कार्तिक मास में पाप से मुक्ति के सात कार्य
कार्तिक मास में बाधाओं और पापों के शमन के लिए करने योग्य सात कार्य।
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कार्तिक मास में भोर का स्नान
सूर्योदय से पूर्व तारों की छाँव में स्नान, और जहाँ नदी तक पहुँचा जा सके वहाँ बहते जल में
वक्ता कहते हैं कि सूर्योदय से पूर्व, भोर के अँधेरे में जब तारे अभी दिखाई दे रहे हों, तब किया गया स्नान पूरे कार्तिक मास का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
वक्ता कहते हैं कि इस मास में करने योग्य सभी कार्यों में सूर्योदय से पूर्व, तारों की छाँव रहते हुए किया गया स्नान सबसे अधिक महत्व रखता है। वे कहते हैं कि कार्तिक में इस समय बहते जल में — अर्थात् नदी में जाकर — किया गया स्नान अक्षय पुण्य देने वाला माना गया है। जहाँ नदी तक जाना संभव न हो, वहाँ वे कहते हैं कि घर पर ही पवित्र नदियों के नामों का स्मरण करते हुए स्नान कर लेना चाहिए।
कार्तिक मास में मंत्र जप और सवा लाख का अनुष्ठान
स्नान के तुरंत बाद जलते दीपक के सम्मुख गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप, और पूरे मास में सवा लाख का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि स्नान के पश्चात पूजन कक्ष में देवी-देवताओं के निमित्त दीपक जलाकर उसके सम्मुख बैठना चाहिए; यदि गुरु से दीक्षा में मंत्र प्राप्त हुआ है तो उस मंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए, भले ही अन्य मासों में जप न चलता हो।
वक्ता कहते हैं कि स्नान के पश्चात पूजन कक्ष में लौटकर वहाँ उपस्थित सभी देवी-देवताओं के निमित्त दीपक जलाना चाहिए — या कम से कम एक प्रमुख दीपक — और उसके सम्मुख बैठना चाहिए। वे कहते हैं कि अन्य मासों में कोई पूजन-पाठ करता हो या न करता हो, कार्तिक में यदि वह गुरु-दीक्षित है (दीक्षा) और उसे अपने गुरु से मंत्र प्राप्त हुआ है, तो उस मंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए। वे कहते हैं कि प्रयास यह होना चाहिए कि पूरे मास में उस मंत्र का सवा लाख (1,25,000 आवृत्ति) का एक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। पूर्ण हो जाए, और यह जप भोर में, स्नान के तुरंत बाद सुबह-सुबह ही चलना चाहिए।
कार्तिक मास में तुलसी की नित्य सेवा
प्रतिदिन प्रातः भगवती तुलसी को जल और संध्या को उनके सम्मुख दीप
वक्ता कहते हैं कि पूरे कार्तिक मास में प्रातःकाल भगवती तुलसी को जल देना और संध्या के समय उनके सम्मुख दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि पूरे कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख कार्य भगवती तुलसी के निमित्त सेवा है। वे कहते हैं कि इस मास में प्रातःकाल जल देना और संध्या के समय तुलसी जी के सम्मुख दीप प्रज्वलित करना अति आवश्यक होता है।
कार्तिक मास में घर के महत्वपूर्ण स्थानों पर दीपदान
कार्तिक मास में दीपदान के लिए दीपक किन-किन स्थानों पर जलाने चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में दीपदान (दीपदान) केवल देवताओं के निमित्त ही नहीं, बल्कि अन्न के भंडार, धन रखने के स्थान, ओखल-मूसल और सिलबट्टे, जल रखने के स्थान, घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर, तथा तुलसी, शमी, बिल्व या आम के वृक्ष के पास भी करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास का चौथा प्रमुख कार्य दीपदान है। वे कहते हैं कि यह केवल देवताओं के निमित्त दीप जलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए — हर उस पूज्य वस्तु के निकट दीप प्रज्वलित करना चाहिए जिसका जीवन में बहुत अधिक महत्व है। वे गिनाते हैं: अन्न रखने का स्थान (भंडार); धन रखने का स्थान; घर में ओखल-मूसल और सिलबट्टा, जहाँ ये हों; जल रखने का स्थान; और घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर। वे कहते हैं कि तुलसी का उल्लेख वे कर ही चुके हैं, और जोड़ते हैं कि शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। वृक्ष, बिल्वबेल वृक्ष की पवित्र लकड़ी, भगवान शिव हेतु बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त। वृक्ष या आम के वृक्ष के पास भी, जहाँ ये उपस्थित हों, एक दीपक जलाना चाहिए। वे कहते हैं कि तेल तिल का हो, सरसों का हो या घी हो — जो भी सामर्थ्य में हो — किंतु सबसे अधिक महत्व दीप के प्रज्वलित होने का है।
कार्तिक मास में सात्विक वैष्णव भोजन
कार्तिक मास में कैसा भोजन करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ही करना चाहिए, लहसुन-प्याज का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए और मांसाहार से पूर्णतः बचना चाहिए, तभी मास में किए गए अन्य कार्यों का पूरा फल प्राप्त होता है।
कार्तिक मास में साप्ताहिक दान और अन्नदान
सप्ताह का एक निश्चित दिन दान के लिए, जिसमें अन्नदान और किसी की विशेष आवश्यकता पूरी करना श्रेष्ठ है
वक्ता कहते हैं कि वे प्रतिदिन दान करने को नहीं कह रहे; इसके स्थान पर सप्ताह का कोई एक दिन चुनकर उसी दिन सदैव दान किया जा सकता है, और इसमें अन्नदान अथवा किसी व्यक्ति को उसकी विशेष आवश्यकता की वस्तु से सहायता करना सर्वश्रेष्ठ रूप माने गए हैं।
वक्ता कहते हैं कि छठी बात दान है, किंतु साथ ही यह भी जान लेना चाहिए कि दान कब और किसे करना चाहिए। वे स्पष्ट करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि दान प्रतिदिन ही करना है — सामर्थ्य हो तो कर सकते हैं, अन्यथा सप्ताह का कोई एक दिन चुनकर उसे सदैव दान का दिन बनाया जा सकता है। वे कहते हैं कि दान में अन्नदान सर्वश्रेष्ठ है, और किसी व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता हो उसके निमित्त सहायता करना भी बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है — जिसे वे सातवीं बात के रूप में गिनते हैं।
सेवा द्वारा पाप का क्षय और प्रारब्ध का नाश
प्राणी मात्र की सेवा उन पापों को क्यों नष्ट कर सकती है जिन्हें पूजन-पाठ और जप नहीं कर पाते?
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में किसी जरूरतमंद की सहायता करने से प्राप्त पुण्य अनेक पापों का क्षय करने में समर्थ होता है, और प्राणी मात्र की सेवा से मिले आशीर्वाद से वे पाप भी नष्ट हो जाते हैं जिन्हें पूजन, पाठ और जप अकेले नष्ट नहीं कर सकते; वे जोड़ते हैं कि प्रारब्ध के कुछ फल केवल इसी प्रकार, किसी अन्य प्राणी की सेवा और संतुष्टि से ही भोगकर समाप्त होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि इस मास में कोई किसी की सहायता करता है — विशेषकर किसी सच्चे जरूरतमंद की — तो उस कार्य से प्राप्त पुण्य उसके अनेक पापों का क्षय करने में समर्थ होता है। वे जोड़ते हैं कि यह एक विशेष बात जान रखने योग्य है: प्राणी मात्र की सेवा से जो आशीर्वाद प्राप्त होता है, उससे ऐसे अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं जिन्हें केवल पूजन, पाठ या जप से नष्ट नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। वश कुछ ऐसे कार्य हो जाते हैं या कुछ ऐसे फल प्राप्त होने वाले होते हैं जिन्हें सहने की क्षमता व्यक्ति में नहीं बची होती। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, किसी अन्य प्राणी को सहायता पहुँचाकर, उसे संतुष्ट करके और उसका रक्षण करके, उसके आशीर्वाद से ही यह प्रारब्ध नष्ट होता है और अपना कल्याण होता है।
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