कार्तिकेय जन्म कथा: शिव महापुराण कुमार खंड

शिव महापुराण की रुद्र संहिता के कुमार खंड पर एक प्रवचन, जिसमें बताया गया है कि भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म किस प्रकार हुआ, ताकि तारकासुर का — जिसका वध केवल शिव के पुत्र से ही संभव था — नाश हो सके। इसमें नवविवाहित दंपत्ति के एकांत में विघ्न डालने के विरुद्ध शास्त्रीय विधान और उसे तोड़ने पर दंड भोगने वाले पौराणिक पात्र; देवताओं द्वारा शिव और पार्वती के एकांत में हुआ व्यवधान, शिव द्वारा अपने तेज का त्याग, और पार्वती द्वारा देवताओं तथा अग्नि को दिया गया शाप; उस तेज का सप्तऋषियों की पत्नियों, हिमालय और गंगा से होते हुए सरकंडे के वन तक पहुँचना, जहाँ कार्तिकेय का जन्म हुआ; कृत्तिकाओं का दुग्धपान करने से प्रकट हुए उनके छह मुख, इंद्र के वज्र से उत्पन्न उनके चार रक्षक स्वरूप, कैलाश पर हुआ राज्याभिषेक और देवताओं द्वारा प्रदत्त अस्त्र, यज्ञीय अज की कथा, तथा उनकी उपासना के फल — सब सम्मिलित हैं।

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The notes
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01

शिव महापुराण श्रवण से पाप नाश क्यों

शिव महापुराण सुनने से पाप नष्ट क्यों होते हैं, और वह प्रभावी किससे बनता है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:00–04:56 · Also a question

शिव महापुराण के माहात्म्य के अनुसार उसका पाठ, वाचन अथवा श्रवण शिवलोक में निवास दिलाता है और पूर्व पापों का नाश करता है — किंतु यह फल तभी मिलता है जब श्रवण से सच्चा आत्मचिंतन और आचरण सुधार हो, केवल निष्क्रिय सुन लेने से नहीं।

जीवन केवल सुख और दुख नहीं है — सनातन परंपरा में जन्मे लोगों के लिए पुराण कथाओं में निहित ज्ञान को समझना आवश्यक है, क्योंकि पुराण उन विषयों की चर्चा करते हैं जिन पर समाज में खुलकर बात कम ही होती है। जैसा कि शिव पुराण के अपने माहात्म्य में कहा गया है, इस शास्त्र का पाठ, वाचन या श्रवण शिव लोक में निवास दिलाता है और जीवन भर संचित पापों का नाश करता है। यह परिवर्तन स्वतः नहीं होता: यह तभी होता है जब श्रवण से आत्मचिंतन जागे, अपनी पूर्व भूलों की ईमानदार पहचान हो और उसके बाद आचरण सुधरे — न कि तब, जब पाठ को केवल मनोरंजन मान लिया जाए।

02

दंपति के एकांत में विघ्न का दंड

नवविवाहित दंपत्ति के एकांत में विघ्न डालने वाले के लिए शास्त्रों में क्या दंड बताया गया है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:57–10:30 · Also a question

शिव महापुराण में भगवान विष्णु के उपदेश के अनुसार, नवविवाहित दंपत्ति के एकांत में जान-बूझकर विघ्न डालना — शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से अथवा तंत्र-मंत्र द्वारा — अपने ही जीवनसाथी और संतान से वियोग, विद्या तथा यश का नाश, दरिद्रता, और कालसूत्र नरक में एक लाख वर्ष का वास कराता है।

जब देवगण भगवान शिव और देवी पार्वती के एकांत की प्रतीक्षा करते-करते व्याकुल हो उठे, तब भगवान विष्णु ने उन्हें एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय नियम की चेतावनी दी: नवविवाहित दंपत्ति के एकांत में विघ्न डालना अथवा उनके शृंगार-रस की सहज मर्यादा भंग करना गंभीर दंड का कारण बनता है। चाहे वह शारीरिक व्यवधान हो, मानसिक उत्पीड़न हो, अथवा कलह उत्पन्न करने के लिए किया गया तंत्र-मंत्र — ऐसा करने वाला आगामी जन्मों में अपने ही जीवनसाथी और संतान से वियोग, आध्यात्मिक ज्ञान तथा यश का नाश, दरिद्रता, और अंततः कालसूत्रपुराणों में वर्णित एक नरक, जो नवविवाहित दंपति के एकांतवास में जानबूझकर विघ्न डालने वालों के लिए बताया गया है। नरक में एक लाख वर्ष का वास भोगता है।

03

इसके भोगी पौराणिक पात्र और उनकी मुक्ति

किन पौराणिक पात्रों को दंपत्ति के एकांत में विघ्न डालने का दंड भोगना पड़ा, और उन्हें मुक्ति कैसे मिली?

· Reviewed Sep 2026 · 10:31–12:55

महर्षि दुर्वासा, कामदेव और बृहस्पति, महर्षि गौतम तथा चंद्र, और राजा हरिश्चंद्र एवं महर्षि विश्वामित्र — सभी को इस अपराध के कारण पत्नी, संतान अथवा राज्य से वियोग भोगना पड़ा, और इनमें से प्रत्येक को मुक्ति केवल भगवान शिव की भक्तिपूर्ण उपासना से ही मिली।

भगवान विष्णु ने चेतावनी के रूप में इस दंड के ऐतिहासिक उदाहरण दिए: महर्षि दुर्वासा ने ऐसा कर्म किया और उन्हें अपनी पत्नी तथा पुत्री से वियोग भोगना पड़ा; कामदेव और बृहस्पति ने एक दंपत्ति के बीच विघ्न डाला, जिसके फलस्वरूप बृहस्पति ने अपनी पत्नी खो दी और दंड पाया; चंद्रदेव महर्षि गौतम की पत्नी की ओर आकृष्ट हुए और गौतम के हस्तक्षेप पर उन्हें भी वियोग सहना पड़ा; और राजा हरिश्चंद्र से अनजाने में ऐसा व्यवधान हो गया जिससे महर्षि विश्वामित्र कुपित हुए, और उन्हें अपना राज्य, पत्नी तथा पुत्र गँवाना पड़ा। इन सभी को अंततः मुक्ति और राहत केवल भगवान शिव की भक्तिपूर्ण उपासना से ही प्राप्त हुई — शिक्षा यह है कि जो कोई सृष्टि की स्वाभाविक गति में बाधा डालता है, वह चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, दंड अवश्य पाता है।

04

शिव ने तेज क्यों छोड़ा, धारण किसने किया

भगवान शिव ने अपना तेज क्यों छोड़ा, और उसे कौन धारण कर सका?

· Reviewed Sep 2026 · 12:56–16:24

देवताओं के तारकासुर को लेकर किए गए विलाप और प्रार्थनाओं ने अंततः भगवान शिव का पार्वती के साथ एकांत भंग कर दिया; क्रुद्ध होकर उन्होंने अपना दिव्य तेज पृथ्वी पर छोड़ दिया और कहा कि जो इसे धारण कर सके, वह करे — और केवल अग्निदेव ही कपोत का रूप धारण कर उसे ग्रहण कर सके।

शिव और पार्वती का मिलन जैसे-जैसे चलता रहा, सृष्टि का भार बढ़ता गया और भगवान विष्णु का कूर्म स्वरूप तथा दिशाओं की वायु तक स्थिर हो गए। तारकासुर — वह असुर जिसका वध केवल शिव के तेज से उत्पन्न पुत्र ही कर सकता था — की चिंता से व्याकुल होकर देवगण और भगवान विष्णु कैलाश पर्वत पहुँचे और द्वार पर विलाप तथा प्रार्थना करने लगे। इस कोलाहल से भगवान शिव बाहर आए; उनकी प्रार्थना सुनकर और असमय हुए व्यवधान से क्रुद्ध होकर उन्होंने अपना तेजोमय तेजदिव्य तेजस्विता या तेजोमय शक्ति — यहां भगवान शिव का वह तेज, जो अंततः कार्तिकेय के रूप में प्रकट हुआ। पृथ्वी पर छोड़ दिया और पूछा कि इनमें से कौन इसे धारण कर सकता है। केवल अग्निदेव ही कपोत का रूप धारण कर पृथ्वी पर गिरे उस तेज को अपनी चोंच में समेट सके।

05

पार्वती ने देवों और अग्नि को शाप क्यों दिया

देवी पार्वती ने देवताओं और अग्नि को शाप क्यों दिया?

· Reviewed Sep 2026 · 16:25–17:59

इस बात से क्रुद्ध होकर कि शिव का तेज उनके गर्भ में जाने के बजाय पृथ्वी पर गिर गया, पार्वती ने देवताओं की पत्नियों को बंध्या होने का शाप दिया, और अग्नि को शाप दिया कि वे सर्वभक्षी हो जाएँगे तथा अज्ञानवश उस तेज को ग्रहण करने के कारण सदैव दाहजनित पीड़ा भोगेंगे।

जब देवी पार्वती बाहर आईं और सब कुछ देखा, तो शिव के साथ अपने एकांत में हुए व्यवधान से वे अत्यंत क्रुद्ध हुईं। चूँकि वह दिव्य तेजदिव्य तेजस्विता या तेजोमय शक्ति — यहां भगवान शिव का वह तेज, जो अंततः कार्तिकेय के रूप में प्रकट हुआ। उनके अपने गर्भ में जाने के बजाय पृथ्वी पर गिर गया था, उन्होंने समस्त देवताओं को शाप दिया कि उनकी पत्नियाँ बंध्या रहेंगी। अग्नि को उन्होंने विशेष रूप से शाप दिया: उस दिन से वे सर्वभक्षी हो जाएँगे और निरंतर दाहजनित पीड़ा भोगेंगे, क्योंकि उन्होंने देवताओं के कहने पर मूर्खतावश, शिव तत्व का यथार्थ ज्ञान न रखते हुए, वह तेज ग्रहण किया। इसके बाद वे भगवान शिव के साथ अपने दिव्य धाम लौट गईं।

06

तेज की यात्रा शर वन तक

शिव का तेज अग्नि से होकर सप्तऋषियों की पत्नियों के माध्यम से उस सरकंडे के वन तक कैसे पहुँचा जहाँ कार्तिकेय का जन्म हुआ?

· Reviewed Sep 2026 · 18:00–24:36

दाह सहन न कर पाने पर अग्नि ने वह तेज माघ मास में स्नान करती सप्तऋषियों की छह पत्नियों में स्थापित कर दिया; गर्भवती होने पर पतियों द्वारा त्याग दिए जाने पर उन छहों ने वह गर्भ हिमालय पर छोड़ दिया, हिमालय ने उसे गंगा को सौंपा, और गंगा ने अंततः उसे सरकंडे के वन में रख दिया — जहाँ वह बालक कार्तिकेय के रूप में प्रकट हुआ।

चूँकि देवताओं को हविष्य अग्नि के मुख से ही प्राप्त होता है, अग्नि द्वारा ग्रहण किए गए उस तेज से समस्त देवताओं में असह्य ताप और सूजन उत्पन्न हो गई, और कोई उसे सहन न कर सका। भगवान शिव के आदेश पर, कि जो धारण न हो सके उसे त्याग दिया जाए, वह मुक्त हुई ऊर्जा आकाश को छूते स्वर्णमय पर्वत के रूप में प्रकट हुई, किंतु अग्नि का दाह फिर भी शांत न हुआ। महर्षि नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। की सलाह मानकर अग्नि ने वह तेजदिव्य तेजस्विता या तेजोमय शक्ति — यहां भगवान शिव का वह तेज, जो अंततः कार्तिकेय के रूप में प्रकट हुआ। किसी उत्तम गुणों वाली स्त्री में स्थापित करना चाहा, और माघ मास की एक शीत प्रातः स्नान करती सप्तऋषियों की छह पत्नियों में उसे स्थापित कर दिया — केवल माता अनसूया को छोड़कर, और माता अरुंधती की चेतावनी के बावजूद। दाह से मुक्त होकर अग्नि चले गए, किंतु वे छहों पत्नियाँ अत्यंत पीड़ित हो उठीं और उस दिव्य ऊर्जा से गर्भवती हो गईं; वस्तुस्थिति न समझ पाने के कारण उनके पतियों ने क्रुद्ध होकर उनका त्याग कर दिया। उस तीव्रता को सह न पाने पर उन छहों ने वह गर्भ हिमालय की चोटियों पर छोड़ दिया, हिमालय ने उसे पवित्र गंगा को सौंप दिया — और गंगा भी उसे धारण न कर सकीं, अतः उन्होंने अपनी लहरों द्वारा उसे सरकंडे के वन में रख दिया, जहाँ वह एक तेजस्वी बालक के रूप में प्रकट हुआ: भगवान कार्तिकेय

07

कार्तिकेय का जन्म दिवस और उसके प्रभाव

भगवान कार्तिकेय का जन्म किस तिथि को हुआ, और जन्म के समय क्या हुआ?

· Reviewed Sep 2026 · 24:37–25:24 · Also a question

भगवान कार्तिकेय मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रकट हुए, जिससे तीनों लोकों में मंगल छा गया और असुरों के लोकों में उथल-पुथल मच गई।

भगवान कार्तिकेय मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पृथ्वी पर प्रकट हुए। उनके जन्म से तीनों लोकों में मंगल का संचार हुआ और विशेष रूप से असुरों के लोकों में उथल-पुथल उत्पन्न हो गई।

08

विश्वामित्र कार्तिकेय के पुरोहित क्यों बने

क्षत्रिय कुल में जन्मे होने पर भी महर्षि विश्वामित्र भगवान कार्तिकेय के पुरोहित कैसे बने?

· Reviewed Sep 2026 · 25:25–27:35 · Also a question

जब नवजात कार्तिकेय ने राजा गाधि के पुत्र, जन्म से क्षत्रिय विश्वामित्र से अपने वैदिक संस्कार कराने और पुरोहित बनने को कहा, तब कार्तिकेय ने दिव्य आदेश से उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित किया, और बाद में दिव्य ज्ञान देकर उन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित कर दिया।

महर्षि विश्वामित्र सरकंडे के वन में पहुँचे और नवप्रकट बालक को देखकर उन्होंने प्रणाम किया। बालक ने विश्वामित्र से कहा कि वे वैदिक परंपरा के अनुसार उनके संस्कार संपन्न करें और उनके पुरोहित बनें। जब विश्वामित्र ने कहा कि वे जन्म से क्षत्रिय (राजा गाधि के पुत्र) हैं, ब्राह्मण नहीं, तब बालक ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए दिव्य आदेश से ब्रह्मर्षि घोषित कर दिया। तब विश्वामित्र ने बालक के समस्त वैदिक संस्कार संपन्न किए, और कार्तिकेय ने बदले में उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान कर श्रेष्ठ ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित किया।

09

चार वीर और उनके नामों का नित्य स्मरण

शाखा, विशाखा, नैगम और स्कंद नामक चार वीर कैसे प्रकट हुए, और उनके नामों का नित्य स्मरण क्यों किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 27:36–30:13 · Also a question

जब कार्तिकेय ने अकेले ही आक्रमण करती असुर सेना का नाश कर दिया, तो चकित इंद्र ने उन पर वज्र का प्रहार किया — दाहिने भाग, बाएँ भाग और वक्ष पर हुए प्रहारों से क्रमशः शाखा, विशाखा और नैगम नामक वीर प्रकट हुए; इन चारों नामों का नित्य स्मरण पूर्ण रक्षा देने वाला कहा गया है।

अग्निदेव दस पद्म असुर योद्धाओं की सेना के साथ सरकंडे के वन में पहुँचे, जिन्होंने उस शिशु पर आक्रमण करने का प्रयास किया। कार्तिकेय ने एक ही प्रहार में संपूर्ण असुर सेना का नाश कर दिया। इस सामर्थ्य को देखकर इंद्र ने बालक को संकट समझ लिया और उनके दाहिने भाग पर अपना वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। चला दिया। उस दाहिने भाग के प्रहार से शाखा नामक वीर प्रकट हुआ; बाएँ भाग के प्रहार से विशाखा; और वक्ष पर हुए प्रहार से नैगम प्रकट हुआ। स्कंद सहित ये चारों महाबली इंद्र की ओर बढ़े, और इंद्र भयभीत होकर भागे तथा शरण माँगी। शास्त्र कहते हैं कि इन चारों नामों — स्कंद, शाखा, विशाखा और नैगम — का नित्य स्मरण पूर्ण रक्षा प्रदान करता है।

10

कार्तिकेय के छह मुख क्यों

भगवान कार्तिकेय के छह मुख क्यों हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 30:14–36:34 · Also a question

जब छह दिव्य कन्याओं, कृत्तिका, में से प्रत्येक ने उस नवजात बालक को अपना पुत्र मानकर स्तनपान कराने की इच्छा की, तो कार्तिकेय ने छह मुख प्रकट कर लिए ताकि वे एक साथ छहों का दुग्धपान कर सकें — यही उनके षडानन नाम का कारण है।

कृत्तिकाछह देव-कन्याएं जिन्होंने बालक कार्तिकेय को अपने पुत्र के समान पाला और स्तनपान कराया। नाम की छह दिव्य कन्याएँ स्नान करने आईं और उन्हें वह बालक मिला। उनमें से प्रत्येक ने उसे अपना पुत्र मानकर गोद लेने की इच्छा की, अतः छहों को एक साथ संतुष्ट करने के लिए कार्तिकेय ने छह मुख प्रकट कर लिए (इसीलिए उनका नाम षडाननकार्तिकेय का एक नाम, 'षडानन' अर्थात 'छह मुख वाला' — यह रूप उन्होंने एक साथ छहों कृत्तिकाओं से स्तनपान करने हेतु धारण किया। पड़ा) और छहों माताओं का एक साथ दुग्धपान किया। इसके बाद वे कृत्तिकाओं के साथ उनके लोक गए, जहाँ उन्होंने अत्यंत स्नेह से उनका पालन किया और उन्हें दिव्य वस्त्र तथा आभूषण दिए।

11

राज्याभिषेक पर प्राप्त अस्त्र

कैलाश पर्वत पर हुए राज्याभिषेक में देवताओं ने कार्तिकेय को कौन से अस्त्र और शक्तियाँ प्रदान कीं?

· Reviewed Sep 2026 · 36:35–48:57 · Also a question

कैलाश पर्वत पर हुए विधिवत राज्याभिषेक में देवताओं ने कार्तिकेय को अपने सर्वश्रेष्ठ अस्त्र और शक्तियाँ अर्पित कीं — विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल और पाशुपतास्त्र, ब्रह्मा के वेद और ब्रह्मास्त्र, तथा इंद्र का ऐरावत और वज्र — और उसके बाद विष्णु ने उन्हें विधिवत ब्रह्मांड का आधिपत्य सौंपा।

जब सृष्टि के साक्षियों (पृथ्वी, अग्नि, हिमालय, गंगा और अन्य) ने भगवान शिव तथा देवी पार्वती को यह पुष्टि दी कि उनके पुत्र का पालन कृत्तिकाछह देव-कन्याएं जिन्होंने बालक कार्तिकेय को अपने पुत्र के समान पाला और स्तनपान कराया। कर रही हैं, तब उन्हें कैलाश पर्वत पर घर लाने के लिए एक भव्य यात्रा भेजी गई। वहाँ स्वर्ण कलशों में भरे तीर्थ जल से विधिवत राज्याभिषेक और अभिषेक संपन्न हुआ, और प्रत्येक देवता ने कार्तिकेय को अपनी सर्वश्रेष्ठ शक्तियाँ तथा अस्त्र अर्पित किए:

देवताप्रदत्त उपहार
विष्णुमुकुट, आभूषण, वैजयंती माला और सुदर्शन चक्र
शिवत्रिशूल, पिनाक धनुष, परशु, शक्ति, पाशुपतास्त्रभगवान शिव का सर्वोच्च, अजेय अस्त्र, जो समस्त सृष्टि का विनाश करने में सक्षम है। और परम दिव्य ज्ञान
ब्रह्मायज्ञोपवीत, वेद, गायत्री मंत्र, कमंडलु, ब्रह्मास्त्रतांत्रिक व पौराणिक कथाओं का सर्वोच्च व अंतिम अस्त्र — किसी अद्वितीय व निर्णायक शक्ति वाले प्रयोग या विद्या हेतु प्रतीकात्मक रूप से प्रयुक्त। और विजय दिलाने वाला ज्ञान
इंद्रऐरावत (हाथी) और वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। (वज्र)
वरुणपाश, मोतियों की माला और श्वेत छत्र
सूर्यदिव्य रथ और कवच
यमराजयमदंड (न्याय का दंड)
चंद्रअमृत का पात्र
अग्निमहान दिव्य शक्ति (महाशक्ति)
वायुवायव्यास्त्र
कुबेरगदा
कामदेवकामास्त्र तथा आकर्षण और वशीकरण की विद्याएँ
हिमालयदिव्य वस्त्र और रत्न
गरुड़देव का वंशमयूर चित्रबर्हण (वाहन के रूप में) और युद्ध-कुक्कुट ताम्रचूर्ण

विश्वकर्मा द्वारा उनके लिए एक भव्य नगर के निर्माण के पश्चात भगवान विष्णु ने विधिवत रूप से कार्तिकेय को संपूर्ण ब्रह्मांड का आधिपत्य सौंपा, और भगवान शिव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उन्हें तारकासुर के विरुद्ध देव सेना का नेतृत्व करने की अनुमति दी।

12

पवित्र अज की कथा

भगवान कार्तिकेय को समस्त ब्रह्मांड में ले जाने वाले उस पवित्र अज की कथा क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 52:50–57:56

जब अजमेध यज्ञ के लिए रखा गया एक ब्राह्मण का अज भागकर वैकुंठ में उत्पात मचाता हुआ मिला, तब कार्तिकेय उस पर सवार हुए और वह अज संपूर्ण ब्रह्मांड का भार लेकर एक ही क्षण में समस्त लोकों की परिक्रमा कर आया — तब कार्तिकेय ने कहा कि इस पशु का वध न किया जाए, और अपनी कृपा से यज्ञ की पूर्णता का आश्वासन दिया।

नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। नामक एक ब्राह्मण (जो कर्मकांडी थे, देवर्षि नारद से भिन्न) कार्तिकेय के पास तब आए, जब अजमेध यज्ञ के लिए रखा गया उनका अज बंधन तोड़कर भाग गया और उनके अनुष्ठान की पूर्णता संकट में पड़ गई। कार्तिकेय ने अपने सेनापति वीरबाहु को भेजा, जिन्होंने उस बलशाली अज को वैकुंठ में उत्पात मचाते हुए पाया और उनके समक्ष ले आए। कार्तिकेय उस अज पर सवार हुए, और वह संपूर्ण ब्रह्मांड का भार वहन करते हुए एक ही क्षण में समस्त लोकों की परिक्रमा कर लौट आया। तब उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि इस अज का वध नहीं किया जाना चाहिए, किंतु उन्हें आश्वासन दिया कि उनका यज्ञ उनकी दिव्य कृपा से पूर्ण रूप से सफल होगा।

13

कार्तिकेय उपासना का फल

भगवान कार्तिकेय की उपासना और उनके जन्म प्रसंग के श्रवण से क्या लाभ होते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 57:57–1:01:30 · Also a question

कार्तिकेय की उपासना और उनके जन्म प्रसंग का श्रवण साधना के विघ्नों को दूर करता है, मंगल दोष को शांत करता है, संतानहीन दंपत्तियों को श्रेष्ठ संतान देता है, और उनकी शक्ति देवसेना (षष्ठी देवी) के द्वारा 13 वर्ष तक के बालकों की रक्षा करता है।

भगवान कार्तिकेय का प्राकट्य विशेष रूप से दुर्धर्ष शत्रुओं और विघ्नों के नाश के लिए हुआ। कार्तिकेय की उपासना और उनके दिव्य जन्म प्रसंग का श्रवण यज्ञ आदि साधनाओं के विघ्नों को दूर करता है, मंगल दोष (मंगल से संबंधित ज्योतिषीय दोष) को शांत करता है, संतानहीन दंपत्तियों को श्रेष्ठ संतान देता है, और उनकी दिव्य शक्ति देवसेना (जिन्हें षष्ठी देवी भी कहा जाता है) के द्वारा बालकों की रक्षा करता है, जो 13 वर्ष की आयु तक बालकों की रक्षा करती हैं। कार्तिकेय समस्त बाह्य और आंतरिक शत्रुओं का नाश कर अपने भक्तों को विजय, आध्यात्मिक उन्नति और रक्षा प्रदान करते हैं।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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