पूजा घर में पितरों का फोटो: पितृ दोष कैसे लगता है
एक संक्षिप्त शिक्षा इस विषय पर कि घर के पूजा स्थान में मृत परिजनों के फोटो रखना — चाहे भावना कितनी ही सच्ची हो — पितृ दोष और देव दोष दोनों को क्यों निमंत्रण देता है, घर में पितरों के लिए परंपरा से मान्य तीन स्थान कौन से हैं, और उनके फोटो के लिए वास्तु के अनुसार सही स्थान कौन सा है।
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पूजा घर में पितृ चित्र से दोनों दोष
पूजा घर में मृत परिजन का फोटो रखने से पितृ दोष और देव दोष दोनों क्यों लगते हैं?
व्यक्तिगत मोह के कारण मृत परिजन का फोटो देवताओं के बीच रखना पितर को गलत अधिकार-क्षेत्र में बैठा देता है — इससे घर में पितृ दोष बनता है और गौण रूप से देव दोष भी।
जो लोग सुंदर बना हुआ अलग पूजा घर बनाते हैं, वे कभी-कभी उसमें देवताओं के साथ किसी मृत परिजन का फोटो भी लगा देते हैं — प्रायः उस व्यक्ति से गहरे लगाव के कारण, या इसलिए कि उसकी अकाल मृत्यु हुई थी। केवल भावुकता और जानकारी के अभाव में किया गया यह कार्य बड़े अनिष्ट का कारण बनता है: इससे घर में बड़ा पितृ दोष बनता है, और गौण रूप से देव दोष भी, जिससे घर पर एक साथ पितृ और देव दोनों से जुड़ी बाधा आ जाती है।
इसका एकमात्र अपवाद
क्या कोई ऐसी स्थिति है जिसमें मृत व्यक्ति का फोटो पूजा घर में रखना उचित हो?
हाँ — यदि किसी साधक या तांत्रिक ने अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति को जानबूझकर, परिणाम जानते हुए वहाँ बैठाया हो, तो वह उनका व्यक्तिगत विषय है, भूल नहीं।
एक पक्ष तंत्र से जुड़ा है: यदि अकाल मृत्यु के बाद किसी साधक या तांत्रिक ने जानबूझकर किसी को घर में बैठाया हो, और परिवार उसी आधार पर देवताओं के साथ उनकी पूजा करता रहे, तो वह उनका व्यक्तिगत विषय है। यह उस सामान्य, अनजाने में की जाने वाली प्रथा से भिन्न है जिसमें केवल भावुकता में परिजन का फोटो पूजा स्थान में रख दिया जाता है, और वही दोष को निमंत्रण देती है।
देव मंत्र पितरों को हानि क्यों देते हैं
गलत स्थान पर रखे पितर के फोटो के सामने देव मंत्रों का पाठ हानि क्यों पहुँचाता है?
क्योंकि पितर अब देवताओं के लिए निर्धारित अधिकार-क्षेत्र में बैठा है, इसलिए वही मंत्र — जैसे हनुमान चालीसा या बजरंग बाण — ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करते हैं जो उन्हें आशीर्वाद के बदले पीड़ा देती है।
पितर एक ही समान श्रेणी नहीं होते — उनके अनेक प्रकार हैं, और जिन्हें मुक्ति नहीं मिली वे प्रेत योनि से जुड़े रह जाते हैं। उन्हें पूजा स्थान में बैठा देना उन्हें ऐसे अधिकार-क्षेत्र में डाल देता है जो उनका है ही नहीं, इसलिए देव मंत्रों से उत्पन्न ऊर्जा — जैसे हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ — उन्हें सम्मान देने के बजाय उनकी सूक्ष्म देह को पीड़ा पहुँचाती है।
वास्तु में देवताओं का स्थान
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में देवताओं का स्थान कहाँ होना चाहिए, और क्यों?
ईशान कोण — पूर्व और उत्तर के बीच का ईशान कोना — देवताओं का निवास माना जाता है, और वहीं घर के इष्ट देव की स्थापना करके प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए।
वास्तु के अनुसार ईशानवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का उत्तर-पूर्व कोण, जिसे देवताओं का निवास स्थान और पूजा घर के लिए उपयुक्त दिशा माना जाता है। कोण — पूर्व और उत्तर के बीच का कोना — देवताओं की भूमि माना जाता है, एक दिव्य स्थान जहाँ कुल परंपरा से जुड़ी दिव्य शक्तियों की स्थापना सदैव होनी चाहिए। परिवार के इष्ट देव की पवित्र मूर्तियाँ या चित्र वहीं रखने चाहिए, और प्रतिदिन धूप, दीप, गंध तथा अक्षत से सजाकर उनकी पूजा करनी चाहिए।
पितरों के तीन पारंपरिक स्थान
घर में पितरों के लिए परंपरा से मान्य तीन स्थान कौन से हैं?
मुख्य द्वार की चौखट, तुलसी का पौधा, और — केवल सूक्ष्म, प्रतीकात्मक रूप में — कुल के प्रधान देवता के श्रीचरण; कभी भी देवताओं के बीच भौतिक रूप से रखा गया फोटो नहीं।
घर के पितरों के लिए तीन स्थान परंपरा से मान्य हैं। पहला, मुख्य द्वार की चौखट (त्रिकूट चौखट नहीं) उनका आधिकारिक स्थान है। दूसरा, तुलसी का पौधा, जहाँ विभिन्न पितरों के भिन्न-भिन्न सूक्ष्म अंश निवास करते माने जाते हैं — तुलसी को या सूर्य नारायण को जल अर्पित करने से पितरों को उनका भाग मिल जाता है और वे तृप्त होते हैं। तीसरा, कुल के प्रधान या कुलदेवता के श्रीचरण, परंतु केवल प्रतीकात्मक, सूक्ष्म रूप में — इसका अर्थ कभी यह नहीं कि मृत परिजन का फोटो या उसकी वस्तुएँ देवता के चरणों के पास भौतिक रूप से रख दी जाएँ, जिससे उल्टे दोष उत्पन्न होता है।
पितृ चित्रों का वास्तविक स्थान
वास्तु के अनुसार पितरों के फोटो घर में वास्तव में कहाँ लगाने चाहिए?
दक्षिण दीवार पर, अथवा नैऋत्य कोण में पश्चिम की ओर — कभी भी घर के पूजा स्थान में नहीं।
पितरों के लिए मान्य दिशा ठीक-ठीक दक्षिण नहीं, बल्कि नैऋत्यवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का दक्षिण-पश्चिम कोण, जिसे देवताओं के बजाय पितरों का अधिकार क्षेत्र माना जाता है। कोण अथवा उससे लगी दक्षिण दिशा है — दक्षिण को पितरों से इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि वह मृत्यु के देवता यमराज का द्वार है, जिनके अधिकार-क्षेत्र में पितर आते हैं। पितरों के फोटो दक्षिण दीवार पर लगाने चाहिए, या नैऋत्य कोण में पश्चिम की ओर — वहीं उन्हें स्थान देना चाहिए, कभी भी घर के पूजा स्थान में नहीं।
भावुकता में स्थान की अनदेखी का परिणाम
यदि सही स्थान के बजाय भावुकता में पितरों के फोटो पूजा घर में रखे जाएँ तो क्या होता है?
जब तक पुण्य बना रहता है तब तक यह ठीक लग सकता है, परंतु पितर अब मानवीय भावनाओं से नहीं चलते — वे दिव्य नियमों से बँधे हैं, और इस प्रकार गलत स्थान देना उन्हें शांति के बजाय अंततः कष्ट ही देता है।
केवल भावना में बहकर मृत परिजन के फोटो को देवताओं के बीच पूजना — पिता के चित्र को ईश्वर मानकर पूजना — अपनी भावना के भीतर उचित लग सकता है। परंतु पितर का स्वरूप बदल चुका है: वे अब परिवार के बनाए नियमों से नहीं, बल्कि अपनी योनि के लिए बने दिव्य नियमों से चलते हैं, और वही नियम उनके कष्ट या प्रसन्नता को निर्धारित करते हैं। जब भी परिवार का पुण्य क्षीण होगा, यह गलत स्थान उन्हें कृपा के बजाय कष्ट ही देगा, चाहे वह कितनी ही सच्ची भावना से किया गया हो।
उपदेव और उसमें पितरों का स्थान
उपदेव क्या है, और घर के पितर उस श्रेणी में कैसे आते हैं?
उपदेव प्रधान देवताओं से नीचे की उपदेवताओं की श्रेणी है — पितर इसी में वर्गीकृत हैं, और वे किसी एक समान प्रकार के नहीं होते।
पितर (पितृ) उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। की श्रेणी में आते हैं — अर्थात प्रधान देवताओं से नीचे के उपदेवता। वे केवल एक ही प्रकार के नहीं होते; पितरों की अनेक भिन्न श्रेणियाँ वर्णित हैं, और जिन्हें मुक्ति नहीं मिल पाती वे प्रेत योनि से जुड़े रह जाते हैं।
रसोई का पेयजल स्थान
रसोई में पीने के पानी के स्थान का पितरों की दृष्टि से क्या महत्व है?
रसोई में पीने के पानी का स्थान — उसके ईशान, नैऋत्य या पश्चिम कोने में — पितरों के अधिकार में माना जाता है, इसीलिए पुराने घरों में वहाँ प्रतिदिन संध्या को दीपक जलाया जाता है।
रसोई परंपरा से घर के आग्नेय कोण में रखी जाती है। उसके भीतर पीने के पानी के लिए नियत स्थान — चाहे वह ईशान कोने में हो, नैऋत्यवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का दक्षिण-पश्चिम कोण, जिसे देवताओं के बजाय पितरों का अधिकार क्षेत्र माना जाता है। कोने में हो, या पश्चिम की ओर — पितरों के अधिकार में माना जाता है, जहाँ उनकी उपस्थिति मानी जाती है। इसीलिए पुराने या ग्रामीण घरों में आज भी पीने के पानी के स्थान पर प्रतिदिन संध्या को दीपक जलाया जाता है, जिससे पितरों का आशीर्वाद मिलता है; वहाँ नैऋत्य लक्ष्मी का भी निवास कहा गया है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।