महायक्षिणी मां विंध्यवासिनी की कृपा सिद्धि और विंध्याचल धाम
विंध्याचल पूर्ण शक्ति पीठ क्यों है और भगवती विंध्यवासिनी की सेवा चालीसा के माध्यम से कैसे करें।
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देवी के अनेक स्वरूपों की ओर आकर्षण: विंध्यवासिनी की सेवा करें, जिनमें सब समाहित हैं
एक सेवा जिसमें हर स्वरूप समा जाए
वक्ता उस भक्त का वर्णन करते हैं जिसका आकर्षण अनेक स्वरूपों की ओर बढ़ता है — कभी शैलपुत्री की सेवा करना चाहता है, कभी कालरात्रि की, कभी दस महाविद्या में कालिका, त्रिपुरसुंदरी या बगलामुखी की — और अंत में संकुचन में पड़ जाता है कि सेवा करे तो किसकी। उनका उत्तर है कि ऐसे व्यक्ति को भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि उनके स्वरूप में इस समस्त सृष्टि का प्रत्येक कण और प्रत्येक देवी शक्ति समाहित है।
वक्ता एक सामान्य स्थिति से आरंभ करते हैं: आसक्ति भगवती नवदुर्गा के विभिन्न रूपों पर है, और हर स्वरूप आकर्षित करता है। कभी भगवती शैलपुत्री की सेवा करना चाहते हैं; कभी इच्छा होती है कि भगवती कालरात्रि की सेवा करें; कभी दस महाविद्या की ओर आकर्षण बढ़ता है — कभी भगवती कालिका अच्छी लगती हैं, कभी त्रिपुरसुंदरी की ओर खिंचाव होता है, कभी बगलामुखी की सेवा करना चाहते हैं। जब एक के बाद एक स्वरूप की ओर आकर्षण बढ़ता जाता है, तो वे कहते हैं, मन में संकुचन का भाव आता है: आखिर सेवा करें तो किसकी? यह स्वरूप भी अच्छा लग रहा है, वह भी। विंध्याचल क्षेत्र के विषय रखने के बाद वे अपना उत्तर देते हैं: जो भी विभिन्न स्वरूपों की ओर आकर्षित होता है, उसे भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि उनके स्वरूप में इस समस्त सृष्टि का प्रत्येक कण समाहित है। जितनी भी शक्तियाँ हैं, देवी शक्तियाँ हैं, सभी उनमें समाहित हैं।
विंध्याचल: ब्रह्मांड का एकमात्र पूर्ण शक्ति पीठ
जीवन में एक बार जाएँ, जीवन भर सेवा करें
वक्ता कहते हैं कि समस्त ब्रह्मांड में यदि कोई धाम, कोई शक्ति पीठ, कोई स्थान पूर्ण शक्ति पीठ है, तो वह एकमात्र है: गंगा तट पर स्थित भगवती विंध्यवासिनी का विंध्याचल धाम, जहाँ जगदम्बा आदिकाल से उपस्थित हैं। इसलिए, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में एक बार विंध्याचल धाम अवश्य जाना चाहिए, और भगवती विंध्यवासिनी की सेवा जीवन पर्यंत करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि समस्त ब्रह्मांड में पूर्ण शक्ति पीठ के रूप में यदि कोई धाम, कोई शक्ति पीठ, कोई स्थान है, तो वह एकमात्र गंगा तट पर स्थित भगवती विंध्यवासिनी का विंध्याचल धाम है। भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। आदिकाल से वहाँ उपस्थित हैं। इसलिए, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में एक बार विंध्याचल धाम अवश्य जाना चाहिए, और भगवती विंध्यवासिनी की सेवा जीवन पर्यंत करनी चाहिए।
त्रिकालदर्शी सिद्धियाँ केवल विंध्यवासिनी की कृपा से
तांत्रिकों और ज्योतिषियों के लिए आजीवन सेवा
वक्ता कहते हैं कि जितने भी उच्च कोटि के सिद्ध तांत्रिक तंत्र विद्याओं में महारत हासिल करते हैं — विशेषकर त्रिकालज्ञ शक्तियाँ, जिनसे भूत, भविष्य और वर्तमान को देखा-जाना जा सकता है और उनकी गति पकड़ी जा सकती है — उन्होंने किसी न किसी योनि या परिस्थिति में भगवती विंध्यवासिनी की सेवा, पूजा, अर्चना और अनुष्ठान अवश्य किया होता है। त्रिकालदर्शिता, वे कहते हैं, किसी को केवल उनकी कृपा से मिलती है; यह सर्वविदित है। इसलिए ज्योतिष या तंत्र के क्षेत्र में ऐसी सिद्धि चाहने वालों को जगदम्बा विंध्यवासिनी की सेवा-उपासना आजीवन करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जितने भी उच्च कोटि के सिद्ध तांत्रिक होते हैं — जो तंत्र विद्याओं में महारत हासिल करते हैं या उन्हें सिद्ध करते हैं — और विशेषकर त्रिकालज्ञ शक्तियाँ, जिनमें यह सामर्थ्य होता है कि भूत, भविष्य और वर्तमान, हर प्रकार की शक्तियों और हर प्रकार की चीज़ों को देख सकें, जान सकें, उनकी गति पकड़ सकें: इनमें से जिन शक्तियों को कोई सिद्ध करता है, उन शक्तियों की भगवती विंध्यवासिनी की सेवा, पूजा, अर्चना और अनुष्ठान अवश्य की हुई होती है। वह व्यक्ति जिस भी योनि में रहा हो, जिस भी परिस्थिति में, जब उसका समय आया होगा तो उन्हीं की कृपा से किसी को त्रिकालदर्शिता प्राप्त होती है। यह, वे कहते हैं, सर्वविदित है। इसलिए, वे कहते हैं, ज्योतिष के क्षेत्र में और तंत्र के क्षेत्र में जो इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें आजीवन जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। — भगवती विंध्यवासिनी — की सेवा-उपासना अवश्य करनी चाहिए।
विंध्याचल की कथा: देवी पुरुष स्वरूप में, आने वाले सब योगिनी रूप में, और अरुणासुर कथा में देवगण स्त्री रूप में प्रवेश
विंध्य सीमा पर विनायक से वैनायकी
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ भगवती विंध्यवासिनी पुरुष के स्वरूप में मानी जाती हैं और वहाँ का प्रत्येक साधक और प्रत्येक आगंतुक योगिनी स्वरूप में उपस्थित माना गया है। वे पुराणों की अरुणासुर दैत्य की कथा देते हैं: त्रिदेव जब उनके क्षेत्र में गए तो देखा कि नवदुर्गा और दस महाविद्या भगवती के जागने से पहले उनकी सारी व्यवस्थाओं में लगी हैं, विभिन्न भैरव और भैरवी उपस्थित हैं; और विंध्य क्षेत्र में प्रवेश से पहले सभी देवगण पुरुष स्वरूप त्यागकर स्त्री स्वरूप धारण करते हैं — गणेश वैनायकी, महेश्वर माहेश्वरी, विष्णु वैष्णवी — और तभी जगदम्बा से अपनी कथा-व्यथा कहते हैं। यह क्षेत्र, वे कहते हैं, प्रत्येक मनोकामना पूर्ण करता है।
वक्ता कहते हैं कि सभी को जानकर आश्चर्य होगा कि विंध्याचल एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ यह माना जाता है कि भगवती विंध्यवासिनी पुरुष के स्वरूप में हैं, और वहाँ का प्रत्येक साधक और वहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति योगिनी स्वरूप में उपस्थित है। वे पुराणों की अरुणासुर दैत्य की कथा की ओर संकेत करते हैं। जब अरुणासुर के कारण लोग पूरी तरह त्रस्त हो गए और त्रिदेव भगवती विंध्यवासिनी के क्षेत्र में गए, तो उन्होंने देखा कि नवदुर्गा और दस महाविद्या भगवती के जागने से पहले उनकी सारी व्यवस्थाओं में लगी हुई हैं; विभिन्न भैरव और भैरवी वहाँ उपस्थित हैं। और प्रवेश से पहले — जहाँ से विंध्याचल क्षेत्र आरंभ होता है, वहीं — सभी देवगण अपना स्त्रीत्व धारण करते हैं: पुरुष स्वरूप त्यागकर स्त्री स्वरूप धारण करके ही उस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। वही, वे कहते हैं, प्रथम स्थान है जहाँ भगवान गणेश वैनायकी स्वरूप में जाते हैं — विनायक से वैनायकी हो जाते हैं। महेश्वर माहेश्वरी स्वरूप धारण करके जाते हैं; भगवान विष्णु वैष्णवी स्वरूप धारण करके उस स्थान में प्रवेश करते हैं, और फिर जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। से अपनी जो भी कथा-व्यथा है उसका वर्णन करते हैं। तो यह क्षेत्र इतना महत्वपूर्ण है, वे कहते हैं: विंध्य क्षेत्र अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण और प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करने वाला क्षेत्र है। भगवती विंध्यवासिनी की महिमा अनंत है, आदि-अनादि काल से है।
अगस्त्य ऋषि: विंध्य के प्रथम ऋषि और विंध्य कुल के कुल पुरोहित
सदाशिव के बाद सबसे पहले सेवा का उपदेश
वक्ता कहते हैं कि महर्षि अगस्त्य विंध्य क्षेत्र के प्रथम ऋषि कहे जाते हैं: भगवान सदाशिव के पश्चात जगदम्बा ने अपनी पूजा-सेवा का उपदेश और आदेश सर्वप्रथम जिसे दिया, वे अगस्त्य ऋषि थे। वे विंध्य कुल के कुल ऋषि कहे जाते हैं और कुल पुरोहित के रूप में माने जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान महर्षि अगस्त्य ऋषि वहाँ के प्रथम ऋषि कहे जाते हैं। भगवान सदाशिव के पश्चात यदि जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने अपनी पूजा-सेवा का उपदेश और आदेश सर्वप्रथम किसी को दिया, तो वे महर्षि अगस्त्य थे। अगस्त्य मुनि, वे कहते हैं, विंध्य कुल के कुल ऋषि कहे जाते हैं, और कुल पुरोहित के रूप में उन्हें माना जाता है।
कृष्ण अवतार में विंध्यवासिनी के तीन स्वरूप: अष्टभुजा, सुभद्रा-विमला और दिल्ली की योगमाया
विंध्य तंत्र अनेक रहस्य समेटे है
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी ही नारायण के कृष्ण अवतार में तीन रूपों में प्रकट हुईं: कंस के हाथ से छूटकर योगमाया स्वरूप में उपस्थित हुईं, जिन्हें विंध्य क्षेत्र में अष्टभुजा कहते हैं; जगन्नाथ पुरी में सुभद्रा के रूप में, जो वहीं जगन्नाथ मंदिर में शक्ति के रूप में भगवती विमला स्वरूप में स्थापित हैं; और योगमाया के रूप में दिल्ली के स्थान पर धारण किया स्वरूप। वे जोड़ते हैं कि अनेक भेद और रहस्य हैं जिनका पूर्ण अनावरण नहीं किया जा सकता — विंध्य क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है और विंध्य तंत्र अनेक रहस्यों को समेटे हुए एक विचित्र तंत्र है।
वक्ता कहते हैं कि सभी को जानकर आश्चर्य होगा कि भगवती विंध्यवासिनी ही भगवान नारायण के कृष्ण अवतार में तीन रूपों में प्रकट हुई थीं। पहला स्वरूप वह जो सब जानते हैं: कंस के हाथ से छूटकर योगमाया स्वरूप में जाकर उपस्थित हुईं। विंध्य क्षेत्र में उन्हें अष्टभुजा के नाम से जाना जाता है। दूसरे स्वरूप में वे सुभद्रा के रूप में जगन्नाथ पुरी में विद्यमान हैं, और शक्ति के रूप में वहीं जगन्नाथ मंदिर में माँ भगवती विमला के स्वरूप में स्थापित हैं। तीसरा स्वरूप वह जो योगमाया के रूप में जाकर दिल्ली के स्थान पर उन्होंने धारण किया। अनेक भेद हैं, अनेक रहस्य हैं, वे कहते हैं, और रहस्यों का पूर्ण अनावरण नहीं किया जा सकता। लेकिन विंध्य क्षेत्र अत्यंत विस्तृत क्षेत्र है, और विंध्य तंत्र अपने आप में अनेक रहस्यों को समेटे हुए एक विचित्र तंत्र है।
सामान्य भक्तों के लिए सुलभ मार्ग: विंध्यवासिनी चालीसा
जब संस्कृत और मंत्र के नियम पहुँच से बाहर हों
वक्ता कहते हैं कि जो सामान्य और सरल लोग भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करते हैं या करना चाहते हैं, उनके लिए सबसे सुलभ यह है कि उनके चालीसा के माध्यम से ही जगदम्बा को प्रसन्न करने का प्रयास करें — क्योंकि संस्कृत का पाठ सबके लिए संभव नहीं, और मंत्र-जाप की अनिवार्यताओं और नियमों में सब बँध नहीं सकते, जबकि चालीसा सर्वसुलभ होता है। नवरात्रि के दिनों में, वे कहते हैं, नौ दिन विधि-विधान से विंध्यवासिनी चालीसा का पाठ करके उसे जागृत करें, तत्पश्चात उसका प्रयोग करें।
वक्ता कहते हैं कि जो सामान्य और सरल लोग भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करना चाहते हैं या करते हैं, उनके लिए सबसे सुलभ यह है: चाहें तो उनके चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। के माध्यम से ही जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। को प्रसन्न करने का प्रयास करें। कारण वे यह देते हैं कि संस्कृत का पाठ सबके लिए सक्षम नहीं — वे कर नहीं सकते — और मंत्र-जाप इत्यादि की जो अनिवार्यताएँ, नियम-कानून हैं, उनमें सब बँध नहीं सकते। चालीसा, वे कहते हैं, सर्वसुलभ होता है। नवरात्रि के दिनों में नौ दिन तक विधि-विधान से विंध्यवासिनी चालीसा का पाठ करके उसे जागृत करें। तत्पश्चात उसका प्रयोग करें।
घर के पूजन स्थान पर विंध्यवासिनी का स्थान: त्रिकोण मंडल, फोटो या दुर्गा का स्वरूप
विद्याओं में महाविद्या, यक्षिणियों में महायक्षिणी
वक्ता कहते हैं कि चाहें तो अपने पूजन स्थान पर भगवती विंध्यवासिनी के त्रिकोण मंडल का स्थान बनाएँ। नहीं तो उनका फोटो रखें, या भगवती दुर्गा के स्वरूप को ही विंध्यवासिनी का स्वरूप मानकर उसमें करें। वे बताते हैं कि उनका स्वरूप विद्याओं में महाविद्या और यक्ष शक्तियों में महायक्षिणी स्वरूपा माना जाता है; अनेक भेद हैं, वे कहते हैं, जिन सबको उजागर नहीं किया जा सकता।
वक्ता कहते हैं कि चाहें तो अपने पूजन स्थान पर भगवती विंध्यवासिनी के त्रिकोण मंडल का स्थान बनाएँ। नहीं तो चाहें तो भगवती विंध्यवासिनी का फोटो रखकर, या भगवती दुर्गा के स्वरूप को ही भगवती विंध्यवासिनी का स्वरूप समझकर, मानकर, उसमें करें। वे जोड़ते हैं कि उनका स्वरूप विद्याओं में महाविद्या और यक्ष शक्तियों में महायक्षिणी स्वरूपा माना जाता है। अनेक भेद हैं, वे कहते हैं, और उन सभी विषयों को उजागर नहीं किया जा सकता।
विंध्यवासिनी: मूल शक्ति और हर बीज तथा महाशक्ति का बीज
कल्प भेद से उद्गम स्थान विंध्याचल
वक्ता कहते हैं कि बहुत कुछ उजागर नहीं किया जा सकता, पर इतना कहा जा सकता है: भगवती विंध्यवासिनी अपने आप में इस समस्त ब्रह्मांड की सबसे मूल शक्ति हैं — जगदम्बा सभी शक्तियों की बीज स्वरूपा हैं। चाहे माया बीज मंत्र हो, प्रणव बीज हो, या जितनी भी महाशक्तियाँ हैं, उन सबका बीज, उद्गम स्थान, कल्प भेद के अनुसार कहीं न कहीं विंध्याचल ही पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि उन सभी विषयों को उजागर नहीं किया जा सकता, फिर भी सबके समक्ष इतना कहा जा सकता है: भगवती विंध्यवासिनी अपने आप में इस समस्त ब्रह्मांड की सबसे मूल शक्ति हैं — यदि मूल शक्ति कहें तो वह वही हैं। अर्थात जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। सभी शक्तियों की बीज स्वरूपा हैं। चाहे माया बीज मंत्र हो या प्रणव बीज, या जितनी भी महाशक्तियाँ हैं — उन सबका बीज, उद्गम स्थान, उद्गम क्षेत्र, कल्प भेद के अनुसार कहीं न कहीं विंध्याचल भी पड़ता है।
विंध्यवासिनी चालीसा को जागृत करने की नवरात्र विधि: प्रतिदिन 41 पाठ, अंतिम दिन आहुति, फिर नित्य प्रयोग
कृपा या लंबे समय से रुकी कामना का संकल्प
वक्ता कहते हैं कि सर्वजन हिताय प्रकाशित विंध्यवासिनी चालीसा का पाठ अनंत काल से होता आया है। नवरात्रि के दिनों में संकल्प लेकर प्रतिदिन उसके 41 पाठ करें; अंतिम दिन पाँच बार आहुति करें, उसकी 40 चौपाइयों में से प्रत्येक चौपाई से एक-एक आहुति देते हुए। इस प्रकार जागृत करके चालीसा का नियमित प्रयोग किया जा सकता है। संकल्प भगवती विंध्यवासिनी की कृपा प्राप्ति का, या लंबे समय से रुकी किसी भी मनोकामना की पूर्ति का हो सकता है। चालीसा के माध्यम से ही, वे कहते हैं, भगवती को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाई जा सकती है; जीवन में नित्य उसका पाठ करें।
विंध्यवासिनी चालीसा पूर्ण चालीसा क्यों है
नवदुर्गा, दस महाविद्या और 51 शक्ति पीठ एक पाठ में
वक्ता कहते हैं कि विंध्यवासिनी चालीसा का पाठ करने पर दिखेगा कि उसमें नवदुर्गा, दस महाविद्या सहित 51 शक्ति पीठ के प्रत्येक नाम का संकलन है। इसी कारण यह पूर्ण चालीसा माना जाता है, और मात्र इसके पाठ से ही सभी शक्तियों की कृपा प्राप्त हो जाती है। वे इसे अत्यंत अद्भुत चालीसा कहते हैं और कहते हैं कि इस विधि-विधान से जागृत करके इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जब कोई चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। का पाठ करेगा तो देखेगा कि उसमें नवदुर्गा, दस महाविद्या सहित 51 शक्ति पीठ के प्रत्येक नाम का संकलन है — विभिन्न नामों का संकलन। इसी कारण, वे कहते हैं, विंध्यवासिनी चालीसा अपने आप में पूर्ण चालीसा माना जाता है। साथ ही सभी शक्तियों की कृपा मात्र और मात्र विंध्यवासिनी चालीसा के पाठ से ही प्राप्त हो जाती है। तो यह अपने आप में एक अत्यंत अद्भुत चालीसा है, वे कहते हैं, और इस विधि-विधान से जागृत करके इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
परिवार सहित विंध्य धाम की यात्रा: जीवन में एक बार, और सनातनी के लिए वर्ष में एक बार
आगे का मार्ग जगदंबा स्वयं दिखाती हैं
वक्ता कहते हैं कि चालीसा जागृत होने के बाद जब जगदम्बा स्वयं कृपालु होती हैं तो भक्त को आगे का मार्ग प्रदर्शित करती हैं। जीवन में सामर्थ्य हो तो कभी न कभी अपने परिवार सहित विंध्य धाम अवश्य जाना चाहिए; और यदि कोई सनातनी है और इच्छुक है तो कम से कम वर्ष में एक बार गंगा तट पर विंध्याचल धाम अवश्य जाए।
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात जब जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। स्वयं कृपालु होती हैं तो आगे का मार्ग प्रदर्शित करती हैं। जीवन में सामर्थ्य हो, वे कहते हैं, तो कभी न कभी अपने परिवार सहित विंध्य धाम अवश्य जाना चाहिए। और यदि कोई सनातनी है और इच्छुक है, तो कम से कम वर्ष में एक बार तो गंगा के तट पर विंध्याचल धाम अवश्य जाए।
विंध्याचल में विधि: दर्शन, त्रिकोण यात्रा, 100 चालीसा पाठ और अर्गला मंत्र से हवन
हर पाप का भक्षण, सुख और फिर मोक्ष
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल में भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन और त्रिकोण यात्रा के पश्चात एक दिन रुककर चालीसा के 100 पाठ करने चाहिए, और अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र से पुरोहितों के माध्यम से हवन कुंड में आहुति करानी चाहिए। इससे, वे कहते हैं, भगवती अनेक रोग, शोक और क्लेश, घर के सभी दोष और कई पाप दूर कर देती हैं: वे हर प्रकार के पाप का भक्षण करने और हर प्रकार का सुख देकर फिर मोक्ष देने में सर्वसमर्थ हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल में उनकी सेवा-पूजा-आराधना अवश्य करे — संभव हो तो आजीवन।
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल में भगवती विंध्यवासिनी का दर्शन करने के पश्चात और त्रिकोण यात्रादेवी के तीन पीठों के मध्य त्रिकोण पूर्ण करने वाली यात्रा। करने के पश्चात वहाँ एक दिन रुककर चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। के 100 पाठ करने चाहिए। अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र से, वे कहते हैं, वहाँ हवन कुंड में पुरोहितों के माध्यम से आहुति इत्यादि करानी चाहिए। इससे भगवती विंध्यवासिनी अनेक रोग, शोक और क्लेश दूर कर देती हैं; घर में जो अनेक प्रकार के दोष होते हैं, उन सभी को दूर कर देती हैं; कई सारे पाप दूर कर देती हैं। भगवती विंध्यवासिनी, वे कहते हैं, हर प्रकार के पाप का भक्षण करने में सर्वसमर्थ हैं, और हर प्रकार का सुख देने के पश्चात मोक्ष देने में सर्वसमर्थ हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में भगवती विंध्यवासिनी की सेवा, पूजा, आराधना अवश्य करनी चाहिए — और संभव हो तो आजीवन।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।