दीपावली पर कुल देवी और महाशक्तियों हेतु तंत्रोक्त दीप दान विधि
कुल देवी और प्रमुख महाशक्तियों हेतु दीपावली की तंत्रोक्त दीप दान विधि।
9 concepts, in the order they are taught. Jump to any one.
2 also answer a common question
Questions this answers
2 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
कार्तिक के महानिशा काल में कुल देवी और प्रमुख महाशक्तियों का दीप दान
दीपावली के महानिशा काल में कुल देवी और प्रमुख महाशक्तियों के लिए दीप दान क्यों किया जाता है?
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक के शुभ महीने में, विशेष करके दीपावली के महानिशा काल (महानिशा काल) में या फिर स्वदोष के समय में (यानी शाम के समय में), प्रमुख देवी-देवताओं का अपने कुलदेवी और कुल की शक्तियों के साथ नारियल के दीपक में 108 बाती के साथ दीपदान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक के शुभ महीने में, और विशेष करके दीपावली के महानिशा काल (महानिशा कालअर्धरात्रि के आसपास का "महानिशा" काल, जिसे दीपावली और काली चौदस जैसी रातों में तांत्रिक पूजन हेतु सर्वाधिक प्रबल समय माना जाता है।) में या स्वदोष के समय में (शाम के समय में), प्रमुख देवी-देवताओं का अपने कुल के देवी-देवताओं और कुल की शक्तियों के साथ, 108 बाती लगे नारियल के दीपक से दीप दान (दीपदानविशेष अवसरों — जैसे गंगा दशहरा पर काल भैरव या बटुक भैरव की पूजा — पर किया जाने वाला दीपदान अनुष्ठान।) करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस दीप दान से अनेकों अनेक पुण्य मिलते हैं और बहुत सारे अनिष्टों का नाश होता है, अकाल मृत्यु (अकाल मृत्यु) से रक्षा होती है, तथा घर-परिवार में आने वाले अनेकों प्रकार के कष्टों और दुख-दारिद्र्य से छुटकारा मिलता है। वे यह भी कहते हैं कि यह विधि हर वर्ष दीपावली की शाम या रात के समय में अवश्य करनी चाहिए।
कर्म साक्षी दीप और नारियल के दीपक की तैयारी
सर्वप्रथम कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित होता है, पुष्पों से सजे पाँच पत्ते रखे जाते हैं, और सूखी गड़ी को बीच से काटा जाता है — यह कार्य घर का पुरुष करे तो अत्युत्तम।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम एक कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित करें, पुष्पों से सजाकर पाँच पत्ते रखें, और उन्हीं में नारियल का दीपक रखें; सूखी गड़ी को अच्छे चाकू से ध्यानपूर्वक बीच से काटें, और यह कार्य घर का पुरुष करे तो अत्युत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम एक दीप प्रज्वलित करना है, जो कर्म साक्षी दीप रहेगा और पुष्प के ऊपर रखा जाता है। उसके पश्चात, वे कहते हैं कि पुष्पों से सजाकर पाँच पत्ते इस प्रकार रखें और उन्हीं में नारियल का दीपक रखें। दीपक बनाने के लिए सूखी गड़ी लेकर अच्छे तेज़ चाकू से उसे बीच से काटा जाता है, यह ध्यान रखते हुए कि हाथ न कटे। वे कहते हैं कि यह कार्य घर का पुरुष करे तो अत्युत्तम है — नारियल पुरुष काटे तो अधिक शुभ माना जाता है।
नारियल के दीपक के लिए कलावा (मौली) से 108 बाती वाली बाती बनाना
तीन सूत्र वाला कलावा अठारह बार लपेटकर दोहरा करने पर छत्तीस, गूँथने पर एक बाती जो 108 बाती के बराबर, और बीच से काटने पर दो दीपकों के लिए।
वक्ता दिखाते हैं कि तीन सूत्र वाले कलावा (कलावा, मौली) के सूती धागे को 18 बार लपेटकर फिर बीच से मोड़ देने पर 36 धागे हो जाते हैं, जिन्हें आपस में गूँथ देने पर एक ऐसी बाती बनती है जो 108 बाती के बराबर होती है; फिर उसे बीच से काट देने पर दो दीपकों के लिए बाती मिल जाती है।
वक्ता दिखाते हैं कि नारियल के दीपक की बहु-सूत्र बाती कलावा (कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है।, लाल-पीले मौली धागे) से कैसे बनाई जाती है, जिसमें तीन धागे आपस में बटे होते हैं, इसलिए धागे के 36 फेरे 108 बाती दे देते हैं। वे धागे को किसी आधार पर 18 बार लपेटते हैं, उसे थोड़ा लंबा रखते हुए, और फिर उसे बीच से मोड़कर दोहरा कर देते हैं, जिससे 36 हो जाते हैं। इस पूरे गुच्छे को जब आपस में अच्छी तरह गूँथ दिया जाता है, तो वह एक लंबी बाती बन जाती है जो 108 बाती के बराबर होती है। फिर वे उसे बीच से काटकर किनारे बराबर कर लेते हैं, जिससे 108 बाती वाली दो अलग बातियाँ मिल जाती हैं — दो दीपकों के लिए पर्याप्त। वे सावधान करते हैं कि धागा सदैव सूती ही होना चाहिए, इसके लिए कभी भी रेशम का धागा नहीं लाना चाहिए।
दीपावली के दीप दान में नारियल की खोल को दीपक बनाने का कारण
दीपावली के दीप दान में दीपक के रूप में नारियल की खोल का प्रयोग क्यों किया जाता है?
वक्ता कहते हैं कि दीपक के रूप में नारियल की खोल का प्रयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि यह दीपावली है: सूखा मेवा जब द्रव्य के साथ जलता है तो वातावरण में विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है, जिससे श्री तत्व (श्री तत्व) की वृद्धि होती है, घर के देवी-देवता संतुष्ट होते हैं, और अनेक प्रकार के अभिचार तंत्र तथा नकारात्मक शक्तियाँ रुकती हैं; तिल तेल या शुद्ध घी, दोनों में से कोई भी प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता बताते हैं कि दीपक के रूप में नारियल की खोल का प्रयोग विशेष रूप से इसलिए किया जाता है क्योंकि यह दीपावली है — सूखा मेवा (जैसे नारियल की गड़ी) जब किसी द्रव्य के साथ जलता है तो वह वातावरण में विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है। वे कहते हैं कि नारियल की खोल को दीपक बनाने से श्री तत्व (श्री तत्वशुभ ऐश्वर्य और समृद्धि का तत्व, जिसे अनुष्ठान द्वारा गृहस्थी में आकर्षित करने हेतु आवाहित किया जाता है।) की वृद्धि होती है, घर के देवी-देवता पुष्ट और संतुष्ट होते हैं, और यह अनेक प्रकार के अभिचार तंत्र तथा नकारात्मक शक्तियों को रोकने में सक्षम होता है। वे दिखाते हैं कि उन्होंने दीपक में तिल तेल का प्रयोग किया है, और कहते हैं कि चाहें तो इसके स्थान पर शुद्ध घी का भी प्रयोग किया जा सकता है।
दीप दान आरंभ करने से पूर्व संकल्प लेना
हाथ में पुष्प और जल लेकर संकल्प लिया जाता है — संस्कृत आती हो तो संस्कृत में, अन्यथा हिंदी में — अपने कुल के देवी-देवताओं की प्रसन्नता हेतु।
वक्ता कहते हैं कि दीपक तैयार हो जाने के बाद हाथ में पुष्प और जल लेकर संकल्प लेना चाहिए — संस्कृत आती हो तो संस्कृत में, अन्यथा हिंदी में — कि अपने कुलदेवी और कुल के देवताओं सहित सभी की प्रसन्नता हेतु यह दीप दान किया जा रहा है।
वक्ता कहते हैं कि दीपक तैयार कर लेने के बाद अगला चरण संकल्प (संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।) लेना है। हाथ में पुष्प और जल लिया जाता है, और संकल्प उसी भाषा में बोला जाता है जिसमें साधक को विधि आती हो — संस्कृत आती है तो संस्कृत में, अन्यथा हिंदी में — कि अपने कुल के देवी-देवताओं सहित सभी की प्रसन्नता हेतु यह दीप दान किया जा रहा है।
दीपावली दीप दान के पाँच दीपक किन-किन के नाम से
पाँच दीपक इस क्रम में: लक्ष्मी-गणेश, लक्ष्मी-नारायण, कुल की देवी और कुल के भैरव, निकटतम शक्तिपीठ, और शिव परिवार।
वक्ता कहते हैं कि पाँच दीपक इस क्रम में समर्पित किए जाते हैं: पहला लक्ष्मी-गणेश के नाम से, दूसरा लक्ष्मी-नारायण के नाम से, तीसरा अपनी कुलदेवी और कुल के भैरव के नाम से, चौथा घर के सबसे निकट के शक्ति पीठ के नाम से, और अंतिम शिव परिवार के नाम से — और इसी क्रम में प्रत्येक दीपक के नाम से पुष्प तथा फिर धूप (धूप) अर्पित की जाती है।
वक्ता कहते हैं कि संकल्प ले लेने के बाद, जिस देवी-देवता के नाम से दीपक जलाना है उनके नाम का पुष्प उस दीपक के पास अर्पित किया जाता है। वे पाँच दीपक क्रम से बताते हैं: पहला लक्ष्मी-गणेश जी के नाम से, दूसरा लक्ष्मी-नारायण के नाम से, तीसरा अपने कुल की देवी और कुल के भैरव के नाम से, चौथा घर के पास जो भी शक्तिपीठ सबसे निकट हो उनके नाम से, और पाँचवाँ तथा अंतिम दीपक शिव परिवार के नाम से। इसके बाद वे कहते हैं कि इन्हीं पाँचों को उसी क्रम में अलग-अलग धूप (धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।) दिखाई जाती है: पहले लक्ष्मी-गणेश जी को, फिर लक्ष्मी-नारायण को, फिर अपने कुल की देवी और कुल के भैरव को, फिर निकटतम शक्तिपीठ को, और अंत में शिव परिवार को।
पाँचों दीपकों को क्रम से प्रज्वलित करना
पाँचों दीपक कर्म साक्षी दीपक से ही उसी नियत क्रम में प्रज्वलित किए जाते हैं, देवता का नाम, दीप प्रज्वलन मंत्र या तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ करते हुए।
वक्ता कहते हैं कि पाँचों दीपक कर्म साक्षी दीपक से ही एक-एक करके उसी नियत क्रम में (लक्ष्मी-गणेश, लक्ष्मी-नारायण, कुल की देवी और कुल के भैरव, निकटतम शक्तिपीठ, शिव परिवार) प्रज्वलित किए जाते हैं, और साथ में उस देवी-देवता का नाम, दीप प्रज्वलन का मंत्र, या तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करते हुए उनका ध्यान-स्मरण किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि कर्म साक्षी दीपक से ही सभी दीपों को प्रज्वलित किया जाता है। वे कहते हैं कि प्रत्येक दीपक जलाते समय जिस देवी-देवता के नाम से वह है उनका नाम लेते रहें, या फिर दीप प्रज्वलन का मंत्र पढ़ सकते हैं। वे कहते हैं कि सूक्तम का पाठ भी किया जा सकता है, विशेष रूप से तंत्रोक्त देवी सूक्तम का, अथवा जिस देवी-देवता का दीपक हो उनके शुभ सूक्त, स्तुति इत्यादि का गायन किया जा सकता है। वे कहते हैं कि जिनका भी दीप प्रज्वलित करें, उनका ध्यान और स्मरण करते हुए ही प्रज्वलित करें। पाँचों दीपक एक-एक करके उसी पूर्व क्रम में जलाए जाते हैं: लक्ष्मी-गणेश, फिर लक्ष्मी-नारायण, फिर अपने कुल की देवी और कुल के भैरव, फिर निकटतम शक्तिपीठ, और अंत में शिव परिवार।
प्रत्येक प्रज्वलित दीप को पुष्पांजलि और आचमनी से जल अर्पित करना
प्रत्येक प्रज्वलित दीप के पीछे थोड़ी पुष्पांजलि दी जाती है और आचमनी से तीन बार जल, उस देवता का नाम लेते हुए।
वक्ता कहते हैं कि दीप प्रज्वलित करने के बाद प्रत्येक दीप के पीछे जरा सी पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और आचमन (आचमनी) से तीन बार जल दिया जाता है, प्रत्येक देवता का नाम-मंत्र लेते हुए — "कुल देवी नमः कुल देवताय नमः पुष्पांजलि समर्पयामि तदुपरांत आचमन्यम जलम समर्पयामि" — अथवा सामान्य हिंदी में वही भाव बोलते हुए।
वक्ता कहते हैं कि सभी दीप प्रज्वलित हो जाने के बाद प्रत्येक दीप के पीछे जरा सा पुष्प चढ़ाकर पुष्पांजलि दी जाती है, और उसके बाद आचमनी से तीन बार जल दिया जाता है। वे कहते हैं कि ऐसा सभी दीपकों के साथ, बारी-बारी से, संबंधित देवता का नाम-मंत्र लेते हुए करना है — जैसे "कुल देवी नमः कुल देवताय नमः पुष्पांजलि समर्पयामि तदुपरांत आचमन्यम जलम समर्पयामि" — अथवा, वे कहते हैं, यही अर्पण सामान्य हिंदी में बोलते हुए भी किया जा सकता है, सभी का नाम लेकर पुष्प और तीन बार आचमनी से जल देते हुए।
कुल देवी और कुल की शक्तियों हेतु दीपावली दीप दान का फल
इससे कुल की शक्तियाँ पुष्ट और संतुष्ट होती हैं, और घर-परिवार की अनेक प्रकार के अरिष्टों से रक्षा होती है।
वक्ता कहते हैं कि दीपावली के अति विशिष्ट शुभ काल में प्रमुख देवी-देवताओं के साथ अपनी कुलदेवी के लिए इस प्रकार दीपदान करने से अनेक प्रकार के अरिष्टों और अनिष्टों से रक्षा होती है, तथा कुल की शक्तियाँ पुष्ट और संतुष्ट होकर हर प्रकार से कल्याण करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि दीपावली के अति विशिष्ट शुभ काल में जब प्रमुख देवी-देवताओं के साथ अपने कुल के देवी-देवताओं का इस प्रकार दीप दान किया जाता है, तो अनेक प्रकार के अरिष्टों (अरिष्टआसन्न विपत्ति अथवा अशुभ बाधा, जिसमें वे लक्षण भी आते हैं जिन्हें अकाल मृत्यु का सूचक माना जाता है।) और अनिष्टों से रक्षा होती है। वे कहते हैं कि इस अर्पण से कुल की शक्तियाँ पुष्ट होती हैं, संतुष्ट होती हैं, और बदले में वे हर प्रकार से कल्याण करती हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।