कामरूप कामाख्या की पूर्ण यात्रा — उर्वशी कुंड, उमानंद भैरव की आज्ञा, सौभाग्य कुंड और दसों महाविद्या पीठ

नीलांचल पर चढ़कर कामाख्या तक की एक-एक स्थान की यात्रा मार्गदर्शिका।

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01

कलिकाल का सबसे जागृत और उग्र शक्तिपीठ कामरूप कामाख्या — यात्रा न हो सके तो मानसिक रूप से यात्रा कीजिए

कलिकाल के सबसे जागृत और उग्र शक्तिपीठ की मानसिक यात्रा

· 00:03–01:16

वक्ता श्रोताओं को भगवती के सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठ कामरूप कामाख्या की यात्रा पर ले चलते हैं और कहते हैं कि इस पूरी यात्रा को मानसिक रूप से कीजिए, और भगवती से प्रार्थना कीजिए कि शीघ्र से शीघ्र जगदंबा अपने उस दिव्य धाम में बुलाएँ। इसका महात्म्य अनेक तंत्र शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है; कलिकाल में यह सबसे सर्वश्रेष्ठ, जागृत और उग्र शक्तिपीठ है। वीडियो में इसका महात्म्य, नीलांचल पर्वत पर आरोहण कैसे करना चाहिए और क्या क्रम है — यह सब बताया गया है।

02

कामाख्या में दर्शन का क्रम क्या होना चाहिए?

उमानंद भैरव से पहले उर्वशी कुंड और ब्रह्मपुत्र

· 01:17–02:02 · Also a question

भगवती जगदंबा के स्वरूप के दर्शन के क्रम में सर्वप्रथम भगवान उमानंद भैरव जी के दर्शन के लिए जाते हैं — लेकिन उससे भी पहले दो प्रमुख दर्शन हैं: पहला उर्वशी कुंड, जहाँ स्नान आदि का महत्व है, और दूसरा ब्रह्मपुत्र नद लोहित कुंड। उर्वशी कुंड के विषय में माना जाता है कि ब्रह्मपुत्र के मध्य एक टापू पर भगवती उर्वशी स्वर्ग लोक से अमृत लाकर रखी थीं, और उसी अमृत से देवता कामरूप कामाख्या को नैवेद्य अर्पित करते हैं।

03

उर्वशी कुंड के निमित्त ब्रह्मपुत्र नद में अक्षत-पुष्प समर्पित किए जाते हैं; ब्रह्मपुत्र ब्रह्मा जी के पुत्र हैं, शांतनु मुनि और अमोघा से उत्पन्न

नद में अक्षत-पुष्प, और ब्रह्मपुत्र ब्रह्मा के पुत्र

· 02:03–02:32

उर्वशी कुंड के निमित्त ब्रह्मपुत्र नद में अक्षत, पुष्प आदि समर्पित करके फिर ब्रह्मपुत्र नद को प्रणाम करते हैं। वक्ता कहते हैं कि धारा बहुत तेज़ और गहराई बहुत अधिक है, और ब्रह्मपुत्र की उत्पत्ति और महात्म्य अनंत है, जिसे जानना चाहिए — बिना महात्म्य जाने किसी तीर्थ यात्रा का पूर्ण फल नहीं मिलता। महात्म्य यह है कि ये भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र हैं; शांतनु नामक मुनि और अमोघा नामक माता से इनकी उत्पत्ति हुई।

04

लोहित कुंड का परशुराम जी से क्या संबंध है?

रेणुका-वध का दोष स्नान से छूटना, और परशु से बना मार्ग

· 02:33–03:09 · Also a question

कैलाश पर्वत पर लोहित नामक कुंड है, जहाँ परशुराम जी मातृ-हत्या के बाद गए थे, क्योंकि उन्हें भगवती रेणुका की हत्या का दोष लगा था। भगवान होते हुए भी लोकाचार से दोष लगा था, इसलिए उसकी निवृत्ति के लिए वे उस कुंड में गए, और ब्रह्मपुत्र नद के उद्गम स्थान पर स्नान करने से उन्हें उस दोष से मुक्ति मिली। फिर माना जाता है कि उन्होंने अपने परशु से रास्ता बनाकर पूरे कामरूप प्रदेश से होते हुए सागर तक ब्रह्मपुत्र का मार्ग बनाया।

05

टापू को भस्मकुट पर्वत क्यों कहते हैं?

त्रिनेत्र की अग्नि से कामदेव भस्म, और रति की प्रार्थना पर पुनर्जीवन

· 03:10–03:33 · Also a question

सामने जो टापू दिखता है वह भस्मकुट पर्वत है, जिसके ऊपर उमानंद भैरव जी विद्यमान हैं। इसका नाम भस्मकुट इसलिए है क्योंकि भगवान शिव ने त्रिनेत्र की अग्नि से कामदेव को यहीं भस्म किया था, और भगवती रति की प्रार्थना पर यहीं उन्हें पुनः जीवन भी प्रदान किया था। इसी पर्वत पर कामरूप कामाख्या जगदंबा के प्रमुख भैरव उमानंद जी नित्य विद्यमान रहते हैं।

06

उमानंद भैरव में किन दिनों का विशेष महत्व है?

चैत्र शुक्ल अष्टमी और सोमवार की अमावस्या

· 03:34–04:09 · Also a question

चैत्र शुक्ल अष्टमी को ब्रह्मपुत्र नद के दोनों तट पर समस्त देवी-देवता और नद के मध्य में समस्त तीर्थ आकर उपस्थित हो जाते हैं, इसलिए उस दिन यहाँ स्नान करने और अशोक के पत्ते खाने का बहुत महत्व है। और अगर अमावस्या सोमवार के दिन पड़ जाए, तो उस दिन आकर उमानंद भैरव जी का दर्शन-पूजन करने का बहुत महत्व है।

07

उमानंद भैरव से क्या आज्ञा लेनी होती है?

नीलांचल आरोहण और दसों महाविद्याओं के दर्शन का आदेश

· 04:10–04:53 · Also a question

प्रमुख मंदिर के भीतर आगे एक गुफा है, नीचे जाकर दर्शन करना होता है। जो आप लेकर गए हैं उससे भगवान का समस्त पूजन करके वहीं आदेश माँगते हैं: प्रभु, हमें आज्ञा प्रदान कीजिए कि हम नीलांचल पर्वत पर आरोहण करें और भगवती कामरूप कामाख्या सहित दसों महाविद्याओं के दर्शन करके पुण्य की प्राप्ति करें, वहाँ साधना-अनुष्ठान पूर्ण कर पाएँ। वक्ता कहते हैं कि यह आज्ञा अवश्य लें, उसके बाद ही नीलांचल की ओर चलें।

08

उमानंद भैरव के पास ही ब्रह्म कुंड और पांडुनाथ के नाम से भी अक्षत-पुष्प छोड़े जाते हैं, जहाँ मधु-कैटभ का वध हुआ था

ब्रह्म कुंड और पांडुनाथ, जहाँ मधु-कैटभ का वध हुआ

· 04:54–05:13

उर्वशी कुंड, ब्रह्मपुत्र नद और उमानंद भैरव जी के दर्शन के पश्चात आप चाहें तो उसी स्थान पर, उमानंद भैरव जी के पास ही, ब्रह्म कुंड और पांडुनाथ के नाम से भी अक्षत-पुष्प आदि छोड़ दें। उन दोनों का भी दर्शन करें और वहाँ से आदेश प्राप्त करें। वक्ता कहते हैं कि मधु-कैटभ का वध पांडुनाथ जी के स्थान पर श्री हरिनारायण के द्वारा किया गया था।

09

नीलांचल पर चढ़ने के कितने मार्ग हैं, और पूर्व मार्ग के द्वारपाल कौन हैं?

आठों कोण से आठ मार्ग, और पूर्व मार्ग के द्वारपाल

· 05:14–05:41 · Also a question

पूर्व के मार्ग से नीलांचल पर्वत का आरोहण आरंभ हुआ है। आठ मार्ग हैं, जिनसे आठों कोण से यात्रा होती है, और आठों मार्ग में अलग-अलग द्वारपाल हैं। इस पूर्व मार्ग के द्वारपाल हैं गणपति जी, मनोहर अग्नि बैताल जी, घंटाकर्ण जी, हनुमान जी और नंदी जी। तो नीलांचल पर्वत के आरोहण के क्रम में प्रथम दर्शन भगवान गणपति जी का है।

10

पूर्व मार्ग पर प्रथम पूजन द्वारपाल गणपति जी और मनोहर अग्नि बैताल का होता है, उसके बाद ही आगे जाना है

आगे बढ़ने से पहले गणपति और मनोहर अग्नि बैताल

· 05:42–06:04

वक्ता कहते हैं कि पैदल ही आरोहण करना चाहिए, और जब भी भगवती कामाख्या के दर्शन के लिए आएँ, पहले गुवाहाटी शहर में रुककर उर्वशी कुंड आदि सभी का दर्शन कर लें। यहाँ भगवान गणपति जी का दर्शन-पूजन पहले करना है, और तत्पश्चात इसी स्थान पर मनोहर अग्नि बैताल के नाम से धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पित कर देना है। प्रथम पूजन द्वारपाल का अवश्य होना चाहिए; इसके पश्चात ही आगे जाना है।

11

पहले गुवाहाटी में रुकें, और पैदल आरोहण से पहले उर्वशी कुंड, ब्रह्मपुत्र, उमानंद भैरव, ब्रह्म कुंड और पांडुनाथ — हर जगह आदेश लें

पहले गुवाहाटी, फिर पाँचों स्थानों पर आदेश

· 06:05–06:50

पैदल ही यात्रा करें; जब भी आएँ, सबसे पहले गुवाहाटी शहर में ही रुकें और वहाँ से पहले उर्वशी कुंड, ब्रह्मपुत्र नद और उमानंद भैरव जी का दर्शन कर लें। तत्पश्चात उन तीनों जगहों में हर जगह आदेश प्राप्त करना है — उर्वशी कुंड में भी आदेश माँगना है कि हमें आदेश दीजिए, सामर्थ्य दीजिए; ब्रह्मपुत्र नद में भी, उमानंद भैरव जी से भी, ब्रह्म कुंड में भी, पांडुनाथ जी से भी। उन सभी के निमित्त अक्षत-पुष्प ब्रह्मपुत्र नद में या उमानंद भैरव जी के पास छोड़कर आदेश लेना है।

12

नीलांचल पर चढ़ते समय क्या करते रहना चाहिए?

गाड़ी केवल वीडियो के लिए, और गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप

· 06:51–07:22 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि यहाँ जो मार्ग दिखाया गया है वह वीडियो के निमित्त गाड़ी से बनाया गया है, लेकिन उन्होंने स्वयं पैदल ही आरोहण किया है, और आप सभी इस मार्ग पर पैदल चढ़ते हुए ऊपर जाएँ। सबसे पहले भगवती कामाख्या के मुख्य मंदिर के पास जाकर सौभाग्य कुंड का दर्शन करेंगे। और ध्यान रखिए कि जब भी नीलांचल पर्वत का आरोहण आरंभ करें, तो जो भी आपके इष्ट-प्रद मंत्र हों, जो गुरु-प्रदत्त मंत्र हों, उनका नित्य-नैमित्तिक जप करते हुए ही आगे बढ़ें।

13

गृहस्थों को विशेष रूप से किस मार्ग से जाने को कहा गया है?

इसी मार्ग का नियम, और ईशान या पूर्व कोण से आरोहण

· 07:23–07:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि गृहस्थों के लिए विशेष करके है कि इसी मार्ग से जाएँ — जो मार्ग अभी दिख रहा है — अन्य किसी मार्ग से विशेष रूप से न जाएँ। ईशान कोण या पूर्व कोण से आरोहण करना चाहिए। इस मार्ग से होते हुए आप सीधे नीलांचल पर्वत के शिखर पर पहुँचते हैं।

वक्ता कहते हैं कि गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। के लिए विशेष करके है कि इसी मार्ग से — जो मार्ग आप अभी देख रहे हैं — जाएँ, अन्य किसी मार्ग से विशेष रूप से न जाएँ। ईशानवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का उत्तर-पूर्व कोण, जिसे देवताओं का निवास स्थान और पूजा घर के लिए उपयुक्त दिशा माना जाता है। कोण या पूर्व कोण से आरोहण करना चाहिए। तो इस मार्ग से होते हुए आप सीधे नीलांचल पर्वत के शिखर पर पहुँचते हैं।

14

नीलांचल और भस्मांचल शिव, ब्रह्मा और भगवती के निमित्त हैं, और शिखर पर भगवती का पूर्व दिशा का प्रमुख प्रवेश द्वार है

शिव, ब्रह्मा और भगवती — तीन स्वरूप — और पूर्व का द्वार

· 07:38–08:06

नीलांचल, भस्मांचल आदि जो पर्वत हैं, वे भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और भगवती — इन तीन प्रमुख स्वरूपों — के निमित्त हैं। नीलांचल के शिखर पर पहुँचकर भगवती का प्रमुख प्रवेश द्वार आता है, जो पूर्व दिशा की ओर का है, और यहीं से भीतर प्रवेश करते हैं।

15

प्रवेश द्वार के ऊपर श्रृंगालिनी वाहन उपस्थित है, और गर्भगृह के भीतर कामदेव द्वारा निर्मित गुफा है

श्रृंगालिनी वाहन और कामदेव की बनाई गुफा

· 08:07–08:50

प्रवेश द्वार के ऊपर भगवती के तांत्रिक स्वरूप का वाहन उपस्थित है, जिसे प्रमुख रूप से श्रृंगालिनी कहा जाता है। भीतर भगवती का प्रमुख गर्भगृह है, और उसी के भीतर कामदेव के द्वारा निर्मित गुफा है, जिसमें भगवती विद्यमान हैं।

16

कामाख्या के नीचे परिक्रमा मार्ग में कौल और घोर संप्रदाय के साधक प्रतिदिन रात्रि में साधना करते हैं

कौल और घोर संप्रदाय के साधक वहाँ साधना करते हुए

· 08:51–09:23

जो मार्ग नीचे जाता है वह भैरवी की ओर — भगवती भैरवी और माँ धूमा — जाता है, और यह परिक्रमा मार्ग है। वक्ता कहते हैं कि परिक्रमा मार्ग में भगवती के निमित्त कौल या घोर संप्रदाय के साधक साधना करते हुए दिखते हैं; जितने दिन वे स्वयं रुके थे, ये साधक प्रतिदिन यहाँ रुककर साधना कर रहे थे। यह रात्रि काल का दृश्य है।

17

कामाख्या की परिक्रमा कहाँ से आरंभ होती है और निर्गत मार्ग कहाँ है?

विनायक जी के चारों ओर गोल मार्ग, और सिंह के पीछे का निर्गत मार्ग

· 09:24–10:04 · Also a question

जो लोग नीचे से ऊपर की ओर आते दिखते हैं, वही परिक्रमा मार्ग है; इसी से होते हुए पूरी परिक्रमा करनी है, और जो लोग सिंह के पीछे से निकल रहे हैं, वह निर्गत मार्ग है — गुफा से बाहर निकलकर वहाँ से निकलने का मार्ग। आने का मार्ग मंदिर के भीतर से, गर्भगृह की ओर से है। परिक्रमा यहीं से आरंभ करनी है, जहाँ सामने विनायक जी उपस्थित हैं, और इन्हीं विनायक जी को लेकर जो पूरा गोल मार्ग बना है, उसी में परिक्रमा करनी होती है।

18

कामाख्या के भित्ति चित्रों और मूर्तियों का अपना-अपना महात्म्य है, जिसका वर्णन तंत्र शास्त्रों में है

तंत्र शास्त्रों में वर्णित गूढ़ रहस्य, और भीतर तीन महाविद्याएँ

· 10:05–10:43

वक्ता कहते हैं कि भगवती कामरूप कामाख्या के बहुत सारे गूढ़ रहस्य हैं। जितने भित्ति चित्र बनाए गए हैं और जो मूर्तियाँ लगाई गई हैं, इन सभी का अपना महात्म्य है, और तंत्र शास्त्रों में इनका वर्णन है — किनके द्वारा, कैसे और क्यों बनाया गया — इस पर अलग से चर्चा होगी। इस वीडियो का मुख्य उद्देश्य एक-एक स्थान का दर्शन करा देना है ताकि आपकी परिक्रमा पूर्ण हो जाए। भगवती कामाख्या जो 10 महाविद्या स्वरूप में हैं, उनमें से तीन महाविद्याएँ इसी गर्भगृह में हैं।

19

सौभाग्य कुंड क्या है और वह कैसे बँटा हुआ है?

भगवती की क्रीड़ा स्थली, मनुष्यों का भाग और पश्चिम की ओर

· 10:44–11:26 · Also a question

नीलांचल के शिखर पर आने के बाद, गर्भगृह में जाने से पहले भगवती के सौभाग्य कुंड में जाना है — यह उनकी क्रीड़ा स्थली है। यह दो भागों में बँटा है: जिस भाग में लोग स्नान करते दिखते हैं वह मनुष्यों के निमित्त है, और जिस ओर साधु बाबा स्नान और तर्पण करते दिखे, वह पश्चिम दिशा है, जिस ओर स्नान का विशेष महात्म्य है, हालाँकि आप किसी भी ओर स्नान कर सकते हैं।

20

दर्शन से पहले सौभाग्य कुंड पर क्या करना चाहिए?

स्नान, कमलेश्वर महादेव, देवताओं का भाग, और विनायक से आदेश

· 11:27–12:02 · Also a question

स्नान अवश्य कीजिए। दर्शन से पहले यहाँ स्नान करना चाहिए, और कमलेश्वर महादेव वहाँ उपस्थित हैं, उनका दर्शन करना चाहिए। घेरे के उस ओर जो कुंड है, वह देवताओं के निमित्त माना गया है — आज के समय में उतने लोग नहीं मानते, लेकिन ग्रंथों में यह वर्णन विशेष रूप से मिलेगा। कुंड पर जहाँ भगवान विनायक उपस्थित हैं, स्नान के पश्चात उनकी सेवा-पूजा करनी है और वहाँ से आदेश प्राप्त करना है कि सौभाग्य कुंड पर उपस्थित समस्त देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो; उसके पश्चात भगवती के दर्शन के लिए जाना है।

21

कालिका पुराण सौभाग्य कुंड के विषय में क्या कहता है?

देवराज इंद्र और देवताओं द्वारा निर्मित; पश्चिम तट और पितर

· 12:03–12:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कालिका पुराण में यह विषय मिलेगा कि इस कुंड का निर्माण देवताओं के द्वारा — देवराज इंद्र और देवताओं के द्वारा — किया गया था। और इसके पश्चिम तट पर विधिपूर्वक स्नान करने, मुंडन करने या अपने पितरों के निमित्त कोई कर्म करने से पितरों को देवी लोक की प्राप्ति हो जाती है। वहाँ स्नान करना चाहिए, अर्घ्य देना चाहिए, और विशेष करके स्नान में संकल्प अवश्य करना चाहिए।

22

सौभाग्य कुंड में गंगा जी की तरह संकल्प के साथ प्रवेश करें; योगिनी तंत्र कहता है कि यहाँ स्नान और तर्पण करने वालों को देवी लोक मिलता है

संकल्प, गंगा जी जैसा प्रवेश, और तर्पण करने वालों को देवी लोक

· 12:34–13:06

कभी भी तीर्थ क्षेत्र में स्नान करें तो संकल्प करें। कुंड में प्रवेश का नियम वैसा ही है जैसा गंगा जी में: पहले जल को मस्तक पर लगाएँ, उसके पश्चात ही भगवती से आदेश प्राप्त करके भीतर की ओर जाएँ। योगिनी तंत्र में कहा गया है कि जो लोग सौभाग्य कुंड में विधिपूर्वक स्नान करके देवी कामाख्या की अर्चना और पूर्व पुरुषों का तर्पण — यानी पितरों का तर्पण — करते हैं, उन्हें सुखपूर्वक देवी लोक प्राप्त हो जाता है।

23

सौभाग्य कुंड की एक परिक्रमा का इतना महत्व क्यों है?

तीनों लोकों के समस्त तीर्थ एक ही कुंड में स्थित

· 13:07–13:45 · Also a question

पृथ्वी की प्रदक्षिणा का जो फल है, वह इस सौभाग्य कुंड की परिक्रमा करने से प्राप्त हो जाता है; इसके लिए सीढ़ियों का मार्ग बना है, और दर्शन से पहले एक परिक्रमा अवश्य कर लें। कामरूप प्रदेश के जितने कुंड हैं, उन सभी में सौभाग्य कुंड का महात्म्य सबसे अधिक माना गया है, क्योंकि इस संसार के जितने अनंत कुंड हैं — पृथ्वी पर 3.5 करोड़ तीर्थ माने गए हैं, कलिकाल में अदृश्य भी — और स्वर्ग, मृत्यु लोक और पाताल लोक के जितने तीर्थ हैं, वे सभी सौभाग्य कुंड में स्थित हैं, ऐसा योगिनी तंत्र में वर्णन है।

24

सौभाग्य कुंड में स्नान के लिए कौन से महीने और दिन सबसे अच्छे हैं?

माघ, वैशाख और कार्तिक, तथा संक्रांति

· 13:46–14:25 · Also a question

इस कुंड में अवश्य स्नान करना चाहिए; यहाँ आए तो बिना स्नान किए न जाएँ। सौभाग्य कुंड में विशेष करके माघ के महीने में, वैशाख के महीने में, कार्तिक के महीने में और संक्रांति में स्नान करने का बहुत अधिक महत्व है। जिस कामना के निमित्त संकल्प लेकर स्नान करते हैं, वह कामना अवश्य पूर्ण हो जाती है।

25

कामरूप यात्रा के लिए कितने दिन रखने चाहिए?

कामरूप में तीन अहोरात्र, और पूरा दिन-क्रम

· 14:26–15:09 · Also a question

कभी भी कामरूप प्रदेश आइए तो कम से कम एक या दो दिन एक्स्ट्रा लेकर आइए। आपके पास कामरूप प्रदेश में बिताने के लिए तीन अहोरात्र — तीन रात्रियाँ — होनी चाहिए। हड़बड़ी में एक दिन में कुछ नहीं होगा; एक दिन तो दर्शन करने में ही लग जाएगा। पहले उर्वशी कुंड, फिर ब्रह्मपुत्र नद होते हुए भगवान उमानंद भैरव के पास, उसके पश्चात नीलांचल पर्वत का पूरा आरोहण, फिर सौभाग्य कुंड में स्नान, तब जाकर भगवती का दर्शन होगा — और टिकट भी कटाना रहता है।

26

कामाख्या में दस महाविद्या पीठ कैसे बँटे हुए हैं?

तीन गर्भगृह में और बाकी अलग-अलग स्थानों पर

· 15:10–15:37 · Also a question

सौभाग्य कुंड में दर्शन और कमलेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात पूरे गर्भगृह की एक परिक्रमा करनी है। 10 महाविद्याओं में से तीन महाविद्याएँ भगवती के इसी गर्भगृह में उपस्थित हैं, और इसके पश्चात तीन महापीठ और अलग-अलग जगह पर उपस्थित हैं। उनका पूरा मार्ग इस वीडियो में दिखाया गया है, इसीलिए वीडियो थोड़ा लंबा है।

27

गर्भगृह में पात्र लेकर क्यों जाना चाहिए?

जल ही सब कुछ है, और श्री विग्रह का न होना

· 15:38–16:09 · Also a question

भगवती के दर्शन के लिए जाने से पहले भीतर का जल लेने के लिए एक पात्र, लोटा या बोतल अवश्य ले लीजिए। वही जल सबसे प्रमुख है; भगवती कामाख्या का वह जल तत्व ही सब कुछ है। यहाँ भगवती किसी श्री विग्रह के स्वरूप में विराजमान नहीं हैं — वह पाषाण शिला है, जिसका स्पर्श आपको गर्भगृह में मिलेगा, और जो जल वहाँ प्राप्त होगा, उसी से हमारी-आपकी मुक्ति संभव है।

28

गर्भगृह के भीतर कौन सी तीन महाविद्याएँ हैं?

मातंगी, कमला और षोडशी ललिता त्रिपुरसुंदरी ही कामाख्या

· 16:10–16:42 · Also a question

भीतर जाने पर भगवती मातंगी हैं, जो नवम महाविद्या हैं; भगवती कमला, जो दशम महाविद्या हैं; और तीसरी महाविद्या भगवती षोडशी, माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी, जो साक्षात कामरूप कामाख्या के रूप में विद्यमान हैं। तो जान लीजिए, वक्ता कहते हैं, कि आप श्री कुल के उपासक हों या काली कुल के, कामरूप प्रदेश में आना, भगवती कामाख्या का दर्शन करना और जीवन-मुक्त हो जाना — यह अपने आप में बहुत बड़ा महात्म्य है।

29

गर्भगृह के मंडप के रक्षक स्वयं कामेश्वर शिव हैं, और वहाँ रखे बलि के महिषों के मुंडों से कभी घृणा नहीं करनी है

रक्षक कामेश्वर शिव, और महिष-मुंडों से घृणा कभी नहीं

· 16:43–17:08

गर्भगृह में प्रवेश करते ही कामेश्वर शिव और भगवती कामेश्वरी का उत्सव विग्रह है; वह निर्गत मार्ग है, दर्शन के पश्चात वहीं से बाहर निकलते हैं। मुख्य गर्भगृह में भीतर प्रवेश करने पर जो मंडप है, उस मंडप के रक्षक साक्षात कामेश्वर शिव हैं। वहाँ बलि चढ़े हुए महिषों के मुंड रखे मिलेंगे — इनसे कभी गलती से भी घृणा न कीजिए।

30

भीतर प्रवेश पर महेश्वर शिव से आज्ञा माँगें, फिर भगवती का स्पर्श करें, जल लें और उनका नाम या गुरु मंत्र बोलते हुए तीन बार आचमन करें

महेश्वर शिव की आज्ञा, और मंत्र के साथ तीन आचमन

· 17:09–18:42

भीतर प्रवेश करने पर महेश्वर शिव से आज्ञा प्राप्त करनी है, तो प्रवेश करके यह बोलना है: प्रभु, हमें भगवती कामेश्वरी के दर्शन, स्पर्श और अमृत जल के पान के निमित्त आदेश प्रदान कीजिए। वहाँ दीप आदि प्रज्वलित किया जाता है। यह बोलकर गर्भगृह में जाएँगे, वहाँ भगवती का दर्शन करेंगे, स्पर्श करेंगे, जल लेंगे, और भगवती का नाम लेकर — या गुरु मंत्र, देवी मंत्र प्राप्त हो तो उसे बोलते हुए — जल से तीन बार आचमन करेंगे।

31

गर्भगृह के बाद सीधे तारा पीठ जाना है; बाहर के सातों पीठों में भी कामाख्या की तरह अपना भूमिगत जल स्रोत है

बाहर के सातों पीठों में भूमिगत जल स्रोत

· 18:43–19:16

भगवती कामाख्या, माँ मातंगी और भगवती कमला के मुख्य पीठ का दर्शन भीतर करेंगे; फिर प्रवेश द्वार से सीधे दूसरे पीठ के दर्शन को जाएँगे, जो भगवती तारा का है। जिस प्रकार भगवती कामाख्या अपनी गुफा में रक्त पाषाण शिला के रूप में विद्यमान हैं, जहाँ से निर्गत जल का आचमन करते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे जितने सातों पीठ हैं, उनमें भी यह भूमिगत जल स्रोत उपस्थित है और स्वतः जल निकलता रहता है।

32

कामाख्या के दर्शन का क्या फल कहा गया है?

हज़ार राजसूय यज्ञ, और तीन ऋणों से मुक्ति

· 19:17–20:05 · Also a question

भगवती के महात्म्य में कहा गया है कि जो फल मनुष्य 1000 राजसूय यज्ञ और 100 अग्निष्टोम यज्ञ से प्राप्त करता है, वही फल भगवती कामाख्या के दर्शन मात्र से मिल जाता है। योगिनी तंत्र में यह भी लिखा है कि जो लोग देव ऋण, पितृ ऋण और मातृ ऋण से मुक्त होना चाहते हैं, वे भक्ति भाव से कामाख्या जाकर देवी के योनि मंडल का दर्शन, स्पर्श और जलपान करें, तो इस ऋण से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि यह मातृ पीठ है। जो भी तीर्थ यात्रा करके इस स्थान तक आता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

33

विंध्याचल के त्रिकोण की तरह हर पीठ पर कपूर प्रज्वलित किया जाता है, और काली पीठ की ओर जाते हुए हर पीठ के लिए अलग-अलग पुष्प खरीदे जाते हैं

विंध्याचल त्रिकोण की तरह कपूर, और हर पीठ के लिए पुष्प

· 20:06–20:36

जो पीठ अभी दिख रहा है वह भगवती तारा का है, और जैसे हम विंध्याचल में त्रिकोण करते समय कपूर प्रज्वलित करते हैं, यहाँ भी — विशेष करके जो लोग गृहस्थ तंत्र से जुड़े हैं और सदैव सब सुनते-जानते हैं — वे उसी प्रकार यहाँ सभी पीठों पर कपूर प्रज्वलित करेंगे। भगवती काली के पीठ पर जाने से पहले पुष्प और श्रृंगार के निमित्त सभी पीठों के लिए अलग-अलग कुछ पुष्प खरीदते हैं।

34

गर्भगृह की तीन महाविद्याओं को एक ही पीठ माना जाता है, तारा दूसरा और काली तीसरा पीठ

गर्भगृह के तीन एक पीठ के रूप में गिने जाते हैं

· 20:37–21:01

भगवती तारा के दर्शन के पश्चात भगवती काली का पीठ है, और यह तीसरा पीठ हुआ। प्रथम, दूसरा और तीसरा — ऐसे 10 पीठ अगर माने जाएँ, तो तीन पीठ तो भगवती के प्रमुख गर्भगृह में ही उपस्थित थे, लेकिन उन्हें एक ही पीठ माना जा रहा है। ऐसे 10 पीठ होंगे। उसके पश्चात दूसरा पीठ भगवती तारा का था और तीसरा भगवती काली का है।

35

कामाख्या के पीठों के लिए कौन से पुष्प और मालाएँ ले जानी चाहिए?

चौदह मालाएँ — सात देवियों के लिए, सात उनके भैरवों के लिए

· 21:02–21:59 · Also a question

सभी के लिए अलग-अलग पुष्पों की मालाएँ ली गईं। भगवती तारा, काली, बगलामुखी माई, भुवनेश्वरी माता, धूमावती माता, त्रिपुर भैरवी आदि को लेकर सात जगह जाना है, तो कम से कम 14 पुष्प की मालाएँ लीं — सात-सात, और सात उनके भैरवों और जिनका भी स्थान वहाँ मिल जाए उनके लिए, नहीं तो दो-दो पुष्प, और साथ में कमल आदि के पुष्प। यानी नीली अपराजिता की एक माला, जवा फूल की एक पूरी माला, भगवती पीतांबरा के लिए पीले पुष्प की एक माला, सभी के लिए कमल पुष्प, दूर्वा, बिल्वपत्र — यह सब आप ले सकते हैं।

36

योगिनी तंत्र डाउनलोड करके पूरा पढ़ना और स्वाध्याय करना चाहिए, क्योंकि कामाख्या और उसके दो बलि पीठ उसी का विषय हैं

योगिनी तंत्र का स्वाध्याय, और कामाख्या के दो बलि पीठ

· 22:00–22:38

वक्ता कहते हैं कि यह योगिनी तंत्र का ही विषय है: योगिनी तंत्र डाउनलोड करके पूरा पढ़ लीजिए, अध्ययन कीजिए, स्वाध्याय कीजिए, तो आपका मनोबल भी बढ़ेगा और महात्म्य भी बढ़ेगा। फिर वे बलि पीठ दिखाते हैं — दो बलि पीठ हैं। यह विशेष रूप से महिष बलि पीठ है, और एक बलि पीठ भीतर भी है, मंदिर के प्रांगण में।

37

बलि पीठ पर साधना करने के विषय में क्या चेतावनी है?

सबसे उग्र स्थान, मंत्र का शीघ्र जागरण, और बिना गुरु के जोखिम

· 22:39–23:25 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बलि पीठ जहाँ भी उपस्थित होता है वह सबसे उग्र स्थान होता है, और जप आदि वहीं करना चाहिए। लेकिन साधकों से विशेष रूप से कहते हैं कि उनके बोलने पर एक्सपेरिमेंट मत कीजिए — अपने रिस्क पर कीजिए। यह बहुत उग्र पीठ है; कुछ गड़बड़ हुई, गलती हुई, और गुरु नहीं हैं तो दिक्कत हो गई। बलि पीठ के पास जप करने से मंत्र अति शीघ्र जागृत होता है।

38

साधक को गर्भगृह के भीतर क्या नहीं माँगना चाहिए?

सांसारिक माँगें नहीं; लाइन से परिक्रमा तक उपवास, और जल पर दस जप

· 23:26–23:52 · Also a question

एक गुप्त बात, वक्ता कहते हैं, विशेष रूप से सभी साधकों के लिए — जो दीक्षित हैं और जो भक्ति भाव से, नियम और अनुशासन से साधना करते हैं: सदैव स्मरण रखिए कि कामरूप कामाख्या माई के पास गर्भगृह में जाएँ तो वहाँ दुनिया भर का जंजाल मत पालिए — माँ हमको यह दीजिए, ऐसी परेशानी है, यह दिक्कत है। वहाँ मंत्र सिद्ध कीजिए। लाइन में लगने से लेकर परिक्रमा पूरी होने तक प्रति क्षण उपवास में रहें — शरीर साथ न दे तो पहले जल पी लें — लेकिन उपवास में रहते हुए मंत्र का जप करें। और इन सभी पीठों के गर्भगृह में 10 सेकंड की भी जगह मिल जाए तो कुंड के जल को स्पर्श करके कम से कम 10 बार अपने देवी मंत्र का जप अवश्य कर लें।

39

छिन्नमस्तिका पीठ पर दस बार जप करने से क्या होता है?

मंत्र की हर प्रकार के दोष से शुद्धि

· 23:53–24:38 · Also a question

यह मार्ग आगे छिन्नमस्तिका पीठ की ओर जाता है, और सामने जो मंदिर दिखता है वही है। जप करते रहना है; जप छूटना नहीं चाहिए। शास्त्रों में, विशेष करके योगिनी तंत्र में, लिखा मिलेगा कि इस पीठ में जो मनुष्य 10 बार भी मंत्र का जप कर देता है, उसका मंत्र शुद्ध हो जाता है — यानी किसी प्रकार का दोष हो, दीक्षा प्राप्ति में या कोई अन्य, यहाँ हर प्रकार के दोषों से मुक्ति मिल जाती है।

40

बाहर के सात पीठों के क्रम में छिन्नमस्तिका तारा और काली के बाद आती हैं, और उनका पीठ अति उग्र है

तारा और काली के बाद, और उनके पीठ का उग्र स्वरूप

· 24:39–25:14

भगवती कामाख्या के अनंतर बाकी महाविद्याओं के जो सात पीठ हैं, उनमें से यह एक है। यह आपके क्रम में पड़ेगा — ऐसे क्रम से जाइए: भगवती तारा के पश्चात भगवती काली, उसके पश्चात भगवती छिन्नमस्तिका। ध्यान रखिए कि छिन्नमस्तिका पीठ अपने आप में अति उग्र पीठ है।

41

छिन्नमस्तिका के गर्भगृह की ऊर्जा बहुत प्रचंड है, और त्रिकोण की तरह यहाँ भी कपूर प्रज्वलित किया जाता है

प्रचंड ऊर्जा, छिन्न शीश, और खुला गर्भगृह

· 25:15–25:40

पुष्पमाला ले ली गई है और कपूर प्रज्वलित कर दिया गया है, और जैसा त्रिकोण में करते हैं, वक्ता कहते हैं कि आप सभी भी अवश्य करिए। वे कहते हैं कि गर्भगृह का वीडियो नहीं डाल सकते — वहाँ की ऊर्जा बहुत प्रचंड है। छिन्नमस्तिका जगदंबा का यह स्वरूप अपने आप में अति उग्र है; सभी जानते हैं, जो भगवती स्वयं अपने ही शीश को छिन्न कर दी हैं। और यह गर्भगृह, जो दृश्य में दिख रहा है, उस पर ताला नहीं लगा है; खुला ही है, अभी पुजारी जी आकर खोले थे।

42

छिन्नमस्तिका की गुफा कामाख्या के दीप-प्रकाशित नीचे के गर्भगृह से भी अधिक गहरी है; भीतर दर्शन न मिले तो बाहर से प्रणाम करके पुष्प अर्पण करें

गुफा में उतरना, प्रकाश का अभाव, और दर्शन न हो तो क्या करें

· 25:41–26:36

यह पीठ बहुत गहरा है। जैसे भगवती कामाख्या का पीठ गहरा है — गर्भगृह में जाने पर पूरे नीचे की ओर जाना पड़ता है, गुफा एकदम नीचे है, और वहाँ कोई लाइट नहीं होती; बड़े-बड़े दीप प्रज्वलित रहते हैं, उन्हीं में जो दिख जाए उसमें दर्शन करना होता है — यहाँ भी ठीक वैसा ही है, लेकिन बहुत अधिक गहरा। वक्ता को लगता है कि भगवती छिन्नमस्तिका का यह मार्ग कामाख्या के नीचे के गर्भगृह के मार्ग से भी ज़्यादा गहरा है। भीतर दर्शन मिल रहा हो तो अच्छे से करें; अन्यथा बाहर से प्रणाम करके पुष्प अर्पण कर दें।

43

भगवती कामाख्या के चारों ओर पीठ कैसे स्थित हैं?

नीचे भैरवी, बीच में धूमावती, बगलामुखी और भुवनेश्वरी अलग भाग में

· 26:37–27:14 · Also a question

यह मार्ग अब नीचे की ओर जाता है, जहाँ भगवती भैरवी — त्रिपुर भैरवी, पंचम महाविद्या — उपस्थित रहेंगी। वहाँ से ऊपर चढ़कर भगवती धूमावती के पास, और धूमावती से पुनः और ऊपर चढ़कर भगवती कामाख्या के पास पहुँचते हैं। यानी भगवती त्रिपुर भैरवी और भगवती कामाख्या के पीठ के मध्य में भगवती धूमावती हैं। भगवती कामाख्या के पीछे के पीठ में भगवती तारा, भगवती काली और भगवती छिन्नमस्तिका हैं; और भगवती बगलामुखी और भगवती भुवनेश्वरी — ये दो पीठ दूसरे भाग में हैं।

44

कामाख्या कवच वास्तव में किसका वर्णन है?

कवच इन्हीं पीठों का उनकी दिशाओं में वर्णन है

· 27:15–27:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आप, विशेष करके सभी माताएँ, भगवती कामाख्या के कवच का पाठ करती हैं, तो वह कवच वास्तव में इसी पीठ का वर्णन है। वहाँ जिस दिशा में जिन शक्ति की उपस्थिति का वर्णन किया गया है, वह वही है।

45

कामाख्या के नए बने रास्तों से कंफ्यूजन होता है, इसलिए पूरा मार्ग कवच में दी गई दिशाओं के साथ दिखाया गया है

नए बने रास्ते, आने वाला कॉरिडोर, और कवच की दिशाएँ

· 27:42–28:32

अभी सब नया-नया बना है, तो थोड़ा कंफ्यूजन हो जाता है, और मार्ग में अन्य सभी देवता भी दिखते हैं। यही मार्ग सीधे चलते हुए जाना है, जो सीढ़ी बनी हुई है, और इसीलिए पूरा वीडियो डाला जा रहा है ताकि आप कंफ्यूज न हों। वक्ता आशा करते हैं कि कॉरिडोर बनने तक यह नहीं टूटेगा; तब तक इसमें जाकर दर्शन कीजिए, कॉरिडोर बनने के बाद तो भगवती की इच्छा, कैसे कहाँ दर्शन होगा। कवच की बात वे दोहराते हैं: आग्नेय दिशा में कौन सी देवी रक्षा करेंगी, पूर्व में कौन सी — वास्तव में वही पीठ यहाँ उसी स्थान पर उपस्थित है।

46

इस स्थान पर अष्टोत्तर शतनाम का जप क्या करता है?

शैव, वैष्णव या शाक्त — सबके लिए क्षण भर में मंत्र सिद्धि

· 28:33–29:02 · Also a question

कहा गया है कि चाहे शैव हो, वैष्णव हो या शाक्त, कोई भी इस पुण्य स्थान पर आकर अष्टोत्तर शतनाम का जप करता है तो क्षण भर में उसका मंत्र सिद्ध हो जाता है। भगवती के जिस भी स्वरूप का पूजन करते हों, उनके अष्टोत्तर शतनाम का जप अवश्य कीजिए। यह सभी के निमित्त है — आप शैव हों, शाक्त हों या किसी अन्य संप्रदाय-पंथ के — लेकिन मंत्र सिद्धि के निमित्त पंचांग का सबसे प्रमुख विषय अष्टोत्तर शतनाम है, इसलिए उसका जप अवश्य करना चाहिए; उससे मंत्र सिद्धि होती है।

47

कच्छप कुंड क्या है और उसके पास क्या है?

कछुओं वाला भैरवी कुंड, और दो तंत्र पीठ

· 29:03–29:35 · Also a question

अब वे कुंड के पास पहुँचे हैं। वक्ता कहते हैं कि यह भैरवी कुंड है; इसमें बहुत सारे कच्छप हैं, लोग इसे कच्छप कुंड भी कहते हैं, और इसमें बहुत बड़े-बड़े कछुए हैं। कच्छपों को खिलाने के लिए केला आदि बेचने के लिए रखते हैं। यहाँ जो दो प्रमुख मंडप दिखते हैं — एक भगवती त्रिपुर भैरवी का है और एक भगवती राजराजेश्वरी का। दोनों ही तंत्र पीठ हैं।

48

यहाँ त्रिपुर भैरवी के भैरव कौन हैं?

पूर्ण तांत्रिक स्वरूप में दक्षिणामूर्ति, और कामाख्या तंत्र पीठ

· 29:36–30:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इस स्थान के दर्शन का बड़ा अद्भुत महात्म्य है। नव पीठों, सप्त पीठों और दश पीठों में यह त्रिपुर भैरवी जगदंबा का स्वरूप है, और इनके भैरव भगवान दक्षिणामूर्ति यहाँ पूर्ण रूप से तांत्रिक स्वरूप में विद्यमान हैं। कामाख्या क्षेत्र तो अपने आप में तंत्र पीठ ही है। इस स्थान पर बैठकर जप कीजिए, वे कहते हैं, तो अद्भुत ऊर्जा का पता चलेगा।

49

क्या यहाँ हर महाविद्या पीठ का अपना जल स्रोत है?

हर पीठ में भूमिगत प्रवाह, और उसे स्पर्श करके दस जप

· 30:18–31:13 · Also a question

कालिका पुराण के कामाख्या महात्म्य में यह विषय भी है कि इन सभी कुंडों — कुंड का अर्थ गर्भगृह के कुंड — में केवल भगवती कामाख्या का ही जल स्रोत नहीं है। भगवती त्रिपुर भैरवी का भी है, भगवती धूमावती का भी, माँ छिन्नमस्तिका — सबका वहाँ जल स्रोत है। एक अंडरग्राउंड वाटर का फ्लो है जो उसी पीठ के स्थान से निकलता है। तो अगर उस पीठ को और उस जल को स्पर्श करते हुए कम से कम 10 बार भी अपने मंत्र का जप कर लिया, तो वह मंत्र विशुद्ध हो जाता है और उसकी जागृति बढ़ जाती है।

50

त्रिपुर भैरवी के मंडप से सीढ़ियाँ धूमावती होते हुए कामाख्या के पीछे तक जाती हैं, जिससे त्रिकोण की परिक्रमा पूरी हो जाती है

कामाख्या के पीछे से ऊपर चढ़ना, और त्रिकोण परिक्रमा का पूरा होना

· 31:14–32:02

नीचे भगवती त्रिपुर भैरवी का मंडप है; वहाँ से ऊपर चढ़कर अब भगवती धूमावती के पास जाते हैं। धूमावती मध्य में हैं, ऊपर भगवती कामाख्या। ये सीढ़ियाँ सीधे कामाख्या मंदिर के पीछे की ओर जाती हैं, उस द्वार के पीछे जहाँ दीप प्रज्वलित कर रहे थे। इधर से भी त्रिपुर भैरवी के दर्शन को जा सकते हैं, और सामने से जाएँ तो पूरी एक परिक्रमा हो जाती है — यहाँ त्रिकोण की परिक्रमा हो जाती है।

51

कामाख्या में हर महाविद्या का अपना बलि पीठ है, और महानिल तंत्र कहता है कि गर्भगृह के जल में हाथ डुबाकर 10 बार जप से मंत्र शुद्ध होता है और 108 बार से सिद्धि की ओर बढ़ता है

हर महाविद्या का बलि पीठ, और दस व एक सौ आठ जप का नियम

· 32:03–32:48

यह भगवती धूमावती का बलि पीठ है; यहाँ दसों महाविद्याओं का अपना-अपना बलि पीठ है, सभी जगह बलि चढ़ती है। भीतर भगवती गर्भगृह में विराजमान हैं। ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं, कि गर्भगृह के जल स्रोत का वर्णन कालिका पुराण में, योगिनी तंत्र में और महानिल तंत्र आदि में भी है। महानिल तंत्र में तो यहाँ तक कहा गया है कि इस जल में अपना हाथ डुबाकर 10 बार मंत्र का जप करते हैं तो मंत्र शुद्ध और जागृत हो जाता है; और जब 108 बार जप कर देते हैं तो भगवती की कृपा से मंत्र सिद्धि की ओर अग्रसर हो जाता है।

52

धूमावती से पीछे का मार्ग कामाख्या गर्भगृह के पीछे, मुख्य द्वार के पास के हवन कुंड के पास निकलता है

कामाख्या गर्भगृह का पिछला भाग, और पूरा हुआ एक राउंड

· 32:49–33:58

ऊपर चढ़ने के बाद यह अब भगवती कामाख्या का पीछे का द्वार, पीछे का भाग है। भीतर भगवती का गर्भगृह है, वह दीवार; यह पीछे का है। यहाँ दीप आदि प्रज्वलित करते हैं। इस पीछे के मार्ग से सीधे देवालय पहुँच जाते हैं, तो एक राउंड पूरा हो गया और पुनः उसी मार्ग में — भगवती तारा वाले मार्ग में — पहुँच जाते हैं। वहीं हवन कुंड है, जो ठीक मुख्य द्वार के पास है।

53

बगलामुखी और भुवनेश्वरी पीठ तक कैसे पहुँचते हैं?

छिन्नमस्तिका के पास से एग्जिट, और पीले पीठ तक सड़क का रास्ता

· 33:59–35:04 · Also a question

प्रवेश द्वार से बाहर की ओर जाना है। जिस ओर सामने मंदिर दिखता था, उधर धूमावती और त्रिपुर भैरवी का दर्शन हुआ था; अब बाहर की ओर, भगवती छिन्नमस्तिका के मंदिर वाले एग्जिट से, वहाँ जाना है जहाँ भगवती पीतांबरा बगलामुखी का पीठ और भगवती माँ भुवनेश्वरी का पीठ है। सड़क सीधे चौराहे तक जाती है; उसके बाद सीधा नहीं जाना है, बस स्टैंड की तरफ नहीं जाना है — बाएँ मुड़कर उसी रोड पर बिल्कुल सीधे जाना है, किसी गली में नहीं घुसना है। सीधे जाने पर भगवती बगला का पीठ पूरा पीला-पीला दिखने लगेगा, तो समझ जाएँगे कि भगवती पीतांबरा का पीठ है।

54

कामाख्या में जपा गया कोई भी मंत्र सिद्ध क्यों कहा जाता है?

हर कामना की पूर्ति, और कामाख्या नाम का अर्थ

· 35:05–36:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बताया गया है कि भगवती कामरूप कामाख्या के क्षेत्र में जिस किसी भी मंत्र का, जिस किसी भी कामना के निमित्त संकल्प लेकर जप किया जाता है, वह अवश्य सिद्ध होता है — क्योंकि भगवती कामाख्या का नाम कामाख्या इसी कारण पड़ा है कि जगदंबा सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली हैं। वे श्रोताओं से चलते-चलते महात्म्य सुनने को कहते हैं, ताकि हृदय में भगवती कामाख्या और वहाँ उपस्थित सभी मंडलों के प्रति विशेष आदर, सम्मान और समर्पण का भाव आए, और मंत्र साधना में विशेष कृपा की प्राप्ति हो।

55

जहाँ भगवती के अंग गिरे, वहाँ पूजन का क्या फल है?

कई कोटि गुना लाभ, और पीतांबरा के लिए पीली सामग्री

· 36:07–36:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भागवत और महाभागवत में यह विषय आया है कि जिन-जिन स्थानों पर भगवती के अंग गिरे हैं, उन स्थानों पर जगदंबा के निमित्त जो कुछ भी जप, होम, पूजा आदि किया जाता है, उसका कई कोटि गुना लाभ प्राप्त होता है। पीतांबरा के स्थान पर पीले पुष्प, पीली चुनरी — यह सब माई के इसी स्वरूप से संबंधित है, और अंदर चढ़ाने के लिए ले सकते हैं; उन्होंने तो पहले ही पुष्पादि ले लिए थे, विशेष समर्पण आप कर सकते हैं।

56

चैत्र शुक्ल अष्टमी को सभी तीर्थ और देवता ब्रह्मपुत्र में स्नान करते हैं, और उस जल या कामाख्या के जल से पिंड दान करने पर पितरों को अक्षय लोक मिलता है

ब्रह्मपुत्र में सभी तीर्थों और देवताओं का स्नान, और पितरों के लिए अक्षय लोक

· 36:36–37:28

महाभागवत में यह विषय भी आया है कि चैत्र के महीने में शुक्ल अष्टमी की तिथि पर सभी तीर्थ और जितने देवता हैं, वे ब्रह्मपुत्र नद के जल में विधि सम्मत स्नान करके भक्ति भाव से भगवती कामाख्या के क्षेत्र में आते हैं। अगर मनुष्य उस समय स्नान करके भगवती के दर्शन करे, तो उनके अर्चन-पूजन से, भगवती की कृपा से भव बंधन से अवश्य मुक्ति हो जाती है। और ब्रह्मपुत्र नद से या भगवती के मुख्य पीठ से निर्गत जल प्राप्त करके पूर्वजों के निमित्त पिंड दान में उसका प्रयोग किया जाए, तो पितर अक्षय लोक को प्राप्त करते हैं — यानी पुनः उनका क्षय नहीं होता, जन्म नहीं होता।

57

क्या कामाख्या की पूजा केवल वाम मार्ग से ही सिद्ध होती है?

कालिका पुराण का मत कि दक्षिण और वाम दोनों से सिद्धि

· 37:29–37:51 · Also a question

भगवती का एक और विषय है, वक्ता कहते हैं: अधिकतर यह कहने को मिलेगा कि जगदंबा की पूजा-सेवा वाम पद्धति से ही सिद्ध होती है। लेकिन कालिका पुराण का यह मत है कि जगदंबा कामेश्वरी कामाख्या की पूजा आप चाहे दक्षिण मार्ग से करें या वाम मार्ग से, दोनों में ही सिद्धि लाभ होगा। इसलिए यह विषय मत रखिए कि वाम मार्ग से ही सिद्धि होगी।

58

कामाख्या का हर स्थान अनंत काल से विराजमान सिद्ध और जागृत पीठ है, जहाँ गण और द्वारपाल उपस्थित हैं

सिद्ध और जागृत पीठ, और कम भीड़ में अष्टोत्तर शतनाम

· 37:52–38:54

वे माँ के द्वार पहुँचे। वक्ता कहते हैं कि जितना भी स्थान आप देख रहे हैं, सब सिद्ध और जागृत पीठ हैं, अनंत काल से विराजमान; जगदंबा के इन सभी स्थानों पर विभिन्न गण, द्वारपाल, योगिनियों की उपस्थिति है। वे कहते हैं कि जब तक वहाँ रहें, दर्शन-पूजन, जप-तप करते रहें, और अगर इस स्थान पर बैठकर भगवती पीतांबरा के अष्टोत्तर शतनाम का जप करते हैं — विशेष करके अगर गर्भगृह में जाने का मार्ग मिल गया और दर्शन करने दिया गया, और अष्टोत्तर शतनाम कंठस्थ हो — तो जान लीजिए; क्योंकि यहाँ कभी उतनी भीड़ नहीं रहती जितनी भगवती कामाख्या के गर्भगृह में हमेशा रहेगी, जिसके लिए टिकट कटाना पड़ता है। बाहर के बाकी सात पीठों पर इस तरह की भीड़ नहीं रहेगी।

59

पीठ के गर्भगृह में जल स्रोत के पास क्या करना चाहिए?

स्रोत पर हाथ, अष्टोत्तर शतनाम, और ग्रंथ स्वयं पढ़ना

· 38:55–39:34 · Also a question

अगर मिल जाए तो दर्शन-पूजन के पश्चात भगवती के गर्भगृह में उस स्थान पर जाइए जहाँ से जल निकल रहा है, वहाँ अपना हाथ रखिए, और माई का स्मरण करते हुए पूरे भक्ति भाव से अष्टोत्तर शतनाम का एक बार भी, या मंत्र का 108 बार भी जप कर लेते हैं, तो वह मंत्र और अष्टोत्तर शतनाम जागृत और सिद्ध हो जाता है। यह शास्त्रों का वचन है: कालिका महापुराण पढ़ें, योगिनी तंत्र, महानिल तंत्र आदि का अध्ययन करें तो मिलेगा। दूसरों का क्या अनुभव है, उसे छोड़ दीजिए; लकीर के फकीर हैं तो पढ़े हुए विषय को देखिए और फिर जीवन में अनुभव कीजिए — वक्ता के कहने से कि यह उनका हुआ, आप थोड़े ही मानेंगे। स्वयं करें।

60

दस पीठों में सबसे ऊँचा पीठ कौन सा है?

भुवनेश्वरी का पीठ, कामाख्या और नीलांचल से भी ऊँचा

· 39:35–40:16 · Also a question

उसी मार्ग से भगवती पीतांबरा के पास से निकलकर भगवती भुवनेश्वरी के पीठ पर पहुँचते हैं, जो अंतिम पीठ दर्शन है। दसों महाविद्याओं में यह सबसे ऊँचा पीठ है: भगवती भुवनेश्वरी का पीठ भगवती कामाख्या से भी, नीलांचल पर्वत से भी ऊँचा है। कामरूप कामाख्या के समग्र दस पीठ लीजिए — दश महाविद्याओं के सप्त पीठ या नौ पीठ माने गए हैं — उनमें सबसे ऊँचा पीठ भगवती भुवनेश्वरी का है। इस शक्तिपीठ में भगवती भुवनेश्वरी का यह स्थान सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा स्थान है।

61

कालिका पुराण कामरूप की तुलना अन्य क्षेत्रों से कैसे करता है?

काशी, पुरुषोत्तम, द्वारावती, गंगा और विंध्याचल, फिर कामरूप

· 40:17–40:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कालिका पुराण में आया है कि वाराणसी में — काशी विशालाक्षी जी का — भगवती का पूजन किया जाए तो पूरा संपूर्ण फल प्राप्त होता है। उस फल की तुलना में पुरुषोत्तम क्षेत्र में, जहाँ भगवती विरजा, भगवती विमला विराजती हैं, पूजन हो तो द्विगुणा; द्वारावती में करें तो द्विगुणा। गंगा और विंध्याचल में पूजन करें तो 100 गुना अधिक फल मिलता है। और उसी प्रकार कामरूप प्रदेश का वर्णन करते हुए कहा है कि कामरूप प्रदेश में पूजन करने से सर्व सिद्धि की प्राप्ति, समस्त फल की प्राप्ति और त्वरित मंत्र सिद्धि का लाभ हो जाता है।

62

कामाख्या में एक बार भी पूजा करने का क्या फल है?

शिवत्व पद, एक करोड़ गौ दान, और दोनों ओर की दस-दस पीढ़ियाँ

· 40:58–41:48 · Also a question

कालिका पुराण में है कि नीलांचल पहाड़ में भगवती का पूजन किया जाए तो शत-शत गुना फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य कामाख्या में भगवती महामाया का सिर्फ एक बार भी पूजन कर लेता है, उसे इस लोक में वांछित फल की प्राप्ति होती है और परलोक में शिवत्व पद की; उस जैसा भाग्यवान और कोई नहीं, उसे सभी फलों की प्राप्ति हो जाती है। क्या फल? मनुष्य एक करोड़ गौ दान करे तो उससे जो फल मिलेगा, वही फल भगवती कामाख्या की पूजा का है। और जो मनुष्य सिर्फ एक बार कामाख्या देवी की पूजा करता है, उसके पूर्व के 10 पुरुष और पश्चात के 10 पुरुष — दस-दस पीढ़ियों — का उद्धार हो जाता है और वे देवी लोक में गमन करते हैं।

63

कामाख्या की दो बार पूजा से सौ-सौ पीढ़ियों और तीन बार से सहस्र पुरखों का उद्धार होता है, और देवी लोक में गणाधिपत्य मिलता है

सौ पीढ़ियाँ, सहस्र पुरखे, और देवी लोक में गणाधिपत्य

· 41:49–42:40

जो मनुष्य सिर्फ दो बार भगवती कामाख्या देवी की पूजा करते हैं, उनके सात वंश उद्धार होकर देवी लोक तक गमन करते हैं — सौ-सौ पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। जो तीन बार कामाख्या देवी की पूजा कर लेते हैं, वे पाप-मुक्त होकर अपने सहस्र पुरखों का उद्धार कर लेते हैं; हज़ारों-हज़ार पीढ़ियाँ उद्धार हो जाती हैं। और ऐसा व्यक्ति यह लोक, सुख, ऐश्वर्य, दीर्घायु प्राप्त करता है, और देहांत के बाद देवी लोक में गमन करके गणाधिपत्य प्राप्त करता है, जहाँ से कभी पतन नहीं होता और पुण्यों की समाप्ति नहीं होती। भुवनेश्वरी का यहाँ का बलि पीठ महिष बलि का पीठ है, सामान्य पीठ नहीं।

64

कालिका महापुराण यहाँ अष्टमी और नवमी के पूजन के विषय में क्या कहता है?

पंचरूपा के मंडल, कुल परंपरा, और अपना यंत्र कुंड पर ले जाना

· 42:41–43:29 · Also a question

कालिका महापुराण में यह भी वर्णन है कि अगर कोई साधक किसी भी अष्टमी और नवमी तिथि में भगवती पंचरूपा कामाख्या देवी के अलग-अलग मंडल अंकित करके स्वतंत्र पंचतंत्र के द्वारा पूजन करे — लेकिन यह सारा, वक्ता कहते हैं, फिर आपकी कुल परंपरा से निर्गत हो जाता है, जिस प्रकार कुल परंपरा में विधि-विधान से पूजन होता है। सीधा तात्पर्य: अगर मंत्र दीक्षा प्राप्त है तो उस अनुसार कर लीजिए। और अगर आप यंत्र अर्चन-पूजन करते हैं तो कभी कामाख्या जी जाइए; अगर अपने यंत्र का कम से कम 100 बार शतार्चन कर लिया है तो अपना यंत्र लेकर जाइए, और सौभाग्य कुंड के निकट बैठकर जो मंडल पूजन, अभिषेक, शतार्चन आपको आता हो वह कीजिए।

65

कामाख्या में पूजा गुप्त क्यों रखनी चाहिए?

कामाख्या गुप्त पीठ, और दिखाकर की गई पूजा का कोई फल नहीं

· 43:30–44:16 · Also a question

एक और विषय ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं: कामाख्या प्रदेश को गुप्त पीठ भी कहा जाता है, और यहाँ गुप्त पूजा का महत्व है। दिखाकर पूजा करने का महत्व नहीं है — यानी आप पूजा करके उसे रील्स में डाल देते हैं, वायरल कर देते हैं, या स्टेटस में डालते हैं कि हम कामाख्या आए हैं, तो उसका फल नहीं है। यह लिखित विषय है, और महानिल तंत्र का लिखित प्रमाण है कि गुप्त पूजा का बहुत महत्व है। भगवती गुप्त पूजा से अत्यंत प्रसन्न होती हैं, और गुप्त पूजन से प्रसन्न होकर जगदंबा सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।

66

क्या जप का फल केवल मुख्य गर्भगृह में ही मिलता है?

पूरे नीलांचल पर कहीं भी वही फल, और अनाधिकृत मंत्र का जप नहीं

· 44:17–44:58 · Also a question

कामाख्या जी आइए तो हल्ला मत कीजिए कि हम कामाख्या जा रहे हैं, और यह मत दिखाइए कि हम बहुत बड़े तांत्रिक बन गए हैं; गुप्त होकर पूजन कीजिए। वहाँ बैठिए तो भी अपने आप को बहुत दिखाने की आवश्यकता नहीं — कहीं कोने में बैठिए। इतना बड़ा स्थान है, कहीं भी पूजन करेंगे तो पूरा फल मिलेगा। ऐसा नहीं है कि केवल भगवती के मुख्य गर्भगृह में जाएँगे तो ही फल है: पूरे नीलांचल पर्वत पर कहीं भी बैठकर जप कीजिए तो जगदंबा वही फल देती हैं जो गर्भगृह का है। तो मंदिर प्रांगण में किसी भी स्थान पर बैठकर अपने मंत्र का पुरश्चरण कीजिए — लेकिन कोई अनाधिकृत मंत्र का जप मत कीजिए, क्योंकि इस क्षेत्र की ऊर्जा अति उग्र, बहुत प्रचंड है और तुरंत प्रभाव देती है।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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