कार्तिक मास में पाप से मुक्ति के सात कार्य
कार्तिक मास में बाधाओं और पापों के शमन के लिए करने योग्य सात कार्य।
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कार्तिक मास के सात कार्य
बाधाएँ शांत, नारायण की कृपा से उन्नति
वक्ता कहते हैं कि पूरे कार्तिक मास में यथासंभव यथाशक्ति सात कार्य करने चाहिए: भोर का स्नान, गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप, तुलसी सेवा, दीपदान, सात्त्विक वैष्णव भोजन, दान, और किसी जरूरतमंद की सहायता। वे कहते हैं कि इन सात कार्यों को करने मात्र से जीवन में आ रही अनेक बाधाओं का शमन हो जाता है और परम विष्णु, परम नारायण की कृपा से मनुष्य उन्नति के मार्ग पर चल पड़ता है। हर कार्य पर इस पृष्ठ पर अलग नोट है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि परम पवित्र कार्तिक के महीने में सात कार्य हैं जो सभी को यथासंभव, यथाशक्ति अवश्य करने चाहिए। वे कहते हैं कि इन सात कार्यों को करने मात्र से जीवन में आ रही अनेक बाधाओं का शमन हो जाता है और परम विष्णु, परम नारायण की कृपा से मनुष्य उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त होता है। उनके क्रम में सातों कार्य हैं: सूर्योदय से पूर्व स्नान; गुरु से प्राप्त मंत्र का जप, जिसमें मास भर में सवा लाख के अनुष्ठान का लक्ष्य हो; भगवती तुलसी की सेवा; घर के पूज्य स्थानों पर दीपदान; पूर्णतः सात्त्विक, वैष्णव भोजन; सप्ताह के कम से कम एक निश्चित दिन दान, जिसमें अन्नदान सर्वश्रेष्ठ है; और किसी व्यक्ति को उसकी आवश्यकता की वस्तु में सहायता। अंत में वे कहते हैं कि आशा है सातों बातें ठीक से समझ में आई होंगी, और पूरे कार्तिक मास में प्रतिदिन यथासंभव यथाशक्ति इन सातों को करने का प्रयास करना चाहिए।
कार्तिक मास में भोर का स्नान
तारों की छाँव में, संभव हो तो नदी में
वक्ता कहते हैं कि सूर्योदय से पूर्व, तारों की छाँव रहते हुए किया गया स्नान पूरे कार्तिक मास का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। बहते जल में, यानी नदी में, किया गया यह स्नान अक्षय पुण्य देने वाला कहा गया है। नदी तक न पहुँचा जा सके तो पवित्र नदियों के नामों का स्मरण करते हुए घर पर ही स्नान कर लिया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि इस मास में करने योग्य सभी कार्यों में सूर्योदय से पूर्व, तारों की छाँव रहते हुए किया गया स्नान सबसे अधिक महत्व रखता है। वे कहते हैं कि कार्तिक में इस समय बहते जल में — अर्थात् नदी में जाकर — किया गया स्नान अक्षय पुण्य देने वाला माना गया है। जहाँ नदी तक जाना संभव न हो, वहाँ वे कहते हैं कि घर पर ही पवित्र नदियों के नामों का स्मरण करते हुए स्नान कर लेना चाहिए।
कार्तिक मास में गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप
मास भर में सवा लाख का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि स्नान के पश्चात पूजन कक्ष में देवी-देवताओं के निमित्त दीपक जलाकर उसके सम्मुख बैठना चाहिए; यदि गुरु से दीक्षा में मंत्र प्राप्त हुआ है तो उस मंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए, भले ही अन्य मासों में जप न चलता हो। लक्ष्य, वे कहते हैं, यह है कि मास भर में उस मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान पूरा हो जाए, और यह जप भोर में स्नान के तुरंत बाद हो।
वक्ता कहते हैं कि स्नान के पश्चात पूजन कक्ष में लौटकर वहाँ उपस्थित सभी देवी-देवताओं के निमित्त दीपक जलाना चाहिए — या कम से कम एक प्रमुख दीपक — और उसके सम्मुख बैठना चाहिए। वे कहते हैं कि अन्य मासों में कोई पूजन-पाठ करता हो या न करता हो, कार्तिक में यदि वह गुरु-दीक्षित है (दीक्षा) और उसे अपने गुरु से मंत्र प्राप्त हुआ है, तो उस मंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए। वे कहते हैं कि प्रयास यह होना चाहिए कि पूरे मास में उस मंत्र का सवा लाख (1,25,000 आवृत्ति) का एक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। पूर्ण हो जाए, और यह जप भोर में, स्नान के तुरंत बाद सुबह-सुबह ही चलना चाहिए।
कार्तिक मास में तुलसी सेवा
प्रातः जल, संध्या दीप
वक्ता कहते हैं कि भगवती तुलसी की सेवा कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख कार्य है: पूरे मास प्रातःकाल तुलसी को जल दिया जाता है और संध्या के समय उनके सम्मुख दीप जलाया जाता है। इस मास में वे इसे अति आवश्यक बताते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पूरे कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख कार्य भगवती तुलसी के निमित्त सेवा है। वे कहते हैं कि इस मास में प्रातःकाल जल देना और संध्या के समय तुलसी जी के सम्मुख दीप प्रज्वलित करना अति आवश्यक होता है।
कार्तिक मास में दीपदान: दीपक कहाँ-कहाँ जलाए जाते हैं
केवल देवताओं के निमित्त नहीं
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में दीपदान केवल देवताओं के निमित्त ही नहीं, बल्कि हर उस पूज्य वस्तु के पास किया जाता है जिसका जीवन में बहुत महत्व है: अन्न का भंडार, धन रखने का स्थान, ओखल-मूसल और सिलबट्टा, जल रखने का स्थान, घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर, तथा तुलसी, शमी, बिल्व या आम के वृक्ष के पास। तेल तिल का, सरसों का या घी, जो सामर्थ्य में हो; महत्व दीप के जलने का है।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास का चौथा प्रमुख कार्य दीपदान है। वे कहते हैं कि यह केवल देवताओं के निमित्त दीप जलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए — हर उस पूज्य वस्तु के निकट दीप प्रज्वलित करना चाहिए जिसका जीवन में बहुत अधिक महत्व है। वे गिनाते हैं: अन्न रखने का स्थान (भंडार); धन रखने का स्थान; घर में ओखल-मूसल और सिलबट्टा, जहाँ ये हों; जल रखने का स्थान; और घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर। वे कहते हैं कि तुलसी का उल्लेख वे कर ही चुके हैं, और जोड़ते हैं कि शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। वृक्ष, बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष या आम के वृक्ष के पास भी, जहाँ ये उपस्थित हों, एक दीपक जलाना चाहिए। वे कहते हैं कि तेल तिल का हो, सरसों का हो या घी हो — जो भी सामर्थ्य में हो — किंतु सबसे अधिक महत्व दीप के प्रज्वलित होने का है।
कार्तिक मास में भोजन: सात्त्विक और वैष्णव
लहसुन, प्याज, मांस नहीं
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ही करना चाहिए, लहसुन-प्याज का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए और मांसाहार से पूर्णतः बचना चाहिए, तभी मास में किए गए अन्य कार्यों का पूरा फल प्राप्त होता है।
कार्तिक मास में दान
प्रतिदिन नहीं; सप्ताह का एक दिन, अन्नदान श्रेष्ठ
वक्ता कहते हैं कि वे प्रतिदिन दान करने को नहीं कह रहे; इसके स्थान पर सप्ताह का कोई एक दिन चुनकर उसी दिन सदैव दान किया जा सकता है, और इसमें अन्नदान अथवा किसी व्यक्ति को उसकी विशेष आवश्यकता की वस्तु से सहायता करना सर्वश्रेष्ठ रूप माने गए हैं।
वक्ता कहते हैं कि छठी बात दान है, किंतु साथ ही यह भी जान लेना चाहिए कि दान कब और किसे करना चाहिए। वे स्पष्ट करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि दान प्रतिदिन ही करना है — सामर्थ्य हो तो कर सकते हैं, अन्यथा सप्ताह का कोई एक दिन चुनकर उसे सदैव दान का दिन बनाया जा सकता है। वे कहते हैं कि दान में अन्नदान सर्वश्रेष्ठ है, और किसी व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता हो उसके निमित्त सहायता करना भी बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है — जिसे वे सातवीं बात के रूप में गिनते हैं।
जरूरतमंद की सहायता: वे पाप जो जप से नहीं, इससे नष्ट होते हैं
सातवाँ कार्य; आशीर्वाद से प्रारब्ध का क्षय
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में किसी जरूरतमंद की सहायता करने से प्राप्त पुण्य अनेक पापों का क्षय करने में समर्थ होता है, और प्राणी मात्र की सेवा से मिले आशीर्वाद से वे पाप भी नष्ट हो जाते हैं जिन्हें पूजन, पाठ और जप अकेले नष्ट नहीं कर सकते; वे जोड़ते हैं कि प्रारब्ध के कुछ फल केवल इसी प्रकार, किसी अन्य प्राणी की सेवा और संतुष्टि से ही भोगकर समाप्त होते हैं।
सातवाँ कार्य, वक्ता कहते हैं, किसी व्यक्ति को जिस वस्तु की उसे सचमुच आवश्यकता है उसमें सहायता करना है। वे कहते हैं कि यदि इस मास में कोई किसी जरूरतमंद की सहायता करता है तो उस कार्य से प्राप्त पुण्य उसके अनेक पापों का क्षय करने में समर्थ होता है। वे जोड़ते हैं कि यह एक विशेष बात जान रखने योग्य है: प्राणी मात्र की सेवा से जो आशीर्वाद प्राप्त होता है, उससे ऐसे अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं जिन्हें केवल पूजन, पाठ या जप से नष्ट नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। वश कुछ ऐसे कार्य हो जाते हैं या कुछ ऐसे फल प्राप्त होने वाले होते हैं जिन्हें सहने की क्षमता व्यक्ति में नहीं बची होती। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, किसी अन्य प्राणी को सहायता पहुँचाकर, उसे संतुष्ट करके और उसका रक्षण करके, उसके आशीर्वाद से ही यह प्रारब्ध नष्ट होता है और अपना कल्याण होता है।
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