महाभैरव स्तोत्र साधना और सिद्धि: मारण तंत्र काट
महाभैरव स्तोत्र साधना व सिद्धि विधि पर नोट्स।
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महाभैरव अनुष्ठान: यह किसलिए है और इसे सार्वजनिक क्यों किया जा रहा है
उनके लिए एक तीव्र उपाय जिन्हें धनहीन कर दिया गया
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव अनुष्ठान विशेष रूप से मारण प्रयोग के नाश के लिए, अपने परिवार और घर की किसी भी बड़े अभिचार प्रयोग से पूर्ण रक्षा के लिए, और इसलिए कि भविष्य में कोई आप पर तंत्र प्रयोग न कर सके — अति महत्वपूर्ण है। वे इसे अत्यंत तीव्रतम अनुष्ठानों में से एक बताते हैं, इसलिए इसके नियम — कौन कर सकता है, कौन नहीं, क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं — पहले सुनकर समझ लेने हैं, और सामर्थ्य हो तो किसी जानकार से करवाना अति उत्तम है। वे इसे इसलिए बता रहे हैं क्योंकि शत्रु अक्सर ऐसा प्रयोग कर देते हैं कि व्यक्ति धनहीन होकर किसी से करवा नहीं पाता, और मारण में ऐसी क्षुद्र विद्या लगती है जो सामान्य पूजा-पाठ से नहीं कटती।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव अनुष्ठान विशेष रूप से मारण प्रयोग के नाश के लिए अति महत्वपूर्ण है; अपने परिवार, अपने घर की हर तरह से पूर्ण रक्षा के लिए; किसी भी बड़े से बड़े अभिचार प्रयोग से रक्षा के लिए; और इसलिए कि भविष्य में कोई आप पर तंत्र प्रयोग न कर सके। इस अनुष्ठान के क्या नियम हैं, कौन इसे कर सकता है, कौन नहीं, इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं — यह सब, वे कहते हैं, अच्छी तरह सुनकर, जानकर तब करना चाहिए, क्योंकि यह अत्यंत तीव्रतम अनुष्ठानों में से एक है। किसी जानकार से करवाएँ तो अति उत्तम; समर्थ हों तो किसी जानकार से ही करवाएँ। लेकिन, वे कहते हैं, शत्रु कभी-कभी ऐसा प्रयोग कर देते हैं कि सामने वाला व्यक्ति धन से पूरी तरह हीन हो जाता है, और धनहीन होने के कारण किसी और के माध्यम से करवा नहीं पाता। और चूँकि मारण तंत्र है, उस प्रकार की क्षुद्र विद्या का प्रयोग होता है, इसलिए सामान्य पूजा-पाठ से उसे निजात नहीं मिलती। इसी बात को ध्यान में रखकर वे यह वीडियो बना रहे हैं ताकि लोग स्वयं भी कर सकें — लेकिन यह जानकर कि किन नियमों का पालन करना है और क्या ज़रूरी है।
महाभैरव अनुष्ठान उठाने से पहले की शर्तें: पुष्ट अभिचार, और केवल अंतिम उपाय के रूप में
तंत्र समझ ली गई मेडिकल बीमारी के लिए नहीं
वक्ता कहते हैं कि पहला नियम यह है कि किसी अच्छे जानकार के माध्यम से और स्वयं भी 100% पुष्ट हों कि आप पर अभिचार प्रयोग है और छुटकारा नहीं मिल रहा — मेडिकल समस्या हो और मन में तंत्र-तंत्र घूम रहा हो, ऐसी अवस्था नहीं होनी चाहिए, उससे दिक्कत ही होगी। लक्षण वे ये बताते हैं: लंबी बीमारी, शरीर के किसी भाग में बहुत अधिक परेशानी, और मेडिकल रिपोर्ट जो शुरू में नॉर्मल थी बाद में बिगड़ने लगी, साथ में तंत्र के दिखते लक्षण। दूसरा, इससे पहले अन्य सामान्य प्रयोग करके देख चुके हों; इसे सीधे कभी नहीं करना, कोई जानकार आपकी अवस्था देखकर कहे तब, और अंतिम रास्ते के रूप में, क्योंकि यह बहुत तीव्र है और इसमें ऐसी चीज़ें हैं जो सामान्यतः नहीं की जातीं।
सबसे पहली बात, वक्ता कहते हैं, यह कि आप 100% कन्फ़र्म हों कि आप पर अभी अभिचार तंत्र का प्रयोग है। मेडिकली समस्या नहीं होनी चाहिए। मेडिकल समस्या है और आप तंत्र की दुविधा में फँसे हैं, मस्तिष्क में घूम रहा है कि तंत्र प्रयोग है कि नहीं — तो दिक्कत हो जाएगी; ऐसी अवस्था नहीं होनी चाहिए। अच्छे जानकार व्यक्ति के माध्यम से आपको पता चल गया हो और आपको भी पूरा 100% पक्का हो कि तंत्र प्रयोग है और छुटकारा नहीं मिल रहा। लंबी बीमारी चल रही है, शरीर के किसी भाग में बहुत अधिक परेशानी है, मेडिकल रिपोर्ट शुरू में बहुत बार नॉर्मल आई और बाद में उसमें परेशानी आने लगी — तंत्र का लक्षण दिखाई दे रहा हो तो इसका प्रयोग करें। इस प्रयोग को करने से पहले, वे कहते हैं, आप अन्य सामान्य प्रयोग करके देख चुके हों। सीधे इसे नहीं करना है। या तो कोई जानकार व्यक्ति आपकी अवस्था देखकर कह रहा हो तो करें; नहीं तो पहले कहीं दिखाएँ-सुनाएँ, देख लें। यह आपके लिए अंतिम रास्ता है, क्योंकि यह बहुत तीव्र है और साथ में इसमें कुछ ऐसी चीज़ें हैं, ऐसे प्रयोग किए गए हैं जो सामान्यतः नहीं करने चाहिए। इसलिए जब कोई रास्ता न दिख रहा हो तभी इसे करने की सोचें।
सावधानी: परिवार में कभी पूजित श्मशानिक शक्ति को महाभैरव प्रयोग से कष्ट पहुँच सकता है
उसे फिर से मनाने में जानकार की ज़रूरत पड़ेगी
वक्ता तीसरा नियम बताते हैं: यदि आपकी जानकारी में आपके घर में कभी पितर-पूर्वजों या पहले के किसी व्यक्ति द्वारा कोई श्मशानिक (मसान) शक्ति पूजित हो गई है, और उसके ऊपर से आप अभिचार से पीड़ित हैं, तो इस प्रयोग के बाद उस शक्ति को भी कष्ट पहुँच सकता है। बाद में उसे फिर से मनाना पड़ेगा, और उसके लिए एक जानकार व्यक्ति की आवश्यकता पड़ेगी।
तीसरी बात, वक्ता कहते हैं: यदि आपके घर में कभी भी आपके पितर-पूर्वजों द्वारा, पहले के समय के किसी व्यक्ति द्वारा, किसी भी प्रकार की कोई श्मशानिक (मसान) शक्ति पूजित हो गई है — उन्होंने उसे पूज लिया है और आपकी जानकारी में है कि वह पूजित है — और उसके ऊपर से आप अभिचार से पीड़ित हैं, तो ध्यान रखें कि इस प्रयोग को करने के बाद उन्हें भी कष्ट पहुँच सकता है। बाद में, वे कहते हैं, उन्हें फिर से मनाना पड़ेगा, और वहाँ एक जानकार व्यक्ति की आवश्यकता पड़ेगी। वे कहते हैं कि ये सभी बातें वे स्पष्ट रूप से बता रहे हैं।
महाभैरव स्तोत्र प्रयोग से पहले सिद्ध किया जाता है, शिव, काली या दुर्गा मंदिर में
घर में नहीं, जब तक कोई मंदिर ही न हो
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग जब भी करें, सर्वप्रथम इसे सिद्ध करना होता है और सिद्धि के बाद ही प्रयोग करना चाहिए; परिस्थिति विकट हो तो बिना सिद्ध किए भी प्रयोग हो सकता है, पर किसी से मार्गदर्शन लेकर। चूँकि साधक पहले से अभिचार से पीड़ित है, सिद्धि का विधान शिव जी के मंदिर में हो तो अति उत्तम, या भगवती काली या दुर्गा जी के मंदिर में भी उत्तम। घर में सिद्ध न करें; वहीं करें जब मंदिर या व्यवस्था बिल्कुल न बन पा रही हो।
यह प्रयोग जब भी करेंगे, वक्ता कहते हैं, सर्वप्रथम इसे सिद्ध करना होता है। सिद्ध करने के बाद ही प्रयोग करना चाहिए। परिस्थिति विकट हो सकती है, वैसी अवस्था में प्रयोग कर सकते हैं — लेकिन किसी से मार्गदर्शन लेकर। जब सिद्ध करें, वे कहते हैं, चूँकि आप पहले से अभिचार से पीड़ित रहेंगे, प्रयास करें कि सिद्धि का विधान शिव जी के मंदिर में हो तो अति उत्तम, या भगवती काली या दुर्गा जी के मंदिर में करें तो भी उत्तम। लेकिन घर में इसे सिद्ध न करने का प्रयास करें। यदि कोई उपाय न बचे — मंदिर न हो, ऐसी जगह हों जहाँ व्यवस्था न बैठ पा रही हो — तभी घर में करें। नहीं तो सिद्धि विधान सबसे पहले मंदिर में ही करेंगे।
महाभैरव अनुष्ठान के दौरान के नित्य नियम: शिव अभिषेक, घी का दीपक, जगदंबा को लाल पुष्प, कुत्तों को भोजन
ताकि तीक्ष्ण साबर मंत्र का कोई तिर्यक प्रभाव न पड़े
वक्ता अनुष्ठान उठाने के दिन से पूर्ण होने तक चार नित्य नियम बताते हैं। शिव जी का अभिषेक दिन में दो बार, कम से कम जल और मिश्री मिले दूध से (केवड़ा या गुलाब जल से सुगंधित कर सकते हैं) — एक पूजा शुरू करने से पहले और एक, अति ज़रूरी, पाठ के बाद, फिर शुद्ध जल से स्नान और क्षमा-याचना, साथ में बिल्व और शमी पत्र; हर बार आधा लोटा पर्याप्त है। पूजा से पहले शिव जी के पास घी का दीपक। पूजा के बाद भगवती के 108 नाम और पार्वती जी (या स्वयं शिव जी, जो उनका स्वरूप हैं) को एक लाल पुष्प, यह कहते हुए कि जगदम्बा इस पूजा को स्वीकार करें और विधान में लगे किसी दोष से मुक्त करें, पुष्प अर्घे पर रख दें। और रोज़ कुत्तों को भोजन — बिस्किट, रोटी या दूध-रोटी — स्वयं खाने से पहले। यह सब, वे कहते हैं, इसलिए कि यह अति तीव्र सबर मंत्र कोई तिर्यक् प्रभाव न डाले और देवता की पूर्ण कृपा मिले। सुबह अति उत्तम; शाम को तभी जब मंदिर में तब दूध चढ़ाने दें।
जिस दिन से यह अनुष्ठान उठाएँ तब से पूर्ण होने तक, वक्ता कहते हैं, प्रतिदिन यथाशक्ति शिव जी का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करना है। दूध से कर सकें तो कम से कम दूध से रोज़ करें — दूध में थोड़ी मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है। मिलाकर, दो बार। पहला अभिषेक पूजा शुरू करने से पहले; दूसरा पूजा-अनुष्ठान पूरा होने के बाद — वह अति ज़रूरी है, और उसमें मिश्री ज़रूर हो, मीठा दूध। दूध, जल और मिश्री तीनों मिलाकर, और शिव जी पर बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। और शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। पत्र ज़रूर चढ़ाएँ। आगे वे व्यावहारिक बात जोड़ते हैं: पूरा एक किलो दूध ले जाने की ज़रूरत नहीं; एक लोटा दूध में जल मिला सकते हैं, चाहें तो केवड़ा या गुलाब जल से सुगंधित भी कर लें। पहले आधा लोटा चढ़ा दें — या एक बड़ा और एक छोटा लोटा रखें, पाठ से पहले प्रार्थना और मंत्र के साथ एक छोटा लोटा शिव जी पर अभिषेक करें — और पूरा स्तोत्र पाठ हो जाने पर पुनः एक लोटा दूध चढ़ाएँ, बाकी सबको स्नान कराएँ, शुद्ध जल से स्नान कराकर क्षमा-याचना करते हुए बाहर निकलें; प्रसाद लोगों को बाँटें, कुत्तों को खिलाएँ, फिर घर आकर स्वयं प्रसाद खाएँ और सामान्य काम करें। यह काम सुबह करें तो अति उत्तम; शाम को भी कर सकते हैं, लेकिन पता कर लें कि उस मंदिर में शाम को दूध चढ़ाने मिलेगा या नहीं। दूसरा, पूजा शुरू करने से पहले शिव जी के पास एक घी का दीपक जला देना है। इसके सिवाय भगवती, माँ जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। के लिए कोई भी लाल रंग का एक पुष्प लें। शिव मंदिर में पार्वती जी की मूर्ति होती है; न हो तो शिव जी ही पार्वती जी का स्वरूप हैं। पूजा पूरी होने पर 108 नाम लेकर कहें, उनके शब्दों में: हे भगवती, जगत-जननी जगदंबा, मेरी इस पूजा को स्वीकार कर लीजिए; इस पुष्प मात्र से प्रसन्न हो जाइए; और अभी जो मंत्र का विधि-विधान किया है उसमें कोई दोष लग रहा हो तो उस दोष से मुझे मुक्त कर दीजिए। यह बोलकर पुष्प अर्घे पर ज़रूर रख दें। तीसरा काम, जो एकदम करना ही करना है: कुत्तों को भोजन कराना, जो करा सकें — बिस्किट, रोटी, दूध-रोटी। प्रतिदिन दूध-रोटी, रोटी या बिस्किट कुत्तों के पेट में जाना ही चाहिए; उन्हें खिलाने के बाद ही स्वयं खाना खाना है। यह सब, वे कहते हैं, इसलिए कि मंत्र का, इस पाठ का, इन सभी विधानों का कोई तिर्यक् प्रभाव न पड़े और देवता की कृपा पूर्ण रूप से मिले — क्योंकि यह अति तीव्र, बहुत तीक्ष्ण सबर मंत्र है। वे सिद्धि और प्रयोग विधान सीमित मात्रा में इसलिए बता रहे हैं, उनके अनुसार, कि लोग सक्षम बनकर सताने वाले दुष्टों से मुक्ति पाएँ, सनातन के लिए कार्य करें, अपने धर्म और घर-परिवार की रक्षा करें।
महाभैरव सिद्धि की सामग्री और व्यवस्था
यंत्र या मंदिर, माला, लाल गोमुखी, वस्त्र, आसन, दिशा, दो दीपक, मीठा भोग
वक्ता कहते हैं कि सिद्धि पहले घर में नहीं करनी। इसमें किसी विद्वान से विधि-विधान से बनवाया भैरव जी का तंत्रोक्त यंत्र लगेगा; बनवाने की क्षमता न हो तो शिव जी के मंदिर में विधान करें और वहीं रोज़ का जप शिव जी को समर्पित करें। माला रुद्राक्ष, स्फटिक या काली हकीक माला — असली — लाल गोमुखी में; वस्त्र लाल या पीला; आसन कुश का या लाल-पीले कंबल का; दक्षिण छोड़कर किसी भी दिशा में मुख। दो दीपक: शिव जी के लिए घी का, और भैरव जी के नाम से सरसों तेल का थोड़ा बड़ा दीपक जो देर तक जले। नित्य भोग कुछ भी मीठा — मिठाई, बेसन या बूँदी के लड्डू, पंचमेवा — वहाँ के लोगों में बाँटें और स्वयं भी खाएँ।
यह विधान पहले घर में नहीं करना है, वक्ता कहते हैं। सिद्ध करने के लिए सर्वप्रथम भैरव जी का तंत्रोक्त यंत्र लगेगा, जिसे किसी विद्वान व्यक्ति से विधि-विधान से बनवा सकते हैं। बनवाने की क्षमता न हो तो कोई दिक्कत नहीं: शिव जी के मंदिर में विधान करें और वहाँ शिव जी के पास रोज़ मंत्र-जप का समर्पण करें। माला रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की, स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। की या काली हकीक मालाकाले हकीक (एगेट) मणकों की माला, उग्र भैरव मंत्रों के जप हेतु रुद्राक्ष के साथ प्रयुक्त। — तीनों में से कोई भी, पर जो भी लें ध्यान रखें कि असली हो, सही हो। गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। लाल रखनी है। वस्त्र लाल या पीला, कोई भी। आसन कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का, या लाल-पीले कंबल का। मंदिर में बैठें तो दक्षिण दिशा छोड़कर किसी भी दिशा में मुख रख सकते हैं। दो दीपक जलेंगे: शिव जी के लिए घी का दीपक जो शुरू में बताया, और सरसों तेल का थोड़ा बड़े साइज़ का दीपक जो थोड़ी देर तक जल सके, भैरव जी के नाम से। नित्य भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। कुछ भी मीठा — मिठाई, बेसन के लड्डू, बूँदी के लड्डू, पंचमेवा, जो क्षमता में हो। पूजन के बाद भोग वहाँ के लोगों में बाँट सकते हैं और स्वयं भी खा सकते हैं। यह सब, वे कहते हैं, नित्य की प्रक्रिया है।
पहला चरण: महाभैरव मंत्र की सिद्धि, शिव मंदिर में ग्यारह दिन ग्यारह माला
स्तोत्र से पहले संपुट मंत्र सिद्ध होना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव स्तोत्र (पीडीएफ का लिंक दिया जाएगा) को महाभैरव मंत्र (डिस्क्रिप्शन में लिंक) से संपुट करना है, और वह मंत्र पहले सिद्ध होना चाहिए — यानी दो अनुष्ठान, एक मंत्र का और एक स्तोत्र का। मंत्र वाला चरण शिव मंदिर में उसी नित्य विधान के साथ कम से कम 11 दिन चलता है: कृष्ण पक्ष की अष्टमी या अमावस्या से आरंभ करके, आसन पर बैठकर गुरु-गणेश स्मरण और अपना सामान्य पाठ, फिर महाभैरव मंत्र की 11 माला (आगे वे 5 माला की भी छूट देते हैं) और जप शिव जी पर समर्पित, 11 दिन तक रोज़।
पाठ कैसे करना है और सिद्धि का विधान कैसे है, वक्ता कहते हैं, यह है। वे एक पीडीएफ का लिंक देंगे, उसे डाउनलोड करके प्रिंट निकलवा लें; उसमें स्तोत्र है, बटुक भैरव स्तोत्र। उस स्तोत्र को महाभैरव मंत्र से संपुट करना है। महाभैरव मंत्र का लिंक इसी वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दिया है; उसे पहले सिद्ध करना होता है। यानी इसमें दो सिद्धियाँ, दो प्रकार के अनुष्ठान होंगे — पहला महाभैरव मंत्र के लिए और दूसरा स्तोत्र के लिए। महाभैरव मंत्र के लिए भी सारा विधि-विधान शिव मंदिर में इसी प्रकार रहेगा। कम से कम 11 दिन करेंगे। कब से? कृष्ण पक्ष की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। या अमावस्या तिथि से आरंभ करके 11 दिन तक नित्य शिव जी के मंदिर में महाभैरव मंत्र की 11 माला जप। जप से पहले आसन पर बैठकर गुरु-गणेश स्मरण और जो भी सामान्य पाठ करते हों वह करके, फिर 11 माला, और मंत्र शिव जी पर समर्पित। 11 दिन तक यह करना है। आगे दोहराते हुए वे कहते हैं कि जिस महाभैरव मंत्र का लिंक दिया है उसे पूरा सुन लें, उसमें केवल मंत्र पर ध्यान दें; उसका 11 दिन तक प्रतिदिन 11 माला — या 5 माला — जप करना है, और जब वह एक अनुष्ठान पूर्ण हो जाए तब पूरे स्तोत्र का अनुष्ठान करना है।
दूसरा चरण: बटुक भैरव स्तोत्र की सिद्धि, काली मिर्च पर रोज़ पाँच पाठ इक्कीस दिन
अगली कृष्ण अष्टमी या मासिक शिवरात्रि से; फिर स्तोत्र वज्र समान
वक्ता कहते हैं कि मंत्र के 11 दिन पूर्ण होने पर अगली कृष्ण पक्ष अष्टमी या मासिक शिवरात्रि जैसी शुभ तिथि से स्तोत्र का पाठ आरंभ होता है। रोज़ 11 पाठ के लिए 11 काली मिर्च या 5 पाठ के लिए 5 लें; धूप-दीपक जलाएँ, शिव जी के पास भोग रखें, भैरव जी का स्मरण-ध्यान करें, पाठ में दिया विनियोग करें और आरंभ करें। हर पाठ में एक काली मिर्च हाथ में लेकर पाठ पूरा होने पर शिव जी के argha पर रख दें; फिर दूसरा दूध अभिषेक। कम से कम 21 दिन रोज़ पाँच पाठ, वे कहते हैं, तो स्तोत्र आपके लिए महासिद्ध, वज्र के समान, बहुत तीव्र प्रभाव देने वाला हो जाता है।
मंत्र के 11 दिन पूर्ण हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, फिर अगली कृष्ण पक्ष अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। से, या जो भी शुभ तिथि पड़ रही हो — शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। आदि, मासिक शिवरात्रि — उस दिन से इस स्तोत्र का पाठ आरंभ करेंगे। पाठ के लिए प्रतिदिन 11 काली मिर्च लेनी है यदि 11 पाठ कर रहे हैं, या 5 यदि 5 पाठ। धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।-दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। इसी प्रकार जला लें, भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। आदि शिव जी के पास लगा दें, और भैरव जी का स्मरण-ध्यान करते हुए, पाठ में दी गई विधि के अनुसार विनियोग करके अपना पाठ आरंभ करें। जैसे पाँच पाठ करने हैं: एक काली मिर्च हाथ में लेकर एक पाठ किया, पूरा हुआ तो शिव जी के argha पर रख दी; दूसरा किया, फिर अर्घ्य पर रख दी; ऐसे पाँच पाठ करें। फिर शिव जी का दूसरा दूध अभिषेक, जैसा नित्य नियमों में बताया। कम से कम 21 दिन का अनुष्ठान करना चाहिए, वे कहते हैं, प्रतिदिन पाँच पाठ। पाँच पाठ 21 दिन तक करेंगे तो यह स्तोत्र आपके लिए महासिद्ध, वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। के समान हो जाएगा और बहुत तीव्र प्रभाव देने वाला है।
महाभैरव साबर मंत्रों का दुरुपयोग भैरव से तुरंत दंड दिलाता है
स्तोत्र में मारण मंत्र हैं; करें तभी जब स्वयं कष्ट में हों
वक्ता कहते हैं कि यह साबर पाठ है, इसमें अति क्लिष्ट सबर मंत्र प्रयोग हुए हैं और मारण संबंधी मंत्र भी हैं, इसलिए इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यदि जान-बूझकर किसी को हानि पहुँचाने के लिए — क्रोध में, लालच में या किसी भी कारण से संकल्प लेकर — करते हैं तो भैरव बहुत तीव्र देवता हैं, तुरंत दंड देते हैं। इसे सार्वजनिक रूप से, सीमित मात्रा में, इसलिए दिया जा रहा है कि बहुत लोग कष्ट में रोते हैं और उन तक व्यक्तिगत रूप से पहुँच नहीं पाते; इसे तभी करें जब आप कष्ट में हों या आप पर मारण प्रयोग हुआ हो, ताकि दंड के पात्र न बनें।
पाठ करेंगे तो देखेंगे, वक्ता कहते हैं, कि चूँकि यह साबर मंत्र है, इसमें अति क्लिष्ट सबर मंत्र प्रयोग किए गए हैं और मारण संबंधी मंत्र भी हैं। इसलिए ध्यान रहे कि इसका दुरुपयोग न हो। जान-बूझकर किसी को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं तो दिक्कत है। यह सबके सामने इसलिए रखा जा रहा है, वे कहते हैं, कि लोग अपनी रक्षा कर सकें — बहुत कष्ट है, विपत्ति है, लोग रोते हैं, और हर किसी को व्यक्तिगत रूप से देना संभव नहीं; सब लोग बात करने के लिए उन तक पहुँच भी नहीं पाते। इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से, सीमित मात्रा में, यह बताते हुए दिया जा रहा है कि किस-किस विधान को करना है। यदि गलत करेंगे — कोई संकल्प लेकर गलत कार्य कर दिया, क्रोध में, लालच में, किसी भी कारण से किसी को हानि पहुँचा दी — तो ध्यान रखें, वे कहते हैं, भैरव बहुत तीव्र देवता हैं, तुरंत दंड देते हैं। इसलिए दंड के पात्र न बनें: कष्ट हो तभी करें; आप पर मारण प्रयोग आदि किया गया हो तो करें।
सिद्ध महाभैरव स्तोत्र को भविष्य की रक्षा के लिए रखना: अमावस्या या कृष्ण अष्टमी पर पाठ
नित्य पाठ केवल जब प्रयोग सक्रिय हो
वक्ता कहते हैं कि जिन सामान्य लोगों पर प्रयोग नहीं है वे भी इस स्तोत्र को — उसी सिद्धि विधि से — सिद्ध करके भविष्य में सुरक्षा के लिए रख सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग करें। सिद्ध करने के बाद प्रत्येक अमावस्या या कृष्ण पक्ष अष्टमी को घर पर एकाध पाठ पर्याप्त है। नित्य पाठ तभी करना होता है जब पता चले या लगे कि तंत्र-अभिचार की स्थिति बनी हुई है।
प्रयोग से पीड़ितों के अलावा, वक्ता कहते हैं, बाकी सामान्य लोग अपने भविष्य में सुरक्षा आदि के लिए इसे सिद्ध करके रख सकते हैं। आप इसे सिद्ध कर सकते हैं — सिद्ध करने की विधि यही रहेगी — सिद्ध करके रख लें, कभी भविष्य में आवश्यकता पड़े तो प्रयोग करें। नहीं तो सिद्ध करने के बाद प्रत्येक अमावस्या या कृष्ण पक्ष अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। को घर पर एकाध पाठ कर सकते हैं। नित्य पाठ, वे कहते हैं, तभी करना होता है जब आपको पता चले या लगे कि तंत्र-अभिचार की स्थिति बनी हुई है।
सक्रिय प्रयोग के विरुद्ध सिद्ध महाभैरव स्तोत्र का घर में प्रयोग
माला, पाँच पाठ, माला — और 21 दिन ताँबे के लोटे का जल छिड़काव
वक्ता कहते हैं कि जब दोनों अनुष्ठान एक-एक बार पूरे हो जाएँ तो घर में पाठ ऐसे होगा: पहले महाभैरव मंत्र की एक माला, फिर स्तोत्र के पाँच पाठ, फिर मंत्र की एक माला। जब भी घर में किसी प्रयोग के लिए पाठ करें, ताँबे के लोटे में शुद्ध गंगाजल, गोमूत्र, कुश और तुलसी पत्र मिलाकर पाठ चलने तक सामने रखें; बाद में वह जल पीड़ित को पिलाएँ, उस पर छिड़कें, और पूरे घर में अंदर से बाहर तक और चौखट पर अच्छे से छिड़काव करें। यह 21 दिन तक लगातार नित्य करना है; इतने से, वे कहते हैं, किसी भी प्रकार का मारण प्रयोग नष्ट होता है। धूनी की विधि और हवन की विधि अलग है, जिसे वे फिर कभी बताने को कहकर छोड़ देते हैं।
प्रयोग कैसे होगा, वक्ता कहते हैं: जब दोनों अनुष्ठान एक-एक बार पूरे हो जाएँ और आप घर में पाठ शुरू करें, तो घर में पाठ ऐसा होगा — पहले महाभैरव मंत्र की एक माला, फिर इस स्तोत्र के पाँच पाठ, फिर महाभैरव मंत्र की एक माला। इस प्रकार घर में करेंगे। और जब भी घर में किसी प्रयोग के लिए पाठ करें, ताँबे के लोटे में शुद्ध गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।, गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है।, कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। और तुलसी पत्र — इन्हें मिलाकर रख लें। जब तक पाठ चलेगा वह सामने रहेगा। उसके बाद जो भी व्यक्ति पीड़ित है — अभिचार से, तंत्र से, भूत-प्रेत-पिशाच से — उसे वह जल पिलाना भी है, उस पर छिड़कना भी है, और पूरे घर में, अंदर से बाहर तक, घर की चौखट पर भी अच्छे से छिड़काव करना है। यह काम नित्य करना है; घर में भी 21 दिन तक लगातार करेंगे। धूनी देने की इसकी विधि अलग है, हवन की विधि भी अलग है — वह, वे कहते हैं, फिर कभी बता देंगे। इतना प्रयोग करेंगे तो किसी भी प्रकार का मारण प्रयोग आदि हो, वह नष्ट होगा।
महाभैरव साधना में भैरव और भैरवी को नित्य नींबू की बलि
डंठल की ओर से काटें, बीच से नहीं; रोली, तीन बार जल, वृक्ष के नीचे विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि इसमें सात्विक बलि नींबू की है: प्रतिदिन कम से कम दो, एक भैरव जी के नाम से और एक भगवती भैरवी के नाम से — महाभैरव मंत्र-जप के दिनों में रोज़ मंदिर में ही, और घर में प्रयोग करते समय घर में भी। हरा, कच्चा नींबू लें और जिस ओर वह पेड़ से लगा रहता है उस भाग को ऊपर रखकर सीधा काटें, शरबत की तरह बीच से नहीं; दो टुकड़ों पर रोली लगाकर समर्पित करें, जल से तीन बार घुमाकर वहीं जल छोड़ दें। पूजा हो जाने पर उन्हें उठाकर वहीं किसी दिव्य वृक्ष के नीचे विसर्जित कर दें। यह पूरी साधना में करना है।
इसमें बलि चढ़ाने की विधि है, वक्ता कहते हैं — सात्विक बलि, नींबू की बलि। प्रतिदिन कम से कम दो दें: एक भैरव जी के नाम से, दूसरी भगवती भैरवी के नाम से। कब देनी है: जब महाभैरव मंत्र का जप कर रहे हों तो प्रतिदिन मंदिर में ही बलि चढ़ाएँ; और जब घर पर प्रयोग करें तब घर में भी इसकी बलि दें। विधि: नींबू को सीधा काटना है — हरा नींबू, कच्चा नींबू — जिधर वह पेड़ से लगा रहता है उस भाग को ऊपर रखकर सीधा काटा जाता है। शरबत के लिए बीच से काटते हैं; यहाँ ऊपर से काटना है। दो टुकड़े करके उन पर रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। लगाकर समर्पित कर दें। जल से तीन बार घुमाकर वहीं जल छोड़ दें। दोनों के नाम से ऐसा करें। पूजा हो जाए तो उन्हें उठाकर वहीं कहीं दिव्य वृक्ष के नीचे विसर्जित कर दें। यह काम, वे कहते हैं, पूरी साधना में करना है। इतना करके आप स्वयं को पूर्ण सुरक्षित और मज़बूत कर सकते हैं।
शिव जी के पास घी के दीपक ताकि विधान देने वाले के प्रति कोई ऋण-दोष न रहे
अनुष्ठान भर रोज़ एक से पाँच दीपक
वक्ता कहते हैं कि जब भी यह अनुष्ठान करें, उसके बीच प्रतिदिन ऋण-दोष (ऋणानुबंध) से मुक्ति हेतु शिव जी के पास घी का कम से कम एक और अधिकतम पाँच दीपक, जितना सामर्थ्य हो, ज़रूर जलाएँ। प्रार्थना करें कि जिनसे यह पूरा विधान मिला है उनके और हमारे बीच कोई ऋण-दोष न रहे, दोनों में किसी पर ऋण का प्रभाव न पड़े, और यह मंत्र पूर्ण रूप से जागृत और सफल हो।
ऋण-दोष (ऋणानुबंध) से मुक्ति हेतु, वक्ता कहते हैं, यह विधान ज़रूर करें: जब भी यह अनुष्ठान करें, उसके बीच में प्रतिदिन शिव जी के पास घी का न्यूनतम एक और अधिकतम पाँच दीपक, जितना सामर्थ्य हो, ज़रूर जलाएँ। और यह प्रार्थना करें, उनके शब्दों में: जिनसे इस पूरे विधान की प्राप्ति हुई है उनके और हमारे बीच कोई ऋण-दोष न रहे; हम दोनों में से किसी पर किसी प्रकार का ऋण का प्रभाव न पड़े; और यह मंत्र पूर्ण रूप से जागृत हो, सफल हो। वे जोड़ते हैं कि इस प्रयोग-विधान का कभी दुरुपयोग न करें।
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