श्री दुर्गा सप्तशती 700 मंत्र तंत्रोक्त हवन विधान — किन मंत्रों की आहुति निषिद्ध है

दुर्गा सप्तशती के 700 मंत्रों के हवन का अध्याय-दर-अध्याय विधान — किन श्लोकों की साकल्य आहुति निषिद्ध है, उनके स्थान पर क्या दें, और विशेष श्लोकों की विशेष सामग्री।

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01

दुर्गा सप्तशती का हवन: तेरह अध्यायों का नियम और स्तुतियों का विकल्प

हर अध्याय में एक श्लोक ऐसा है जो साकल्य से नहीं होता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:01–00:57

वक्ता कहते हैं कि जैसा सब सुनते हैं, सप्तशती के अस्त्र मंत्रों का हवन नहीं किया जाता — और उसी तरह हर अध्याय में एक-दो ऐसे श्लोक होते हैं जिनकी आहुति साकल्य (मिश्रित हवन सामग्री) से नहीं देनी चाहिए, या जिनके लिए कोई निश्चित सामग्री तय है। नवरात्र के नौ दिन पूरा पाठ करने पर तेरहों अध्याय के हवन का विधान है; यदि वह संभव न हो तो ग्यारहवें या चौथे अध्याय की स्तुतियों की आहुति दी जा सकती है।

02

पूरे सप्तशती हवन से पहले की पूर्व-तैयारी का क्रम

श्राप विमोचन से नवार्ण की एक माला तक, फिर प्रथम अध्याय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:58–01:43

वक्ता कहते हैं कि हवन के दिन — मान लीजिए अष्टमी तक पाठ हुआ और नवमी को हवन है — पहले श्राप विमोचन आदि का पूरा विधान किया जाता है, कवच-अर्गला-कीलक का केवल पाठ होता है (उनसे आहुति नहीं), और गुरु, गणपति, दिक्पाल आदि के आरंभिक हवन पूरे कर लिए जाते हैं। पूरे सप्तशती के हवन में कवच की आहुति की अलग से अनिवार्यता नहीं है; अर्गला के प्रथम मंत्र से नवाहुति दी जा सकती है, और कीलक के प्रथम मंत्र की आहुति अवश्य देनी है, केवल उसी की। फिर रात्रि सूक्त और अथर्वशीर्ष का पाठ, सप्तशती न्यास, नवार्ण का जप और उसकी एक माला का हवन, फिर न्यास, और तब प्रथम अध्याय आरंभ होता है। वे जोड़ते हैं कि यह विषय किसी विशिष्ट आचार्य के पास बैठकर प्रायोगिक रूप से सीखना ही उचित है।

03

विशेष स्थिति: दुर्गा कवच के पुरश्चरण में आहुति श्लोकों की नहीं, देवी-देवताओं के नाम की होती है

कवच में आए हर देवी-देवता का नाम लिख लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:44–02:15

वक्ता कहते हैं कि यदि आप कवच का पुरश्चरण कर रहे हैं और उसकी आहुति देना चाहते हैं तो श्लोकों की आहुति नहीं दी जाती; कवच में जितने भी देवी-देवता उपस्थित हैं, उनके नाम की आहुति दी जाती है। जैसे जहाँ "सह कृत्रिम च लक्ष्मीम" लिखा है वहाँ भगवती लक्ष्मी के नाम से आहुति होगी — तो सभी देवियों के नाम लिख लें और उनके नाम-मंत्र से आहुति दें, इससे कवच की शक्तियों की कृपा मिलती है।

04

सप्तशती की उवाच पंक्तियों की आहुति

साकल्य कभी नहीं: केवल घृत, या पान के पत्ते पर छिला पका केला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:07–04:01

वक्ता कहते हैं कि प्रथम अध्याय का विनियोग-ध्यान करके हवन आरंभ करते समय सबसे पहली बात याद रखें कि उवाच (जैसे मार्कण्डेय उवाच) की आहुति साकल्य से नहीं दी जाती। "ओम नमः चंडिकाय" के बाद उवाच की भी आहुति दी जा सकती है — पर केवल घृत से, या पान के पत्ते पर छिलका हटाकर रखे पके केले से। प्रथम अध्याय के बाकी सभी मंत्रों की आहुति दी जा सकती है, और दूसरा अध्याय ठीक इसी तरह चलता है; उवाच का यही नियम हर अध्याय में लागू है।

05

सप्तशती तृतीय अध्याय के मधुपान वाले श्लोक की मधु से आहुति

38वाँ श्लोक, जहाँ महिषासुर-युद्ध में भगवती मधुपान करती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:02–04:49

वक्ता कहते हैं कि तीसरे अध्याय में जिस श्लोक में भगवती महिषासुर-वध के समय युद्ध करते-करते मधुपान करती हैं — 38वाँ, "गर्ज गर्ज छड़म मूड" जैसा प्रतिलेख में है — उसकी आहुति मधु से दी जाए तो अति उत्तम है। वहाँ की देवी-उवाच की आहुति पहले की तरह घृत या पान के पत्ते पर केले से होती है।

06

सप्तशती चतुर्थ अध्याय के चार रक्षा मंत्रों की आहुति साकल्य से कभी नहीं

श्लोक 24 से 27: केवल पाठ, पान पर केला, आचार्य का घृत, या "महालक्ष्मय स्वाहा"

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:50–06:30

वक्ता कहते हैं कि चौथे अध्याय में 23वें श्लोक तक आहुति दी जाती है; 24वें से — "सुलेन पाहि नो देवी पाहि खड़गंचा अंबिके", जैसा प्रतिलेख में है — सप्तशती के रक्षा मंत्र आरंभ होते हैं (जो सप्तशती न्यास में भी प्रयोग होते हैं), और इन चार, 24 से 27, की आहुति साकल्य (तिल-चावल-जौ का मिश्रण) से कभी नहीं दी जाती। इन्हें केवल पाठ करके छोड़ा जा सकता है, पान के पत्ते पर केला रखकर आहुति दी जा सकती है, केवल प्रधान आचार्य घृत की आहुति दे सकते हैं, या श्लोक पढ़कर केवल "महालक्ष्मय स्वाहा" बोला जा सकता है — मानसिक पाठ करके भी — पर वे चार आहुतियाँ भी साकल्य से नहीं होतीं।

07

सप्तशती चतुर्थ अध्याय के 29वें श्लोक की गंध-पुष्प आहुति

पूजन का श्लोक, पूजन की ही सामग्री से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:31–06:59

वक्ता कहते हैं कि चौथे अध्याय के 29वें श्लोक में स्तुति के बाद देवताओं द्वारा भगवती का पूजन किया गया है; इसलिए गंध, पुष्प आदि का मिश्रण करके उसमें थोड़ा घृत मिलाकर उससे आहुति दी जाए तो भगवती को विशेष प्रसन्नता होती है।

08

सप्तशती पंचम अध्याय के देवी सूक्त की हवन में आहुति कैसे दी जाती है?

हर पद में तीन क्रमांकित श्लोक, तीन अलग आहुतियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:00–08:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि देवी सूक्त ("या देवी सर्वभूतेषु…") में तीनों नमस्तस्यै के बाद पुस्तक में 14, 15 और 16 लिखा है — यानी हर एक अपने आप में एक श्लोक है और हर एक की अलग आहुति होती है: "या देवी सर्वभूतेषु विष्णु मायति शब्दिता नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई स्वाहा", फिर "नमस्तस्यई नमो नमः स्वाहा" (जैसा प्रतिलेख में है)। पूरा पद पढ़कर एक बार स्वाहा बोलें तो दो आहुतियाँ छूट जाती हैं। घृत, साकल्य, या पंचमेवा-मधु मिली पौष्टिक आहुति — सब चल सकते हैं, और जो 700 मंत्रों की आहुति नहीं दे सकते उनके लिए अकेला यह सूक्त भी हवन हो सकता है।

09

सप्तशती सप्तम अध्याय: विशेष सामग्री वाले दो श्लोक

चौथे के लिए पौष्टिक सामग्री, पाँचवें के लिए कपूर मिला काजल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:38–09:36

वक्ता कहते हैं कि छठे अध्याय (धूम्रलोचन-वध) में सामान्य आहुति दें, बस उवाच का ध्यान रखें। सातवें में दो श्लोकों पर ध्यान चाहिए: चौथे श्लोक की आहुति केवल पौष्टिक हवन सामग्री से, और पाँचवें में जो विशेष रूप से भगवती की कृपा चाहते हैं वे कपूर और काजल मिलाकर आहुति दे सकते हैं — सामान्य पौष्टिक सामग्री भी उचित है, पर विशेष प्रयोग के लिए कपूर मिला काजल। बाकी अध्याय सामान्य है।

10

सावधानी: सप्तशती के वध-अध्यायों के उग्र प्रयोग गुरु-आदेश के बिना नहीं

धूम्रलोचन और रक्तबीज वध के उग्रतम प्रयोग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:37–10:05

वक्ता चेतावनी देते हैं कि सप्तशती के वध-अध्यायों — धूम्रलोचन, रक्तबीज आदि — में उग्रतम प्रयोग होते हैं, और इन्हें गुरु-आदेश के बिना नहीं करना चाहिए। वे आठवें अध्याय को, जिसमें रक्तबीज का वध है, अति विशिष्ट बताते हैं और श्रोताओं से यह सावधानी ध्यान में रखने को कहते हैं।

11

सप्तशती अष्टम अध्याय: शूल वाली पंक्ति और काली के रक्तबीज-रक्तपान वाले श्लोक की आहुति

अस्त्र के लिए घृत या केला; काली के लिए अनार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:06–11:29

वक्ता कहते हैं कि आठवें अध्याय में जहाँ "इति युक्ता ताम ततो देवी … सूलेन" में शूल, एक अस्त्र, का उच्चारण है, वहाँ घृत या पान के पत्ते पर केले की आहुति दें। अगला मंत्र, "मुखेन काली च गृह … रक्तबीज से शोणितम" (जैसा प्रतिलेख में है), जहाँ काली रक्तबीज का रक्त अपने मुख में लेती हैं, अनार से देना अति उत्तम है — अनार के दाने घृत या मधु में मिलाकर — या केवल घृत से। नौवें और दसवें अध्याय (निशुम्भ- और शुम्भ-वध) में स्तुति नहीं है, बस उवाच का नियम रखना है।

12

सप्तशती एकादश अध्याय की स्तुति के अस्त्र-युक्त श्लोकों की आहुति

विद्वानों में मतभेद; पूरी स्तुति गौ-घृत मिली खीर से देना सुरक्षित

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:30–14:04

वक्ता कहते हैं कि 11वाँ अध्याय — भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान और जय दुर्गा स्तुति — समस्त कामनाएँ पूरी करता है और जो पूरा सप्तशती हवन नहीं कर सकते उनका हवन हो सकता है। जहाँ-जहाँ इसके मंत्रों में अस्त्र दिखें — जैसे "शंख चक्र गदा श्रंग गृहीत परमायुधे प्रसीद वैष्णवी रूपे नारायणी नमोस्तुते" — वहाँ पान के पत्ते पर केला या घृत दें; शक्ति-स्वरूपा (स्त्री) हवन कर रही हो तो गुरु-आदेश लेकर घृत में गुग्गुल मिलाकर दे, और कुछ न मिलाए। आचार्य साकल्य दें तो उसमें तिल अवश्य हो, साथ पंचमेवा और अनार। कोई ग्रंथ इन श्लोकों का स्पष्ट निषेध नहीं करता, क्योंकि अस्त्र धारण किए हुए हैं, स्वतंत्र अस्त्र मंत्र नहीं; पर कुछ विद्वान इन्हें अस्त्र मानकर घृत, केला, पौष्टिक या खीर को उत्तम कहते हैं — इसलिए पूरा अध्याय शुद्ध गौ-घृत मिली खीर से देना सबसे उत्तम है।

13

सप्तशती एकादश अध्याय में रक्तदंतिका, शाकंभरी और भ्रामरी की स्वरूप-अनुसार आहुति

स्तुति के बाद नामित देवी-स्वरूपों के लिए अनार, शाक और खीर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:05–15:44

वक्ता कहते हैं कि स्तुति के बाद 44वाँ श्लोक — "रक्तदंतिका डाडमि कुसुमोपमा", जैसा प्रतिलेख में है — अनार या लाल पुष्प से देना अति उत्तम है, इससे भगवती रक्तदंतिका प्रसन्न होती हैं। श्लोक 48 और 49 ("तत्वम अखिलम लोकमात…") शाकंभरी के हैं और इनमें शाक की आहुति दी जाती है — विशेषकर जिनकी कुलदेवी शाकंभरी हों — यद्यपि केवल घृत या साकल्य भी चल सकता है। जिस-जिस देवी-स्वरूप का वर्णन है उसकी अलग आहुति दी जा सकती है, और भ्रामरी के मंत्र में घृत या खीर की आहुति अलग-अलग दी जाती है।

14

सप्तशती हवन का समापन: 12–13वाँ अध्याय, नवार्ण आहुति और तीनों रहस्य

अंत में सामान्य साकल्य, फिर नवार्ण, फिर रहस्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:45–15:59

वक्ता कहते हैं कि बारहवें और तेरहवें अध्याय में सामान्य साकल्य की आहुति दी जा सकती है। उसके बाद पुनः नवार्ण मंत्र की आहुति दें, और नवार्ण की आहुति के बाद तीनों रहस्यों का पाठ अवश्य करें।

ग्यारहवाँ अध्याय पूरा करके वक्ता कहते हैं कि बारहवें और तेरहवें अध्याय में सामान्य साकल्य आदि की आहुति दी जा सकती है। उसके बाद पुनः नवार्ण मंत्र की आहुति दें, और नवार्ण की आहुति के बाद तीनों रहस्य त्रय का पाठ अवश्य कर लें।

15

सप्तशती हवन के लिए अध्याय-अनुसार सामग्री की योजना

हर अध्याय की एक सामग्री, उवाच और अस्त्र के नियम यथावत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:00–18:39

वक्ता अस्त्र मंत्रों का ध्यान रखते हुए एक अलग अध्याय-अनुसार योजना बताते हैं: पहला अध्याय पूरा मधु से; दूसरा गुग्गुल से (प्रतिलेख में "Google"); तीसरा भैंस के घी से — यह विधान विशेषकर शाक्त दीक्षितों के लिए है, पर यज्ञोपवीत वाले गायत्री-साधक भी अपना सकते हैं; चौथा गंध-अक्षत से; पाँचवाँ, छठा, सातवाँ पके केले या ईख के टुकड़ों से; आठवाँ लाल चंदन के चूरे और अनार के दानों से; नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ केसर, गंध, अक्षत और श्वेत-पीत पुष्प मिली खीर से; बारहवाँ और तेरहवाँ गोरोचन मिले गेंदे के पत्ते से। पूरे समय उवाच गलत नहीं होना चाहिए — पान के पत्ते पर केला या केवल घृत — और अस्त्र मंत्रों का ध्यान रखना है; बाकी अपनी सुविधा से चुन सकते हैं।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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