किसी और की कुल शक्ति का भोग खाने से प्रेत दोष क्यों लगता है — प्रसाद के नियम, लोक देवता और कन्याओं का निषेध
कुल देवता का प्रसाद किसी और घर से न लेने और न देने के नियम के पीछे का तांत्रिक तर्क, अविवाहित कन्याओं को उससे क्यों दूर रखा जाता है, और कुल शक्ति का भोग परिवारों के बीच जाने पर लगने वाला प्रेत दोष।
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घरेलू नियम: कुल देवता का प्रसाद घरों के बीच नहीं बाँटा जाता, और कन्याओं को दूर रखा जाता है
गाँव की पुरानी रीति, जिसका तंत्रोक्त कारण वक्ता बताते हैं
वक्ता कहते हैं कि गाँवों में और पुराने रीति-रिवाज मानने वालों से आप हमेशा सुनेंगे कि दूसरे के घर के देवी-देवताओं का प्रसाद नहीं खाना चाहिए और अपने घर के देवी-देवताओं का प्रसाद दूसरों को नहीं देना चाहिए। जिन घरों में कुलदेवता प्रमुख रूप से पूजित हैं, वहाँ तो घर की कन्याओं को देखना-छूना तक वर्जित रहता है, वे वार्षिक पूजन में सम्मिलित नहीं होतीं और उन्हें प्रसाद भी नहीं दिया जाता।
वक्ता एक ऐसे रिवाज से शुरू करते हैं जो, वे कहते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में और पुराने रीति-रिवाज मानने वालों से हमेशा सुनने को मिलता है: दूसरे के घर के देवी-देवताओं का प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। नहीं खाना चाहिए, और अपने घर के देवी-देवताओं का प्रसाद किसी और को नहीं देना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि जिन घरों में कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। प्रमुख रूप से पूजित हैं, वहाँ नियम और आगे जाता है — घर की कन्याओं को उन्हें देखना और स्पर्श करना तक वर्जित रहता है। जहाँ कुल देवताओं का केवल वार्षिक पूजन होता है, वहाँ उसमें घर की कन्याएँ सम्मिलित नहीं होतीं, केवल पुरुष होते हैं। घर की वधुएँ, यानी विवाह करके आई स्त्रियाँ, सहयोग कर सकती हैं, पर कहीं-कहीं उन्हें भी स्पर्श की मनाही होती है। और ऐसे कुल देवता वाले घरों में कन्याओं को प्रसाद बिल्कुल नहीं दिया जाता। वे कहते हैं कि आज का विषय इसके पीछे का कारण है — तंत्रोक्त कारण: यह कैसे होता है और क्यों मना किया जाता है।
मुगल काल के बाद लोक देवता किस तरह कुल देवता के रूप में पूजित होने लगे
पिछले 100–200 वर्षों में स्थान दिए गए दिवंगत साधक और सामान्य लोग
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में हर परिवार के मूल कुल देवी-देवता कोई न कोई महाशक्ति रहे हैं, किंतु मुगल काल के बाद घालमेल शुरू हुआ और कई घरों में पूजित शक्ति वास्तव में लोक देवता है — कोई साधक जिसकी शरीर छूटने पर गति नहीं हुई और जिस शक्ति की वह सेवा करता था उसकी कृपा से वह स्वतंत्र रूप से पूजा-भोग लेने लगा और उसे स्थान दे दिया गया; कहीं-कहीं कोई सामान्य व्यक्ति, या किसी को इष्ट का अंश मानकर पूजित किया गया। ऐसी शक्तियाँ पुरानी नहीं हैं; ये पिछले 100–200 साल में जगह-जगह स्थापित हुई हैं।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में किसी भी परिवार के जो कुल देवी-देवता रहे हैं, वे कोई न कोई महाशक्ति ही रहे हैं। किंतु एक समय आया — मुगलों का काल — जिसके बाद घालमेल देखने को मिलता है: कई घरों में जो शक्ति पूजित रही है, वह वास्तव में लोक देवता, लोक शक्ति रही है। लोक देवता कौन होते हैं, यह वे चैनल पर अलग वीडियो में स्पष्ट कर चुके हैं: कोई साधक जो बहुत अच्छी साधना करता था — चाहे तांत्रिक हो, तंत्र प्रवृत्ति की साधनाएँ करता हो, या किसी अन्य संप्रदाय का सिद्ध हो — और समय आने पर जब उसका शरीर छूटा तो उसकी गति नहीं हो पाई। जिस शक्ति की वह सेवा करता था, उसके आशीर्वाद और कृपा से या उसके सान्निध्य में रहकर वह संत स्वतंत्र रूप से पूजा-भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लेने लगा, और फिर उसे स्थान दे दिया गया। कालांतर में लोगों ने उसकी बहुत सेवा-पूजा की, धीरे-धीरे उसकी महिमा बढ़ी और वह लोक देवता के रूप में पूजित हो गया। वे जोड़ते हैं कि कोई सामान्य व्यक्ति भी इस तरह की शक्ति के रूप में पूजित रहा है, और किसी-किसी को अपने इष्ट का अंश-रूप मानकर भी पूजा गया है। ये शुरू से नहीं रहे — पिछले 100–200 साल में जगह-जगह स्थापित होते गए हैं।
अभिचार से हुई मृत्यु की प्रेत शक्तियाँ भगतवाल के माध्यम से घर के देवता कैसे बना दी जाती हैं
अभिचार से मरे लोग और ब्रह्म देव घर में स्थापित, पीढ़ियों में इतने जागृत कि छोड़े नहीं जा सकते
लोक देवताओं से नीचे वक्ता और भी निम्न श्रेणी की शक्तियों का वर्णन करते हैं: जब किसी अभिचार क्रिया से किसी सामान्य व्यक्ति की मृत्यु हुई, तो स्थानीय भक्तों ने तंत्र और भगतवाल के माध्यम से बहुत बार उसे उसके ही घर में स्थान देकर देवता के रूप में पुजवा दिया — देव-स्वरूप में एक प्रेत शक्ति। एक-दो पीढ़ी पूजित होते-होते ऐसी शक्ति इतनी जागृत हो जाती है कि उसे फिर छोड़ा नहीं जा सकता। उदाहरण में वे ब्रह्म देवों को लेते हैं — मृत्यु के बाद स्थान दी गई कोई विवाहिता स्त्री, स्वतंत्र रूप से या महादेव के मंदिर के नीचे ब्रह्मशिला के रूप में — और कहते हैं कि अभिचार में चली, लोगों की हत्या कर चुकी उपद्रवी शक्तियों को भी बहुत बार धाम की जगह घर में ही स्थान दे दिया जाता है।
लोक देवताओं के बाद वक्ता और निम्न श्रेणी की शक्तियों की ओर आते हैं। किसी के घर में कोई सामान्य व्यक्ति किसी अभिचार क्रिया से मर गया। विशेषकर पिछले 100–150 साल में, मुगलों के बाद के समय में, यह बहुत हुआ: अभिचारी गतिविधियों से किसी की मृत्यु हुई तो छुटकारा पाने के लिए उस समय के स्थानीय, क्षेत्रीय भक्तों ने बहुत बार तंत्र के माध्यम से — भगतवाल के माध्यम से — उसे उसके ही घर में स्थान देकर देवता के रूप में पूजित कर दिया। नाम देवता दे दिया, वे कहते हैं, पर वह विशेष रूप से प्रेत शक्ति है; प्रेत को ही देव-स्वरूप में पुजवा दिया कि भाई ये अब घर के देवता हो गए। एक-दो पीढ़ी पूजित होते-होते ऐसी शक्तियाँ इतनी जागृत हो जाती हैं कि फिर उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। वे कहते हैं कि एक दृष्टि से वे इसे गलत नहीं कह रहे, और श्रोताओं से निवेदन करते हैं कि इससे आहत न हों — पर कहीं न कहीं ये ऐसे तत्व हैं जो नकारात्मकता में थे, और भगतवाल के माध्यम से वचन देकर आपने उन्हें घर में रख लिया है। उदाहरण में वे ब्रह्म देवों को लेते हैं: किसी घर की कोई विवाहिता स्त्री, जिसे मृत्यु के बाद स्थान दे दिया गया। इसमें भी दो-तीन प्रकार हैं — किसी को स्वतंत्र रूप से स्थान दिया गया, किसी को किसी शक्ति के नीचे, जैसे महादेव का मंदिर बनाकर वहाँ स्थापित किया, जिससे मुख्य पूजा महादेव की होती है और ब्रह्मशिला के रूप में एक शिला स्थापित कर दी गई कि ये ब्रह्म देव हैं। और कहीं-कहीं अभिचार में चली हुई कोई शक्ति जब अभिचारिक कारणों से कुछ लोगों की हत्या कर देती है, तो वह और उपद्रवी हो जाती है, परिवार में बहुत अशांति हो जाती है; उसे किसी धाम पर स्थान न देकर लोग बहुत बार घर में ही स्थान दे देते हैं, और घर में स्थान मिलते ही वह पूजित हो जाती है।
प्रेत शक्ति का भोग दिव्य कुल शक्ति तक पहुँचे तो लगने वाला दोष
स्थापित-पूर्वज वाले घर का भोग महाकाली वंश में; उच्च शक्ति द्वारा उपदेव का जूठा लेना
वक्ता दो घर आमने-सामने रखते हैं: एक जहाँ मूल महाकाली का पीढ़ी दर पीढ़ी कुलदेवी के रूप में पूजन हो रहा है और उनका अलग विधान कुल तक सीमित रखा जाता है, और एक जहाँ लोक शक्ति के रूप में — कोई मृत पूर्वज, शायद कोई दादा जिन्हें सिद्ध कहा जाता है — कुल देवता के रूप में स्थापित किया गया है। दूसरे घर में लगा भोग पहले घर के किसी व्यक्ति तक पहुँचे तो तत्व का भेद होता है: प्रेत शक्ति के अंश का भोग एक ऐसी दिव्य शक्ति को दिया जा रहा है जिसके अंश में प्राण ऊर्जा है — किसी और का जूठा उसे मिल रहा है। एक उच्च कोटि की शक्ति इस तरह उपदेव कोटि की शक्ति का भोग स्वीकार करती है; श्रेष्ठता और निम्नता का भेद टूटता है, और यही दोष लगता है। जो आपत्ति करते हैं कि शक्ति ऊँची-नीची नहीं होती, उसे वे पहले ही अस्वीकार करते हैं — तकनीकी कारणों को ठीक-ठीक वर्गीकृत किया जा रहा है — और वेदांत मार्गियों से कहते हैं कि वे अपने मार्ग पर चलें, इस चैनल पर ज्ञान न दें।
वक्ता अब एक उदाहरण रखते हैं। मान लीजिए किसी के घर में मूल भगवती महाकाली का पीढ़ी दर पीढ़ी पूजन हो रहा है — परिवार ने अपने कुल की अधिष्ठात्री शक्ति को जागृत रखा है; परंपरा जागृत है, वे शुरू से पूजित हैं। किसी और के घर में हनुमान जी पिछली तीन-चार पीढ़ियों से कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। के रूप में पूजित हैं, दादा-परदादा के समय से। किसी के यहाँ सुनने को मिलता है कि दादा या परदादा सिद्ध थे, उन्होंने इतनी सेवा-तपस्या की कि फलानी जगह उनका मंदिर है। जिस घर में लोक शक्ति के रूप में — अपने ही घर के किसी पूर्वज को, किसी मृत व्यक्ति को देव-रूप में स्थान देकर — कुल देवता के रूप में स्थापित किया गया है, वहाँ जो भी पूजा होगी और जो भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगेगा, वह उसी स्थापित शक्ति को जाता है। इसके विपरीत जिनके घर महाकाली कुलदेवी हैं, वे उन्हें अच्छी तरह कुलदेवी के रूप में पूजते हैं, और कुलदेवी पूजन का विधान ही अलग होता है: उस परंपरा का निर्वहन होता है और उसे उस कुल तक सीमित रखा जाता है जो शुरू से उसे चला रहा है। अब, वे कहते हैं, पूर्वज-देवता वाले घर में जो भोग लगा, वह भोग लगी हुई चीज़ किसी ऐसे व्यक्ति के घर पहुँचे या उसे दी जाए जिसके घर महाकाली पूजित हैं। यही वह प्रसंग है जिसे स्पष्ट करना है। यहाँ, वक्ता कहते हैं, तत्व का भेद हो रहा है। एक प्रेत शक्ति के अंश का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। एक ऐसी दिव्य शक्ति के भोग में दिया जा रहा है जिसके अंश में प्राण ऊर्जा है — यानी जूठा किसी और को मिल रहा है। इससे किस प्रकार के दोष होंगे? एक उच्च कोटि की शक्ति उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। कोटि की शक्ति के भोगों को ग्रहण कर रही है, स्वीकार कर रही है। एक ओर श्रेष्ठता और एक ओर निम्नता — यहाँ भेद टूटता है, और यह दोष लगता है। वे श्रोताओं से कहते हैं कि इसे स्पष्ट रूप से जानें-समझें। वे पहले ही कह देते हैं कि अब कुछ ज्ञानी लोग ज्ञान देंगे कि शक्ति ऊँची-नीची नहीं होती, और साफ़ निवेदन करते हैं कि यह सब ज्ञान यहाँ न दें: वे स्पष्ट रूप से तकनीकी कारणों की बात कर रहे हैं, वर्गीकृत कर रहे हैं कि क्यों, कैसे, कहाँ क्या बनता है; सब होता है। जो वेदांत मार्गी हैं और जिन्हें इन सब बातों में वेदांत का बहुत ज्ञान है, वे कृपया उसी मार्ग पर चलें — इस चैनल में उनकी आवश्यकता नहीं है। यही, वे कहते हैं, पहला कारण है कि ऐसे भोग के आदान-प्रदान से आपको मना किया जाता है।
देवी से रक्त, देवता से हड्डी: कुलदेवी और कुल देवता का अंश होना
सूक्ष्म शरीर और प्राण में बहता कुल शक्ति का अंश; महाकाली वंश में स्थापित भगवती की योगिनी
वक्ता समझाते हैं कि कुलदेवी का अर्थ है हमारे कुल की शक्ति और कुल देवता का अर्थ हमारे कुल के देवता, और माना गया है कि हम उनके अंश हैं: उनकी कृपा से हमने इस कुल में जन्म लिया है। कहा जाता है कि हमारे शरीर में रक्त और रक्त-संबंधी सब चीज़ें देवी की कृपा से बनती हैं, जबकि हड्डी और ठोस चीज़ें देवता की कृपा से — कुल देवता और कुलदेवी यानी महादेव और जगदंबा, पिता और माता — इसलिए उनका अंश हमारे सूक्ष्म शरीर और प्राण ऊर्जा में भी प्रवाहित है। महाकाली की परंपरा में भगवती की कोई योगिनी स्थापित होती है, प्रत्यक्ष हो या न हो, और उसकी कृपा उस घर में जन्मे हर व्यक्ति में रहती है।
प्रसंग को और स्पष्ट करने के लिए वक्ता पूछते हैं कि कुलदेवी का अर्थ क्या हुआ: हमारे कुल की शक्ति। और कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। का अर्थ हुआ हमारे कुल के देवता। कहीं न कहीं यह माना गया है कि हम उनके अंश हैं — उनके कृपा-प्रसाद से हमने उनके कुल में जन्म लिया है। पिछला जन्म और प्रारब्ध कर्म जो भी रहा हो, यह वर्तमान जीवन उन देवी-देवता की कृपा से इस कुल में लेना पड़ा है; उन्होंने दिया है, तो उनका अंश हमारे भीतर कहीं न कहीं प्रवाहित हो रहा है। कहा जाता है, वे आगे कहते हैं, कि शक्ति की, देवी की कृपा से हमारे शरीर में रक्त और रक्त-संबंधी सब चीज़ें बनती हैं, जबकि हड्डी, शरीर की ठोस चीज़, देवता की कृपा से बनती है। कुल देवता और कुलदेवी — यानी महादेव और जगदंबा — इस प्रकार शरीर के अवयव बनाते हैं, पिता और माता के रूप में। तो उनका अंश हमारे सूक्ष्म शरीर और प्राण ऊर्जा में भी चल रहा है। जिन्होंने अपने पितृ-पूर्वजों को देवता के रूप में स्थापित किया है, वे कहते हैं, उनके लिए यह सामने-सामने स्पष्ट दिखता है: आप उन्हीं के कुल के हैं। और जो भगवती महाकाली को लेकर चल रहे हैं — जिस साधक ने पहली बार उनकी सिद्धि की होगी, या उनकी सेवा करके उनकी किसी योगिनी को प्रसन्न किया होगा, या उस महाशक्ति को अपने कुल में स्थापित कर कुलदेवी के समान पूजन शुरू किया होगा; या कोई ब्राह्मण या वेद मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति जो शुरू से कुल-गोत्र के अनुसार कुल परंपरा का निर्वहन करता आया है — वहाँ भगवती की कोई न कोई योगिनी स्थापित है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या न हो। उस घर में जितने लोगों का जन्म हुआ, जितनी वंश-वृद्धि हुई, सबमें उसका कृपा-प्रसाद स्पष्ट रूप से रहा है।
लाग: एक ही परिवार की अलग हुई शाखाओं के बीच कुलदेवी का भोग बाँटना
अलग हुई शाखा ने कुलदेवी के साथ अन्य शक्तियाँ भी बैठाई हो सकती हैं; लाग जूठन है जो अर्जित ऊर्जा दूषित करती है
वक्ता कहते हैं कि एक ही कुलदेवी दो घरों में तभी पूजित होती है जब वे पहले एक ही परिवार रहे हों और बाद में अलग हुए हों — और तब भी भेद हो जाता है। यदि कोई जानकार सदस्य जो तंत्र शक्तियाँ जागृत कर रहा है, परिवार से अलग होकर कुलदेवी की अलग स्थापना करे, तो हो सकता है वह उनके साथ नई शक्तियाँ भी स्थापित कर दे, और कुलदेवी के साथ किसी और का भोग-पूजा भी दिया जाता हो। भगतवाल की भाषा में इसे लाग लगना कहते हैं — एक तरह से जूठन — और यह दोष है: मंत्र जप और कर्मकांड से हमें जो भी ऊर्जा मिली है, वह सब दूषित हो जाती है।
वक्ता आगे पूछते हैं कि एक ही कुलदेवी दो घरों में कब पूजित हो सकती है — केवल तब जब आप एक ही परिवार के हों जो बाद में अलग-अलग हो गया। तब भी, वे कहते हैं, भेद आ जाता है। कैसे? अगर कोई जानकार व्यक्ति बन गया, जो किसी प्रकार की तंत्र शक्ति जागृत कर रहा है, तो जब वह अपने परिवार से अलग होकर कुलदेवी की अलग स्थापना करेगा, तो हो सकता है कि साथ में कोई नई शक्तियाँ भी स्थापित कर दे। और अगर कुलदेवी के साथ किसी और का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य।-पूजा भी दिया जाता हो, तो — भगतवाल की भाषा में — इसे लाग लगना कहते हैं, और लाग लगने की संभावना रहती है। हमारे शरीर को, वे कहते हैं, एक जूठन लेने जैसा मान लीजिए: लाग का अर्थ एक तरह से जूठन हो गया। तो वह दोष लगता है, और उससे मंत्र जप, कर्मकांड आदि से हमें जो भी ऊर्जा प्राप्त हुई है, वह सब दूषित हो जाती है।
महाकाली वंश का भोग प्रेत शक्ति पूजने वाले घर पहुँचे तो लगने वाला दोष
महाकाली के प्रसाद की विस्फोटक ऊर्जा से बँधी और कुंठित उपदेव कोटि की शक्ति; केवल कुल शक्ति का भोग, मंदिर का प्रसाद नहीं
प्रसंग उलटकर वक्ता कहते हैं कि महाकाली को लगा भोग, जिसे उनकी योगिनियों ने सूक्ष्म रूप से ग्रहण किया, उसकी ऊर्जा और दिव्यता ही अलग होती है। अगर वह प्रसाद ऐसे घर में जाए जहाँ लोग उपदेवता कोटि की शक्ति की सेवा करते हैं और वे उसे ग्रहण करें, तो महाकाली की ऊर्जा का स्तर विस्फोटक है, और उनके दिव्य अंश के कारण उस घर की शक्ति बंधित और कुंठित हो जाती है — उसे कष्ट होता है। वे ज़ोर देते हैं कि बात केवल कुल शक्ति के भोग की है, बाहर के मंदिर के प्रसाद की नहीं, और जोड़ते हैं कि कुल देवता बना प्रेत ज़रूरी नहीं कि जीवन में साधक रहा हो; दुष्ट लोगों को भी भगतवाल के माध्यम से घर के देवता बना दिया जाता है, और ऐसा भोग पहुँचने पर उन्हें कष्ट होता है।
अब वक्ता प्रसंग को उलटकर देखते हैं। कोई उच्च शक्ति — महाकाली की शक्ति — पूजित है, उच्च कोटि के ब्राह्मण द्वारा या किसी भी वर्ण के व्यक्ति द्वारा अच्छी तरह पूजित-सेवित। उस घर की कुलदेवी पूजा का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। किसी ऐसे व्यक्ति के घर जाता है जिसके घर के पूजित देवता प्रेत ऊर्जा से संबंधित हैं। तब क्या होगा? महाकाली को लगा भोग, जिसे उनकी योगिनियों ने सूक्ष्म रूप से ग्रहण किया, उसकी ऊर्जा और दिव्यता ही अलग होगी; प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। की महिमा, वे कहते हैं, अनंत है, किसी के भी द्वारा दिया गया हो। अब वह भोग ऐसे व्यक्ति के घर जा रहा है जो उपदेवता कोटि की किसी शक्ति की सेवा-पूजा कर रहा है। जब वे उसे ग्रहण करेंगे, तो ऊर्जा का स्तर — महाकाली की ऊर्जा — विस्फोटक है, जबकि वहाँ की शक्ति उपदेवता कोटि में है; महाकाली की ऊर्जा के कारण, उनके दिव्य अंश के कारण, वह शक्ति वहाँ बंधित होगी, कुंठित होगी। उसे कष्ट होगा। और उस घर के लोग जो भी पूजा-पाठ करते होंगे, उस पर भी असर पड़ेगा। वे ध्यान दिलाते हैं कि वे बार-बार 'कुल शक्ति' कह रहे हैं — यहाँ बाहर के मंदिर के भोग-प्रसाद की बात नहीं हो रही। वे एक और बात स्पष्ट रूप से जानने को कहते हैं: ज़रूरी नहीं कि जो व्यक्ति वहाँ प्रेत रूप में पूजित हो गया है, वह जीवन में साधक ही रहा हो। दुष्ट लोग भी होते हैं — भगतवाल के लोग उन्हें घर में कुल देवता के रूप में पुजवा देते हैं, और पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा होती रहती है। उनकी ऊर्जा भले बढ़ रही हो, पर जब इस प्रकार की शक्ति का भोग वहाँ जाएगा तो उन्हें कष्ट होगा: जीवन में शरीर रहते उन्होंने पूजा-पाठ किया नहीं; अब देवता बनकर — या कहिए राक्षस, राक्षस-देव बनकर — वहाँ भोग ले रहे हैं, तो वहाँ कष्ट होने लगेगा।
स्थापित पूर्वज शक्ति को दिव्य कुल शक्ति के भोग से कब कष्ट नहीं होता
जीवन में किया नाम जप, या महादेव अथवा शक्ति पीठ के नीचे स्थापना — नित्य मंत्र, अभिषेक और शालिग्राम के साथ
वक्ता कहते हैं कि स्थापित शक्ति को वैसा कष्ट नहीं होगा अगर वह व्यक्ति शरीर रहते पूजा-पाठ और नाम जप करता था, या शरीर छूटने के बाद उसे स्वतंत्र स्थान न देकर किसी शक्ति पीठ की महाशक्ति के नीचे या भगवान महादेव के नीचे रखा गया हो, इस निर्देश के साथ कि उसकी पूजा और भोग के साथ घर वालों को रोज़ महादेव के मंत्रों का जप और नित्य अभिषेक करना है — वहाँ शालिग्राम स्थापित हो और शुभ ऊर्जाओं का निर्माण हुआ हो। ऐसी शुद्धता और सात्विकता में रखने पर उस तरह का कष्ट नहीं होता, हालाँकि थोड़ी लाग, बंधन या कष्ट फिर भी हो सकता है।
तो ऐसी शक्ति को, इस तरह की कुल शक्ति का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लेने पर भी, कब कष्ट नहीं होगा? वक्ता दो शर्तें बताते हैं। पहली, अगर वह व्यक्ति शरीर रहते पूजा-पाठ और नाम जप किया करता था। दूसरी, अगर शरीर छूटने के बाद जब उसे स्थान दिया गया, तो स्वतंत्र रूप से न देकर किसी शक्ति पीठ की महाशक्ति के नीचे या भगवान महादेव के नीचे दिया गया हो, यह कहकर: हाँ, इनकी पूजा होगी, भोग लगेगा, पर साथ में आपको रोज़ अपने महादेव के मंत्रों का जप और उनका नित्य अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करना है। जहाँ शालिग्राम आदि की स्थापना हुई हो, शुभ शक्तियों, शुभ ऊर्जाओं का निर्माण हुआ हो — जहाँ उन्हें इस प्रकार शुद्धता और सात्विकता से रखा जाता है — वहाँ, वे कहते हैं, उस तरह का कष्ट नहीं होगा। थोड़ी-बहुत लाग लग सकती है, बंधित हो सकते हैं, कष्ट हो सकता है — फिर भी इस भेद को जान लीजिए।
अनजाने भोग-दोष के बाद घर के देवता की स्वप्न में चेतावनी
जानबूझकर आदान-प्रदान लक्ष्य-भेद का प्रयोग है; अनजाने में हुआ दोष देवता स्वयं स्वप्न में बताते हैं
वक्ता कहते हैं कि ऐसी क्रियाओं से बहुत बार स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है — और वे केवल अनजाने में हुई बात कर रहे हैं; जानबूझकर कोई करे तो बात ही अलग है, वह लक्ष्य भेद करके किया गया प्रयोग है। जब अनजाने में दोष लग जाता है, तो घर के देवता जो भी हों — भले ही पितृ-पूर्वज ही कुल देवता के रूप में पूजित हों — स्वप्न में आकर कहेंगे: बेटा, इस प्रकार का दोष लग गया है, अब ऐसे क्षमा-याचना कर लो, मंदिर में जाकर भोग लगा दो, क्योंकि इससे मुझे कष्ट हो रहा है या तुम लोगों को कष्ट होगा। इसी कारण आदान-प्रदान से मना किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार की क्रियाओं से बहुत बार स्थिति काफ़ी गंभीर हो जाती है — हालाँकि वे जानबूझकर किए गए की बात नहीं कर रहे। वे अनजाने की बात कर रहे हैं। जानबूझकर कोई करे तो बात ही अलग है: वहाँ लक्ष्य भेद करके प्रयोग किया जा रहा है। पर जब अनजाने में ऐसी चीज़ें हो जाती हैं, तो दोष लगता है। इसका परिणाम, वे कहते हैं, यह होता है कि घर के देवता जो भी हों — भले ही पितृ-पूर्वज ही कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। के रूप में पूजित हो गए हों — वे स्वप्न में आपको बोलेंगे: देखो बेटा, इस प्रकार का दोष लग गया है; अब इस तरह क्षमा-याचना कर लो, मंदिर में जाकर भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगा दो, क्योंकि इससे मुझे कष्ट हो रहा है या तुम लोगों को कष्ट होगा। वे बता देते हैं। यह सब इसी तरह होता है, वे कहते हैं, और इसी कारण एक-दूसरे के ऐसे भोग के आदान-प्रदान से कभी भी मना किया जाता है।
अविवाहित कन्याओं को कुल देवता के प्रसाद से क्यों मना किया जाता है?
दूसरे गोत्र के लिए जन्मी कन्या, रजस्वला से पहले विवाह की पुरानी रीति, और अदत्त कन्या की असीमित शक्ति
वक्ता आधार बताते हैं। एक क्षेत्रीय परंपरा। दूसरा यह कि कन्या विवाह के बाद किसी और घर जाने वाली है, और उसे वहाँ पहुँचाना पिता का कर्तव्य है: शास्त्रीय परंपरा में ग्यारह-बारह वर्ष की आयु में कन्यादान कर दिया जाता था और पाँच-सात साल बाद गौना होता था, क्योंकि तब लोग मानते थे कि पिता के घर कुँवारी रहते कन्या रजस्वला हो जाए तो उसे स्त्री का स्वरूप माना जाता है और पिता को कन्या-हत्या का दोष लगता है — अब इसे कोई नहीं मानता, वे कहते हैं। फिर तांत्रिक कारण: जब तक अग्नि देव के समक्ष या संकल्प के माध्यम से वरुण देव का कलश स्थापित कर कन्या का दान नहीं हो जाता — जब तक भगवती का यह स्वरूप पाणिग्रहण संस्कार से किसी कुल को प्राप्त नहीं होता — तब तक उसके भीतर विराजित शक्ति की सीमा असीमित होती है। इसलिए जब वह कुल देवता का प्रसाद भोग करती है तो ग्रहण दोष लगता है और कुल देवता पर ऋण चढ़ता है, क्योंकि उसमें विद्यमान ऊर्जा भगवती की है। परिवार मानता है कि कन्या अभी दूसरे गोत्र को दान नहीं हुई, इसलिए उसे भोग देकर अपने देवी-देवता को कुंठित नहीं कर सकते। वे कहते हैं कि कोई केवल उनका वीडियो सुनकर यह प्रथा शुरू न करे; यह वहीं के लिए बताया जा रहा है जहाँ पहले से है।
अब वक्ता इस पर आते हैं कि कन्याओं को क्यों मना किया गया — विशेषकर जहाँ कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। पूजित हैं, वहाँ कन्या को दूर रखा जाता है। एक कारण, वे कहते हैं, यह है कि क्षेत्रीय परंपरा ऐसे ही चली आई है। दूसरा यह कि कन्या को यहाँ हमेशा ऐसा कहा गया है जो विवाह के बाद किसी और घर जाने वाली है; और पिता के घर उसका पालन-पोषण होते समय पिता का उसके प्रति एक कर्तव्य होता है। शास्त्रीय परंपरा में जाइए, वे कहते हैं, तो यह पुराने समय की बात थी, जिसे क्षेत्रीय लोगों ने थोड़ा आगे बढ़ाया है। कहा जाता था कि ग्यारह-बारह वर्ष की आयु में कन्या का कन्यादान कर विवाह कर दिया जाता था; गौना — ससुराल जाना — पाँच-सात साल बाद होता था। क्यों? क्योंकि उस समय के लोग मानते थे कि पिता के घर रहती हुई कन्या कुँवारी ही रह गई और रजस्वलारजस्वला स्त्री, जिस अवस्था में इस परंपरा में अनुष्ठान सम्बन्धी विशेष निषेध माने जाते हैं। हो गई, मासिक धर्म शुरू हो गया, तो जिसका मासिक धर्म आने लगे उसे स्त्री का स्वरूप माना गया है — और पिता को कन्या-हत्या का दोष लगता है। अभी के समय में इन बातों को कोई नहीं मानता, वे कहते हैं; पर जो मानते थे वे विवाह कर दिया करते थे। वे श्रोताओं से कहते हैं कि प्रसाद के नियम को इसी से स्पष्ट रूप से जोड़कर देखें। वक्ता कहते हैं कि जब तक कन्या का दान नहीं हो जाता — अग्नि देव के समक्ष, या संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। के माध्यम से वरुण देव का कलश स्थापित करके — तब तक भगवती का यह स्वरूप, जो उस परिवार की वृद्धि के लिए जहाँ कन्यादान होगा और इस संसार को चलाने के लिए जन्मा है, अग्नि देव और पाणिग्रहण संस्कार के माध्यम से किसी कुल को प्राप्त नहीं हुआ है। कन्यादान का, वे कहते हैं, इसीलिए बहुत बड़ा महत्व है: जब तक वह किसी को प्राप्त नहीं होती, उस कन्या के भीतर विराजित शक्ति की सीमा असीमित होती है। इसी कारण ग्रहण दोष लगता है। वे बीच में कहते हैं कि यह वहाँ के लिए है जहाँ कुल परंपरा ऐसे चली आ रही है, और नए लोगों से निवेदन करते हैं कि केवल उनका वीडियो सुनकर यह काम न कर लें — वे सिर्फ़ जानकारी के लिए बता रहे हैं, स्पष्ट कर रहे हैं कि जहाँ होता है वहाँ कैसे होता है, क्योंकि लोग पूछते हैं कि क्यों होता है। वहाँ, जब कन्या कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। का प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। भोग करती है, तो कुल देवता पर ऋण चढ़ता है। यही हमारा ग्रहण दोष है, क्योंकि वह ऊर्जा — भगवती की ऊर्जा — कन्या के रूप में विद्यमान है। वे श्रोताओं को याद दिलाते हैं कि माना जाता है कि जब तक बच्चे का अंगूठा मुँह में जाता है तब तक वह देव-अंश है; कि ऐसी बहुत-सी बातों का कारण सहित विस्तृत वर्णन है, जिसे वे कभी चैनल पर बताएँगे; कि जो बच्चे उल्टे पैदा होते हैं उनका तांत्रिक महत्व अधिक है, तंत्र में उन्हें बहुत महत्व दिया गया है और उन्हें सिद्धियाँ जल्दी मिलती हैं; और कि तंत्र के क्षेत्र में कुँवारी कन्या का बहुत महत्व है, जैसा श्रोता जानते होंगे। तो यह दोष चढ़ता है — जिसे ग्रहण दोष कहते हैं, जिसे ऋण दोष कहते हैं। ऐसे परिवार दृढ़ता से मानते हैं कि चूँकि कन्या अभी दूसरे गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। को दान नहीं की गई, दूसरे घर में उसका विवाह नहीं हुआ, जिस कुल की वृद्धि के लिए भगवान-भगवती ने उसे जन्म दिया वहाँ वह अभी नहीं गई, तो हम अपने घर में उसे देवता का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। देकर अपने ही देवी-देवता को कुंठित नहीं कर सकते, दूसरा दोष नहीं दे सकते। इसीलिए मना किया जाता है, और कन्याओं को भी प्रसाद नहीं दिया जाता।
विशेष स्थिति: अनियंत्रित स्थापित शक्ति का कन्याओं और वधुओं को कष्ट देना
गलती से घर में रखी कामुक अभिचार शक्ति; कन्याएँ "खेलती" हैं, वधुएँ रोकी जाती हैं, परिवार पूर्वज की गलती में फँसा
वक्ता कहते हैं कि किसी-किसी घर में — अपवाद स्वरूप, नियम नहीं — कोई थोड़ी अनियंत्रित शक्ति स्थापित है: जो काम-रूप से बहुत अमर्यादित रही, अभिचार में चली, और गलती से या किसी भगतवाल साधक के कहने पर घर में स्थान दे दी गई। वहाँ दोष लगने की संभावना अधिक है: दोष कन्याओं पर लगता है, वे "खेलने" लगती हैं (शक्ति उन पर आने लगती है) और तकलीफ़ पाती हैं, और विवाह करके आई वधुओं को भी वहाँ जाने की मनाही होती है। ऐसा परिवार पूर्वज की गलती के कारण एक तरह से फँस जाता है, बिना उस जानकारी के कि शक्ति को नियंत्रित कैसे करें, और कभी-कभी उसे कारण ही पता नहीं होता।
वक्ता एक और प्रसंग जोड़ते हैं जो, वे चेताते हैं, थोड़ा आहत करने वाला लग सकता है। किसी-किसी घर में स्थापित शक्ति थोड़ी अनियंत्रित होती है — वहाँ कोई ऐसी शक्ति रही होगी जो काम-रूप से बहुत अमर्यादित रही, और अभिचार में चली, और इन लोगों ने गलती से या किसी भगतवाल साधक के कहने-सुनने पर उसे घर में स्थान दे दिया। वहाँ इस दोष के लगने की संभावना अधिक होती है: कन्याओं पर दोष लग जाता है, वे 'खेलने' लगती हैं — शक्ति उन पर आने लगती है — और तकलीफ़ शुरू हो जाती है; और वधुओं को भी, जो विवाह करके आई हैं, वहाँ जाने की मनाही होती है। एक तरह से, वे कहते हैं, ऐसे लोग लगभग फँस चुके होते हैं। यह केस 100% नहीं है — इसे अपवाद मानिए, जहाँ किसी गलती के कारण ऐसा हो रहा है। वहाँ भी जानकारी की कमी है: उन्हें पूरी जानकारी नहीं है या वे बदल नहीं पा रहे — कैसे नियंत्रण करें, क्या करें — और अपने पूर्वजों की गलती के कारण वे वहाँ बँध जाते हैं, और ऐसी स्थिति बन जाती है। कहीं-कहीं तो शुरू से उन्हें कारण ही पता नहीं होता।
कुलवधू को कुलदेवी-कुल देवता की पूजा से कभी नहीं रोका जाता
वधू कुल में आ गई तो स्थापित शक्ति जो भी हो, उसे उसके प्रति मर्यादा रखनी है
वक्ता ज़ोर देते हैं कि कुलवधू के लिए कभी भी, कहीं भी अपने कुलदेवी-कुल देवता की पूजा का निषेध नहीं है — वधू पूजा क्यों न करे? वह बिल्कुल करेगी। स्थापित शक्ति जो भी हो, जब वधू कुल में आ गई, तो अब यह मर्यादा उस शक्ति को रखनी है: ये हमारी बेटी हैं, कुल की वृद्धि के लिए आई हैं, इसलिए शक्ति को उनके प्रति मर्यादित रहना है। जो परिवार वधुओं को रोकते हैं, वह उनकी अपनी जानकारी की कमी है, और उसके कारण उन्हें गाहे-बगाहे भुगतना भी पड़ता है, जिसे वे कभी समझ नहीं पाते।
वक्ता ज़ोर देते हैं कि कुल वधूपरिवार की बहू या घर की गृहिणी — परंपरागत रूप से मुख्य द्वार की चौखट को स्वच्छ रखने व प्रतिदिन सिर ढककर सजाने की जिम्मेदार होती है। के लिए कभी भी, कहीं भी निषेध नहीं है। वधू पूजा क्यों न करे? वह अपनी कुलदेवी और कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। की पूजा बिल्कुल करेगी। शक्ति कोई भी हो, वे कहते हैं, जब वधू कुल में आ गई, तो अब यह मर्यादा उस शक्ति को रखनी है: ये हमारी बेटी हैं, कुल की वृद्धि के लिए आई हैं, तो शक्ति — जो भी हो — उनके प्रति मर्यादित रहेगी। जहाँ परिवार वधुओं को पूजा नहीं करने देते या रोककर रखते हैं, वह उनकी अपनी जानकारी की कमी है, और उसके कारण उन्हें गाहे-बगाहे भुगतना भी पड़ता है, जिसे वे कभी समझ नहीं पाते।
कुल शक्ति का भोग परिवार तक सीमित रखें और बच्चों को समय रहते ज्ञान दें
सीमित, गुप्त आदान-प्रदान; धर्म का मध्यम ज्ञान — न केवल डांस-गिटार, न इतना वेदांत कि मानें ही नहीं
वक्ता निष्कर्ष देते हैं कि शक्तियों के भोग का इस तरह आदान-प्रदान नहीं होना चाहिए, या सीमित मात्रा में ही; इन सब चीज़ों को गुप्त रखकर अपने परिवार तक सीमित रखना चाहिए और यह ज्ञान अपने वंशजों को देना चाहिए। वे माता-पिता से कहते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में बच्चों को केवल डांस और गिटार पर न पालें, बल्कि उन्हें धर्म का और अपने कुल के देवी-देवताओं का ज्ञान दें — और इतना वेदांत भी न पढ़ा दें कि वे इन सब चीज़ों को मानना ही छोड़ दें, क्योंकि दोनों ही तरफ़ दिक्कत होगी। समय रहते मध्यम स्तर का ज्ञान दें, वे कहते हैं, न कि आज की तरह जब कष्ट हो तब वे खोजना शुरू करें।
वक्ता निष्कर्ष देते हैं कि शक्तियों के भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। का इस तरह आदान-प्रदान नहीं होना चाहिए, नहीं करना चाहिए — या सीमित मात्रा में, सीमित तरीके से रखना चाहिए। इन सारी चीज़ों को गुप्त रखकर अपने परिवार तक सीमित रखना चाहिए और यह ज्ञान अपने वंशजों को देना चाहिए। आपके जो भी बच्चे हों, वे कहते हैं, आधुनिकता की दौड़ में उन्हें केवल डांस करवाकर और अफलातून मत बनाइए कि गिटार बजाना सीख लो, यह कर लो, वह कर लो; साथ में उन्हें धर्म का और अपने कुल की तरफ़ का ज्ञान भी दीजिए। और दूसरी ओर इतना वेदांत भी न पढ़ा दीजिए कि वे इन सब चीज़ों को मानें ही नहीं। दोनों ही तरह से दिक्कत होगी। उन्हें अपने कुल के देवी-देवताओं का मध्यम स्तर का ज्ञान समय रहते दीजिए। ऐसा न हो कि जब कष्ट हो तब वे ढूँढना शुरू करें — जैसा अभी के समय में हो रहा है कि जब कष्ट हो रहा है तब खोज रहे हैं। यह भी नहीं होना चाहिए। वे यह आशा करते हुए समापन करते हैं कि जब श्रोता इन विषयों को सही तरीके से जानकर जीवन में लागू करेंगे और अपने बच्चों को यह ज्ञान देंगे, तो कुल परंपरा का अच्छे से निर्वहन होगा और वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा पूरी कर भगवती के लोक में निवास करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।