ज्योतिष विद्या और तंत्र साधना — दोनों प्रतिद्वंद्वी नहीं, एक-दूसरे के पूरक क्यों हैं
वक्ता का मत कि ज्योतिष और तंत्र पूरक हैं: किसी भी तंत्र-उपाय से पहले कुंडली देखनी चाहिए, रत्न लग्न के अनुसार चलते हैं, अभिचार के लिए तंत्र चाहिए, और साढ़ेसाती धैर्य का फल देती है।
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ज्योतिष और तंत्र एक-दूसरे के पूरक, हर एक की अपनी मर्यादा
पहले कुंडली, फिर वैदिक या तंत्रोक्त शांति
वक्ता कहते हैं कि ज्योतिष और तंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं, यद्यपि ऑनलाइन साधक और ज्योतिषी एक-दूसरे को पाखंडी कहते रहते हैं। जन्म कुंडली के माध्यम से ज्योतिष पूर्व कर्मों से उत्पन्न संकट और आगे होने वाली हानि का विश्लेषण करता है; उसके बाद के शांति कर्म या तो वैदिक विधि से होते हैं या तंत्रोक्त विधि से, और भूत-प्रेत जैसी व्याधि के लिए तंत्र तक जाना पड़ता है। तंत्र भी यह नहीं कह सकता कि सिद्ध शक्तियों से सब कुछ जान लेगा और उसे ज्योतिष की आवश्यकता नहीं — हर विद्या की एक मर्यादा है, और कोई महाकाल या महादेव नहीं है कि सब कुछ जान ले।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि ज्योतिष और तंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। फिर भी आज YouTube और Facebook पर अच्छे सत्पथ पर चलने वाले साधक भी एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं: तंत्र प्रवृत्ति के लोग ज्योतिषियों को पाखंडी कहते हैं और ज्योतिषी तांत्रिकों को पाखंडी कहते हैं। वास्तविकता, वे कहते हैं, यही है कि दोनों एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं। वे समझाते हैं कि कैसे: ज्योतिष विद्या के माध्यम से, जन्म कुंडली से, हम पूर्व में किए गए कर्मों के कारण उत्पन्न परिस्थिति का विश्लेषण करते हैं — कौन-सा संकट आया है और आगे क्या-क्या हानि होने वाली है। विश्लेषण के बाद जब उनके शांति कर्म की ओर बढ़ते हैं तो दो रास्ते होते हैं — या तो वैदिक विधि से आगे बढ़ें या तंत्रोक्त विधि से। अगर ज्योतिष से पता चले कि कुंडली में ऐसे दोष हैं जिनके कारण शरीर में भूत-प्रेत की व्याधि लग गई है या इस प्रकार के कष्ट उत्पन्न हो गए हैं, तो निवारण के लिए कहाँ जाएँगे? ज्योतिषीय उपाय कर सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, तंत्र की आवश्यकता पड़ेगी। तो, वे पूछते हैं, कोई कैसे कह सकता है कि ज्योतिष तंत्र के बिना पूर्ण है? तंत्र की ओर से भी, वे कहते हैं, यह नहीं कहा जा सकता कि "हम ऐसी शक्तियों को सिद्ध कर रहे हैं जिनसे हर चीज़ जान लेंगे, हमें ज्योतिष की कोई आवश्यकता नहीं"। हर चीज़ की अपनी मर्यादा है, अपनी लिमिटेशन है, और दोनों में से कोई भी उससे आगे नहीं जा सकता — आप सदैव महाकाल नहीं हैं, महादेव नहीं हैं कि हर चीज़ जान लेंगे। लेकिन दोनों विद्याओं के माध्यम से इतना अवश्य जाना जा सकता है। न कोई त्याज्य है, न किसी में कमी है, और दोनों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है; लोगों ने आज के समय में बना दी है, और यह लोगों की गलती है।
भाग्येश का दान कभी नहीं: किसी भी तांत्रिक उपाय से पहले कुंडली देखें
नब्बे प्रतिशत काम हुआ, आखिरी दस प्रतिशत छूट गया
वक्ता कहते हैं कि नवम भाव में बैठा ग्रह भाग्येश है, भाग्य का कारक; अगर वह लग्न के अनुसार मित्र ग्रह है और अंश के अनुसार बली है, तो ज्योतिष कहता है कि उस ग्रह का दान कभी नहीं करना चाहिए — भाग्येश का कभी दान नहीं होता। अगर तंत्र का जानकार कुंडली देखे बिना उसी ग्रह का दान बता दे, तो तात्कालिक संकट में कमी हो सकती है, लेकिन बाद में भाग्य साथ नहीं देता: 90% काम हो जाता है और अंतिम 10% किसी और को मिल जाता है। इसलिए पहले कुंडली का विश्लेषण अवश्य हो; तभी तंत्र के माध्यम से किया गया दान या क्रिया पूर्ण फल देती है।
दोनों विद्याएँ कैसे एक-दूसरे को पूर्ण करती हैं, इसके पहले उदाहरण के रूप में वक्ता जन्म कुंडली का नवम भाव लेते हैं। नवम भाव में बैठा ग्रह, वे कहते हैं, हमारा भाग्येश है, भाग्य का कारक। अगर वह ग्रह लग्न कुंडली के अनुसार मित्र है और बलाबल — अंश — के अनुसार उसमें बल भी है और वह सही तरीके से फल देने में सक्षम है, तो ज्योतिष कहता है कि उस ग्रह के अनुसार कभी दान नहीं करना चाहिए। वे इसे प्रमुख नियम के रूप में दोहराते हैं: भाग्येश का कभी दान नहीं होता। अब, वे कहते हैं, मान लीजिए कि कोई तंत्र विद्या जानने वाला इसका विश्लेषण नहीं करता, कुंडली नहीं देखता, और तंत्र के माध्यम से जो कुछ देखा उसके आधार पर ऐसी चीज़ों के दान बता देता है जिनसे आपकी परेशानी का निर्मूलन या उसमें कमी होनी थी। आप क्या करेंगे? आप सीधे जाकर जो उन्होंने कहा वह कर लेंगे। हो सकता है उनकी बताई विधि से जीवन के संकट में कमी हो जाए — लेकिन जब आपने भाग्येश का दान कर दिया, तो आने वाले समय में भाग्य आपका साथ नहीं देगा। भाग्य कहाँ साथ देता है? आपका काम 90% हो जाएगा और 10% पर भाग्य का साथ नहीं मिलेगा; जो आपको मिलने वाला था वह किसी और को मिल जाएगा। वे बताते हैं कि कैसे लोग प्रतियोगिता में दो-तीन नंबर से पीछे रह जाते हैं, कैसे नौकरी या टेंडर मिलते-मिलते रह जाता है — वहीं भाग्य निर्णायक होता है। इसलिए भाग्येश को सदैव प्रबल रखना चाहिए। तो, वे पूछते हैं, कोई कैसे कह सकता है कि ज्योतिष और तंत्र अलग-अलग चीज़ें हैं, या ज्योतिष ठग विद्या है और तंत्र ठग विद्या है? अगर आपके विचार ऐसे हैं, वे कहते हैं, तो इसलिए कि आप स्वयं ठग हैं और वह प्रवृत्ति आपके अंदर है, इसीलिए एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। दोनों की अति बुरी है। इसलिए दोनों का समन्वय करके आगे बढ़ना चाहिए: ज्योतिष के माध्यम से जन्म कुंडली का विश्लेषण अवश्य हो, और उसके बाद ही तंत्र के माध्यम से जो दान-पुण्य और क्रिया-कर्म करवाते या करते हैं, वह पूर्ण रूप से फलीभूत होगा।
रत्न लग्न कुंडली से पहने जाते हैं, लक्षण से नहीं
हर किसी को मोती — चंद्र मारकेश हो तो घातक
वक्ता कहते हैं कि तंत्र प्रवृत्ति के लोग हाथों में तरह-तरह की रत्न-अंगूठियाँ धारण कर लेते हैं, लेकिन रत्न विज्ञान की अपनी मर्यादा है: चार उंगलियों में रत्न लग्न कुंडली के अनुसार धारण किए जाते हैं, यद्यपि कुछ ज्योतिषी चंद्र कुंडली से भी धारण करवा देते हैं। मानसिक अशांति पर किसी को भी चाँदी में मोती पहना देने का प्रचलन — जिसे तांत्रिक भी कुंडली देखे बिना दोहरा देते हैं — कुछ दिन शांति दे सकता है, उसके बाद जीवन तहस-नहस होने लगता है, और अगर उस कुंडली में चंद्र मारकेश हों तो मृत्यु-तुल्य कष्ट भी मिल सकता है।
वक्ता दूसरी बात पर आते हैं: तंत्र प्रवृत्ति के लोग हाथों में विभिन्न प्रकार की अंगूठियाँ और रत्न धारण कर लेते हैं। वहाँ भी, वे कहते हैं, मर्यादा है। रत्न विज्ञान अपने आप में एक विद्या है, उसकी अपनी अलग श्रृंखला और शाखा है, अपना अलग ज्ञान है। अंगूठे को छोड़कर चार उंगलियों में विभिन्न प्रकार के रत्न धारण किए जाते हैं, और वे लग्न कुंडली के अनुसार धारण किए जाते हैं। कुछ ज्योतिष विद्वान, वे बताते हैं, चंद्र कुंडली के अनुसार भी धारण करवा देते हैं। और एक प्रचलन है: मानसिक अशांति हो तो चाँदी में मोती धारण करवा दो — किसी को भी मोती पहना दिया जाता है। तांत्रिक और तंत्र क्षेत्र के जानकार भी यही कर देते हैं, क्योंकि कुंडली तो देखनी नहीं है; सीधे कह देते हैं, अच्छा मानसिक परेशानी है, इस तरह की बाधा आ रही है, मोती धारण कर लो। ठीक है, आपने धारण कर लिया, वे कहते हैं। लेकिन मान लीजिए आपकी लग्न कुंडली उसे बिल्कुल अनुमति ही नहीं देती। कुछ दिन के लिए मानसिक शांति मिल सकती है, उसके बाद आपका जीवन तहस-नहस होना शुरू हो जाएगा; मृत्यु-तुल्य कष्ट भी मिल सकता है अगर आपकी कुंडली के अनुसार चंद्र मारकेश हों। इसलिए, वे कहते हैं, इस चीज़ को कभी अंडरएस्टीमेट मत कीजिए।
रत्न वास्तविक प्रभाव वाला शास्त्र है, और एक साथ नहीं पहने जाते
एक प्रतिशत प्रभाव भी बहुत कुछ बना-बिगाड़ देता है
वक्ता कहते हैं कि विभिन्न रत्न एक साथ धारण नहीं किए जाते, फिर भी बहुत से साधक और उनके अनुयायी ढेर सारे रत्न पहन लेते हैं और कहते हैं कि रत्नों का कोई विशेष प्रभाव नहीं। अगर रत्न 1% भी प्रभाव देता है, वे कहते हैं, तो बहुत कुछ बना देता है और बहुत कुछ बिगाड़ देता है; रत्न विज्ञान ऋषि-महर्षियों का लिखा पूरा शास्त्र है, इसलिए उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, न यह कहा जा सकता कि वह लाभ या हानि नहीं देता — वह दोनों देता है, और उसका प्रयोग कैसे करना है यह पता होना चाहिए।
इसके साथ ही, वक्ता कहते हैं, विभिन्न प्रकार के रत्न एक साथ धारण नहीं किए जाते। फिर भी लोग बहुत सारे रत्न पहन लेते हैं, उनके अनुयायी भी वैसा ही करते हैं, और कहते हैं कि रत्न का बहुत अधिक विशेष प्रभाव नहीं है; कुछ कहते हैं कि कोई प्रभाव ही नहीं है। अगर रत्न 1% भी प्रभाव देता है, वे उत्तर देते हैं, तो वह बहुत कुछ काम बना देता है और बहुत कुछ बिगाड़ देता है। "प्रभाव नहीं देता" केवल आपका अपना अनुभव है। रत्न एक विज्ञान है, उस पर पूरा शास्त्र बना हुआ है, ऋषि-महर्षियों ने उस पर लिखा है — इसलिए उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, और यह नहीं कह सकते कि वह लाभ नहीं देता या हानि नहीं देता। वह दोनों देता है; जानना यह है कि उसका प्रयोग कैसे करना है।
नीलम और मोती एक साथ विष योग बनाते हैं: कर्क लग्न का उदाहरण
चंद्र स्वामी, शनि मारकेश, और अँगूठियों से भरा हाथ
वक्ता कर्क लग्न की कुंडली लेते हैं: चंद्रमा उसके स्वामी और प्रमुख देवता हैं, चंद्र के मित्र सूर्य और बृहस्पति हैं, और अष्टम, द्वितीय और षष्ठ भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। अगर उस कुंडली में कोई शनि का नीलम पहन ले, और चंद्रमा अच्छे हैं इसलिए मोती भी पहन ले, तो दोनों मिलकर विष योग बना देते हैं — शनि और चंद्रमा मिलकर विष योग बनाते हैं। बाकी उंगलियों में और रत्न सजा लें तो जीवन तहस-नहस होने लगता है। रत्न, पत्थर और रंग हल्के में लेने की चीज़ नहीं हैं; हर चीज़ पाखंड नहीं होती, हाँ हर चीज़ की अति पाखंड होती है।
उदाहरण के रूप में वक्ता कर्क लग्न की कुंडली लेते हैं, उनके लिए जिन्हें थोड़ा ज्योतिष का ज्ञान हो। कर्क लग्न में चंद्रमा प्रमुख ग्रह हैं, उसके देवता माने जाते हैं। चंद्र की मित्रता किससे है? भगवान सूर्य से और भगवान बृहस्पति से। और वहाँ मारकेश कौन हैं? जो अष्टम भाव में पड़ेंगे वे मारकेश होंगे; द्वितीयेश भी मारकेश होते हैं; षष्ठमेश मारकेश होते हैं। अब मान लीजिए कि इस कर्क लग्न की कुंडली में हमने शनि देव का रत्न — नीलम — धारण कर लिया, और साथ में, क्योंकि कर्क लग्न है और चंद्रमा अच्छे हैं, मोती भी धारण कर लिया। एक बात सदैव याद रखिए, वे कहते हैं: नीलम और मोती एक साथ धारण करेंगे तो वह आपके जीवन में विष योग बना देगा। शनि और चंद्रमा मिलकर विष योग बनाते हैं। और फिर बची हुई दो उंगलियों में भी किसी-किसी प्रकार के रत्न पहन लेते हैं, पूरा हाथ अच्छी तरह सजा लेते हैं — उसके बाद जीवन तहस-नहस होना शुरू हो जाता है। इसलिए इसे कभी अंडरएस्टीमेट मत कीजिए, वे दोहराते हैं: रत्नों, पत्थरों और रंगों को हल्के में न लें, वे जीवन पर बहुत प्रभाव डालते हैं। हर चीज़ पाखंड नहीं होती — लेकिन हर चीज़ की अति पाखंड होती है, हर चीज़ की अति बुरी होती है। अंधविश्वासी नहीं बनना है, लेकिन जो बातें विज्ञान-सम्मत हैं उन्हें मानना चाहिए और जितनी उनकी सीमा है, जितना करना है, उतना पकड़कर चलना चाहिए।
मारकेश ग्रहों का दान करें, मित्र ग्रहों को धारण करें
नियम उलटने पर थोड़ा लाभ, फिर उल्टा प्रभाव
वक्ता कहते हैं कि दिन के अनुसार रंग चुनने तक जाना ज़रूरी नहीं, लेकिन जो अनुकूल है उसे ग्रहण करके चलें। ज्योतिष कहता है: जो ग्रह मारकेश हैं उनका दान करें और उन्हें शांत कराने के लिए पूजा-पाठ करें, और जो ग्रह लग्न के अनुसार मित्र हैं उनके रत्न और रंग धारण करें। जिन तंत्र प्रवृत्ति के लोगों को यह जानकारी नहीं, वे जो धारण करना है उसका दान करवा देते हैं और जिसका दान करना है उसे धारण करवा देते हैं; कुछ समय फायदा हो सकता है, फिर उल्टा प्रभाव देता है, और दोष पत्थर पर जाता है।
ऐसा नहीं है, वक्ता कहते हैं, कि दिन के अनुसार रंगों का चयन करके ही चलना पड़े — लेकिन चलें, और तरीके से चलें: जो आपके लिए अनुकूल है उसे ग्रहण करें। ज्योतिष कहता है कि जो ग्रह आपके मारकेश हैं उनका दान करना चाहिए और उन्हें शांत कराने के लिए पूजा-पाठ करना चाहिए; और जो ग्रह लग्न के अनुसार आपके मित्र हैं — उनके रत्न धारण करने चाहिए, उनके रंग धारण करने चाहिए। यहाँ, वे कहते हैं, जिन तंत्र प्रवृत्ति के लोगों को यह जानकारी नहीं है, वे उन्हीं चीज़ों का दान करवा देते हैं जिन्हें धारण करना था। जो धारण करना है उसका दान करवाएँ और जिसका दान करवाना है उसे धारण करवा दें, तो वह उल्टा प्रभाव देने लगेगा: कुछ समय के लिए फायदा दे सकता है, बाद में उल्टा प्रभाव देगा। फिर लोग परेशान होते हैं और दोष रत्नों को जाता है — इस पत्थर ने खराब काम कर दिया, इस पत्थर ने गलत काम कर दिया। ऐसी और भी बहुत सी बातें हैं, वे जोड़ते हैं; यह इधर की बात हो गई।
तंत्र भी नौ ग्रहों और 27 नक्षत्रों पर ही चलता है
कर्मों का फल देने और संतुलन रखने के लिए बने
दूसरी ओर मुड़कर वक्ता कहते हैं कि ज्योतिषी तांत्रिकों को बहुत अंडरएस्टीमेट करते हैं, कहते हैं तंत्र से कुछ नहीं होता, जो भी है नौ ग्रहों से है। उनका उत्तर: आपकी विद्या भी नौ ग्रहों से है और जो तंत्र में गए हैं उनकी विद्या भी नौ ग्रहों से है — बिना नौ ग्रहों और 27 नक्षत्रों के कुछ नहीं चलता। वे इसलिए बने हैं कि हमारे कर्मों का फल दें और जीवन में संतुलन रखें: गलत कर्म का दंड मिलता है और अच्छे कर्म से पुण्य बढ़ता है, इस जन्म में या अगले में, और यह हम पर निर्भर करता है।
तंत्र पक्ष की बात पूरी करके वक्ता ज्योतिषियों की ओर मुड़ते हैं, जो उनके अनुसार तांत्रिकों और तंत्र विद्याओं के जानने वालों को बहुत अंडरएस्टीमेट करते हैं। वे कहते हैं कि उससे कुछ नहीं होता — जो भी है नौ ग्रहों से है। उनका उत्तर: आपकी विद्या भी नौ ग्रहों से है, और जो तंत्र में गए हैं उनकी विद्या भी नौ ग्रहों से है। बिना नौ ग्रहों के कोई चीज़ नहीं चलती, बिना 27 नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के कोई नहीं चलता। वे बने ही इसलिए हैं कि हमारे कर्मों का फल दें और उसमें संतुलन बनाए रखें। जब हम गलत कर्म करेंगे तो उसके अनुसार दंड मिलेगा, फिर जीवन संतुलित होगा; अगर अच्छे कर्म करेंगे तो हमारी अच्छाई बढ़ेगी और पुण्य में वृद्धि होगी, और फिर जो जन्म होगा — इस जन्म में या अगले में — और अच्छा फल मिलेगा और हम आगे बढ़ेंगे। यह हम पर निर्भर करता है।
क्या अभिचार और भूत-प्रेत बाधा केवल ज्योतिषीय उपायों से ठीक हो सकती है?
अभिचार के आगे अच्छे ज्योतिषी तिनका नहीं हिला पाते
वक्ता कहते हैं नहीं। ज्योतिषी तंत्र के षट्कर्मों को अंडरएस्टीमेट करते हैं: अभिचार से ग्रसित को मानसिक रोगी कह देते हैं, प्रेत या भूत बाधा से असंतुलित को कहते हैं नौटंकी कर रहा है, और उपाय होता है रत्न, "8000 जप करा लो", या "राहु की दशा है इसलिए भ्रमित हो रहे हो" — काम खत्म। लेकिन अभिचार बहुत बड़ी चीज़ है; अच्छे-अच्छे ज्योतिषियों की विद्या उसके आगे रखी रह जाती है, तिनका नहीं हिला पाती, और लोग पाठ करते-करते जीवन बिता देते हैं, कुछ नहीं हिलता। वहाँ तंत्र विद्या का अनुसरण करना पड़ता है और उसके जानकारों का साथ लेना पड़ता है; समाज को उनकी भी आवश्यकता है।
तंत्र कर्म में षट्कर्म हैं, वक्ता कहते हैं, और लोग षट्कर्मों को अंडरएस्टीमेट करते हैं। ज्योतिष प्रवृत्ति के लोग कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता। जो अभिचार से ग्रसित है उसे मानसिक रोगी कह देते हैं। जिसके ऊपर किसी प्रकार की बाधा है — प्रेत बाधा, भूत बाधा — जिससे उसका मस्तिष्क असंतुलित हो गया है, उसे कहते हैं नौटंकी कर रहा है, ऐसा कुछ नहीं होता। सामान्य रूप से रत्न पहना देंगे, जप करने को कह देंगे — "हाँ ठीक है, 8000 जप करा लो" — कह देंगे राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। के कारण हो रहा है, राहु की दशा है इसलिए भ्रमित हो रहे हो, भ्रम की स्थिति बन गई है। बस, काम खत्म। लेकिन यह बहुत बड़ी चीज़ है, वे कहते हैं: अभिचार अपने आप में बहुत बड़ी चीज़ है। अच्छे-अच्छे ज्योतिषियों की विद्या रखी की रखी रह जाती है; तिनका नहीं हिला पाते। एक-दो छोटे-मोटे वैसे केस संभाल लिए हों तो कह देते हैं, हाँ, ज्योतिष विद्या से ठीक हो गया था, ऐसे-ऐसे करवाया था तो सब ठीक हो गया — ऐसा कुछ नहीं है जो ज्योतिष विद्या से ठीक न हो सके, हमने कहा शंकर जी का यह पाठ कर लो, ठीक हो गया। ऐसे लोग भरे पड़े हैं, वे कहते हैं, और पाठ करते-करते जीवन बीत जाता है, कुछ नहीं हिलता। वहाँ, वे कहते हैं, तंत्र विद्या का अनुसरण करना पड़ता है, तंत्र विद्याओं का साथ लेना पड़ता है, और ऐसे लोगों का साथ लेना पड़ता है जो इस प्रकार की विद्याओं का ज्ञान रखते हैं। उनकी भी आवश्यकता हमारे समाज को है। हमारे सनातन धर्म में जब ये सारी चीज़ें बनाई गईं तो हर एक की कुछ न कुछ आवश्यकता पड़ी थी — तभी बनी है। ज्योतिष अपने आप में महत्वपूर्ण है, तंत्र अपने आप में महत्वपूर्ण है, और दोनों का समन्वय करके जब अध्यात्म में आगे बढ़ते हैं तभी सही फल मिलता है।
पाखंडी ज्योतिषी या तांत्रिक के लक्षण
रोज़ रंग बदलवाना, बात-बात में अभिचार, हर दशा पर दान
वक्ता कहते हैं कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने से कोई अच्छा फल नहीं मिलता: ज्योतिषी तंत्र जानने वालों को नीचा न दिखाए, और जिस तांत्रिक को भगवती कृपा से कुछ प्राप्त है वह ज्योतिषियों को अंडरएस्टीमेट न करे, क्योंकि दोनों विद्याएँ लोक-कल्याण के लिए बनी हैं। पाखंडियों को आप स्वयं पहचान लेंगे — जो रोज़ रंग बदलवाए, जो तांत्रिक बात-बात में आपके ऊपर अभिचार बताए, जो कहता रहे राहु की महादशा है, अब केतु की, अब मंगल की, यह जाप करो, वह दान करो। पूछिए कि उससे आपको वास्तव में क्या रिज़ल्ट और कितनी शांति मिल रही है; उतना ही करें जितना जेब अनुमति दे।
वक्ता कहते हैं कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने से कोई अच्छा फल नहीं मिलता। अगर आप ज्योतिषी हैं तो तंत्र विद्या जानने वालों को नीचा न दिखाएँ; और अगर आप तंत्र प्रवृत्ति के हैं, ऐसे तांत्रिक जिन्हें अपनी विद्याओं का ज्ञान है और भगवती कृपा से कुछ प्राप्त है, तो ज्योतिषियों को अंडरएस्टीमेट न करें, न उन्हें कहें कि आप गलत हैं। दोनों की विद्याएँ अपनी-अपनी जगह अपना महत्व रखती हैं और लोक-कल्याण के लिए ही बनी हैं; वे एक-दूसरे की पूरक हैं। वे आशा करते हैं कि श्रोता दोनों प्रवृत्ति के व्यक्तियों का सही तरीके से सम्मान करेंगे। जो गलत व्यक्ति पाखंड फैलाते हैं, वे कहते हैं, उन्हें आप स्वयं समझ जाएँगे। जो बात-बात में ज्योतिष की बात करे, जो रोज़ आपका रंग बदलवाए — आज के समय में उतना नहीं देखा जाता, एक सीमा है, उतनी जानकारी होनी चाहिए; आप अंधविश्वासी नहीं बन सकते। वैसे ही तांत्रिक प्रवृत्ति का व्यक्ति जो बात-बात में अभिचार की बात करे — "हाँ, तुम्हारे ऊपर यह हो गया है, यह करवा लो, वह करवा लो" — या जो कहता चले: राहु की महादशाज्योतिष में किसी एक ग्रह की दीर्घ शासन-अवधि, जिसमें उसी ग्रह के फल प्रमुख रूप से प्रकट होते हैं। चल रही है, राहु का जाप करा लो; अब केतु का करा लो; मंगल की महादशा चल रही है तो यह दान करो, वह करो। उससे आपको क्या रिज़ल्ट मिल रहा है, वे पूछते हैं, और कितनी शांति हो रही है? जेब अनुमति देती है तो उतना कर पाएँ; नहीं देती तो एक सीधा उपाय है, जिस पर वे आगे आते हैं।
जन्म नक्षत्र के अनुसार इष्ट साधना — सबसे सुगम उपाय
लंबे समय तक पकड़े रहें, फिर दीक्षा लें
अगर जेब अनंत उपायों की अनुमति नहीं देती, तो वक्ता कहते हैं कि सीधी बात — और उनके अपने अनुभव में सबसे अच्छे परिणाम — ज्योतिष के अनुसार, अपने जन्म नक्षत्र के अनुसार चलने में है: जन्म नक्षत्र के अनुसार अपने इष्ट की साधना करें। यह सबसे सुगम उपाय है और कुछ नहीं, लेकिन लंबे समय तक पकड़कर करना होगा। उसके बाद कोई योग्य गुरु या योग्य साधक मिल जाए और उनके सान्निध्य में किसी विधि-विधान से दीक्षित होकर साधना करें तो अच्छा फल मिलता है।
अगर आपकी जेब उतना अनुमति नहीं देती, वक्ता कहते हैं, तो सीधी सी बात है: सबसे अच्छा ज्योतिष के अनुसार, या अपने जन्म के नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के अनुसार — जो परिणाम सबसे अच्छे मिलते हैं, उनके अपने अनुभव में, वे जन्म नक्षत्र के अनुसार मिलते हैं। आपका जो जन्म नक्षत्र है उसके अनुसार अपने इष्ट की साधना करनी चाहिए; यह सबसे सुगम उपाय है, और कुछ नहीं। लेकिन लंबे समय तक करें, वे जोड़ते हैं — पकड़कर रखना होगा। उसके बाद किसी के सान्निध्य में जाएँ: कोई योग्य गुरु मिल जाए या कोई योग्य साधक मिल जाए, और उनके द्वारा किसी विधि-विधान से दीक्षित होकर साधना करें तो अच्छा फल प्राप्त होगा।
लंबी साधना का फल क्यों नहीं: पहले तंत्र की जाँच, फिर कुंडली
सच्चा जानकार कह देता है कि तंत्र का प्रभाव नहीं है
वक्ता कहते हैं कि ज्योतिष के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि लंबे समय से साधना करने वाले को फल क्यों नहीं मिल रहा। जो तंत्र का सच्चा जानकार होगा वह देखकर दो में से एक बात कहेगा: या तो आपके ऊपर तंत्र का प्रभाव है और वह बताएगा कि कैसे हटाना है, या तंत्र का कोई प्रभाव नहीं है और वह कहेगा कि हो सकता है ग्रह दोष हो, एक बार जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाइए — जहाँ पता चल सकता है कि, जैसे, लग्न के अनुसार शनि की साढ़ेसाती चल रही है।
ज्योतिष के माध्यम से, वक्ता कहते हैं, यह जाना जा सकता है कि जो व्यक्ति लंबे समय से साधना कर रहा है उसे फल क्यों नहीं मिल रहा। तंत्र के जानकार देखेंगे — अगर सच में जानकारी होगी — और दो बातें होंगी। या तो कहेंगे हाँ, आपके ऊपर तंत्र का प्रभाव है, और फिर बताएँगे कि कैसे हटाना है। या, जो सही जानकार होंगे, वे देखकर कह देंगे नहीं, तंत्र का कोई प्रभाव नहीं है; हो सकता है आपके ऊपर ग्रह का दोष हो, एक बार जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाइए। और वहाँ, वे कहते हैं, पता चल सकता है कि लग्न के अनुसार आपकी शनि साढ़े साती चल रही है — जिससे वे अगली बात पर आते हैं।
क्या शनि की साढ़ेसाती हमेशा बुरी होती है?
रुका साधना-फल शनि के पीछे बाँध की तरह जमा होता है
वक्ता कहते हैं नहीं। लोग मान लेते हैं कि साढ़ेसाती हमेशा बुरा करेगी, लेकिन हो सकता है कुंडली में शनि दो विपरीत राजयोग बनाकर बैठे हों और साढ़ेसाती में ही आपको मालामाल करने वाले हों, जबकि डराने वाला "पोंगा पंडित" आपको डराकर पैसा लुटवाता जाता है। साढ़ेसाती केवल उनके लिए बुरी है जिन्होंने गलत कर्म किए; सामान्यतः वह बहुत कुछ देने में सक्षम है। अगर ढैया या साढ़ेसाती में साधना फलीभूत नहीं हो रही, तो फल रुककर बाँध के पानी की तरह जमा होता जाता है; जब वह दबाव नहीं संभलता तो शनैश्चर देने पर आते हैं और बहुत कुछ देते हैं — लेकिन तब तक धैर्य से साधना में लगे रहना है। यह, वे कहते हैं, ज्योतिष से देखा जा सकता है, तंत्र से नहीं, इसीलिए दोनों पूरक हैं।
जब कुंडली में दिखे कि शनि साढ़े साती चल रही है, वक्ता कहते हैं, तो लोग बस मान लेते हैं कि साढ़ेसाती चल रही है, इसलिए हमेशा बुरा ही करेगी। लेकिन हो सकता है कि आपकी जन्म कुंडली में शनि दो विपरीत राजयोग बनाकर बैठे हों, साढ़ेसाती चल रही हो और साढ़ेसाती में ही वे आपको मालामाल करने वाले हों — और आपको जानकारी नहीं, क्योंकि पोंगा पंडित जी पहले ही दौड़कर आपको डरा चुके हैं कि साढ़ेसाती चल रही है, आपकी हालत खराब होने वाली है, और आप डर के मारे पैसा लुटाते जाते हैं। इसलिए जानकारी रखनी होगी, और ऐसे योग्य साधकों और योग्य ज्योतिषियों के पास जाना होगा जो आपको डराएँ नहीं बल्कि इसे सही तरीके से लेकर चलने में मदद करें। साढ़ेसाती हर किसी के लिए खराब नहीं होती; जिन्होंने गलत कर्म किए हैं उन्हें तो वैसे भी डरना चाहिए, लेकिन सामान्य रूप से वह बहुत कुछ देने में सक्षम होती है। अगर साधना फलीभूत नहीं हो रही और ढैया या साढ़ेसाती चल रही है, वे समझाते हैं, तो वह रुकेगा: फल एक जगह जमा होता जाएगा, और जब वह बाँध उस दबाव को नहीं संभाल पाएगा, तब भगवान शनिदेव — शनि ग्रह, शनैश्चर — जब देने पर आएँगे तो बहुत कुछ देंगे। शनि की कृपा से फिर बहुत कुछ मिलेगा; लेकिन तब तक लगे रहना है, छोड़ना नहीं है, और उतना धैर्य, उतना पेशेंस आपके अंदर होना चाहिए। यह, वक्ता कहते हैं, ज्योतिष के माध्यम से देखा जा सकता है, और तंत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। इसलिए दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और किसी को अंडरएस्टीमेट नहीं करना है। वे समापन में श्रोताओं से कहते हैं कि दोनों विद्याओं को सम्मानपूर्वक जानें, योग्य लोगों के सान्निध्य में बैठें ताकि ज्ञान बढ़े, और किसी को छोटा या नीच समझने के बजाय इन विद्याओं के द्वारा अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।