संकट नाशन गणपति स्तोत्र — पाठ करें, आठ बार लिखें, ब्राह्मण को दें
संकट नाशन गणपति स्तोत्र का पाठ और लेखन प्रयोग।
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हर उपाय के बाद भी विघ्न न छूटें तो गणपति की शरण
छह महीने संकट नाशन स्तोत्र का पाठ
वक्ता कहते हैं कि जब संकट बढ़ते जाएँ और मिटें ही नहीं — कई साधनाएँ, अनुष्ठान, ब्राह्मणों, साधकों और तांत्रिकों के पास जाना, और जन्म कुंडली में चल रही ग्रह की महादशा-अंतरदशा के लिए पूजन, स्नान, दान करवा लेने के बाद भी — और हर नए काम में विघ्न और बार-बार हानि हो, तब प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता गणपति की शरण लेनी चाहिए। वे कहते हैं कि माना जाता है, जो व्यक्ति नारद पुराण के संकट नाशन स्तोत्र (संकट नाशन गणपति स्तोत्रम्) का छह महीने तक प्रतिदिन नियमित पाठ करे, उसे जो चाहे वह मिलता है: धन, वंश वृद्धि के लिए पुत्र या संतान, या विद्या। प्रमाण में वे शिव महापुराण बताते हैं: जब शिव त्रिपुरासुर के तीनों पुरों को भेद नहीं पा रहे थे, तब आकाशवाणी ने उन्हें गणपति और भगवती भद्रकाली की एक साथ पूजा करने को कहा।
वक्ता संकट नाशन स्तोत्र — संकट नाशन गणपति स्तोत्रम् — का परिचय देते हैं, जिसे वे नारद पुराण के अंतर्गत बताते हैं। वे बताते हैं कि कहा जाता है, जो व्यक्ति छह महीने तक लगातार प्रतिदिन इसका नियमित पाठ करे, उसे जो चाहिए वह मिलता है: धन चाहे तो धन, पुत्र चाहे तो पुत्र, वंश वृद्धि के लिए विशेष संतान, विद्या चाहे तो विद्या। वे जोड़ते हैं कि किसी भी कार्य से पहले गणेश की सेवा-पूजा अति अनिवार्य है, क्योंकि गणपति प्रथम पूज्य हैं। वे जिस स्थिति की बात करते हैं: संकट बहुत बढ़ गए हैं और नष्ट नहीं हो रहे। आपने कई प्रकार की साधना कर ली, अनुष्ठान करवा लिए, विद्वानों, ब्राह्मणों, साधकों और तांत्रिकों के पास चले गए। जन्म कुंडली में कोई दोष है, या किसी ग्रह की महादशा या अंतरदशा चल रही है, और उसकी शांति के लिए पूजन, स्नान, दान भी करवा लिया — फिर भी कोई विशेष लाभ नहीं। हर नए काम में विघ्न-बाधा आती है, बार-बार हानि होती है, विघ्न पीछा नहीं छोड़ते। ऐसी विपरीत और विकट परिस्थिति में, वे कहते हैं, गणपति की शरणागति लेनी चाहिए। प्रमाण में वे शिव महापुराण की कथा बताते हैं: त्रिपुरासुर के तीनों पुर एक साथ नहीं आ रहे थे और भगवान शिव (वे उन्हें पशुपतिनाथ कहते हैं) उन्हें भेद नहीं पा रहे थे, तब आकाशवाणी हुई कि हे रुद्र, आप विघ्नहर्ता गणपति और भगवती भद्रकाली की एक साथ पूजा कीजिए। इसलिए, वे कहते हैं, जब हम भी जीवन में किसी लक्ष्य तक न पहुँच पा रहे हों और बहुत विघ्न आ रहे हों, तब गणपति की शरण लेनी चाहिए।
शास्त्र क्या कहता है
A voice from the sky tells Śiva he cannot destroy the three cities until Vināyaka is worshipped, so Śiva summons Bhadrakālī and worships Gaṇeśa.
The speaker has the voice ask for Gaṇapati and Bhadrakālī to be worshipped together; in the text Śiva summons Bhadrakālī and the worship is of Gaṇeśa.
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भो भो न यावद्भगवन्नर्चितोऽसौ विनायकः । पुराणि जगदीशेश साम्प्रतं न हनिष्यति ॥ ६
"अरे, अरे! हे भगवन्! जबतक उस विनायकका पूजन नहीं होगा, हे जगदीश्वर! तबतक आप अभी पुरोंका नाश नहीं कर सकेंगे।"
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं गजवक्त्रमपूजयत् । भद्रकालीं समाहूय ततोऽन्धकनिषूदनः ॥ ७
यह वचन सुनकर अन्धकनिषूदन शिवजीने भद्रकालीको बुलाकर गजवदन गणेशजीका पूजन किया।
संकट नाशन गणपति स्तोत्र को आठ बार लिखकर ब्राह्मण को देना
न मिटने वाले कष्टों के लिए चतुर्थी का प्रयोग
जिनके कष्ट बहुत अधिक हैं और कई उपायों के बाद भी नहीं मिट रहे, उनके लिए वक्ता गणपति का एक प्रयोग बताते हैं जो कृष्ण या शुक्ल किसी भी पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ होता है। नारद पुराण के संकट नाशन स्तोत्र (संकट नाशन गणपति स्तोत्रम्) का पाठ करें, और साथ में उसके मूल भाग को आठ बार लिखें — संभव हो तो प्रतिदिन, नहीं तो हर चतुर्थी को — लिखकर रखें, और कुछ दक्षिणा सहित ब्राह्मण को दान दे दें। वे कहते हैं कि इससे सभी संकट अवश्य नष्ट होंगे और गणपति कृपा करेंगे। इसके साथ वे अपनी अलग, सरल अष्टविनायक चतुर्थी पूजा और हवन की विधि भी करने को कहते हैं, जो दूसरे वीडियो में है।
वक्ता कहते हैं कि यह साधना चतुर्थी तिथि से आरंभ होती है, चाहे कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की। वे अपनी एक अलग, बहुत सरल अष्टविनायक साधना की ओर भी इशारा करते हैं जो दूसरे वीडियो में है: महाराष्ट्र और आसपास प्रकट हुए गणपति के आठ स्वरूपों की चतुर्थी तिथि को पूजा कैसे करें, साथ में हवन कैसे करें। उसके साथ, अगर आपके कष्ट बहुत अधिक हैं और नहीं मिट रहे, तो यह प्रयोग भी करना है। संकट नाशन स्तोत्र — संकट नाशन गणपति स्तोत्रम्, जिसे वे नारद पुराण के अंतर्गत बताते हैं — का पाठ तो करना ही है। इसके साथ स्तोत्र के मूल भाग को, जो स्क्रीन पर लिखा जाता दिखाया गया है, आठ बार लिखना है। संभव हो तो प्रतिदिन लिखें; नहीं तो हर चतुर्थी तिथि को लिखकर रखें, और कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। सहित ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। को दान दे दिया करें। इससे, वे कहते हैं, आपके सभी संकट अवश्य नष्ट होंगे और गणेश कृपा करेंगे। मूल भाग में कौन से श्लोक आते हैं, यह वीडियो में बोला नहीं गया; वह केवल स्क्रीन पर दिखाया गया है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।