महायक्षिणी मां विंध्यवासिनी की कृपा सिद्धि और विंध्याचल धाम
विंध्याचल पूर्ण शक्ति पीठ क्यों है और भगवती विंध्यवासिनी की सेवा चालीसा के माध्यम से कैसे करें।
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गंगा तट पर स्थित पूर्ण शक्ति पीठ विंध्याचल
विंध्याचल को समस्त ब्रह्मांड का पूर्ण शक्ति पीठ क्यों कहा जाता है?
वक्ता कहते हैं कि समस्त ब्रह्मांड के सभी धामों और शक्ति पीठों में एकमात्र पूर्ण शक्ति पीठ गंगा तट पर स्थित भगवती विंध्यवासिनी का विंध्याचल धाम है, जहाँ जगदंबा आदिकाल से उपस्थित हैं।
वक्ता कहते हैं कि समस्त ब्रह्मांड में यदि कोई धाम, कोई शक्ति पीठ, कोई स्थान पूर्ण शक्ति पीठ कहा जा सकता है तो वह गंगा तट पर स्थित भगवती विंध्यवासिनी का विंध्याचल धाम है, जहाँ भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। आदिकाल से उपस्थित हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में एक बार विंध्याचल धाम अवश्य जाना चाहिए और भगवती विंध्यवासिनी की सेवा जीवन पर्यंत करनी चाहिए। वे आगे कहते हैं कि उच्च कोटि के जितने भी सिद्ध तांत्रिक होते हैं, जो तंत्र विद्याओं में महारत हासिल करते हैं — विशेष करके त्रिकालज्ञ शक्तियाँ, जिनमें भूत, भविष्य और वर्तमान की हर वस्तु की गति को देखने, जानने और पकड़ने का सामर्थ्य होता है — उनकी सिद्धि के पीछे भगवती विंध्यवासिनी की सेवा, पूजा, अर्चना और अनुष्ठान अवश्य रहा होता है। साधक जिस भी योनि में या जिस भी परिस्थिति में हो, समय आने पर उन्हीं की कृपा से त्रिकालदर्शिता प्राप्त होती है; वे कहते हैं कि यह सर्वविदित है, और ज्योतिष तथा तंत्र के क्षेत्र में जो इस प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें आजीवन भगवती विंध्यवासिनी के स्वरूप में जगदंबा की उपासना करनी चाहिए।
विंध्याचल में विंध्यवासिनी की उपस्थिति और अरुणासुर कथा
विंध्याचल एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ भगवती विंध्यवासिनी की उपस्थिति पुरुष के स्वरूप में मानी जाती है और वहाँ आने वाले प्रत्येक साधक तथा दर्शनार्थी की उपस्थिति योगिनी स्वरूप में मानी जाती है
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ भगवती विंध्यवासिनी की उपस्थिति पुरुष स्वरूप में मानी जाती है और वहाँ के प्रत्येक साधक तथा आने वाले लोगों की उपस्थिति योगिनी स्वरूप में मानी गई है; वे अरुणासुर की कथा सुनाते हैं जिसमें त्रिदेव देखते हैं कि भगवती के जागने से पहले ही नवदुर्गा और दस महाविद्या वहाँ की सारी व्यवस्थाओं में लगी हुई हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह जानकर आश्चर्य होगा कि विंध्याचल एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ यह माना जाता है कि भगवती विंध्यवासिनी वहाँ पुरुष के स्वरूप में हैं, और वहाँ के प्रत्येक साधक तथा उस क्षेत्र में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की उपस्थिति योगिनी स्वरूप में मानी गई है। वे बताते हैं कि पुराणों के अनुसार जब अरुणासुर दैत्य के कारण लोग पूरी तरह त्रस्त हो गए और त्रिदेव भगवती विंध्यवासिनी के क्षेत्र में गए, तो उन्होंने देखा कि भगवती के जागने से पहले ही नवदुर्गा और दस महाविद्या वहाँ की सारी व्यवस्थाओं में लगी हुई हैं। वे कहते हैं कि विभिन्न प्रकार के भैरव और भैरवी भी उस क्षेत्र में उपस्थित हैं, और विंध्याचल क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले सभी देवगण अपना पुरुष स्वरूप त्याग कर स्त्री स्वरूप धारण करके ही प्रवेश करते हैं — गणपति वैनायकी स्वरूप में, महेश्वर माहेश्वरी स्वरूप में और विष्णु वैष्णवी स्वरूप में जाते हैं, और फिर जगदंबा से अपनी कथा-व्यथा का वर्णन करते हैं।
विंध्य के प्रथम ऋषि और कुल-पुरोहित अगस्त्य
विंध्य क्षेत्र के प्रथम ऋषि किन्हें माना जाता है?
वक्ता कहते हैं कि महर्षि अगस्त्य विंध्य क्षेत्र के प्रथम ऋषि और उस कुल के कुल-पुरोहित माने जाते हैं, क्योंकि भगवान सदाशिव के पश्चात अपनी सेवा-पूजा का उपदेश जगदंबा ने सर्वप्रथम उन्हीं को दिया था।
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी की महिमा अनंत है और आदि-अनादि काल से है, तथा महर्षि अगस्त्य ऋषि उस क्षेत्र के सर्वप्रथम ऋषि कहे जाते हैं। वे कहते हैं कि भगवान सदाशिव के पश्चात अपनी पूजा-सेवा का उपदेश और आदेश स्वयं जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने सर्वप्रथम जिन्हें दिया, वे महर्षि अगस्त्य ऋषि थे, और अगस्त्य मुनि विंध्य कुल के कुल-ऋषि तथा कुल-पुरोहित के स्वरूप में माने जाते हैं।
अनेक देवी स्वरूपों के आकर्षण में विंध्यवासिनी की सेवा
यदि देवी के अनेक स्वरूपों की ओर आकर्षण हो तो किस स्वरूप की सेवा करनी चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें देवी के अनेक स्वरूपों — शैलपुत्री, कालरात्रि, किसी महाविद्या या अन्य — की ओर आकर्षण होता है, उन्हें भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि उनके स्वरूप में इस समस्त सृष्टि का प्रत्येक कण और प्रत्येक देवी शक्ति समाहित है।
जो भक्त देवी के विभिन्न स्वरूपों के बीच दुविधा में रहते हैं — कभी शैलपुत्री की ओर, कभी कालरात्रि की ओर, कभी कालिका, त्रिपुर सुंदरी या बगलामुखी जैसी किसी महाविद्या की ओर आकर्षण बढ़ता है — उन्हें संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि इसका समाधान भगवती विंध्यवासिनी की सेवा है, क्योंकि उनके स्वरूप में इस समस्त सृष्टि का प्रत्येक कण समाहित है और जितनी भी देवी शक्तियाँ हैं, सभी उनमें समाहित हैं।
कृष्ण अवतार से जुड़े विंध्यवासिनी के तीन स्वरूप
कृष्ण अवतार के संबंध में विंध्यवासिनी ने कौन से तीन स्वरूप धारण किए?
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी भगवान कृष्ण के अवतार से जुड़े तीन रूपों में प्रकट हुईं — कंस के हाथ से छूटने वाले योगमाया स्वरूप में, जिन्हें विंध्य क्षेत्र में अष्टभुजा कहा जाता है; जगन्नाथ पुरी में सुभद्रा के रूप में, जहाँ शक्ति के रूप में भगवती विमला भी स्थापित हैं; और योगमाया स्वरूप में उस क्षेत्र में जो आज दिल्ली है।
वक्ता कहते हैं कि यह जानकर आश्चर्य होगा कि भगवती विंध्यवासिनी ही भगवान नारायण के कृष्ण अवतार से जुड़े तीन रूपों में प्रकट हुई थीं। पहला स्वरूप वही है जिसे सब जानते हैं — जो कंस के हाथ से छूट कर योगमाया स्वरूप में उपस्थित हुईं; विंध्य क्षेत्र में उन्हें अष्टभुजा के नाम से जाना जाता है। दूसरा स्वरूप जगन्नाथ पुरी में सुभद्रा के रूप में विद्यमान है, जहाँ उसी जगन्नाथ मंदिर में शक्ति के रूप में भगवती विमला भी स्थापित हैं। तीसरा स्वरूप योगमाया के रूप में उन्होंने उस क्षेत्र में धारण किया जो आज दिल्ली है। वे कहते हैं कि ऐसे अनेक भेद और अनेक रहस्य हैं जिनका पूर्ण अनावरण नहीं किया जा सकता, किंतु यह विंध्य क्षेत्र अत्यंत विस्तृत क्षेत्र है और विंध्य तंत्र अपने आप में अनेक विचित्र रहस्यों को समेटे हुए एक तंत्र है।
सामान्य भक्तों के लिए सुलभ मार्ग: विंध्यवासिनी चालीसा
सामान्य भक्त के लिए विंध्यवासिनी की सेवा का सबसे सुलभ मार्ग क्या है?
वक्ता कहते हैं कि जो सामान्य और सरल भक्त संस्कृत का पाठ नहीं कर सकते या मंत्र जप के अनिवार्य नियमों में नहीं बंध सकते, उनके लिए सबसे सुलभ मार्ग विंध्यवासिनी चालीसा है, जिसे नवरात्र के नौ दिनों में विधि-विधान से पाठ करके जागृत किया जाता है, और जिसके लिए त्रिकोण मंडल या देवी का फोटो स्थापित किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि जो सामान्य और सरल लोग भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए सबसे सुलभ मार्ग उनके चालीसा के माध्यम से जगदंबा को प्रसन्न करने का प्रयास है, क्योंकि संस्कृत का पाठ सभी के लिए सक्षम नहीं है और मंत्र जप इत्यादि की जो अनिवार्यताएँ और नियम-कानून हैं, उनमें सब बंध नहीं सकते; चालीसा इसके विपरीत सर्वसुलभ होता है। वे कहते हैं कि नवरात्रि के दिनों में नौ दिन तक विंध्यवासिनी चालीसा का विधि-विधान से पाठ करके उसे जागृत करना चाहिए, तत्पश्चात ही उसका प्रयोग करना चाहिए। स्थापना के विषय में वे कहते हैं कि अपने पूजन स्थान पर भगवती विंध्यवासिनी का त्रिकोण मंडल बनाया जा सकता है, और यदि यह संभव न हो तो भगवती विंध्यवासिनी का फोटो रखकर, या भगवती दुर्गा के स्वरूप को ही उनका स्वरूप मानकर पूजा की जा सकती है। वे बताते हैं कि उनका स्वरूप विद्याओं में महाविद्या और यक्षिणियों में महायक्षिणी स्वरूपा माना जाता है — यक्षिणियों में महायक्षिणी।
सभी शक्तियों की बीज स्वरूपा मूल शक्ति
विंध्यवासिनी को समस्त ब्रह्मांड की मूल शक्ति और सभी दिव्य शक्तियों का बीज स्वरूपा बताया गया है
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि अनेक रहस्यों को पूर्ण रूप से उजागर नहीं किया जा सकता, फिर भी इतना कहा जा सकता है कि भगवती विंध्यवासिनी अपने आप में समस्त ब्रह्मांड की मूल शक्ति हैं और सभी दिव्य शक्तियों की बीज स्वरूपा हैं — चाहे वह माया बीज हो, प्रणव बीज हो, या किसी भी महाशक्ति का बीज।
वक्ता कहते हैं कि इस विषय के अनेक भेद और रहस्य उजागर नहीं किए जा सकते, फिर भी सबके समक्ष इतना कहा जा सकता है कि भगवती विंध्यवासिनी अपने आप में इस समस्त ब्रह्मांड की सबसे मूल शक्ति हैं — यदि ऐसा कहा जाए तो वही मूल शक्ति हैं। अर्थात जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। सभी शक्तियों की बीज स्वरूपा हैं। चाहे वह माया बीज हो, प्रणव बीज हो, या जितनी भी महाशक्तियाँ हैं उन सभी का बीज हो — उनका उद्गम स्थान और उद्गम क्षेत्र कहीं न कहीं, कल्प भेद के अनुसार, विंध्याचल ही पड़ता है।
विंध्यवासिनी चालीसा की नवरात्र पाठ विधि
विंध्यवासिनी चालीसा की नवरात्र पाठ विधि क्या है?
वक्ता कहते हैं कि सर्वजन हिताय प्रकाशित यह विंध्यवासिनी चालीसा किसी भी समय पढ़ा जा सकता है, किंतु नवरात्र के दिनों में प्रत्येक दिन संकल्प लेकर उसका 41 पाठ करना चाहिए, और अंतिम दिन पाँच बार आहुति करते हुए उसकी लगभग चालीस चौपाइयों में से प्रत्येक चौपाई से एक-एक आहुति देनी चाहिए।
विंध्यवासिनी चालीसा के पूर्ण चालीसा माने जाने का कारण
विंध्यवासिनी चालीसा को पूर्ण चालीसा क्यों माना जाता है?
वक्ता कहते हैं कि इस चालीसा के माध्यम से भगवती विंध्यवासिनी की कृपा प्राप्ति हेतु या किसी लंबे समय से रुकी हुई मनोकामना की पूर्णता हेतु संकल्प लिया जा सकता है, और चालीसा को इसलिए पूर्ण माना जाता है क्योंकि उसमें नवदुर्गा, दस महाविद्याओं सहित 51 शक्ति पीठों के नामों का संकलन है, जिससे इन सभी शक्तियों की कृपा मात्र इसी चालीसा के पाठ से प्राप्त हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इस चालीसा के माध्यम से या तो भगवती विंध्यवासिनी की कृपा प्राप्ति हेतु, या किसी ऐसी मनोकामना की पूर्णता हेतु जो काफी लंबे समय से रुकी हुई है, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लिया जा सकता है। वे कहते हैं कि उनकी महिमा अनंत है और चालीसा के माध्यम से ही भगवती को काफी प्रसन्न करके उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है, इसलिए जीवन में नित्य इसका पाठ करना चाहिए। वे कहते हैं कि जब कोई ध्यान से चालीसा का पाठ करेगा तो उसमें पाएगा कि उसमें नवदुर्गा, दस महाविद्या सहित इक्यावन शक्ति पीठ के प्रत्येक नामों का संकलन है — विभिन्न नामों का संकलन। वे कहते हैं कि इसी कारण से विंध्यवासिनी चालीसा अपने आप में पूर्ण चालीसा माना जाता है, और सभी शक्तियों की कृपा भक्त को मात्र और मात्र विंध्यवासिनी चालीसा के पाठ से ही प्राप्त हो जाती है। वे इसे अपने आप में एक अत्यंत अद्भुत चालीसा कहते हैं और कहते हैं कि इसे पहले जागृत करके इस पूरे विधि-विधान के साथ अवश्य पढ़ना चाहिए।
जीवन में कम से कम एक बार विंध्य धाम की यात्रा
जब जगदंबा स्वयं कृपालु होती हैं तब वे आगे का मार्ग प्रदर्शित करती हैं, और जीवन में एक बार परिवार सहित विंध्य धाम जाने की सलाह दी गई है
वक्ता कहते हैं कि जब जगदंबा स्वयं कृपालु होती हैं तो वे साधक को आगे का मार्ग प्रदर्शित करती हैं, और यदि सामर्थ्य हो तो जीवन में कम से कम एक बार परिवार सहित गंगा तट पर विंध्य धाम अवश्य जाना चाहिए, और यदि इच्छुक हों तो वर्ष में एक बार।
वक्ता कहते हैं कि साधना के इस चरण के पश्चात, जब जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। स्वयं कृपालु होती हैं, तो वे भक्त को आगे का मार्ग प्रदर्शित करती हैं। वे कहते हैं कि जीवन में यदि सामर्थ्य हो तो कभी न कभी अपने परिवार सहित विंध्य धाम अवश्य जाना चाहिए, और जो इस प्रकार की यात्रा के इच्छुक हैं उन्हें कम से कम वर्ष में एक बार गंगा के तट पर विंध्याचल धाम जाना चाहिए।
विंध्याचल में उपस्थित होकर की जाने वाली पूजा विधि और उसका फल
विंध्याचल पहुँचने पर पूजा की विधि क्या है?
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन और त्रिकोण यात्रा के पश्चात वहाँ एक दिन रुककर चालीसा का सौ पाठ करना चाहिए, और पुरोहितों के माध्यम से अरगला के प्रथम मंत्र से हवन कुंड में आहुति देनी चाहिए — जिससे, वे कहते हैं, रोग, शोक, क्लेश, घर के दोष और पाप दूर होते हैं, क्योंकि भगवती हर प्रकार के पाप का भक्षण करने में और हर सुख देने के पश्चात मोक्ष देने में सर्वसमर्थ हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी का दर्शन करने और वहाँ त्रिकोण यात्रा पूर्ण करने के पश्चात एक दिन वहीं रुककर चालीसा का 100 पाठ (सौ परिवार) करना चाहिए। वे कहते हैं कि अरगला के प्रथम मंत्र से पुरोहितों के माध्यम से वहाँ हवन कुंड में आहुति इत्यादि देनी चाहिए, जिससे भगवती विंध्यवासिनी भक्त के अनेक रोग, शोक और क्लेशों को दूर कर देती हैं।\n\nवे कहते हैं कि वे घर में उपस्थित अनेक प्रकार के दोष को दूर कर देती हैं और भक्त के कई सारे पापों को दूर कर देती हैं; भगवती विंध्यवासिनी हर प्रकार के पापों का भक्षण करने में सर्वसमर्थ हैं और हर प्रकार का सुख देने के पश्चात मोक्ष देने में सर्वसमर्थ हैं। वे कहते हैं कि इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में भगवती विंध्यवासिनी की सेवा, पूजा और आराधना अवश्य करनी चाहिए, और संभव हो तो आजीवन करनी चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।