गलत विधि से की गई दुर्गा सप्तशती शतचंडी और तीन अकाल मृत्यु — वक्ता द्वारा गिनाई गई गलतियाँ और उनसे निकले नियम
गलत विधि से की गई 108 पाठ की दुर्गा सप्तशती और उसके बाद तीन अकाल मृत्युओं की सत्य घटना, और वक्ता द्वारा गिनाई गई गलतियाँ तथा उनसे निकाले गए नियम।
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गलत विधि से दुर्गा सप्तशती कृपा नहीं, कष्ट लाती है
तंत्रोक्त ग्रंथ विधियुक्त कर्म माँगता है
वक्ता कहते हैं कि सही विधि-विधान से नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करने पर जगदंबा की ऐसी कृपा होती है कि कोई भौतिक कामना अधूरी नहीं रहती — लेकिन जब नियति से प्रेरित होकर गलत विधि से, गलत तरीके से सप्तशती का अनुष्ठान किया जाता है तो जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं, वही सामान्य विषय कि देव या मंत्र शाप लग जाए। भावपूर्वक उपासना अपनी जगह ठीक है, पर तंत्रोक्त विधि अपनाने पर विधियुक्त कर्म ही करना चाहिए। गलत पारायण की गई सप्तशती, वे कहते हैं, पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर लील सकती है: उसके 700 मंत्र तांत्रिक हैं, सामान्य नहीं।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि भगवती जगदंबिका के दुर्गा सप्तशती पाठ से जगदंबा की ऐसी अनन्य कृपा होती है कि जीवन में कोई भी ऐसी भौतिक कामना नहीं रहती जो पूरी न हो सके — यह सत्य है। अगर कोई भगवती की शरण ले ले और सही विधि-विधान से नित्य सप्तशती का पाठ करे, तो भगवती की कृपा अनन्य रूप से मिलती है। लेकिन, वे कहते हैं, जब कोई व्यक्ति नियति से प्रेरित होकर गलत विधि-विधान से, गलत तरीके से सप्तशती का अनुष्ठान करता है, तो उसके जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं। यह वही सामान्य विषय है जिसकी सदैव चर्चा होती है कि देव या मंत्र शाप लग जाए। और विशेषकर सप्तशती के बारे में कहा जाता है कि वह ऐसा ग्रंथ है कि अगर आप उसका गलत पारायण करें तो वह पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर लीलने की क्षमता रखता है। चंडी पाठ के ये 700 मंत्र तांत्रिक हैं; सामान्य नहीं हैं। वे एक रेखा खींचते हैं: भावपूर्वक भगवती की उपासना अपनी जगह बिल्कुल सही और उचित है। लेकिन जब आप तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। विधि-विधान का अनुसरण कर रहे हों, तब आपको विधियुक्त कर्म ही करने चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यह भय फैलाने के लिए नहीं, बल्कि, जैसा वे सदैव कहते हैं, भ्रम दूर करने के लिए कह रहे हैं।
सत्य घटना: स्वयं सीखकर की गई 108 पाठ की शतचंडी और उसके बाद तीन अकाल मृत्यु
गुरु का आदेश, कोई विधि नहीं, पुस्तक से सीखा
वक्ता कहते हैं कि दो व्यक्तियों के लगभग एक जैसे मामले उनके पास आए; वे केवल उसी का विषय रख रहे हैं जिसने अनुमति दी। वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित एक व्यक्ति को उसके वैष्णव गुरु ने भगवती के प्रति उसकी श्रद्धा देखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का आदेश दिया — पहले नौ पाठ, फिर 100–108 दिन की शतचंडी। गुरु ने घर या मंदिर में पारायण की कोई विधि नहीं बताई, इसलिए उसने दुर्गा अर्चन पद्धति से जो जानकारी मिली वह लेकर स्वयं ही शुरू कर दिया। उत्पात बीच में ही शुरू हो गया; उसके बाद के तीन साल में परिवार के तीन चलते-फिरते लोगों की मृत्यु हुई — दो उसके पुत्र, अब एक पुत्री बची है, और छोटा भाई जिसे उसने पुत्रवत् स्नेह दिया था।
गलती: ब्राह्मण होकर यज्ञोपवीत त्यागना और केवल पाठ के दिनों में धारण करना
गुरु की अनुमति से जनेऊ का त्याग
वक्ता कहते हैं कि उन्हें पहला आश्चर्य यह हुआ कि वह व्यक्ति ब्राह्मण होते हुए भी यज्ञोपवीत का त्याग कर चुका था और नित्य नियम से उसे धारण नहीं करता था; उसने यज्ञोपवीत केवल तब तक धारण किया जब तक 100–108 पाठ पूरे नहीं हुए, और हवनात्मक विधान तो छोड़ ही दीजिए। बताया गया कि गुरु से आदेश मिला था कि "नियम नहीं पाल पाते तो इस विधान से त्याग दो और पूजन के समय धारण कर लेना" — वक्ता अपने अनुसार इसे पहली गलती मानते हैं: पूरी चीज़ यहीं गड़बड़ हो जाती है।
उस व्यक्ति ने क्या किया, इस पर आते हुए वक्ता कहते हैं: ठीक है, उसे जिस परंपरा में दीक्षा मिली — वह तो सही। लेकिन उन्हें यह जानकर बड़ा आश्चर्य और हैरानी हुई कि ब्राह्मण होते हुए भी उसने यज्ञोपवीत का त्याग कर दिया था। वह नित्य नियम से यज्ञोपवीत धारण नहीं करता था। उसने यज्ञोपवीत केवल तभी तक धारण रखा जब तक 100–108 पाठ पूरे नहीं हुए — और हवनात्मक विधान तो, वक्ता कहते हैं, अभी छोड़ ही दीजिए। पाठ के बाद वह नित्य नियम से यज्ञोपवीत धारण नहीं कर पाता था, नियम नहीं पाल पाता था, इसलिए उसने त्याग दिया। वक्ता कहते हैं कि पूरी चीज़ यहीं गड़बड़ हो जाती है: गुरु से कैसे आदेश मिला कि "हाँ ठीक है, तुम नहीं धारण कर पाते तो कोई बात नहीं, इस विधान से त्याग दो, ऐसे करो, पूजन के समय धारण कर लेना"? तो वक्ता के अनुसार पहली गलती यहीं हो गई थी।
उच्चारण अशुद्ध हो तो क्या दुर्गा सप्तशती संस्कृत में पढ़नी चाहिए?
बदले में भावपूर्वक हिंदी, या केवल स्तुतियाँ
वक्ता कहते हैं कि वे सदैव कहते हैं: भगवती के प्रति भक्ति-भावना है पर संस्कृत का उच्चारण नहीं आता, अभ्यास नहीं किया, सप्तशती सीखी नहीं, तो भाव-प्रधानता के साथ हिंदी में ही पाठ कीजिए, जगदंबा उससे प्रसन्न होंगी। इस व्यक्ति ने 108 पाठ संस्कृत में किए, अपने ही कहने से बहुत अशुद्धियों के साथ, और गुरु की कही कथा से तसल्ली रखी कि अस्पष्ट उच्चारण से कोई विशेष दिक्कत नहीं; वक्ता इसे एक स्तर तक मानते हैं, पर 108 पाठ में हर बार उच्चारण गलत हो तो यही सबसे बड़ा ब्लंडर है, और अर्थ से अनर्थ होना दुर्गति का एक कारण बना। पूर्ण सप्तशती के बदले, वे कहते हैं, केवल स्तुतियाँ करो — रात्रि सूक्तम्, देवी सूक्तम, चतुर्थ अध्याय की स्तुति, शक्रादि स्तुति — माँ उससे प्रसन्न होंगी।
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, वह है जो वे सदैव कहते हैं: भगवती के प्रति आपकी भक्ति है, भावना है, तो सप्तशती का पाठ हिंदी में ही कीजिए — अगर आपको संस्कृत का उच्चारण नहीं आता, या अभ्यास नहीं किया, या सप्तशती का पाठ सीखा नहीं है। इस व्यक्ति से जब पूछा गया कि सप्तशती पाठ कैसे करते थे, तो बोला संस्कृत में। क्या उच्चारण आता था? बोला कि बहुत सारी अशुद्धियाँ थीं, गलती होती थी, लेकिन मन में सदैव भाव रहता था; गुरु जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि "भावपूर्वक माई की सेवा करो," और कुछ कथा भी सुनाई कि अस्पष्ट उच्चारण से गलती हो तो भी कोई विशेष दिक्कत नहीं है। वक्ता कहते हैं कि इस बात को एक स्तर तक मान लेते हैं। लेकिन आप 108 पाठ करने जा रहे हो, गलती कर रहे हो, उच्चारण गलत ही हो रहा है — तब तो दिक्कत वाला विषय है न? फिर संस्कृत में उच्चारण क्यों कर रहे हो? भावपूर्वक 108 पाठ का पारायण हिंदी में ही कर लेना चाहिए था। दुनिया भर की गलती छोड़िए, वक्ता कहते हैं — यह एक सबसे बड़ा ब्लंडर मिस्टेक हुआ है। संस्कृत का उच्चारण नहीं आता था और फिर भी यह गलती करते रहे, अस्पष्ट और गलत उच्चारण, और अर्थ से अनर्थ होने के कारण यह उनकी दुर्गति का एक कारण बना। केवल संस्कृत में पाठ करने से उस व्यक्ति को यह भी पता नहीं था कि श्लोक का अर्थ क्या है। उनका नियम, वे कहते हैं, कई बार कहा है: भाव से करना है तो भाव-प्रधानता के साथ हिंदी में ही करो, जगदंबा उससे प्रसन्न होंगी। पूर्ण सप्तशती का मत करो; केवल स्तुतिदेवता की प्रशंसा में कहा गया स्तवन, जो स्तोत्र से लघु और कम विधिबद्ध होता है। पाठ करो — रात्रि सूक्तम् कर लो, देवी सूक्तम कर लो, चतुर्थ अध्याय में स्तुति का पाठ कर लो, शक्रादि स्तुति। माँ उससे प्रसन्न होंगी।
सप्तशती पारायण में कर्म-साक्षी दीपक और अखंड ज्योत
छूटा हुआ साक्षी दीपक, और हर पारायण पर एक ज्योत का नियम
वक्ता कहते हैं कि तीसरी बात यह है कि पता नहीं क्यों उस व्यक्ति को यह नियम नहीं बताया गया कि जिस समय पाठ करो उस समय कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित कर लें, और नवरात्र में अखंड ज्योति आदि रखें। उसे अखंड ज्योत का जो नियम बताया गया था वह था: हर पारायण के साथ एक अखंड ज्योत — आज एक जलाई, कल के पाठ के साथ दूसरी जलाएँगे, आज वाली जब तक जले जले, पूरी होने पर उसे हटा दें, विसर्जन कर दें। यही उसका नियम था।
तीसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि — पता नहीं क्यों — उस व्यक्ति को यह नियम नहीं बताया गया था कि जिस समय पाठ करो उस समय कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित कर लें, और नवरात्र में अखंड ज्योति आदि रखें। उसे अखंड ज्योत का क्या नियम बताया गया था? कि हर पारायण के साथ एक अखंड ज्योत रहेगी, और पुरानी अखंड ज्योत जब तक जले जले, जैसे ही वह पूरी हो जाए उसका विसर्जन कर दें। यानी आज जब वह चंडी पाठ करता तो एक अखंड ज्योत जला लेता; कल जब फिर सप्तशती का पाठ करेगा तो दूसरी ज्योत प्रज्वलित करेगा; आज वाली ज्योत कल तक, परसों तक जली, फिर पूरी हो गई, उसे हटा देगा। यही, वक्ता कहते हैं, उसका नियम था।
बिना हवन नित्य मंडल आवाहन घर के सप्तशती पारायण का नियम नहीं
पुस्तक से याग-स्तर का पूजन, हवन के बिना
वक्ता कहते हैं कि उस व्यक्ति ने मंडल पूजन आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री जी की सबसे लोकप्रचलित पुस्तक दुर्गा अर्चन पद्धति से सीखा, जितना बन पड़ा नवग्रह मंडल आदि बनाया, और प्रतिदिन हर मंडल के हर देवता का उतना ही बृहत् विधि से आवाहन करता जितना उसमें दिया है — जो चंडी याग में होता है — फिर हर पाठ के बाद विसर्जन। लेकिन याग में आवाहन के साथ हवनात्मक विधान रहता है, और 108 पाठ में उसने कभी हवन नहीं किया। पूरे मंडल के साथ नित्य आवाहन-विसर्जन घर के 108 पाठ पारायण का नियम होता ही नहीं; इसके विकल्प हैं, और जो जिस चीज़ का जानकार है उसे वही सही ढंग से करनी चाहिए।
अगली गलती, वक्ता कहते हैं, वह मंडल पूजन था जिसका उस व्यक्ति ने अनुसरण किया। उसने इसे श्री श्री आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री जी की दुर्गा अर्चन पद्धति से सीखा — जो सबसे लोकप्रचलित ग्रंथ है — और उसी से नवग्रह मंडल आदि जो बन पड़ा वह बनाया। प्रतिदिन वह हर मंडल के हर देवता का उतना बृहत् विधि से आवाहन करता जितना उसमें दिया है, जो चंडी याग की विधि है, और प्रतिदिन पाठ के बाद विसर्जन करता। देखने वाली बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि याग में जब आवाहन होता है तो उसके साथ हवनात्मक विधान रहता है। इस व्यक्ति ने हवन किया ही नहीं — 108 पाठ में कभी हवन नहीं किया — जबकि पूरे मंडल के साथ नित्य आवाहन, नित्य विसर्जन कर रहा था। घर में 108 का पारायण कर रहे हैं तो ऐसा नियम होता ही नहीं; ऐसे नहीं होता, इतना इस प्रकार से नहीं होता। इसके लिए विकल्प उपस्थित हैं, और इसीलिए, वे कहते हैं, जो व्यक्ति जिस चीज़ का जानकार है उसे वही चीज़ जाननी चाहिए, सही प्रकार से जानकर करे तो उचित है। तो यह एक और गलती उसने यहाँ की।
सप्तशती पारायण के साथ ज़रूरी सहायक पूजन और भेंट
गणपति, भैरव, बटुक, योगिनी, नैवेद्य, बलि, कुछ हवन
वक्ता कहते हैं कि पाँचवीं गलती यह थी कि किसी प्रकार का कोई गणेश अनुष्ठान नहीं, कोई भैरव अनुष्ठान नहीं, न बटुक पूजन, न योगिनी पूजन, न कोई विशेष नैवेद्य, भोग या भेंट, न किसी प्रकार की बलि — केवल सामान्य पाठ चल रहा था। अगर वह अर्चन पद्धति के ही हवनात्मक विधान का सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार भी अनुसरण करता तो कुछ विधान और हो जाते और थोड़ी-बहुत शांति बनी रहती। उसने कभी नहीं किया।
पाँचवीं गलती, वक्ता कहते हैं: किसी भी प्रकार का कोई गणेश अनुष्ठान नहीं; फिर वही गलती — कोई भैरव अनुष्ठान नहीं; न बटुक पूजन; न योगिनी पूजन; न किसी प्रकार का कोई विशेष नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।, भोग या भेंट; न कोई बलि आदि। कोई कुछ नहीं — केवल सामान्य यह क्रम चल रहा था। अगर वह अर्चन पद्धति का ही अनुसरण करता, वक्ता कहते हैं, तो उसमें हवनात्मक विधान है; उसे कम से कम सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार भी करता तो उसमें कुछ-कुछ विधान और हो जाते और थोड़ी-बहुत शांति बनी रहती। उसने कभी नहीं किया।
संस्कृत में नित्य षडंग सप्तशती पाठ के साथ अनिवार्य बलि
चंडी बलिप्रिया हैं: रोज़ एक नींबू, अष्टमी पर 9/18/27
वक्ता कहते हैं कि भवानी स्वयं सप्तशती में कहती हैं कि जो कोई जानकर या अनजाने में वार्षिक पूजन में मुझे बलि देता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं — चंडी बलिप्रिया हैं, इसलिए पाठ होगा तो बलि अवश्य चढ़ेगी; उस व्यक्ति ने कभी हिंदी में न पढ़ने से यह जाना ही नहीं और कभी बलि नहीं दी। उनका नियम, भयभीत करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि यह तांत्रिक ग्रंथ है: संस्कृत में छह अंगों (षडंग) के साथ नित्य सप्तशती पाठ करने पर रोज़ कम से कम एक बलि दें — नींबू की, या लौंग-कपूर की; कुष्मांड की वे नहीं कहेंगे — और सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार अष्टमी या चतुर्दशी को नौ, अठारह या सत्ताईस नींबू की अच्छी बलि। इससे उनकी योगिनियाँ संतुष्ट रहती हैं, दुर्भिक्ष-दुर्योग और दुष्ट ग्रहों का प्रकोप हटता है, कृपा मिलती है, और गलतियों की क्षमा मिलती है।
और सबसे बड़ी गलती, वक्ता कहते हैं: जब वह व्यक्ति पाठ कर रहा था — संस्कृत में, हिंदी में कभी नहीं — तो उसे अर्थ भी नहीं पता था कि श्लोक का क्या अर्थ होता है। अगर सही प्रकार से थोड़ा हिंदी में भी पाठ करता तो इतना तो पता होता कि भवानी ने उसमें कहा है कि जो कोई — जानकर, या अनजाने में भी — वार्षिक पूजन में मुझे बलि प्रदान करता है, उसके भी सभी मनोरथ मैं पूर्ण करती हूँ। वे चंडी, वक्ता कहते हैं, बलिप्रिया हैं। पाठ होगा तो बलि अवश्य चढ़ेगी। इस व्यक्ति ने कभी बलि चढ़ाई ही नहीं। वक्ता कहते हैं कि वे यह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं, किसी को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि यह तंत्र का मार्ग है और सप्तशती तांत्रिक ग्रंथ है। अगर आप संस्कृत में विधियुक्त, छह अंगों के साथ (षडंग) नित्य सप्तशती का पाठ कर रहे हैं, तो कम से कम एकाध बलि तो रोज़ देनी चाहिए। चाहे नींबू की दीजिए; कुष्मांड की तो वे नहीं कहेंगे, पर नींबू या लौंग-कपूर की तो कर ही सकते हैं। और उसके बाद कम से कम सप्ताह में एक बार, या पक्ष में एक बार अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। या चतुर्दशी तिथि को कुछ अच्छा बलि प्रयोजन कर लेना चाहिए — चाहे नौ नींबू की बलि दें, अठारह नींबू की, या सत्ताईस नींबू की। बलि विधान, वे कहते हैं, ऐसे व्यक्ति को अवश्य करना चाहिए। फल वे यह बताते हैं: उनकी योगिनी संतुष्ट रहती हैं, कृपा करती हैं; आपके अनेक दुर्भिक्ष दूर हो जाते हैं, दुर्योग दूर हो जाते हैं; दुष्ट ग्रहों का प्रकोप दूर हो जाता है; भगवती की कृपा-प्रसाद प्राप्त होती है; और कोई अपराध या गलती बन गई हो तो उसमें भी क्षमा मिल जाती है।
तंत्र के विषयों में फिलॉसफी और भक्ति-भाव की जगह नहीं
फिलॉसफी वाले का कुछ नहीं जाता; सुनने वाले का जीवन बर्बाद
वक्ता कहते हैं कि यह कोई मनोवैज्ञानिक विषय नहीं है, न ही फिलॉसफी झाड़ने का विषय है। जो लोग तंत्र के विषयों में फिलॉसफी घुसेड़ते हैं वे इन विषयों से दूर रहें — यह उनका विषय नहीं है — क्योंकि उनकी बातें सुनकर लोग ऐसे ग्रंथों में अनर्गल कृत्य और गलतियाँ कर बैठते हैं। फिलॉसफी वाले का कुछ नहीं जाता, पर उस बेचारे का जीवन बर्बाद हो जाता है, जैसे इस व्यक्ति का हो रहा है। भक्ति-भाव और फिलॉसफी को तंत्र के विषयों से दूर रखें, वे निवेदन करते हैं।
तो देखिए, वक्ता कहते हैं: यह किसी प्रकार का मनोवैज्ञानिक विषय नहीं है। यह वह नहीं है जिसे लोग फिलॉसफी कहते हैं — फिलॉसफी झाड़ने का विषय नहीं है। वे फिलॉसफी घुसेड़ने वालों से ध्यान देने को कहते हैं: जो लोग तंत्र के विषयों में फिलॉसफी घुसेड़ देते हैं, वे इन विषयों से दूर रहें; यह उनका विषय नहीं है। अगर इसमें फिलॉसफी घुसेड़ोगे, वे कहते हैं, तो जो लोग तुम्हारी बातें सुनकर इस प्रकार के ग्रंथों में अनर्गल कृत्य कर देते हैं, गलती कर देते हैं — और वह फिलॉसफी कहाँ-कहाँ घुस जाती है, तुम्हें पता भी नहीं चलता। तुम्हारा तो कुछ नहीं जाएगा; लेकिन उस बेचारे का जीवन बर्बाद हो जाएगा, जैसे इस व्यक्ति का हो रहा है। फिलॉसफी न घुसेड़ा करें। भक्ति-भाव और फिलॉसफी को तंत्र के विषयों से दूर रखें, वे निवेदन करते हैं।
शतचंडी के दौरान ब्रह्मचर्य और "शाक्त की पत्नी भगवती है" वाला तर्क
गलत तर्क पर छोड़ा गया विशेष नियम
वक्ता कहते हैं कि ऐसे पारायण में ब्रह्मचर्य पालन और खानपान के लिए विशेष नियम और सावधानियाँ हैं। उस व्यक्ति को कहा गया था कि जब आप शाक्त हैं तो आपकी पत्नी भी भगवती का स्वरूप है — उन्हें प्रसन्न नहीं रखोगे तो भगवती को कैसे प्रसन्न रखोगे? — वही विषय जिस पर एक बार पूरी कंट्रोवर्सी हुई थी। इसी चक्कर में उसने ब्रह्मचर्य का पालन ही नहीं किया: सात्विक खाना-पीना ठीक था, पर ब्रह्मचर्य का कोई विशेष पालन नहीं, सप्ताह में एकाध बार गृहस्थ कार्य होता रहा। वक्ता कहते हैं यह बिल्कुल गलत है, यह नहीं होना चाहिए था।
इसके बाद, वक्ता कहते हैं, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। पालन और खानपान के लिए विशेष नियम और विशेष सावधानियाँ आती हैं। उस व्यक्ति को कहा गया था: जब आप शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। हैं तो आपकी पत्नी भी भगवती का स्वरूप हैं — अगर उन्हें प्रसन्न नहीं रखते तो भगवती को कैसे प्रसन्न रखोगे? वक्ता कहते हैं कि यह वही विषय है जिस पर एक बार पूरी कंट्रोवर्सी हुई थी। इसी चक्कर में, वे कहते हैं, उस व्यक्ति ने ब्रह्मचर्य का पालन ही नहीं किया। सात्विक खाना-पीना ठीक-ठाक था, लेकिन ब्रह्मचर्य का उसने कोई विशेष पालन नहीं किया — यानी सप्ताह में एकाध बार उसका अपना गृहस्थ कार्य होता रहा। यह, वक्ता कहते हैं, बिल्कुल गलत विषय है; यह नहीं होना चाहिए था। बाद में वे फिर पूछते हैं: ब्रह्मचर्य कहाँ गया? पालन क्यों नहीं हुआ?
अकाल मृत्यु पर गलत प्रतिक्रिया: न नारायण नागबली, फिर सुनी-सुनाई पर घर में पशु बलि
पहली मृत्यु के बाद गलती पर और बड़ी गलती
वक्ता कहते हैं कि 108 पाठ पूरे होने के बाद जब परेशानी शुरू हुई और घर में पहली मृत्यु — छोटे भाई की — हुई, तो उस अकाल मृत्यु के लिए उसने कुछ नहीं किया: न नारायण नागबली, न कोई पिंडदान, केवल सामान्य 13 दिन का श्राद्ध। साल भर की वार्षिकी पूरी होने से पहले ही, घर में किसी के कहने पर कि "तुमने बलि नहीं चढ़ाई", उसने घर में ही पशु बलि चढ़ा दी। उस पशु बलि के साल भर के भीतर दोनों पुत्रों की अकाल मृत्यु हो गई; अब केवल छोटी पुत्री बची है।
108 पाठ पूरे होने के बाद, वक्ता कहते हैं, परेशानी शुरू हुई और घर में पहली मृत्यु उस व्यक्ति के छोटे भाई की हुई। उसने पहला कृत्य क्या किया? मृत्यु हुई, साल भर की वार्षिकी पूरी भी नहीं हुई, और किसी से यह बात भी नहीं की कि ऐसा कैसे हो गया — यह अकाल मृत्यु थी, अकाल मृत्यु, जो गंभीर विषय है। अकाल मृत्यु का न कोई नारायण नागबली हुआ, न कोई पिंडदान, कुछ नहीं। केवल सामान्य 13 दिन का श्राद्ध, जो अपने स्थान पर होता ही है, वह नियम उसने पूरा किया। फिर वार्षिकी पूरी होने से पहले ही, घर में किसी के कहने पर — किसी और से जानकारी लेकर कि "हमने ऐसे-ऐसे पाठ किया था, उसके कारण कहीं यह तो नहीं हुआ" — किसी ने बोल दिया कि तुमने बलि नहीं चढ़ाई। तो उसने घर में ही पशु बलि चढ़ा दी। और उस पशु बलि के साल भर के भीतर, वक्ता कहते हैं, उसके दो पुत्र और एक पुत्री में से दोनों पुत्रों की अकाल मृत्यु हो गई — किसी न किसी कारण से; कारण क्या बना वह छोड़िए। अब केवल छोटी पुत्री बची है। वह व्यक्ति, वे कहते हैं, आज गहरे मानसिक डिप्रेशन में है, भयभीत है, जहाँ जाता है रोता है।
लापरवाह तांत्रिक कार्य का दंड स्वयं का किया हुआ है और पलटा नहीं जा सकता
देवी नहीं, अतिक्रमण करने वाला दोषी; योग्यता लाओ
वक्ता श्रोता से कहते हैं कि स्वयं आकलन करें कि जब वह व्यक्ति, उसका परिवार या समाज अब जगदंबा को, सप्तशती को और उनके भक्तों को गाली दे रहा हो, तो गलती किसकी है: विधियुक्त कर्म किसने नहीं किया, दुर्गा सप्तशती का अतिक्रमण किसने किया, और स्पष्ट उच्चारण नहीं आता था तो किया क्यों। लोग तांत्रिक कार्य करने निकलते हैं, अनर्गल काम करते हैं, और पहली गलती पर और बड़ी गलती कर लेते हैं — तो ऐसे दंड उनके अपने ही कर्म का फल हैं; उन्हें हृदयहीन कहा जाए तो भी वह व्यक्ति स्वयं ज़िम्मेदार है। ऐसी घटनाएँ घट जाने पर कोई उन्हें पलट नहीं सकता; तर्क-कुतर्क और गाली-गलौज से कुछ नहीं होता। डरो मत, वे कहते हैं — डर हटाने के लिए सप्तशती पढ़ने की योग्यता लाओ, यानी संस्कृत का स्पष्ट उच्चारण सीखो; अस्पष्ट उच्चारण के दंड का अपना अनुभव वे फिर कभी के लिए छोड़ते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर अब उस व्यक्ति की पत्नी, उसके माता-पिता, उसके यार-मित्र, आसपास का समाज या वह स्वयं बैठकर जगदंबा को गाली दे रहे हों, सप्तशती को गाली दे रहे हों, और वक्ता जैसे भक्तों को, जो जगदंबा की जय-जयकार करते हैं, गाली दे रहे हों — तो भाई, इसमें गलती किसकी है? आप स्वयं आकलन करो, वे कहते हैं। विधियुक्त, विधि-सम्मत कर्म किसने नहीं किया? दुर्गा सप्तशती का अतिक्रमण किसने किया? जब तुम्हें स्पष्ट उच्चारण नहीं आता था, तुमने क्यों किया? तो, वे कहते हैं, लोगों को तांत्रिक कार्य करना होता है; उसमें अनर्गल काम कर लेते हैं; जब गलती होती है तो उस पर और बड़ी गलती कर लेते हैं; और फिर आपके अपने ही कृत्य और कर्म हैं जिनसे ऐसे दंड मिलते हैं। आप कहोगे कि वे हृदयहीनता के साथ ऐसे शब्द बोल रहे हैं — पर वह व्यक्ति अपनी गलती का स्वयं ज़िम्मेदार है। और इसके सिवाय भी बहुत से विषय हैं: ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। कहाँ गया? जिनके साथ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, वे कहते हैं, उसे अब कोई पलट नहीं सकता। इन विषयों पर तर्क बहुत हो सकता है, कुतर्क बहुत हो सकता है, गाली-गलौज हो सकती है — ऐसा कुछ नहीं होगा। याद रखिए, वे कहते हैं, यह कोई वीडियो वायरल करने का विषय नहीं है; यह कोई नकारात्मक विषय नहीं है। वे सदैव सचेत करते हैं: डरो मत — उस डर को दूर करने के लिए अपने भीतर योग्यता लाओ। सप्तशती पढ़ने की योग्यता चाहिए। उसके लिए क्या करना है? संस्कृत का स्पष्ट उच्चारण सीखिए। बिना सीखे, बिना विधि जाने जब करते हो, तभी तुम्हारे साथ दिक्कत होती है। वे जोड़ते हैं कि उनका निजी अनुभव भी कुछ इससे संबंधित है — गलत, अस्पष्ट उच्चारण और गलत प्रकार के कृत्य से किस-किस प्रकार के दंड भुगतने पड़ते हैं — पर वह एक अलग विषय है, जिसे वे फिर कभी के लिए रखते हैं।
नित्य पूर्ण पाठ का सामर्थ्य न हो तो हिंदी में महाविद्या क्रम की सप्तशती
सप्तशती को मज़ाक में न लें; एक-एक सीढ़ी चढ़ें
वक्ता कहते हैं कि इस व्यक्ति के जीवन से सबको, उनके सहित, यह बड़ी सीख मिलती है: गलत तरीके से न करें, और सप्तशती को मज़ाक में न लें। अगर नित्य पाठ करने का सामर्थ्य नहीं है तो क्यों कर रहे हो? मत करो। महाविद्या क्रम से करो, भावपूर्ण ही करो, हिंदी में ही करो — उससे पॉज़िटिव परिणाम मिलते हैं, और उसकी विधि और अनुभव उन्होंने अलग से बताए हैं। व्यक्ति को बहुत जल्दी रहती है। भगवती से दूर मत भागिए; उनके निकट जाना है तो सही मार्ग पर चलिए। अगर चार सीढ़ी एक साथ लाँघने का सामर्थ्य नहीं है, तो या तो सामर्थ्यवान बनें या एक-एक सीढ़ी आराम से चढ़ें — इसी में समझदारी है।
इस व्यक्ति के जीवन को देखकर, वक्ता कहते हैं, सबको — उनके सहित — बहुत बड़ी सीख मिलती है: गलत तरीके से न करें। सप्तशती को मज़ाक में न लें। वे बताते हैं कि सप्तशती के और भी विषय उन्होंने बताए हैं, जिनमें महाविद्या क्रम से सप्तशती पाठ करने की विधि भी है। अगर नित्य पाठ करने का सामर्थ्य नहीं है तो क्यों कर रहे हो? मत करो। महाविद्या क्रम से करो; भावपूर्ण ही करो; हिंदी में ही करो। उससे पॉज़िटिव परिणाम मिलते हैं, और उस क्रम से जीवन में क्या-क्या पॉज़िटिव हुआ उसके अनुभव उन्होंने अलग से बताए हैं। लेकिन, वे कहते हैं, व्यक्ति को बहुत जल्दी रहती है। वे यह उस व्यक्ति के विरुद्ध नहीं कह रहे, वे जोड़ते हैं — इसे केस स्टडी कहिए, जीवन कहिए; इससे सीखने और समझने का विषय है कि लोग गलती न करें। भगवती से दूर मत भागिए; और उनके निकट जाना है तो सही मार्ग पर चलिए। अगर हमें नहीं पता कि चार सीढ़ी एक साथ कैसे लाँघी जाती है — हमारी योग्यता, हमारा सामर्थ्य नहीं है — तो या तो हम सामर्थ्यवान बनें कि चार सीढ़ी लाँघ पाएँ, या फिर एक-एक सीढ़ी आराम से चढ़ें। इसी में, वे कहते हैं, अपनी समझदारी है। बाकी, वे समापन करते हैं, आपके अपने कुतर्क, आपके अपने विचार, आपकी अपनी महानता और आपकी अपनी नियति।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।