कुल पितृ, कुलदेवी और अभिचार-ग्रस्त घर के लिए चौखट के तांत्रिक प्रयोग
वक्ता के तीन चौखट प्रयोग — रुष्ट कुल पितरों के लिए कृष्ण पक्ष की सेवा, कुलदेवी और कुल शक्ति के लिए दीपकों और धूनी वाली शुक्ल पक्ष की सेवा, और अभिचार से पीड़ित घर के लिए आर्द्रा नक्षत्र का शिव जल व रोज़ का निर्माल्य — साथ में कौन कर सकता है और बिना चौखट के घर का कोई विकल्प क्यों नहीं।
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चौखट पर किए प्रयोग क्यों काम करते हैं: नरसिंह का आसन और कुल की शक्तियाँ
देहरी पर कुल पितृ और रक्षात्मक शक्तियाँ; गोधूलि बेला प्रयोग को तीव्र करती है
वक्ता कहते हैं कि मुख्य द्वार की देहरी, यानी चौखट, भगवान नरसिंह का स्थान और आसन मानी गई है, और वहाँ कुल के पितृ और कुल की रक्षात्मक शक्तियाँ सदैव उपस्थित रहती हैं। गोधूलि बेला में — दिन और रात के बीच की संध्या, जो भगवान नरसिंह का समय है — उस स्थान पर उनके तत्व अवश्य उपस्थित रहते हैं, इसलिए उस समय वहाँ किया गया हर प्रयोग अत्यंत विशेष प्रभाव देता है। वे कहते हैं कि चौखट के माध्यम से घर की सुरक्षा और कुल देवताओं, कुल पितरों की तृप्ति अवश्य हो सकती है।
वक्ता कहते हैं कि चौखट के माध्यम से हमारे घर की सुरक्षा और कुल देवताओं, कुल पितृ की तृप्ति अवश्य हो सकती है; तंत्र में अनेक ऐसे विधान हैं जिनमें चौखट के ही माध्यम से कुल की शक्तियों को अत्यंत तीव्र और तेज किया जाता रहा है। वे पहले की चर्चा की बात दोहराते हैं कि घर के मुख्य द्वार की देहरी, यानी चौखट, भगवान नरसिंह का स्थान और आसन मानी गई है। उस देहरी पर, वे कहते हैं, कुल के पितृ और कुल की रक्षात्मक शक्तियाँ नित्य, सदैव उपस्थित रहती हैं। और दिन और रात के बीच का जो संध्या का समय है जिसे गोधूलि बेलासांयकाल का गोधूलि समय — परंपरागत रूप से आकर्षण प्रयोगों हेतु उपयुक्त माना जाता है। कहते हैं — जो भगवान नरसिंह का समय है — उस समय उस स्थान पर भगवान नरसिंह के तत्व अवश्य उपस्थित रहते हैं, इसलिए उस समय वहाँ किया गया हर प्रयोग अत्यंत विशेष प्रभाव देने वाला होता है।
जिस घर में चौखट नहीं है, क्या वहाँ चौखट के प्रयोग किए जा सकते हैं?
चौखट नहीं तो प्रयोग नहीं — किराए के घर में भी लगवा लें
नहीं — वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि जिनके घर में देहरी या चौखट नहीं है, वे ये प्रयोग नहीं कर सकते और उनका कोई विकल्प नहीं है; "बिना चौखट के" करने से कोई लाभ नहीं है। उनका उत्तर है कि चौखट लगवा लीजिए: अपने घर में तो अवश्य, और किराए के घर में भी, क्योंकि आप उसका पैसा दे रहे हैं — यदि वह घर अभी छोड़ना नहीं है तो वहाँ चौखट लगवाने में कोई दोष नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जिनके घर में देहरी नहीं है, चौखट नहीं है, वे इन प्रयोगों को नहीं कर सकते; उनका कोई विकल्प नहीं है। चौखट होगी तभी कर पाएँगे। वे पहले से ही उस प्रश्न का उत्तर दे देते हैं कि चौखट नहीं है तो बिना चौखट के ही कर लें क्या — उत्तर है कि उसमें कोई फायदा नहीं, कोई लाभ नहीं है। उनकी सलाह है कि चौखट लगवा लीजिए। अपना घर है तो लगवा सकते हैं। किराए के घर में भी चौखट लगवा सकते हैं, क्योंकि आप उसका पैसा दे रहे होते हैं; यदि वह घर अभी छोड़ना नहीं है तो ऐसा करने में कोई दोष नहीं है। वे यह बात आगे फिर दोहराते हैं: चौखट नहीं है तो चौखट लगवाइए — यह आपके ही लिए है, आपके कल्याण के लिए, आपके घर-परिवार की सुरक्षा के लिए है।
कुल पितरों के लिए चौखट का प्रयोग कब करना चाहिए
रुष्ट पितृ, कुंडली में पितृ दोष या श्राप, ऊपरी शक्तियाँ और वायव्य बाधा
वक्ता कहते हैं कि पहला प्रयोग तब है जब यह स्पष्ट हो जाए कि घर के कुल पितृ आपसे रुष्ट और असंतुष्ट हैं, या कुंडली या जीवन में कहीं न कहीं पितृ दोष या श्राप की उपस्थिति है। विशेष रूप से जो ऊपरी शक्तियों या वायव्य बाधाओं से पीड़ित हैं, और उसमें भी यदि पितृ दोष है, उनके लिए यह पहला प्रयोग है। पितृ दोष कैसे और कितनी जल्दी लगता है, वे कहते हैं, इसकी चर्चा पहले हो चुकी है — दुष्प्रभाव बहुत जल्दी पड़ा लगता है, पर उसके पीछे अनेक कारण होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पहला विषय यह है कि यदि घर के कुल पितृ आपसे रुष्ट हैं और आपको यह पता चल रहा है। पितृ दोष कैसे लगता है — इतनी जल्दी नहीं, लेकिन कैसे, कब, कब तुरंत लग जाता है और कब समय लगता है — इसकी पूरी चर्चा पहले हो चुकी है; हम सोचते हैं कि अरे इतनी जल्दी दुष्प्रभाव पड़ गया, लेकिन उसके पीछे अनेक कारण होते हैं। तो जब यह स्पष्ट हो जाए, विशेष रूप से, कि हमारे कुल पितृ असंतुष्ट और रुष्ट हैं, तृप्त नहीं हो रहे हैं, और कहीं न कहीं पितृ दोष या श्राप की उपस्थिति हमारी कुंडली या जीवन में है, तब यह प्रयोग करना चाहिए। जो किसी प्रकार की ऊपरी शक्तियों या वायव्य बाधा से पीड़ित हैं, वे कहते हैं, और विशेष रूप से यदि पितृ दोष है, उनके लिए यह पहला प्रयोग है।
कुलवधू द्वारा चौखट की दैनिक न्यूनतम सेवा
चौखट वाले हर घर में रोज़ धोना, सुगंधित करना, धूप-दीप
सामान्य नियम के रूप में, वक्ता कहते हैं, जिनके भी घर में चौखट है, वहाँ कुलवधू को रोज़ अपने घर की उस चौखट को स्नान कराना, धोना और सुगंधित करना चाहिए, और वहाँ धूप-दीप दिखा देना चाहिए। इतना, वे कहते हैं, हर घर में अवश्य होना चाहिए — किसी विशेष प्रयोग से अलग, नित्य।
वक्ता कहते हैं कि सामान्य रूप से जिनके भी घर में चौखट है, वहाँ कुल वधूपरिवार की बहू या घर की गृहिणी — परंपरागत रूप से मुख्य द्वार की चौखट को स्वच्छ रखने व प्रतिदिन सिर ढककर सजाने की जिम्मेदार होती है। रोज़ अपने घर की उस चौखट को स्नान कराए — धोए, सुगंधित करे, और वहाँ धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।-दीप दिखा दे। इतना, वे कहते हैं, अवश्य होना चाहिए। रुष्ट कुल पितरों के लिए विशेष प्रयोग इस दैनिक न्यूनतम के ऊपर है, उनके लिए जो वास्तव में पीड़ित हैं।
कुल पितरों के लिए चौखट का प्रयोग कौन कर सकता है
घर का कोई पुरुष या विवाहिता; कुँवारी बेटी कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि कुल पितृ प्रयोग में सुबह और शाम दो भाग हैं। सुबह का प्रयोग घर का कोई भी पुरुष या कोई भी कुलवधू कर सकते हैं — घर के लड़के, बहू, जो भी विवाहिता वहाँ हैं। लेकिन घर की कुँवारी बेटी यह प्रयोग नहीं करेगी; इसका ध्यान रखने को वे कहते हैं।
इस प्रयोग में, वक्ता कहते हैं, सुबह और शाम दो प्रकार का विषय रहेगा। सुबह का प्रयोग घर का कोई भी पुरुष कर सकता है, कोई भी कुल वधूपरिवार की बहू या घर की गृहिणी — परंपरागत रूप से मुख्य द्वार की चौखट को स्वच्छ रखने व प्रतिदिन सिर ढककर सजाने की जिम्मेदार होती है। कर सकती है। लेकिन ध्यान रखें कि घर की जो कुँवारी बेटी होगी वह यह प्रयोग नहीं करेगी। उस घर के लड़के कर सकते हैं, उस घर की बहू कर सकती है, जो भी विवाहिता वहाँ हैं वे कर सकती हैं — लेकिन घर की बेटी यह प्रयोग नहीं करेगी।
कुल पितरों के लिए सुबह की चौखट सेवा
स्नान, कर्म-साक्षी दीपक, धोना, इत्र, कुशा आसन, सूर्योदय के एक घंटे में दो घी के दीपक
वक्ता कहते हैं कि सुबह का प्रयोग स्वयं स्नान करने के बाद करना है (झाड़ू-पोछा पहले कर लें, पर स्नान प्रयोग से पहले हो), और नित्य पूजा से पहले करें तो अधिक श्रेष्ठ है: पूजन स्थान की पूरी तैयारी कर लें पर पूजन के लिए बैठें नहीं — केवल वहाँ का कर्म-साक्षी दीपक प्रज्वलित करके चौखट के पास आ जाएँ। चौखट को ऊपर-नीचे अच्छे से धोएँ, चंदन का इत्र लगाएँ (एलर्जी हो तो गुलाब जल और अगरु), अच्छे वस्त्र से पोंछें, दोनों ओर दो-दो कुशा के छोटे आसन रखें, उन पर मिट्टी या पीतल का एक-एक मुखी घी का दीपक रखें, और यह बोलते हुए प्रज्वलित करें कि हमारे कुल के पितृ प्रसन्न हों, कृपा करें, घर की सुरक्षा करें, और हमसे जो ज्ञात-अज्ञात दोष या अपराध हुआ हो उसे क्षमा करें। यह सूर्योदय के एक घंटे के भीतर कर लेना है।
वक्ता कहते हैं कि सुबह के समय सबसे पहले यह कि प्रयोग स्वयं स्नान करने के बाद करना है। घर का झाड़ू-पोछा, सब कुछ पहले कर लीजिए, लेकिन प्रयोग स्नान के बाद ही करना है। पूजन स्थान पर जो भी पूजा करते हैं वह इसके बाद भी कर सकते हैं और पहले भी, लेकिन प्रयोग पहले करें तो अधिक श्रेष्ठ है। पूजन स्थान की पूरी तैयारी कर लीजिए, लेकिन पूजन के लिए बैठिए मत — केवल पूजन स्थान का कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित कर दीजिए और फिर चौखट के पास आ जाइए। सबसे पहले चौखट को ऊपर-नीचे पूरा अच्छे से धो लेना है। धोने के बाद इत्र का लेपन करना है: चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। का इत्र लगाइए; यदि किसी प्रकार की एलर्जी है तो गुलाब जल और अगरु का प्रयोग कर सकते हैं। धोने के बाद उसे अच्छे वस्त्र से पोंछ लीजिए — चौखट सुगंधित और अत्यंत दिव्य हो जाएगी। उसके बाद कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है।: कुशा को काटकर आसन जैसे छोटे-छोटे कुशा बनाने हैं, केवल दो-दो कुशा की डंठल, और दोनों ओर रखने हैं। फिर मिट्टी का या पीतल का एक-एक मुखी घी का दीपक दोनों ओर रख देना है। उन दीपकों को यह बोलते हुए प्रज्वलित करना है कि हमारे घर के कुल के जो पितृ हैं वे प्रसन्न हों, कृपा करें, हमारे घर की सुरक्षा करें, और हमारे द्वारा जो भी ज्ञात-अज्ञात दोष लगा हो, हमसे जो अपराध बना हो, उसे क्षमा कर दें। यह बोलकर दीप प्रज्वलित करें। वे कहते हैं कि यह प्रयोग सूर्योदय के एक घंटे के भीतर कर लेना चाहिए।
सावधानी: स्त्रियाँ कुल पितरों का अर्घ ताम्र पात्र से न दें
स्त्रियों के लिए पीतल, स्टील या पत्ते का दोना; ताँबा केवल पुरुषों के लिए
चौखट पर कुल पितरों के अर्घ के लिए, वक्ता कहते हैं, कोई भी पात्र ले सकते हैं, पर स्त्रियों के मामले में ताम्र पात्र छोड़कर: स्त्रियाँ ताम्र पात्र से नहीं करेंगी, पुरुष कर सकते हैं। स्त्री पीतल से, या स्टील के पात्र से भी करे तो कोई दोष नहीं; नहीं तो पत्ते का बना छोटा दोना भी चल सकता है।
दीप प्रज्वलित करने के बाद, वक्ता कहते हैं, किसी पात्र में — लेकिन ताम्र पात्र को छोड़कर: स्त्रियाँ ताम्र पात्र से नहीं करेंगी, पुरुष कर सकते हैं। स्त्री हैं तो पीतल से, या स्टील के पात्र में भी करेंगी तो कोई दोष नहीं है; नहीं तो जो पत्ते का बना छोटा पात्र आता है, दोना, उसमें भी यह प्रयोग कर सकते हैं।
चौखट पर कुल पितरों को अर्घ
काले तिल वाला ताल मिश्री का जल दोनों ओर; बिना प्रणव "कुल पितृभ्यो नमः"
वक्ता कहते हैं कि ताल मिश्री पानी में मिलाकर मीठा जल बनाएँ, उसमें पाँच-दस दाने या चुटकी भर काला तिल डालें, और कुल पितरों के निमित्त चौखट के दोनों ओर, जहाँ दीपक रखे हैं, थोड़ा-थोड़ा अर्घ दें। इसमें कोई विशेष मंत्र नहीं है — यह भाव-प्रधान विधान है जो भाव से प्रभाव देता है — पर चाहें तो "कुल पितृभ्यो नमः" बोलकर अर्घ दे सकते हैं, उसमें प्रणव आदि नहीं लगाना है।
पात्र में, वक्ता कहते हैं, ताल मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है। लें — ताल मिश्री को पानी में मिलाकर, यानी मीठा जल बनाना है — और उसमें ज़रा सा काला तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है। डाल देना है, पाँच-दस दाने या चुटकी भर। उससे कुल पितृ के निमित्त दोनों ओर अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। देना है: दरवाज़े के दोनों ओर, चौखट के दोनों ओर थोड़ा-थोड़ा, जहाँ दीप प्रज्वलित करके रखे हैं। वे कहते हैं कि इसमें मंत्र आदि का कोई विशेष विषय नहीं है; यह भाव-प्रधानता के साथ एक विधान है जिसका प्रभाव मिलता है। यदि मंत्र बोलना चाहें तो "कुल पितृभ्यो नमः" बोलकर अर्घ दे सकते हैं — उसमें प्रणव आदि को नहीं लगाना है।
कुल पितरों के अर्घ के बाद सूर्यनारायण को अर्घ
सादा जल, सूर्य मंत्र, बारह नाम, अधिकार हो तो गायत्री, या अपनी संध्या विधि
कुल पितरों के अर्घ के बाद, वक्ता कहते हैं, भगवान सूर्यनारायण को सादे जल से अर्घ देना है — उसमें कुछ मिलाना नहीं है — सूर्य के मंत्रों का जाप, या उनके बारह नामों की नामावली, या अधिकार हो तो गायत्री का जप करते हुए। जो संध्या उपासना करते हैं और जिनकी अपनी संध्या विधि है, वे संध्या के अनुसार ही उन्हें अर्घ देंगे।
कुल पितरों के अर्घ के बाद, वक्ता कहते हैं, भगवान सूर्य नारायण को सादे जल से अर्घ देना है — उसमें कुछ मिश्रण नहीं करना है, सामान्य जल — भगवान सूर्य के मंत्रों का जाप, या उनकी बारह नामों की नामावली, या यदि अधिकार रखते हैं तो गायत्री का जप या पाठ करते हुए। यदि आप संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। उपासना करते हैं और आपकी संध्या की विधि है, तो संध्या के अनुसार ही उन्हें अर्घ देंगे।
तुलसी जी को किन दिनों में अर्घ नहीं देना चाहिए?
एकादशी और रविवार को कभी नहीं; मंगलवार और द्वादशी अपनी परंपरा के अनुसार
वक्ता कहते हैं कि रोज़ सुबह सूर्य अर्घ के बाद भगवती तुलसी जी को अर्घ देना है, लेकिन एकादशी के दिन और रविवार के दिन नहीं। यदि आपके यहाँ मंगलवार को भी न देने का प्रचलन है, या द्वादशी को देने का विधान नहीं है, तो वैसा ही करें; अपनी परंपरा के अनुसार देखें। बाकी सब दिनों में देना है।
सूर्य अर्घ के बाद, वक्ता कहते हैं, भगवती तुलसी जी को अर्घ देना है। तुलसी जी को एकादशी के दिन और रविवार के दिन अर्घ नहीं देना है। यदि आपके यहाँ मंगलवार को भी न देने का प्रचलन है तो न दें, और द्वादशी को देने का विधान न हो तो न दें। अपनी परंपरा के अनुसार इस विषय को देखें: रविवार और एकादशी को नहीं देते, बाकी दिनों का आपकी ओर जो प्रचलन है उसके अनुसार करें। बाकी दिन देना है। वे कहते हैं कि यह सुबह का विषय हो गया।
कुल पितरों के लिए शाम की चौखट सेवा
सुगंधित सफेद कपड़ा, सफेद के ऊपर पीला चंदन, कुशा पर सरसों के तेल के आटे के चौमुख दीपक
शाम के समय, वक्ता कहते हैं, या तो चौखट को फिर से धोएँ या एक साफ़ सफेद कपड़े को गुलाब जल या इत्र में भिगोकर उससे पूरी चौखट को सुगंधित करें। फिर दोनों कोनों पर चंदन लगाएँ — पहले नीचे सफेद चंदन, फिर उसके ऊपर पीला चंदन (सुबह भी चंदन लेपन करेंगे)। गेहूँ के आटे के बिल्कुल छोटे-छोटे चौमुख दीपक बनाएँ, सुबह की तरह दोनों ओर दो-दो कुशा के आसन लगाएँ, एक-एक आटे का दीपक दोनों ओर रखें, उनमें सरसों का तेल भरें और कुल पितरों के निमित्त यह कहते हुए प्रज्वलित करें कि आप हम पर प्रसन्न हों और हमसे जो अपराध हुआ हो उसे क्षमा करें।
शाम के समय, वक्ता कहते हैं, या तो चौखट को पुनः धोना है, या फिर एक साफ़ सफेद रंग का कपड़ा भिगोकर उसमें गुलाब जल या इत्र आदि अच्छे से ले लेना है और उससे पूरी चौखट को अच्छे से सुगंधित करना है। उसके बाद दोनों ओर सफेद और पीला चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। लगाना है — सुबह के समय भी चंदन लेपन करेंगे। चौखट के दोनों कोनों में पहले नीचे सफेद चंदन लगाएँगे, उसके बाद उस पर पीला चंदन। फिर गेहूँ के आटे का चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। बनाना है — जो आटे का दीपक बनेगा, बिल्कुल छोटा-छोटा सा। कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का आसन सुबह के जैसा ही दोनों तरफ लगाना है, दो-दो कुशा दोनों तरफ। एक-एक आटे का दीपक दोनों ओर रखेंगे और उसमें सरसों का तेल भरेंगे। सरसों का तेल डालकर कुल पितृ के निमित्त यह बोलकर दीप प्रज्वलित करेंगे कि आप हम पर प्रसन्न होइए, हमसे जो अपराध हुआ है उसे क्षमा कर दीजिए। वे कहते हैं कि यह पितरों के लिए सुबह-शाम की चौखट पूजन की विधि हो गई।
कुल पितृ चौखट प्रयोग की अवधि: एक कृष्ण पक्ष
कम से कम एक पक्ष, प्रतिपदा से अमावस्या तक
वक्ता कहते हैं कि कुल पितृ चौखट प्रयोग कम से कम एक पक्ष करना है: कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पर्यंत। आगे वे जोड़ते हैं कि यह पंद्रह दिन का है, और उसके बाद शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तक पंद्रह दिन का कुलदेवी प्रयोग आता है; दोनों भी कर सकते हैं या कोई एक भी।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग कम से कम एक पक्ष करना है: कृष्ण पक्ष में प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से लेकर अमावस्या पर्यंत। आगे, तीसरा प्रयोग बताने से पहले, वे समेटते हैं कि पूर्णिमा तक दोनों प्रयोग 15-15 दिन के होंगे — 15 दिन पितरों के लिए, 15 दिन कुलदेवी के लिए — और दोनों भी कर सकते हैं या कोई एक भी।
कुल पितृ प्रयोग के दौरान अन्न ग्रहण से पहले किसी जीव को भोजन
गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी या मनुष्य — एक बिस्किट या रोटी भी — अपने मुँह में अन्न से पहले
प्रयोग के हर दिन, वक्ता कहते हैं, जब चौखट पर दीप प्रज्वलित हो गया, सूर्यनारायण को अर्घ हो गया और अपना नित्य पूजन हो गया, तब गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों, किसी मनुष्य, या इन पाँचों में से किसी को भी — अपनी सामर्थ्य और इच्छा के अनुसार, चाहे एक बिस्किट या एक रोटी — भोजन कराएँ, और तभी अपने मुँह में अन्न जाए।
प्रतिदिन सुबह के समय, वक्ता कहते हैं, जब आपने दीप प्रज्वलन कर लिया, चौखट का पूजन हो गया, सूर्यनारायण को अर्घ हो गया और अपना नित्य का पूजन कर लिया, उसके बाद गाय को, या कुत्ते को, कौवे को, चींटियों को, किसी मनुष्य को, या इन पाँचों में से किसी को भी भोजन कराइए। जितना हो सके अपनी सामर्थ्य के अनुसार — चाहे एक बिस्किट हो, एक रोटी हो, या जितनी सामर्थ्य और इच्छा हो — और तभी आपके मुँह में अन्न जाए।
कुल पितरों के लिए गीता का सप्तम अध्याय और कुशा वाला जल
दोपहर या सुबह पाठ, जल घर और चौखट पर छिड़कना
कुल पितृ प्रयोग के दौरान दोपहर में समय मिल जाए तो, वक्ता कहते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करें — हिंदी में ही सही — सामने कुशा डालकर लोटे में जल रखें और वह जल घर में और चौखट पर अवश्य छिड़कें। यह दोपहर में करें या सुबह अपने पूजन-पाठ में भी कर सकते हैं। चौखट सेवा के साथ, वे कहते हैं, यह कुल पितरों की प्रसन्नता, शांति और उनके कोप से मुक्ति का अत्यंत दिव्य प्रयोग हो जाता है।
दैनिक सेवा के सिवाय, वक्ता कहते हैं, दोपहर के समय यदि समय मिल जाए तो श्रीमद्श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ कर लें — हिंदी में ही सही — और पाठ करते समय सामने एक लोटे में कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। डालकर जल रखें और उस जल को घर में और चौखट पर अवश्य छिड़क दें। यह दोपहर में करें या सुबह अपने पूजन-पाठ में भी कर सकते हैं। वे कहते हैं कि कुल पितृ की प्रसन्नता, शांति और उनके कोप-क्रोध से मुक्ति के लिए यह अत्यंत दिव्य प्रयोग हो जाता है।
क्या चौखट का प्रयोग पितृ दोष को स्थायी रूप से दूर कर देता है?
केवल अस्थायी शांति; गति के लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी या भागवत
नहीं — वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि यह टेंपरेरी है, इसका यह परमानेंट उपाय नहीं है। यदि पितरों का प्रकोप पूरे प्रबलतम रूप से आप पर पड़ा है तो वे तुरंत शांत हो जाएँगे, उनका प्रकोप शांत होगा और स्वप्न में या सामान्य जीवन में दिक्कत देना बंद कर देंगे। लेकिन पूरा समाधान यह है कि जब वे पूरी तरह मान जाएँ, तब उनकी गति के लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी आदि और भागवत जी कराकर उन्हें पूर्ण रूप से गति करा दी जाए — रोककर नहीं रखना है। नारायण बलि कब होती है, यह वे अलग से बताने की बात कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह ध्यान रखिएगा कि यह टेंपरेरी है; परमानेंटली इसका यह उपाय नहीं होता है। यदि पितृ का प्रकोप पूरी तरह प्रबलतम रूप से आप पर पड़ा है तो वे तुरंत शांत हो जाएँगे — उनका प्रकोप शांत हो जाएगा, दिक्कत देना बंद कर देंगे, और स्वप्न में या सामान्य जीवन में यदि बहुत परेशान कर रहे हैं तो वह अवश्य शांत हो जाएगा। लेकिन पूरा समाधान यह है, वे कहते हैं, कि जब ये पूरी तरह मान जाते हैं, तब उसके बाद इनके निमित्त, इनकी गति के निमित्त नारायण बलि, त्रिपिंडी आदि कराकर और भागवत जी कराकर इन्हें पूर्ण रूप से गति करा दी जाए। रोककर रखना नहीं है। नारायण बलि कब होती है, यह सारा विषय वे अलग से बताने की बात कहते हैं।
कुलदेवी का चौखट प्रयोग कब किया जाता है और कौन कर सकता है
रुष्ट या विरुद्ध चलाई गई कुल शक्ति; शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से पूर्णिमा या नवरात्र; कुलदेवी अज्ञात हो तो भी
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि आपको पता चले कि कुल पितरों के साथ-साथ कुल की शक्तियाँ भी रुष्ट हैं, या आपकी कुल शक्ति को आपके विरुद्ध चला दिया गया है — तंत्र सूक्ष्म विषय है, उसमें बहुत हेरफेर है, और यह पहचानना है कि आपके साथ कौन सा विषय है। जिसकी कुल शक्ति रुष्ट है वह यह कर सकता है, और जिसे अपनी कुलदेवी का पता नहीं पर किसी प्रकार की साधना कर रहा है, वह भी। कुलदेवी और कुल शक्ति की प्रसन्नता चौखट की सेवा से अवश्य होती है, क्योंकि वहाँ रक्षात्मक शक्तियाँ रहती हैं। यह शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक, या नवरात्र जैसे पर्व काल में किया जाता है।
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि आपको पता चले कि कुल पितरों के साथ-साथ कुल की शक्तियाँ भी रुष्ट हैं, या आपकी कुल की शक्ति को आपके विरुद्ध चला दिया गया है — ऐसा भी होता है। तंत्र एक बहुत गहन विषय है और उसमें बहुत हेरफेर रहता है; सबके साथ एक जैसा विषय नहीं होता, इसलिए देखकर चुनें कि आपके साथ कौन सा विषय है — हो सकता है केवल कुल पितरों की समस्या हो, या दोनों की। तो यदि किसी भी प्रकार से कुल की शक्ति आपसे रुष्ट है तो उनके निमित्त भी यह किया जा सकता है; और यदि आपको अपनी कुलदेवी के विषय में जानकारी नहीं है लेकिन आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं, तो भी आप यह विधान कर सकते हैं। वे कहते हैं कि कुलदेवी और कुल शक्ति की प्रसन्नता चौखट की सेवा से अवश्य होती है, क्योंकि वहाँ वे रक्षात्मक शक्तियाँ अवश्य उपस्थित होती हैं। इनके पूजन के लिए यह विधान शुक्ल पक्ष की प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से लेकर पूर्णिमा तक, या नवरात्रि आदि के पर्व काल में करना चाहिए।
कुलदेवी के लिए चौखट की तैयारी: पोंछना और चंदन-रोली के तिलक
पूरी चौखट ऊपर-नीचे; त्रिकूट बनाम चारों ओर की; हर छोर पर पीला-सफेद चंदन और रोली
कुलदेवी प्रयोग के लिए, वक्ता कहते हैं, पूरी चौखट को अच्छे से धोएँ या इत्र लगे वस्त्र से ऊपर-नीचे पोंछें। त्रिकूट चौखट में ऊपर और अगल-बगल होती है, नीचे नहीं — कोई बात नहीं; जहाँ चारों ओर चौखट है, वहाँ चारों दिशा में — नीचे, ऊपर, दाएँ-बाएँ — पोंछें। फिर ऊपर-नीचे, दोनों छोरों पर, सब ओर पीले चंदन, सफेद चंदन और रोली से तिलक करें।
पूरी चौखट को अच्छे से धोएँ, वक्ता कहते हैं, या इत्र लगे वस्त्र से अच्छे से पोंछें — पूरी चौखट, ऊपर-नीचे। त्रिकूट चौखट में ऊपर और अगल-बगल चौखट रहती है, नीचे नहीं; तो कोई बात नहीं। जहाँ चारों दिशा में चौखट है — जिससे चारों ओर से ओट हो — वहाँ नीचे, ऊपर, अगल-बगल, दाएँ-बाएँ चौखट की पूरी जगह चारों दिशा में पोंछें। फिर ऊपर-नीचे, दोनों छोरों पर, सब ओर पीले चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है।, सफेद चंदन और रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। से तिलक करें।
कुलदेवी के लिए चौखट पर चमेली के तेल में सिंदूर के तिलक
ऊपर बकरा सिंदूर के पाँच तिलक, नीचे पीले चंदन के पाँच; कुलदेवी अज्ञात हो तो दुर्गा
चंदन और रोली के बाद, वक्ता कहते हैं, नारंगी वाला सिंदूर — "बकरा सिंदूर", जो गाँव-देहात में और विवाह के समय अधिक प्रयोग होता है और जो हनुमान जी पर भी चढ़ता है — उसे चमेली के तेल में मिलाएँ। अपनी कुलदेवी का स्मरण करते हुए, या कुलदेवी का नाम न पता हो तो भगवती दुर्गा का स्मरण करते हुए, ऊपर की चौखट पर उसके पाँच तिलक लगाएँ। नीचे की चौखट पर पीले चंदन के पाँच तिलक लगाएँ।
चंदन और रोली के तिलक के बाद, वक्ता कहते हैं, नारंगी वाला ऑरेंज सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। लें — जिसे बकरा सिंदूर कहते हैं, जो गाँव-देहात में और विवाह के समय अधिक प्रयोग किया जाता है, और विशेष रूप से जो हनुमान जी पर भी चढ़ता है — उसी सिंदूर को चमेली के तेल में मिलाना है। फिर अपनी कुलदेवी का स्मरण करते हुए — और यदि अपनी कुलदेवी के विषय में जानकारी नहीं है, नाम नहीं पता है, तो भगवती दुर्गा का स्मरण करते हुए — ऊपर की चौखट में पाँच जगह तिलक लगाएँ। नीचे की चौखट में, वे कहते हैं, पीले चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। के पाँच तिलक लगाएँ।
क्या चौखट पर पैर रखना दोष है?
बहुत बड़ा दोष — घर में सबको बार-बार समझाना है
हाँ — वक्ता कहते हैं कि घर में सबको स्पष्ट कर दें कि आते-जाते कोई चौखट के ऊपर पैर रखकर न आए-जाए। चौखट पर पैर नहीं रखना चाहिए: दोष लगता है, बहुत बड़ा दोष लगता है। यह बात घर में सबको बार-बार समझानी है; यह गलती मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि ध्यान रखें, अपने घर में सबको स्पष्ट कर दें कि चौखट के ऊपर पैर रखकर मत आना, मत जाना। चौखट पर पैर नहीं रखना चाहिए — दोष लगता है, बहुत बड़ा दोष लगता है। यह बात बार-बार घर में सबको समझाइए, वे कहते हैं; यह गलती मत कीजिए। और चौखट नहीं है तो लगवाइए — यह आपके ही कल्याण और घर-परिवार की सुरक्षा के लिए है।
चौखट पर कुलदेवी के लिए दाहिनी ओर सरसों के तेल का चौमुख दीपक
पीतल का बार-बार या मिट्टी का रोज़ नया; फूल या उड़द की ढेरी पर; पाँच लौंग और एक इलायची
चौखट का शृंगार हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, एक छोटा चार मुँह वाला दीपक लें — पीतल का हो तो रोज़ वही चलेगा; मिट्टी का हो तो रोज़ नया लगेगा। घर से बाहर निकलते समय जो आपकी दाहिनी ओर हो, वहाँ फूल या साबुत उड़द की ढेरी पर सरसों के तेल का एक चौमुख दीपक प्रज्वलित करें। वहाँ एक ही दीपक लगेगा, और उसमें पाँच लौंग और एक इलायची अवश्य डली हो।
जब चौखट का शृंगार हो जाए — इत्र, चंदन, चमेली के तेल में लगे सिंदूर से — तो वक्ता कहते हैं कि चार मुँह वाला दीपक लेना है। पीतल का दीपक लेकर हमेशा प्रयोग कर सकते हैं; छोटा-छोटा हो, बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। यदि मिट्टी के दीपक का प्रयोग करते हैं तो रोज़ नया दीपक लगेगा। प्रयोग कैसे करना है: जब आप अपने घर से बाहर निकलते हैं तो जो आपकी दाहिनी ओर होती है, उधर सरसों के तेल का एक चार मुँह वाला दीपक प्रज्वलित करना है — एक ही दीपक लगेगा। उस चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। को पुष्प के ऊपर या साबुत उड़द की ढेरी बनाकर उसके ऊपर रखिए, सरसों का तेल डालिए और प्रज्वलित कर दीजिए। ध्यान रखें कि उस दीपक में पाँच लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। और एक इलायचीइलायची, जो लौंग के साथ छोटे प्रयोगों और पूजन में अर्पित होती है। अवश्य डली हो।
चौखट पर कुलदेवी के लिए बाईं ओर तिरंगे चावल पर घी का दीपक
दो इलायची, कपूर, दो लौंग; साबुत चावल दो-तीन रंग के, काला-नीला कभी नहीं, पक्षियों के लिए फूड कलर
बाहर निकलते समय आपकी बाईं ओर, वक्ता कहते हैं, एक मुँह वाला घी का दीपक रखें जिसमें दो इलायची, कपूर और दो लौंग हों, फूलों की ढेरी पर या रंग-बिरंगे चावल पर। चावल एक रंग का नहीं होना चाहिए — पीला, लाल, सफेद, दो या तीन रंग, काले को छोड़कर कोई भी रंग; काला और नीला नहीं होना चाहिए। लाल, पीला, सफेद चावल मिलाएँ, साबुत, टूटे नहीं, फूड कलर से रंगे ताकि बाद में पक्षी दाने खा सकें। उसके ऊपर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
आपकी बाईं ओर, वक्ता कहते हैं, एक मुँह वाला दीपक होगा, और वह घी का दीपक होगा। उसमें दो इलायची, कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। और दो लौंग अवश्य होने चाहिए। इस दीपक को पुष्प के ढेर पर या रंग-बिरंगे चावल के ऊपर रखना है। चावल एक रंग का नहीं होना चाहिए — पीला हो, लाल हो, दो रंग का हो, सफेद हो, तीन रंग का हो, काले रंग को छोड़कर कोई भी रंग; काला-नीला नहीं होना चाहिए। लाल, पीला, सफेद तीन रंग के चावल मिला दें, और चावल साबुत होना चाहिए, टूटा नहीं। फूड कलर से रंग लें, क्योंकि फूड कलर होगा तो पक्षी बाद में इन दानों को खाएँगे। फिर उसके ऊपर दीपक रखकर प्रज्वलित कीजिए।
कुलदेवी के दीपक के नीचे के चावल: पूर्णिमा को खीर
रोज़ दाने एकत्र करें, पंद्रह दिन बाद थोड़ा बचाएँ, बाकी पक्षियों को
वक्ता कहते हैं कि जब-जब दीपक पूरा जल जाए, चावल के दानों को एक जगह और उड़द के दानों को दूसरी जगह एकत्रित करते जाएँ। पंद्रह दिन बाद चावल का थोड़ा दाना बचाकर रखें; बाकी पक्षियों को डाल सकते हैं। पूर्णिमा के दिन जब पूजन हो, तब दोपहर में बचाए चावल में और चावल मिलाकर खीर बना लें।
वक्ता कहते हैं कि ध्यान रखिएगा, जब-जब दीप पूरा जल जाए, पूर्ण हो जाए, उसके बाद उड़द के दानों को एक जगह और चावल के दानों को एक जगह एकत्रित करते जाइए। पंद्रह दिन के बाद चावल का थोड़ा-थोड़ा दाना बचाकर रखना है; बाकी दाना पक्षियों को डाल सकते हैं। पूर्णिमा के दिन जब पूजन होता है, तब दोपहर में इन चावलों में और चावल मिलाकर खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। बना लीजिए।
कुलदेवी के चौमुख के नीचे के उड़द: लाल कपड़े की रक्षा और पशुओं के लिए भात
बचाया उड़द चौखट के ऊपर बाँधना; बाकी चावल और थोड़े घी के साथ भात, बाहर खिलाना या चौराहे पर
थोड़ा-थोड़ा करके बचाए गए उड़द के दानों को, वक्ता कहते हैं, लाल कपड़े में लपेटकर, बाँधकर मुख्य चौखट के ऊपर — या अंदर की ओर कहीं — सुरक्षा के लिए बाँध दें। बाकी उड़द में चावल मिलाकर उड़द-चावल का भात बनाएँ; उसमें थोड़ा सा ही घी डालें, ज़्यादा नहीं, और घर के बाहर किसी भी पशु को खिला दें, या चौराहे पर रख दें। वे पूरे प्रयोग को बहुत दिव्यतम बताते हैं।
जो उड़द के दाने थोड़ा-थोड़ा करके रखे थे, वक्ता कहते हैं, उन्हें लाल कपड़े में लपेटकर, बाँधकर मुख्य चौखट के ऊपर — या अंदर की ओर भी कहीं — सुरक्षा के लिए बाँध दें। बाकी उड़द में चावल मिलाकर चावल-उड़द का जो भात होता है वह बना दीजिए; उसमें थोड़ा सा घी डालिए — हल्का सा ही, ज़्यादा नहीं — और ले जाकर घर के बाहर किसी भी पशु को खिला दीजिए। चौराहे पर भी रख सकते हैं। वे इसे बहुत दिव्यतम प्रयोग बताते हैं और इन सब बातों का ध्यान रखने को कहते हैं।
कुलदेवी के लिए गोबर के उपलों की धूनी और दो मंत्रों की 21-21 आहुति
हवन अग्नि नहीं, ताँबे-लोहे का कुंड नहीं; कुलदेवी को केवल गूगल, जयंती मंगला काली को इलायची-घी के साथ गूगल
कुलदेवी प्रयोग का दूसरा भाग, वक्ता कहते हैं, पूजन स्थान पर किसी बड़े मिट्टी के पात्र में या ऐसे हवन कुंड में करना है जो ताँबे या लोहे का न हो। हवन अग्नि नहीं बुलानी है: गाय के गोबर के सामान्य उपलों को घी या कपूर से जलाकर, दो मंत्रों से 21-21 आहुति देनी हैं — कुलदेवी के निमित्त और अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र "जयंती मंगला काली" से। आरंभ में गुरु-गणपति के निमित्त भी आहुति दे सकते हैं। कुलदेवी की आहुति में केवल गूगल, कुछ और नहीं; जयंती मंगला की आहुति में गूगल के साथ चार-पाँच इलायची फाड़कर उसके दाने और थोड़ा सा घी। स्वाहा न भी बोलें तो कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि यह धूनी है।
दूसरा भाग, वक्ता कहते हैं, किसी बड़े मिट्टी के पात्र में, या यदि हवन कुंड हो तो उसमें — लेकिन ताँबे या लोहे के हवन कुंड में प्रयोग नहीं करना है। इसमें हवन अग्नि को नहीं बुलाना है। गाय के गोबर के सामान्य उपलों को सामान्य तरीके से घी या कपूर से प्रज्वलित करना है, और उसमें दो मंत्रों से 21-21 आहुति देनी हैं: भगवती कुलदेवी के निमित्त, और अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र जयंती मंगला काली से। आरंभ में गुरु और गणपति के निमित्त भी आहुति दे सकते हैं। कुलदेवी के लिए टाइमस्टैम्प वाले ट्रांसक्रिप्ट में आहुति के शब्द "श्री कुल दिव्य स्वाहा, श्री कुल दिव्य स्वाहा" दर्ज हैं (बिना टाइमस्टैम्प वाला ट्रांसक्रिप्ट इसी अंश को "श्री कुलदेव्यै स्वाहा" पढ़ता है); इस प्रकार 21 आहुति, केवल गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। की — कुलदेवी की आहुति में कुछ अन्य चीज़ नहीं मिलानी है। जयंती मंगला वाली आहुति में गूगल में थोड़ी सी इलायची मिलानी है — चार-पाँच इलायचीइलायची, जो लौंग के साथ छोटे प्रयोगों और पूजन में अर्पित होती है। अच्छे से फाड़कर उनके पूरे दाने — और थोड़ा सा घी; घी में डुबाकर, पूरा मंत्र "जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ..." पढ़कर, अंत में ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार स्वाहा बोलकर छोड़ दें। स्वाहा न भी बोलें तो कोई दिक्कत नहीं, वे कहते हैं, क्योंकि यह धूनी का विषय है।
कुलदेवी की धूनी का धुआँ पूरे घर में दिखाकर चौखट तक ले जाना
रंगीन चावल पर रखे घी के दीपक के पास रखना; सुबह-शाम, न हो सके तो एक समय
धूनी से जो पूरा धुआँ उठेगा, वक्ता कहते हैं, उसे पूरे घर में दिखाना है — धूनी पूजन स्थान पर ही जलानी है — और फिर पात्र को चौखट पर लाकर उसी ओर रख देना है जहाँ रंग-बिरंगे चावल की ढेरी पर कुलदेवी का घी का दीपक रखा है। यह सुबह किया और शाम को भी दोहराना है; किसी कारण से एक ही समय कर सकें तो भी कोई दिक्कत नहीं।
फिर जो पूरा धुआँ उठेगा उसे पूरे घर में दिखाना है, वक्ता कहते हैं — यह काम पूजन स्थान पर करना है — और पूरा धुआँ दिखाते हुए पात्र को चौखट पर लाकर उसी ओर रख दें जहाँ रंग-बिरंगे चावल की ढेरी पर कुलदेवी के निमित्त घी का दीपक रखा था। यह प्रयोग सुबह के समय किया और शाम को भी इसी को दोहराना है; किसी कारण से एक ही समय कर सकें तो भी कोई दिक्कत नहीं।
अभिचार-ग्रस्त घर के लिए आर्द्रा नक्षत्र में शिव अभिषेक का जल चौखट पर
पुराना शिव मंदिर, किसी भी पक्ष में गंगाजल से अभिषेक, अर्घी के पास का जल रोज़
तीसरा प्रयोग, वक्ता कहते हैं, उस घर के लिए है जिस पर बहुत अभिचारिक समस्या हो — रात में कुछ घुस जाता है, गला दबाता है, उत्पात मचाता है, कोई सो नहीं पाता। कोई ऐसा शिव मंदिर खोजें जो कम से कम 12 वर्ष पुराना हो, और 50-100 वर्ष पुराना मिल जाए तो अति उत्तम। जब भी आर्द्रा नक्षत्र पड़े, शुक्ल या कृष्ण कोई भी पक्ष हो, वहाँ शुद्ध गंगाजल लेकर जाएँ, भगवान शिव का अभिषेक करें और अर्घी के पास से जल ले लें। वह जल पूरे घर में छिड़कें, और बचाकर रखें ताकि रोज़ चौखट को पहले की तरह सुगंधित करके वही जल पूरी चौखट पर — ऊपर, नीचे, सब ओर — लगाया जाए।
तीसरा प्रयोग, वक्ता कहते हैं, तब है जब आपके घर पर बहुत अभिचारिक समस्या हो: घर में कुछ घुस जाता है, रात के समय गला दबाता है, उत्पात मचाता है, पूरी रात कोई सो नहीं पाता — बहुत दिक्कत है। तब कोई ऐसा शिव मंदिर खोजें जो पुराना हो — सौ वर्ष पुराना, या कम से कम बारह वर्ष; यदि 50-100 वर्ष पुराना शिव मंदिर मिल जाए तो अति उत्तम। वहाँ जब कभी भी आर्द्रा नक्षत्र पड़े — ध्यान रखें, शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष, कोई भी — आर्द्रा नक्षत्र के समय जाएँ, शुद्ध गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। लेकर जाएँ, भगवान शिव का उससे अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करें, और अर्घी के पास से जल ले लें। वह जल लाकर पूरे घर में छिड़कना है। चौखट को पहले की तरह सुगंधित करके, उस जल को बचाकर रखें, और प्रतिदिन चौखट पर — ऊपर, नीचे, सब ओर, पूरी चौखट पर — इसी जल को लगाना है।
अभिचार के विरुद्ध रोज़ मंदिर का निर्माल्य चौखट के ऊपर टाँगना
पुराने भैरव, हनुमान, काली, दुर्गा या योगिनी मंदिर का सुबह का पहला निर्माल्य, 108 दिन से एक वर्ष
शिव जल के साथ, वक्ता कहते हैं, प्रत्येक दिन उसी मंदिर से या किसी भी बहुत पुराने मंदिर से निर्माल्य लाएँ — विशेष रूप से भैरव जी, हनुमान जी, भगवती काली, दुर्गा जी, या योगिनियों से संबंधित किसी मंदिर का। वह सुबह का पहला निर्माल्य होना चाहिए: रात को शृंगार करके जो थोड़ा छोड़ा जाता है और सुबह वही मिले। उसे रोज़ घर के मुख्य दरवाज़े की चौखट पर ऊपर की ओर टाँग दें; अगले दिन सुबह फिर नया निर्माल्य लाएँ, पुराने का विसर्जन करें, नया चढ़ाएँ। इसे कम से कम 108 दिन, छह महीने, साल भर तक जारी रखें — घर के ऊपर चलने वाला आधे से अधिक तंत्र, वे कहते हैं, इसी से रुक जाता है।
और प्रत्येक दिन, वक्ता कहते हैं, निर्माल्य लाएँ — या तो उसी मंदिर से, या किसी भी बहुत पुराने मंदिर से — विशेष रूप से भैरव जी का, हनुमान जी का, भगवती काली का, दुर्गा जी का, या योगिनी से संबंधित किसी मंदिर का। रोज़ सुबह लेना है, और पहला निर्माल्य होना चाहिए: रात को शृंगार करके जो थोड़ा सा छोड़ा जाता है — सुबह वही वाला निर्माल्य मिल जाए तो उसे लाइए। उसे रोज़ घर के मुख्य दरवाज़े की चौखट में ऊपर की ओर टाँग दिया कीजिए। अगले दिन सुबह फिर नया निर्माल्य लाइए, पुराने का विसर्जन कीजिए, नया चढ़ा दीजिए। इसी काम को कम से कम 108 दिन तक, छह महीने तक, साल भर तक जारी रखिए। वे कहते हैं कि आपके घर के ऊपर चलने वाला आधे से अधिक तंत्र इसी से रुक जाएगा।
चौखट के ऊपर का निर्माल्य तांत्रिक शक्तियों को क्यों रोकता है?
निर्माल्य लाँघने से गंधर्वराज पुष्पदंत की शक्तियाँ कुंठित; ऊपर, नीचे नहीं, क्योंकि नीचे सब लाँघेंगे
वक्ता याद दिलाते हैं कि पुष्पदंत — चित्ररथ गंधर्व, गंधर्वराज, जिन्होंने शिव महिम्न स्तोत्र की रचना की — की शक्तियाँ केवल निर्माल्य का उल्लंघन करने से कुंठित हो गई थीं; जब उनके साथ ऐसा हुआ तो सामान्य भूत-प्रेत-पिशाच की क्या बिसात। इसलिए शक्तियाँ चौखट के ऊपरी भाग पर रुक जाती हैं — निर्माल्य नीचे नहीं टाँगा जाता, क्योंकि नीचे सब लाँघेंगे — और उसके नीचे से कोई शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती। कितना प्रभाव देगा यह अन्य बातों पर निर्भर है: घर के भीतर कोई कर रहा हो, या वह घर के भीतर घुसता हो, तब विषय अलग है; पर फिर भी शक्तियाँ कुंठित होंगी, विचार रुकेगा, और घर बहुत हद तक सुरक्षा में आ जाएगा।
वक्ता इसका कारण बताते हैं। चित्ररथ गंधर्व — पुष्पदंत, जिन्होंने शिव महिम्न स्तोत्र की रचना की — की शक्तियाँ निर्माल्य का उल्लंघन करने से कुंठित हो गई थीं। जब पुष्पदंत के साथ ऐसा हो सकता है, जिनके विषय में जानना चाहिए कि वे गंधर्वराज कहे जाते हैं, तो सामान्य भूत-प्रेत-पिशाचों की क्या बिसात? तो, वे कहते हैं, ये शक्तियाँ आपकी चौखट के ऊपर के भाग में रुक जाती हैं — हालाँकि नीचे नहीं, क्योंकि नीचे सब लाँघेंगे। निर्माल्य के नीचे से कोई शक्ति प्रवेश नहीं कर पाएगी। बाकी बहुत से अन्य विषय हैं, वे जोड़ते हैं — वह कितना प्रभाव देगा या नहीं देगा; यदि घर के भीतर कोई व्यक्ति कर रहा हो, या वह घर के भीतर पहले से घुसता हो, तब विषय अलग है। लेकिन फिर भी शक्तियाँ कुंठित होंगी और विचार रुकेगा, और बहुत हद तक आपका घर सुरक्षा में आ जाएगा।
चौखट की सेवा नित्य क्रम है, एक बार का प्रयोग नहीं
नरसिंह के स्थान की जितनी सेवा, घर उतना सुरक्षित और मन उतना शांत
वक्ता समापन में आग्रह करते हैं कि चौखट की सेवा-पूजा अवश्य करें, क्योंकि वहाँ भगवान नरसिंह का स्थान है: उनकी जितनी सेवा होगी, घर उतना ही सुरक्षित और मस्तिष्क उतना ही शांत रहेगा — जिनके घर में बहुत उत्पात, झगड़ा और बिना मतलब की कच-कच होती रहती है, वे यह करें। यह प्रयोग नहीं, वे कहते हैं, नित्य क्रम का विषय है; चौखट की सेवा से घर की बहुत सी अशुद्धियाँ और नकारात्मक चीज़ें दूर हो जाती हैं।
वक्ता आग्रह करते हैं कि चौखट की सेवा-पूजा अवश्य करें, क्योंकि वहाँ भगवान नरसिंह का स्थान है: उनकी जितनी सेवा होगी, आपका घर उतना ही सुरक्षित होगा और आपका मस्तिष्क उतना ही शांत रहेगा — जिनके घर में बहुत अधिक उत्पात और झगड़ा होता रहता है, बिना मतलब की कच-कच, वे यह करें। यह प्रयोग नहीं है, वे कहते हैं, नित्य क्रम का विषय है। चौखट की सेवा से घर की बहुत सारी अशुद्धियाँ और नकारात्मक चीज़ें दूर हो जाती हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।