दीपावली पर कुल देवी और महाशक्तियों हेतु तंत्रोक्त दीप दान विधि
कुल देवी और प्रमुख महाशक्तियों हेतु दीपावली की तंत्रोक्त दीप दान विधि।
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दीपावली की रात कुल देवी और प्रमुख महाशक्तियों का दीप दान: कब करें और क्या फल मिलता है
हर वर्ष नारियल में 108 बाती का दीप दान
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक के शुभ महीने में, विशेष रूप से दीपावली के महानिशा काल में या फिर शाम के (प्रदोष) समय में, प्रमुख देवी-देवताओं का अपनी कुलदेवी, कुल देवताओं और कुल शक्ति के साथ नारियल के दीपक में 108 बाती के साथ दीपदान करना चाहिए। वे कहते हैं कि इससे अनेक पुण्य मिलते हैं, बहुत से अनिष्टों का नाश होता है, अकाल मृत्यु से रक्षा होती है और घर-परिवार के अनेक कष्टों तथा दुख-दारिद्र्य से छुटकारा मिलता है। वे कहते हैं कि इससे कुल की शक्तियाँ पुष्ट और संतुष्ट होती हैं और हर प्रकार से कल्याण करती हैं, और वे कहते हैं कि यह विधि हर वर्ष दीपावली की शाम या रात में अवश्य करें।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक के शुभ महीने में, विशेष करके दीपावली के महानिशा कालअर्धरात्रि के आसपास का "महानिशा" काल, जिसे दीपावली और काली चौदस जैसी रातों में तांत्रिक पूजन हेतु सर्वाधिक प्रबल समय माना जाता है। में या फिर शाम के (प्रदोष) समय में, प्रमुख देवी-देवताओं का अपने कुल के देवी-देवताओं और कुल शक्ति के साथ नारियल के दीपक में 108 बाती के साथ दीपदान करना चाहिए। वे कहते हैं कि इससे अनेकों पुण्य मिलते हैं और बहुत सारे अनिष्टों का नाश होता है; अकाल मृत्यु से रक्षा होती है, और घर-परिवार में जो अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं उन सबसे तथा दुख-दारिद्र्य से छुटकारा मिलता है। विधि के अंत में वे कहते हैं कि दीपावली के अति विशिष्ट शुभ काल में जब इस प्रकार प्रमुख देवी-देवताओं के साथ अपने कुल के देवी-देवताओं का दीप दान किया जाता है तो अनेक प्रकार के arishta और अनिष्टों से रक्षा होती है। कुल की शक्तियाँ पुष्ट और संतुष्ट होती हैं और हर प्रकार से कल्याण करती हैं। वे कहते हैं कि इस विधि को पूरा देखें और हर वर्ष दीपावली की शाम या रात के समय इसे अवश्य करें।
दीपावली दीप दान के लिए कर्म साक्षी दीप और नारियल के दीपक की तैयारी
पहले साक्षी दीप, फिर पाँच पत्ते और आधा कटा नारियल
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले एक दीप कर्म साक्षी दीप के रूप में प्रज्वलित करना है, जो पुष्प के ऊपर रखा जाता है। फिर पाँच पत्ते पुष्पों से सजाकर रखे जाते हैं और उन्हीं पर नारियल का दीपक रखा जाता है। दीपक के लिए सूखी गरी को अच्छे चाकू से सावधानी से बीच से काटा जाता है ताकि हाथ न कटे; वे कहते हैं कि यह काम घर का पुरुष करे तो अत्युत्तम है, क्योंकि पुरुष द्वारा काटा नारियल ज़्यादा बढ़िया माना जाता है।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम एक दीप प्रज्वलित कर लेना है, जो कर्म साक्षी दीप रहेगा; उनकी व्यवस्था में यह पुष्प के ऊपर रखा गया है। उसके बाद, वे कहते हैं, पाँच पत्ते पुष्पों से सजाकर रखे जाते हैं और इन्हीं पर नारियल का दीपक रखना है। दीपक बनाने के लिए वे सूखी गरी लेते हैं और प्रयास करते हैं कि उसे बिल्कुल बीच से काटा जाए। वे सावधान करते हैं कि ध्यान से काटें ताकि हाथ न कटे, और अच्छा चाकू लें। वे कहते हैं कि यह कार्य घर का पुरुष करे तो अत्युत्तम है — नारियल जब भी पुरुष काटते हैं तो ज़्यादा बढ़िया रहता है। फिर कटे हुए नारियल को दीपक बनाकर सजा दिया जाता है।
नारियल के दीप दान दीपक के लिए कलावे से 108 बाती वाली बाती बनाना
अठारह लपेट, दोहरा करके गूँथना
वक्ता कहते हैं कि बाती कलावा (मौली) से बनती है, जिसमें तीन सूत्र होते हैं, इसलिए 36 धागे लेने पर 108 बाती पूरी हो जाती है। वे धागे को थोड़ा लंबा रखते हुए 18 बार लपेटते हैं, बंडल को बीच से मोड़कर 36 कर देते हैं, और पूरे को आपस में गूँथकर एक लंबी बाती बनाते हैं जो 108 बाती के बराबर होती है। उस गुँथी बाती को बीच से काटकर किनारे बराबर कर लेने पर 108 बाती की दो बातियाँ बनती हैं, यानी दो दीपकों के लिए; हर बाती अपने नारियल के दीपक में रख दी जाती है और ऐसे पाँच दीपक तैयार किए जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाती बनाने के लिए कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। का प्रयोग करना है। वे कहते हैं कि कलावे में तीन सूत्र होते हैं, इसलिए पूरा 36 धागा लेने पर 108 बाती पूरी हो जाती है। वे तरीका दिखाते हैं: 108 बाती बनाने के लिए धागे को 36 बार लपेटना पड़ेगा। वे दोबारा, तिबारा, चौबारा, पाँच बार, छह बार ऐसे लपेटते जाते हैं, और क्योंकि बाती थोड़ी लंबी रखनी है इसलिए 18 बार ही लपेटते हैं; फिर बंडल को बीच से मोड़ देने पर 36 हो जाता है। वे सलाह देते हैं कि बढ़िया मौली का बड़ा बंडल लाएँ, ताकि पाँच बाती बनाने में अच्छा-खासा लग जाए। 18 लपेट को दोहरा करके 36 हो जाने पर, वे कहते हैं, पूरे बंडल को आपस में गूँथ दिया जाता है, और गूँथने के बाद यह 108 बाती के बराबर की एक लंबी बाती बन जाती है। फिर वे उसे बीच से काटते हैं और किनारे-किनारे से काटकर बराबर कर लेते हैं; बीच से काटने पर 108 बाती की दो बातियाँ हो जाती हैं, यानी दो दीपकों के लिए। बनकर तैयार बाती को नारियल के दीपक में रख दिया जाता है, और इस प्रकार, वे कहते हैं, 108 बाती वाले पाँच दीपक बनकर तैयार हो जाते हैं।
सावधानी: दीप दान की बाती का धागा सूती ही हो, रेशमी कभी नहीं
कौन-सा मौली बंडल खरीदें
वक्ता कहते हैं कि बाती के लिए जो कलावा (मौली) धागा लाएँ वह हमेशा सूती वाला ही हो, और रेशम का धागा कभी न लाएँ। वे कहते हैं कि अच्छी क्वालिटी की सूती मौली का बड़ा बंडल लाएँ, क्योंकि दीपावली दीप दान की पाँच बातियाँ बनाने में अच्छा-खासा धागा लग जाता है।
बाती लपेटते हुए वक्ता बीच में कहते हैं कि धागा हमेशा सूती वाला ही लाना है — रेशम का धागा कभी मत लाइएगा। वे कहते हैं कि इस तरह का सूती कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। का बड़ा वाला बंडल लाएँ। वे जोड़ते हैं कि जो मौली लाएँ वह बढ़िया-सा कलावा हो, और चूँकि पाँच बातियाँ बनानी हैं इसलिए अच्छा-खासा धागा लग जाएगा, अतः बड़ा बंडल लेना ही ठीक है।
दीपावली दीप दान में दीपक के रूप में नारियल की खोल क्यों, और उसमें कौन-सा तेल जलाएँ
सूखा मेवा द्रव्य के साथ जलकर सकारात्मक ऊर्जा देता है
वक्ता कहते हैं कि नारियल की खोल का दीपक इसलिए है क्योंकि यह दीपावली है, और सूखा मेवा जब किसी द्रव्य के साथ जलता है तो वातावरण में विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है। वे कहते हैं कि दीपक के रूप में नारियल की खोल का ही प्रयोग करने से श्री तत्व की वृद्धि होती है, घर के देवी-देवता पुष्ट और संतुष्ट होते हैं, और यह अनेक प्रकार के अभिचार तंत्र और नकारात्मक शक्तियों को रोकने में सक्षम होता है। उन्होंने दीपकों में तिल का तेल प्रयोग किया है और कहते हैं कि शुद्ध घी भी प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता बताते हैं कि नारियल की खोल का प्रयोग क्यों करना चाहिए: क्योंकि यह दीपावली है, और सूखा मेवा (नारियल) जब किसी द्रव्य के साथ जलता है तो वातावरण में विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है। इसलिए, वे कहते हैं, दीपक के रूप में नारियल की खोल का ही प्रयोग करें। इससे श्री तत्वशुभ ऐश्वर्य और समृद्धि का तत्व, जिसे अनुष्ठान द्वारा गृहस्थी में आकर्षित करने हेतु आवाहित किया जाता है। की वृद्धि होती है; घर के देवी-देवता पुष्ट और संतुष्ट होते हैं; और यह अनेक प्रकार के अभिचार तंत्र और नकारात्मक शक्तियों को रोकने में सक्षम होता है। वे दिखाते हैं कि उन्होंने तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है। के तेल का प्रयोग किया है, और कहते हैं कि चाहें तो घी का — शुद्ध घी का — भी प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार, वे कहते हैं, 108 बाती के पाँच दीपक बनकर तैयार हो गए।
कुल देवी और कुल देवताओं के दीपावली दीप दान का संकल्प
संस्कृत या हिंदी में, हाथ में पुष्प और जल
वक्ता कहते हैं कि दीपक तैयार कर लेने के बाद अगला चरण संकल्प है। हाथ में पुष्प और जल लिया जाता है और जो भी विधि आती हो उसी में संकल्प बोला जाता है — संस्कृत आती हो तो संस्कृत में, हिंदी आती हो तो हिंदी में — कि हम अपने कुल के देवी-देवताओं सहित सभी की प्रसन्नता हेतु इस दीपदान का संकल्प ले रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि दीपक तैयार कर लेने के बाद अब हमें संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेना है। वे कहते हैं कि हाथ में पुष्प और जल लें, और जो भी विधि आती हो उसी में संकल्प बोलें — संस्कृत आती है तो संस्कृत में, हिंदी आती है तो हिंदी में — इस आशय से कि "हम अपने कुल के देवी-देवताओं सहित सभी की प्रसन्नता हेतु दीपदान का संकल्प ले रहे हैं"।
दीपावली दीप दान के पाँच दीपक किनके नाम से, और पुष्प तथा धूप अर्पण का क्रम
लक्ष्मी-गणेश से शिव परिवार तक, हर एक को अलग पुष्प और धूप
वक्ता कहते हैं कि जिस देवी-देवता के नाम से दीपक जलाना है, उसके नाम का पुष्प उस दीपक के पास अर्पित करते हैं: पहला दीपक लक्ष्मी-गणेश के नाम से, दूसरा लक्ष्मी-नारायण के नाम से, तीसरा कुलदेवी और कुल भैरव के नाम से, चौथा घर के सबसे पास जो भी शक्ति पीठ हो उसके नाम से, और अंतिम शिव परिवार के नाम से। वे कहते हैं कि फिर पाँचों के नाम से उसी क्रम में अलग-अलग धूप दिखाई जाती है।
वक्ता कहते हैं कि जिस देवी-देवता के नाम से दीपक जलाना है, उनके नाम का पुष्प उस दीपक के पास अर्पित करेंगे। वे क्रम बताते हैं: पहला दीपक लक्ष्मी-गणेश जी के नाम से; दूसरा लक्ष्मी-नारायण के नाम से; तीसरा दीपक कुलदेवी और कुल भैरव के नाम से; चौथा दीपक घर के पास जो भी शक्ति पीठ हो — जो सबसे नज़दीक हो — उसके नाम से; और अंतिम शिव परिवार। फिर, वे कहते हैं, सभी देवी-देवताओं के नाम से अलग-अलग धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। दिखाई जाती है: पहले लक्ष्मी-गणेश जी के नाम से धूप अलग; फिर लक्ष्मी-नारायण के नाम से धूप, वह अलग; फिर अपने कुल की देवी और कुल के भैरव के नाम से धूप, वह अलग; उसके बाद अपने शक्तिपीठ के नाम की धूप; और अंत में शिव परिवार।
दीपावली दीप दान के पाँचों दीपक कर्म साक्षी दीप से प्रज्वलित करना
नियत क्रम में, नाम, मंत्र या सूक्तम बोलते हुए
वक्ता कहते हैं कि सभी दीप कर्म साक्षी दीपक से ही प्रज्वलित किए जाते हैं। हर दीपक जलाते समय, वे कहते हैं, उस देवता का नाम लेते रह सकते हैं, या दीप प्रज्वलन का मंत्र पढ़ सकते हैं, या सूक्तम — तांत्रोक्त देवीसूक्तम् — का पाठ कर सकते हैं, या उस देवी-देवता का कोई शुभ सूक्त या स्तुति गा सकते हैं, और जिसका दीप जला रहे हों उसका ध्यान-स्मरण करते हुए ही जलाएँ। पाँचों दीपक एक-एक करके उसी नियत क्रम में जलाए जाते हैं: लक्ष्मी-गणेश, लक्ष्मी-नारायण, कुल के देवी-देवता और कुल के भैरव, नज़दीक का शक्ति पीठ, और शिव परिवार।
वक्ता कहते हैं कि अब दीप प्रज्वलन आरंभ होता है, और सभी दीप कर्म साक्षी दीपक से ही प्रज्वलित करने हैं। पहले लक्ष्मी-गणेश जी से आरंभ करते हुए, वे कहते हैं, जलाते समय उनका नाम लेते रह सकते हैं; या दीप प्रज्वलन का मंत्र पढ़ सकते हैं; या सूक्तम का पाठ कर सकते हैं — तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ किया जा सकता है; या भगवती या किसी भी देवी-देवता का शुभ सूक्त, स्तुति इत्यादि गाते हुए दीप प्रज्वलित कर सकते हैं। जिनका भी दीप प्रज्वलित करें, वे कहते हैं, उनका ध्यान-स्मरण करते हुए ही प्रज्वलित करें। इस प्रकार, वे कहते हैं, पाँचों दीपक एक-एक करके जला लिए जाते हैं, क्रम वैसा ही रखते हुए जैसा तय किया गया था: लक्ष्मी-गणेश, फिर लक्ष्मी-नारायण, फिर कुल के देवी-देवता और कुल के भैरव, फिर अपने नज़दीक का शक्ति पीठ, और फिर शिव परिवार के नाम से।
प्रत्येक प्रज्वलित दीपावली दीप दान दीपक को पुष्पांजलि और तीन बार जल अर्पण
समापन अर्पण, मंत्र से या सामान्य हिंदी में
वक्ता कहते हैं कि सभी दीप जल जाने के बाद हर दीप के पीछे पुष्पांजलि दी जाती है — ज़रा-सा पुष्प चढ़ाया जाता है — और आचमनी से तीन बार जल दिया जाता है। यह हर दीपक के साथ करना है, सभी का नाम-मंत्र लेते हुए, जैसे "कुल देवी नमः, कुल देवताय नमः, पुष्पांजलि समर्पयामि, तदुपरांत आचमनीयं जलं समर्पयामि"; या, वे कहते हैं, सामान्य हिंदी में बोलते हुए भी सभी को पुष्प और तीन बार आचमनी से जल दे सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दीप जलाने के बाद सभी दीप के पीछे पुष्पांजलिहाथों में पुष्प लेकर देवता के चरणों में अर्पित करने का समापन अनुष्ठान, आत्मसमर्पण की प्रार्थना सहित। देनी है — ज़रा-सा पुष्प चढ़ाना है — और तीन बार आचमनी से जल देना है। वे कहते हैं कि ऐसा सभी दीपक के साथ करना है, सभी का नाम-मंत्र लेते हुए: "कुल देवी नमः, कुल देवताय नमः, पुष्पांजलि समर्पयामि, तदुपरांत आचमनीयं जलं समर्पयामि"। इस प्रकार सभी के लिए करके — या फिर सामान्य हिंदी में बोलते हुए — सभी को पुष्प और तीन बार आचमनी से जल दिया जाता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।