देहरी रक्षा की सत्य घटना — नवविवाहिता पर अभिचार, कुल शक्ति का हथियार बनना, और काल भैरव एकाक्षरी से सप्तश्लोकी संपुट विधान
भगतवाल से पलटी गई नवविवाहिता पर अभिचार की सत्य घटना, और उसके बाद वक्ता का दहलीज रक्षा विधान: सप्तश्लोकी, काल भैरव एकाक्षरी, ताँबे के लोटे पर संपुट पाठ, साबर मंत्र, और द्वेष से प्रयोग न करने की चेतावनी।
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गाँव के घर में अभिचार कैसे रखा जाता है
अभिमंत्रित वस्तु घर में लाकर चौखट, ब्रह्म भाग या बिस्तर में रख दी जाती है
वक्ता कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में जब किसी को किसी का घर तंत्र से बर्बाद करना होता है तो वहाँ की प्रक्रिया बड़ी अलग होती है: जिस भी चीज़ के माध्यम से अभिचार करना हो, उसे लेकर वे अवश्य घर के भीतर जाएँगे और चौखट पर, घर के भीतर ब्रह्म भाग में, या जिस पुरुष या स्त्री को परेशान करना हो उसके बिस्तर में रखकर चले आते हैं। स्त्रियाँ, वे कहते हैं, यह काम आराम से कर देती हैं। यह घटना, वे कहते हैं, ठीक ऐसे ही की गई थी।
वक्ता कहते हैं कि जो अनुभव वे साझा कर रहे हैं वह देहरी पूजन और चौखट पर होने वाले तंत्र से जुड़ा है, जिन विषयों पर चैनल पर और लाइव में वे बात कर चुके हैं, और यह घटना ग्रामीण क्षेत्र की है। ग्रामीण क्षेत्र में, वे कहते हैं, सब जानते हैं कि किसी का घर बर्बाद करना हो, तंत्र-विचार करना हो, तो वहाँ की प्रक्रिया बड़ी अलग होती है। जिस भी चीज़ के माध्यम से तंत्र करना हो, ये लोग उस चीज़ को लेकर अवश्य घर में जाएँगे और घर में जाकर चौखट पर, या घर के भीतर ब्रह्म भाग में, या जिस पुरुष या स्त्री को परेशान करना हो उनके बिस्तर आदि में रखकर चले आते हैं। स्त्रियाँ, वे कहते हैं, यह काम आराम से कर देती हैं। और यह घटना ऐसी ही थी।
नवविवाहिता के पहले तीन महीने क्रूशियल पीरियड क्यों होते हैं
दहेज और सुंदरता की ईर्ष्या, और वे पुराने नियम जो इस अवधि की रक्षा करते थे
वक्ता कहते हैं कि विवाह करके जब कोई कन्या घर आती है तो उसके पहले तीन महीने बहुत क्रूशियल पीरियड होते हैं जिनमें उस पर अभिचार हो सकता है। इसीलिए कहा जाता है कि उस समय घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, और बहुत से नियम होते हैं: सिंदूर भरने का नियम, पूजन-पाठ का नियम, तीन महीने के बाद ही कहीं जाने का नियम; आज, वे कहते हैं, इतने नियम कोई मानता नहीं। उनकी सुनाई घटना में उनके गृह तंत्र परिवार के एक साधक का विवाह हुआ था और दहेज अच्छा-खासा मिला था, जिस पर गाँव में ईर्ष्या होती है कि किसके बेटे को ज़्यादा मिला और इतनी सुंदर पत्नी मिली; और क्योंकि नई बहू से आस-पड़ोस के लोग आते-जाते और हँसी-मज़ाक करते हैं, द्वेष रखने वाले एक परिवार ने इसी का फायदा उठाकर उस बच्ची पर तंत्र कर दिया।
यह घटना, वक्ता कहते हैं, उनके गृह तंत्र परिवार से जुड़े एक साधक का निजी अनुभव है। उनका नया विवाह हुआ था और विवाह में दहेज अच्छा-खासा मिला था। गाँव में यह सब ईर्ष्या की बात हो जाती है: मेरे बेटे को ज़्यादा मिला, मेरे बेटे को ज़्यादा मिला, और उसे इतनी सुंदर पत्नी मिली। तो किसी ने द्वेषवश नवविवाहिता के विरुद्ध किया। नवविवाहिता के लिए, वे कहते हैं, जब विवाह करके कोई कन्या आती है तो उसके तीन महीने बहुत क्रूशियल पीरियड होते हैं। उस समय उस पर अभिचार हो सकता है। इसीलिए कहा जाता है कि उस समय घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। उस समय के बहुत से विधि-नियम होते हैं: सिंदूर भरने का नियम, पूजन-पाठ का नियम, तीन महीने के बाद ही कहीं जाने का नियम। आज के समय में, वे कहते हैं, इतने नियम कोई मानता नहीं। ठीक इसी समय में, जब नई-नई बहू आती है, तो अगल-बगल, आस-पड़ोस के लोग भी बड़ी संख्या में आते हैं; हँसी-मज़ाक चलता है, इसे सामान्य माना जाता है, और जहाँ अच्छे पड़ोसी हों वहाँ लोग ऐसे रिश्ते निभाते हैं; गाँव में आज भी यह चलता है। इसी का फायदा उठाकर द्वेष करने वाले एक परिवार ने उस बच्ची पर इस प्रकार का तंत्र कर दिया।
नवविवाहिता पर अभिचार के लक्षण, जिन्हें विवाह के बाद की मनोवैज्ञानिक समस्या समझ लिया गया
अनिद्रा, सिरदर्द, दस-बारह दिन में पीरियड, फिर चिड़चिड़ापन और क्रोध
वक्ता कहते हैं कि अभिचार विवाह के लगभग पंद्रह-सोलह दिन बाद दिखने लगा: बहू रात को सो नहीं पाती, सुबह ठीक से उठ नहीं पाती, दिन भर सिर में दर्द रहता, मासिक पीरियड अनियमित हो गए, और सबसे बड़ी बात कि दस-बारह दिन बीतते ही फिर पीरियड आ जाता। लोग सामान्यतः कहते हैं कि विवाह के बाद ऐसी समस्या होती है, थोड़ा साइकोलॉजिकल इश्यू भी होता है, तो उसे गायनो को दिखाकर दवाई दिलाई गई और सारा विषय सामान्य समझा गया। तीन-चार महीने बाद समस्या और बढ़ी और वह काफी चिड़चिड़ी होने लगी, जो वे कहते हैं कि बीमारी का सामान्य प्रभाव है; पर सौम्य ससुराल वालों ने, जिनके घर में यह पहला विवाह था, उसके क्रोध को नई जगह और गाँव की बंदिशों की फ्रस्ट्रेशन समझा, एक मुहूर्त रखा, और उसे मायके भेज दिया।
अभिचार में हुआ क्या, वक्ता कहते हैं, यह। विवाह के लगभग पंद्रह-सोलह दिन बाद से बहू के साथ अनिद्रा की स्थिति उत्पन्न हुई। रात को सो नहीं पाती, सुबह सही से उठ नहीं पाती, उठती तो दिन भर सिर में दर्द रहता; मासिक पीरियड अनियमित होने लगे। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अभी दस-बारह दिन बीते और फिर पीरियड आ गया। जब ये दिक्कतें शुरू हुईं तो लोग सामान्यतः कहते हैं कि विवाह के बाद इस प्रकार की समस्या होती है, थोड़ा साइकोलॉजिकल इश्यू भी होता है। तो इसे सामान्य लेकर गायनो को दिखाया गया, थोड़ी दवाई दिलाई गई, और सारा विषय सामान्य समझा गया। पर तीन-चार महीने बीतने के बाद समस्या बढ़ती गई, और साथ में लड़की काफी चिड़चिड़ी होने लगी, जो वे कहते हैं कि बहुत सामान्य प्रभाव है: शरीर में बीमारी उत्पन्न हो रही थी तो यह समस्या और चिड़चिड़ापन तो आना ही था। चिड़चिड़ेपन के साथ लोगों को धीरे-धीरे कुछ आभास होने लगा कि जब यह क्रोधित होती है तो कुछ अलग है। ससुराल के लोग बड़े सौम्य, शांत प्रवृत्ति के थे, दो लड़के, जिनमें पति बड़े थे, और घर में यह पहला विवाह था; तो उन्हें लगा कि शायद दिमाग की स्थिति है, नई जगह में व्यक्ति को दिक्कत होती है, फ्रस्ट्रेट हो रही है, उतनी स्वतंत्रता नहीं मिल रही, गाँव का माहौल है, बाहर आना-जाना कम है। तो तय हुआ कि इन्हें मायके पहुँचा दिया जाए। जैसे यूपी-बिहार में होता है, एक मुहूर्त, दिन-धरा, रखा गया, उन्हें विदा किया गया और मायके वाले ले गए।
पहली होली ससुराल में नहीं मनाई जाती, और होलिका अष्टक वह समय जब आवेश तीव्र होता है
होली के आसपास आवेश पूर्ण हो गया
वक्ता वह नियम याद दिलाते हैं कि पत्नी को होली से पहले मायके भेजा जाता है, क्योंकि विवाह के बाद पहली होली ससुराल में नहीं मनानी चाहिए। घटना में बहू को होली के आसपास वैसे भी जाना था, पर समस्या बढ़ने से उसे एकाध महीने पहले ही भेज दिया गया। जब होलिका का आठ दिन का अष्टक लगा, वे कहते हैं, तो मायके में उसकी समस्या बढ़ने लगी, और होली के एकाध दिन के आसपास वह पूरी तरह आवेशित हो गई और खेलना शुरू कर दिया, यानी आवेश खुलकर प्रकट हो गया।
इसमें एक और विषय रहा, वक्ता कहते हैं। सब जानते होंगे कि जब किसी का विवाह होता है तो होली के समय धर्मपत्नी को होली से पहले मायके भेजा जाता है, क्योंकि नियम है कि पहली होली ससुराल में नहीं मनानी चाहिए। यह विषय वहाँ उत्पन्न था: उन्हें होली के आसपास वैसे भी भेजना था, पर समस्या बढ़ गई थी तो एकाध महीने पहले ही भेज दिया गया, यह सोचकर कि ऐसे भी जाना था, ऐसे भी चली जाएँ। फिर, वे कहते हैं, जब होलिका का आठ दिन का अष्टक लगता है, और आखिरी दिन लगते हैं, तो मायके में उनकी समस्या बढ़नी शुरू हुई, और होली के एकाध दिन के आसपास वह पूरी तरह आवेशित हो गईं, खेलना शुरू कर दिया, आवेश पूरी तरह प्रकट हो गया।
घटना: काउंसलिंग सत्र में प्रकट हुआ आवेश, और भेजी गई शक्ति की ओझाओं को ललकार
पढ़े-लिखे परिवार नकारते हैं; इंजेक्शन से भी शांत नहीं हुई
वक्ता कहते हैं कि बहू का परिवार पढ़ा-लिखा, मॉडर्न, संपन्न और रुतबे वाला था, और ऐसे परिवार, वे कहते हैं, अधिकतर इन चीज़ों को नकार देते हैं; उन्हें शंका हुई कि ससुराल में प्रताड़ना हुई है और वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो रही है, और उसे काउंसलिंग के लिए ले गए, और जब उसने कहा कि उसकी समस्या कुछ अलग है तो चुप करा दिया। डॉक्टर ने अपनी सामान्य विधि से मरीज़ को क्रोध दिलाया तो वह "मंजुलिका" बन गई, टेबल उठा ली, जिस पर सबसे ज़्यादा उछलने वाली भाभी सबसे पहले भागी; चिल्लाना बढ़ता गया, और इंजेक्शन का भी विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। वे कहते हैं कि काउंसलिंग बहुत मामलों में मदद करती है, हर किसी पर भूत-प्रेत की समस्या नहीं होती, पर यहाँ विषय असली था। पति को बुलाया गया, और जब ओझा और सोखा दिखाए-सुनाए गए तो शक्ति शरीर पर आकर ललकारती: तेरे में औकात है तो तू बता मैं कौन हूँ, और तू तो फलाने चीज़ की पूजा करता है, जो प्रायः सही निकलता; पर उस क्षमता का साधक जल्दी नहीं मिला।
बहू जिस परिवार से थी, वक्ता कहते हैं, वे पढ़े-लिखे, मॉडर्न थे, और जहाँ यह विषय आता है, जान लीजिए कि अधिकतर लोग इसे नकार देते हैं; जल्दी मानते नहीं। यह परिवार इस अवस्था में आ चुका था कि इन चीज़ों को नहीं मानता था, क्योंकि पढ़े-लिखे थे, समाज में रुतबा और दबदबा था, पैसे की कमी नहीं थी। साथ ही उन्हें शंका हुई कि ससुराल में कहीं प्रताड़ना हुई है, यह बता नहीं सकती, और मानसिक रूप से अस्वस्थ हो रही है। तो, जैसा आजकल होता है, काउंसलिंग के लिए ले जाया गया। काउंसलिंग के दौरान वह कहती रही कि हमारी समस्या कुछ अलग है, पर सुना नहीं गया; कहा गया तुम चुप रहो। भैया, पिताजी, माताजी और बड़ी बहन, चार-पाँच लोग, सब नई विवाहिता बहन को लेकर चिंतित, उसे ले गए। डॉक्टर ने प्रश्न आदि शुरू किए, और साइकोलॉजिकल मरीज़ के लिए डॉक्टर का अपना तरीका होता है: कुछ ऐसा बोलेगा कि गुस्सा आए, कुछ ऐसा कि सामान्य हो जाए। उस पहले काउंसलिंग सत्र में, जैसा परिवार ने वक्ता को बताया, वह पूरी मंजुलिका बन गई। डॉक्टर ने क्रोध दिलाया तो क्रोधित तो हुई, पर पूरा सिस्टम डॉक्टर के हाथ से निकल गया: मंजुलिका ने पलंग उठाया था; इसने डॉक्टर की टेबल उठा ली। पहला असर यह हुआ कि भाभी, जो सबसे ज़्यादा उछल रही थी कि कुछ नहीं होता, सब फालतू, तुमने दिमाग में बैठा रखा है, उसका रौद्र रूप देखकर सबसे पहले गिरते-पड़ते भागी कि यह क्या हो रहा है। डॉक्टर ने परिवार को साथ रहने को कहा था, क्योंकि पहला सत्र थोड़ा आक्रामक हो सकता है और सँभालने के लिए कोई चाहिए; लोग बहुत बार ऐसा रखते हैं, और ऐसे सत्र ज़रूरी भी होते हैं, वे कहते हैं, क्योंकि हर किसी पर भूत-प्रेत की समस्या उतनी नहीं होती, और कई बार काउंसलिंग से थोड़ी शांति भी मिलती है। पर यहाँ असली मामला था। चिल्लाना बढ़ता गया; डॉक्टर अपने तरीकों से समझाने, शांत करने की कोशिश करती रहीं, पर वह शांत क्यों होती, हो नहीं रही थी। शांत करने के लिए इंजेक्शन दिया गया, उसका भी कोई बहुत प्रभाव नहीं पड़ा; जैसे-तैसे घर आए। तब पति को सूचना गई कि यह समस्या हो गई है, आ जाइए; वे दौड़ते हुए पहुँचे। उसके बाद दिखाने-सुनाने का विषय शुरू हुआ। उस प्रक्रिया में जब कोई सोखा-ओझा देखता-सुनता तो वह चीज़ शरीर पर आती और ललकारती: तेरे में औकात है, हिम्मत है तो तू बता मैं कौन हूँ; मुझसे क्यों पूछता है? तेरे में औकात है तो तू बता। और तू तो फलाने चीज़ की पूजा करता है, यह बता दे। और उसकी कही बातें लगभग सही निकलतीं। पर उसे उत्तर देने की क्षमता वाले साधक जल्दी नहीं मिल रहे थे।
कुल-पूजित शक्ति को अभिचार का हथियार कैसे बनाया जाता है
बलि बाबा, बुलाकी मसान जैसी शक्तियाँ, अक्षत के माध्यम से पीड़ित पर चलाई गईं
वक्ता समझाते हैं कि भेजी गई चीज़ किसी के कुल में पूजित कोई पुरानी शक्ति थी, बलि बाबा या बुलाकी मसान जैसी। ऐसी शक्तियाँ, वे कहते हैं, एक स्तर पर ठीक हैं, पर जब इन्हें नकारात्मक तरीके से चलाने का विषय उत्पन्न हो जाता है तो बड़ी दिक्कत हो जाती है, वे अपनी अलग चाल चलती हैं और पचास झंझटें हो जाती हैं, जब तक कि केवल भगतवाल की पद्धति से न चलाई जाएँ। हमला करने वाले परिवार ने अपनी कुल-पूजित शक्ति को अक्षत आदि या ऐसे किसी माध्यम से बहू पर चला दिया था; वह तगड़ी चीज़ है, उनके घर में उसकी नित्य पूजा चल रही है और वह पीड़ित पर चढ़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बहुत आम है, वे कहते हैं: प्रेतत्व या उपदेव से संबंधित कोई शक्ति किसी के घर में कुल शक्ति के रूप में पूजित हो तो सबसे पहले प्रहार करने वाला व्यक्ति उसी को चला देता है। क्योंकि शक्ति बार-बार ऐसा बोल रही थी, गाँव के लोग समझ गए कि यह पूजित शक्ति है।
अब पहली बात देखिए, वक्ता कहते हैं: इसमें होता क्या है? कोई पुरानी शक्ति, किसी की कुल-पूजित। जैसे जान लीजिए एक बलि बाबा का विषय है; बलि बाबा की तरह बुलाकी मसान है, बलि बाबा है। ये सभी शक्तियाँ एक स्तर पर ठीक हैं, पर जब इन्हें नकारात्मक तरीके से चलाने का विषय उत्पन्न हो जाता है तो बड़ी दिक्कत हो जाती है: फिर वह अपनी अलग चाल चलती है और उसमें पचास झंझटें हो जाती हैं। केवल भगतवाल की पद्धति से चलाई जाएँ तो अलग बात है, पर यहाँ भी यही समस्या थी। हमला करने वालों ने अपनी कुल की पूजित शक्ति को अक्षत आदि के माध्यम से, या किसी ऐसे ही माध्यम से, बहू पर चला दिया था। वह तगड़ी चीज़ है: उनके घर में उसकी नित्य पूजा चल रही है, और वह इन पर चढ़ी हुई है। यह विषय, वे कहते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा आम है। प्रेतत्व से या उपदेव से संबंधित कोई शक्ति किसी के घर में कुल शक्ति के रूप में पूजित हो, तो सबसे पहले प्रहार करने वाला व्यक्ति जब इस प्रकार की प्रक्रिया में फँसता है तो उसी को चला देता है। यहाँ यही विषय था। जब कोई पकड़ नहीं पाया, तो क्योंकि ग्रामीण लोग थे, उन्हें समझ में आ गया कि यह पूजित शक्ति है, ज़रूर कुछ ऐसा विषय रहा है, इसीलिए यह बार-बार ऐसा बोल रही है।
भेजी गई कुल शक्ति को पलटना: क्षेत्रपाल के माध्यम से पहचान, भगतवाल के हिसाब से भोग-भेंट, और वापस भेजना
अनुभवी ग्रामीण साधकों ने उसे पलटा और शरीर को बाँधा
वक्ता कहते हैं कि बुज़ुर्ग, अनुभवी ग्रामीण साधकों ने वह प्रक्रिया अपनाई जिससे हल-सृष्टि के समय गुरु उपदेश के माध्यम से शिष्य को सब कुछ देता है, जो उन्होंने एक और वीडियो में समझाई है। हमला करने वालों का स्थान किस क्षेत्र में है यह पता था, तो क्षेत्रपाल आदि के माध्यम से उन्होंने केवल इतना निकाला कि यह कौन सी शक्ति है और किससे संबंधित है; पता चलते ही पहले शुद्ध भगतवाल के हिसाब से, यानी कितने में उतारना है, डबल में या चार में, सही भोग-भेंट से उसे मनाया। फिर, सारी जानकारी हो जाने पर, उसे उतारा, और जिनकी शक्ति थी उनके घर वापस भेजने से पहले अपनी कुछ चीज़ें लगाकर भेज दिया, पूरा तांत्रिक विद्या वाला पलटना विषय। शरीर को बाँधकर सुरक्षित किया, और समस्या लगभग नब्बे प्रतिशत हल हो गई, जबकि करने वालों के घर में उत्पात मचना शुरू हुआ और सूचना आने लगी, जिससे परिवार को भी पता चल गया कि किसके घर की बात थी। होली के बाद वह ससुराल लौट आई, शरीर में कोई विशेष समस्या नहीं थी, भगत जी का बताया वह करती रही।
फिर, वक्ता कहते हैं, इसमें एक और विषय आता है: हल-सृष्टि के समय की एक प्रक्रिया, जिसे उन्होंने एक वीडियो में स्पष्ट किया था, कि किस प्रकार उपदेश आदि के माध्यम से गुरु अपने शिष्य को सब चीज़ देता है। उस प्रक्रिया का यहाँ प्रयोग किया गया। उन्होंने किया क्या। उन्हें पता था कि किस क्षेत्र में हमला करने वालों का स्थान है, और केवल इतनी जानकारी क्षेत्रपाल आदि के माध्यम से निकाल ली, जो साधक थे, जानकार व्यक्ति थे: यह शक्ति किस चीज़ से संबंधित है, कौन सी शक्ति है। और पता चल गया कि यह फलानी शक्ति है। पता चलने पर उसका भोग-भेंट क्या होता है? भगतवाल का शुद्ध विषय: क्या होता है, कितने में उतारना है, डबल में उतारना है कि चार में। उससे पहले उन्होंने उसे मनाया। मनाने के बाद अगली प्रक्रिया, जब उसने माँगा, अपने तरीके से की, क्योंकि विशुद्ध ग्रामीण चीज़ थी और वे बुज़ुर्ग, अनुभवी साधक थे। पता करने के बाद जब सारी जानकारी हो गई, उसके बाद इसे उतारा, और उतारने के बाद जिनकी शक्ति थी उनके घर भेजने से पहले अपनी कुछ चीज़ें लगाकर भेज दिया। यह पूरा तांत्रिक विद्या वाला पलटने का विषय होता है, और उन्होंने कर दिया। शरीर को बाँधकर जो पूरा सुरक्षित करना था, वह सब भी कर दिया। समस्या लगभग नब्बे प्रतिशत हल हो गई, वे कहते हैं, और जिन्होंने यह सब किया था उनके घर में उत्पात मचना शुरू हो गया; सूचना आने लगी, और परिवार को भी पता चल गया कि किसके घर की समस्या थी, क्या था, क्या नहीं। होली बीती, दिन-धरा आया, वह ससुराल वापस आई, और शरीर में कोई विशेष समस्या नहीं थी; भगत जी ने जो बताया था वह ज़रूर कर रही थी।
केवल घर का बंधन दहलीज़ लाँघकर लाए गए प्रयोग को क्यों नहीं रोक सकता
दहलीज़ पर ही प्रचंड शक्ति का पूजन करें
वक्ता कहते हैं कि पहली घटना के बाद परिवार ने पूछा कि आगे ये लोग दोबारा न कर पाएँ इसके लिए क्या किया जाए, क्योंकि स्पष्ट था कि वे फिर आएँगे, और अपने भारत में कोई सीधे यह कहकर नहीं लड़ता कि तुमने किया; ऐसा हो तो सीधे मार होती है। उन्होंने कहा कि घर को कितने भी सिस्टम से बाँध लें, छान लें, जब हमला करने वाले पूरे अंदर घुसकर दहलीज़ लाँघ रहे हों तो संभावना थोड़ी कम हो सकती है, प्रयोग का प्रभाव थोड़ा कम हो सकता है, पर प्रभाव तो पड़ेगा ही। इसलिए उन्होंने कहा कि दहलीज़ पर ही प्रचंड शक्ति का पूजन करें, और एक विधान बताया जिसे वे सबसे पहला और बहुत सरल विधान कहते हैं, जिसे कोई भी कर सकता है और जिसका प्रभाव बहुत तीव्र और तीक्ष्ण होता है।
वक्ता कहते हैं कि पहला इंसिडेंट पूरा यही था। दूसरा तब हुआ जब हमला करने वालों ने दोबारा प्रयोग किया; अपने भारत में, वे कहते हैं, कोई सीधे जाकर यह बोलकर नहीं लड़ता कि तुमने किया, ऐसा होता नहीं, और हो जाए तो सीधे मार। तो उन्होंने दोबारा प्रयोग किया, पर इस बार परिवार तैयार था। जब पहले का पूरा विषय उन्हें बताया गया था, तब परिवार ने पूछा था: आगे ये लोग दोबारा न कर पाएँ इसके लिए क्या किया जाए? उन्होंने पूछा कि क्या यह स्पष्ट है कि वे आएँगे, और उत्तर मिला हाँ, बिल्कुल आएँगे। उन्होंने कहा: घर को कितने भी सिस्टम से बाँध दीजिए, छान दीजिए, जब ये पूरे अंदर ही घुस रहे हैं तो संभावना भले थोड़ी कम हो, जो प्रयोग करेंगे उसका प्रभाव थोड़ा कम हो सकता है, पर प्रभाव तो पड़ेगा ही, अगर दहलीज़ लाँघ रहे हैं तो। तो एक काम कीजिए, उन्होंने कहा: दहलीज़ पर ही प्रचंड शक्ति का पूजन कीजिए। और उन्होंने इसका एक विधान बताया, जिसे वे सबसे पहला और बहुत सरल विधान कहते हैं, और सबको सुनने को कहते हैं, क्योंकि इसे कोई भी कर सकता है और इसका प्रभाव बहुत तीव्र और तीक्ष्ण होता है।
दहलीज़ रक्षा विधान: सप्तश्लोकी सिद्धि, काल भैरव एकाक्षरी जप, ताँबे के लोटे पर संपुट पाठ, और दहलीज़ पर जल
7000 जप, फिर 4 लाख जप, फिर संपुट पाठ; साबर मंत्र नहीं बताया गया
वक्ता के बताए विधान के तीन भाग हैं। पहला, सप्तश्लोकी को 7000 जप से सिद्ध करना; साधक ने यह छह महीने में किया, शारदीय नवरात्र से चैत्र नवरात्र से थोड़ा पहले तक, हालाँकि तीन महीने में पूरा हो गया था। दूसरा, चैत्र नवरात्रि में भगवान काल भैरव का एकाक्षरी बीज, केवल बीज मात्र, लेकर सवा लाख जप, जो बढ़ाकर 4 लाख किया गया ताकि बीज प्रचंड हो जाए; साधक विवाह से ही यज्ञोपवीत धारण किए थे और अच्छे आचार्य के गायत्री उपदेश से ठीक संध्या करते थे। तीसरा, बगलामुखी जयंती से उस एकाक्षरी बीज से सप्तश्लोकी का संपुट पाठ, चैनल पर बताई संपुट विधि से, हाथ में ताँबे का लोटा लेकर जिसमें पानी, गुड़, थोड़े लाल या गुलाब के फूल और हल्का गुलाब का इत्र हो, प्रार्थना करते हुए कि घर का पूर्ण बंधन हो, देहरी पूरी बँध जाए, उस पर भैरव जी का पहरा लगे, और बाहर की जो शक्ति अहित के लिए उसका उल्लंघन करे वह स्वयं नष्ट हो और भैरव जी उसे दंड दें। फिर एक परंपरागत सबर मंत्र, जिसमें तांत्रिक प्रणव और बीज हैं और जिसे उन्होंने निजी रूप से दिया, यहाँ नहीं बताते, उस अभिमंत्रित जल को चलित करता है; उसे दहलीज़ पर दोनों तरफ डाला जाता है, साथ में नियमित देहरी पूजन और आटे का दीपक।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, उन्होंने साधक से सप्तश्लोकी सिद्ध करने को कहा: सप्तश्लोकी का 7000 जप, जो उसने छह महीने में किया। वास्तव में तीन महीने में कर लिया था, पर मन की संतुष्टि नहीं थी, तो तीन महीने और बढ़ाए। जप शारदीय नवरात्र से लेकर माघ की गुप्त नवरात्र से थोड़ा आगे, यानी चैत्र नवरात्र से थोड़ा पहले तक चला; लगभग चार महीने में हो चुका था। इतना जप पहले किया। दूसरा, चैत्र नवरात्र के समय भगवान काल भैरव जी के एकाक्षरी बीज का जप करवाया, एकाक्षरी बीज मात्र। यह साधक यज्ञोपवीत धारण करते थे और नियम से चलते थे; विवाह के समय यज्ञोपवीत हुआ था, और अच्छे शास्त्री, अच्छे आचार्य मिले थे जिन्होंने गायत्री का उपदेश दिया था, तो ठीक संध्या कर रहे थे और अपनी अवस्था में जितना चलना चाहिए उतना कर रहे थे। एकाक्षरी बीज का सवा लाख जप किया। सवा लाख के बाद वक्ता ने कहा कि तीन बार और कीजिए, नहीं तो 4 लाख पूरा कीजिए; तो पहले एकाक्षरी का 4 लाख जप हुआ। वह एकाक्षरी अब प्रचंड हो चुकी थी, और सप्तश्लोकी के साथ दो चीज़ें सिद्ध हो गईं। तीसरा, प्रयोग: उस एकाक्षरी बीज से संपुट करके सप्तश्लोकी का पाठ। यह बगलामुखी जयंती के समय से आरंभ किया, काल भैरव के बीजाक्षर से संपुट करके सप्तश्लोकी का पाठ; संपुट पाठ की विधि चैनल पर है। उस समय करना बस इतना था: ताँबे के लोटे में पानी और गुड़ डालकर, थोड़े लाल पुष्प या गुलाब के पुष्प, और हल्का सा गुलाब का इत्र। फिर सामने हाथ में लोटा लिए एकाक्षरी संपुट से सप्तश्लोकी का पाठ और प्रार्थना कि हमारे घर का पूर्ण रूप से बंधन हो जाए, देहरी पूरी बँध जाए, इस पर भैरव जी का पहरा लग जाए, कोई भी शक्ति इसका उल्लंघन न करे, और बाहर की जो शक्ति हमारा अहित चाहते हुए उल्लंघन करे वह स्वयं नष्ट हो जाए, भैरव जी उसे दंड दें। इसका एक और मंत्र है, वक्ता कहते हैं, जो उन्होंने साधक के साथ साझा किया: साबर मंत्र, साबर और उसमें थोड़ा तांत्रिक प्रणव, तांत्रिक बीज आदि, परंपरागत मंत्र। वह दिया गया था, तो पहले संपुट पाठ से जल को अभिमंत्रित करके फिर उस साबर मंत्र से उसे चलित किया। फिर उसे ले जाकर दहलीज़ पर दोनों तरफ, देहरी पर डाला। और बाकी सारा, दहलीज़ का पूजन, देहरी पूजन, साथ में आटे का दिया आदि, वह सब भी कर रहे थे। साबर मंत्र वार्ता में नहीं दिया गया है।
दहलीज़ रक्षा का फल: विशुद्ध रक्षात्मक, बिना नाम के संकल्प से 24 घंटे में हमलावरों को दंड
जिस स्तर पर प्रयोग हुआ, उसी स्तर पर जवाब मिला
वक्ता कहते हैं कि प्रभाव प्रचंड पड़ा: जिस दिन हमलावरों ने दूसरी बार घात किया, उसी दिन 24 घंटे के भीतर उनके घर के दो लोगों का एक साथ एक्सीडेंट हुआ; अक्टूबर 2024 तक एक अभी तक होश में नहीं आया, एक तरह से कोमा में, ब्रेन में समस्या और शायद पैरालिसिस, और दूसरा समय लेकर ठीक हुआ पर स्थिति बहुत खराब है। वे यह नहीं कह रहे कि भैरव जी ने तुरंत उनका अहित कर दिया, पर जिस स्तर पर प्रयोग किया गया था उसी स्तर पर जवाब मिला। जब रक्षात्मक शक्तियों को तीव्रता से जागृत किया जाए, वे कहते हैं, और मन शुद्ध हो, भाव शुद्ध हो, क्रिया-विधि में समर्पण हो, मन में कोई द्वेष न हो, और शरणागत भाव से एक सद्गृहस्थ की भाँति परिवार की रक्षा के लिए किया गया हो, तो देवता दंड देते हैं। यहाँ संकल्प में किसी शत्रु का नाम नहीं लिया गया था; सीधा विषय था कि जो भी ज्ञात-अज्ञात शत्रु हैं, उनका जो भी प्रयोग हो, उसे नष्ट करें या उचित दंड दें, सामान्य रक्षात्मक संकल्प, और यही दंड उन्हें मिला।
इसका प्रचंड प्रभाव यह पड़ा, वक्ता कहते हैं, कि जब दूसरी बार घात होने की संभावना बनी और हमलावरों ने घात किया, तो जिस दिन घात किया उसी दिन 24 घंटे के भीतर करने वालों के घर में दो लोगों का एक साथ एक्सीडेंट हुआ। उनमें से एक, वर्तमान समय, अक्टूबर 2024 तक, अभी तक होश में नहीं आ पाया, एक तरह से कोमा में है; उसका पूरा विषय अभी ठीक नहीं हुआ, शायद पैरालिसिस वाला विषय भी हो गया या उससे संबंधित कुछ, होश में नहीं है, एक्सीडेंट के बाद से ब्रेन में कुछ समस्या हो गई। दूसरे व्यक्ति को समय लगा, वह ठीक हुआ, पर अब उसकी स्थिति बहुत खराब है। वे यह नहीं कह रहे, वे ज़ोर देते हैं, कि भैरव जी ने वहाँ तुरंत उसका अहित कर दिया; पर जिस स्तर पर वह प्रयोग किया गया था उसी स्तर पर उसे जवाब मिला, और वे श्रोताओं से इसे याद रखने को कहते हैं। जब कभी आप रक्षात्मक शक्तियों को तीव्रता से जागृत कर लेते हैं, वे कहते हैं, और आपका मन शुद्ध है, भाव शुद्ध है, क्रिया-विधि में समर्पण रखा है, मन में किसी प्रकार का द्वेष नहीं रखा, कहीं न कहीं शरणागति के भाव से किया है, और अपने परिवार के रक्षण के लिए एक सद्गृहस्थ की भाँति किया है, तो देवता उधर से दंड देते हैं। यहाँ कहीं संकल्प नहीं किया गया था कि फलाना मेरा शत्रु है, उसका नाम यह है, उसको यह करो, वह करो; नहीं। यहाँ सीधा विषय था: जो भी ज्ञात-अज्ञात शत्रु हैं, उनके जो भी अज्ञात प्रयोग हों, उस प्रयोग को नष्ट कर दें या उचित दंड प्रदान करें। जो सामान्यतः रक्षात्मक संकल्प होता है वह किया गया था, तो उन्हें इस प्रकार का दंड मिला। यही, वे कहते हैं, उनकी वर्तमान स्थिति बनी हुई है।
देहरी और शरीर की रक्षा के लिए कौन सा एकाक्षरी बीज प्रयोग किया जा सकता है?
किसी भी देवता का एकाक्षरी, दीक्षा विधि से, 4 लाख जप और 7000 सप्तश्लोकी, जीवन पर्यंत
वक्ता कहते हैं कि वे यह आग्रह नहीं करते कि संपुट भैरव जी के एकाक्षरी से ही हो; किसी भी बीजाक्षर का संपुट किया जा सकता है, सौम्य देवताओं का भी, हालाँकि किस देवता के मंत्र का प्रयोग करें यह सामान्य विषय नहीं है। हनुमान जी के एकाक्षरी का, भगवान बटुक भैरव जी के, नरसिंह जी के, भगवती काली के या दुर्गा जी के एकाक्षरी का प्रयोग कर सकते हैं; जो भी हो, कम से कम देव दीक्षा विधि आदि से किसी दिव्य समय में उस मंत्र को ग्रहण करके 4 लाख जप कर लें और सप्तश्लोकी का 7000 जप कर लें, फिर जीवन पर्यंत प्रयोग करें। यह केवल देहरी रक्षण के लिए नहीं, किसी के शरीर के रक्षण और बंधन के लिए भी है, और श्रद्धा से, वे कहते हैं, घर-परिवार या किसी के शरीर की सुरक्षा के लिए कहीं भी बैठकर जीवन भर इसका प्रयोग किया जा सकता है। वे जोड़ते हैं कि इसका एक और पूरा विधान भविष्य में चैनल पर देंगे।
वक्ता कहते हैं कि वे यह नहीं कहेंगे कि भैरव जी के एकाक्षरी मंत्र से ही संपुट करें। जिस भी बीजाक्षर का संपुट करें, सौम्य देवताओं का भी प्रयोग करें, तो अब आप जान सकते हैं कि किस देवता के मंत्र का प्रयोग करेंगे यह सामान्य विषय नहीं है। चाहें तो, वे कहते हैं, हनुमान जी के एकाक्षरी का प्रयोग करें, भगवान बटुक भैरव जी के एकाक्षरी का, नरसिंह जी के एकाक्षरी का, या भगवती काली के एकाक्षरी का, दुर्गा जी के एकाक्षरी का। जिस भी एकाक्षरी का प्रयोग करें, कम से कम देव दीक्षा विधि आदि से उस मंत्र को किसी दिव्य समय में ग्रहण करके 4 लाख जप कर लें, सप्तश्लोकी का 7000 जप कर लें, और जीवन पर्यंत प्रयोग करें। यह केवल देहरी रक्षण के लिए ही नहीं होगा, वे कहते हैं, किसी के शरीर के रक्षण-बंधन आदि के लिए भी। यह वीडियो, वे कहते हैं, अनुभव भी है और साथ में सिद्धि आदि की प्रक्रिया-विधि, दिव्य विधि; जब साधक ने अनुभव भेजा तो ध्यान आया कि पूरा विषय इस अनुभव के साथ साझा किया जाए ताकि लोग लाभ उठा सकें। चाहें तो, वे जोड़ते हैं, इस विधान को श्रद्धा से करके जीवन पर्यंत सुरक्षा के कार्य में लगाया जा सकता है: घर-परिवार, किसी का शरीर, कहीं भी बैठकर। भविष्य में कभी, वे कहते हैं, इसका पूरा एक और विधान भी चैनल पर अवश्य देंगे।
सावधानी: जिस पर प्रयोग है उसके प्रति द्वेष रखकर रक्षा प्रयोग कभी न करें; विधि अपने गुरु से फिर लें
द्वेष अपात्र बनाता है और दोष स्वयं पर पड़ता है
वक्ता कहते हैं कि अगर कोई इस प्रकार की किसी विधि का प्रयोग कर रहा है और जिस व्यक्ति के लिए प्रयोग है उसके प्रति मन में अति द्वेष है, बार-बार उस पर कटाक्ष कर रहा है, और मन में गुरु जैसा सम्मान नहीं है, तो वह प्रयोग न करे, न करे। अगर मन में द्वेष आ ही गया है, वे स्पष्ट कहते हैं, तो वह विधि अपने किसी गुरु से पुनः ले ले, ताकि अपना अकल्याण न हो। कोई उनका हित चाहे या बैठकर गाली दे, वह उसकी बात है, पर अपात्र या कुपात्र न बने: द्वेष करके वह विषय करने से अपना अहित होगा, और वे कभी नहीं चाहेंगे कि मंत्र और देवता के कारण किसी का अहित हो। अपने गुरु से उपदेश लेने पर, वे कहते हैं, गुरु समझ जाएँगे कि किस स्तर का विषय है और पूछेंगे; और ऐसे व्यक्ति से द्वेष करने का जो दोष लगे उसका विचार फिर उसके गुरु जी और आराध्य करेंगे, वक्ता को उसमें क्या करना।
वक्ता एक चेतावनी के साथ समाप्त करते हैं। अगर आप इस प्रकार की किसी भी विधि का प्रयोग कर रहे हैं, और जिस व्यक्ति के लिए वह प्रयोग है उसके प्रति आपके मन में अति द्वेष है, बार-बार उस पर कटाक्ष कर रहे हैं, और मन में गुरु जैसा सम्मान नहीं है, तो भाई, उस प्रयोग को न करें, न करें। अगर मन में द्वेष आ ही गया है, वे स्पष्ट कहते हैं, तो उस विधि को अपने किसी गुरु से पुनः ले लीजिए, ताकि आपका अकल्याण न हो। उनका हित करना चाहते हैं, कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। मन में द्वेष है, गाली देना चाहते हैं, बैठकर दीजिए। पर फिर अपात्र मत बनिए, कुपात्र मत बनिए। द्वेष करके वह विषय करेंगे तो आपका अहित होगा, और वे कहते हैं कि वे कभी नहीं चाहेंगे कि मंत्र और देवता के कारण किसी का अहित हो। व्यक्तिगत बात अलग है; वह आपकी सड़ी-गली मानसिकता हो सकती है। ताकि मंत्र आदि के माध्यम से आपका अहित न हो, उसका उपदेश अपने गुरु से लीजिए। आपके गुरु भी समझ जाएँगे कि किस स्तर का विषय है, पूछेंगे; और ऐसे व्यक्ति से द्वेष कर रहे हैं तो उसका जो दोष लगे, उसका विचार आपके गुरु जी और आपके आराध्य करेंगे; वक्ता को उसमें क्या करना। वे आशा करते हैं कि श्रोताओं ने विषय अच्छी तरह समझ लिया होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।