक्ष्मी-गणेश पूजा में मिट्टी के विग्रह मत लाइए; ठोस धातु के स्थापित कीजिए, छोटे हों या बड़े, और उन्हें कभी मत बदलिए। केवल धोकर रख देना नहीं: जब विग्रह को स्थान पर बैठाएँ, पूरे विग्रह पर गाय के घी का लेपन करें, और उन पर कच्चे दूध की धार छोड़ते हुए तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करें। वे कहते हैं कि गणेश तत्व और लक्ष्मी तत्व की शुद्ध सत्व शक्तियाँ उसमें प्रविष्ट हो जाती हैं और प्रतिष्ठा हो जाती है; संस्कार आदि, अग्न्युत्तारण विधि सहित, संक्षेप में इसी में मान लिए जाते हैं। वे बताते हैं कि मूर्ति प्रतिष्ठा की सरलतम हिंदी विधि और पीडीएफ उनके चैनल पर है, पर यह भी एक सरलतम विषय है।
वक्ता कहते हैं कि जब भी घर में किसी का भी विग्रह स्थापित करना हो — हनुमान जी, शिव जी, भगवती दुर्गा, काली, देवियों का कोई भी स्वरूप, देवताओं का भी कोई स्वरूप — जैसे अभी लोग लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा करेंगे, मिट्टी के विग्रह मत लाइए। ठोस धातु के विग्रह स्थापित कीजिए, चाहे छोटा हो चाहे बड़ा, और उन्हें कभी मत बदलिए। जब उनकी प्राण प्रतिष्ठा करनी हो — सब लोग पंडित जी को बुलाकर पूजा नहीं करवाएँगे — तो घर में क्या करना चाहिए? वह नहीं, वे कहते हैं, जो लोग करते हैं: धोकर रख देते हैं। धो लीजिए, पर जब उन्हें स्थान पर बैठाएँ तो पूरे विग्रह पर घृत से, गाय के घी से, पूरे शरीर पर लेपन कीजिए। फिर उन पर कच्चे दूध की धार छोड़ते हुए दोनों के ऊपर तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ कीजिए। तब, वे कहते हैं, गणेश तत्व और लक्ष्मी तत्व से संबंधित शुद्ध सत्व शक्तियाँ उनमें प्रविष्ट हो जाएँगी और उनकी प्रतिष्ठा हो जाएगी। इसके साथ के संस्कार आदि संक्षिप्त रूप से इसी में मान लिए गए हैं, और अग्न्युत्तारण विधि आदि भी इसी में हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि मूर्ति प्रतिष्ठा की पूरी सरलतम हिंदी विधि चैनल पर दी हुई है, पीडीएफ भी बना दिया है ताकि कोई भी कर ले — वह भी देख सकते हैं — पर यह भी एक सरलतम विषय है। देवी सूक्तम, वे कहते हैं, अपने आप में हृदय है; उसके बिना कुछ नहीं हो सकता।
सावधानी: देवी सूक्तम का प्रयोग छोटी बात पर नहीं; जीवन में 40,000 पाठ
अदीक्षित के लिए योगिनियों और क्षेत्रपालों की कृपा
वक्ता सावधान करते हैं कि तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का प्रयोग अकारण नहीं करना चाहिए — पाठ कीजिए और भगवती की कृपा प्राप्त कीजिए, पर कहीं फँसने पर छोटी-सी बात पर इसका प्रयोग न करें। फिर वे कहते हैं कि अगर आपने अपने जीवन में इन पूरे मंत्रों का 40,000 पाठ कर लिया है, तो भगवती की योगिनी, उनकी शक्तियाँ, उनकी परिचारिका और क्षेत्रपाल सभी आप पर कृपालु हो जाते हैं और कोई आपका अहित नहीं कर सकता; ललिता सहस्रनाम में जो फलश्रुति दी गई है उसका प्रभाव इससे मिल जाता है। वे इसे उनके लिए मार्ग बताते हैं जो उतना नहीं कर सकते और दीक्षा नहीं लिए हैं।
तांत्रोक्त देवीसूक्तम् को वह हृदय बताकर जिसके बिना कुछ नहीं हो सकता, वक्ता एक सावधानी जोड़ते हैं: पाठ कीजिए और भगवती की विशेष कृपा प्राप्त कीजिए, पर इसका प्रयोग अकारण नहीं करना चाहिए। जब कहीं फँसते हैं, तो ऐसा नहीं कि थोड़ी-सी छोटी बात पर इसका प्रयोग करें — नहीं। फिर एक वचन: अगर आपने अपने जीवन में इन पूरे मंत्रों का 40,000 पाठ कर लिया है, तो भगवती की योगिनी, उनकी शक्तियाँ, उनकी परिचारिका, क्षेत्रपाल सभी आपके ऊपर कृपालु हो जाते हैं। कोई आपका अहित नहीं कर सकता। जान लीजिए, वे कहते हैं, कि ललिता सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। में जो फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। दी गई है उसका प्रभाव इससे प्राप्त हो जाता है। वे इसे एक विशेष व्यक्ति के लिए रखते हैं: जो उतना नहीं कर सकते, जो दीक्षा नहीं लिए हैं — वे अगर इतना कर लें तो पर्याप्त है।
जय दुर्गा स्तुति: किसी भी कामना की सप्तशती स्तुति और 700 श्लोकों के हवन का विकल्प
ग्यारहवें अध्याय के पैंतीस श्लोक; शक्ति हवन
चौथी स्तुति है भगवती जय दुर्गा स्तुति, दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के पहले से 35वें श्लोक तक। वक्ता कहते हैं कि 700 श्लोकों में उपस्थित सभी प्रचंडतम शक्तियों का अर्क इन 35 में है, इसलिए किसी भी कामना के लिए — धन, बल, रोग नाश, शत्रु नाश, अभिचार तंत्र नाश — इसका पाठ किया जा सकता है, और नित्य भी। जो लोग नवरात्रि के नौ दिन सप्तशती का पाठ करते हैं पर 700 श्लोकों के हवन का सामर्थ्य नहीं रखते, उनके लिए वे कहते हैं: इसका शक्ति हवन कर लें, खीर, घी, गुग्गुल-घी और तिल से आहुति देते हुए — अपने गुरु से जानकर कि कौन-से अंश छोड़ने हैं, क्योंकि उवाच की और अस्त्र मंत्रों की आहुति नहीं दी जाती।
देवी सूक्तम के बाद, वक्ता कहते हैं, आती है भगवती जय दुर्गा स्तुति — दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में, प्रथम श्लोक से 35वें श्लोक तक के 35 श्लोक। इनके द्वारा भी, वे कहते हैं, आपकी जिस भी प्रकार की कामना हो — धन की, बल की, रोग नाश की, शत्रु नाश की, अभिचार तंत्र नाश की — सप्तशती के 700 श्लोकों में उपस्थित सभी प्रचंडतम शक्तियों का अर्क इन 35 श्लोकों में उपस्थित है। तो यह भी करें। फिर वे एक विशेष उपयोग बताते हैं: जो लोग नौ दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और हवन करने का — 700 श्लोकों के हवन का — सामर्थ्य नहीं रखते, वे यह शक्ति हवन कर लें; यह शक्ति पाठ है। ग्यारहवें अध्याय के इन 35 श्लोकों में विषयों को जानकर उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। की आहुति नहीं देनी है, अस्त्र मंत्रों की आहुति नहीं देनी है — यह अपने गुरु से जान लेनी चाहिए। उसके बाद इन 35 श्लोकों से खीर से, घी से, गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त।-घी से, तिल से आहुति देनी चाहिए। इससे भगवती की कृपा प्राप्त होती है। तो यह भी, वे कहते हैं, आप पाठ करें — और नित्य भी इसका पाठ कर सकते हैं।
इष्ट के अनुसार सप्तशती की चार स्तुतियों में से कौन-सी अपनाएँ
जीवन भर के लिए एक स्तुति, गुरु मिलने पर काम आएगी
वक्ता कहते हैं कि इन चारों स्तुतियों में से कोई एक अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए, और उन्हें भक्त से मिलाते हैं: महाकाली के भक्त रात्रि सूक्तम् करें; भगवती महासरस्वती के भक्त ग्यारहवें अध्याय की जय दुर्गा स्तुति; महालक्ष्मी के अनन्य उपासक शक्रादि स्तुति, चौथे अध्याय के 27 श्लोक; और जो भगवती के किसी भी स्वरूप के भक्त हैं, सभी स्वरूपों की कृपा चाहते हैं और हर शक्ति में अपनी माता, अपनी दुर्गा, अपनी काली देखते हैं — प्रचंडतम उपासक — वे तांत्रोक्त देवीसूक्तम् कभी न छोड़ें। वे कहते हैं कि ये चारों जीवन बदलने का सामर्थ्य रखती हैं, सबका स्वतंत्र प्रयोग है, और आज इन्हें कर रखने से जब देवी कृपा से जीवन में ऐसे विद्वान गुरु प्रकट हों जो ये सब करवाते हैं, तब ये बहुत काम आएँगी।
इन चारों स्तुतियों में से, वक्ता कहते हैं, कोई भी एक अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए; भगवती की विशिष्टतम कृपा प्राप्त होती है। फिर वे उन्हें बाँटते हैं। अगर आप महाकाली के भक्त हैं, विशेष रूप से, तो रात्रि सूक्तम् कीजिए। अगर आप भगवती महासरस्वतीसप्तशती के तृतीय चरित्र की अधिष्ठात्री देवी। के भक्त हैं, तो ग्यारहवें अध्याय की जय दुर्गा स्तुति कीजिए। अगर आप भगवती महालक्ष्मी के अनन्य उपासक हैं, तो शक्रादि स्तुति कीजिए — चौथे अध्याय के पहले से 27वें तक 27 श्लोक। और अगर आप भगवती के किसी भी स्वरूप के भक्त हैं और सभी स्वरूपों की कृपा चाहिए — सभी शक्तियों में अपनी माता को देखते हैं, हर शक्ति में आपको अपनी दुर्गा, अपनी काली दिखाई देती हैं, आप प्रचंडतम उपासक हैं — तो तांत्रोक्त देवीसूक्तम् को कभी मत छोड़िए। ये चार स्तुतियाँ, वे कहते हैं, हमारे जीवन को बदलने का सामर्थ्य रखती हैं, और इन सभी का स्वतंत्र प्रयोग है। ये आज करके रखिए: जब देवी कृपा से जीवन में वैसे गुरु प्रकट हो जाएँ — विद्वान गुरु जो ये सब चीज़ें करवाने वाले होते हैं — तो ये चीज़ें आपके बहुत काम आएँगी; यही आपके ऊपर कृपा करेंगी। अंत में वे आशा करते हैं कि श्रोता का नवरात्र बहुत अच्छा बीते और अन्य समय में भी इन स्तुतियों से भगवती की विशिष्ट कृपा और सान्निध्य मिले।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।