दुर्गा सप्तशती पाठ की सात गलतियाँ जिनसे देवी दोष लगता है — आधा पाठ, अशुद्ध उच्चारण, जल्दबाज़ी, हिलना, बीच में बात, बिना दीक्षा, गलत हवन
दुर्गा सप्तशती पाठ की सात सामान्य गलतियाँ जो वक्ता के अनुसार देवी अपराध बन जाती हैं, हर एक का उपाय, और बिना दीक्षा वाले के लिए सुरक्षित विकल्प।
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क्या नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ रोज़ एक अध्याय करके किया जा सकता है?
पहली गलती: आधा-अधूरा पाठ
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। नए लोग देखते हैं कि दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय हैं और नवरात्र में आठ या नौ दिन ही मिलते हैं, तो पहले दिन पहला अध्याय, दूसरे दिन दूसरा — ऐसे करते हुए आठ या नौ अध्याय पर रुक जाते हैं। वे इसे ऐसा अपराध बताते हैं जो कभी नहीं करना है और जिससे देवी दोष बनता है। सप्तशती, वे कहते हैं, छह अंगों के साथ ही पढ़ी जाती है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज वे उन गलतियों पर चर्चा करेंगे जो श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय सामान्यतः लोगों से हो जाती हैं, और जिनसे देवी दोष बन जाता है। इनमें से कुछ, वे कहते हैं, बहुत ही सामान्य हैं और अनजाने में भी अपराध बन जाते हैं। पहली गलती, वे कहते हैं, बिना जानकारी के किया गया आधा-अधूरा पाठ है। संस्कृत का उच्चारण आता है या नहीं, यह अलग विषय है; लेकिन कई बार ऐसा होता है कि नए लोग, जिन्हें सप्तशती पाठ की पूरी जानकारी नहीं होती, देखते हैं कि इसमें तेरह अध्याय हैं और पूछते हैं कि किस-किस का पाठ करना है, कैसे करना है। वे कहते हैं कि नवरात्र में तो आठ या नौ दिन ही मिलते हैं, तो पहले दिन प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दूसरे अध्याय का — ऐसे करते हुए मात्र आठ या नौ अध्याय तक का पाठ करते हैं। ऐसा, वे कहते हैं, कभी नहीं करना चाहिए। आज बहुत से वीडियो आ गए हैं जिनमें ये विषय स्पष्ट किए गए हैं, फिर भी कई लोग यह अपराध कर देते हैं। मात्र नौ अध्यायों का ऐसे पाठ कभी नहीं करना है; ऐसा विषय होता ही नहीं। सप्तशती का पाठ ऐसे कभी नहीं होता — इसका पाठ छह अंगों के साथ किया जाता है, जिसकी चर्चा वे इसी प्रवचन में आगे करते हैं।
सप्तशती पाठ में अशुद्ध संस्कृत उच्चारण
दूसरी गलती: पहले किसी पाठ करने वाले से सीखें; कवच का भयार्ताः उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि जिसने कभी संस्कृत का उच्चारण नहीं किया और सीधे संस्कृत में पाठ करने जा रहा है, उसे पहले सीखना चाहिए कि पाठ कैसे किया जाता है — किसी विद्वान या जानकार व्यक्ति से जो सप्तशती या चंडी पाठ करता हो, साधक, ब्राह्मण, या शाक्त दीक्षा प्राप्त कोई माता — उनके सान्निध्य में बैठकर शुद्ध उच्चारण सीखें और उनके सामने अभ्यास करें। अशुद्ध उच्चारण से दिक्कत होती है; संत-महात्मा ऐसे प्रकरण बताते हैं जहाँ गलत उच्चारण से पाठ का फल बदल गया। एक छोटे उदाहरण के रूप में वे दुर्गा कवच का छठा श्लोक बताते हैं, जहाँ भयार्ताः को हड़बड़ी में भरताः या भर्यताः पढ़ दिया जाता है, दोनों गलत; हड़बड़ी में ऐसी कई गलतियाँ होती हैं और अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि अगर आपको संस्कृत का उच्चारण नहीं आता, आपने जीवन में कभी संस्कृत का उच्चारण नहीं किया, और भगवती का पाठ करने के लिए सीधे संस्कृत में पाठ करने जा रहे हैं, तो आपको पहले पता होना चाहिए कि इसका पाठ किस प्रकार किया जाता है। वे कहते हैं कि इसे किसी विद्वान से, किसी जानकार व्यक्ति से सीख लें जो सप्तशती पाठ या चंडी पाठ करता हो — साधक हो, ब्राह्मण हो, या कोई माता हों जिन्हें शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। दीक्षा प्राप्त है और वे पाठ करती हैं। उनके सान्निध्य में बैठकर विधिपूर्वक सीख लें। उच्चारण को शुद्धतापूर्वक जान लें और उनके समक्ष अभ्यास कर लें — यह, वे कहते हैं, अति उत्तम है। अशुद्ध उच्चारण से दिक्कत होती है: संत-महात्माओं द्वारा बताए गए कई प्रकरण प्रचलित हैं कि इस-इस प्रकार गलत उच्चारण करने से पाठ का फल बदल जाता है। यह विषय पहले भी कई बार बताया जा चुका है, इसलिए उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं कि देखिए, श्री दुर्गा कवच का पाठ करते समय कई लोग हड़बड़ी में कई गलतियाँ कर देते हैं, और उनमें से एक गलती छठे श्लोक में आती है। वे पंक्ति को "विषमे दुर्गमे चयो भयार्ताः शरणं गताः" कहकर पढ़ते हैं और शब्द को अक्षरशः बताते हैं: भ-या-र-तः, भयार्ताः। कई लोग इसे भरताः पढ़ देते हैं; कुछ भर्यताः पढ़ देते हैं। ये दोनों, वे कहते हैं, गलत हैं। यह बहुत छोटा-सा एक उदाहरण है, वे कहते हैं; हड़बड़ी में ऐसी कई गलतियाँ हो जाती हैं। इसलिए उच्चारण शुद्धतापूर्वक करें — नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
सप्तशती का हर श्लोक एक मंत्र है: भाव गलत संस्कृत का बहाना नहीं
देवता का स्वरूप बिगाड़ने के बजाय भाव से हिंदी में पढ़ें
वक्ता कहते हैं कि बार-बार यह न कहें कि भाव-प्रधानता से माँ प्रसन्न होती हैं। संस्कृत के मंत्र साक्षात देवी-स्वरूप हैं; सप्तशती का हर श्लोक एक स्वतंत्र मंत्र है जिसके अपने देवता, अपना कीलक और अपनी शक्ति है, इसलिए हर श्लोक स्वयं एक देवता का स्वरूप है। गलत पढ़ने पर वह स्वरूप बिगड़ जाता है — जैसे शरीर में कहीं एक पथरी हो जाए तो पीड़ा होती है। देवता के स्वरूप को बिगाड़ने का अधिकार किसी को नहीं; उससे अच्छा है सीख लें, और संस्कृत न आए तो भाव के साथ हिंदी में पाठ करें, लेकिन गलत पाठ न करें।
वक्ता कहते हैं: इस विषय में बार-बार यह न कहें कि भाव-प्रधानता से माँ प्रसन्न होती हैं। संस्कृत के जो मंत्र हैं, वे कहते हैं, वे साक्षात देवी-स्वरूप हैं। जो श्लोक हैं, वे मंत्र-स्वरूप हैं — सप्तशती के सभी श्लोक एक-एक मंत्र हैं, और वह मंत्र भगवती का साक्षात रूप है। वे कहते हैं कि यह कई बार स्पष्ट किया गया है कि हर श्लोक एक स्वतंत्र मंत्र है जिसके अलग-अलग देवता हैं, अलग कीलक हैं, अलग शक्ति है — तो वह मंत्र अपने आप में एक देवता का स्वरूप है। जब आप उसे गलत पढ़ेंगे तो स्वरूप बिगड़ जाएगा। आपके पूरे शरीर में कहीं एक जगह पथरी हो जाए, वे कहते हैं, तो शरीर में पीड़ा होती है, दिक्कत होती है; उसी तरह देवता के स्वरूप को बिगाड़ने का अधिकार न आपको है, न हमको। उससे अच्छा है, वे कहते हैं, कि उसे सीखकर करें। और अगर संस्कृत में नहीं आता तो हिंदी में भाव-प्रधानता के साथ पाठ कीजिए — लेकिन गलत पाठ मत कीजिए।
सप्तशती को तेजी से पढ़ना बनाम छंद में गाकर पढ़ना
तीसरी गलती: दोष गति का है, छंद का नहीं
वक्ता कहते हैं कि एक प्रचलित बात है कि सप्तशती गाकर नहीं पढ़नी चाहिए, पर इसे सही समझना चाहिए: इसे छंद में गाया जाता है और छंद में उच्चारण करने का विधान है, तो वह किया जा सकता है। लोग असल में गलती यह करते हैं कि बिल्कुल तेजी से पढ़ते हैं — वे कवच के आरंभ को जल्दी-जल्दी पढ़कर दिखाते हैं — जबकि इसे एकदम आराम से, जिस विधा से पढ़ना बताया गया है, वैसे पढ़ना चाहिए। संस्कृत में पढ़ रहे हैं तो जानें कि जिस अनुष्टुप छंद में यह है उसका उच्चारण कैसे होता है; न जानते हों तो सीख लें।
तीसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि सप्तशती का पाठ करते समय एक प्रचलित बात है कि गाकर नहीं करना चाहिए — लेकिन यह समझना चाहिए कि कैसे गाकर नहीं करना चाहिए। इसे छंद में गाया जाता है; छन्दस्छंद — किसी स्तुति या ग्रंथ के पाठ हेतु निर्धारित लयबद्ध संरचना (जैसे अनुष्टुभ का आठ-अक्षरीय चरण), जो उसके विनियोग में निर्दिष्ट होती है। में उच्चारण करने का विधान होता है। वह आप कर सकते हैं। सामान्यतः लोग, वे कहते हैं, इसके बजाय बिल्कुल तेजी से पढ़ते हैं। वे कवच के आरंभ को दौड़ाकर पढ़ने की नकल करते हैं — "अस्तु यंत्रम विप्र सर्वभूत कारकम" — और कहते हैं कि ऐसे जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ना है। "देवस्तु कवचम पुण्यम" — एकदम आराम से पढ़िए, जिस विधा से पढ़ना है उसी तरह। अगर आप संस्कृत में उच्चारण कर रहे हैं, वे कहते हैं, तो जानिए कि अनुष्टुप छंद में हम किस प्रकार पढ़ें, यह किस छंद में बताया गया है और उस छंद का उच्चारण कैसे होता है। उसे जानकर पढ़िए ताकि किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो; और अगर आप नहीं जानते कि कैसे उच्चारण करना चाहिए, तो सीख लीजिए। गलती नहीं करनी चाहिए।
सप्तशती पाठ करते समय हिलना
चौथी गलती: एक अपराध जिससे दोष उत्पन्न होता है
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद विषय आता है हिल-हिल कर पाठ करना। गाने लगते हैं तो आगे-पीछे हिलने भी लगते हैं, और उसमें, वे कहते हैं, आधा तो अपने आप ही "एक देवी" प्रवेश कर जाती हैं — "मार्कंडेय उवाच" से ही पूरा हिलना शुरू कर देते हैं। वह भी नहीं करना है: पाठ के समय हिलना नहीं है। यह सब अपराध है, इससे दोष उत्पन्न होता है।
इसके पश्चात, वक्ता कहते हैं, विषय आता है हिल-हिल कर पाठ करना। लोग गाने लगते हैं तो आगे-पीछे हिलने भी लगते हैं — और उसमें, वे टिप्पणी करते हैं, आधा तो स्वतः ही "एक देवी" प्रवेश कर जाती हैं। "मार्कंडेय उवाच" शुरू करेंगे और हिलना शुरू कर देंगे, पूरा हिल-हिल कर पढ़ेंगे। वह भी नहीं करना है, वे कहते हैं। पाठ के समय हिलना नहीं है। यह सब अपराध है; इससे दोष उत्पन्न होता है।
सप्तशती पाठ के बीच में बात करना या आसन से उठना
पाँचवीं गलती, और आचमन के साथ पुनः आरंभ
वक्ता कहते हैं कि पूरे पाठ के बीच में न बोलना चाहिए और न आसन से उठना चाहिए। कवच के श्लोकों के बीच रुककर "कोई ज़रूरी बात" कर लेना और फिर आगे शुरू कर देना गलत है। अगर इमरजेंसी में बात करनी ही पड़ी, तो या तो उस पाठ को फिर शुरू से पढ़ें, या पहले पूरा कवच पूर्ण कर लें, फिर बात करें, फिर आचमन और क्षमा प्रार्थना करके आगे बढ़ें। अगर एक बैठक में तेरह अध्याय का सामर्थ्य नहीं है — नए हैं, अभ्यास नहीं, पैर दर्द करने लगे — तो उठने से पहले जितना पढ़ा उसका समर्पण कर दें, और दोबारा बैठें तो आचमन और भगवती का ध्यान करके ही आगे पढ़ें; बीच में ऐसे छोड़ना नहीं चाहिए।
इसके बाद, वक्ता कहते हैं, है पाठ के बीच में बात करना। लोग कहेंगे कि हमने श्लोक पूरे कर लिए — वे पढ़ते हैं "पंचमम स्कंद मातेति षष्ठं कात्यायनीति च सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम्" — इतना पढ़कर यहाँ रुके क्योंकि कोई ज़रूरी बात थी, बात कर ली, और उसके बाद "नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता" से फिर आगे शुरू कर दिया। यह गलत है, वे कहते हैं; ऐसा नहीं कर सकते। अगर कोई इमरजेंसी आ भी गई और बात कर भी ली, तो या तो फिर से शुरू से पढ़िए, या अगर चाहते हैं कि दोष न लगे, तो पहले कवच का पूरा पाठ पूर्ण कर लीजिए। उसके बाद भले बात कीजिए, और फिर आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। और क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है। करके तब आगे का पाठ शुरू कीजिए। पूरे पाठ के बीच में नहीं बोलना चाहिए, वे कहते हैं, और पूरे पाठ के बीच में अपने आसन से उठना भी नहीं चाहिए। अगर सामर्थ्य नहीं है — लग रहा है कि एक बार में तेरह अध्याय का पाठ नहीं कर पाएँगे, बीच में पैर दर्द देने लगे, नए हैं, अभ्यास नहीं है, अब उठना पड़ रहा है — तो उठने से पहले जितना पाठ किया था, उतने का समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। कर दीजिए। दोबारा जब पाठ के लिए बैठें तो आचमन करके, पुनः भगवती का ध्यानदेवता के स्वरूप को मन में धारण करना, जो अधिकांश विधियों में जप से पूर्व की क्रिया है। आदि करके, तब आगे का पाठ कीजिए। यही करना चाहिए, वे कहते हैं; बीच में ऐसे नहीं छोड़ना चाहिए।
क्या नवार्ण दीक्षा के बिना दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है?
छठी गलती: न्यास छोड़ना, और नवार्ण का मंत्रराज होना
वक्ता कहते हैं नहीं। दो बातें गलत हैं: विधि न आने पर न्यास छोड़ देना, और नवार्ण दीक्षा न होने पर बिना नवार्ण के सप्तशती का पाठ करना। बिना दीक्षा नवार्ण का जप नहीं हो सकता — यह कोई सामान्य मंत्र नहीं, बल्कि त्रिपुर सुंदरी के षोडशी और पंचदशी के साथ तीन मंत्रराजों में से एक है, और इनका कभी अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। "जगदंबा हैं, माई हैं" वाली आपत्ति को वे नकारते हैं: माई अपनी जगह हैं, मंत्र का प्रभाव अपनी जगह। अदीक्षित को पता नहीं कि उसके बीज का उच्चारण गकार में होगा या मकार में, वे कादी, हादी या सादी में से किसमें दीक्षित होंगे, कि हर मंत्र का अपना यंत्र होता है जिसकी अंग-शक्तियों का आवरण पीठ पूजन के साथ बैठाया जाता है, या कि दीक्षा क्षेत्र के पीठ के अनुसार मिलती है — ये बातें केवल परंपरागत दीक्षा में बताई जाती हैं। इसलिए शाक्त दीक्षा लें; और कुछ नहीं किया जा सकता।
अदीक्षित नवार्ण और सप्तशती पाठ का अधिकार कैसे प्राप्त करें
यज्ञोपवीतधारी गायत्री-साधक से उपदेश और आदेश
वक्ता कहते हैं कि अगर गहरी जानकारी नहीं है तो कम से कम किसी यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति से जो गायत्री आदि करता हो — साधक हो, ब्राह्मण हो — नवार्ण का उपदेश ले लें, शाक्त दीक्षा ले लें, और सप्तशती के लिए उपदेश या आदेश ले लें। जो ब्राह्मण नवरात्र में सप्तशती पाठ करते हैं, उनसे नवरात्र में ही निवेदन करें कि हमें आदेश दे दीजिए, शाक्त में दीक्षित कर दीजिए। जो यज्ञोपवीत धारण करके त्रिकाल या दो समय गायत्री करता हो या सप्तशती का नित्य पाठ करता हो, वह आदेश कर देगा; उससे अधिकार मिल जाता है और दोष नहीं लगता। इतना कर लेना चाहिए ताकि बिना दोष, बिना समस्या पाठ हो सके।
दुर्गा सप्तशती पाठ के छह अंग और दो संपुट कौन-से हैं?
पूरी विधि, गुरु-परंपरा के क्रम के अनुसार
वक्ता कहते हैं कि सीधे तेरह अध्याय पढ़ देना — हिंदी में भाव से भी — गलत है: सप्तशती छह अंगों के साथ ही पढ़ी जाती है। सामान्यतः ये हैं कवच, फिर अर्गला, फिर कीलक, फिर नवार्ण का जप, फिर रात्रि सूक्त आदि, फिर सप्तशती न्यास, और तब पहले से तेरहवें अध्याय तक का पाठ, और उसके बाद पुनः नवार्ण जप। तेरह अध्यायों का नवार्ण से संपुट होता है, फिर सूक्तों से — रात्रि सूक्त और देवी सूक्त से — संपुट, और उसके बाद मूर्ति रहस्य आदि तीनों रहस्यों से संपुट। छह अंग और दो संपुट से पूरा प्रभाव मिलता है और विधि पूर्ण होती है; जहाँ मतभेद हो, वहाँ अपने गुरु के अनुसार करें।
अब, वक्ता कहते हैं, आते हैं छह अंगों के बिना पाठ करने वाले लोग — सीधे तेरह अध्याय का पाठ मार देते हैं। हिंदी में भी कर रहे हैं तो चलिए, हिंदी में भाव-प्रधानता है, फिर भी: सप्तशती छह अंगों के साथ ही पढ़ी जाती है, छह अंगों के बिना नहीं। वे छह अंग कौन-कौन से हैं? आरंभ में, वे कहते हैं, कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक का पाठ करना चाहिए। वे बताते हैं कि इसमें भी मतभेद आता है — स्वतंत्र तंत्र के अनुसार और शाक्त के अन्य ग्रंथों के अनुसार अलग-अलग विषय है — तो आपके गुरुजी जैसा बताएँ, उसके अनुसार कीजिए। सामान्यतः: पहले कवच, फिर अर्गला, फिर कीलक, उसके बाद नवार्ण का जप, रात्रि सूक्तम् आदि का जप, फिर सप्तशती न्यास आदि करके, तब पहले से तेरहवें अध्याय तक का पाठ करना चाहिए। उसके बाद पुनः नवार्ण मंत्र का जप। नवार्ण से संपुट होता है, फिर सूक्तों से संपुट होता है — यानी सप्तशती के तेरह अध्यायों का रात्रि सूक्त और देवी सूक्त से संपुट — और उसके बाद मूर्ति रहस्य आदि तीनों रहस्यों (रहस्य त्रय) से संपुट। यानी छह अंग हो गए और साथ में दो संपुट। तभी, वे कहते हैं, सप्तशती का पूरा प्रभाव मिलता है और पूरी विधि एक पूर्ण होती है; इसलिए इनके साथ ही करना चाहिए।
बिना दीक्षा या गुरु-आदेश के शतचंडी
सातवीं गलती: 100 पाठों के लिए नवार्ण का अधिकार चाहिए
वक्ता कहते हैं कि किसी प्रकार की दीक्षा प्राप्त किए बिना शतचंडी विधान — सप्तशती के 100 पाठ — करना उचित नहीं है और दिक्कत कर देगा। इसके लिए नवार्ण का अधिकार और सप्तशती पाठ का उपदेश चाहिए; इनके बिना दिक्कत होती है। इसलिए शतचंडी करने जा रहे हैं तो बिना दीक्षा और बिना गुरु-आदेश के कभी न करें।
अदीक्षित के लिए शतचंडी के स्थान पर देवी सूक्त
तेरहवें अध्याय का सुरथ और समाधि वाला प्रमाण
वक्ता कहते हैं कि जिसके पास अधिकार नहीं है और वह भाव से करना चाहता है, वह हिंदी में पाठ करे, या स्वतंत्र चार महास्तुतियाँ करे, और सप्तशती के तेरहवें अध्याय का अनुसरण करे: वहाँ राजा सुरथ और वैश्य समाधि ने केवल देवी सूक्त का पाठ करते हुए मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर नदी-तट पर तीन वर्ष पुष्प, धूप, हवन और अपने रक्त की बलि से तप किया, जब तक चंडिका देवी प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुईं। भगवती केवल देवी सूक्त से प्रकट हुईं। इसलिए देवी सूक्त का आश्रय लें — 100, 500 या 1000 पाठ, कोई दिक्कत नहीं — जबकि बिना अधिकार पूरी सप्तशती का शतचंडी में अतिक्रमण दिक्कत लाता है।
भाव-प्रधानता में करना है, वक्ता कहते हैं, तो हिंदी में करें, उस भाव से भगवती प्रसन्न होंगी। या इसकी स्वतंत्र चार महास्तुतियाँ हैं — जिन पर वीडियो पहले से बना है — उन स्तुतियों को कीजिए। और तेरहवें अध्याय का अनुसरण कीजिए, जहाँ लिखा है कि दोनों — सुरथ और समाधि — को केवल तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करके भगवती का दर्शन प्राप्त हुआ। वे अध्याय का भावार्थ बताते हैं: राजा और वैश्य तपस्यादीर्घकाल तक किया गया तप, जिससे तपोबल संचित होता है। के लिए चले गए और जगदंबा के दर्शनार्थ नदी-तट पर तप-साधन करने लगे; तपस्या में लीन होकर उन्होंने देवी की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की और पुष्प, धूप, हवन आदि से उपासना की; अपने आहार की मात्रा कम कर दी, फिर निराहार, एकाग्रचित्त होकर देवी का चिंतन किया; अपने शरीर के रक्त से बलि (बलि) चढ़ाते हुए तीन वर्षों तक संयमी होकर उपासना करते रहे; और उस उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर जगत की धारित्री चण्डिका देवी प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोलीं। भगवती, वे ज़ोर देते हैं, केवल देवी सूक्त से प्रकट हुईं। इसलिए देवी सूक्त का आश्रय लीजिए, वे कहते हैं, अगर आपको अधिकार नहीं है या विषय की जानकारी नहीं है। देवी सूक्त का 100 पाठ कीजिए, 500 कीजिए, 1000 कीजिए — कोई दिक्कत नहीं। लेकिन बिना अधिकार के पूरी सप्तशती का अतिक्रमण करके शतचंडी करते हैं तो दिक्कत और समस्या आपको होती है। यह ध्यान रखिए।
शतचंडी में बलि छोड़नी नहीं चाहिए
रक्त-बलि केवल गुरु-परंपरा से; फल और नारियल सबके लिए
वक्ता कहते हैं कि जिनके पास शतचंडी का अधिकार और गुरु-आदेश है, वे भी विमोहित होकर बलि न देने की गलती करते हैं। बलि का अर्थ यह नहीं कि जीव की ही बलि चढ़ानी है: तेरहवें अध्याय जैसी अपने रक्त की बलि हर किसी के लिए नहीं है और केवल गुरु-परंपरा से अपने विधान के साथ होती है, लेकिन फल, साग-सब्जी, ईख, कुष्मांड और नारियल की बलि कोई भी चढ़ा सकता है। शतचंडी में मात्रा बढ़ जाती है — 100, 108 या अधिक नारियल, या नौ पीठों पर कुष्मांड। बिल्कुल छोड़ देंगे तो दिक्कत होती है, संतान को कष्ट शुरू हो जाता है; इसलिए बलि पीठ और बलि पूजन करके बलि अवश्य चढ़ाएँ।
इसके बाद, वक्ता कहते हैं, आता है यह: जो लोग शतचंडी विधान कर रहे हैं, जिन्हें अधिकार भी है और गुरु-आदेश भी मिला है, वे भी विमोहित होकर बलि प्रदान नहीं करते। समझिए, वे कहते हैं, बलि प्रदान का अर्थ यह नहीं है कि जीव की ही बलि चढ़ानी है। तेरहवें अध्याय के प्रसंग में अपने रक्त की बलि चढ़ाई गई — लेकिन अपने रक्त की बलि हर कोई नहीं चढ़ा सकता; उसका विधान होता है, वह गुरु परंपरा से ही हो सकता है, उसका तरीका होता है। कम से कम, वे कहते हैं, फल आदि की, साग-सब्जी की, ईख की, कूष्माण्ड की बलि — हर कोई चढ़ा सकता है। नारियल की बलि हर कोई चढ़ा सकता है। लेकिन उसकी मात्रा बढ़ जाएगी: शतचंडी कर लिए तो 100 नारियल की बलि चढ़ाई जाती है, 100 से अधिक, 108। कुष्मांड की बलि करनी है तो नौ पीठ बनाकर उन पर कुष्मांड की बलि चढ़ाई जाती है। लेकिन अगर बिल्कुल ही छोड़ देते हैं तो दिक्कत होती है — तब संतान आदि को कष्ट शुरू हो जाता है। इसलिए, वे कहते हैं, बलि पीठ बनाकर, बलि का पूजन करके उसकी बलि अवश्य चढ़ानी चाहिए। यह ध्यान रखें: शतचंडी का पाठ कर रहे हैं तो बलि चढ़ाएँ।
सप्तशती हवन में उवाच और अस्त्र मंत्रों की साकल्य से आहुति नहीं
केवल घृत, या पान के पत्ते पर फल
वक्ता कहते हैं कि कई लोग बिना दीक्षा, बिना अधिकार पूरे 700 मंत्रों से बड़ी प्रचंडता से हवन करते हैं, उच्चारण भी गलत करते हुए, और नहीं जानते कि "उवाच" वाली पंक्तियों — जैसे "मार्कंडेय उवाच" — और अस्त्र मंत्रों की आहुति कभी साकल्य से नहीं दी जाती। ऐसी पंक्तियों की आहुति केवल घृत से, या पान के पत्ते पर रखे फल से दी जाती है; इसका विधान होता है और उसका पालन न हो तो दिक्कत होती है। जहाँ-जहाँ भगवती के अस्त्रों का नाम है या वे अस्त्र चला रही हैं, उन अस्त्र मंत्रों से कभी आहुति नहीं दी जाती — जैसे "शंख चक्र गदा श्रंग गृहीत प्रमायुधे…" वाली पंक्ति, जिसमें शंख, चक्र, गदा और शृंग सब उसे अस्त्र मंत्र बना देते हैं।
उसके पश्चात, वक्ता कहते हैं, आता है हवन का विधान। कई लोग जिन्हें दीक्षा नहीं, अधिकार नहीं, फिर भी पूरे 700 मंत्रों से बड़ी प्रचंडता से हवन कर रहे हैं — और उसमें उच्चारण भी गलत हो रहा है। उन्हें यह नहीं पता कि जब हवन कर रहे हों तो अस्त्र मंत्र की, उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। आदि की आहुति साकल्य से नहीं दी जाती। जैसे "मार्कंडेय उवाच" है: इसकी आहुति साकल्य से नहीं दी जाएगी। इसकी आहुति या तो केवल घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से देनी है, या फल से — पान के पत्ते पर फल रखकर। इसका विधान होता है, और उसका पालन न हो तो दिक्कत करता है। जहाँ-जहाँ भगवती के अस्त्र मंत्र आदि का उच्चारण है — जहाँ भगवती अपने अस्त्र का प्रयोग कर रही हैं — उन अस्त्र मंत्रों से कभी आहुति नहीं देनी होती। उदाहरण के लिए वे पंक्ति उद्धृत करते हैं "शंख चक्र गदा श्रंग गृहीत प्रमायुधे प्रसिद्ध वैष्णवी रूपे नारायण नमस्तुते": यहाँ शंख, चक्र, गदा, शृंग — ये सब अस्त्र मंत्र हो गए।
सप्तशती हवन में रक्षोघ्न मंत्रों, कवच, अर्गला और कीलक की आहुति के नियम
चतुर्थ अध्याय के मंत्र 24–27 साकल्य से नहीं; केवल प्रथम मंत्र और शक्ति-नाम
वक्ता कहते हैं कि चतुर्थ अध्याय के रक्षोघ्न मंत्र — 23 श्लोकों की स्तुति के बाद "शूलेन पाहि नो देवी पाहि खड़गिन चंबिके" से शुरू होने वाले चार मंत्र 24 से 27 — साकल्य से नहीं चढ़ाए जा सकते: या तो पाठ करके छोड़ दें, या प्रधान व्यक्ति उनकी घृत की आहुति दे; इनकी भी साकल्य से आहुति नाश का कारण बनती है। कवच और अर्गला के पूर्ण मंत्रों से आहुति नहीं होती। अर्गला के प्रथम मंत्र से आहुति होती है, कीलक के प्रथम मंत्र से होती है, और कवच से केवल उसकी शक्तियों के नाम-मंत्रों से — पूरे श्लोक से कभी नहीं।
इनके सिवा, वक्ता कहते हैं, रक्षोघ्न मंत्र हैं — दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय में चले आइए। चतुर्थ अध्याय में 23 मंत्रों की स्तुतिदेवता की प्रशंसा में कहा गया स्तवन, जो स्तोत्र से लघु और कम विधिबद्ध होता है। के पश्चात "शूलेन पाहि नो देवी पाहि खड़गिन चंबिके" से शुरू होने वाले मंत्र आते हैं — मंत्र 24, 25, 26 और 27। इन चार मंत्रों से आप साकल्य की आहुति नहीं दे सकते। या तो पाठ करके छोड़ दीजिए, या फिर उनकी घृत आदि की आहुति प्रधान व्यक्ति देंगे। लेकिन आप इनकी आहुति साकल्य से देते हैं तो यह भी नाश का कारण बनता है। कवच और अर्गला स्तोत्र आदि के पूर्ण मंत्रों से आहुति नहीं होती। अर्गला के प्रथम मंत्र से आहुति होगी और कीलक के प्रथम मंत्र से आहुति होगी। कवच में जो शक्तियाँ हैं, केवल उन शक्तियों के नाम-मंत्र से आहुति होगी; पूरे श्लोक से आहुति नहीं होती।
गलत सप्तशती हवन से शादी-ब्याह और मांगलिक कार्य क्यों रुक जाते हैं
अग्नि के मुख में अस्त्र; केवल पौष्टिक मंत्र; 108 आहुति के लिए दो सुरक्षित मंत्र
वक्ता कहते हैं कि जो लोग नियम जाने बिना सप्तशती हवन करते हैं, वे स्वयं अपने विनाश का कारण बनते हैं: घर में मांगलिक कार्य रुक जाते हैं, शादी-ब्याह अटक जाता है और बाद में जल्दी नहीं हो पाता, घर की मांगलिकता नष्ट हो जाती है। कारण वे यह बताते हैं: जब अग्नि का आवाहन होता है — अग्नि जो माँ स्वाहा हैं — और कवच का अस्त्र मंत्र आहुति के रूप में उनके मुख में दिया जाता है, तो मुख बिंध जाता है; फिर वे कल्याण कैसे करेंगी? बिना गुरु की जानकारी और आदेश के केवल पौष्टिक मंत्रों की आहुति दें; किस अग्नि को कौन-सा मंत्र देना है, इसकी आगे की विधि कवच अध्याय आदि में है। जो स्वतंत्र रूप से 108 बार दिया जा सकता है, वह कीलक का प्रथम मंत्र है, जिसे वे "विशुद्ध ज्ञान देहया त्रिवेदी दीप चक्षु से … श्रेय प्राप्ति निमित्ताय" कहकर पढ़ते हैं, और जयंती मंगला कालिका भी। अंत में वे कहते हैं: गलत हवन, गलत पाठ, गलत विधि से शतचंडी न करें।
इन सब विषयों को जानकर, वक्ता कहते हैं, हवन आदि कीजिए — अन्यथा लोग स्वयं अपने विनाश का कारण बनते हैं। घर में मांगलिक कार्य रुक जाते हैं; शादी-ब्याह पूरा रुक जाता है, उसके बाद करते रहिए, बहुत परेशानी होती है और शादी-ब्याह जल्दी नहीं हो पाता। मांगलिकता इसमें नष्ट हो जाती है — क्योंकि, वे पूछते हैं, अस्त्र मंत्र के द्वारा आप क्या कर रहे हैं? जब अग्नि का आवाहन करते हैं, जब अग्नि उसमें आती हैं — अग्नि जो माँ स्वाहा हैं — तो उनके मुख में आहुति क्या दे रहे हैं? कवच का अस्त्र मंत्र अस्त्र बनाकर उनके मुख में देंगे तो मुख बिंधेगा; और जब आप उनके मुख में अस्त्र मंत्र देकर मुख बींध रहे हैं, तो क्या वे आपका कल्याण करेंगी? इसलिए, वे कहते हैं, सामान्यतः — बिना गुरु की जानकारी के, उनसे आदेश लिए बिना — केवल पौष्टिक मंत्रों की ही आहुति करनी चाहिए। और उसमें आगे विधि होती है कि किस अग्नि को कौन-सा मंत्र देना है, कवच अध्याय आदि में; ऐसे मनमाने नहीं करना चाहिए। जो स्वतंत्र रूप से 108 बार दिया जा सकता है, वह कीलक का प्रथम मंत्र है, जिसे वे "विशुद्ध ज्ञान देहया त्रिवेदी दीप चक्षु से" कहकर पढ़ते हैं — पूरा मंत्र, "श्रेय प्राप्ति निमित्ताय" तक — और जयंती मंगला काली की आहुति भी दी जा सकती है। इन विधानों को जानकर कीजिए, वे कहते हैं; गलत हवन, गलत पाठ, गलत विधि-विधान से शतचंडी न कीजिए।
अदीक्षित व्यक्ति पूरी सप्तशती के बदले क्या पढ़े?
रात्रि सूक्तम, देवी सूक्तम, चतुर्थ अध्याय की स्तुति और एकादश अध्याय के 35 श्लोक
सातों बातों का सार बताते हुए वक्ता कहते हैं कि अगर आप अदीक्षित हैं और संस्कृत उच्चारण नहीं आता, तो रात्रि सूक्तम, देवी सूक्तम, चतुर्थ अध्याय की इंद्रादि स्तुति और एकादश अध्याय के स्तुति के 35 श्लोकों का पाठ करें — इनसे भगवती की पूर्ण कृपा और आशीर्वाद मिलेगा। संस्कृत में करें, गाकर करें। लेकिन बिना अधिकार के पूरा पाठ करेंगे, वे कहते हैं, तो वह हमारी और आपकी हानि है, और आपकी हानि सनातन की हानि है; इसलिए इस नवरात्र किसी योग्य व्यक्ति से दीक्षित होकर, विधि सीखकर पाठ करें।
ये, वक्ता कहते हैं, वे सात प्रमुख विषय थे जो सबके समक्ष रखने थे, ताकि किसी प्रकार का कोई अपराध न हो और सप्तशती पाठ सही प्रकार से हो सके। अगर आप अदीक्षित हैं और संस्कृत उच्चारण नहीं आता, तो रात्रि सूक्तम्, तांत्रोक्त देवीसूक्तम् और चतुर्थ अध्याय की इंद्रादि स्तुति — इन सबका पाठ कीजिए। एकादश अध्याय के स्तुति के 35 श्लोकों का पाठ कीजिए। इनसे, वे कहते हैं, भगवती की पूर्ण कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होगा। संस्कृत में कीजिए, गाकर कीजिए। लेकिन अनाधिकृत रूप से करेंगे, वे कहते हैं, तो वह हमारी और आपकी हानि है — और आपकी हानि सनातन की हानि है। वे आशा करते हैं कि श्रोता विषय समझेंगे, इस नवरात्र किसी योग्य व्यक्ति से दीक्षित होकर, विधि सीखकर पाठ करेंगे, ताकि उनका कल्याण अवश्य हो।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।