दुर्गा सप्तश्लोकी का संपुट पाठ कैसे करें
संपुट पाठ करने की विधि पर नोट्स।
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विशेष कामना हेतु दुर्गा सप्तश्लोकी का संपुट पाठ
पूर्ण सप्तशती संभव न हो तब का सरल मार्ग
वक्ता कहते हैं कि पूरी दुर्गा सप्तशती को किसी कामना के अंतर्गत संपुट करके भी पढ़ा जाता है, और वे उसकी सरल सामान्य विधि सप्तश्लोकी पर लगाकर दिखा रहे हैं। जो लोग पूर्ण सप्तशती का पाठ नहीं कर पाते और जिनकी विशेष कामनाएँ हैं, वे सप्तश्लोकी का संपुट पाठ करें, और वे कहते हैं कि उनकी मनोकामना फलीभूत होगी। मूल पाठ सप्तश्लोकी जैसा है वैसा ही रहता है: शिव उवाच और देवी उवाच, विनियोग, फिर सात मंत्र।
वक्ता बताते हैं कि किसी विशेष कामना के लिए सप्तशती का संपुट पाठ कैसे किया जाता है। वे कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती के सामान्य पाठ अनेक प्रकार के होते हैं, और पूरी की पूरी सप्तशती को किसी कामना के अंतर्गत संपुट करके भी पढ़ा जाता है। उसकी जो सरल सामान्य विधि है, वही वे सप्तश्लोकी पर लगाकर दिखाते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग पूर्ण सप्तशती का पाठ नहीं कर पाते और जिनकी विशेष कामनाएँ हैं, वे सात श्लोकों वाली दुर्गा सप्तश्लोकी का संपुट पाठ करें, तो उनकी मनोकामना फलीभूत होगी। मूल पाठ, वे कहते हैं, सप्तश्लोकी ही है: शिव उवाच और देवी उवाच, फिर विनियोग, और विनियोग के बाद वे सात मंत्र जो दुर्गा सप्तश्लोकी में पढ़े जाते हैं। इन सात मंत्रों को संपुट कैसे किया जाए, यही प्रश्न बाकी वार्ता में सुलझाया जाता है।
संपुट मंत्र क्या है और उसे कैसे चुना जाता है
एक मंत्र को दूसरे के बीच बाँधना; कामना से चुनाव
वक्ता कहते हैं कि संपुट का अर्थ है किसी एक मंत्र को किसी दूसरे मंत्र के मध्य बाँध देना, घेर देना। जिस कामना की पूर्ति के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जाता है वही संपुट मंत्र होता है, और उसे पढ़े जा रहे पाठ के हर मूल मंत्र के चारों ओर पढ़ा जाता है। कौन सा मंत्र संपुट बनेगा, यह इसलिए कामना तय करती है, पाठ नहीं।
वक्ता कहते हैं कि संपुट पाठ में मूल पाठ के अलावा एक संपुट का मंत्र होता है। जिस कामना की पूर्ति के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जाता है, वही संपुट मंत्र होता है। आगे पाठ का क्रम दिखाते समय वे शब्द का अर्थ भी बताते हैं: संपुट का अर्थ है किसी एक मंत्र को किसी दूसरे मंत्र के मध्य बाँध देना, बंधित करना, घेर देना। पाठ का मूल मंत्र दोनों ओर से संपुट मंत्र से घिर जाता है।
घर में मांगलिकता और कलह की समाप्ति हेतु संपुट मंत्र
उदाहरण के रूप में सर्वमंगल मांगल्ये
उदाहरण के लिए वक्ता ऐसा घर लेते हैं जहाँ मांगलिक कार्य नहीं हो पा रहे और बहुत कलह-क्लेश मचा है। घर में मांगल्य कार्यों की पूर्ति, मांगलिकता आने और सब प्रकार के कल्याण के लिए वे संपुट मंत्र बताते हैं: "सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते"। इससे बने पाठ को वे सर्व प्रकार के मंगल और कल्याण हेतु श्री दुर्गा सप्तश्लोकी संपुट पाठ कहते हैं।
विधि दिखाने के लिए वक्ता एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए घर में मांगलिक कार्य नहीं हो पा रहे हैं और बहुत कलह-क्लेश मचा हुआ है। घर में मांगल्य कार्यों की पूर्ति, मांगलिकता आने और सब प्रकार के कल्याण के लिए मंत्र का प्रयोग करना है। इसके लिए, वे कहते हैं, संपुट मंत्र है "सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते"। वे कहते हैं कि उन्होंने पूरा पाठ लिखकर दिखाने का प्रयास किया है, और उसका शीर्षक रखा है "सर्व प्रकार के मंगल और कल्याण हेतु श्री दुर्गा सप्तश्लोकी संपुट पाठ"। वह सदा की तरह शिव उवाच, देवी उवाच, यानी पूर्व पीठिका से आरंभ होता है, और फिर विनियोग आता है। वे यह भी कहते हैं कि दर्शक चाहें तो वे हर कामना के लिए अलग-अलग पूरा पाठ बनाकर डाल देंगे।
संपुट पाठ का विनियोग: कामना कहाँ बोली जाती है
देवता तक वही, दुर्गा प्रीत्यर्थम् के बाद कामना
वक्ता कहते हैं कि सप्तश्लोकी का सामान्य विनियोग हर प्रकार के संपुट पाठ में "देवता" तक वही रहता है। "श्री दुर्गा प्रीत्यर्थम्" भी बोला जाता है, लेकिन उसके ठीक बाद जिस कामना के लिए पाठ हो रहा है वह भी बोली जाती है, जैसे "सर्व मंगल प्राप्त्यर्थम्", और फिर विनियोग "श्री संपुट सप्तश्लोकी दुर्गा पाठे विनियोगः" पर समाप्त होता है। यह विनियोग एक बार किया जाता है, और उसके बाद ही संपुट आरंभ होता है।
वक्ता पूछते हैं कि विनियोग में क्या बदलाव करना है। सप्तश्लोकी का सामान्य विनियोग, वे कहते हैं, है "अस्य श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मंत्रस्य नारायण ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवता"। यहाँ तक हर प्रकार के संपुट पाठ में सब वही रहता है। फिर आता है "श्री दुर्गा प्रीत्यर्थम्", जो बोला भी जाता है। लेकिन उसके बाद जिस कामना के लिए संपुट पाठ किया जा रहा है वह भी बोली जाती है। उनके उदाहरण में वह है "सर्व मंगल प्राप्त्यर्थम्"। तो "दुर्गा प्रीत्यर्थम्" के बाद बोला जाता है "सर्व मंगल प्राप्त्यर्थम् श्री संपुट सप्तश्लोकी दुर्गा पाठे विनियोगः"। वे कहते हैं कि यह विनियोग एक बार किया जाता है और उसके बाद संपुट आता है।
संपुट पाठ में पढ़ने का क्रम: दोनों ओर दो-दो बार संपुट
एक-एक बार पढ़ना आम गलती है
वक्ता कहते हैं कि संपुट मंत्र दो बार पढ़ा जाता है, फिर मूल मंत्र एक बार, फिर संपुट मंत्र दो बार, और तब जाकर अगला मूल मंत्र; सातों मंत्रों में यही क्रम दोहराया जाता है। वे कहते हैं कि लोग गलती से हर मूल मंत्र के पहले एक बार और बाद में एक बार संपुट पढ़ते हैं, जिसे वे गलत विधि कहते हैं। जब संपुट मंत्र स्वयं मूल मंत्रों में से एक हो, जैसे "सर्वमंगल मांगल्ये" सातों में तीसरा है, तो अपनी बारी पर वह लगातार पाँच बार पढ़ा जाता है। वे कहते हैं कि किसी भी पाठ का कोई भी संपुट ठीक इसी प्रकार लगाया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि किसी भी प्रकार के पाठ में जब संपुट लगाया जाता है तो संपुट लगाने की विधि यही होती है। सप्तश्लोकी के पहले मूल मंत्र "ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति" को लेकर वे क्रम दिखाते हैं: संपुट मंत्र दो बार पढ़ा जाता है; फिर मूल मंत्र; फिर संपुट मंत्र दो बार; और तब जाकर दूसरा मंत्र आरंभ होता है। वे बताते हैं कि लोग गलती क्या करते हैं। वे एक बार संपुट मंत्र पढ़ते हैं, फिर मूल मंत्र, फिर एक बार संपुट, और फिर अगला मंत्र पढ़ देते हैं। इसे वे गलत विधि कहते हैं और ध्यान रखने को कहते हैं। पहले दो बार संपुट मंत्र, फिर मूल मंत्र, फिर दो बार संपुट मंत्र, और तब अगला मंत्र। उनके लिखे उदाहरण में संपुट "सर्वमंगल मांगल्ये" है। वह दो बार पढ़ा गया, फिर पहला मूल मंत्र एक बार, फिर दो बार; फिर दूसरा मंत्र, फिर संपुट दो बार; और फिर तीसरा मंत्र। सप्तश्लोकी का तीसरा मंत्र स्वयं "सर्वमंगल मांगल्ये" ही है, वही मंत्र जो संपुट के रूप में लग रहा है। तो तीसरी बारी में, वे कहते हैं, गिनिए कि यह कितनी बार पढ़ा गया: लगातार पाँच बार, पहले दो बार संपुट के रूप में, एक बार मूल मंत्र के रूप में, और बाद में दो बार संपुट के रूप में, और उसके बाद चौथा मंत्र पढ़ा जाता है। इसी तरह, वे कहते हैं, संपुट किया जाता है, और किसी भी मंत्र का संपुट इसी प्रकार लगाया जाता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।