होलिका की रात्रि में मंत्र जाप कैसे करें कि मंत्र सिद्ध हो
होलिका की रात्रि में साबर मंत्र का जाप कैसे करें कि मंत्र सिद्ध हो जाए, इस पर टिप्पणियाँ।
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होलिका की रात्रि में साबर मंत्र सिद्ध करने की पूर्व-शर्त: मंत्र पहले से जाप में हो
होलिका की रात्रि में पहली बार का मंत्र नहीं
वक्ता कहते हैं कि होलिका की रात्रि में जिस सबर मंत्र को जागृत करना हो, वह कभी ऐसा मंत्र न हो जिसका जाप उसी रात पहली बार किया जा रहा हो — उसका कोई विशेष लाभ नहीं मिलता। मंत्र पहले से कंठस्थ हो और नियमित जाप में हो। गुरुमुख से प्राप्त साबर मंत्र पहले से सर्वसमर्थ सिद्ध होता है और होलिका की रात्रि में उसका पुनः पुरश्चरण उसे अमोघ बना देता है; स्वयं इंटरनेट, YouTube, Facebook या किसी ग्रंथ से लिया हुआ मंत्र होलिका से कम से कम चार-पाँच दिन पहले, या एकादशी से, एक निर्धारित समय पर प्रतिदिन एक माला जाप के साथ शुरू कर देना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई होलिका की रात्रि में सबर मंत्र सिद्ध करने जा रहा है, तो सबसे पहले यह ध्यान रखे: वह ऐसा मंत्र न हो जिसका जाप उस रात से पहले कभी किया ही न हो। ऐसा हुआ तो, वे कहते हैं, कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा। साबर मंत्र कंठस्थ हो और पहले से उसका जाप चल रहा हो। वे जोड़ते हैं कि गुरुमुख से प्राप्त साबर मंत्र पहले से ही सर्वसमर्थ सिद्ध होता है; यदि होलिका की रात्रि में उसका पुनः पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके उसे फिर से जागृत कर लिया जाए तो वह अमोघ हो जाता है। लेकिन यदि किसी ने स्वयं किसी भी माध्यम से — इंटरनेट, YouTube, Facebook या किसी ग्रंथ से — अपने कार्य, रक्षा, उन्नति या कल्याण के लिए कोई मंत्र लिया है और उसे शुद्ध करना चाहता है, तो वे कहते हैं कि होलिका से कम से कम चार-पाँच दिन पहले, या कम से कम एकादशी से, एक निर्धारित समय पर प्रतिदिन उस मंत्र की एक माला जाप शुरू कर देनी चाहिए।
होलिका से पहले के दिनों के जाप की व्यवस्था: देवता के अनुसार वस्त्र, आसन, दिशा, ज्योत, माला और दैनिक संख्या
विधि देवता के सूक्ष्म स्वरूप के अनुसार
वक्ता कहते हैं कि जाप की विधि मंत्र के देवता के अनुसार हो: भगवती काली जैसे उग्र देव हों तो लाल वस्त्र, हनुमान जी हों तो लाल या पीला, पीताम्बरा हों तो पीला, भैरव जी हों तो पीला या लाल। आसन कंबल या कुश आसन का हो, दिशा सदैव पूर्व या उत्तर, और जब तक जाप चले एक ज्योत प्रज्वलित रहे; रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम है। भगवती साबरी — जो दुर्गा का एक स्वरूप हैं, शिव के किरातेश्वर अवतार और पार्वती के समय का स्वरूप — तथा अपने कुलदेवी-देवताओं का स्मरण करके प्रतिदिन कम से कम एक माला (108) जाप करें, ताकि तीन-चार दिनों में मंत्र कंठस्थ हो जाए और जाप पहले से चलने लगे।
वक्ता कहते हैं कि जाप करने की विधि उस मंत्र के देवता की सूक्ष्मता और स्वरूप के अनुसार हो — अर्थात देव कौन हैं। उग्र देव हों, जैसे भगवती काली, तो लाल वस्त्र रखें। हनुमान जी हों तो लाल या पीला वस्त्र। भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। हों तो पीला वस्त्र। भैरव जी हों तो पीला या लाल वस्त्र। आसन कंबल का हो या कुश आसन का। दिशा सदैव पूर्व या उत्तर ही रखें। एक सामान्य ज्योत जब तक जाप करें तब तक अखंड प्रज्वलित रहे। रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला, वे कहते हैं, सर्वोत्तम है। वे कहते हैं कि भगवती साबरी का स्मरण अवश्य करें — जो जगदंबा भगवती दुर्गा का एक स्वरूप हैं; भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। और भगवान शिव के किरातेश्वर अवतार के समय का वह स्वरूप। अपने कुलदेवी-देवताओं और स्थान के देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए तत्पश्चात उस साबर मंत्र की कम से कम एक माला, एक आवृत्ति — 108 बार जाप करें। इसका फल, वे कहते हैं, यह होगा कि जो तीन-चार दिन हाथ में हैं उनमें मंत्र कंठस्थ भी हो जाएगा और होलिका से पहले उसका जाप शुरू भी हो चुका रहेगा।
घर में सूतक-पातक के बाद कपूर की अग्नि से माला की शुद्धि
अग्नि जिसे छू ले वह शुद्ध
वक्ता कहते हैं कि अग्नि देव को वरदान है कि वे जिसे स्पर्श कर दें वह शुद्ध हो जाता है। इसलिए घर में सूतक-पातक पड़ने के बाद जब साधक साधना पुनः आरंभ करता है, तो धागे में पिरोई माला की शुचिता लौटाने के लिए उसे अग्नि स्पर्श कराने का प्रावधान है: कपूर की अग्नि प्रज्वलित करें, अग्नि देव का ध्यान करें और माला को उसमें हल्का सा स्पर्श कराते हुए पार करें — उस स्पर्श मात्र से माला शुद्ध हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि अग्नि देव को वरदान है: वे जिस वस्तु को भी स्पर्श कर दें वह शुद्ध हो जाती है। इसी कारण, वे कहते हैं, धागे में पिरोई हुई माला घर में हो और घर में सूतक-पातक पड़ जाए, और साधक बाद में अपनी साधना पुनः आरंभ करे, तो माला की शुचिता और स्वच्छता लौटाने के लिए उसे अग्नि स्पर्श कराने का प्रावधान है। विधि वे यह बताते हैं: कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। की अग्नि प्रज्वलित करें, अग्नि देव का ध्यान करें, और माला को हल्का सा स्पर्श कराते हुए उसमें से पार करें। उस स्पर्श मात्र से, वे कहते हैं, माला शुद्ध हो जाती है।
होलिका की रात्रि के जाप का समय: मध्यरात्रि और स्थानीय होलिका दहन दोनों जाप के भीतर आएँ
अग्नि के पास बैठें, माला न गिनें
वक्ता होलिका की रात्रि के जप के विषय में दो बातें कहते हैं: जब भी शुरू करें, मध्यरात्रि उस बैठक के भीतर अवश्य आ जाए — दहन चाहे 7, 9, 12 या 2 बजे हो — और अपने क्षेत्र में जिस समय वास्तव में होलिका दहन हो रहा हो उस समय भी जाप चलता रहे। दहन 9 बजे हो तो 8:30 से बैठें और 9:30 या 10 बजे तक जाप करें। सर्वोत्तम यह है कि दहन के पास ही थोड़ा किनारे, जहाँ लोग देख न सकें, बैठकर जब तक अग्नि जलती रहे तब तक जाप करते रहें; तब माला की गिनती का कोई महत्व नहीं — एक हो, दस हो या सौ — मंत्र की क्षमता में अतिशय वृद्धि होती है और वह अमोघ हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि होलिका के समय की पहली बात यह है: जब भी जप शुरू करें, मध्यरात्रि उस बैठक के भीतर अवश्य आ जाए। होलिका दहन चाहे रात के 7 बजे हो, 9 बजे, 12 बजे या 2 बजे, पर जिस जाप के लिए बैठें उसमें मध्यरात्रि आनी चाहिए। दूसरी बात, जिस समय वास्तव में होलिका दहन हो रहा हो — अपने घर के आसपास वहाँ के नियम के अनुसार जो समय चुना गया हो — उस समय भी जाप करना है। वे 9 बजे के दहन का उदाहरण देते हैं: 8:30 से बैठ जाएँ और 9:30 तक जाप करें, ताकि दहन का पूरा समय उसी के भीतर आ जाए। यदि किसी मंदिर प्रांगण में या किसी अच्छे स्थान पर होलिका दहन की पूरी व्यवस्था हो, तो वे कहते हैं कि दहन के समक्ष थोड़ा किनारे, कुछ दूरी पर, जहाँ लोग आपको देख न सकें, बैठकर पूरे दहन के समय साबर मंत्र का जाप करें — 9 बजे का दहन हो तो 8:30 से 9:30 या 10 बजे तक, जब तक होलिका की अग्नि प्रज्वलित रहे। ऐसे में, वे कहते हैं, कितनी माला हुई इसकी गिनती की आवश्यकता नहीं — एक हो, दस हो या सौ। बस जाप करते रह जाएँ तो मंत्र की क्षमता में अतिशय वृद्धि होती है और वह उस साधक के लिए अमोघ हो जाता है।
घर के बने भोजन को होलिका अग्नि में अर्पित करना: मंत्र पौष्टिक होता है और उग्र मंत्रों की हानि रुकती है
रात्रि का सबसे महत्वपूर्ण चरण
वक्ता इसे सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हैं: उस संध्या घर में रात के भोजन के लिए जो भी अन्न बना हो, उसे होलिका की अग्नि में नैवेद्य रूप में अर्पित करना ही चाहिए — जाप से पहले या बाद में, जैसा दहन का समय पड़े — और जाप करने वाला साधक उसे अपने हाथ से ले जाकर अर्पित करे। फिर दहन के समय बैठकर जाप करने पर मंत्र पौष्टिक और पुष्टता बढ़ाने वाला हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि इससे उग्रात्मक मंत्रों के जाप से पड़ने वाला तिर्यक् प्रभाव भी नहीं पड़ता: अन्न-संबंधी कष्ट नहीं होगा, धन की उतनी हानि नहीं होगी, श्रीविहीनता और विपन्नता नहीं आएगी — क्योंकि साधक एक पावक अग्नि को, जो नारायणी स्वरूपिणी और श्री बढ़ाने वाली है, संतुष्ट कर रहा है और उसके समक्ष बैठकर जाप कर रहा है।
वक्ता कहते हैं कि तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है: होलिका दहन के समय घर में शाम और रात के भोजन के लिए जो भी अन्न या पकवान बना हो, वह उस अग्नि में जाना चाहिए। यदि दहन का समय जाप के बाद पड़े, या पहले, तो पहले से ही वहाँ जाकर जहाँ अग्नि प्रज्वलित होने वाली है, घर का नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। अर्पित करके आएँ। होलिका अग्नि को, वे कहते हैं, घर का नैवेद्य अवश्य अर्पित करना चाहिए। जो जाप करता है — साधक स्वयं — अपने हाथ से अन्न ले जाकर वहाँ प्रदान करे। फिर जब दहन के समय वहाँ बैठकर जाप करता है, तो वे कहते हैं, मंत्र पौष्टिक हो जाता है और पुष्टता को बढ़ाने वाला होता है। श्मशानिक साबर मंत्रों के जोखिम बताने के बाद वे इसी अर्पण पर लौटते हैं: यदि होलिका के समय घर से बने अन्न को होलिका अग्नि में डालकर समर्पित करें और फिर ऐसे मंत्र का जाप करें, तो उग्रात्मक मंत्रों के जाप से जो तिर्यक् प्रभाव पड़ता है वह साधक पर नहीं पड़ेगा। अर्थात, वे कहते हैं, अन्न से संबंधित कष्ट कभी नहीं होगा, धन की इतनी हानि नहीं होगी, श्रीविहीनता नहीं होगी, विपन्नता नहीं आएगी। कारण वे यह बताते हैं कि साधक एक पावक अग्नि के स्वरूप को संतुष्ट कर रहा है जो स्वयं नारायणी स्वरूपिणी और श्री को बढ़ाने वाली है, और उसके समक्ष बैठकर मंत्र का जाप कर रहा है।
बिना उचित विधि श्मशानिक साबर मंत्र सिद्ध करने का जोखिम: रुग्णता और श्री की हानि
मंत्र की दुहाई अलक्ष्मी शक्तियों का आवाहन
वक्ता कहते हैं कि श्मशान से संबंधित उग्र शक्तियों के साबर मंत्र — श्मशान काली का मंत्र, रक्षा काली के श्मशानिक स्वरूपों के मंत्र, श्मशान चण्डिका का मंत्र, अघोर काली का मंत्र — जिन्हें लोग शत्रु को परास्त करने के लिए उग्रता में सिद्ध करते हैं, बिना सही विधि-विधान के सिद्ध करने पर शरीर में रुग्णता लाते हैं, और कहा गया है कि शरीर से श्री तत्व का ह्रास होता है। गृहस्थ के लिए कारण यह है कि ऐसे मंत्र में दुहाई लगती है — किसी को कुछ बोला जा रहा है — इसलिए उसमें अलक्ष्मी स्वरूप वाली महाशक्तियों और योगिनी की शक्तियाँ विराजमान रहती हैं, और बहुत बार श्री की हानि होती है। वे कहते हैं कि जो इन्हें प्रैक्टिकली करते हैं वही समझेंगे; जिनके लिए यह केवल सुनने का विषय है वे कुछ भी बोल सकते हैं, पर यह सत्य है।
वक्ता उदाहरण देते हैं: श्मशान काली का मंत्र, रक्षा काली के अनेक श्मशानिक स्वरूपों के मंत्र, और श्मशान चण्डिका का मंत्र — ऐसे मंत्र जिन्हें लोग शत्रु को परास्त करने के लिए उग्रता में सिद्ध करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे साबर मंत्रों को सिद्ध करने से शरीर में रुग्णता आती है। कहा गया है, वे जोड़ते हैं, कि शरीर से भगवती श्री — श्री तत्वशुभ ऐश्वर्य और समृद्धि का तत्व, जिसे अनुष्ठान द्वारा गृहस्थी में आकर्षित करने हेतु आवाहित किया जाता है। — का ह्रास और हानि होती है। ध्यान रखें, वे कहते हैं, कि श्मशान काली आदि और जितनी भी उग्रात्मक, श्मशान से संबंधित मशान शक्तियाँ हैं, उनके साबर मंत्र को बिना सही विधि-विधान के कहा जाए तो कुछ न कुछ कमी अवश्य रहती है। गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। के लिए कारण वे यह बताते हैं: गृहस्थ होकर ऐसे मंत्रों को जागृत करने पर अलक्ष्मी के स्वरूप या तत्व को धारण करने वाली जितनी महाशक्तियाँ हैं, उनकी योगिनी हैं, उनकी शक्तियाँ उस मंत्र में विराजमान रहती हैं — क्योंकि उसमें दुहाई लग रही है, किसी को कुछ बोला जा रहा है। इसी कारण, वे कहते हैं, बहुत बार श्री की हानि होती है, और यह सत्य है। जो लोग प्रैक्टिकली ये कार्य कर रहे हैं वे समझेंगे; जिनके लिए यह केवल सुनने का विषय है उनसे कुछ कहा ही नहीं जा सकता — वे कुछ भी बोल सकते हैं। लेकिन, वे आग्रह करते हैं, यह सत्य बात है। वे और उदाहरण जोड़ते हैं: अघोर काली का मंत्र, अघोर काली का श्मशान साबर मंत्र, श्मशान मंत्र। इन सभी श्मशानिक साबर मंत्रों को सिद्ध करने पर, वे कहते हैं, अनेक प्रकार की रुग्णता और अलक्ष्मी का वास शरीर में होने लगता है, जिससे धन हानि आदि होती है।
जलती हुई होलिका अग्नि की भस्म लगाना ताकि मंत्र सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित हो
मस्तक, हृदय, छाती, नाभि — अग्नि रहते-रहते
वक्ता कहते हैं कि जब होलिका दहन पूर्ण हो चुका हो पर अग्नि अभी हल्की-फुल्की जल रही हो और पूरी तरह राख न हुई हो — अंतिम अग्नि जो अब बुझे तब बुझे — तब साधक उसे अपनी आँखों के समक्ष देखता रहे। जब तक अग्नि शेष है, उसी समय निकाली हुई भस्म भगवान का स्मरण करते हुए या उसी मंत्र का जाप करते हुए मस्तक, हृदय, दोनों छाती, नाभि और पूरे शरीर पर लगाएँ। इससे, वे कहते हैं, मंत्र पूर्ण शक्ति के साथ साधक के सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अगला चरण होलिका दहन पूर्ण होने पर आता है: ध्यान दें कि दहन पूर्ण हो चुका है, अग्नि अभी हल्की-फुल्की प्रज्वलित है, राख पूरी तरह अभी हुई नहीं है — जलती हुई अंतिम अग्नि, उस अवस्था में जब अब बुझेगी तब बुझेगी। ऐसे समय, वे कहते हैं, साधक वहीं हो और अपनी आँखों के समक्ष उसे देख रहा हो। जब तक अग्नि शेष रहे, उसी समय निकाली हुई भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। मस्तक पर, हृदय पर, दोनों छाती पर, नाभि आदि स्थानों पर — पूरे शरीर पर — भगवान का स्मरण करते हुए, अथवा जिस मंत्र का जाप कर रहे थे उसी का जाप करते हुए लगाएँ। ऐसा करने पर, वे कहते हैं, वह मंत्र पूर्ण शक्ति के साथ साधक के सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित हो जाता है।
सावधानी: होलिका की अग्नि बुझ जाने के बाद उसकी भस्म नहीं
ज्वाला के साथ दिव्यता जाती है; बाद में उतारे और टोटके
वक्ता कहते हैं कि होलिका में दिव्यता तभी तक है जब तक अग्नि उपस्थित है। अग्नि समाप्त होने पर लोग अपने घर के उतारा वहाँ डालते हैं — जो डालना भी है — और वहाँ अनेक टोटके, विद्वेषण क्रियाएँ, उतारे और घर की अलाई-बलाई भी छोड़ी जाती हैं; कुछ लोग शराब भी ढार देते हैं। यदि साधक देख नहीं रहा था और शांत हुई अग्नि की भस्म निकाले जिस पर किसी ने कुछ रख दिया हो, तो वह उसके शरीर में लग जाती है और लेने के देने पड़ जाते हैं। भस्म केवल प्रज्वलित अग्नि से ली जाती है, जैसे हवन के अंत में अग्नि कोण से थोड़ी सी निकालकर हुंकार आदि मंत्रों से मस्तक पर लगाई जाती है। यदि माला पूरी होने से पहले अग्नि बुझ गई हो और किसी ने वहाँ कुछ कर दिया हो, तो वे कहते हैं, यह काम बिल्कुल न करें; शुद्धता से हो तो अवश्य लाभ मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि ध्यान दें, होलिका में दिव्यता तभी तक है जब तक अग्नि वहाँ उपस्थित है। अग्नि समाप्त होने पर लोग अपने घर के उतारा ले-लेकर वहाँ बस डाल जाते हैं। बहुत सारे लोग ऐसा करते हैं, वे कहते हैं, और डालना भी वहीं है; सुनने वाले को भी डालना है। दिव्य अग्नि तो सभी को शुद्ध कर देती है, वे कहते हैं, पर अग्नि बुझ जाने के बाद वहाँ लोग बहुत से टोटके करते हैं। विद्वेषण क्रियाएँ होती हैं; कोई कुछ लाकर उतारा करके चला जाता है; कोई अपने घर की अलाई-बलाई लाकर वहाँ बैठा जाता है। यदि अग्नि शांत हो गई, साधक देख नहीं रहा था, और वह शांत हुई अग्नि की भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। निकाले — और कोई अपना कुछ वहाँ रखकर चला गया हो — तो वह उसके शरीर में लग जाएगी और लेने के देने पड़ जाएँगे। इसलिए, वे कहते हैं, ऐसा नहीं करना है। भस्म अग्नि के प्रज्वलित रहते, उसी बीच के समय में ली जाती है। वे हवन से तुलना करते हैं: अंत में अग्नि कोण से थोड़ी सी अग्नि निकालकर हुंकारशस्त्र के रूप में की गई हुंकार, जो सप्तशती में बिना प्रहार किए ही संहार कर देती है। आदि मंत्रों से मस्तक आदि पर लगाई जाती है। ठीक उसी प्रकार, वे कहते हैं, होलिका की अग्नि पर भी करना है। लेकिन, वे चेतावनी देते हैं, यदि लोग वहाँ से चले गए हों, कोई टोकने वाला न हो, कोई आकर वहाँ कुछ कर रहा हो, और अपनी मंत्र-माला अभी पूरी नहीं हुई थी कि अग्नि बुझ गई — कोई आकर उतारा कर गया, कुछ लोग शराब भी ढार देते हैं, बहुत सारी क्रियाएँ करते हैं — तो ऐसी परिस्थिति में यह काम बिल्कुल न करें। शुद्धता से हो, वे कहते हैं, तो अवश्य लाभ मिलता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।