गलत विधि से की गई दुर्गा सप्तशती शतचंडी और तीन अकाल मृत्यु — वक्ता द्वारा गिनाई गई गलतियाँ और उनसे निकले नियम

गलत विधि से की गई 108 पाठ की दुर्गा सप्तशती और उसके बाद तीन अकाल मृत्युओं की सत्य घटना, और वक्ता द्वारा गिनाई गई गलतियाँ तथा उनसे निकाले गए नियम।

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01

गलत विधि से दुर्गा सप्तशती कृपा नहीं, कष्ट लाती है

तंत्रोक्त ग्रंथ विधियुक्त कर्म माँगता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:03–00:51

वक्ता कहते हैं कि सही विधि-विधान से नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करने पर जगदंबा की ऐसी कृपा होती है कि कोई भौतिक कामना अधूरी नहीं रहती — लेकिन जब नियति से प्रेरित होकर गलत विधि से, गलत तरीके से सप्तशती का अनुष्ठान किया जाता है तो जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं, वही सामान्य विषय कि देव या मंत्र शाप लग जाए। भावपूर्वक उपासना अपनी जगह ठीक है, पर तंत्रोक्त विधि अपनाने पर विधियुक्त कर्म ही करना चाहिए। गलत पारायण की गई सप्तशती, वे कहते हैं, पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर लील सकती है: उसके 700 मंत्र तांत्रिक हैं, सामान्य नहीं।

02

सत्य घटना: स्वयं सीखकर की गई 108 पाठ की शतचंडी और उसके बाद तीन अकाल मृत्यु

गुरु का आदेश, कोई विधि नहीं, पुस्तक से सीखा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:52–03:33

वक्ता कहते हैं कि दो व्यक्तियों के लगभग एक जैसे मामले उनके पास आए; वे केवल उसी का विषय रख रहे हैं जिसने अनुमति दी। वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित एक व्यक्ति को उसके वैष्णव गुरु ने भगवती के प्रति उसकी श्रद्धा देखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का आदेश दिया — पहले नौ पाठ, फिर 100–108 दिन की शतचंडी। गुरु ने घर या मंदिर में पारायण की कोई विधि नहीं बताई, इसलिए उसने दुर्गा अर्चन पद्धति से जो जानकारी मिली वह लेकर स्वयं ही शुरू कर दिया। उत्पात बीच में ही शुरू हो गया; उसके बाद के तीन साल में परिवार के तीन चलते-फिरते लोगों की मृत्यु हुई — दो उसके पुत्र, अब एक पुत्री बची है, और छोटा भाई जिसे उसने पुत्रवत् स्नेह दिया था।

03

गलती: ब्राह्मण होकर यज्ञोपवीत त्यागना और केवल पाठ के दिनों में धारण करना

गुरु की अनुमति से जनेऊ का त्याग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:34–04:19

वक्ता कहते हैं कि उन्हें पहला आश्चर्य यह हुआ कि वह व्यक्ति ब्राह्मण होते हुए भी यज्ञोपवीत का त्याग कर चुका था और नित्य नियम से उसे धारण नहीं करता था; उसने यज्ञोपवीत केवल तब तक धारण किया जब तक 100–108 पाठ पूरे नहीं हुए, और हवनात्मक विधान तो छोड़ ही दीजिए। बताया गया कि गुरु से आदेश मिला था कि "नियम नहीं पाल पाते तो इस विधान से त्याग दो और पूजन के समय धारण कर लेना" — वक्ता अपने अनुसार इसे पहली गलती मानते हैं: पूरी चीज़ यहीं गड़बड़ हो जाती है।

04

उच्चारण अशुद्ध हो तो क्या दुर्गा सप्तशती संस्कृत में पढ़नी चाहिए?

बदले में भावपूर्वक हिंदी, या केवल स्तुतियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:20–05:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वे सदैव कहते हैं: भगवती के प्रति भक्ति-भावना है पर संस्कृत का उच्चारण नहीं आता, अभ्यास नहीं किया, सप्तशती सीखी नहीं, तो भाव-प्रधानता के साथ हिंदी में ही पाठ कीजिए, जगदंबा उससे प्रसन्न होंगी। इस व्यक्ति ने 108 पाठ संस्कृत में किए, अपने ही कहने से बहुत अशुद्धियों के साथ, और गुरु की कही कथा से तसल्ली रखी कि अस्पष्ट उच्चारण से कोई विशेष दिक्कत नहीं; वक्ता इसे एक स्तर तक मानते हैं, पर 108 पाठ में हर बार उच्चारण गलत हो तो यही सबसे बड़ा ब्लंडर है, और अर्थ से अनर्थ होना दुर्गति का एक कारण बना। पूर्ण सप्तशती के बदले, वे कहते हैं, केवल स्तुतियाँ करो — रात्रि सूक्तम्, देवी सूक्तम, चतुर्थ अध्याय की स्तुति, शक्रादि स्तुति — माँ उससे प्रसन्न होंगी।

05

सप्तशती पारायण में कर्म-साक्षी दीपक और अखंड ज्योत

छूटा हुआ साक्षी दीपक, और हर पारायण पर एक ज्योत का नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:31–06:07

वक्ता कहते हैं कि तीसरी बात यह है कि पता नहीं क्यों उस व्यक्ति को यह नियम नहीं बताया गया कि जिस समय पाठ करो उस समय कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित कर लें, और नवरात्र में अखंड ज्योति आदि रखें। उसे अखंड ज्योत का जो नियम बताया गया था वह था: हर पारायण के साथ एक अखंड ज्योत — आज एक जलाई, कल के पाठ के साथ दूसरी जलाएँगे, आज वाली जब तक जले जले, पूरी होने पर उसे हटा दें, विसर्जन कर दें। यही उसका नियम था।

06

बिना हवन नित्य मंडल आवाहन घर के सप्तशती पारायण का नियम नहीं

पुस्तक से याग-स्तर का पूजन, हवन के बिना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:08–07:06

वक्ता कहते हैं कि उस व्यक्ति ने मंडल पूजन आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री जी की सबसे लोकप्रचलित पुस्तक दुर्गा अर्चन पद्धति से सीखा, जितना बन पड़ा नवग्रह मंडल आदि बनाया, और प्रतिदिन हर मंडल के हर देवता का उतना ही बृहत् विधि से आवाहन करता जितना उसमें दिया है — जो चंडी याग में होता है — फिर हर पाठ के बाद विसर्जन। लेकिन याग में आवाहन के साथ हवनात्मक विधान रहता है, और 108 पाठ में उसने कभी हवन नहीं किया। पूरे मंडल के साथ नित्य आवाहन-विसर्जन घर के 108 पाठ पारायण का नियम होता ही नहीं; इसके विकल्प हैं, और जो जिस चीज़ का जानकार है उसे वही सही ढंग से करनी चाहिए।

07

सप्तशती पारायण के साथ ज़रूरी सहायक पूजन और भेंट

गणपति, भैरव, बटुक, योगिनी, नैवेद्य, बलि, कुछ हवन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:07–07:33

वक्ता कहते हैं कि पाँचवीं गलती यह थी कि किसी प्रकार का कोई गणेश अनुष्ठान नहीं, कोई भैरव अनुष्ठान नहीं, न बटुक पूजन, न योगिनी पूजन, न कोई विशेष नैवेद्य, भोग या भेंट, न किसी प्रकार की बलि — केवल सामान्य पाठ चल रहा था। अगर वह अर्चन पद्धति के ही हवनात्मक विधान का सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार भी अनुसरण करता तो कुछ विधान और हो जाते और थोड़ी-बहुत शांति बनी रहती। उसने कभी नहीं किया।

08

संस्कृत में नित्य षडंग सप्तशती पाठ के साथ अनिवार्य बलि

चंडी बलिप्रिया हैं: रोज़ एक नींबू, अष्टमी पर 9/18/27

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:34–08:50

वक्ता कहते हैं कि भवानी स्वयं सप्तशती में कहती हैं कि जो कोई जानकर या अनजाने में वार्षिक पूजन में मुझे बलि देता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं — चंडी बलिप्रिया हैं, इसलिए पाठ होगा तो बलि अवश्य चढ़ेगी; उस व्यक्ति ने कभी हिंदी में न पढ़ने से यह जाना ही नहीं और कभी बलि नहीं दी। उनका नियम, भयभीत करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि यह तांत्रिक ग्रंथ है: संस्कृत में छह अंगों (षडंग) के साथ नित्य सप्तशती पाठ करने पर रोज़ कम से कम एक बलि दें — नींबू की, या लौंग-कपूर की; कुष्मांड की वे नहीं कहेंगे — और सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार अष्टमी या चतुर्दशी को नौ, अठारह या सत्ताईस नींबू की अच्छी बलि। इससे उनकी योगिनियाँ संतुष्ट रहती हैं, दुर्भिक्ष-दुर्योग और दुष्ट ग्रहों का प्रकोप हटता है, कृपा मिलती है, और गलतियों की क्षमा मिलती है।

09

तंत्र के विषयों में फिलॉसफी और भक्ति-भाव की जगह नहीं

फिलॉसफी वाले का कुछ नहीं जाता; सुनने वाले का जीवन बर्बाद

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:51–09:32

वक्ता कहते हैं कि यह कोई मनोवैज्ञानिक विषय नहीं है, न ही फिलॉसफी झाड़ने का विषय है। जो लोग तंत्र के विषयों में फिलॉसफी घुसेड़ते हैं वे इन विषयों से दूर रहें — यह उनका विषय नहीं है — क्योंकि उनकी बातें सुनकर लोग ऐसे ग्रंथों में अनर्गल कृत्य और गलतियाँ कर बैठते हैं। फिलॉसफी वाले का कुछ नहीं जाता, पर उस बेचारे का जीवन बर्बाद हो जाता है, जैसे इस व्यक्ति का हो रहा है। भक्ति-भाव और फिलॉसफी को तंत्र के विषयों से दूर रखें, वे निवेदन करते हैं।

10

शतचंडी के दौरान ब्रह्मचर्य और "शाक्त की पत्नी भगवती है" वाला तर्क

गलत तर्क पर छोड़ा गया विशेष नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:33–10:03

वक्ता कहते हैं कि ऐसे पारायण में ब्रह्मचर्य पालन और खानपान के लिए विशेष नियम और सावधानियाँ हैं। उस व्यक्ति को कहा गया था कि जब आप शाक्त हैं तो आपकी पत्नी भी भगवती का स्वरूप है — उन्हें प्रसन्न नहीं रखोगे तो भगवती को कैसे प्रसन्न रखोगे? — वही विषय जिस पर एक बार पूरी कंट्रोवर्सी हुई थी। इसी चक्कर में उसने ब्रह्मचर्य का पालन ही नहीं किया: सात्विक खाना-पीना ठीक था, पर ब्रह्मचर्य का कोई विशेष पालन नहीं, सप्ताह में एकाध बार गृहस्थ कार्य होता रहा। वक्ता कहते हैं यह बिल्कुल गलत है, यह नहीं होना चाहिए था।

11

अकाल मृत्यु पर गलत प्रतिक्रिया: न नारायण नागबली, फिर सुनी-सुनाई पर घर में पशु बलि

पहली मृत्यु के बाद गलती पर और बड़ी गलती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:04–11:02

वक्ता कहते हैं कि 108 पाठ पूरे होने के बाद जब परेशानी शुरू हुई और घर में पहली मृत्यु — छोटे भाई की — हुई, तो उस अकाल मृत्यु के लिए उसने कुछ नहीं किया: न नारायण नागबली, न कोई पिंडदान, केवल सामान्य 13 दिन का श्राद्ध। साल भर की वार्षिकी पूरी होने से पहले ही, घर में किसी के कहने पर कि "तुमने बलि नहीं चढ़ाई", उसने घर में ही पशु बलि चढ़ा दी। उस पशु बलि के साल भर के भीतर दोनों पुत्रों की अकाल मृत्यु हो गई; अब केवल छोटी पुत्री बची है।

12

लापरवाह तांत्रिक कार्य का दंड स्वयं का किया हुआ है और पलटा नहीं जा सकता

देवी नहीं, अतिक्रमण करने वाला दोषी; योग्यता लाओ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:03–12:51

वक्ता श्रोता से कहते हैं कि स्वयं आकलन करें कि जब वह व्यक्ति, उसका परिवार या समाज अब जगदंबा को, सप्तशती को और उनके भक्तों को गाली दे रहा हो, तो गलती किसकी है: विधियुक्त कर्म किसने नहीं किया, दुर्गा सप्तशती का अतिक्रमण किसने किया, और स्पष्ट उच्चारण नहीं आता था तो किया क्यों। लोग तांत्रिक कार्य करने निकलते हैं, अनर्गल काम करते हैं, और पहली गलती पर और बड़ी गलती कर लेते हैं — तो ऐसे दंड उनके अपने ही कर्म का फल हैं; उन्हें हृदयहीन कहा जाए तो भी वह व्यक्ति स्वयं ज़िम्मेदार है। ऐसी घटनाएँ घट जाने पर कोई उन्हें पलट नहीं सकता; तर्क-कुतर्क और गाली-गलौज से कुछ नहीं होता। डरो मत, वे कहते हैं — डर हटाने के लिए सप्तशती पढ़ने की योग्यता लाओ, यानी संस्कृत का स्पष्ट उच्चारण सीखो; अस्पष्ट उच्चारण के दंड का अपना अनुभव वे फिर कभी के लिए छोड़ते हैं।

13

नित्य पूर्ण पाठ का सामर्थ्य न हो तो हिंदी में महाविद्या क्रम की सप्तशती

सप्तशती को मज़ाक में न लें; एक-एक सीढ़ी चढ़ें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:52–13:55

वक्ता कहते हैं कि इस व्यक्ति के जीवन से सबको, उनके सहित, यह बड़ी सीख मिलती है: गलत तरीके से न करें, और सप्तशती को मज़ाक में न लें। अगर नित्य पाठ करने का सामर्थ्य नहीं है तो क्यों कर रहे हो? मत करो। महाविद्या क्रम से करो, भावपूर्ण ही करो, हिंदी में ही करो — उससे पॉज़िटिव परिणाम मिलते हैं, और उसकी विधि और अनुभव उन्होंने अलग से बताए हैं। व्यक्ति को बहुत जल्दी रहती है। भगवती से दूर मत भागिए; उनके निकट जाना है तो सही मार्ग पर चलिए। अगर चार सीढ़ी एक साथ लाँघने का सामर्थ्य नहीं है, तो या तो सामर्थ्यवान बनें या एक-एक सीढ़ी आराम से चढ़ें — इसी में समझदारी है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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