YouTube देखकर किया नवार्ण मंत्र जप — साधिका के साथ क्या हुआ, और वक्ता के नियम
YouTube से सीखे बिना मार्गदर्शन के नवार्ण मंत्र जप की एक देखी हुई घटना — अनुभव, साधिका और परिवार को हुई हानि, विंध्याचल का उपाय — और नवार्ण, कुंजिका, अधिकार और गुरु मार्गदर्शन पर वक्ता के नियम।
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वक्ता प्रयोग-मंत्र प्रसारित क्यों नहीं करते: मंत्र की ऊर्जा सीमित होती है
YouTube या Facebook से देखकर मंत्र करना; न संभली ऊर्जा गंभीर समस्या बन जाती है
वक्ता कहते हैं कि वे एक ऐसी सत्य घटना रख रहे हैं जिसके वे स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, ताकि तंत्र प्रेमी यह समझें कि इंटरनेट, YouTube और Facebook पर हर विषय देखकर उछल-उछल कर करने से क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं। वे कहते हैं कि मंत्र की ऊर्जा सीमित होती है, और यदि कोई व्यक्ति उस ऊर्जा को संभाल न पाए और असंतुलित हो जाए तो बहुत दिक्कत वाला विषय हो जाता है — इसीलिए वे अपने चैनलों पर ऐसे मंत्र न प्रसारित करते हैं, न किसी को उन्हें करने के लिए प्रेरित करते हैं, और इसीलिए अधिकार का विषय बार-बार रखते हैं।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि वे श्रोताओं के समक्ष एक ऐसी सत्य घटना रख रहे हैं जिसके वे स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं — वे इसमें कहीं भी शामिल नहीं थे, लेकिन पूरी घटना को अपने सामने घटते देखा है। उनका उद्देश्य, वे कहते हैं, यही है कि विशेष रूप से तंत्र प्रेमी इन विषयों को सही प्रकार से समझें: इंटरनेट, YouTube और Facebook पर हर विषय देखकर उछल-उछल कर करने से क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं। वे कहते हैं कि शुरू से लेकर आज तक उन्होंने अपने दोनों चैनलों पर यह नियम बिल्कुल बनाए रखा है कि इस प्रकार के मंत्र चैनल पर प्रसारित नहीं किए जाते, और न ही किसी को उन्हें करने के लिए बहुत अधिक प्रेरित किया जाता है। इसका कारण यह है कि मंत्र की ऊर्जा सीमित होती है, और यदि कोई व्यक्ति उस ऊर्जा को संभाल न पाए और असंतुलित हो जाए तो बहुत दिक्कत वाला विषय हो जाता है। इसीलिए, वे कहते हैं, अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। का विषय वे सबके समक्ष बार-बार रखते हैं। वे यह भी बताते हैं कि संबंधित व्यक्ति के वीडियो उनके पास हैं, लेकिन वे उन्हें उजागर नहीं करना चाहते; उन्होंने स्वयं भी मना किया था और केवल इतना कहा कि घटना को सबके सामने रख दिया जाए ताकि लोग समझें। यह घटना, वे कहते हैं, कोलकाता क्षेत्र की है — बंगाल, जहाँ हर जगह तंत्र विचार आदि का प्रयोग होता है और जहाँ परेशान व्यक्ति स्वयं भी समाधान खोजने का प्रयास करता है।
दो-चार सफल प्रयोगों के बाद स्वयं तांत्रिक बन जाने का भ्रम
न सिद्धि, न दीक्षा — फिर भी दो-चार सफलताएँ व्यक्ति को तांत्रिक होने का भ्रम दे देती हैं
वक्ता कहते हैं कि साधिका ने लगभग 2016-17 में किसी व्यक्ति के चैनल को देखकर अभिचार नाश हेतु कुछ विशेष वामाचारी प्रयोग किए; उनसे उन्हें बड़ा तीक्ष्ण लाभ हुआ और विश्वास अकाट्य हो गया कि ऐसे प्रयोगों से उनका रक्षण हो सकता है। वे कहते हैं कि यह वह पैटर्न है जिसे वे कई बार लाइव में बोल चुके हैं: जो व्यक्ति अभिचार से ग्रसित होकर इस क्षेत्र में आता है और सुनते-सुनते, पढ़ते-पढ़ते अनुभव पाता जाता है, वह स्वयं ही तांत्रिक बन जाता है — या यों कहिए कि तांत्रिक बनने का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। कोई विशेष सिद्धि नहीं की, कहीं दीक्षा नहीं ली, लेकिन दो-चार चीज़ें सफल हो गईं तो लगता है कि अब हम भी तांत्रिक हैं।
वक्ता कहते हैं कि आज से लगभग चार-पाँच वर्ष पहले — लगभग 2016 या 2017 में — साधिका ने किसी व्यक्ति के चैनल को देखकर अभिचार नाश हेतु कुछ विशेष प्रयोग किए, जो वामाचारी प्रयोग थे। उनसे उन्हें बड़ा तीक्ष्ण लाभ हुआ और विश्वास अकाट्य हो गया कि इस प्रकार के प्रयोग करने से उनका रक्षण हो सकता है। वे कहते हैं कि यह बात वे कई बार लाइव में बोल चुके हैं। यदि कोई व्यक्ति अभिचार आदि से ग्रसित होकर इस क्षेत्र में आता है, तो इन विषयों को सुनते-सुनते, जानते-जानते, पढ़ते-पढ़ते उसे इतने अनुभव हो जाते हैं कि वह स्वयं ही तांत्रिक बन जाता है — या, वक्ता के शब्दों में, उसे तांत्रिक बनने का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। कोई विशेष सिद्धि नहीं की, कहीं दीक्षा नहीं ली, लेकिन दो-चार चीज़ें सफल हो गईं तो ऐसे लोगों को लगता है कि अब वे स्वयं भी तांत्रिक हैं। वे कहते हैं कि यह बात वे इसलिए भी कह रहे हैं क्योंकि जब फोन आते हैं तो सामने वाला बताता है कि उसके साथ फलानी शक्ति प्रत्यक्ष चलती है, उसने ऐसा-ऐसा कर लिया — और साथ ही वह स्वयं कष्ट से ग्रसित भी है। दोनों बातें साथ चलती हैं: लोग कहते हैं कि उन्होंने संसार के फलाने व्यक्ति का दुख दूर कर दिया, लेकिन उनका अपना दुख दूर नहीं हो रहा और वे स्वयं शरणागति खोज रहे हैं। भक्त या साधक होकर, यह जानते हुए कि आप स्वयं ग्रसित हैं और कष्ट में हैं, फिर भी बड़बोलापन दिखाना — यह, वे कहते हैं, बड़ा अलग प्रकार का विषय हो जाता है। साधिका ने, जो देखा-समझा उससे लाभ पाकर, इस मार्ग में आगे बढ़ने का निश्चय किया — क्योंकि, वक्ता कहते हैं, इस मार्ग में जब थोड़ा-बहुत सफल होने लगता है तो व्यक्ति इसमें पूरी तरह घुसने का प्रयास करता है।
नवार्ण जप से पहले तय करने योग्य प्रश्न: अधिकार, प्रणव, न्यास, गणपति-भैरव पूजन
बिना मार्गदर्शन की साधिका ने इन सबको छोड़कर कैसे 108 माला प्रतिदिन आरंभ किया
वक्ता कहते हैं कि साधिका के पास मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था, इसलिए उन्होंने उसी चैनल के वीडियो देखना आरंभ किया, जिनमें नवार्ण मंत्र की अत्यंत महिमा बताई गई थी। उन्होंने सोचा कि यदि नवार्ण की जागृति और सिद्धि हो जाए तो भगवती की कृपा से अनेक सिद्धियाँ मिल सकती हैं। नवार्ण का अधिकार किसे है, किसे करना चाहिए, प्रणव के साथ करना है या नहीं, न्यास विधि होगी या नहीं, गणपति-भैरव पूजन होगा या नहीं — इन विषयों से उनका कोई लेना-देना नहीं रहा; उन्होंने बस एक लाल चंदन की माला, लाल वस्त्र और लाल आसन खरीदा, सामान्यतः बताया जाने वाला विधान लिया, और प्रतिदिन 108 माला जप आरंभ कर दिया।
क्या बिना दीक्षा के भी मंत्र जप से अनुभव और पूर्वाभास हो सकते हैं?
दीक्षा हो या न हो मंत्र प्रभाव दिखाता है; शुभ ग्रह और जागृत अष्टम भाव इसे शीघ्र कर देते हैं
वक्ता कहते हैं कि हाँ: साधिका की कोई दीक्षा नहीं थी, कुछ नहीं, फिर भी मंत्र ने अपना प्रभाव दिखाया — 9-10 दिन में ही सुगंधित वायु, स्वप्न में दक्षिणेश्वरी काली का उन्हें बुलाना, और दिव्य लोकों में घूमना; सवा लाख-दो लाख जप तक वे भगवती के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गईं और पूर्वाभास होने लगे। वे जोड़ते हैं कि यदि उस समय व्यक्ति के ग्रह-नक्षत्र सही हों, शुभ ग्रहों का योग चल रहा हो, नवम भाव का कोई विशेष योग हो और अष्टम भाव जागृत हो, तो साधना के क्षेत्र में आते ही ये सब चीज़ें तुरंत मिल जाती हैं। जो पता नहीं था, वे कहते हैं, वह यह कि साधिका किस प्रकार की गलती कर रही थी।
बिना मार्गदर्शन के नवार्ण साधक को शक्तियाँ कैसे भ्रम देती हैं
स्वप्न में मिले मंत्र, दिव्य दृष्टि का संपुट, चार-पाँच लाख पर दर्शन, शरीर और घर की उपेक्षा
वक्ता कहते हैं कि जैसे-जैसे साधिका और जप की ओर बढ़ीं, शक्तियों ने भ्रम देना आरंभ किया: स्वप्न में उन्हें मंत्र मिलने लगे — यह मंत्र करो, यह देवता हैं, ये शक्तियाँ होती हैं — और जो भी विषय बताया जाता, वे उसे इंटरनेट पर खोजकर उसी के अनुसार करतीं। अनुष्ठान के लगभग दो महीने बाद उन्हें इंटरनेट पर नवार्ण से संबंधित कुछ मंत्र मिले जिनमें कहा गया था कि कुछ बीज मंत्रों का संपुट लगा देने से दिव्य दृष्टि पूरी तरह जागृत हो जाती है; दिव्य दृष्टि का मोह पहले ही जाग चुका था, और YouTube पर, वे कहते हैं, ऐसे विषयों की भरमार है। अभ्यास हो जाने से उनकी 108 माला अब साढ़े तीन-चार घंटे में पूरी हो जाती थी और उन्होंने संख्या और बढ़ा दी; साधना में अब भी केवल नवार्ण ही था, जिसे वे प्रणव के साथ कर रही थीं। चार से पाँच लाख के बीच उनकी अवस्था इतनी उग्र हो गई कि जिस भी शक्ति का ध्यान करतीं वह प्रत्यक्ष खड़ी लगती — जबकि वे अपने शरीर को नहीं देख रही थीं और घर को पूरी तरह छोड़ चुकी थीं।
गड़बड़ाते मंत्र जप का पहला संकेत: परिवार पर हानि
एक पक्ष के भीतर हानियाँ, जिन्हें अभिचार समझकर उसी मंत्र से उतारा गया
वक्ता कहते हैं कि पहला नकारात्मक प्रभाव साधना आरंभ करने के मात्र 11-12 दिन के भीतर — एक पक्ष लगते-लगते — आया: उनके पिताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई। उन्होंने मान लिया कि कारण अभिचार होगा, और जप से मिलने लगे अनुभवों का आश्रय लेकर, जिस मंत्र का जप कर रही थीं उसी से अभिमंत्रित करके पिता पर उतारा किया, फिर विशेष द्रव्यों से हवन किया; पिता कुछ ठीक हुए, जिससे उन्हें विश्वास हुआ कि मंत्र विद्या काम कर रही है। फिर बड़े भाई का, जो बाहर रहते थे, पैर टूट गया और उन्हें घर लाना पड़ा; इसे भी नज़रअंदाज़ करके साधना जारी रखी। तीसरे, माताजी का मासिक धर्म रजोनिवृत्ति के बाद दोबारा शुरू हो गया, शरीर की अवस्था बहुत बिगड़ी और डॉक्टर ने कहा कि गर्भाशय ऑपरेशन करके निकालना पड़ेगा — न निकालते तो कैंसर हो जाता। तब भी वे नहीं रुकीं। यह सब, वे कहते हैं, मात्र दो-तीन महीने के भीतर की बात है।
बिना मार्गदर्शन के नवार्ण जप से आवेश, उच्चाटन और शरीर का टूटना
तीसरे महीने में साधिका का अपना शरीर टूटता है; स्रोत चैनल कहता है जप-हवन करते रहिए
वक्ता कहते हैं कि तीसरा महीना पूरा होते-होते साधिका के अपने शरीर में सबसे विकट परिस्थिति आरंभ हुई: लगातार दर्द, अपने ऊपर आवेश महसूस होना, लगभग हमेशा नशे जैसी स्थिति, कंधे भारी और मुंडी झुक जाना — यहाँ तक कि जो प्रतिदिन 150 माला तक कर लेती थीं, वे माला उठाने की अवस्था में भी नहीं रहीं। उच्चाटन और चिड़चिड़ापन शुरू हुआ, और शरीर पर लाल रंग के छाले पड़ने लगे। चार-पाँच महीने बाद उन्होंने उसी चैनल से संपर्क किया जिसके वीडियो देखकर शुरू किया था; वहाँ से कहा गया कि इसमें कोई दिक्कत नहीं, भगवती ने तो रक्षा ही की है, बस प्रतिदिन कुछ माला जप और हवन ज़रूर कीजिए। उन्होंने किया, पर शांति नहीं मिली; उच्चाटन बढ़ता गया, घर की समस्याएँ और कर्ज़ बढ़ते गए।
बिना मार्गदर्शन के जप से जागी शक्ति का घर-परिवार की शक्ति बनकर बलि माँगना
नींद में गला दबाना, गर्भाशय में गाँठ, बंद मासिक और साल पूरा होते-होते हैलुसिनेशन
वक्ता कहते हैं कि अब दिखने वाली चीज़ों की जगह असली चीज़ दिखने लगी: सोते समय कोई स्त्री उनका गला दबाती, खींचती, और कहती कि माला जप नहीं हो रहा, तुम्हें जप करना होगा; कुछ समय बाद वह बलि माँगने लगी — "हम तुम्हारे घर-परिवार की शक्ति हैं, बलि दो, बलि देना ज़रूरी है, नहीं तो शांत नहीं होंगे।" भ्रम की अवस्था शुरू हुई: बलि देनी है या नहीं, यह कौन-सी शक्ति है, इस मंत्र से क्या जागृत हुआ। आसपास के लोग सटीकता से कुछ नहीं बता पाते थे। लगभग साल होने को आया, पूजा-पाठ छूट चुका था, तब कम उम्र में ही गर्भाशय में गाँठ बन गई, मासिक धर्म बंद हो गया, इलाज से लाभ नहीं हुआ, रासायनिक प्रतिक्रियाओं से शरीर फूल गया, और हैलुसिनेशन इतना बढ़ा कि यथार्थ और भ्रम में अंतर करना कठिन हो गया; मनोचिकित्सक की दवाइयों से बस नींद आती, जबकि आवाज़ कहती रहती: जप करो, तुमने क्यों छोड़ा, हमारी बलि नहीं दी।
गलत ढंग से किए नवार्ण जप के दोषों का विंध्याचल उपाय
माई से क्षमा याचना, सब जगह दर्शन, सप्तशती पाठ और क्षमा मंत्र का जप
वक्ता कहते हैं कि चार-पाँच साल अलग-अलग लोगों को दिखाने-सुनाने पर भी लाभ न होने के बाद, साधिका की कोलकाता में अपनी सहेली के नवचंडी अनुष्ठान में विंध्याचल के कुछ पुरोहितों से भेंट हुई। पूरा विषय सुनकर उन्होंने कहा कि ये दुष्प्रभाव उन मंत्रों के कारण हैं जो उन्होंने किए — मंत्र की ऊर्जा गड़बड़ कर रही है और उससे अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो रहे हैं — और निर्देश दिया कि वे विंध्य क्षेत्र आकर माई से क्षमा याचना करें, यथासंभव सब जगह दर्शन करें, एक बार सप्तशती पाठ करवा लें, और क्षमा प्रार्थना तथा क्षमा मंत्र का जप करें, क्योंकि माँ बहुत दयालु हैं और क्षमा कर देंगी।
बुलाई गई शक्ति का अपनी बलि माँगना, और विंध्याचल में उसका शांत होना
"हमें बुलाया गया तो दिया क्यों नहीं" — नौ दिन गंगा स्नान और परिक्रमा, क्या सुधरा और क्या नहीं
वक्ता कहते हैं कि त्रिकोण यात्रा के समय काली खोह के पीछे भैरवनाथ के स्थान पर उनकी साधिका से भेंट हुई, जहाँ वे बहुत अधिक "खेल" रही थीं: अनुष्ठान हो चुका था, और अब उनके शरीर पर जो चीज़ें थीं वे अपना भोग माँग रही थीं — भोजपुरी में कहतीं कि हमें बलि चाहिए, हमें बुलाया गया है तो दिया क्यों नहीं गया, हम क्रुद्ध हैं। वहाँ के लोग शांत कराते: क्षमा कर दीजिए, जाने दीजिए, अनजाने में हुआ है — जिस पर उत्तर आता कि जब बुलाया है तो देना चाहिए। वे 9-10 दिन रहीं, प्रतिदिन गंगा स्नान किया, यथासामर्थ्य लघु परिक्रमा की और भगवती को मनाती रहीं; विक्षिप्तता ठीक हो गई, शरीर शांत हुआ, उच्चाटन और गाँठ की परेशानी बहुत हद तक ठीक हुई, और बाद में उन्होंने बताया कि थोड़ा-थोड़ा रक्तस्राव फिर शुरू हुआ है — जिसे उन्होंने क्षमा मिलने की निश्चितता माना।
वक्ता उस अवस्था का वर्णन करते हैं जिसमें त्रिकोण यात्रादेवी के तीन पीठों के मध्य त्रिकोण पूर्ण करने वाली यात्रा। के समय विंध्याचल में उनकी साधिका से भेंट हुई। सबसे पहली बात, वे कहते हैं, यह थी कि काली खोह के पीछे भगवान भैरव — भैरवनाथ — के स्थान पर जब वे मिलीं तो बहुत अधिक "खेल" रही थीं (शरीर पर सवार शक्ति के प्रकट होने के लिए स्थानीय शब्द)। यह कैसे हुआ: जो अनुष्ठान होना था वह हो चुका था, और उसके बाद उनके शरीर पर जो-जो चीज़ें थीं वे अब अपना भोग माँग रही थीं। वे माँगतीं, वक्ता कहते हैं, जैसे भोजपुरी भाषा में कहा जाता है: हमें बलि चाहिए; हमें जब बुलाया गया है तो दिया क्यों नहीं गया; इस बात से हम क्रुद्ध हैं। वहाँ के लोग शांत कराते — क्षमा कर दीजिए, जाने दीजिए, अनजाने में हुआ है — और उत्तर आता: ऐसे कैसे? जब बुलाया है तो देना चाहिए। कैसे क्या हुआ, इसकी पूरी जानकारी, वे कहते हैं, बाद में मिली, और बहुत-से विषय स्वयं साधिका ने ही बताए। वे वहाँ लगभग 9-10 दिन रहीं, प्रतिदिन गंगा स्नान करतीं, यथासामर्थ्य परिक्रमा करतीं — पैदल पूरी नहीं कर पाती थीं, लेकिन लघु परिक्रमा आदि करके — और भगवती को मनाना जारी रखा। वे लगभग ठीक होकर गईं: इतनी जल्दी पूरा ठीक होना संभव नहीं था, लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि विक्षिप्तता की अवस्था ठीक हो गई, शरीर थोड़ा शांत हुआ, और जो उच्चाटन बनता था और पेट में जो गाँठ थी, वह परेशानी भी बहुत हद तक ठीक हुई। बाद में संपर्क होने पर उन्होंने बताया कि गाँठ, और उसके कारण मासिक धर्म की जो समस्या थी, वह भी ठीक हो रही है — पूरी तरह नहीं, लेकिन थोड़ा-थोड़ा रक्तस्राव शुरू हुआ है — यानी, उनके अनुसार, निश्चितता है कि क्षमा प्राप्त हो रही है।
बिना गुरु के मार्गदर्शन के नवार्ण या कुंजिका का कितना जप सुरक्षित है?
अपने घर की अनजानी ऊर्जाएँ जागती हैं; स्वयं करें तो केवल निश्चित कम मात्रा में
वक्ता कहते हैं कि सबसे ज़रूरी सीख यह है कि जब आप किसी मंत्र का जप करते हैं तो आप नहीं जानते कि उससे आपके घर की कौन-सी ऊर्जा, कौन-से देवी-देवता जागृत हो रहे हैं, कौन उसे स्वीकार कर रहा है और उससे कौन-सा उत्पात मचने वाला है। इसीलिए वे नवार्ण और कुंजिका को लेकर तटस्थ रहते हैं और बार-बार कहते हैं कि बिना विषय समझे न करें। हर जगह जो फल बताए जाते हैं वे होते तो हैं — पर विधिवत करने पर। यदि अपनी मनमर्जी से, बिना मार्गदर्शन के करें तो एक निश्चित, कम मात्रा में करें; अधिक मात्रा में ऊर्जा असंतुलित हो जाएगी, और साक्षात जगदंबा को प्रकट कर देने का सामर्थ्य न उनमें है न श्रोता में। नवार्ण, वे कहते हैं, अकेले सीधे करने का मंत्र नहीं है; उसके नियम हैं।
नवार्ण मंत्र को तंत्र की गायत्री क्यों कहा जाता है?
नौ चंडिकाओं का मंत्र जिसमें दसों महाविद्याएँ और नवदुर्गाएँ हैं; हलवा-पूरी की तरह बाँटा जाने वाला मंत्र
वक्ता कहते हैं कि नवार्ण केवल दुर्गा जी का मंत्र नहीं है: वह उस भगवती की नौ चंडिकाओं का, उनकी नौ प्रमुख शक्तियों का मंत्र है; उसमें दसों महाविद्याएँ उपस्थित हैं, नवदुर्गाएँ उपस्थित हैं। इससे हर प्रकार की शक्ति जागृत हो जाती है और षट्कर्म के सभी विधान हो सकते हैं। वेद में गायत्री है, तंत्र में नवार्ण — तंत्र में नवार्ण के समकक्ष कोई दूसरा मंत्र नहीं माना गया। फिर भी, वे कहते हैं, इतने बड़े तांत्रिक मंत्र को आजकल लोग हलवा-पूरी की तरह बाँटते हैं — हर वीडियो में नवार्ण करो — जबकि कैसे करें, कितना करें, दीक्षा लेनी है या नहीं, बिना दीक्षा के कितना करें, इस पर कोई चर्चा नहीं करता।
तंत्र विद्या केवल योग्य गुरु के सान्निध्य में सीखें
फल आपको और आपके परिवार को भोगना है, YouTube के बाबाजी को नहीं; चैनल हर वर्ण के लिए पौष्टिक अनुष्ठानों तक सीमित
वक्ता कहते हैं कि उनका उद्देश्य भ्रम फैलाना नहीं, बल्कि यह कहना है: जागृत बनो। यदि आप बिना समझे अपनी मनमर्जी से करते हैं तो उसका विपरीत प्रभाव YouTube का बाबाजी या Facebook पर लिखने वाला बाबाजी नहीं भोगेगा — भोगना आपको और आपके परिवार को पड़ेगा। उनका चैनल गृहस्थों को समर्पित है, तांत्रिकों को नहीं; तंत्र विद्या सीखनी है और सिद्धियाँ पानी हैं तो किसी योग्य गुरु के सान्निध्य और मार्गदर्शन में जाएँ। वे केवल वही रखते हैं जो एक सामान्य गृहस्थ कर सकता है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबके और स्त्री-पुरुष सबके कल्याण के लिए; उनके अनुष्ठान अधिकतर पौष्टिक होते हैं, बस एक-दो षट्कर्म से जुड़े (तंत्र काट, विवाह), और उनके पीछे भगवती की यही प्रार्थना है: सब बाधाओं से मुक्ति और धन-धान्य, पुत्र-पौत्र से संपन्नता।
वक्ता कहते हैं कि यह भ्रम फैलाने का विषय नहीं है; वे इसे इसलिए रखते हैं कि भैया, जागृत बनो। यदि बिना जागृत हुए, बिना विषय समझे, अपनी मनमर्जी से करते हो तो उसका जो विपरीत प्रभाव होगा उसे YouTube का बाबाजी आकर नहीं भोगेगा, न Facebook का वह बाबाजी जिसने पूरा विषय लिख दिया है — भोगना तुम्हें और तुम्हारे परिवार को पड़ेगा। इस चैनल के माध्यम से, वे कहते हैं, वे बार-बार कहते हैं कि यह चैनल गृहस्थों को समर्पित है, तांत्रिकों को नहीं; वे विषय ऐसे रखते हैं कि गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। व्यक्ति का कल्याण हो सके, और उनका मार्ग बस वहीं तक सीमित है। तंत्र विद्या सीखनी है, सिद्धियाँ प्राप्त करनी हैं, तो किसी योग्य गुरु के सान्निध्य और मार्गदर्शन में रहकर सीखें। चैनल पर वे वही रखते हैं जिस स्तर तक एक सामान्य गृहस्थ सामान्यतः जा सकता है — ताकि सभी गृहस्थों का, चाहे ब्राह्मण हों, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, स्त्री-पुरुष सभी का कल्याण हो — न कि किसी एक विशेष मंत्र के ज़रिए किसी को तांत्रिक बनाना। तांत्रिक बनाने वाले लोग भरे पड़े हैं; YouTube और Facebook से वे बना देंगे; वे न बना सकते हैं, न ऐसे विषय रखते हैं। जो अनुष्ठान वे आयोजित करते हैं, वे कहते हैं, वे अधिकतर पौष्टिक होते हैं। षट्कर्म से संबंधित बस एक-दो अनुष्ठान होंगे — तंत्र काटने के लिए या विवाह के लिए; नहीं तो पौष्टिक अनुष्ठान ही होता है कि माई भगवती कल्याण करें। उन्हें पता नहीं कि किसके साथ क्या परेशानी है, इसलिए प्रार्थना वही है जिसे ट्रांसक्रिप्ट "सर्व बाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतानिता" लिखता है — भगवती सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त करें और धन-धान्य, पुत्र-पौत्र आदि से संपन्न करें। इसी प्रार्थना के निमित्त अनुष्ठान होते हैं। विषयों को समझा करें, वे कहते हैं; केवल कुतर्क करके, या यह सुनकर कि किस मंत्र से ऐसा होता है उस मोह में पड़कर अपने मन से करेंगे तो कहीं के न रहेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।