दत्तात्रेय वज्र कवच अनुभव: स्वप्न में मिले संकेत और तंत्र नाश
वज्र कवच के पाठ के दौरान बालक के बार-बार आने वाले स्वप्न और अभिचारजनित पीड़ा से मिली वास्तविक राहत का वृत्तांत।
5 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
दत्तात्रेय वज्र कवच आरंभ करने पर सफेद वस्त्र वाले बालक का स्वप्न
पहले कुल का बाल-ब्रह्म समझकर संशय
वक्ता बताते हैं कि जिस साधक ने दत्तात्रेय के वज्र कवचम् का पाठ आरंभ किया, उन्हें लगभग दूसरे-तीसरे दिन से ही स्वप्न (स्वप्न) में सफेद वस्त्र पहने एक बच्चा सदैव दिखने लगा। चूँकि परिवार में पहले से तंत्र-मंत्र की समस्या थी और वे ब्राह्मण परिवार से थे, साधक को भय हुआ कि यह कुल का कोई बाल-ब्रह्म है — कम आयु में मृत्यु को प्राप्त कोई बालक — जो वज्र कवच के पाठ के कारण बार-बार दिख रहा है।
वक्ता कहते हैं कि यह वृत्तांत पिछले वीडियो का ही एक अंश है, जिसमें एक साधक ने भगवान दत्त की कृपा से अपने घर में उपस्थित नकारात्मक शक्ति को हटाया था। वे बताते हैं कि जब साधक ने दत्तात्रेय के वज्र कवचम् का पाठ आरंभ किया, तो कुछ ही दिनों में — साधक के अपने शब्दों में लगभग दूसरे-तीसरे दिन से ही — उनके स्वप्न (स्वप्न) में सफेद वस्त्र पहने एक बच्चा सदैव दिखता था। वक्ता जोड़ते हैं कि साधक पहले के वीडियो सुन चुके थे और उन्होंने अपना आकलन किया था। वे ब्राह्मण परिवार से थे, और वक्ता यह मान्यता बताते हैं कि जिनके घर में तंत्र-मंत्र की समस्या होती है या कुल में brahm की उपस्थिति होती है, वहाँ किसी कारण से छोटी आयु में मृत्यु को प्राप्त बच्चे बाल-ब्रह्म आदि हो जाते हैं। इसलिए साधक के मन में सदैव यह संशय बना रहा कि वज्र कवच के पाठ के कारण ही यह शक्ति बार-बार दिखाई दे रही है।
पीड़ित के सिर से कुछ उतारे जाने का स्वप्न: अभिचार बढ़ने का नहीं, कटने का संकेत
हर स्वप्न के बाद दो-चार दिन की राहत
वक्ता बताते हैं कि वज्र कवच के पाठ के सप्ताह-दस दिन बाद स्वप्न का वह बालक साधक को यह दिखाने लगा कि वह उनकी बहू — जिन पर अभिचार क्रिया की गई थी और brahm-avesh आता था — के सिर से कुछ उतारकर घर की मुख्य चौखट पर रख रहा है। साधक को नब्बे प्रतिशत यही शंका थी कि अभिचार बढ़ रहा है, क्योंकि यह स्वप्न ठीक उन्हीं रातों में आता जब बहू का उत्पात सबसे अधिक होता। परंतु वे कहते हैं कि हर ऐसे स्वप्न के बाद बहू शांत हो जातीं और अगले दो-तीन-चार दिन लगभग सामान्य रहतीं — अर्थात् स्वप्न आक्रमण नहीं, राहत दिखा रहा था।
वक्ता बताते हैं कि जब सप्ताह-दस दिन बीते, तब स्वप्न (स्वप्न) का वह बच्चा साधक से सदैव एक बात बोला करता था, उनकी बहू को लेकर। परेशानी उन्हीं पर थी: उन पर brahm-avesh आता था, उन पर अभिचार क्रिया की गई थी, विवाह के कम से कम पाँच-छह साल बीतने पर भी वे गर्भवती नहीं हो पा रही थीं, और शरीर की अन्य समस्याएँ भी थीं। जब आवेश आता तो वे गाली-गलौज करतीं और बहुत से ऐसे कार्य करतीं जो काफी दिक्कत देने वाले थे। तब से वह बच्चा स्वप्न में दिखाता कि वह बहू के सिर के ऊपर से किसी चीज़ को उतारकर घर के मुख्य द्वार पर रख रहा है। साधक को भय होने लगा कि जो अभिचार क्रिया की जा रही है वह चौखट से संबंधित कोई विषय है, और यही उन्हें दिखाया जा रहा है। परंतु कुछ समय बाद, वक्ता कहते हैं, साधक ने क्रम समझा: जब-जब बहू की समस्या बहुत अधिक बढ़ती — जब वे सबसे अधिक उत्पात मचातीं, सबसे अधिक गाली-गलौज करतीं और कहने लगतीं कि "तुम कुछ भी कर लो, मुझे ठीक नहीं कर पाओगे" — उसी रात यह स्वप्न आता, और वे देखते कि कोई बालक उनके सिर से कुछ उतारकर रख रहा है। वक्ता कहते हैं कि इसे दो तरीके से लिया जा सकता था। परिवार अभिचार-ग्रसित था, इसलिए मन में नब्बे प्रतिशत शंका यही थी कि यह अभिचार का ही कोई विषय है — जब अभिचार किया जाता है तो उसकी परेशानी बढ़ती है, और वही स्वप्न में दिखता लगा। फिर भी जब-जब साधक स्वप्न में वह उतारना देखते, बहू शांत हो जातीं और अगले दो-तीन-चार दिन तक लगभग सामान्य रहतीं।
बीमार गाय को धूनी दिए जाने का स्वप्न और अगले दिन उसका ठीक होना
स्वप्न की शक्ति को सकारात्मक कैसे पहचाना गया
वक्ता बताते हैं कि कवच की साधना चलते रहने के दौरान साधक ने स्वप्न में उसी बालक को अपनी गौ के नथुने के पास dhuna करते देखा, जो थनैला से बीमार थी और दवा से ठीक नहीं हो रही थी। अगले दिन गाय लगभग अस्सी प्रतिशत ठीक हो गई, दवा तो चल ही रही थी। ऐसी दो-तीन घटनाओं के बाद साधक समझ गए कि वह शक्ति नकारात्मक ऊर्जा नहीं, सकारात्मक ऊर्जा है।
वक्ता कहते हैं कि चूँकि कवच की साधना चल रही थी, ऐसा ही एक अगला स्वप्न (स्वप्न) आया जिसमें साधक ने उसी बच्चे को अपनी गौ के पास देखा, जिसकी तबीयत बहुत खराब थी। वे बताते हैं कि गाँव में गायों को थनैला नामक रोग होता है, जिसमें थन काफी सूज जाते हैं, गाय दूध नहीं देती और अन्य परेशानियाँ भी होती हैं। साधक उसकी दवा दे रहे थे, पर गाय को राहत नहीं हो रही थी। स्वप्न में साधक ने देखा कि वही बालक गाय के नथुने के पास dhuna कर रहा है। वक्ता समझाते हैं कि गाय बीमार होती है तो उसे धुआँ दिया जाता है — अजवाइन जलाई जाती है — क्योंकि उसके शरीर में गर्मी आना ज़रूरी होता है। स्वप्न में बालक इसी तरह का कुछ अन्य प्रकार का धूना देते दिखा, और अगले दिन गाय ठीक हो गई — अस्सी प्रतिशत, दवा तो चल ही रही थी। वक्ता कहते हैं, यह प्रभाव दिया। स्वप्न में ये दो-तीन घटनाएँ होने पर, वक्ता कहते हैं, साधक को समझ में आया कि वह शक्ति कोई नकारात्मक ऊर्जा नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा है।
दत्तात्रेय स्मृतगामी हैं: साल भर के स्वप्न-दर्शनों से सिद्ध
दूसरे दिन से साथ, समझ साल भर बाद
वक्ता बताते हैं कि अंतिम घटना साल भर बाद दीपदान के दिन हुई, जब साधक को स्वप्न में आदेश मिला कि जो मिठाई और प्रसाद उन्होंने फेंक दिया था, वह प्रसाद चाहिए। उस साल भर में वह स्वरूप तीन-चार रूपों में दिखा, जिनमें एक यही सफेद वस्त्र वाला बालक था। वक्ता कहते हैं कि कवच में ही भगवान दत्तात्रेय को स्मृतिगामी कहा गया है — स्मरण मात्र से आ जाते हैं, चाहे कैसे भी स्मरण करें — और यह यहाँ सिद्ध हुआ: दत्त दूसरे दिन से ही साधक के साथ थे, उनका प्रारब्ध काट रहे थे और दर्शन दे रहे थे, क्योंकि वे शुद्ध सात्विक और समर्पित भक्त थे। वे जोड़ते हैं कि भय से भ्रम ज़रूरत से अधिक बनता है; साल भर बाद ही साधक समझे कि कृपा पहले से हो चुकी थी।
वक्ता कहते हैं कि अंतिम घटना दीपदान के दिन हुई, यानी साल भर के बाद, जब साधक ने दीपदान किया। वे बताते हैं कि पिछले वीडियो में सारी बातें क्रमवार, एक-एक घटना करके पूरे विस्तार से कही गई हैं, और उसका लिंक दे दिया जाएगा। पूरे साल भर में, वे कहते हैं, छोटी-छोटी अनेक घटनाएँ हुईं, क्योंकि साधक ने बहुत अधिक मात्रा में कवच का जाप किया था — और उसी कवच में जो स्मृतगामिता आती है, उसे भगवान ने यहाँ सिद्ध किया। जब साधक ने उस वर्ष दीपदान किया, तो उन्हें स्वप्न (स्वप्न) में दर्शन हुआ और आदेश मिला: "तुमने हमारी मिठाई फेंक दी, हमारा प्रसाद फेंक दिया; वह प्रसाद हमें चाहिए।" स्वप्न में यह भाव सुनने को मिला, वक्ता कहते हैं, जिससे साधक पूरा समझ पाए। जो स्वरूप वे देखते आ रहे थे, वह तीन से चार स्वरूपों में दिखा था, जिनमें एक इसी बालक का था। तब साधक को समझ में आया कि कवच में जो पाठ किया जाता है — कि भगवान दत्तात्रेय स्मृतिगामी हैं, स्मरण मात्र से आ जाते हैं, चाहे कैसे भी स्मरण करो — वह सच था। वे तो पहले-दूसरे दिन से ही साथ आना शुरू हो गए थे; साथ रहकर साधक का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। काट रहे थे, जिससे परेशानी हो रही थी, फिर भी बार-बार उसी स्वरूप में दर्शन देते रहे, क्योंकि साधक बड़े सही भक्त थे — शुद्ध सात्विक आचार, विचार और व्यवहार वाले और बहुत समर्पित। पर आदमी भयभीत रहता है, वक्ता कहते हैं, इसलिए भ्रम की स्थिति ज़रूरत से अधिक बन जाती है। साल भर बाद जब चीज़ें स्पष्ट हुईं, तभी साधक समझे कि भगवत कृपा तो पहले से हो चुकी थी और भगवान सहयोग कर रहे थे।
प्रारब्ध एक बार में नहीं, धीरे-धीरे कटता है
धीरे-धीरे साहस, समझ बाद में
जो लोग पूछते हैं कि जब भगवान आ ही रहे थे तो एक ही बार में ठीक क्यों नहीं कर दिया, उन्हें वक्ता उत्तर देते हैं कि प्रारब्ध ऐसे ही कटवाया जाता है: साहस देकर धीरे-धीरे चीज़ें ठीक होती हैं। वे यह सीख देते हैं कि कभी यह न सोचें कि "हम कवच का पाठ कर रहे हैं तो पूरा लाभ क्यों नहीं हो रहा" — हम-आप में उतनी बुद्धि नहीं कि इन विषयों को समझ पाएँ, यह एक समय बाद समझ आता है। जिस तत्व या शक्ति के प्रति समर्पित होकर आप आवाहन करते हैं, वह ज़रूर आती है, बुरे प्रारब्ध के अनुरूप साथ रहकर उसे कटवाने का प्रयास करती है; यही, वे कहते हैं, सच्ची भक्ति और भगवान की कृपा है।
वक्ता पहले ही कहते हैं कि बोलने वाले तो बोलेंगे: जब भगवान ही आ रहे थे तो एक ही बार में ठीक क्यों नहीं कर दिया? उनका उत्तर है — देखिए प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को कैसे कटवाया गया: साधक को साहस दिया गया और धीरे-धीरे करके चीज़ें ठीक हुईं। इस घटना से, वे कहते हैं, सभी एक बात सीख सकते हैं: कभी यह न सोचें कि "हम कवच का पाठ कर रहे हैं, यह कर रहे हैं, तो हमें पूरा लाभ क्यों नहीं हो रहा।" आप और हम में, वे कहते हैं, उतनी बुद्धि नहीं है कि इन विषयों को समझ पाएँ। यह तो एक समय के बाद समझ में आता है — "अच्छा, उस समय भगवान ने इस प्रकार हमारी सहायता की थी।" जिस तत्व और शक्तियों के प्रति समर्पित होकर आप उनका आवाहन करते हैं, वे ज़रूर आती हैं, और हमारे बुरे प्रारब्ध के अनुरूप साथ रहकर, हमारा साथ देकर उसे कटवाने का प्रयास करती हैं। यही, वक्ता कहते हैं, सच्ची भक्ति है और यही भगवान की कृपा है। वे जोड़ते हैं कि जो लोग इस घटना के साक्षी रहे — जिनके परिवार में यह घटित हुई — वे आज पूर्ण रूप से समर्पित हो चुके हैं, जबकि पहले वे कोई पूजन-पाठ या संध्या आदि नहीं करते थे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।