पूजा घर में पितरों का फोटो: पितृ दोष कैसे लगता है
पूजा स्थान में मृतकों की फोटो वर्जित होने पर एक शिक्षा।
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क्या मृत परिजन का फोटो पूजा घर में रखा जा सकता है?
एक फोटो से पितृ दोष और देव दोष
यह पूछे जाने पर कि क्या घर के मृतक का फोटो पूजन स्थान पर लगाकर वहीं उसकी पूजा की जा सकती है, वक्ता कहते हैं नहीं। उनके अनुसार जो लोग मोह और जानकारी के अभाव में ऐसा फोटो देवताओं के बीच लगा देते हैं, वे घर में बड़े विनाश को निमंत्रण देते हैं: बड़ा पितृ दोष बनता है, deva-dosha भी बनता है, और परिवार को देव शाप तथा पितृ श्राप दोनों मिल जाते हैं। एकमात्र अपवाद वे जानबूझकर की गई तांत्रिक स्थापना का मानते हैं, जिसे वे अलग प्रसंग के रूप में लेते हैं।
वक्ता इस प्रश्न से आरंभ करते हैं कि क्या अपने घर के मृतकों और पूर्वजों का फोटो घर के पूजन स्थान पर लगाकर वहीं उनकी पूजा की जा सकती है या नहीं। वे कहते हैं कि यह विषय अवश्य जानना चाहिए। वे बताते हैं कि आजकल लोग बहुत सुंदर अलग पूजन रूम बनवाते हैं, और वहाँ देवी-देवताओं के साथ ही घर के किसी मृतक का फोटो भी लगा देते हैं — प्रायः इसलिए कि उस व्यक्ति से लगाव बहुत अधिक था, या उसकी अकाल मृत्यु हो गई थी। तांत्रिक अपवाद को अलग रखते हुए वे कहते हैं कि सामान्यतः जिनको जानकारी ही नहीं है और जो अपने पितृ, पूर्वजों, मृतकों का फोटो भगवान के साथ लगाकर पूजन करते हैं, उनके यहाँ यह बहुत बड़े विनाश का कारण बन जाता है। घर में कहीं न कहीं बहुत बड़ा पितृ दोष बन जाता है, देव दोष भी बन जाता है; देव श्राप भी मिल जाता है और पितृ श्राप भी मिल जाता है। यह कैसे होता है, यही आगे की पूरी बात है।
विशेष स्थिति: तांत्रिक द्वारा जानबूझकर घर में बैठाया गया मृतक
जानकार साधक का कार्य उसका अपना विषय
वक्ता पूजा घर में पितृ चित्र न रखने के सामान्य नियम से एक स्थिति को अलग रखते हैं। यदि अकाल मृत्यु के बाद किसी साधक या तांत्रिक ने अपनी जानकारी में उसी व्यक्ति को घर में बैठा दिया हो, और परिवार उसी आधार पर उसे देवताओं के साथ पूज रहा हो, तो वे कहते हैं कि यह उनका व्यक्तिगत मामला है और वे कर सकते हैं। निषेध, उनके अनुसार, उन सामान्य लोगों के लिए है जो बिना किसी ऐसी जानकारी के ऐसा करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रश्न का एक पक्ष तंत्र का विषय है। यदि किसी अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति को किसी साधक या तांत्रिक ने अपनी जानकारी में घर में बैठा दिया हो, और परिवार तब से उसे देवताओं के साथ ही पूज रहा हो, तो यह उनका अपना व्यक्तिगत मामला हो सकता है; वे कर सकते हैं। ऐसी स्थापना कैसे की जाती है या उसमें क्या होता है, यह वे नहीं बताते। वे केवल इसे उस सामान्य स्थिति से अलग करते हैं जिसमें बिना किसी जानकारी के लोग भावना में फोटो देवताओं के बीच रख देते हैं — और वही वह स्थिति है जिससे वे सावधान करते हैं।
ईशान कोण: घर में देवताओं का स्थान
ईशान में इष्ट का नित्य पूजन
वक्ता कहते हैं कि वास्तु के हिसाब से ईशान कोण, यानी पूर्व और उत्तर के बीच का कोण, देवताओं का स्थान माना गया है; वहाँ देवता वास करते हैं, उसे देवभूमि और देवस्थान कहा गया है। उनके अनुसार उस स्थान पर सदैव अपने कुल से संबंधित देव शक्तियों की स्थापना करनी चाहिए, अपने इष्ट देवता के श्री विग्रह या फोटो से उसे सजाना चाहिए और नित्य वहाँ धूप, दीप, गंध, अक्षत से पूजन-पाठ करना चाहिए। वह स्थान, वे कहते हैं, सदैव शुभ्र होता है।
पितृ चित्र पूजा घर में क्यों नहीं रखे जाते, यह समझाने के लिए वक्ता पहले बताते हैं कि देवताओं का स्थान कहाँ है। वे कहते हैं कि हम सब जानते हैं कि घर में वास्तु के हिसाब से चला जाए तो ईशान कोण, यानी पूर्व और उत्तर के बीच का कोण, देवताओं का स्थान माना गया है। वहाँ देवता वास करते हैं; उसे देवभूमि कहा गया है, देवस्थान माना गया है। उस स्थान पर, वे कहते हैं, सदैव अपने कुल से संबंधित देव शक्तियों की स्थापना करनी चाहिए। वहाँ अपने इष्ट-आराध्य के श्री विग्रह और उनके फोटो से उस स्थान को सजाकर नित्य धूप, दीप, गंध, अक्षत इत्यादि से पूजन-पाठ करना चाहिए। वह स्थान, उनके अनुसार, सदैव शुभ्र होता है।
पूजा घर में बैठाए गए पितर को देव मंत्र क्यों कष्ट देते हैं
पितर उपदेव हैं, कुछ प्रेत योनि में
वक्ता कहते हैं कि पितृ उपदेव की श्रेणी में आते हैं; वे एक प्रकार के नहीं होते, उनके अनेक प्रकार बताए गए हैं, और उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी गति नहीं हो पाती और जो प्रेत योनि से संबंधित होते हैं। ऐसे पितरों को पूजन स्थान में बैठा दिया जाए तो, उनके अनुसार, जिन मंत्रों से देवताओं का पूजन हो रहा है उन्हीं मंत्रों से पितरों को कष्ट पहुँचने लगता है। उदाहरण वे हनुमान चालीसा और bajrang-baan का देते हैं: वहाँ अधिकार क्षेत्र ही गलत है, इसलिए उस पाठ से उत्पन्न ऊर्जा से पितरों के शरीर को कष्ट पहुँचता है।
देवताओं को ईशान कोण में रखने के बाद वक्ता बताते हैं कि पितर क्या हैं। वे कहते हैं कि पितृ उपदेव की कैटेगरी में आते हैं। पितृ केवल एक प्रकार के नहीं होते; पितरों के प्रकार अलग-अलग अनेक प्रकार से बताए गए हैं। उनमें कुछ ऐसे भी पितृ होते हैं जिनकी गति नहीं हो पाती और जो प्रेत योनि से संबंधित होते हैं। अगर उन्हीं को आप पूजन स्थान में बैठा देंगे, वे कहते हैं, तो जिन मंत्रों से आप देवताओं का पूजन कर रहे हैं उन्हीं मंत्रों से आपके पितरों को कष्ट पहुँचने लगेगा। उदाहरण वे हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का देते हैं: क्योंकि वहाँ अधिकार क्षेत्र ही गलत है, इसलिए जब बजरंग बाण का पाठ होगा तो उससे उत्पन्न ऊर्जा से पितरों के शरीर को कष्ट पहुँचेगा। यह, वे कहते हैं, सबसे पहली बात है।
घर में पितरों के तीन स्थान
चौखट, तुलसी और देवता के श्रीचरण
वक्ता घर में पितरों के तीन माने गए स्थान बताते हैं। पहला, उनका आधिकारिक स्थान घर के मुख्य द्वार की चौखट है, आज बनने वाला त्रिकूट नहीं। दूसरा, तुलसी, जहाँ अलग-अलग प्रकार के पितृ का सूक्ष्म अंश माना गया है, इसलिए तुलसी या सूर्य नारायण को दिया गया जल उन तक पहुँचता है और वे तृप्त होते हैं। तीसरा, सांकेतिक और सूक्ष्म रूप से, घर के इष्ट या कुल देवता के श्रीचरण जिनका प्रमुख विग्रह पूजन स्थान में है; पर वे कहते हैं कि इसका अर्थ कभी यह नहीं कि अपने मृतकों का फोटो उन चरणों के पास रख दिया जाए; ऐसा करने से दोष बनता है।
वक्ता पूछते हैं कि पितरों का स्थान कहाँ-कहाँ माना गया है, और तीन स्थान बताते हैं। पहला घर का मुख्य द्वार: उनका आधिकारिक स्थान चौखट पर माना गया है। वे जोर देते हैं कि चौखट में होता है, त्रिकूट में नहीं; आज के समय की बात अलग है कि लोग त्रिकूट बना दे रहे हैं, पर कुल के पितरों का स्थान चौखट में माना गया है। दूसरा तुलसी जी। तुलसी जी में, वे कहते हैं, अलग-अलग प्रकार के पितरों का अलग-अलग जगह सूक्ष्म रूप से अंश माना गया है। जब हम तुलसी जी को जल देते हैं, सूर्य नारायण को जल देते हैं, तो उनके माध्यम से भी पितरों को अपना अंश मिलता है और वे तृप्त होते हैं। यह, वे कहते हैं, आधिकारिक रूप से है। तीसरा स्थान अपने घर के इष्ट-आराध्य या कुल के देवी-देवता के श्रीचरण, जिनका प्रमुख श्री विग्रह पूजन स्थान में स्थापित है। पर यह सांकेतिक रूप से, सूक्ष्म रूप से माना गया है। वहाँ कौन से पितर हैं और किस रूप में हैं, यह कुल के देवी-देवता पर निर्भर करता है। फिर वे सावधान करते हैं कि इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है कि अपने इष्ट के चरणों के पास ही अपने मृतकों का फोटो इत्यादि रख दें। यह नहीं किया जा सकता; ऐसा करेंगे तो वह दोष निर्मित करेगा।
रसोई का पेयजल स्थान: पितरों का एक स्थान
वहाँ शाम का दीपक क्यों जलता है
वक्ता कहते हैं कि रसोई कक्ष, जहाँ खाना पकता है, घर के आग्नेय कोण में माना गया है, और उस रसोई के भीतर पानी रखने की जगह, चाहे वह कक्ष के ईशान कोण में बनी हो, नैऋत्य कोण में, या पश्चिम की ओर, वह स्थान है जहाँ पितरों का अधिकार माना गया है; वे वहाँ उपस्थित होते हैं। इसीलिए, उनके अनुसार, पुराने क्षेत्रों और गाँवों के लोग जो अब भी पुरानी मान्यताएँ मानते हैं, पानी पीने के स्थान पर रोज़ शाम दीप अवश्य जलाते हैं, और पितृ की कृपा मिलती है। वे जोड़ते हैं कि वहीं भगवती नैऋत्य लक्ष्मी भी विराजमान होती हैं।
चौखट, तुलसी और देवता के चरणों के अलावा वक्ता रसोई में एक स्थान बताते हैं। पहले वे भोजन के स्थान को रसोई से अलग करते हैं: जहाँ आप खाना पकाते हैं वह रसोई कक्ष आग्नेय कोण में माना गया है। उस रसोई के भीतर आपने जहाँ पानी रखने की जगह बनाई हो, चाहे उस कक्ष के ईशान कोण में, या नैऋत्य कोण में, या रसोई में पश्चिम की ओर, वह पानी पीने का स्थान पूर्वजों, पितरों के अधिकार का माना गया है; वे वहाँ उपस्थित होते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, पुराने क्षेत्रों में, या गाँव से जुड़े लोग जो अब भी पुरानी मान्यताओं को मानते हैं, पानी पीने वाले स्थान पर रोज़ शाम को दीप अवश्य प्रज्वलित करते हैं। उससे पितरों को कृपा प्राप्त होती है। वहीं पर, वे कहते हैं, भगवती नैऋत्य लक्ष्मी भी विराजमान होती हैं।
आसुरी लक्ष्मी और आसुरी दुर्गा पूजा: दीप का नियत आरंभ स्थान
ग्रंथों में लिखी वह बात जो पूजक नहीं जानते
वक्ता कहते हैं कि जो लोग आसुरी लक्ष्मी और आसुरी दुर्गा की पूजा करते हैं, उन्हें यह जानकारी ही नहीं है कि उनकी पूजा वास्तव में किस जगह से कैसे शुरू करनी चाहिए, या दीप कहाँ से प्रज्वलित होकर जाएगा। वे कहते हैं कि यह मनगढ़ंत नहीं बल्कि लिखित बात है: तंत्र के ग्रंथों में जहाँ आसुरी दुर्गा, दीपन दुर्गा या आसुरी लक्ष्मी दी गई हैं, वहाँ इसकी चर्चा मिलती है कि किस स्थान से उनके हेतु दीप प्रज्वलित करके अपने पूजन स्थान पर रखकर पूजन करना है, और ऐसा क्यों किया जाता है इसका सविस्तार वर्णन भी। यह बात वे रसोई के पेयजल स्थान के ठीक बाद उठाते हैं और यह कहकर समाप्त करते हैं कि वह स्थान पितरों का है; विधि वे नहीं बताते।
यह कहने के ठीक बाद कि रसोई के पेयजल स्थान पर नैऋत्य लक्ष्मी विराजमान होती हैं, वक्ता एक आम चूक पर टिप्पणी करते हैं। जो लोग आसुरी लक्ष्मी और आसुरी दुर्गा की पूजा करते हैं, वे कहते हैं, उन्हें यह जानकारी ही नहीं है कि उनकी पूजा वास्तव में किस जगह से शुरू करनी चाहिए, कहाँ से दीप प्रज्वलित होकर जाएगा। वे जोर देते हैं कि यह मनगढ़ंत बात नहीं है; यह लिखित बात है जो वे बता रहे हैं। अगर इतना खोजना है, वे कहते हैं, तो खोज लीजिए जहाँ आसुरी दुर्गा, दीपन दुर्गा या आसुरी लक्ष्मी दी गई हैं: वहाँ इस बात की चर्चा मिल जाएगी कि किस स्थान से उनके हेतु दीप प्रज्वलित करके अपने पूजन स्थान पर रखकर पूजन करना है। वह क्यों किया जाता है, इसका सविस्तार वर्णन भी तंत्र के ग्रंथों में मिल जाएगा। वे इस प्रसंग को "तो वह स्थान होता है पितरों का" कहकर समाप्त करते हैं, पेयजल स्थान पर लौटते हुए, और स्वयं विधि बताए बिना आगे बढ़ जाते हैं।
घर में पितरों के फोटो कहाँ लगाने चाहिए?
दक्षिण दीवार या नैऋत्य कोण, यम का द्वार
वक्ता कहते हैं कि घर में पितरों का सामान्य स्थान नैऋत्य कोण, यानी दक्षिण-पश्चिम, या उससे लगा हुआ दक्षिण का दल है, ठीक दक्षिण दिशा नहीं; लोग "दक्षिण" इसलिए बोल देते हैं क्योंकि वह यम का द्वार है, यमराज उस दिशा के स्वामी हैं और पितृ उनके अधीन होते हैं, और यह भी, वे कहते हैं, सही और शास्त्रोक्त है। अतः पितरों का फोटो दक्षिण दीवार पर, या नैऋत्य कोण से सटाकर पश्चिम की ओर लगाना चाहिए और वहीं उन्हें स्थान देना चाहिए; घर के पूजन स्थान में, वे कहते हैं, कभी नहीं।
पितरों के स्थान गिनाने के बाद वक्ता उनके फोटो का स्थान बताते हैं। वे कहते हैं कि घर में सामान्यतः जो स्थान माना गया है वह ठीक दक्षिण दिशा की ओर नहीं माना गया है। दक्षिण-पश्चिम का कोण, नैऋत्य कोण, या नैऋत्य कोण से लगा हुआ दक्षिण का दल पितरों का स्थान माना गया है। सामान्यतः, वे कहते हैं, हम बोल देते हैं कि दक्षिण दिशा पितरों के निमित्त है क्योंकि वह यम का द्वार है; यमराज उस दिशा के स्वामी हैं और पितर यमराज के अधीन होते हैं, इसलिए हम "दक्षिण दिशा की ओर" बोल देते हैं। यह भी, वे कहते हैं, सही है, उचित है, शास्त्रोक्त है। तो, वे कहते हैं, दक्षिण दिशा की दीवार की ओर, या नैऋत्य दिशा की ओर पश्चिम से लगाकर फोटो लगानी चाहिए: दक्षिण-पश्चिम के कोने से सटा हुआ पितरों का फोटो लगाना चाहिए, या दक्षिण दीवार पर, और वहीं उन्हें स्थान देना चाहिए। घर के पूजन स्थान में कभी नहीं।
पूजा घर में भावना से की गई पितृ पूजा हानिकारक क्यों बन जाती है
पितर परिवार की भावना से नहीं, नियम से चलते हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि मृत परिजन को पूजन स्थान में जगह दी गई तो कभी न कभी, जब आपके पुण्य क्षय होंगे, वह दिक्कत देगा। आज आप अपने मनगढ़ंत तरीके से वहाँ पूजन कर सकते हैं, रोज़ बड़ा दिया जला सकते हैं, रोज़ भोग लगा सकते हैं, यह आपका भाव है और अपनी जगह उचित भी लग सकता है, पर कालांतर में वह दिक्कत देने वाला होगा क्योंकि पितर को कष्ट पहुँचेगा। उनका स्वरूप अब अलग हो चुका है, वे कहते हैं; वे आपके नियम से नहीं, बने हुए नियम से चलेंगे, और उनका कष्ट या प्रसन्नता उसी के अनुसार होगी। पिताजी के फोटो को भगवान मानकर देवताओं के साथ पूजना एक भाव है, पर वास्तविकता में, वे कहते हैं, उस स्थान पर जगह देकर आप उन्हें कष्ट ही पहुँचा रहे हैं।
वक्ता बताते हैं कि पितर को फिर भी पूजा घर में रख दिया जाए तो क्या होता है। पूजन स्थान में देंगे, वे कहते हैं, तो कभी न कभी, जब आपके पुण्य क्षय होंगे, तब दिक्कत आएगी। आज आप पूजन कर रहे हैं; अपने मनगढ़ंत तरीके से पूजन कर सकते हैं, वहाँ उनके लिए धूप-दीप जलाइए, रोज़ बड़ा दिया जलाइए, रोज़ भोग लगाइए। यह आपका भाव है। भाव से पूजन करना अपनी जगह उचित हो सकता है। लेकिन कालांतर में वह दिक्कत देने वाला होगा, क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं कष्ट पहुँचेगा। उनका स्वरूप, वे कहते हैं, अब अलग हो चुका है। वे आपके नियम के अनुसार नहीं चलेंगे; जो नियम बना हुआ है उसके अनुसार उन्हें चलना होगा, और जो कष्ट या प्रसन्नता उन्हें होनी है वह उसी नियम से हो रही होगी। आप अपने भाव से मानकर चलते हैं कि वे यहाँ विराजमान हैं और देवताओं के साथ हम उनका पूजन करेंगे: "मेरे पिताजी हैं, मेरे पिताजी भगवान हैं, तो भगवान के रूप में उन्हीं की पूजा करेंगे।" यह, वे कहते हैं, एक भाव है। पर वास्तविकता देखिए तो उस स्थान में उन्हें जगह देकर आप उन्हें कष्ट ही पहुँचा रहे हैं।
उचित स्थान देने के बाद पितरों की सेवा-पूजा कैसे करें
दीप, पुष्प, भोग और गीता पाठ
वक्ता कहते हैं कि पितरों को जो उनका यथोचित स्थान और दिशा है वहाँ विराजमान कराने के बाद उनके समक्ष धूप-दीप जलाना चाहिए, पुष्प चढ़ाना चाहिए, भोग लगाना चाहिए और यथाशक्ति श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना चाहिए। उससे, वे कहते हैं, वे अवश्य तृप्त होंगे और सही तरीके से आशीर्वाद देंगे; अगर सच में उनकी गति नहीं हुई और वे हैं, तो भविष्य में कभी कोई कष्ट नहीं आने देंगे, और अगर गति हो भी गई है तो भी वह पुण्य आपको अवश्य मिलेगा। गलत जगह गलत तरीके से की गई सेवा-पूजा, उनके अनुसार, कष्ट ही बढ़ाती है।
हानि समझाने के बाद वक्ता सही तरीका बताते हैं। पितरों को जो उनका यथोचित स्थान है, जिस दिशा में, जिस जगह उन्हें स्थान देना चाहिए, वहाँ विराजमान कराइए। फिर उनके समक्ष धूप-दीप जलाइए, पुष्प चढ़ाइए, भोग लगाइए, या श्रीमद्भगवद्गीता का यथाशक्ति पाठ कीजिए। उससे, वे कहते हैं, वे अवश्य तृप्त होंगे और आशीर्वाद भी सही तरीके से देंगे। अगर सच में उनकी गति नहीं हुई है और वे हैं, तो भविष्य में कभी कोई कष्ट नहीं आने देंगे। और अगर गति हो भी गई है, तो भी वह पुण्य आपको अवश्य प्राप्त होगा। इसलिए, वे कहते हैं, कभी भी गलत जगह में गलत तरीके से ऐसी सेवा-पूजा नहीं करनी चाहिए; इससे कष्ट बढ़ जाते हैं। वे इस आशा के साथ समाप्त करते हैं कि सब अपने पितरों, पूर्वजों, मृतकों को यथोचित स्थान देकर उनकी कृपा प्राप्त करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।