श्री दुर्गा सप्तशती 700 मंत्र तंत्रोक्त हवन विधान — किन मंत्रों की आहुति निषिद्ध है
दुर्गा सप्तशती के 700 मंत्रों के हवन का अध्याय-दर-अध्याय विधान — किन श्लोकों की साकल्य आहुति निषिद्ध है, उनके स्थान पर क्या दें, और विशेष श्लोकों की विशेष सामग्री।
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दुर्गा सप्तशती का हवन: तेरह अध्यायों का नियम और स्तुतियों का विकल्प
हर अध्याय में एक श्लोक ऐसा है जो साकल्य से नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि जैसा सब सुनते हैं, सप्तशती के अस्त्र मंत्रों का हवन नहीं किया जाता — और उसी तरह हर अध्याय में एक-दो ऐसे श्लोक होते हैं जिनकी आहुति साकल्य (मिश्रित हवन सामग्री) से नहीं देनी चाहिए, या जिनके लिए कोई निश्चित सामग्री तय है। नवरात्र के नौ दिन पूरा पाठ करने पर तेरहों अध्याय के हवन का विधान है; यदि वह संभव न हो तो ग्यारहवें या चौथे अध्याय की स्तुतियों की आहुति दी जा सकती है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि विषय यह है कि दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का हवन करते समय किन मंत्रों का निषेध है और किस मंत्र से क्या आहुति देनी चाहिए। वे कहते हैं कि जैसा हम सब सदैव सुनते हैं, अस्त्र मंत्र का हवन नहीं करना चाहिए; उसी प्रकार अन्य सभी अध्यायों में भी एक-दो ऐसे श्लोक होते हैं जिनकी आहुति साकल्य (मिश्रित हवन सामग्री) से नहीं देनी चाहिए, या जिनके लिए कोई निश्चित सामग्री तय है। वे श्रोताओं से सदैव ध्यान रखने को कहते हैं कि जब नवरात्रि में नौ दिन श्री दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ किया जाता है, तो हवन के समय तेरहों अध्याय का हवन करने का विधान है। यदि तेरह अध्यायों का हवन न हो सके तो ग्यारहवें अध्याय या चौथे अध्याय की स्तुतियों की आहुति दी जा सकती है — लेकिन इन सबमें, वे कहते हैं, कुछ बातों का ध्यान रखना है, और वही बाकी वार्ता का विषय है।
पूरे सप्तशती हवन से पहले की पूर्व-तैयारी का क्रम
श्राप विमोचन से नवार्ण की एक माला तक, फिर प्रथम अध्याय
वक्ता कहते हैं कि हवन के दिन — मान लीजिए अष्टमी तक पाठ हुआ और नवमी को हवन है — पहले श्राप विमोचन आदि का पूरा विधान किया जाता है, कवच-अर्गला-कीलक का केवल पाठ होता है (उनसे आहुति नहीं), और गुरु, गणपति, दिक्पाल आदि के आरंभिक हवन पूरे कर लिए जाते हैं। पूरे सप्तशती के हवन में कवच की आहुति की अलग से अनिवार्यता नहीं है; अर्गला के प्रथम मंत्र से नवाहुति दी जा सकती है, और कीलक के प्रथम मंत्र की आहुति अवश्य देनी है, केवल उसी की। फिर रात्रि सूक्त और अथर्वशीर्ष का पाठ, सप्तशती न्यास, नवार्ण का जप और उसकी एक माला का हवन, फिर न्यास, और तब प्रथम अध्याय आरंभ होता है। वे जोड़ते हैं कि यह विषय किसी विशिष्ट आचार्य के पास बैठकर प्रायोगिक रूप से सीखना ही उचित है।
सामान्य स्थिति लेकर — अष्टमी तक पाठ हुआ और अब नवमी को पूरे सप्तशती से हवन करना है — वक्ता कहते हैं कि इसमें पूरे सप्तशती का विषय भी आ जाता है और उनका भी जो केवल स्तुति आदि का हवन करना चाहते हैं। उस दिन पाठ-हवन से पहले शाप विमोचनएक प्रारंभिक शाप-निवारण अनुष्ठान — इसके बिना, या बिगड़ी हुई लय में दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों का पाठ करने से आध्यात्मिक अनुभव सुसंगत के बजाय विसंगत रूप से प्रकट हो सकते हैं। आदि का पूरा विधान किया जाता है। कवच, अर्गला और कीलक का केवल पाठ होता है — उनसे आहुति नहीं दी जाती। और आरंभिक हवन सब पहले दे लिए जाते हैं — गुरु, गणपति आदि, और दिक्पाल आदि का आरंभिक हवन; उसके बाद ही आगे बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि यह विषय किसी विशिष्ट आचार्य के सान्निध्य में बैठकर प्रायोगिक रूप से सीखना अति उचित होगा, लेकिन वे जानकारी सबके सामने रख रहे हैं ताकि लोग प्रेरणा लें और सही मार्ग से हवन करें। जब पूरे सप्तशती का हवन करना हो, वे कहते हैं, तो कवच-अर्गला-कीलक में कवच की आहुति देने की अलग से अनिवार्यता नहीं है। अर्गला के प्रथम मंत्र से आहुति दी जा सकती है — नवाहुति। उसी प्रकार कीलक के प्रथम मंत्र के लिए विशेष रूप से स्पष्ट किया गया है कि यह मंत्र — "ओम विशुद्ध ज्ञाना देहाया", जैसा प्रतिलेख में है — अवश्य आहुति में दिया जाए; तो कीलक के केवल प्रथम मंत्र की आहुति होती है। उसके बाद रात्रि सूक्तम् आदि का पाठ और अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। का पाठ करना चाहिए। फिर सप्तशती न्यास आदि करके नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है; यहाँ न्यास करके नवार्ण का हवन भी किया जा सकता है — एक माला का हवन। उसके बाद सप्तशती न्यास करें और प्रथम अध्याय में आ जाएँ।
विशेष स्थिति: दुर्गा कवच के पुरश्चरण में आहुति श्लोकों की नहीं, देवी-देवताओं के नाम की होती है
कवच में आए हर देवी-देवता का नाम लिख लें
वक्ता कहते हैं कि यदि आप कवच का पुरश्चरण कर रहे हैं और उसकी आहुति देना चाहते हैं तो श्लोकों की आहुति नहीं दी जाती; कवच में जितने भी देवी-देवता उपस्थित हैं, उनके नाम की आहुति दी जाती है। जैसे जहाँ "सह कृत्रिम च लक्ष्मीम" लिखा है वहाँ भगवती लक्ष्मी के नाम से आहुति होगी — तो सभी देवियों के नाम लिख लें और उनके नाम-मंत्र से आहुति दें, इससे कवच की शक्तियों की कृपा मिलती है।
यदि कोई कवच का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहा है और कवच की आहुति देना चाहता है, तो वक्ता कहते हैं कि श्लोक-श्लोक की आहुति नहीं दी जाती। इसके बदले इस पूरे कवच में जितने भी देवी-देवता उपस्थित हैं, उनके नाम की आहुति दी जाती है। उदाहरण के लिए जहाँ "सह कृत्रिम च लक्ष्मीम" लिखा है (जैसा प्रतिलेख में है), वहाँ भगवती लक्ष्मी के नाम से आहुति होगी। तो सभी देवियों के नाम लिख लें और उसके बाद उनके नाम-मंत्र से आहुति दें — और, वे कहते हैं, कवच की शक्तियों की कृपा आपको प्राप्त होगी।
सप्तशती की उवाच पंक्तियों की आहुति
साकल्य कभी नहीं: केवल घृत, या पान के पत्ते पर छिला पका केला
वक्ता कहते हैं कि प्रथम अध्याय का विनियोग-ध्यान करके हवन आरंभ करते समय सबसे पहली बात याद रखें कि उवाच (जैसे मार्कण्डेय उवाच) की आहुति साकल्य से नहीं दी जाती। "ओम नमः चंडिकाय" के बाद उवाच की भी आहुति दी जा सकती है — पर केवल घृत से, या पान के पत्ते पर छिलका हटाकर रखे पके केले से। प्रथम अध्याय के बाकी सभी मंत्रों की आहुति दी जा सकती है, और दूसरा अध्याय ठीक इसी तरह चलता है; उवाच का यही नियम हर अध्याय में लागू है।
जब प्रथम अध्याय का विनियोग और ध्यान करके हवन आरंभ करें, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहली बात सदैव याद रखें कि उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। आदि की आहुति नहीं दी जाती — अर्थात साकल्य से नहीं दी जाती। "ओम नमः चंडिकाय" के बाद इसकी भी आहुति दी जा सकती है। उवाच — मार्कण्डेय उवाच — में आहुति देनी हो तो केवल घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। की आहुति देंगे, या फिर पान के पत्ते पर पका केला छिलका हटाकर रखें और उससे आहुति दें। इसी तरह आहुति करनी चाहिए। फिर प्रथम अध्याय के सभी मंत्रों की आहुति दी जा सकती है। इसके साथ, वे कहते हैं, पहला अध्याय हो गया; दूसरा अध्याय ठीक इसी तरह अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते हैं। आगे के हर अध्याय में वे यही नियम दोहराते हैं: जहाँ कोई विशेष श्लोक नहीं है वहाँ सामान्य आहुति दें, बस उवाच की आहुति कैसे देनी है इसका ध्यान रखें।
सप्तशती तृतीय अध्याय के मधुपान वाले श्लोक की मधु से आहुति
38वाँ श्लोक, जहाँ महिषासुर-युद्ध में भगवती मधुपान करती हैं
वक्ता कहते हैं कि तीसरे अध्याय में जिस श्लोक में भगवती महिषासुर-वध के समय युद्ध करते-करते मधुपान करती हैं — 38वाँ, "गर्ज गर्ज छड़म मूड" जैसा प्रतिलेख में है — उसकी आहुति मधु से दी जाए तो अति उत्तम है। वहाँ की देवी-उवाच की आहुति पहले की तरह घृत या पान के पत्ते पर केले से होती है।
तीसरे अध्याय में आकर वक्ता उस श्लोक की ओर संकेत करते हैं जिसमें भगवती महिषासुर-वध के समय युद्ध करते-करते मधुपान करती हैं — पहले वे 36 कहते हैं, फिर 38वाँ श्लोक तय करते हैं। यह पूरा श्लोक, जिसे वे "गर्ज गर्ज छड़म मूड" कहकर उद्धृत करते हैं (प्रतिलेख का रूप), मधु से आहुति में दिया जाए तो अति उत्तम है; इसकी आहुति मधु से ही देनी चाहिए। वहाँ देवी उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। भी है, तो उस उवाच की आहुति पहले की तरह घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से, या पान के पत्ते पर रखे पके केले से दी जाती है। तो तीसरे अध्याय का यह एक श्लोक है जिसका हवन मधु से करना है।
सप्तशती चतुर्थ अध्याय के चार रक्षा मंत्रों की आहुति साकल्य से कभी नहीं
श्लोक 24 से 27: केवल पाठ, पान पर केला, आचार्य का घृत, या "महालक्ष्मय स्वाहा"
वक्ता कहते हैं कि चौथे अध्याय में 23वें श्लोक तक आहुति दी जाती है; 24वें से — "सुलेन पाहि नो देवी पाहि खड़गंचा अंबिके", जैसा प्रतिलेख में है — सप्तशती के रक्षा मंत्र आरंभ होते हैं (जो सप्तशती न्यास में भी प्रयोग होते हैं), और इन चार, 24 से 27, की आहुति साकल्य (तिल-चावल-जौ का मिश्रण) से कभी नहीं दी जाती। इन्हें केवल पाठ करके छोड़ा जा सकता है, पान के पत्ते पर केला रखकर आहुति दी जा सकती है, केवल प्रधान आचार्य घृत की आहुति दे सकते हैं, या श्लोक पढ़कर केवल "महालक्ष्मय स्वाहा" बोला जा सकता है — मानसिक पाठ करके भी — पर वे चार आहुतियाँ भी साकल्य से नहीं होतीं।
अब अस्त्र मंत्र मंत्र आते हैं, वक्ता कहते हैं। चौथे अध्याय में स्तुति पूर्ण होने के बाद 23वें श्लोक तक आहुति दी जाती है। 24वें श्लोक से सप्तशती का रक्षा मंत्र आरंभ होता है — जो सप्तशती न्यास में भी प्रयोग होता है, जैसा श्रोताओं ने देखा होगा। यहाँ से शुरू होने वाला मंत्र, "सुलेन पाहि नो देवी पाहि खड़गंचा अंबिके" (प्रतिलेख का रूप), 24वें, 25वें, 26वें और 27वें श्लोक तक चलता है। इन चार मंत्रों की आहुति साकल्य से नहीं दी जाती। इन्हें केवल पाठ करके छोड़ा जा सकता है; या चाहें तो पान के पत्ते पर केला रखकर उससे आहुति दें; या यदि आचार्य बुलाए हों तो केवल प्रधान आचार्य ही आहुति देंगे, और केवल घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। की। वे इस पर विशेष बल देते हैं: इनसे साकल्य की आहुति नहीं — तिल, चावल, जौ आदि की मिश्रित सामग्री इनसे नहीं देनी है। वैकल्पिक रूप से पूरा श्लोक पढ़ने के बाद केवल "महालक्ष्मय स्वाहा" बोलें (जैसा प्रतिलेख में है)। चारों मंत्रों का मानसिक पाठ करके भी "महालक्ष्मय स्वाहा" बोलकर आहुति दी जा सकती है — पर इस तरह दी गई चार आहुतियाँ भी साकल्य से नहीं देनी हैं।
सप्तशती चतुर्थ अध्याय के 29वें श्लोक की गंध-पुष्प आहुति
पूजन का श्लोक, पूजन की ही सामग्री से
वक्ता कहते हैं कि चौथे अध्याय के 29वें श्लोक में स्तुति के बाद देवताओं द्वारा भगवती का पूजन किया गया है; इसलिए गंध, पुष्प आदि का मिश्रण करके उसमें थोड़ा घृत मिलाकर उससे आहुति दी जाए तो भगवती को विशेष प्रसन्नता होती है।
चौथे अध्याय की चार निषिद्ध आहुतियों के बाद वक्ता उसके 29वें श्लोक पर आते हैं। चूँकि यहाँ स्तुति करने के बाद देवताओं द्वारा भगवती का पूजन किया गया है, वे कहते हैं कि गंध, पुष्प आदि का मिश्रण बनाकर उसमें थोड़ा घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। मिलाकर उससे आहुति दी जाए तो भगवती को विशेष प्रसन्नता होती है। वे श्रोताओं से इस बात का ध्यान रखने को कहते हैं; इसके साथ चौथे अध्याय का विषय पूरा हो जाता है।
सप्तशती पंचम अध्याय के देवी सूक्त की हवन में आहुति कैसे दी जाती है?
हर पद में तीन क्रमांकित श्लोक, तीन अलग आहुतियाँ
वक्ता कहते हैं कि देवी सूक्त ("या देवी सर्वभूतेषु…") में तीनों नमस्तस्यै के बाद पुस्तक में 14, 15 और 16 लिखा है — यानी हर एक अपने आप में एक श्लोक है और हर एक की अलग आहुति होती है: "या देवी सर्वभूतेषु विष्णु मायति शब्दिता नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई नमो नमः स्वाहा" (जैसा प्रतिलेख में है)। पूरा पद पढ़कर एक बार स्वाहा बोलें तो दो आहुतियाँ छूट जाती हैं। घृत, साकल्य, या पंचमेवा-मधु मिली पौष्टिक आहुति — सब चल सकते हैं, और जो 700 मंत्रों की आहुति नहीं दे सकते उनके लिए अकेला यह सूक्त भी हवन हो सकता है।
चौथे अध्याय के बाद, वक्ता कहते हैं, पाँचवें अध्याय में श्री देवी सूक्त आ जाता है — "या देवी सर्वभूतेषु" से शुरू होने वाले मंत्र। ध्यान देने की बात यह है कि आहुति कैसे दी जाए। जहाँ से "विष्णु मायति शब्दिता" (जैसा प्रतिलेख में है) मंत्र शुरू होता है, पुस्तक में देखें: नमस्तस्यै के बाद 14 लिखा है, अगले नमस्तस्यै के बाद 15, और नमस्तस्यै नमो नमः के बाद 16। यानी हर एक अपने आप में एक श्लोक है — पहला, दूसरा, तीसरा — और हर एक की अलग आहुति देनी है। कैसे? वे करके दिखाते हैं: "या देवी सर्वभूतेषु विष्णु मायति शब्दिता नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई नमो नमः स्वाहा" (सब प्रतिलेख के रूप में)। यहाँ के सभी श्लोकों की आहुति इसी तरह दी जाती है। घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से दे सकते हैं; साकल्य से भी दे सकते हैं; पंचमेवा, मधु आदि मिलाकर पौष्टिक आहुति भी दे सकते हैं। एक सावधानी यह है कि यदि पूरा पद एक साथ पढ़ लें — "या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" — और पूरा पढ़ने के बाद ही स्वाहा बोलें, तो दो आहुतियाँ छूट जाएँगी। देवी सूक्त में यही ध्यान देने वाली बात है। वे जोड़ते हैं कि पंचम अध्याय का सूक्त स्वतंत्र रूप से भी हवन में दिया जा सकता है: जैसे मान लीजिए नवरात्रि में पूरा पाठ किया, पर सप्तशती के 700 मंत्रों से आहुति नहीं दे सकते, तो ऐसे समय में इससे आहुति दे सकते हैं।
सप्तशती सप्तम अध्याय: विशेष सामग्री वाले दो श्लोक
चौथे के लिए पौष्टिक सामग्री, पाँचवें के लिए कपूर मिला काजल
वक्ता कहते हैं कि छठे अध्याय (धूम्रलोचन-वध) में सामान्य आहुति दें, बस उवाच का ध्यान रखें। सातवें में दो श्लोकों पर ध्यान चाहिए: चौथे श्लोक की आहुति केवल पौष्टिक हवन सामग्री से, और पाँचवें में जो विशेष रूप से भगवती की कृपा चाहते हैं वे कपूर और काजल मिलाकर आहुति दे सकते हैं — सामान्य पौष्टिक सामग्री भी उचित है, पर विशेष प्रयोग के लिए कपूर मिला काजल। बाकी अध्याय सामान्य है।
छठे अध्याय — धूम्रलोचन-वध आदि — में वक्ता कहते हैं कि सामान्य आहुति दें, बस उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। का नियम ध्यान में रखें, यानी उवाच की आहुति कैसे देनी है। सातवें अध्याय में चौथा और पाँचवाँ श्लोक — इन दो पर ध्यान रखना है। चौथे श्लोक में केवल पौष्टिक हवन सामग्री का प्रयोग करना है। पाँचवें में यदि विशेष रूप से भगवती की कृपा प्राप्त करनी हो तो कपूर और काजल मिलाकर आहुति दी जा सकती है। सामान्य पौष्टिक सामग्री से देना भी उचित है, वे कहते हैं, पर विशेष प्रयोग और विशेष कृपा चाहें तो यहाँ कपूर युक्त काजल का प्रयोग कर सकते हैं। उसके बाद बाकी सारा अध्याय सामान्य है; केवल उवाच पर ध्यान देना है।
सावधानी: सप्तशती के वध-अध्यायों के उग्र प्रयोग गुरु-आदेश के बिना नहीं
धूम्रलोचन और रक्तबीज वध के उग्रतम प्रयोग
वक्ता चेतावनी देते हैं कि सप्तशती के वध-अध्यायों — धूम्रलोचन, रक्तबीज आदि — में उग्रतम प्रयोग होते हैं, और इन्हें गुरु-आदेश के बिना नहीं करना चाहिए। वे आठवें अध्याय को, जिसमें रक्तबीज का वध है, अति विशिष्ट बताते हैं और श्रोताओं से यह सावधानी ध्यान में रखने को कहते हैं।
आठवें अध्याय में आकर वक्ता कहते हैं कि यह अति विशिष्ट है — रक्तबीज वध। जितने वध हैं, धूम्रलोचन, रक्तबीज, इन सबके उग्रतम प्रयोग होते हैं, जो गुरु-आदेश के बिना नहीं करने चाहिए; इस बात का ध्यान रखें, वे कहते हैं। इस अध्याय में बहुत से विषय उपस्थित होते हैं, और यह सप्तशती का अति विशिष्ट अध्याय है क्योंकि इसमें रक्तबीज जैसे महा-असुर का नाश किया गया है। प्रयोगों का वर्णन वे स्वयं नहीं करते।
सप्तशती अष्टम अध्याय: शूल वाली पंक्ति और काली के रक्तबीज-रक्तपान वाले श्लोक की आहुति
अस्त्र के लिए घृत या केला; काली के लिए अनार
वक्ता कहते हैं कि आठवें अध्याय में जहाँ "इति युक्ता ताम ततो देवी … सूलेन" में शूल, एक अस्त्र, का उच्चारण है, वहाँ घृत या पान के पत्ते पर केले की आहुति दें। अगला मंत्र, "मुखेन काली च गृह … रक्तबीज से शोणितम" (जैसा प्रतिलेख में है), जहाँ काली रक्तबीज का रक्त अपने मुख में लेती हैं, अनार से देना अति उत्तम है — अनार के दाने घृत या मधु में मिलाकर — या केवल घृत से। नौवें और दसवें अध्याय (निशुम्भ- और शुम्भ-वध) में स्तुति नहीं है, बस उवाच का नियम रखना है।
आठवें अध्याय की पुस्तक में वक्ता "इति युक्ता ताम ततो देवी" वाली जगह दिखाते हैं जहाँ "सूलेन" आता है — शूल, यानी अस्त्र मंत्र, का यहाँ उच्चारण है। तो यहाँ भी घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से आहुति दें, या पान के पत्ते पर रखे केले की आहुति दें। उसके बाद अगला मंत्र — "मुखेन काली च गृह" … "रक्तबीज से शोणितम" (जैसा प्रतिलेख में है) — वह मंत्र जहाँ भगवती काली रक्तबीज का रक्त अपने मुख में ग्रहण करने लगती हैं। यह पूरा श्लोक आठवें अध्याय में अति विशिष्ट हो जाता है। इस श्लोक की आहुति अनार से दें तो अति उत्तम: अनार के दाने निकालकर घृत में मिलाकर आहुति दें, या मधु में मिलाकर दें। यह विशिष्टतम प्रयोग है, वे कहते हैं; वैसे केवल घृत की आहुति भी दी जा सकती है। विशेष प्रयोग करना चाहें तो इसका ध्यान रखें। नवम अध्याय आदि में, वे कहते हैं, उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। का ध्यान रखते हुए बस आगे बढ़ जाना है। दशम अध्याय में भी शुम्भ-वध है, स्तुति नहीं, तो उवाच का नियम रखकर आगे बढ़ें; जहाँ स्तुति है वहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है।
सप्तशती एकादश अध्याय की स्तुति के अस्त्र-युक्त श्लोकों की आहुति
विद्वानों में मतभेद; पूरी स्तुति गौ-घृत मिली खीर से देना सुरक्षित
वक्ता कहते हैं कि 11वाँ अध्याय — भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान और जय दुर्गा स्तुति — समस्त कामनाएँ पूरी करता है और जो पूरा सप्तशती हवन नहीं कर सकते उनका हवन हो सकता है। जहाँ-जहाँ इसके मंत्रों में अस्त्र दिखें — जैसे "शंख चक्र गदा श्रंग गृहीत परमायुधे प्रसीद वैष्णवी रूपे नारायणी नमोस्तुते" — वहाँ पान के पत्ते पर केला या घृत दें; शक्ति-स्वरूपा (स्त्री) हवन कर रही हो तो गुरु-आदेश लेकर घृत में गुग्गुल मिलाकर दे, और कुछ न मिलाए। आचार्य साकल्य दें तो उसमें तिल अवश्य हो, साथ पंचमेवा और अनार। कोई ग्रंथ इन श्लोकों का स्पष्ट निषेध नहीं करता, क्योंकि अस्त्र धारण किए हुए हैं, स्वतंत्र अस्त्र मंत्र नहीं; पर कुछ विद्वान इन्हें अस्त्र मानकर घृत, केला, पौष्टिक या खीर को उत्तम कहते हैं — इसलिए पूरा अध्याय शुद्ध गौ-घृत मिली खीर से देना सबसे उत्तम है।
ग्यारहवाँ अध्याय — भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान, भगवती जय दुर्गा की स्तुति — वक्ता के अनुसार विशेष कृपा-प्राप्ति का अध्याय है; इसमें समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है। तो जो पूरे सप्तशती का हवन नहीं कर सकते, वे 11वें अध्याय की स्तुति, देवी सूक्त और चतुर्थ अध्याय की स्तुति से भी हवन कर सकते हैं। 11वें अध्याय में जहाँ-जहाँ स्तुति में अस्त्र का विषय है — जिस मंत्र में अस्त्र उपस्थित दिखें — उन मंत्रों की आहुति केला और पान के पत्ते से, या घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से दी जाती है। और यदि शक्ति-स्वरूपा (स्त्री) हवन कर रही हैं तो वे गुरु-आदेश लेकर घृत में गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। मिलाकर आहुति देंगी, उसमें और कोई सामग्री नहीं मिलाई जाएगी। उदाहरण के लिए "शंख चक्र गदा श्रंग गृहीत परमायुधे प्रसीद वैष्णवी रूपे नारायणी नमोस्तुते" (जैसा प्रतिलेख में है) — शंख के बाद चक्र भी है, गदा भी, शार्ङ्ग भी। तो इसकी आहुति विशेष रूप से घृत से, या घृत में गुग्गुल मिलाकर दें। यदि आचार्य सामान्य साकल्य आहुति करा रहे हों तो उसमें तिल की मात्रा अवश्य रहेगी — तिल और पंचमेवा, साथ में अनार मिला लें। वे कहते हैं कि कहीं भी स्वतंत्र रूप से यह वर्णन नहीं आता कि 11वें अध्याय की स्तुति निषिद्ध है: इसमें स्वतंत्र अस्त्र मंत्र मंत्र नहीं है — अस्त्र उन्होंने धारण किए हुए हैं — इसलिए इनकी आहुति दी जा सकती है, स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं है। पर कुछ विद्वान कहते हैं कि इसमें भी अस्त्र मंत्र हैं, इसलिए साकल्य न देकर घृत, केला या पौष्टिक आहुति देना उत्तम है; खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। की आहुति भी अति उत्तम है। तो, वे सुझाते हैं, 11वें अध्याय की पूरी आहुति शुद्ध गौ-घृत मिली खीर से दी जाए — यह अति उत्तम है।
सप्तशती एकादश अध्याय में रक्तदंतिका, शाकंभरी और भ्रामरी की स्वरूप-अनुसार आहुति
स्तुति के बाद नामित देवी-स्वरूपों के लिए अनार, शाक और खीर
वक्ता कहते हैं कि स्तुति के बाद 44वाँ श्लोक — "रक्तदंतिका डाडमि कुसुमोपमा", जैसा प्रतिलेख में है — अनार या लाल पुष्प से देना अति उत्तम है, इससे भगवती रक्तदंतिका प्रसन्न होती हैं। श्लोक 48 और 49 ("तत्वम अखिलम लोकमात…") शाकंभरी के हैं और इनमें शाक की आहुति दी जाती है — विशेषकर जिनकी कुलदेवी शाकंभरी हों — यद्यपि केवल घृत या साकल्य भी चल सकता है। जिस-जिस देवी-स्वरूप का वर्णन है उसकी अलग आहुति दी जा सकती है, और भ्रामरी के मंत्र में घृत या खीर की आहुति अलग-अलग दी जाती है।
पूरी स्तुति की आहुति उवाच का ध्यान रखते हुए दे देने के बाद वक्ता आगे के मुख्य श्लोकों पर आते हैं। 44वाँ श्लोक देखें: यहाँ भगवती रक्तदंतिका हैं — "रक्तदंतिका डाडमि कुसुमोपमा", जैसा प्रतिलेख में है — इस मंत्र से विशेष रूप से अनार की आहुति दी जाए तो भगवती रक्तदंतिका की प्रसन्नता होती है; इससे, या लाल पुष्प आदि से आहुति दें तो अति उत्तम है। फिर 48वाँ मंत्र, "तत्वम अखिलम लोकमात" (प्रतिलेख का रूप): यह भगवती शाकंभरी का मंत्र है, और शाकंभरी के दो मंत्र हैं, 48 और 49। इन दोनों में शाक आदि की आहुति विशेष रूप से दी जाती है; ऐसे आहुति दे रहे हों तो केवल घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से भी दे सकते हैं, साकल्य का भी प्रयोग कर सकते हैं — पर विशेष रूप से भगवती शाकंभरी की प्रसन्नता चाहें, या शाकंभरी मैया जिनकी कुलदेवी हों, तो इन मंत्रों से आहुति दें और उसमें शाक का प्रयोग करें। उसके बाद समस्त देवियों के जिस-जिस स्वरूप का वर्णन है, उस अनुसार अलग-अलग आहुति दी जा सकती है। भगवती भ्रामरी के मंत्र में घृत की आहुति अलग से और खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। की अलग से दी जा सकती है। इसके साथ, वे कहते हैं, हवन का विधान पूरा हो गया।
सप्तशती हवन का समापन: 12–13वाँ अध्याय, नवार्ण आहुति और तीनों रहस्य
अंत में सामान्य साकल्य, फिर नवार्ण, फिर रहस्य
वक्ता कहते हैं कि बारहवें और तेरहवें अध्याय में सामान्य साकल्य की आहुति दी जा सकती है। उसके बाद पुनः नवार्ण मंत्र की आहुति दें, और नवार्ण की आहुति के बाद तीनों रहस्यों का पाठ अवश्य करें।
ग्यारहवाँ अध्याय पूरा करके वक्ता कहते हैं कि बारहवें और तेरहवें अध्याय में सामान्य साकल्य आदि की आहुति दी जा सकती है। उसके बाद पुनः नवार्ण मंत्र की आहुति दें, और नवार्ण की आहुति के बाद तीनों रहस्य त्रय का पाठ अवश्य कर लें।
सप्तशती हवन के लिए अध्याय-अनुसार सामग्री की योजना
हर अध्याय की एक सामग्री, उवाच और अस्त्र के नियम यथावत
वक्ता अस्त्र मंत्रों का ध्यान रखते हुए एक अलग अध्याय-अनुसार योजना बताते हैं: पहला अध्याय पूरा मधु से; दूसरा गुग्गुल से (प्रतिलेख में "Google"); तीसरा भैंस के घी से — यह विधान विशेषकर शाक्त दीक्षितों के लिए है, पर यज्ञोपवीत वाले गायत्री-साधक भी अपना सकते हैं; चौथा गंध-अक्षत से; पाँचवाँ, छठा, सातवाँ पके केले या ईख के टुकड़ों से; आठवाँ लाल चंदन के चूरे और अनार के दानों से; नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ केसर, गंध, अक्षत और श्वेत-पीत पुष्प मिली खीर से; बारहवाँ और तेरहवाँ गोरोचन मिले गेंदे के पत्ते से। पूरे समय उवाच गलत नहीं होना चाहिए — पान के पत्ते पर केला या केवल घृत — और अस्त्र मंत्रों का ध्यान रखना है; बाकी अपनी सुविधा से चुन सकते हैं।
अलग से, वक्ता कहते हैं, इसे अध्याय-अनुसार भी देखा जा सकता है — यदि पूरे अध्याय की आहुति देनी हो, अस्त्र मंत्र मंत्रों और किस मंत्र से कौन-सी आहुति, इसका ध्यान रखते हुए। अस्त्र मंत्र का नियम ध्यान में रखकर यह प्रयोग करें। पहला अध्याय पूरा का पूरा मधु से आहुति में दिया जा सकता है। दूसरे अध्याय में गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। से आहुति करें (प्रतिलेख में यह शब्द "Google" लिखा है)। तीसरे अध्याय में भैंस के घी से हवन का विधान आता है। यह, वे कहते हैं, विशेषकर शाक्त दीक्षितों के लिए है; जो गायत्री करते हैं और जिनका यज्ञोपवीत हुआ है वे भी यह विषय ले सकते हैं — बहुत अच्छा है, भगवती कृपा करती हैं। चौथे अध्याय में गंध-अक्षत मिलाकर आहुति दें। पाँचवें, छठे और सातवें अध्याय में — क्योंकि इनमें धूम्रलोचन, रक्तबीज आदि के प्रकरण हैं, और पाँचवें में देवी सूक्त है — पके केले के टुकड़ों से या ईख के टुकड़ों से आहुति दें; इनसे हवन अति उत्तम है। आठवाँ अध्याय, रक्तबीज वध, में आहुति में विशेष रूप से लाल चंदन का प्रयोग हो तो अति उत्तम — लाल चंदन का चूरा, उसमें अनार के दाने मिला लें; इससे भगवती की विशेष कृपा मिलती है। नौवाँ अध्याय निशुम्भ-वध है, दसवाँ और ग्यारहवाँ शुम्भ-वध और देवताओं की स्तुति; 9, 10, 11 में खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। का प्रयोग अति उत्तम है — खीर में केसर, गंध, अक्षत, श्वेत और पीत पुष्प मिलाकर हवन करें। बारहवें और तेरहवें अध्याय में गेंदे के पौधे के पत्ते — जिसका फूल हम प्रयोग करते हैं — में गोरोचनगाय से प्राप्त पीत द्रव्य, जो यंत्र लेखन तथा तिलक में प्रयुक्त होता है। मिलाकर हवन करने के विषय में बताया गया है। अंत में वे स्थायी नियम दोहराते हैं: अभी जो पूरा विषय बताया गया उसमें उवाच"कहा" — दुर्गा सप्तशती में कथा-श्लोकों का सूचक (ऋषि उवाच, देवी उवाच आदि)। का ध्यान रखना है — उवाच गलत नहीं होना चाहिए; उसकी आहुति पान के पत्ते पर केले से या केवल घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। से होगी — और अस्त्र मंत्रों का ध्यान रखना है। बाकी अपनी सुविधानुसार हवन का विषय चुन सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।