महाशिवरात्रि के चार प्रहर और अग्नि स्तंभ की कथा
महाशिवरात्रि के महत्व और पूजा के सही समय पर नोट्स।
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महाशिवरात्रि पर रात्रि के चारों पहर का पूजन
हर पहर के सही समय पर पूजन से सदाशिव की कृपा
वक्ता कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन रात्रि काल में चार पहर पूजन करने का विधान है, और उन चार पहरों में सही समय पर सदाशिव का पूजन करने से शिव की अनन्य कृपा और विशेष आशीर्वाद मिलता है। विधान यह है कि उस दिन व्रत, उपवास किया जाए और चारों पहर में यथाशक्ति पंचोपचार या दशोपचार पूजन, आरती, और शिव के नाम या मंत्र का जप अथवा स्तुति आदि का पाठ किया जाए। चारों पहर, महानिशीथ काल और पारण का समय वीडियो में स्क्रीन पर दिखाया गया है, बोला नहीं गया।
महाशिवरात्रि से पहले वक्ता यह बताते हैं कि इस दिन की महत्ता क्या है, विशेष विधि-विधान से पूजन कैसे करें कि पूजन का विशेष फल मिले, और पूजन का समय कौन-सा है। वे कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन रात्रि काल में चार पहर पूजन करने का विधान है, और उन चार पहरों में सही समय पर सदाशिव का पूजन किया जाए तो साधक पर शिव की अनन्य कृपा बरसती है और उनका विशेष आशीर्वाद मिलता है। वे कहते हैं कि चारों पहर के पूजन का समय, महानिशीथ काल के पूजन का समय और व्रत के पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। का समय वीडियो में स्क्रीन पर लिखा गया है; बातचीत में वह पढ़ा नहीं गया। अंत में वे विधान बताते हैं: उसी समय के अनुसार उस दिन व्रतउपवास और संयम के साथ निभाया जाने वाला संकल्प, जो अनुष्ठान की अवधि तक चलता है। और उपवास कीजिए, चारों पहर में यथाशक्ति पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। या दशोपचार पूजन, आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है।, और शिव के नाम या मंत्र का जप अथवा स्तुति आदि का पाठ कीजिए, और शिव की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कीजिए।
भ्रांति: शिव पहली बार अग्नि स्तंभ के रूप में महाशिवरात्रि को प्रकट हुए
वह मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, आर्द्रा नक्षत्र था
शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता का हवाला देकर वक्ता कहते हैं कि जब ब्रह्मा और विष्णु में यह होड़ लगी कि कौन श्रेष्ठ है, तब सदाशिव दोनों के मध्य पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में, agni-stambha के रूप में प्रकट हुए। उस समय तिथि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष तृतीया और नक्षत्र आर्द्रा नक्षत्र था। वे कहते हैं कि बहुत लोग, और जगह-जगह लिखी सामग्री, गलती से यह बताती है कि शिव पहली बार अग्नि स्तंभ के रूप में महाशिवरात्रि को प्रकट हुए; ऐसा नहीं है, शिव मार्गशीर्ष मास में प्रकट हुए थे।
वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में वर्णन है कि ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ लग गई, "मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ"। तब सदाशिव दोनों के मध्य पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में, agni-stambha के रूप में प्रकट हुए। जब सदाशिव अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, वे कहते हैं, उस समय तिथि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष तृतीया और नक्षत्र आर्द्रा नक्षत्र था। वे कहते हैं कि बहुत सारे लोग यहाँ थोड़ी गलती कर देते हैं, और जगह-जगह लिखी सामग्री में भी मिल जाएगा कि इस दिन, महाशिवरात्रि को, शिव पहली बार अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। वे कहते हैं नहीं, ऐसा नहीं है: शिव मार्गशीर्ष मास में प्रकट हुए थे। महाशिवरात्रि वास्तव में किस बात का दिन है, यह वे आगे बताते हैं।
काल भैरव की उत्पत्ति और ब्रह्मा को श्राप: अग्नि स्तंभ की कथा
ब्रह्मा की झूठी गवाही, पाँचवाँ मस्तक, ब्रह्महत्या दोष
वक्ता शिव पुराण की कथा सुनाते हैं। agni-stambha का ओर-छोर खोजने ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर और विष्णु शूकर बनकर नीचे गए, तय हुआ कि जो छोर पाकर पहले लौटे वही श्रेष्ठ। अनेक कल्प बीतने पर भी ब्रह्मा को छोर नहीं मिला, पर ऊपर से गिरता केतकी का फूल दिखा जिससे उन्होंने वरदानों के बदले झूठी गवाही का वचन लिया; विष्णु खाली हाथ लौटे और सच बोले। उस झूठ के बल पर जब विष्णु ने ब्रह्मा का सोलह उपचारों से पूजन किया, तब शिव क्रोधित होकर स्तंभ से प्रकट हुए और उनकी भृकुटियों के मध्य से एक विकराल पुरुष, काल भैरव, प्रकट हुए, जिन्होंने झूठ बोलने वाले ब्रह्मा का पाँचवाँ मस्तक नाखूनों से काट डाला। ब्रह्म कपाल लेने से भैरव को ब्रह्महत्या का दोष लगा। ब्रह्मा और विष्णु ने क्षमा माँगी; शिव शांत हुए, पर ब्रह्मा को श्राप दिया कि मृत्यु लोक में उनका पूजन नहीं होगा, और साथ ही वरदान दिया कि यज्ञ आदि कर्म में और विश्वकर्मा के स्वरूप में उनका पूजन हर जगह होगा।
विद्येश्वर संहिता की कथा आगे बढ़ाते हुए वक्ता कहते हैं कि agni-stambha के प्रकट होने के बाद ब्रह्मा और विष्णु उसका ओर-छोर पता लगाने गए। ब्रह्मा ने हंस का रूप लिया और ऊपर गए; विष्णु ने शूकर का रूप लिया और नीचे गए। दोनों में यह निश्चय हुआ था कि जो ओर-छोर पता लगाकर पहले लौटेगा वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्मा ऊपर खोजते रहे। बहुत कल्प बीत गए, करोड़ों वर्ष; वे कहते हैं कि एक कल्प में मनुष्य के हिसाब से लगभग चार अरब वर्ष होते हैं, और उससे भी कहीं अधिक बीत चुका था। तब ब्रह्मा को ऊपर से गिरता एक फूल दिखा, केतकी का, केवड़े का फूल। उन्होंने उससे कहा कि तुम झूठी गवाही दे देना, बोल देना कि हमने इस अग्नि स्तंभ का सबसे ऊपर का छोर पा लिया है, देख लिया है; इससे हम श्रेष्ठ हो जाएँगे और हम तुम्हें अनेक वरदान देंगे। यह कहकर वे फूल को साथ लेकर लौट आए। विष्णु निराश होकर लौटे, क्योंकि उन्हें स्तंभ का अंत नहीं मिला, पर उस स्थिति में भी उन्होंने सत्यवादिता नहीं छोड़ी और सच बोला। ब्रह्मा ने झूठ बोलकर अपने को श्रेष्ठ बना लिया, और विष्णु ने सोलह उपचारों से उनका पूजन किया, क्योंकि ब्रह्मा ने ऐसा कहा था और केतकी के फूल ने भी झूठी गवाही दी कि हाँ, इन्होंने देख लिया है। जब यह कृत्य हो गया, वे कहते हैं, तब शिव क्रोधित होकर उसी अग्नि स्तंभ में से उनके सामने प्रकट हुए। उनके ललाट से, दोनों भृकुटियों के मध्य से, एक विकराल पुरुष प्रकट हुए: काल भैरव। उन्होंने असत्य बोलने वाले ब्रह्मा का पाँचवाँ मस्तक अपने नाखूनों से काट डाला। और ब्रह्म कपाल लेने से भैरव को ब्रह्महत्या का दोष लगा। फिर ब्रह्मा ने क्षमा याचना की, और विष्णु ने भी उनकी ओर से क्षमा माँगी। शिव शांत हुए, पर ब्रह्मा को श्राप दिया कि मृत्यु लोक में तुम्हारा पूजन नहीं होगा, और वहीं वरदान भी दिया कि यज्ञ आदि कर्म में और विश्वकर्मा के स्वरूप में तुम्हारा पूजन हर जगह होगा।
महाशिवरात्रि किसका दिन है: पंचानन, पंचाक्षरी और गायत्री
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी-युक्त चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन शिव ने ब्रह्मा को वरदान दिया, उस दिन और भी बहुत वरदान मिले: महादेव के पंचानन स्वरूप की उत्पत्ति हुई, पंचाक्षरी मंत्र का उपदेश और दीक्षा हुई, प्रणव गायत्री का उपदेश हुआ, और त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई। यह सब, वे कहते हैं, फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी से युक्त चतुर्दशी तिथि को हुआ, और इसी को महाशिवरात्रि कहा गया है। उसी दिन शिव सब पर विशेष रूप से कृपा करते हैं। यानी महाशिवरात्रि इन घटनाओं का दिन है, न कि अग्नि स्तंभ के रूप में शिव के पहले प्राकट्य का।
शिव ने ब्रह्मा को श्राप और फिर वरदान कैसे दिया, यह बताकर वक्ता कहते हैं कि उस वरदान के साथ उस दिन और भी बहुत सारे वरदान मिले। महादेव के पंचानन स्वरूप की उत्पत्ति हुई; पंचाक्षरी मंत्र का उपदेश और दीक्षा हुई; प्रणव गायत्री का उपदेश और दीक्षा हुई; और उसी दिन त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई। यह सारा कुछ, वे कहते हैं, फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी से युक्त चतुर्दशी तिथि को हुआ, और इसी को महाशिवरात्रि कहा गया है। उसी दिन शिव सब पर विशेष रूप से कृपा करते हैं। उनकी पहले की गई शुद्धि का यही आशय है: महाशिवरात्रि इन घटनाओं का दिन है, न कि, जैसा प्रायः लिखा मिलता है, अग्नि स्तंभ के रूप में शिव के पहले प्राकट्य का, जो मार्गशीर्ष में हुआ था।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।