साधना के अनुभव बताने से तपोबल क्यों घटता है — गोपनीयता, गुरु का अपवाद, और वह एक साधक जिसे बताना उचित है
साधना के अनुभव क्यों गुप्त रखने चाहिए, और यदि किसी को बताया जाए तो किसे।
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साधना-अनुभव एक नशा जो साधक को न इधर का रखता है न उधर का
त्रिशंकु अवस्था और अनुभव की लत
वक्ता कहते हैं कि विशेष रूप से नए साधक अपने अनुभव लोगों के सामने बहुत बताते हैं और बार-बार पूछते हैं कि इसका क्या अर्थ है — और यही आदत स्वयं एक जाल है। उनके अनुसार अनुभव व्यक्ति को त्रिशंकु बना देता है — न वह पूर्ण साधक बन पाता है, न सामान्य स्तर पर रह पाता है — और उसे एक फैंटेसी की दुनिया में ले जाकर बीच में फँसा देता है। वे इसे नशा कहते हैं: एक बार अनुभव मिलने लगे तो व्यक्ति को हमेशा चाहिए, और बंद हो जाए तो वह जगह-जगह पूछता फिरता है कि अब क्यों नहीं हो रहा।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि विशेष रूप से नए साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। अपने अनुभव लोगों के सामने बहुत बताते हैं और चिल्ला-चिल्ला कर पूछते हैं — मुझे यह अनुभव हुआ, इसका क्या अर्थ है? वे कहते हैं कि साधना के ग्रुप्स में जब कोई किसी साधना के विषय में पोस्ट डालता है तो जिसने वही साधना की है वह नीचे कमेंट करता है — मैंने इतने दिन यह साधना की, मुझे ये-ये अनुभव हुए, इसका क्या अर्थ है? लोग, उनके अनुसार, अपना जीवन 'अनुभव और अर्थ' के ऊपर अटका देते हैं। वे कहते हैं कि वे इस विषय को टेक्निकली और गहराई से देखेंगे और यह भी तय करेंगे कि क्या करना चाहिए और किस बात के लिए क्यों मना किया जाता है। अनुभव, वे कहते हैं, एक ऐसी चीज़ है जो व्यक्ति को त्रिशंकु बना कर रख देती है। साधक न ठीक से पूर्ण साधक बन पाता है, न सामान्य स्तर पर रह पाता है; वह एक फैंटेसी की दुनिया में चला जाता है और पूरी तरह बीच की अवस्था में फँस कर रह जाता है। वे अनुभव को नशा कहते हैं: एक बार मिलना शुरू हुआ तो व्यक्ति को हमेशा चाहिए। अनुभव न मिले तो वह जगह-जगह पूछता फिरता है — पहले मुझे यह अनुभव होता था, अब नहीं हो रहा; पहले ऐसा हुआ था, अब नहीं होता। वह यह प्रश्न बार-बार पूछता रहता है। इसीलिए, वक्ता कहते हैं, अपने अनुभव बताने का यह विषय बहुत विशेष हो जाता है।
सामान्य साधक नित्य चालीसा-पाठ से कैसे आरंभ करता है और धीरे-धीरे तपोबल कैसे बनता है
बूँद-बूँद से घड़ा भरता है
वक्ता बताते हैं कि एक सामान्य नया व्यक्ति, जिस पर कोई अभिचार प्रयोग नहीं है, साधना तक कैसे आता है: किसी सत्संग या किसी व्यक्ति को सुनकर थोड़ा पुण्य उदय होता है और वह अपने इष्ट देवता — महाकाली, शिव या हनुमान जी — का चालीसा शुरू कर देता है — नहा-धोकर सुबह-शाम पाँच से पंद्रह मिनट, पुष्प, भोग, साथ में कोई स्तोत्र या मंत्र और आरती। नियम से तीन महीने, छह महीने, साल, दो साल चलने पर धीरे-धीरे तपोबल बनता है — बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, वे कहते हैं — और एक समय आता है जब व्यक्ति अनुभवों के दौर से गुज़रने लगता है।
वक्ता एक बिल्कुल नए व्यक्ति का उदाहरण लेते हैं जो साधना आरंभ कर रहा है और जिस पर किसी प्रकार का अभिचार प्रयोग नहीं है; वे कहते हैं कि वे दोनों स्थितियाँ साथ लेकर चलेंगे। ऐसा व्यक्ति आरंभ कैसे करता है? एकाएक कुछ घटता है — कहीं से कुछ सुना, कोई सत्संग, कोई अन्य व्यक्ति — और जब थोड़ा-सा पुण्य उदय होता है तो मन में आता है कि हाँ, मुझे भी सेवा-पूजा करनी चाहिए। मन एक बिंदु पर क्लिक कर जाता है और वहीं साधना शुरू होती है। सामान्य लोग, वे कहते हैं, अपने इष्ट देवता के चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। से शुरू करते हैं। जिसकी इच्छा भगवती महाकाली की सेवा की हुई, उसने महाकाली चालीसा शुरू कर दिया; जिसे शिव जी का करना है, उसने शिव चालीसा। यह नियमित रूप से होता है, भले ही पाँच ही मिनट का समय हो: सुबह नहा-धोकर, भगवती का पुष्प आदि से अच्छे से शृंगार करके, भोग लगाकर, आराम से बैठकर पाँच, दस, पंद्रह मिनट चालीसा पाठ, चालीसा में जो एकाध स्तोत्र या मंत्र होता है उसका भी पाठ, और फिर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है।। हनुमान जी का करने वाला हनुमान चालीसा, bajrang-baan, हनुमान अष्टक और राम जी का रामावतार पाठ करता है, साथ में दुर्गा चालीसा भी जुड़ सकता है। इतना नियम, वे कहते हैं, सभी बना लेते हैं। जब यह क्रम से, नियम से, सुबह-शाम चलता रहता है — तीन महीना, छह महीना, साल भर, दो साल — तो एक समय आता है। धीरे-धीरे तपोबल बनता जाता है; बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता है, वे कहते हैं, लेकिन भरता है। और एक समय आता है जब व्यक्ति अनुभवों के दौर से गुज़रना आरंभ करता है।
स्वप्न-दर्शन: देवता की कृपा का पहला संकेत
स्वप्न में पूर्वाभास, बार-बार, विश्वास जगाता है
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला अनुभव यह होता है कि साधक स्वप्न में दिव्य चीज़ों की अनुभूति करने लगता है: उसे कुछ दिखता है, पता चल जाता है कि दो-चार दिन बाद कुछ होने वाला है, और बाद में वह जोड़ लेता है — अरे, यह तो मैंने स्वप्न में देखा था। जब यह दो बार, चार बार, दस बार दोहराता है तो वह मानने लगता है कि जिस शक्ति की वह आराधना कर रहा है उसकी कृपा अब उस पर हो रही है, और यहीं से वह पूजा जो गुप्त और क्रमबद्ध चल रही थी, बदलने लगती है।
अनुभव कैसे आरंभ होते हैं? वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम अनुभव यह होना शुरू होता है कि व्यक्ति स्वप्न में कुछ न कुछ दिव्य चीज़ों की अनुभूति करने लगता है। उसे कुछ दिखना शुरू होता है; उसे पता चलता है कि दो-चार दिन बाद कुछ होने वाला है, स्वप्न में उसकी अनुभूति हो जाती है। वह घटता है और वह जोड़ लेता है — अरे, यह तो मैंने स्वप्न में देखा था। दो बार, चार बार, दस बार यह देखने के बाद, जब यह चीज़ बार-बार दोहराने लगती है, तो साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। कहीं न कहीं मानने लगता है कि हाँ, जिस शक्ति की मैं आराधना कर रहा हूँ उसकी कृपा अब मुझ पर हो रही है। और यह चीज़ जो इतने दिन गुप्त रूप से या सामान्य रूप से क्रमबद्ध चल रही थी — हम पूजा-पाठ कर रहे थे — वक्ता कहते हैं, यहीं से उसमें थोड़ा बदलाव आना शुरू हो जाता है।
साधक-मंडली में अनुभव बताने से अहंकार पनपता है: महामाया की परीक्षा
प्रदर्शन, फैलती ख्याति और कर्तापन का भाव
वक्ता कहते हैं कि जिस साधक को अनुभव होते हैं और जिसे नहीं होते पर वह चीज़ों को गुप्त नहीं रखता — दोनों एक ही जगह जाकर हिट करते हैं: प्रदर्शन। तीन-छह महीने की पूजा से मनोबल बनता है कि हम सेवक, पुजारी, साधक हैं और देवता की कृपा साथ है; मंडली में ज़रा-सी कृपा को बढ़ा-चढ़ाकर, नमक-मिर्च लगाकर बताया जाता है, एक दूसरे को बताता है, ख्याति फैलती है और एक वर्ग सम्मान देने लगता है, यहाँ तक कि बच्चों से प्रणाम करवाता है। यहाँ जो कर्तापन का भाव और अहं आता है, वे कहते हैं, वही महामाया की माया है — इष्ट की परीक्षा चल रही है — और यह दो-तीन साल में ही शुरू हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्य लोग जिन्हें कोई अनुभव नहीं भी होता, यदि वे चीज़ों को गुप्त नहीं रखते तो वे भी उसी जगह जाकर हिट करते हैं जहाँ अनुभव वाला जाता है: प्रदर्शन। प्रदर्शन क्यों शुरू होता है? क्योंकि तीन महीना, छह महीना पूजा करने पर मन में एक मनोबल उत्साहित हो जाता है — हम सेवक हैं, पुजारी हैं, साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं, यह कर रहे हैं तो परम शक्ति की कृपा हमारे साथ है, हमारे साथ कुछ अनिष्ट नहीं होता, हमारी बोली हुई बात सही हो जाती है। इस प्रकार के अप्रत्यक्ष अनुभव तो बन ही जाते हैं; और जब प्रत्यक्ष कोई घटना घट जाए, शक्ति की एक छटाँक भर कृपा साथ हो जाए, तो उसे और बढ़ाकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। मंडली बैठती है, वे कहते हैं, और बातचीत होती है। स्त्री हो या पुरुष, कोई अपना अनुभव साझा करता है — हम तो स्वप्न में ऐसा देखे, हनुमान जी का फलाना मंदिर देखे। जो व्यक्ति साधनात्मक दौर में चलकर यहाँ तक पहुँचा है, जिसे अनुभव हो रहे हैं, वह अपना बताता है — हाँ, मुझे भी ऐसा-ऐसा दिखा। दो-चार जिज्ञासु पूछते हैं क्या हुआ, कैसे हुआ, और फिर नमक-मिर्च लगा-लगा कर बताना शुरू होता है। सामान्य लोग भी कहते हैं: हम तो इतना ही करते हैं और इतने में ही मुझे यह मिल गया; हम फलाने को बोले थे कि तुम्हारे साथ ऐसा होगा, बात नहीं मानी, देखो गलत हो गया; उसने मेरे साथ गलत किया, उसके साथ ऐसा हो गया। ये चीज़ें वहीं से शुरू हो जाती हैं। जब गुप्तता आपके पास से छूटती है और अनुभव लोगों के सामने जाते हैं, वे कहते हैं, तो वे बढ़ते हैं। एक दूसरे को बताता है, दूसरा तीसरे को, और आपकी ख्याति शुरू हो जाती है। एक ऐसा वर्ग खड़ा होता है जो सामने से सम्मान देता है — आप पूजा-पाठ करते हैं, शुद्ध हैं, सात्विक प्रवृत्ति के हैं, भगवती की, आपके इष्ट की कृपा आपके पास है — और छोटे बच्चों से प्रणाम करवाता है। भीतर जो कर्तापन का भाव आने लगता है, जो अहं अंदर आता है — यही, वक्ता कहते हैं, महामाया की माया है; यहाँ इष्ट देवता की परीक्षा चल रही होती है। अब आप उस अहंकार से ग्रसित हो गए — मेरे पास यह शक्ति है, इनकी कृपा है। अभी यह बहुत छोटे स्तर पर है, केवल दो-तीन साल में, बड़ी बात तो छोड़ ही दीजिए — और इतने में ही अहं शुरू हो गया, और आप लोगों को अपने अनुभव बता रहे हैं।
पूजा और हवन की फोटो सोशल मीडिया पर डालने से साधक का तपोबल घटता है
अहं की तुष्टि जो भीतर से खोखला करती है
वक्ता एक दूसरा तरीका बताते हैं: साधक शुरू से ही अपनी हर चीज़ प्रदर्शित करने में विश्वास रखता है — बाल गोपाल के शृंगार, पूजन-स्थान और हवन की दस-बारह-बीस एडिट की हुई फोटो फेसबुक और स्टेटस पर। यह, वे कहते हैं, अहं की तुष्टि के लिए होता है कि लोग बोलें वाह, आप तो बहुत बड़े भक्त हैं — और यही संतुष्टि भीतर से खोखला करती रहती है। दोनों ही स्थितियों में — सामने का सम्मान और ऑनलाइन प्रदर्शन — कमाया हुआ तपोबल और पुण्य हर वह व्यक्ति ले जाता है जिसे बताया जाता है, इसीलिए गोपनीयता का निर्देश है: अनुभव अपने तक सीमित रखें।
मंत्र, साधना और पूजन-स्थान की गोपनीयता, और वह एक योग्य मार्गदर्शक जिससे साधक मंत्रणा करे
बताने से घटता है, छुपाने से तपोबल बढ़ता है
वक्ता कहते हैं कि ऋषि-मुनियों ने बार-बार कहा कि मंत्र, साधना, पूजन-स्थान और कौन-सी पूजा हो रही है — सब गुप्त रहे, और भटका हुआ साधक केवल अपने मार्गदर्शक और गुरु से मंत्रणा करे — एक परिपक्व, योग्य व्यक्ति जो इन परिस्थितियों से ऊपर उठा हो, न कि फेसबुक पोस्ट से मिला हर तीसरा व्यक्ति जो आज सहायता करे, कल उल्टा सुझाव दे और दस लोगों को बता दे। अनुभव बताने से घटता है; जितना छुपाया जाए और प्रदर्शन से दूर रहा जाए, उतना तपोबल बढ़ता है। जो शक्ति कृपा करने वाली थी वह बताने पर क्षीण होती है, इसलिए साझा केवल गुरु या योग्य साधक से, आगे बढ़ने के लिए, मान-सम्मान के लिए नहीं — दूसरों के सामने सही रुख यही है कि हम कुछ नहीं करते, मंदिर जाकर घंटी बजाते हैं, दीपक जलाते हैं।
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, पहले के समय में ऋषि-मुनियों ने बार-बार कहा कि मंत्र को गुप्त रखना है, अपनी किसी भी साधना को गुप्त रखना है, पूजन-स्थान को गुप्त रखना है, कौन-सी पूजा कर रहे हैं किसी को नहीं बताना है। केवल अपने मार्गदर्शक और गुरु-जन से मंत्रणा करनी है — मुझे ये अनुभव हुए, समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ। जब आप कहीं भटक रहे हों, तब किसी एक योग्य व्यक्ति से पूछना चाहिए, जो इन परिस्थितियों से ऊपर उठा हो, न कि ऐसा जो आपकी बात सुनकर आपको ही गलत सुझाव देने लगे। एक परिपक्व व्यक्ति होना चाहिए जिससे आप साझा करें। हर तीसरे व्यक्ति से नहीं, वे कहते हैं — जैसे फेसबुक पर, ग्रुप में होता है: किसी की पोस्ट पढ़ी, लगा कि यह बंदा बहुत मैच्योर है, और उसे अपना पूरा अनुभव जाकर बता दिया। वह आज आपकी सहायता करे, कल आपको ही कुछ उल्टा-सीधा सुझाव दे दे और आपका सब बिगड़ जाए; वह दस आदमियों को बता दे। ऐसा न हो, इसलिए किसी योग्य व्यक्ति पर विश्वास करके ही अनुभव बताने चाहिए। यह याद रखिए, वे कहते हैं: अनुभव बताने से वह घटता है। जितना अनुभव गुप्त रखेंगे, उतना तपोबल बढ़ेगा; जितना प्रदर्शन से दूर रहेंगे, अपने पूजा-पाठ के प्रदर्शन को छुपा कर चलेंगे, उतना वह बढ़ेगा। आगे वे इसी बात पर लौटते हैं: अनुभव बताने से जो भी शक्ति आप पर कृपा करने वाली होती है वह कहीं न कहीं क्षीण हो जाती है, घटने लगती है, तपोबल क्षीण होने लगता है। इसलिए अनुभव नहीं बताना — केवल अपने मार्गदर्शक, अपने गुरु, या ऐसे ही किसी योग्य साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। के साथ साझा करके आगे बढ़ने के लिए, न कि मान-सम्मान पाने या स्वयं को बड़ा दिखाने के लिए कि हम फलाने बहुत बड़े भक्त हैं, इतना कर लिया, उतना कर लिया। सीधी-सी बात, वे कहते हैं, यह कहनी है: भैया, हम कुछ नहीं करते; मंदिर जाते हैं, घंटी बजाते हैं, दीपक जलाकर रख आते हैं। दिखाना केवल योग्य व्यक्ति को है।
तिलक लगाना प्रदर्शन नहीं है; अपनी पूजा किसी अनजान को बताना प्रदर्शन है
संस्कृति और खुलासे के बीच रेखा कहाँ है
वक्ता कहते हैं कि तिलक या त्रिपुण्ड्र लगाना प्रदर्शन नहीं है — कोई टोके तो बस इतना कहना है कि यह सनातन संस्कृति है, आप भी लगाओ; और पूजा के बारे में पूछे तो कहना है कि हम ज़्यादा कुछ नहीं करते, भगवान के चरणों का तिलक मस्तक पर लगा लेते हैं। प्रदर्शन यह है कि पूछने पर बता दिया जाए कि आज सहस्रनामावली से भगवती का कार्य संपन्न किया और फिर सहस्रनाम क्या होता है यह भी समझाया जाए — उस व्यक्ति को जिसकी योग्यता और श्रद्धा का पता नहीं। ऐसी बातें गुप्त रखनी हैं और अयोग्य को बिल्कुल नहीं बतानी हैं; जब उनका पुण्य उदय होगा, वे स्वयं आएँगे।
तिलक लगाना प्रदर्शन नहीं है, वक्ता कहते हैं — निश्चिंत रहें। तिलक लगाते ही कोई बोले — अरे, इतना त्रिपुण्ड्र लगाते हो, बाबाजी बोल रहे हैं — तो उत्तर है: बाबाजी थोड़ी हैं, सनातन है, संस्कृति है भाई, हम लगाते हैं, आप भी लगाओ, आपको क्या परेशानी है? इतना ही बोलना है। यह कहने में कोई दिक्कत नहीं कि हम त्रिपुंड लगाते हैं, अपना मस्तक सजाते हैं, हमें अच्छा लगता है। पूजा-पाठ नहीं बोलना है; कोई पूछे भी तो — हाँ ठीक है, हम नहीं करते, उतना पूजा-पाठ नहीं है, लेकिन भगवान के पास जाते हैं और उनके चरणों में जो तिलक लगता है, वह अपने मस्तक पर लगा लेते हैं। बस इतनी-सी बात; इसमें कोई दिक्कत नहीं। लेकिन, वे कहते हैं, अब किसी ने कहा कि आपने तिलक लगाया है, बहुत अच्छा, क्या पूजा की? और आप बोले — हाँ, आज तो सहस्रनामावली से भगवती का कार्य संपन्न किया। अब वह पूछेगा — सहस्रनामावली, यह क्या होता है? और आप उसे पूरा बताने लगे — देखो, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। ऐसे-ऐसे होता है। अगला व्यक्ति योग्य है या नहीं, उसके मन में उसके प्रति श्रद्धा है या नहीं, पता नहीं — फिर भी आप बताए जा रहे हैं। क्यों बताना है? छोड़ दीजिए न, वे कहते हैं; ऐसे व्यक्ति को बताना ही क्यों है? क्यों दिखाना है कि आप पूजा-पाठ करते हैं और आपके भीतर बहुत भक्ति-भावना है? नहीं — इन चीज़ों को गुप्त रखिए, नहीं बताना है। अयोग्य को तो बिल्कुल नहीं। जिस दिन उनके पुण्यों का उदय होगा, पुण्य-उदय होगा, वे स्वयं आएँगे और वैसी स्थिति अपने आप बन जाएगी। लेकिन आपको जगह-जगह नहीं बताना है।
कष्ट में पड़े व्यक्ति को सामान्य सुझाव देना ठीक है; अपनी साधना का ब्योरा बताना नहीं
सामने वाले के स्तर से सलाह, अपनी गहराई कभी नहीं
यह पूछे जाने पर कि क्या कष्ट में पड़े व्यक्ति को कम से कम पूजा-पाठ का सुझाव दे सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि इसके लिए किसने मना किया है — लेकिन अपना पूजा-पाठ क्यों बताना: कौन-सा हवन, किस मंत्र का कितना जप, कौन-सी माला और उसे कैसे सिद्ध किया, स्वप्न में क्या दर्शन हुआ। जो कहे भैया जी या दीदी जी, मुझे ऐसा कष्ट है, क्या करूँ — उसे उसकी स्थिति के अनुसार कहें: शिव चालीसा, शिव जी के 108 नाम, रुद्राष्टक का पाठ करो, यूट्यूब से सीख लो — न कि यह कि हम शिव तांडव स्तोत्र बीज-मंत्र से संपुट करके इस विधि से करते हैं, तुम भी करो। किसी को भी उसके स्तर के अनुसार मंत्रणा दी जा सकती है, लेकिन स्वयं का अंत नहीं देना है।
दूसरी एक बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि लोग कहेंगे — ठीक है, हम अपने अनुभव नहीं बताएँगे, लेकिन किसी कष्ट में पड़े व्यक्ति को यह सुझाव तो दे सकते हैं कि वह पूजा-पाठ करे। यह कहने के लिए किसने मना किया है? लेकिन आप अपना पूजा-पाठ क्यों बता रहे हैं? क्यों कहना है: हम फलाना करते हैं, यह हवन करते हैं, इस मंत्र का इतना जप कर रहे हैं, मेरे पास यह माला है और इसे ऐसे सिद्ध किया है, जब यह वाली साधना की तो स्वप्न में ऐसा दर्शन हुआ? यह सब कहीं क्यों बकना है? मत बको, वे कहते हैं — इन चीज़ों को अपने तक सीमित रखो। यदि किसी को कहना ही है — भाई, साधना करो, पूजा-पाठ करो — तो उसे वैसा सुझाव दो, आराम से, एक सामान्य सुझाव। मान लीजिए कोई कहे — आप तो पूजा-पाठ करते हैं, भैया थोड़ा बताइए; या भैया जी, भाभी जी, दीदी जी, मुझे ऐसा-ऐसा कष्ट है, क्या करूँ? तो उनकी स्थिति के अनुसार कहें: शिव चालीसा का पाठ करो, शिव जी के 108 नाम का पाठ करो, रुद्राष्टक का पाठ करो; रुद्राष्टक कैसे करना है, यूट्यूब से सुनकर सीख लो। इस तरह बोल सकते हैं। यह नहीं कि हम शिव तांडव स्तोत्र इस-इस विधि से, बीज-मंत्र से संपुट करके करते हैं, तुम भी करो। अगला व्यक्ति उस योग्यता में है या नहीं, आपको पता नहीं, तो उसे अपनी चीज़ें क्यों बताओगे? किसी भी व्यक्ति को उसके स्तर के अनुसार मंत्रणा दी जा सकती है, वे कहते हैं, लेकिन स्वयं का अंत — अपनी गहराई — नहीं देना है। इस बात का विशेष ध्यान रखें।
विशेष स्थिति: डगमगाते हुए सच्चे साधक को प्रेरित करना
वह एक व्यक्ति जिसे थोड़ा बताया जा सकता है
वक्ता वह एक स्थिति बताते हैं जहाँ बताना ठीक है: कोई व्यक्ति योग्य है, अच्छी साधना करता है, मनोबल अच्छा है, भगवान के प्रति श्रद्धा है, लेकिन जीवन के कष्ट से उसका विश्वास डगमगा रहा है। ऐसे व्यक्ति को, वे कहते हैं, प्रेरित करने के लिए थोड़ा-बहुत बताइए — कथा-कहानी सुनाइए, उसे चार्ज कर दीजिए: करो, डरो मत, भागो मत — या थोड़ा अपना भी: ऐसा अनुभव मुझे एक बार हुआ था, फिर मैंने ऐसा किया, तुम भी करो। इतना ठीक है।
अनुभव और ऐसी चीज़ें किसे दिखानी हैं? वक्ता कहते हैं: मान लीजिए कोई व्यक्ति है जिसका भगवान के प्रति विश्वास कहीं डगमगा रहा है। वह योग्य है, अच्छी साधना करता है, मनोबल अच्छा है, भगवान के प्रति श्रद्धा है — लेकिन उसके जीवन में कष्ट है और वह डगमगा रहा है। वैसी स्थिति में उसे प्रेरित करने के लिए थोड़ा-बहुत बताइए, वे कहते हैं। थोड़ा बोलिए, उसे मोटिवेट कीजिए, कथा-कहानी सुनाइए, उसे चार्ज कर दीजिए — भाई करो, डरो मत, भागो मत। या थोड़ा अपना बता दीजिए: देखो, ऐसा अनुभव मुझे एक बार हुआ था, फिर हम ऐसे-ऐसे किए, ऐसा हुआ, तुम भी करो। वह, वे कहते हैं, ठीक है।
बताया हुआ अनुभव लौटकर नहीं आता: अनुभव कृपा-प्रसाद हैं, मान-सम्मान का साधन नहीं
अनुभव में अटके तो साधना-मार्ग से भटके
वक्ता अपने अनुभवों का पूरा पिटारा खोल देने से सावधान करते हैं। उनका उदाहरण: तबीयत खराब थी, साधक भगवती का आवाहन करके सोया, स्वप्न में उनका शेर आकर उसे चाटता है, शरीर गीला हो जाता है और बुखार उतर जाता है — यह सच्चा अनुभव किसी को बक दिया तो जीवन में दोबारा नहीं होगा; हो भी गया तो एक समय आएगा कि सिर पटक-पटक कर मर जाओगे, अनुभव नहीं होगा, क्योंकि आप उसी जगह अटक चुके हैं। उनका सूत्र: जहाँ अनुभव में अटके, साधना-मार्ग से भटके — अपने इष्ट देवता के प्रति समर्पित रहो। अनुभव कृपा-प्रसाद स्वरूप दिए जाते हैं यह दिखाने को कि देवता साथ हैं और मार्गदर्शन दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि लोग आपको बड़ा भक्त कहकर आपके अहं को तुष्ट करें।
लेकिन, वक्ता कहते हैं, यदि आप अपने अनुभवों का पूरा चिट्ठा, पूरा पिटारा खोलकर रख दोगे — हम तो यह साधना किए, भगवती का शेर हमारे स्वप्न में आ गया — तो बात दूसरी है। वे उदाहरण देते हैं: मेरी तबीयत खराब थी, मैं भगवती का आवाहन करके सोया, उनका शेर आकर मुझे पूरा चाटा, मेरा पूरा शरीर गीला हो गया और बुखार उतर गया। यह अनुभव आपने किसी को जाकर बक दिया — और सच में यह आपके साथ हुआ था। अब, वे कहते हैं, यह दोबारा जीवन में होने से रहा। कभी नहीं होगा। और अगर हो भी गया तो मानकर चलो कि एक समय आएगा कि सिर पटक-पटक कर मर जाओगे, अनुभव ही नहीं होगा — क्योंकि आप उसी जगह अटक चुके हो। इसलिए उनका सूत्र: जहाँ अनुभव (स्वप्न या कोई और) में अटके, साधना-मार्ग से भटके। न अनुभव में अटको, न साधना-मार्ग से भटको; अपने इष्ट देवता के प्रति समर्पित होकर चलो। वे अनुभव कृपा-प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। स्वरूप दिए जा रहे हैं — ठीक है, भगवती साथ हैं, आपके इष्ट, आपके देवता साथ हैं, मार्गदर्शन दे रहे हैं — इसलिए नहीं कि आपको मान-सम्मान मिले और लोग देखकर आपके अहं को तुष्ट करें: मैं बहुत बड़ा भक्त हूँ, मुझ पर भगवती की बहुत कृपा है, मैं फलाना हूँ। अंत में वे आशा करते हैं कि श्रोता इन बातों को समझेंगे और गोपनीयता बरतेंगे, ताकि इस चीज़ का सही प्रयोग हो।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।